नियति का विधान: भीष्म पितामह के अनजाने पाप का फल
कुरुक्षेत्र की वह शाम बहुत भारी थी। युद्ध के अठारह दिन समाप्त होने को थे, पर आकाश में अब भी चील-कौवों का शोर और हवा में बारूद और रक्त की गंध घुली हुई थी। रणभूमि के बीचों-बीच, तीरों की एक ऊँची शैया पर लेटे थे— भीष्म पितामह।
उनके शरीर का कोई भी अंग ऐसा नहीं बचा था जहाँ बाण न धँसा हो। उनका पूरा शरीर रक्त से लथपथ था, पर आँखों में एक अजीब सी व्याकुलता थी। मृत्यु उनके सामने खड़ी थी, पर 'इच्छा-मृत्यु' के वरदान के कारण उनके प्राण शरीर छोड़ने को तैयार नहीं थे।
तभी वहाँ मंद मुस्कान लिए भगवान श्रीकृष्ण पहुँचे।
कृष्ण को देखते ही भीष्म की आँखों से आँसू छलक आए। उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, "केशव! आप तो जानते हैं कि मैंने आजीवन मर्यादा और सत्य का पालन किया। मैंने कभी किसी स्त्री का अपमान नहीं किया, कभी किसी निर्दोष पर शस्त्र नहीं उठाया। फिर यह कैसा न्याय है? इस शरशैया पर मिलने वाली यह असहनीय पीड़ा मेरे किस पाप का फल है? क्या आप मेरे इस दारुण कष्ट का कारण बता सकते हैं?"
श्रीकृष्ण ने करुणा भरे स्वर में कहा, "पितामह, कर्म का गणित बहुत गहरा है। कभी-कभी हम इस जन्म के कर्मों में उत्तर खोजते हैं, जबकि कारण कहीं पीछे छिपा होता है। आपके पास दिव्य दृष्टि है, आप स्वयं अपने पूर्व जन्मों को क्यों नहीं देखते?"
कृष्ण की बात सुनकर भीष्म ने अपनी आँखें मूँद लीं। अपनी योगशक्ति से वे समय की धारा में पीछे की ओर बहने लगे।
* उन्होंने अपना वर्तमान जन्म देखा—एक निष्ठावान ब्रह्मचारी।
* वे 10 जन्म पीछे गए—एक न्यायप्रिय योद्धा।
* वे 50... 80... और पूरे 100 जन्म पीछे तक चले गए।
हर जन्म में उन्हें अपना आचरण शुद्ध और परोपकारी मिला। थककर उन्होंने आँखें खोलीं और बोले, "माधव! मैंने सौ जन्मों की यात्रा कर ली। कहीं भी ऐसा कोई पाप नहीं दिखा, जिसकी सजा इतनी भयानक हो। क्या विधाता से कोई चूक हुई है?"
श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "तात! एक जन्म और पीछे जाइए। उत्तर 101वें जन्म के पन्नों में छिपा है।"
भीष्म ने पुनः ध्यान लगाया। इस बार वे 101वें जन्म में पहुँचे। उस जन्म में वे एक राज्य के राजा थे। एक बार वे अपनी सेना के साथ वन मार्ग से जा रहे थे। अचानक मार्ग में एक विषैला सर्प (करैत) रेंगता हुआ आ गया।
सैनिक उस सांप को मारने दौड़े, पर राजा (भीष्म) ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने कहा, "इसे मारो मत, बस रास्ते से हटा दो।"
एक सैनिक ने सांप को अपने बाण की नोक पर उठाया और दूर झाड़ियों में फेंक दिया। पर दुर्भाग्य! वह झाड़ी 'कंटकारी' (काँटों वाली) थी। वह सांप उन तीखे काँटों के बीच जाकर बुरी तरह फँस गया। वह जितना निकलने की कोशिश करता, काँटे उतने ही उसके मांस में धँसते जाते।
भीष्म ने देखा कि वह सांप छह दिनों तक उसी काँटों की शैया पर तड़पता रहा। चींटियाँ उसे जीवित ही नोचने लगीं और अंत में उसने तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।
जब भीष्म का ध्यान टूटा, तो उनका गला भर आया था। उन्होंने कांपते हुए कहा, "हे त्रिलोकीनाथ! वह तो एक अनजानी भूल थी। मेरा इरादा उस जीव को मारना नहीं था।"
श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया:
> "पितामह! कर्म चाहे जानबूझकर किया जाए या अनजाने में, उसका परिणाम निश्चित होता है। उस जीव को जो कष्ट मिला, उसका निमित्त आप बने। आपके पिछले सौ जन्मों का पुण्य इतना शक्तिशाली था कि इस पाप का फल उदय नहीं हो सका। लेकिन आज, जब इस महायुद्ध में आपने अधर्म का पक्ष लिया, तो आपके पुण्यों का कवच कमजोर पड़ गया और 101 जन्म पुराना वह पाप 'बाणों की शैया' बनकर आपके सामने आ खड़ा हुआ।"
> भीष्म पितामह को अपनी जिज्ञासा का समाधान मिल चुका था। उन्होंने समझ लिया कि प्रकृति के न्याय में न तो देरी है और न ही अंधेर।
* कर्म का फल: हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है। हम जो बोते हैं, वही काटते हैं, चाहे उसमें सौ जन्म ही क्यों न बीत जाएं।
* सजगता: हमें अपने कार्यों के प्रति हमेशा जागरूक रहना चाहिए। अनजाने में पहुँचाया गया कष्ट भी हमारे कर्मों के खाते में जुड़ जाता है।
* करुणा: जीव मात्र के प्रति करुणा रखना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
🙏🏻जय श्री कृष्ण 🥀
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