मंत्र जाप की प्रक्रिया वास्तव में है क्या?


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मंत्र जाप की प्रक्रिया वास्तव में है क्या........ ? 


शरीर का काम करने का अपना ही एक तरीका है। 


ये हमारे अभ्यास से आया है। भोजन पेट में जाएगा। हमारे वर्षों काम करने के तरीके से शरीर की आदत बन गई है। इसमें यदि बदलाव करना है तो शरीर को नये सिरे से प्रोग्राम करना होगा। 


मंत्र जाप की प्रक्रिया को बिना समझे करने का कोई अर्थ नहीं होने वाला है। “ॐ नमः शिवाय” हे शिव मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। यदि कोई व्यक्ति अमेरिका में रहता है, उसे प्रणाम करना है, तो उसे वही जाकर प्रणाम करेंगे तो एक ही प्रणाम में काम चल जाएगा या फिर चिट्ठी लिखिए या फिर फोन घुमाइए। तरीके तो इतने ही हैं। अब नहा धोकर माला लेकर किसी झोंपड़ी में बैठ गए हो उसका फोटो रखकर, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। 5 हजार बार करो या फिर 25 हजार इससे क्या होने वाला है.......... ? 


कोई एहसान कर रहे हो, कि वो तुम्हारा प्रणाम लेने तुम्हारे पास आए। मंत्र जाप गलत नहीं है तरीका गलत है। 


पहली चीज जिस देवता का जाप कर रहे हो वह रहता कहां है........ ? 


दूसरा मंत्र जाप का उदेश्य क्या है.......... ? 


एक महात्मा चुनार गंगा तट के श्मशान में बैठकर गायत्री जाप करते थे | सुनकर भी बड़ा अजीब लगता है। मैंने उनसे पूछा महाराज ये क्या करते रहते हो......... ? 


उन्होंने कहा स्वामी जी, यहां बहुत सारी प्रेत आत्माएं हैं उनकी मुक्ति के लिए कोशिश करता हूँ। उनके जवाब ने स्तब्ध कर दिया मुझे। गायत्री वास्तव में मुक्ति और मोक्ष का ही मंत्र है। इसे तो वहीं पढ़ा जा सकता है, जहां जीव मुक्त नहीं हुए हैं। श्मशान में शून्यकाल होता है, शून्य में शब्द अनंत तक गति कर जाता है। शून्य काल निर्बाध समय। 


लेकिन ज्यादातर हम लोग धन संतान आदि भौतिक वस्तुओं के लिए ही मंत्र जाप करते हैं। 


आपको ध्यान होगा जब महा मृत्युंजय किया जाता है तो पहले पता किया जाता शिव का उस समय निवास कहां है। वास्तव में ऐसा हर मंत्र के जाप से पहले किया जाना चाहिए। तुम्हें अपने पिताजी को भोजन कराना है, आप भोजन लेकर खेत पर पहुँच गए। वहाँ जाकर पता चला आज वो खेत पर आए ही नहीं हैं, वो तो घर के पड़ोस में ही बैठे थे। तुम भी अपने घर में पूरे समय नहीं रहते हो। एक टांग पर खड़ा कर रखा है उसे बाँसुरी लेकर, कोई कब तक एक टांग पर खड़ा रहेगा......... ? 


पहले अपने तरीकों की समीक्षा करनी चाहिए। 


कोई चौबीस घंटे बाँसुरी बजाता है........ ? 


देवी देवता कोई भी हो आपको इस धरती की ही साधनाएं करनी हैं। मंत्र के सतत जाप का अर्थ होता है अपने और देवता के मध्य पाथ बनाना। जैसे ईंट से सड़क बनाई जाती है। उसी प्रकार से आप एक-एक जाप किये गए मंत्र से पाथ अपने इष्ट तक बनाते हैं। जाप का उदेश्य इतना ही होता है। इसके लिए जरूरी है आपका देवता रहता कहां है उसका सही पता आपके पास होना चाहिए। 


इसके अलावा वो कर क्या रहा है.......... ? 


गलत समय पर आवाज लगाएंगे तो नुकसान ही होगा। तुम पत्नी के साथ बिस्तर पर हो और तुम्हें कोई आवाज लगा दे तो........ ? 


महामृत्युंजय मंत्र करते समय ये सब कुछ गणित लगाए जाते है। उस पते तक पहुँचने के लिए पर्याप्त साधन भी आपके पास होना चाहिए। जो मंत्र हृदय के उस पार ले जाता है, उसके लिए जरूरी है। हृदय के इस पार मनुष्य हृदय के उस पार ईश्वर है। गायत्री हृदय के उस पार है। इस मंत्र को करने का सही तरीका है चित्त से करना। 


इसे दूसरे तरीके से समझते हैं। मनुष्य को मृत्यु के बाद श्मशान तक ले जाते है, यहाँ दाह संस्कार होता है। दाह संस्कार के बाद भौतिक शरीर जलकर नष्ट हो जाता है। तब जीवात्मा की यात्रा शुरू होगी जो मोक्ष तक जाएगी। यही मंत्र के साथ करना है, पहले मंत्र को जिह्वा से हृदय तक ले जाएं। फिर उसे हृदय से पार लेकर जाएं। क्योंकि आपका इष्ट हृदय के उस पार रहता है। हृदय में ले जाकर मंत्र को रखना नहीं है, कि सारा स्टॉक होने पर आगे सप्लाई करेंगे। मंत्र सीधे चित्त से ब्रह्मांड में गति कर जाए।


चित्त हृदय में होता है या हृदय ही चित्त है इसे ऐसा समझिए। 


आप मंत्र करते हैं विचार भी चलते रहते हैं, कई बार एक से अधिक विचार चलते रहते हैं। अर्थात आप की जिह्वा मंत्र कर रही है, और चित्त अलग ही दुनिया में लगा है। हम मंत्र को इस प्रकार से करें कि चित्त बीच में आए ही नहीं। जैसे बायपास रोड निकल जाते है या फिर पुल से निकल जाते हैं, पुल के नीचे सारी गंदगी बहती रहती है। आप इसे ऐसे समझ लीजिए पुल के नीचे माया का क्षेत्र है, या चित्त है। बड़ा अच्छा रहा हमने पुल बना लिया।


गुरु मंत्र हों, गायत्री मंत्र, शिव मंत्र इन सबके इष्ट एक ही हैं, ये हृदय के उस पार हैं। 


मंत्र मनुष्य से परमात्मा तक निर्बाध रूप से जा सके इसकी व्यवस्था बनानी होगी। इसकी सही जानकारी होनी चाहिए तब ही आप इसे कर पाएंगे। ईश्वर से धन दौलत नहीं मिलनी है। हमें उधर जाना है जहां हमें मोक्ष होना है। हमें अपने अस्तित्व को ईश्वर में समाहित करना है। वास्तव में कोई कहीं जाता नहीं है, ये मंत्र के साथ काम करने का तरीका है। 


सत्य कहा जाए तो ये जाप जिह्वा से किये भी नहीं जाते हैं, ये चित्त से ही किये जाते हैं। लेकिन जब तक अभ्यास नहीं बना ये भी तरीका है या तो चित्त को मंत्र पर काम करवाएं या फिर चित्त को बीच में आने ही न दें। तभी आप मंत्र पर सही तरीके से काम कर पाएंगे। 


एक बच्चा मेले में खो गया है, मां चिल्ला रही है उसे पुकार रही है, आप इस मां की मानसिक अवस्था और भौतिक गतिविधियों को भी ध्यान में ले कर आइए। यदि ज्यादा शोर है तो उसकी आवाज बेटे तक नहीं जाएगी। इस अवस्था में ये मां को क्या करना चाहिए....... ? 


जिस धरती पर आप हैं, सब चिल्ला रहे हैं, हे भगवान, हायो रब्बा, हे क्राइस्ट। जब आप धरती से ऊपर उठते हैं तो ये सभी आवाजें आपको सुनाई पड़ती हैं।आप अपना मंत्र भी उसी शोर शराबे में कर रहे हैं। सभी परेशानी में है, कोई परेशानी कह देता है, कोई अपने अंदर कह रहा है। धरती पर होने का अर्थ है पीड़ा में होना। यहां अरबों जीव हैं तो कल्पना की जा सकती है कितना शोर होता होगा........ ? 


इसी शोर में आपका मंत्र भी है। आप खुद अपने इष्ट के पास जाइए, उसके कान में कह दीजिए “ॐ नमः शिवाय”। एक ही बार में काम चल जाएगा। 


वेदव्यास पुराण लिखने से पहले गणेश जी को मनाने गए थे। वेदव्यास ने पहले एक लाख जाप नहीं किये थे। 


दूसरा तरीका चिट्ठी लिखने का है, तुलसी दास ने राम को प्रेम पत्र लिखे थे। विनय पत्रिका उन्हीं का संकलन है। 


तीसरा तरीका है, वहाँ तक पहुँचने के लिए पाथ बनाना। मंत्रों का ही सड़क बना डालिए। जिसमें बड़े पुल, पुलिया सभी हो। अब आप ये नहीं कह सकते हैं इसमें एक लाख ही ईंट लगेगी। यदि सवा लाख लगेगी तो भी पीछे नहीं हटना है। किसी का जाप एक लाख में हो गया होगा, हम कम अनुभवी है, तो क्या फर्क पड़ता है ढेड़ लाख जाप लग गए, उदेश्य तो पूरा हो गया है।


मैं इसे और सरल भाषा में कह देता हूँ। धरती पर जब भी आप कुछ कर रहे हैं, तो कम्युनिकेशन का कोई माध्यम तो बनाना ही होगा। फोन सैमसंग और सिम एयरटेल की इससे काम नहीं चलने वाला है। यहां फोन भी आपका होगा और बातें भी आपकी होगी, सिम भी आपकी अपनी होगी। तो जो मंत्र धरती के हैं उनका यही तरीका है। लेकिन जब ईश्वर तक जाना है। तब वास्तव में ये मंत्र कुछ भी नहीं है, चित्त को समाप्त करने के लिए है। शिव से शिवत्व की प्राप्ति करना। आप प्रेम में उतरें और प्रेम ही हो जाएं।  सिर्फ दूसरे को समाप्त करना है। मंत्र के माध्यम से खुद को समाप्त कर देना है। कर्म से शरीर बना है, जब मंत्र के माध्यम से एक-एक कर्म की आहुति दे रहे हैं। 


अंत में कोई कर्म बचेगा ही नहीं, तो शरीर भी नहीं बचेगा। फिर चित्त भी नहीं बचेगा।  


हमने अपना घर तोड़ा है, ढेर सारा कबाड़ पड़ा है, एक ट्रक वाले को ठेका दे दिया सारा कबाड़ा फेंक दो। ट्रक वाला सारा कबाड़ा फेंक आया। अब पीछे कुछ बचा ही नहीं, सिर्फ खुला हुआ आकाश है। ये मनुष्य शरीर कबाड़ ही तो है, गायत्री, गुरु मंत्र या फिर शिव मंत्र कर ही रहे हैं इस कबाड़े को नष्ट करने के लिए।  


घर ईंट पत्थर से बनता है, मनुष्य शरीर कर्म से बनता है। मंत्र तो जपा ही था कर्म को नष्ट करने के लिए। वशिष्ठ जी इसी मनुष्य शरीर को घट कह देते हैं। घट की चिंता क्यों करनी है........ ? 


आयुर्वेद..... मनुष्य के शरीर में रोग मानता है, 


रस विद्या मनुष्य होने को ही रोग मानती है। 


जब आप गायत्री का उपयोग करते हैं तो ब्रह्म होने के लिए ब्रह्म का ही उपयोग कर रहे हैं |

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