उद्धव और भगवान श्री कृष्ण संवाद।।

उद्धव और भगवान श्री कृष्ण संवाद।।



एक बार भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने भगवान कृष्ण से पूछा: "आप द्रोपदी चीरहरण के समय चुप क्यों रहे?" 
उद्धव और श्री कृष्ण जी का यह संवाद हम सभी के जीवन के लिए एक बड़ा सबक है।

उद्धव का प्रश्न:
"हे कृष्ण! आप तो अंतर्यामी हैं। आपने कहा कि सच्चा मित्र वही है जो बिना मांगे मदद करे। फिर आप पांडवों के संकट के समय चुप क्यों रहे?
आपने युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नहीं रोका?
आपने पासे को धर्मराज के पक्ष में क्यों नहीं पलटा?
जब द्रोपदी को भरी सभा में घसीटा गया, तब भी आप नहीं आए।
आप तब आए जब दुशासन उनका चीर हरण करने लगा। इतनी देरी क्यों? क्या यही सच्ची मित्रता है?"

भगवान कृष्ण का उत्तर (कर्म और विवेक का सिद्धांत):
भगवान मुस्कुराए और बोले, "उद्धव, विजय उसी की होती है जो विवेक से काम लेता है। दुर्योधन के पास विवेक था, उसने शकुनि को अपनी ओर से खेलने दिया। धर्मराज युधिष्ठिर भी विवेक से काम लेकर मुझे अपनी ओर से खेलने को कह सकते थे। सोचो, अगर शकुनि और मैं खेलते तो कौन जीतता?"

भगवान को 'बाँध' दिया गया:
"धर्मराज ने मुझसे प्रार्थना की थी कि मैं तब तक सभाकक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए। वे मुझसे छुपकर जुआ खेलना चाहते थे। मैं उनकी प्रार्थना से बंधा हुआ बाहर प्रतीक्षा कर रहा था। जब वे हारते गए, तो उन्होंने मुझे नहीं, बल्कि भाग्य को कोसा।"

द्रोपदी की पुकार:
"जब दुशासन द्रोपदी को सभा में लाया, तब तक उसने मुझे नहीं पुकारा। जब उसकी स्वयं पर से निर्भरता टूटी और उसने 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा' कहकर मुझे पुकारा, मैं उसी क्षण वहां पहुँच गया। बताओ उद्धव, मेरी गलती कहाँ थी?"

साक्षी भाव:
उद्धव ने फिर पूछा, "क्या आप तभी आएंगे जब बुलाया जाएगा? क्या आप स्वतः मदद नहीं करेंगे?"
कृष्ण बोले, "उद्धव, सृष्टि कर्मफल के सिद्धांत पर चलती है। मैं हस्तक्षेप नहीं करता, मैं केवल 'साक्षी' हूँ। मैं हर क्षण तुम्हारे साथ रहकर सब देखता हूँ। यही मेरा धर्म है।"

उद्धव का कटाक्ष और अंतिम सत्य:
उद्धव बोले, "वाह! तो हम पाप करते रहें और आप बस देखते रहेंगे?"

भगवान ने अंतिम सत्य कहा: 
"उद्धव, जब तुम यह अनुभव कर लोगे कि मैं हर क्षण तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हें देख रहा हूँ, तो क्या तुम पाप कर सकोगे? 
तुम पाप तभी करते हो जब मुझे भूल जाते हो और सोचते हो कि कोई नहीं देख रहा। युधिष्ठिर की भी यही भूल थी।"

निष्कर्ष:
उद्धव जी अभिभूत हो गए। यह संवाद हमें सिखाता है कि पाप हम तभी करते हैं जब भगवान को भूल जाते हैं। अगर हम हर पल उनकी उपस्थिति महसूस करें, तो हमारा जीवन पापमुक्त और दिव्य हो जाएगा।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
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