इसीलिए गणित एकमात्र पूर्ण विज्ञान है, क्योंकि वह नितांत असत्य है। केवल असत्य के साथ ही तुम परिपूर्ण हो सकते हो। वास्तविकता तुम्हारे नियमों की, निर्धारित व्यवस्थाओं की फिक्र नहीं करती। वास्तविकता अपने ढंग से चलती है। गणित एक पूर्ण विज्ञान है, मनुष्य निर्मित है।
यदि मनुष्य खो जाए पृथ्वी से, तो गणित सबसे पहले खो जाएगा। बाकी दूसरी चीजें तो बनी रह सकती हैं, लेकिन गणित नहीं बच सकता। सारे नियम और अनुशासन औसत के लिए हैं; और औसत कोई है नहीं। और औसत कोई हो भी नहीं सकता। व्यक्ति को अपना रास्ता खोजना होता है।
औसत को समझने के लिए उसका उपयोग कर लेना और भूल जाना उसके विषय में। उससे थोड़ा इशारा मिल सकता है। लेकिन सुनिश्चित समझ नहीं मिल सकती। महृषि पतंजलि जैसे व्यक्ति कभी नियम नहीं देते; वे केवल इशारे देते हैं, संकेत देते हैं। संस्कृत का मूल पाठ कहता है ।
स्थिर सुखम् आसनम्—कहीं कोई 'चाहिए' नहीं है। तुम्हें संकेत का अर्थ अपने अंतस में खोलना पड़ता है। तुम्हें अनुभव करना है उसे, समझना है और प्रयोग करना है उसे, तब तुम नियम तक पहुंचोगे। लेकिन वह नियम केवल तुम्हारे लिए होगा -किसी और के लिए नहीं।
जिस क्षण तुम 'चाहिए' बीच में ले आते हो, चीजें कठिन हो जाती हैं। यदि लोग इस बात पर ध्यान रख सकें, तो यह संसार बहुत ही सुंदर संसार होगा ;कोई किसी को कुछ करने के लिए मजबूर नहीं कर रहा होगा। कोई किसी दूसरे को अनुशासित करने की कोशिश नहीं कर रहा होगा।
क्योंकि तुम्हारा अनुशासन तुम्हारे लिए ठीक रहा होगा, वह दूसरे के लिए जहर हो सकता है। जरूरी नहीं है कि तुम्हारी औषधि सबके लिए हो।लेकिन मूढ़ व्यक्ति सदा नियमों द्वारा जीते हैं। मूढ़ मन नकल करता रहता है। इन सूत्रों को इशारों की तरह समझो।
उन्हें अपनी समझ का हिस्सा बनने दो , लेकिन उनकी नकल करने की कोशिश मत करो। उन्हें अपने भीतर गहरे उतरने दो ताकि वे तुम्हारी समझ बन जाएं; और फिर तुम खोज लेना अपना मार्ग। गहरी शिक्षा हमेशा परोक्ष होती है। प्रत्येक व्यक्ति की सुख की इच्छा होती है।
जब भी तुम आराम में नहीं होते तो तुम उस स्थिति को बदलना चाहोगे ..यह स्वाभाविक है। तो सदा अपने भीतर की सहज-स्वाभाविक अनुभूति को सुनना। वह करीब -करीब हमेशा सही होती है। यदि तुम्हारा शरीर गहन सुख में, गहन विश्राम में होता है, अच्छा अनुभव कर रहा होता है।
एक स्वास्थ्य घेरे होता है तुमको : तो वही निर्णय का मापदंड, कसौटी होनी चाहिए। और यह खड़े हुए संभव है।यह बैठे हुए संभव है, यह लेटे हुए संभव है। यह कहीं भी संभव है, क्योंकि यह आंतरिक अनुभूति है सुख की, आराम की।
स्वर विज्ञान: ''प्रयत्न की शिथिलता और असीम पर ध्यान से आसन सिद्ध होता है''। क्या तुमने कभी ध्यान दिया है कि जब तुम किसी थिएटर में कोई फिल्म देखने जाते हो तो कितनी बार तुम अपने बैठने का ढंग बदलते हो? अगर पर्दे पर कोई बहुत सनसनीखेज सीन चल रहा होता है।
तो तुम कुर्सी पर आराम से टिके हुए बैठ नही सकते। तुम सीधे बैठ जाते हो; तुम्हारी रीढ़ सीधी हो जाती है। अगर कुछ उबाऊ बात चल रही होती है। तो तुम शिथिल रहते हो। अगर कुछ बहुत ही अप्रीतिकर सीन चल रहा होता है, तो तुम बार -बार अपना बैठने का ढंग बदलते हो।
अगर सच में कोई सुंदर बात वहां चल रही होती है, तो तुम्हारी आँख का झपकना तक रुक जाता है। कोई गति नहीं होती, तुम बिलकुल स्थिर हो जाते हो, अकंप, जैसे कि शरीर हो ही नहीं। क्या तुमने इन बातों के आपसी संबंध को देखने की कोशिश की है?
आसन की सिद्धि में पहली बात है प्रयास की शिथिलता, जो इस संसार की सर्वाधिक कठिन बातों में से एक है। यदि तुम उसे समझ लेते हो तो बहुत सरल है, यदि तुम नहीं समझते तो बहुत कठिन है। यह किसी अभ्यास की बात नहीं है; समझ की बात है।
फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक एमाइल कुए ने एक विशिष्ट नियम खोजा है'' 'विपरीत प्रभाव का नियम'। वह मनुष्य मन की सर्वाधिक आधारभूत बातों में से एक है। कुछ चीजें हैं जिन्हें तुम करना चाहते हो, तो कृपया उन्हें करने की कोशिश मत करना, अन्यथा विपरीत प्रभाव होगा।
उदाहरण, तुम्हें नींद नहीं आ रही है। तो प्रयास मत करना नींद लाने का। यदि तुम प्रयास करते हो, तो नींद और मुश्किल हो जाएगी। यदि तुम बहुत ज्यादा प्रयास करते हो तो नींद असंभव हो जाएगी, नींद तभी आती है जब कोई प्रयास नहीं होता। तुम बस विश्राम में होते हो और कुछ नहीं।
तुम नींद के विषय में सोच तक नहीं रहे होते। कुछ चित्र गुजरते हैं मन से... तुम उन्हें तटस्थ भाव से देखते हो। तुम्हें उनमें भी कोई बहुत ज्यादा रस नहीं होता है , क्योंकि यदि रस पैदा हो जाए तो नींद खो जाती है। बस तुम उनसे अलग बने रहते हो, विश्राम में होते हो, तो नींद आ जाती है।
अगर तुम कोशिश करने लगो कि नींद आनी ही चाहिए, तो जब यह 'चाहिए' बीच में आ जाता है तो बात करीब -करीब असंभव हो जाती है। तब तुम सारी रात जागते रह सकते हो। और यदि तुम्हें नींद आ भी जाती है। तो केवल इसीलिए कि तुम प्रयास द्वारा थक जाते हो।
एमाइल कुए ने अभी इसी सदी में ही 'विपरीत प्रभाव का नियम' खोजा। महाऋषि पतंजलि इसे करीब पांच हजार वर्ष पहले ही जानते थे। वे कहते हैं ,प्रयत्न शैथिल्य -प्रयास की शिथिलता। 'यदि तुम बहुत ज्यादा प्रयास करते हो, तो यह संभव नहीं होगा। अप्रयास में ही यह घटता है।
सारे प्रयास छूट जाने चाहिए पूरी तरह से, क्योंकि प्रयास संकल्प का ही हिस्सा है और संकल्प समर्पण के विपरीत है। यदि तुम कुछ 'करने' की कोशिश करते हो, तो तुम परमात्मा को नहीं करने दे रहे हो। जब तुम समर्पण कर देते हो, जब तुम कह देते हो,अगर नींद को भेज रहे हो, ठीक।
अगर नहीं भेज रहे तो , वह भी ठीक। कोई शिकायत नहीं । अगर मेरे लिए नींद जरूरी है तो भेज दो। अगर नहीं जरूरी है तो मत भेजो। इसी भांति कोई प्रयास को छोड़ता है। अप्रयास एक अदभुत घटना है। एक बार तुम यह जान लेते हो तो लाखों बातें तुम्हारे लिए संभव हो जाती हैं।
प्रयास से मिलता है बाजार; अप्रयास से मिलता है परमात्मा। प्रयास से तुम कभी नहीं पहुंच सकते निर्वाण तक ...तुम नई दिल्ली पहुंच सकते हो, लेकिन निर्वाण तक नहीं। प्रयास से तुम संसार की वस्तुएं पा सकते हो; वे कभी बिना प्रयास के नहीं मिलती ।
यदि तुम ज्यादा धन की तलाश में हो। तो संसार के मार्ग हैं । हिंसा और संकल्प के मार्ग। यदि तुम संकल्प को शिथिल कर देते हो , तो तुम हटा दिए जाओगे कोई छलांग लगा कर तुम्हारे ऊपर चढ़ जाएगा। तुम साधन बना दिए जाओगे।
यदि तुम संसार के मार्गों पर सफल होना चाहते हो, तो कभी मत सुनना पतंजलि जैसे लोगों की। बेहतर है मैक्यावेली को, स्वेट मार्टिन, चाणक्य को पढना—जो संसार के सर्वाधिक चालाक व्यक्ति हैं। वे तुम्हें बताएंगे कि कैसे सब का शोषण करना और किसी को अपना शोषण नहीं करने देना।
कैसे निर्दयी होना -बिना किसी करुणा के, एकदम कठोर। केवल तभी तुम पा सकते हो सत्ता, प्रतिष्ठा, धन -संसार की तमाम चीजें। लेकिन यदि तुम कुछ पारलौकिक अनुभूति पाना चाहते हो, तो एकदम विपरीत बात चाहिए ;अप्रयास चाहिए, प्रयास शून्यता , विश्रांति चाहिए।
राजनीति की दुनिया के, धन की, बाजार की दुनिया के बहुत से लोग कहते हैं।'हम शांति पाना चाहते हैं। लेकिन राजनीति और शांति... ये दोनों बातें एक साथ संभव नहीं हैं। हम आराम से शांत नहीं बैठ सकते।' शांत होना एक बिलकुल ही अलग आयाम है -ठीक विपरीत आयाम है।
तुम संसार में संकल्प के साथ सफल होते हो। संसार में सफलता का सूत्र है... 'विल टु पावर'। पतंजलि का मार्ग नहीं है.. 'विल टु पावर', वह है समग्रता के प्रति समर्पण ; 'प्रयत्न शैथिल्य' -अप्रयास। तुम्हें तो बस विश्राम में होना है। प्रयास मत करना; अनुभूति को ही काम करने देना।
तुम आराम को अपने ऊपर नहीं थोप सकते हो?यह असंभव है। तुम विश्राम में हो सकते हो यदि तुम सहजता से शिथिल हो जाओ। तुम उसे जबरदस्ती नहीं ला सकते। यदि तुम किसी व्यक्त
ि से प्रेम नहीं करते, तो नहीं करते;तुम जबरदस्ती प्रेम को नहीं ला सकते हो।
तुम कोशिश कर सकते हो, दिखावा कर सकते हो, लेकिन एकदम विपरीत परिणाम होगा तुम्हारे प्रयत्नों का एकमात्र परिणाम यही होगा। तुम उस व्यक्ति से घृणा करने लगोगे ।तुम कहोगे, 'यह कैसा अजीब व्यक्ति है, क्योंकि मैं तो प्रेम करने की इतनी कोशिश कर रहा हूं और कुछ घटता ही नहीं।
तुम उसे जिम्मेवार ,अपराधी ठहराओगे, जैसे कि वही कुछ कर रहा है। लेकिन वह कुछ नहीं कर रहा है। प्रेम , प्रार्थना ,आसन संकल्प से नहीं हो सकता। तुम्हें इनकी अनुभूति में उतरना पड़ता है। अनुभूति संकल्प से एकदम अलग बात है।
बुद्ध संकल्प के मार्ग से बुद्ध नहीं बन सके। उन्होंने लगातार छह वर्ष तक प्रयत्न किया संकल्प से। वे संसारी व्यक्ति थे, राजकुमार की भांति शिक्षा -दीक्षा हुई थी उनकी। सम्राट बनने का प्रशिक्षण मिला था उन्हें। उन्हें जरूर वही सब सिखाया गया होगा जो चाणक्य ने कहा है।
चाणक्य कुछ ज्यादा ही चालाक है .. शिखर है। क्योंकि भारतीय चित्त की एक खूबी है,जड़ों तक जाने की। यदि वे बुद्ध होते हैं, तो सच में वे बुद्ध होते हैं। यदि वे चाणक्य होते हैं, तो तुम उनके साथ मुकाबला नहीं कर सकते । जहां भी वे उतरते हैं, एकदम जड़ों तक उतरते हैं।
तो बुद्ध को जरूर सिखाए गए होंगे संसार के ढंग। उनको सांसारिक व्यक्तियों के बीच जीना था ,अपना साम्राज्य देखना था। प्रत्येक राजकुमार को तैयार किया जाता है। और फिर वे सब छोड़ कर चले गए। लेकिन महल छोड़ कर चले जाना। राज्य छोड़ कर चले जाना आसान है।
मन के प्रशिक्षण को छोड़ना कठिन है। छह वर्ष तक उन्होंने संकल्प द्वारा परमात्मा को पाने का प्रयास किया। उन्होंने वह सब किया जो किसी मनुष्य के लिए संभव है। वह भी किया जो मनुष्य के लिए संभव नहीं है। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।
जितनी उन्होंने कोशिश की, उतना ही दूर उन्होंने अपने को पाया। असल में जितना ज्यादा संकल्प उन्होंने किया । उतना ही उन्होंने अनुभव किया कि वे दूर हैं ...परमात्मा कहीं नहीं है। कुछ उपलब्धि नहीं हुई फिर एक शाम उन्होंने सब छोड़ दिया। उसी रात वे बुद्धत्व को उपलब्ध हो गए।
तभी घटित हुआ 'प्रयत्न शैथिल्य' -प्रयास की शिथिलता। वे संकल्प द्वारा बुद्ध नहीं हुए, वे बुद्ध हुए जब उन्होंने समर्पण किया, जब उन्होंने सारा प्रयास छोड़ दिया। इसीलिए हर संभव प्रयास करो जो कि तुम कर सकते हो, लेकिन सदा स्मरण रहे।
हर संभव प्रयास पर यह जोर केवल इसीलिए है ताकि तुम्हारा संकल्प बिखर जाए, और संकल्प के साथ जुड़ा सपना टूट जाए। तुम संकल्प से इतने थक जाओ कि एक दिन तुम गिर पड़ो, तुम हार कर सब छोड़ दो और उसी दिन तुम सबुद्ध हो जाते होब लेकिन जल्दी मत करना।
क्योंकि तुम बिना प्रयास किए हुए ही सब प्रयास छोड़ सकते हो। लेकिन तब कोई मदद न मिलेगी। तुम परमात्मा से नहीं जीत सकते चालाकी द्वारा। तुम्हें बहुत निर्दोष होना होगा। बुद्धत्व अपने आप घटित होता है। ये सीधी साफ परिभाषाएं हैं।
महृषि पतंजलि नहीं कह रहे हैं, 'ऐसा करो।’ वे तो बस मार्ग दिखा रहे हैं। यदि तुम उसे समझ लेते हो , तो वह तुमको, तुम्हारे मार्ग को, तुम्हारे अंतस को प्रभावित करने लगेगा । उसे आत्मसात करो ;गहरे उतरने दो। बहने दो अपने रक्त में ..बनने दो मांस -मज्जा। बस इतना ही।
ये सूत्र रटने के लिए नहीं हैं। इन्हें स्मृति में रख लेने की जरूरत नहीं है, इन्हें प्राणों में उतारने की जरूरत है। तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व को बात समझ में आनी चाहिए।बस इतना ही वे अपना काम शुरू कर देती हैं 'और असीम पर ध्यान से आसन सिद्ध होता है''।
मन बहुत कुशल है... सीमित के साथ। यदि तुम धन के ,सत्ता के ,राजनीति के विषय में सोचते हो, तो मन कुशल है। यदि तुम शब्दों के , दर्शन के, सिद्धांतो के , धारणाओं के विषय में सोचते हो। तो मन कुशल है ..ये सब सीमित बातें हैं।
लेकिन यदि तुम परमात्मा के विषय में सोचते हो, तो अचानक मन ठिठक जाता है। एक शून्य आ जाता है। तुम क्या सोच सकते हो परमात्मा के विषय में? यदि तुम कुछ भी सोच सकते हो, तो फिर वह परमात्मा नहीं है; वह सीमित हो गया।
यदि तुम परमात्मा का विचार करते हो कृष्ण के रूप में, तो वह परमात्मा नहीं है; तब श्रीकृष्ण वहां हो सकते हैं अपनी बांसुरी बजाते हुए, लेकिन सीमा आ गई। वह परमात्मा न रहा, तुमने एक सीमा दे दी। सुंदर छवि है , लेकिन असीम के सौंदर्य की तुलना में कुछ भी नहीं है।
दो प्रकार के परमात्मा हैं। पहला, धारणा का दूसरा अस्तित्व का। धारणा तो एक खिलौना है जिससे तुम्हारा मन खेलता है। वास्तविक परमात्मा तो बड़ा विराट है। तब परमात्मा खेलता है तुम्हारे मन के साथ न कि तुम्हारा मन खेलता है परमात्मा के साथ।
तब परमात्मा तुम्हारे हाथ का खिलौना नहीं होता; तुम एक खिलौना होते हो परमात्मा के हाथ में। सारी बात बदल जाती है। अब तुम नियंत्रण नहीं करते -नियंत्रण तुम्हारे हाथ से छूट जाता है। अब परमात्मा तुम्हें चलाता है। इसके लिए सही शब्द है 'आविष्ट होना।
असीम द्वारा आविष्ट होना, संचालित होना। फिर यह बात तुम्हारे मन के पर्दे पर किसी चित्र की भांति नहीं रहती। नहीं, वहां कोई चित्र नहीं होता। एक विराट शून्यता होती है -और उस विराट शून्यता में तुम खो रहे होते हो। न केवल परमात्मा की परिभाषा खो जाती है।
सीमाएं भी खो जाती हैं; जब तुम असीम के संपर्क में आते हो। तो तुम भी अपनी सीमाएं खोने लगते हो। तुम्हारी सीमाएं भी धुंधली - धुंधली हो जाती हैं , खोने लगती हैं, ज्यादा लोचपूर्ण हो जाती हैं; तुम आकाश में धुएं की भाति विलीन होने लगते हो।
एक घड़ी आती है, तुम देखते हो स्वयं को ..और तुम वहां नही होते। तो महृषि पतंजलि दो बातें कहते हैं : अप्रयास और चैतन्य का असीम पर केंद्रित होना। इस भांति तुम आसन सिद्ध करते हो। और यह केवल शुरुआत है, यह केवल शरीर है। व्यक्ति को और गहरे उतरना होता है।
स्वर विज्ञान: 'जब आसन सिद्ध हो जाता है तब द्वंद्वों से उत्पन्न अशांति की समाप्ति होती है''। जब शरीर सच में ही सुख में होता है, विश्रांत होता है, शरीर की लौ कांप नहीं रही होती स्थिर होती है, कोई गति नहीं होती—अचानक जैसे समय रुक गया हो, कोई हवा न चल रही हो।
प्रत्येक चीज थिर और शांत हो और शरीर में कोई उत्पेरणा न हो हिलने —डुलने की, वह थिर हो, गहनरूप से संतुलित, शांत, मौन, अपने स्वभाव में स्थित. उस अवस्था में सभी द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और द्वंद्वों के कारण उत्पन्न अशांति समाप्त हो जाती है।
क्या तुमने ध्यान दिया कि जब भी तुम्हारा मन अशांत होता है तो तुम्हारा शरीर भी अशांत और बेचैन होता है, तुम चुपचाप नहीं बैठ सकते? या जब भी तुम्हारा शरीर बेचैन होता है तो तुम्हारा मन मौन नहीं हो सकता? वे दोनों जुड़े हैं। पतंजलि अच्छी तरह से जानते हैं ।
कि शरीर और मन दो चीजें नहीं हैं, तुम शरीर और मन, दो में बंटे हुए नहीं हो। शरीर और मन एक ही चीज है। तुम साइकोसोमैटिक हो; तुम मनोशरीर हो। शरीर केवल तुम्हारे मन का प्रारंभ है और मन तुम्हारे शरीर के अंतिम छोर के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
दोनों एक ही घटना के दो पहलू हैं; वे दो नहीं हैं। जो कुछ भी शरीर में घटता है वह मन को प्रभावित करता है और जो कुछ भी मन में घटता है वह शरीर को प्रभावित करता है। वे साथ-साथ चलते हैं। इसलिए शरीर पर इतना जोर है, क्योंकि अगर तुम्हारा शरीर विश्राम में नहीं है।
तो तुम्हारा मन भी शांत नहीं हो सकता। और शरीर के साथ शुरू करना ज्यादा आसान होता है, क्योंकि वह सब से बाहरी पर्त है। मन के साथ शुरू करना कठिन होता है। बहुत से लोग मन के साथ प्रारंभ करने का प्रयास करते हैं और असफल होते हैं, क्योंकि उनका शरीर सहयोग नहीं देता।
क, ख, ग से प्रारंभ धीरे -धीरे आगे बढ़ना;हमेशा अच्छा होता है। शरीर सबसे पहली बात है, व्यक्ति को शरीर से प्रारंभ करना चाहिए। यदि तुम शरीर की शांत अवस्था को उपलब्ध हो जाते हो, तो अचानक तुम पाओगे कि मन स्थिर हो रहा है। मन हमेशा बाएं-दाएं डोलता रहता है ।
पुरानी घड़ी के पेंडुलम जैसा। और यदि तुम पेंडुलम को ध्यान से देखो तो तुम अपने मन के विषय में बहुत कुछ जान सकते हो। जब पेंडुलम बाईं तरफ जा रहा होता है, तो प्रकट में वह बाईं तरफ जा रहा होता है, किंतु असल में वह दाईं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी कर रहा होता है।
जब आंखें कहती हैं कि पेंडुलम बाईं तरफ जा रहा है। तो बाईं ओर की वह गति ही पेंडुलम के फिर से दाईं ओर जाने के लिए एक शक्ति, एक मोमेंटम पैदा कर देती है। और जब वह दाईं तरफ जा रहा होता है तो वह बाईं ओर जाने के लिए शक्ति इकट्ठा कर रहा होता है।
तो जब भी तुम प्रेम में पड़ते हो, तब तुम घृणा करने की शक्ति इकट्ठी कर रहे होते हो। जब तुम घृणा करते हो तो तुम प्रेम करने की शक्ति इकट्ठी कर रहे होते हो। जब तुम सुखी अनुभव कर रहे होते हो। तब तुम दुखी होने के लिए ऊर्जा इकट्ठी कर रहे होते हो।
जब तुम दुखी अनुभव कर रहे होते हो, तब तुम सुखी होने की शक्ति इकट्ठी कर रहे होते हो। इसी भांति मन डोलता रहता है। तुम्हारा मन निरंतर एक अति से दूसरी अति में डोलता रहता है... बाईं ओर, दाईं ओर; दाईं ओर, बाईं ओर। मध्य में कभी नहीं। और मध्य में होना वस्तुत: 'होना' है।
दोनों अतियां बोझिल होती हैं,तब तुम आराम में नहीं हो सकते। आराम होता है मध्य में, क्योंकि मध्य में बोझ नहीं होता। ठीक -ठीक मध्य में तुम निर्भार होते हो। बाईं ओर झुको, और बोझ हो जाता है। दाईं ओर झुको, और बोझ हो जाता है।
और बढ़ते ही चलो... तो जितना ज्यादा तुम मध्य से दूर जाते हो, उतना ही ज्यादा बोझ बढ़ता जाता है। मध्य में रहो। धार्मिक व्यक्ति अतियों में जीने वाला व्यक्ति नहीं होता है। और जब तुम ठीक मध्य में होते हो -तुम्हारा शरीर और तुम्हारा मन दोनों ही ..तो सारे द्वैत खो जाते हैं।
क्योंकि सारे द्वैत हैं ...तुम निरंतर इस ओर से उस ओर डोलते रहते हो। जब आसन सिद्ध हो जाता है, तब द्वंद्वों से उत्पन्न अशांति की समाप्ति होती है।’और जब कहीं कोई द्वैत नहीं बचता, तब तुम कैसे तनावपूर्ण , परेशानी में रह सकते हो?
जब तुम्हारे भीतर दो होते हैं, तो संघर्ष होता है। वे दो लड़ते ही रहते हैं, और वे तुम्हें कभी विश्राम में न रहने देंगे। तुम्हारा घर बंटा हुआ होता है, तुम सदा शीतयुद्ध में ,बुखार में जीते हो। जब यह द्वैत तिरोहित हो जाता है, तो तुम शांत, केंद्रस्थ, मध्य मे होते हो।
बुद्ध ने अपने मार्ग को कहा है, 'मज्झिम निकाय' -मध्य मार्ग। वे अपने शिष्यों से कहा करते थे, 'केवल एक बात ध्यान रखने की है... सदा मध्य में रहो; अतियों पर मत जाओ।’ संसार भर में अतियां हैं। कोई निरंतर स्त्रियों के पीछे दौड़ रहा है और फिर किसी दिन वह सारी भाग -दौड़ से थक जाता है।
तब वह संसार छोड़ देता है और वह संन्यासी हो जाता है। और फिर वह हर किसी को स्त्रियों के विरुद्ध समझाता रहता है, और कहता है, ''स्त्री नरक का द्वार है। सचेत रहो। जब भी तुम किसी संन्यासी को स्त्री के विरुद्ध बोलते हुए पाओ, तो तुम समझ सकते हो कि वह पहले जरूर 'मजनू' रहा है।
वह स्त्री के बारे में कुछ नहीं कह रहा है; वह अपने अतीत के बारे में कुछ कह रहा है। अब एक अति समाप्त हो गई, वह दूसरी अति की तरफ जा रहा है। कोई पागल है धन के पीछे। और बहुत हैं ..धन के पीछे पागल। एकदम आविष्ट, जैसे उनका पूरा जीवन धन के अंबार इकट्ठे करने के लिए ही हो।
लगता है कि उनके यहां होने का एकमात्र अर्थ इतना ही है कि जब उनकी मृत्यु हो तो वे धन के अंबार छोड़ जाएं -दूसरों से बड़े अंबार। वही उनके जीवन का कुल अर्थ मालूम पड़ता है। जब ऐसा आदमी थक जाता है तो वह सिखाने लगता है, ' धन दुश्मन है।
जब भी तुम किसी को यह कहते हुए सुनो कि धन दुश्मन है, तो तुम समझ सकते हो कि यह आदमी जरूर धन के पीछे पागल रहा होगा। अभी भी वह पागल ही है -दूसरी अति पर है। एक ठीक संतुलित व्यक्ति किसी चीज के विरुद्ध नहीं होता है, क्योंकि वह किसी चीज के पक्ष में नहीं होता है।
धन एक साधन है, एक उपयोगिता है। विनिमय का एक माध्यम है -उसके पीछे पागल होने की कोई जरूरत नहीं है। यदि वह तुम्हारे पास है तो उसका उपयोग कर लो। योगी आंनद में रहता भोजन है तो उसका आनन्द लेता नही है तो उपवास का आनन्द लेता। वो परेशान नही होगा भोजन न होने पर।
संतुलित व्यक्ति यदि महल में है, तो वह महल का सुख लेता है। यदि महल न हो तो वह झोपड़ी का आनंद लेता है। कैसी भी स्थिति हो, वह प्रसन्न और संतुलित रहता है। न तो वह महल के पक्ष में होता है और न वह, उसके विरोध में होता है।
जो व्यक्ति पक्ष में या विरोध में होता है, वह असंतुलित है, गौतम बुद्ध अपने शिष्यों से कहा करते थे, 'बस संतुलित रहो, और सब कुछ अपने आप सध जाएगा। मध्य में रहो । और यही महृषि पतंजलि कहते हैं ,'' बाह्य आसन शरीर से संबंधित आंतरिक आसन मन से संबंधित है और दोनों जुड़े हुए हैं।
जब शरीर मध्य में होता है, विश्राम में होता है, तो मन भी मध्य में होता है -शांत और मौन होता है। जब शरीर शांत होता है, तो शरीर भाव तिरोहित हो जाता है, जब मन विश्राम में होता है, तो मन तिरोहित हो जाता है। तब तुम केवल आत्मा हो... इंद्रियातीत, जो न शरीर है और न मन।
स्वर विज्ञान: यस जी यह किसी प्रकार के प्रचार के लिए मंच नही है । हमने बार बार कहा की यहां सदस्य केवल अपनी साधना से जुड़ा संदेश लिखकर प्रेषित कर सकते मात्र। आशा है आप समझ जाते।
स्वर विज्ञान: ग्रुप शुरू करने से पहले हमारी वार्ता हुआ सब सदस्यो से । कुछ सदस्य काफी साधना में काफी अच्छी स्तिथि में है जो काफी समय से साधना कर रहे।
जो हमे ध्यान में रहे उन्हें हमने थोड़ा उच्च अवस्था के ग्रुप में जोड़ दिया ताकि समय व्यर्थ नही हो उनका यहां पर। और भी कुछ सदस्य यहां होंगे जो अच्छी अवस्था में है तो अवश्य हम से संपर्क करे फोन द्वारा।
जो नवसाधक है और शुरुवात कर रहे वो इस ग्रुप में ही रहेंगे। आभार आप सब का
स्वर विज्ञान: भगवान शिव कहते है: - ''सांसरिक कामों में लगे हुए, अवधान, को दो श्वासों के बीच टिकाओ। इस से थोड़े ही दिन में नया जन्म होगा''। “सांसारिक कामों में लगे हुए” इसलिए कहा गया है, “सांसारिक कामों में लगे हुए… तुम जो भी कर रहे हो, उसमे अवधान को दो श्वासों के अंतराल में स्थिर रखो।
लेकिन काम-काज में लगे हुए ही इसे साधना है। ”श्वासों को भूल जाओं और उनके बीच में अवधान को लगाओ। एक श्वास भीतर आती है। इसके पहले कि वह लौट जाए, उसे बाहर छोड़ा जाए। वहां एक अंतराल होता है। उदाहरण के लिए तुम भोजन कर रहे हो।
भोजन करते जाओ और अंतराल पर अवधान रखो। तुम चल रहे हो, चलते जाओ और अवधान को अंतराल पर टिकाओ। तुम सोने जा रहे हो, लेटो और नींद को आने दो। लेकिन तुम अंतराल के प्रति सजग रहो। काम-काज में डांवाडोल न हों और अंतराल में स्थिर रहें।
तब तुम्हारे अस्तित्व के दो तल हो जाएंगे। करना ओर होना अथार्त एक करने का जगत और दूसरा होने का जगत। एक परिधि है और दूसरा केंद्र। परिधि पर काम करते रहो, रूको नहीं; लेकिन केंद्र पर भी सावधानी से काम करते रहो।
तब तुम्हारा काम-काज अभिनय हो जाएगा। मानों तुम कोई पार्ट अदा कर रहे हो। उदाहरण के लिए, तुम किसी नाटक में पार्ट कर रहे हो । नाटक में तुम श्रीकृष्ण बने हो। यद्यपि तुम श्रीकृष्ण का अभिनय करते हो, तो भी तुम स्वयं बने रहते हो।
केंद्र पर तुम जानते हो कि तुम कौन हो और परिधि पर तुम श्रीकृष्ण का रोल अदा करते हो। तुम जानते हो कि तुम श्रीकृष्ण नहीं हो, उनका का अभिनय भर कर रहे हो। तुम कौन हो तुमको मालूम है। तुम्हारा अवधान तुममें केंद्रित है और तुम्हारा काम परिधि पर जारी है।
यदि इस विधि का अभ्यास हो तो पूरा जीवन एक लंबा नाटक बन जाएगा। तुम एक अभिनेता होगें। अभिनय भी करोगे और सदा अंतराल में केंद्रित रहोगे। जब तुम अंतराल को भूल जाओगे, तब तुम अभिनेता नहीं रहोगे, तब तुम कर्ता हो जाओगे।
तब वह नाटक नहीं रहेगा। उसे तुम भूल से जीवन समझ लोगे और यही हम सबने किया है। हर मनुष्य सोचता है कि वह जीवन जी रहा है लेकिन यह जीवन नहीं बल्कि एक रोल है। जो समाज ने, परिस्थितियों ने, संस्कृति ने, देश की परंपरा ने तुमको थमा दिया है।
तुम अभिनय कर रहे हो और तुम इस अभिनय के साथ तादात्म्य भी कर बैठे हो। उसी तादात्म्य को तोड़ने के लिए यह विधि है। श्रीकृष्ण के अनेक नाम है, वे सबसे कुशल अभिनेताओं में से एक है। वे सदा अपने में स्थिर है और लीला कर रहे है।
गंभीरता तादात्म्य से पैदा होती है। यदि नाटक में तुम सच ही श्री कृष्ण हो जाओ तो अवश्य समस्याएं खड़ी होगी। जब-जब राधा से विछोह होगा , तो तुमको दिल का दौरा पड़ सकता है और पूरा नाटक बंद हो जाना भी निश्चित है। लेकिन अगर तुम बस अभिनय कर रहे हो ।
तो राधा का विछोह से तुमको समस्याएं नहीं होगी । तुम अपने घर लौटोगे और चैन से सो जाओगे। इसका बड़ा गहरा अर्थ है, और अर्थ यह है कि यदि तुम समझ जाते हो कि तुम्हारे लिए जीवन नाटक हो जाता है। तो उसका अर्थ हुआ कि तुम केवल उसे अंजाम देने वाले हो।
तुमको उसे जीना नहीं उसका अभिनय करना है। यह विधि, तुमको एक खेल बना देती है। तुम दो श्वासों के अंतराल में स्थिर हो और जीवन परिधि पर चल रहा है। यदि तुम्हारा अवधान केंद्र पर है, तो तुम्हारा अवधान परिधि पर नहीं है। परिधि पर जो है वह उपावधान है।
इस विधि से तुम्हारा समूचा जीवन बदल जाएगा और स्वय की प्रतीति होना शुरू होगा । जब स्वय को जान लिया तो बहुत से संसारिक दुखो से मुक्त हो जाते
स्वर विज्ञान: आसन की सिद्धि के बाद का चरण है प्राणायाम। यह सिद्ध होता है श्वास और प्रश्वास पर कुंभक करने से। शरीर और मन के बीच श्वास एक सेतु है। ये तीनों बातें समझ लेनी हैं। आसन में स्थिर शरीर, असीम में विलीन होता मन और श्वास का सेतु जो कि उन्हें जोड़ता है।
ये तीनों चीजें एक सम्यक लय में होनी चाहिए। ध्यान देना.. कि जब भी तुम्हारा मन बदलता है, तो श्वास बदल जाती है। इसके विपरीत यह बात भी सच है कि यदि श्वाश का ढंग बदलो तो मन बदल जाता है। जब तुम शांत और मौन होते हो, तो अच्छा अनुभव करते हो।
अचानक किसी सुबह की शांति में या शाम तारों की ओर देखते हुए, कुछ न करते हुए, बस विश्राम करते हुए श्वास पर ध्यान देना। वह बहुत धीमी चलती है। तुम उसे अनुभव भी नहीं करते कि वह चल भी रही है या नहीं। जब तुम क्रोधित होते हो, तो ध्यान देना। श्वास तुरंत बदल जाती है।
प्रत्येक भाव दशा के साथ श्वास की लय भिन्न होती है। श्वास एक सेतु है। जब तुम्हारा शरीर स्वस्थ होता है, तो श्वास अलग ढंग से चलती है। जब तुम्हारा शरीर अस्वस्थ होता है तो श्वास अलग ढंग से चलती है। जब पूर्णरूपेण स्वस्थ होते हो तो तुम बिलकुल भूल जाते हो श्वास को।
जब तुम पूरी तरह स्वस्थ नहीं होते तो श्वास पर बार -बार तुम्हारा ध्यान जाता है, कुछ गड़बड़ है। श्वास पर नियंत्रण' नहीं है। यह प्राणायाम शब्द की ठीक व्याख्या नहीं है। प्राण =आयाम : प्राण का अर्थ है श्वास में छिपी प्राण -ऊर्जा, और आयाम का अर्थ है असीम विस्तार।
प्राणो को उसके आयाम तक पहुंचाना। यह 'श्वास पर नियंत्रण' नही है। क्योंकि यह 'नियंत्रण' शब्द ही तुम्हें कर्ता की अनुभूति देता है । इस ढंग से श्वास लेना कि तुम अस्तित्व की श्वास के साथ एक हो जाते हो; कि तुम अलग से श्वास नहीं ले रहे, तुम समग्र के साथ श्वास ले रहे हो।
कई बार ऐसा होता है..प्रयोग करके देखना कि तुम अपने मित्र के साथ बैठे हो, तो तुम साथ -साथ श्वास ले रहे होओगे। यदि कोई दुश्मन बैठा है या कोई उबाने वाला बैठा है और तुम उससे छुटकारा पाना चाहते हो, तो तुम अलग -अलग श्वास लोगे; तुम्हारी श्वास आपस में बिलकुल लयबद्ध न होगी।
आश्चर्य की बात है,कि किसी वृक्ष के पास बैठना। यदि तुम शांत हो, आनंदित हो, आह्लादित हो, तो अचानक तुम पाओगे कि वृक्ष,उसी ढंग से श्वास ले रहा है, जिस ढंग से तुम श्वास ले रहे हो। और एक घड़ी आती है जब तुम अनुभव करते हो कि तुम समग्र के साथ श्वास ले रहे हो।
तुम समग्र की श्वास के साथ लयबद्ध हो जाते हो। तुम फिर लड़ नहीं रहे होते, संघर्ष नहीं कर रहे होते। तुम समर्पित होते हो कि अलग श्वास लेने की जरूरत नहीं रह जाती है। गहन प्रेम में लोग साथ -साथ श्वास लेते हैं। घृणा में ऐसा कभी नहीं होता। अगर तुम किसी के प्रति विरोध रखते हो।
वह हजारों मील दूर क्यों न हो ;तुम अलग -अलग श्वास लोगे; तुम एक साथ श्वास नहीं ले सकते। यह एक अनुभूति ही है क्योंकि इसके लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है । लेकिन तुम भारत में हो, और तुम्हें पता भी न हो कि तुम्हारा प्रेमी कहां है ;लेकिन तुम साथ-साथ ही श्वास लोगे।
ऐसा ही होता है। कुछ प्रमाण हैं जो संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए टेलीपैथी पर कुछ प्रयोग चलते हैं। इस टेलीपैथी के प्रयोग में दो व्यक्ति, बहुत दूर होते हैं। एक व्यक्ति संदेश भेजता , दूसरा व्यक्ति संदेश ग्रहण करता है। निश्चित समय पर, कोई व्यक्ति संदेश भेजना शुरू करता है।
वह त्रिभुज का आकार बनाता है, उस पर चित्त को एकाग्र करता है और संदेश भेजता है कि 'मैंने त्रिभुज बनाया है। और दूसरा व्यक्ति उसे ग्रहण करने की कोशिश करता है। बस खुला रहता है, अनुभव करता है, संवेदनशील रहता है ..क्या संदेश आ रहा है।
और वैज्ञानिकों ने निरीक्षण किया है कि यदि वह त्रिभुज को पकड़ पाता है। तो वे दोनों एक ही ढंग से श्वास ले रहे होते हैं; यदि वह त्रिभुज को चूक जाता है तो वे एक ही ढंग से श्वास नहीं ले रहे होते हैं। श्वास की गहन लयबद्धता में कोई सेतु तुम्हें जोड़ता है; तुम एक हो जाते हो।
तब अनुभूति दूसरे तक पहुंच सकती है, विचार दूसरे तक पहुंच सकते हैं। यदि तुम किसी संत से मिलने जाओ तो सदा उसकी श्वास पर ध्यान देना। और यदि तुम एक संवाद अनुभव करते हो। उसके साथ एक गहन प्रेम अनुभव करते हो, तो फिर अपनी श्वास पर भी ध्यान देना।
तुम अचानक अनुभव करोगे कि तुम उसके जितने ज्यादा पास आते हो, तुम्हारी भाव -दशा, तुम्हारी श्वास उसके साथ मेल खाने लगती है। जाने या अनजाने ; लेकिन यह होता है। प्राणायाम का मतलब है : समग्र के साथ श्वास लेना। यदि तुम नियंत्रण करते हो।
तो कैसे तुम समग्र के साथ श्वास ले सकते हो? 'प्राणायाम' को 'श्वास का नियंत्रण' कहना गलत है। प्राणायाम है समग्र के साथ श्वास लेना तब तुम विस्तार पाते हो। तब तुम्हारी जीवन-ऊर्जा फैलती चली जाती है पेड़ों और पहाड़ों और आकाश और सितारों के साथ।
तब एक घड़ी आती है, जब तुम बुद्ध हो जाते हों—तुम पूरी तरह खो जाते हो। अब तुम श्वास नहीं लेते, समग्र श्वास लेता है तुम में। अब तुम्हारी श्वास और समग्र की श्वास अलग नहीं होती। वे एक होती हैं। इतनी एक होती हैं कि अब यह कहना व्यर्थ होता है कि 'यह मेरी श्वास है।’
आसन की सिद्धि के बाद का चरण है प्राणायाम। यह सिद्ध होता है श्वास और प्रश्वास पर कुंभक करने से।’ जब तुम श्वास भीतर लेते हो, तो एक घड़ी आती है जब श्वास पूरी तरह भीतर होती है और कुछ क्षणों के लिए श्वास ठहर जाती है। ऐसा ही तब होता है जब तुम श्वास बाहर छोड़ते तो।
तुम श्वास बाहर छोड़ते हो, जब श्वास पूरी तरह बाहर होती है, तब फिर कुछ क्षणों के लिए श्वास ठहर जाती है। उन घड़ियों में तुम्हारा मृत्यु से साक्षात्कार होता है, और मृत्यु से साक्षात्कार परमात्मा से साक्षात्कार है। क्योंकि जब तुम मिट जाते हो, परमात्मा अवतरित होता है तुम में।
जब श्वास ठहर जाती है; तुम उस अवस्था में होते हो जैसे मृत्यु की घड़ी में होओगे। एक पल को तुम्हारा मृत्यु से साक्षात्कार हो जाता है -श्वास ठहर गई होती है। पूरा 'विज्ञान भैरव तंत्र' इस प्रक्रिया पर आधारित है, क्योंकि यदि तुम उस अंतराल में प्रवेश कर सको , तो वही द्वार है।
लेकिन वह बहुत सूक्ष्म और संकरा है। कबीर ने कहा है, 'दो नहीं गुजर सकते साथ -साथ, केवल एक ही गुजर सकता है। मार्ग इतना संकरा है कि यदि तुम्हारे भीतर भीड़ है, तो तुम नहीं गुजर सकते। यदि तुम दो में भी बंटे हुए हो बाएं और दाएं ;तो भी तुम नहीं गुजर सकते।
यदि तुम एक हो, एक समस्वरता, एक अखंडता, तो तुम गुजर सकते हो। मार्ग संकरा है , सीधा है, निश्चित ही; वह कोई आड़ा -तिरछा नहीं है। वह सीधा परमात्मा के मंदिर की तरफ जाता है, लेकिन बहुत संकरा है। तुम अपने साथ किसी को नहीं ले जा सकते।
तुम अपने साथ अपनी चीजें नहीं ले जा सकते। तुम अपना ज्ञान नहीं ले जा सकते। तुम अपना त्याग नहीं ले जा सकते। असल में तुम अपना अहंकार भी नहीं ले जा सकते ।'तुम्हीं' गुजरोगे वहां से, लेकिन तुम्हारे शुद्धतम अस्तित्व के अतिरिक्त बाकी हर चीज द्वार पर छोड़ देनी होती है ।
और यही क्षण हैं मार्ग को देख लेने के। जब श्वास भीतर जाती है और ठहर जाती है ...पल भर को; जब श्वास बाहर जाती है और ठहर जाती है। इन अंतरालों के प्रति, इन क्षणों के प्रति और भी सजग होना। इन अंतरालों के द्वारा परमात्मा तुम में प्रवेश करता है।
हम इसे बहुत सोच समझ कर देवता कहते हैं. क्योंकि मृत्यु द्वार है..' असल में मृत्यु ज्यादा गहरी है..उस जीवन की अपेक्षा जिसे तुम जीवन जानते हो। और जब तुम मृत्यु से गुजरते हो, तो तुम्हें वह जीवन मिलेगा जिसका किसी से कोई लेना -देना नहीं एक समग्र का जीवन।
मृत्यु को देवता कहा गया है। एक पूरा उपनिषद है, कठोपनिषद । पूरा उपनिषद यही है कि एक छोटा बच्चा मृत्यु के पास जाता है -जीवन का रहस्य सीखने के लिए । बात, बिलकुल असंगत लगती है। जीवन का रहस्य सीखने के लिए मृत्यु के पास जाना?
लेकिन सच्चाई जब तुम्हारा तथाकथित जीवन समाप्त होता है, तभी वास्तविक जीवन सक्रिय होता है-तो तुम्हें पूछना होगा मृत्यु से। आसन की सिद्धि के बाद का चरण है प्राणायाम। यह सिद्ध होता है श्वास और प्रश्वास से’तो जब तुम श्वास भीतर लेते हो।
तो उसे थोड़ी देर रोकना, ताकि 'द्वार' अनुभव किया जा सके। जब तुम श्वास बाहर छोड़ते हो, तो उसे थोड़ी देर बाहर रोकना, ताकि तुम उस शून्य अंतराल को ज्यादा आसानी से अनुभव कर सको। या, कभी श्वास को अचानक रोक देना।
रास्ते पर चलते हुए उसे रोक देना.. अचानक झटका, और मृत्यु प्रवेश कर जाती है। कभी भी, किसी भी समय तुम अचानक रोक सकते हो श्वास को।उसी श्वास के रुकने में मृत्यु प्रवेश कर जाती है अथार्त इन अंतरालों के द्वारा परमात्मा तुम में प्रवेश करता है।
स्वर विज्ञान: उपरोक्त प्राणायामों की अवधि और आवृत्ति देश काल और संख्या के अनुसार ज्यादा लंबी और सूक्ष्म होती जाती है''। इन अंतरालों का जितना अभ्यास होता है, उतना ज्यादा विस्तीर्ण होता ''द्वार''; तुम उसे उतना ज्यादा अनुभव करने लगते हो। इसे अपने जीवन का हिस्सा बना ले।
जब भी तुम कुछ नहीं कर रहे हो, तो श्वास को भीतर लेना और रोक लेना। उसे वहां अनुभव करना; वहीं कहीं द्वार है। वहां अंधेरा है; द्वार तुरंत ही नहीं मिल जाता है, तुम्हें टटोलना होगा ..लेकिन तुम पा लोगे। और जब भी तुम श्वास को रोकोगे, तुरंत ही विचार ठहर जाएंगे।
प्रयोग करके देखना। अचानक श्वास रोक देना और तुरंत प्रवाह रुक जाता है और विचार ठहर जाते हैं, क्योंकि विचार और श्वास दोनों संबंधित हैं। इस जीवन से, दूसरे दिव्य जीवन में, श्वास की जरूरत नहीं है। तुम जीते हो, श्वास की कोई जरूरत नहीं होती, विचारों की कोई जरूरत नहीं होती।
विचार और श्वास भौतिक संसार का हिस्सा हैं। निर्विचार, निःश्वास वे शाश्वत जीवन का हिस्सा हैं। ''प्राणायाम का चौथा प्रकार आंतरिक होता है और वह प्रथम तीन के पार जाता है''। पतंजलि कहते हैं. ये प्राणायाम के तीन प्रकार हैं -भीतर रोकना, बाहर रोकना, अचानक रोकना।
और चौथा प्रकार आंतरिक है। चौथे प्रकार पर बुद्ध ने बहुत जोर दिया है, वे इसे कहते हैं, 'अनापानसतीयोग'। वे कहते हैं, 'बस श्वास की पूरी प्रक्रिया को देखते रहना।’ श्वास भीतर जाती है ..तुम देखना, एक भी श्वास मत चूकना। फिर एक ठहराव आता है।
जब श्वास भीतर जा चुकी होती है तो एक पल के लिए ठहरती है।उस ठहराव को देखना। कुछ करना मत; बस देखते रहना। फिर श्वास बाहर की यात्रा पर चल देती है ...देखते रहना। जब श्वास पूरी तरह बाहर होती है तो फिर एक क्षण के लिए ठहरती है ..उसको भी देखना।
फिर श्वास भीतर आती है, बाहर जाती है, तुम बस देखना। यह चौथा प्रकार है,केवल देखते रहने से ही तुम श्वास से अलग हो जाते हो। जब तुम श्वास से अलग हो जाते हो, तब तुम विचारों से अलग हो जाते हो। असल में शरीर में श्वास की प्रक्रिया मन में विचारों की प्रक्रिया के समानांतर ही है।
मन में विचार चलते हैं ; शरीर में श्वास चलती है। वे समानांतर शक्तियां हैं... एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। महृषि पतंजलि भी चौथे प्राणायाम की ओर संकेत करते हैं। गौतम बुद्ध ने भी अपना पूरा ध्यान चौथे प्राणायाम पर ही केंद्रित कर दिया। वे प्रथम तीन की बात ही नहीं करते।
संपूर्ण बौद्ध ध्यान चौथे प्राणायाम पर ही आधारित है। प्राणायाम का चौथा प्रकार' जो कि साक्षी होना है ' आंतरिक होता है और वह प्रथम तीन के पार जाता है। ’महृषि पतंजलि बहुत वैज्ञानिक हैं ;वे योग के विषय में वह सब कहते जाते हैं ...जो भी कहा जा सकता है।
इसीलिए वे योग के आदि और अंत हैं। उन्होंने एक भी बात नहीं छोड़ी है। महृषि पतंजलि के योग -सूत्रों में कुछ भी जोड़ा -घटाया नहीं जा सकता है। योग सूत्र में पूरा, संपूर्ण, विज्ञान मौजूद है ..अपनी पराकाष्ठा पर। हालांकि योग महाऋषि पतांजलि से पूर्व भी मौजूद था।
लेकिन वो विषय आंनन्त की ओर इंगित करता। हम पतंजलि को ही योग का जनक मानते। योग और भोग दो विपरीत ध्रुव है। बुद्ध राजकुमार थे सब भोग उपलब्ध थे उन्होंने सब ठुकराकर योग को चुना। भोगी सांसारिक पदार्थो में सुख देखता वही योगी उन उन से दूर भागता।
अगर सच मे पदार्थो में सुख होता तो योगी को भी उसमे सुख दिखना चाइये। किँतु नही दिखता क्योकि योगी की दृस्टि अंतर्मुखी होती। योग की अपनी साधना प्रक्रिया है। महाऋषि पतंजलि ने अष्टांग योग, के आठ अंग कहे हैं, आठ चरण, आठ हिस्से, जिनसे मिलकर योग बनता है।
जिनसे योग पूरा होता, यदि योग एक शरीर है, तो आठ उसके अंग हैं। योग का अर्थ है, व्यक्ति जैसा है, वह बहुत ढीला-ढाला है सब कुछ भरा है; उल्टा-सीधा सब भरा है। साधारण व्यक्ति जैसा है, उसके भीतर कोई संगीत नहीं है। उसके भीतर कोई लयबद्धता नहीं है।
उसके भीतर बहुत-सी शक्तियां हैं–आपस में विरोधी, एक-दूसरे से लड़ती, ढीली, अस्तव्यस्त। उदाहरण के लिए हजार आदमी हैं बाजार में। लेकिन बाजार के पास कोई व्यक्तित्व नहीं है, जिसमें एक स्वरता हो। फिर हजार आदमी मिलिट्री के जवान हैं।
वे भी हजार हैं, लेकिन उनके पास एक व्यक्तित्व है। हजार आदमी के साथ पंक्तिबद्ध व्यक्तित्व है। एक से चलते हुए कदम हैं। एक आवाज, एक आज्ञा पर सारे प्राण आंदोलित होते हैं। एक स्वरता है। तो बाजार में तो लय नहीं है, मिलिट्री के हजार लोगों में एक लय है।
वे इकट्ठे हैं, एक शरीर की भांति हैं वे। बाजार भीड़ है, एक शरीर नहीं। हमारा व्यक्तित्व बाजार की भांति है। हजार चीजें हैं उसमें, हजार हित हैं। एक हिस्सा बाएं जाता है, दूसरा दाएं जाता है। एक ऊपर जाता है, तीसरा नीचे जाता है। एक कहता है, मत करो; एक कहता है, करो।
तीसरा हिस्सा सोया रहता है; इस फिक्र में ही नहीं पड़ता कि करना है, कि नहीं करना है। ऐसे हजार हिस्से हैं हमारे भीतर। हम एक ऐसे मकान हैं, जिसका मालिक सोया हुआ है और जिसमें हजार नौकर हैं। और हर नौकर अपने को मालिक समझने लगा है।
क्योंकि मालिक सोया ही रहता है। तो आम आदमी की हालत एक मकान की तरह है। असली मालिक सोया हुआ है। इंद्रियों में वृत्तियों में जो ऊपर होता है। वह कहता है, में मालिक हूं, जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपको पता है, क्रोध कहता है, मैं हूं मालिक।
जब आप प्रेम में होते हैं, तो प्रेम कहता है, मैं हूं मालिक। नौकर–इंद्रियां, वृत्तियां, वासनाएं मालिक हो जाती हैं। जो जब मौका पा जाता है, हमारी छाती पर बैठ जाता है। जब लोभ हमारे ऊपर बैठता है, तो ऐसा लगता है, लोभ ही हमारी आत्मा है।
जब क्रोध हम पर सवार होता है, तो ऐसा लगता है कि क्रोध ही मैं हूं। जब प्रेम हम पर सवार होता है, तो लगता है, बस प्रेम ही सब कुछ है। जो हमें पकड़ लेता है भूत-प्रेत की भांति, जो वृत्ति हम पर हावी हो जाती है। बस हम उसके हाथ के खिलौने हो जाते हैं।
असली मालिक का कोई भी पता नहीं है। योग का अर्थ है, असली मालिक का जग आना; नौकरों के बीच मालिक को सिंहासन-आरूढ़ करना। योग शब्द का अर्थ है, जोड़। व्यक्ति जुड़ा हुआ हो; खंड-खंड नहीं, अखंड; एक हो। और जब कभी व्यक्ति एक होता है।
तो नौकर तत्काल सिर झुकाकर मालिक के सामने खड़े हो जाते हैं। फिर कोई नौकर नहीं कहता कि मैं मालिक हूं। योगस्थ चेतना तत्काल समस्त इंद्रियों की मालिक हो जाती है। फिर इंद्रियां नौकर की तरह पीछे चलती हैं। छाया की तरह। मालकियत उनकी खो जाती है।
तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि योग यज्ञ भी है अर्जुन! यह चेतना कैसे जगे। यह सोया हुआ मालिक कैसे उठे! यह आदमी क्रिस्टलाइज्ड कैसे हो, एक कैसे हो, इकट्ठा कैसे हो!तो योग की हजारों प्रक्रियाएं हैं, जिनके द्वारा सोए हुए मालिक को उठाया जाता है।
योग का अर्थ है, भीतर जो सोया है, उस पर चोट करनी है, उसे उठाने के लिए चोट करनी है। हजार रास्ते हैं उस पर चोट करने के। हठयोग के अपने रास्ते हैं, राजयोग के अपने रास्ते हैं, मंत्रयोग के अपने रास्ते हैं, तंत्र के अपने रास्ते हैं।
हजार-हजार विधियां हैं, जिन विधियों से उस सोई हुई चेतना में जो भीतर केंद्र पर प्रसुप्त है, उसे जगाने की कोशिश की जाती है। जैसे कोई आदमी सोया हो, उसे जगाने के बहुत रास्ते हो सकते हैं। कोई उसका नाम लेकर जोर से पुकार सकता है; तो उठ आए।
कोई उसका नाम लेकर न पुकारे, सिर्फ चिल्लाए कि मकान में आग लग गई है, और वह आदमी उठ आए। कोई मकान में आग लगने की बात भी न करे। सिर्फ संगीत बजाए, और वह आदमी उठ आए।
कोई संगीत भी न बजाए, सिर्फ तेज रोशनी उसकी बंद आंखों पर डाले, और वह आदमी उठ आए। ऐसे योग के हजार रास्ते हैं, जिनसे भीतर सोई हुई चेतना को चोट की जाती है। और उस चोट से वह जग आता है।
स्वर विज्ञान: योग का अर्थ है, भीतर जो सोया है, उस पर चोट करनी है, उसे उठाने के लिए चोट करनी है। हजार रास्ते हैं उस पर चोट करने के। हठयोग के अपने रास्ते हैं, राजयोग के अपने रास्ते हैं, मंत्रयोग के अपने रास्ते हैं, तंत्र के अपने रास्ते हैं , हजार-हजार विधियां हैं।
जिन विधियों से उस सोई हुई चेतना में जो भीतर केंद्र पर प्रसुप्त है, उसे जगाने की कोशिश की जाती है। जैसे कोई आदमी सोया हो, उसे जगाने के बहुत रास्ते हो सकते हैं। कोई उसका नाम लेकर जोर से पुकार सकता है; तो उठ आए। कोई उसका नाम लेकर न पुकारे।
सिर्फ चिल्लाए कि मकान में आग लग गई है, और वह आदमी उठ आए। कोई मकान में आग लगने की बात भी न करे। सिर्फ संगीत बजाए, और वह आदमी उठ आए। कोई संगीत भी न बजाए, सिर्फ तेज रोशनी उसकी बंद आंखों पर डाले, और वह आदमी उठ आए।
ऐसे योग के हजार रास्ते हैं, जिनसे भीतर सोई हुई चेतना को चोट की जाती है। और उस चोट से वह जग आता है। उदाहरन के लिए अगर कोई व्यक्ति जोर से ओम का नाद करे भीतर, तो उसकी नाभि के पास जोर से चोट होने लगती है। नाभि जीवन-ऊर्जा का केंद्र है।
नाभि से ही बच्चा मां से जुड़ा होता है। नाभि के द्वारा ही मां से जीवन पाता है। फिर नाभि कटती है अलग, तो बच्चा अलग होता है। नया जीवन शुरू होता है। कभी आपने खयाल किया हो, अगर एकदम से एक्सिडेंट होने की हालत हो जाए, तो सबसे पहले चोट नाभि पर पड़ती है।
साइकिल पर चले जा रहे हैं; एकदम से कोई सामने आ गया, ब्रेक मारा। तो आपके शरीर में जो चोट पड़ेगी, वह नाभि पर पड़ेगी। एकदम से नाभि पर चोट पड़ जाएगी। खतरे की हालत में जीवन-ऊर्जा को जगने का मौका आ जाता है।
ओम ऐसी ध्वनि है, जिसके माध्यम से भीतर से नाभि पर चोट की जाती है। आप ओम की गूंज करें भीतर, तो नाभि पर चोट पड़ने लगती है। पहले हलकी पड़ती है पहले, फिर तेज होती जाती है। फिर और तेज होती जाती है। फिर नाभि पर हथौड़े की तरह पड़ने लगती है।
और वह सोई हुई जो चेतना है, उसे जगाता है। हजार विधियों से योग सोए हुए मालिक को जगाता है। और उस सोए हुए मालिक के जगते ही व्यक्तित्व में योग पैदा हो जाता है। खंड इकट्ठे हो जाते हैं। बाजार समाप्त हो जाता है। पंक्तिबद्ध सैनिक खड़े हो जाते हैं। फिर व्यक्तित्व आज्ञा मानता है।
बाजार की भीड़ में कोई आज्ञा नहीं मानता। मानने का कोई सवाल भी नहीं है। न कोई आज्ञा देने वाला होता है, न कोई मानने वाला होता है। योगस्थ व्यक्ति के अंतर , अनुशासन से भर जाता है। एक भीतरी अनुशासन पैदा हो जाता है। फिर वह जो करना चाहता है, वही करता है।
जो नहीं करना चाहता है, नहीं करता है। और जैसे ही भीतर का व्यक्ति जागा तो उनसे भी वही परिणाम होता है। इस परिणाम को योग के मार्ग से लाने की बहुत अनंत विधियां हैं। और एक-एक व्यक्ति को देखकर कि उसके लिए कौन-सी विधि सार्थक होगी, प्रयोग किया जाता है।
सब व्यक्तियों का नाद-बोध अलग है। आप रास्ते से गुजरें, जिसका नाद बोध तीव्र है, उसे पक्षी की चहचहाहट भी सुनाई पड़ती है। आपका नाद-बोध तीव्र नहीं है, तो कभी नहीं सुनाई पड़ता कि पक्षी भी चहचहा रहे हैं। जिसका नाद-बोध तीव्र है, उसे मंत्रयोग से जगाने की कोशिश की जाती है।
जिसका दृष्टि-बोध तीव्र है, उसके लिए त्राटक, एकाग्रता के अनंत-अनंत प्रयोग हैं, उनसे जगाने की कोशिश की जाती है। यह व्यक्ति पर निर्भर करेगा कि उसका बोध कौन-सा सर्वाधिक तीव्र है। उसके तीव्र बोध के ही मार्ग से उसे गहरे ले जाया जा सकता है।
जिनका रंग-बोध तीव्र है, उन्हें रंग के द्वारा भी मार्ग मिल सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, अर्जुन, योग-यज्ञ के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो जाता है। और दूसरे योगीजन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं।
तथा अन्य योगीजन प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के परायण होते हैं। मनुष्य के पास अस्तित्व से जुड़े होने के बहुत द्वार हैं; एक द्वार नहीं, अनंत द्वार हैं। हम परमात्मा से बहुत-बहुत भांति से जुड़े हुए हैं। जैसे एक वृक्ष एक ही जड़ से नहीं जुड़ा होता पृथ्वी से।
बहुत जड़ों से जुड़ा होता है। ऐसे हम भी अस्तित्व से बहुत जड़ों से जुड़े हुए हैं, एक ही जड़ से नहीं। और इसलिए अस्तित्व तक पहुंचने के लिए किसी भी एक जड़ के सहारे हम प्रवेश कर सकते हैं। जीवन-ऊर्जा नाभि पर इकट्ठी है; यह एक द्वार है।
जीवन-ऊर्जा प्राण पर भी संचालित है; श्वास पर भी। श्वास पर सब खेल है। श्वास से ही शरीर और आत्मा जुड़ी है, श्वास सेतु है। इस लिए श्वास पर भी प्रयोग करके योगीजन उस परम अनुभूति को उपलब्ध हो पाते हैं। श्वास या प्राण, उसका अपना प्राणयोग है।
स्वर विज्ञान: अष्टांग योग का पांचवां चरण प्रत्याहार है। इस का अर्थ है'' अपने स्रोत तक लौट आना''। पांचवां चरण 'प्रत्याहार प्रथम चार (बाहरी योग) के और अंतिम तीन (भीतरी योग) के बीच सेतु के रूप में काम करता है। इसमें उर्जा के लौटने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है ।
विषय वस्तुओं में रस नहीं रह गया , ऊर्जा बाहर से हट चुकी है इसीलिए भीतर मुड़ती है। तुम पांचो इंद्रियों का उपयोग करते हो लेकिन तुम भूल गए हो कि कौन इन इंद्रियों के पीछे छिपा है। जब तुम देखना चाहते हो, सूंघना छूना चाहते हो, अनुभव करना चाहते हो।
तब तुम्हारी ऊर्जा बाहर जा रही होती है। तुम्हारे पास आंखें हैं, लेकिन तुम आंखें नहीं हो। तुम्हारी मौजूदगी चाहिए क्योकि आंखें अपने आप नहीं देख सकतीं। तुम पीछे खड़े देखते हो। उदाहरण के लिए पूजा होने वाली है परंतु पूजा की थाली में फूल-माला नहीं है।
तुम जल्दी-जल्दी लेने जा रहे हो। अचानक तुम्हारे पैर में चोट लग जाती है खून बहने लगता है। लेकिन तुम इतने डूबे होते हो कि तुम्हें होश नहीं होता। चोट लगी है, लेकिन तुम अनुभव करने के लिए मौजूद नहीं हो। आधे घंटे बाद पूजा खतम होती है।
अचानक तुम्हारा ध्यान पैर की तरफ जाता है ..खून बह रहा है। अब दर्द होता है। आधा घंटा खून बहता रहा, लेकिन कोई दर्द न था क्योंकि तुम वहां नहीं थे। इसे गहरे में समझना है कि इंद्रियां अपने आप में नहीं है। यदि तुम सहयोग नहीं देते, तो इंद्रियां बंद हो जाती हैं।
वापस लौटना शुरू हो जाता है। अथार्त प्रत्याहार शुरू हो जाता है। जब ऊर्जा बाहर देखने में, सुनने में, छूने में व्यस्त नहीं होती तो ऊर्जा भीतर की ओर मुड़ने लगती है। 'प्रत्याहार' है उस केंद्र की ओर लौट पड़ना जहां से तुम आए हो।
प्रत्याहार' तो केवल ऊर्जा के घर की ओर लौट पड़ने का प्रारंभ है ..अंत होगा 'समाधि' में। यम, नियम, आसन, प्राणायाम ...ये चारों प्रत्याहार के लिए, पांचवें चरण के लिए तैयारी हैं। प्राणायाम ब्रह्मांड के साथ लयबद्धता पाने की विधि है, लेकिन फिर भी तुम बाहर रहते हो ।
तुम ऐसी लय से श्वास लेना आरंभ कर देते हो कि तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व के साथ तालमेल बैठ जाता है। तब तुम समग्र के साथ संघर्ष नहीं कर रहे होते, तुमने समग्र के साथ समर्पण कर दिया होता है। धार्मिक होने का वास्तविक अर्थ समर्पण करना ही है।
अब उसके पास अपने कोई निजी लक्ष्य नहीं होते। उसका वही लक्ष्य है जो समग्र का लक्ष्य है। अब अस्तित्व की धारा के साथ बहता है; वह धारा के विपरीत नहीं लड़ता है। अब उसकी कोई निजी नियति नहीं है, समग्र अस्तित्व की नियति ही उसकी नियति है।
जब तुम अस्तित्व की धारा के साथ बहते हो तो तुम मिट जाते हो, क्योंकि अहंकार केवल तभी बच सकता है जब वह ,प्रतिरोध करता है। बहुत से लोग कहते हैं कि, 'हम अहंकार छोड़ देना चाहते हैं'।वास्तव में, अगर तुम अहंकार को छोड़ना चाहते हो तो तुम उसे नहीं छोड़ सकते।
क्योंकि जो यह कह रहा है कि मैं अहंकार छोड़ देना चाहता हूं ..वह भी अहंकार है और अब तुम केवल अपने अहंकार से ही लड़ रहे हो। तुम केवल विनम्र होने का दिखावा कर सकते हो ,लेकिन अहंकार मौजूद रहेगा। अगर सम्पन्नता में अहंकार रहा है।
तो विपन्नता में भी अहंकार बना रहेगा। पहले वह राजा की भांति था; अब वह विनम्र भिक्षुक की भांति रहेगा। तुम कहते हो कि, 'मैं संसार का सबसे विनम्र व्यक्ति हूं।’ लेकिन उससे कुछ अंतर नहीं पड़ता। पहले तुम संसार के महान व्यक्ति थे ।
और अब विनम्र व्यक्ति हो लेकिन तुम्हारे अंदर असाधारण होने का भाव मौजूद है। अगर तुम अहंकार के साथ लड़ते हो तो तुम और सूक्ष्म अहंकार बना लेते हो। जो ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि वह सूक्ष्म अहंकार तो पवित्र और धार्मिक होने का भी दावा करेगा।
पहला अहंकार तो लौकिक ही था लेकिन दूसरा तो अलौकिक है। यह तो शुद्ध, शक्तिशाली, और सूक्ष्म है ; उसकी पकड़ ज्यादा खतरनाक है और उससे बाहर आना ज्यादा कठिन होगा। तुम छोटे खतरे से बड़े खतरे में प्रवेश कर जाओगे। '
प्राणायाम' जिसे 'श्वास नियंत्रण' की भांति समझा गया है, वह नियंत्रण नहीं बल्कि समस्त अस्तित्व के साथ सहजता से होने का, जीने का एक ढंग है।सारे नियंत्रण अहंकार से आते हैं क्योकि वह ही नियंत्रण करता है।
स्वर विज्ञान: प्राणायाम' जिसे 'श्वास नियंत्रण' की भांति समझा गया है, वह नियंत्रण नहीं बल्कि समस्त अस्तित्व के साथ सहजता से होने का, जीने का एक ढंग है। सारे नियंत्रण अहंकार से आते हैं। लेकिन तुम इसे समझ लो, तो अहंकार स्वयं ही तिरोहित हो जाएगा ।
तुम माया,भ्रम को, झूठ को नहीं छोड़ सकते। तुम केवल सत्य को ही छोड़ सकते हो और अहंकार सत्य नहीं है। भ्रम इसीलिए नहीं छोड़े जा सकते, क्योंकि वे तो होते ही नहीं है। तुम्हें केवल समझना होता है, और वे तिरोहित हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए सपने को नहीं छोड़ा जा सकता है। तुम्हें केवल सजग होना होता है कि यह सपना है, और सपना खो जाता है। अहंकार भी सूक्ष्मतम सपना है कि मैं अस्तित्व से अलग व्यक्ति हूं। मुझे 'समग्र' के विरुद्ध कुछ पाना है। जिस क्षण तुम होशपूर्ण होते हो।
अहंकार मिट जाता है। तुम समग्र के विपरीत नहीं हो सकते, क्योंकि तुम समग्र के हिस्से हो।यह वैसा है जैसे अपना हाथ विरुद्ध होने की कोशिश करे। समग्र के विरुद्ध होने का कोई उपाय नहीं है। केवल एक ही उपाय है....समग्र के साथ बहना।
जब तुम सोचते भी हो कि तुम समग्र के विरुद्ध चल रहे हो या समग्र से अलग हो या तुम्हारा अपना कोई अलग लक्ष्य है। तो वह केवल सपना ही है; क्योंकि तुम अलग हो ही नहीं सकते। समुद्र पर उठने वाली लहर.. रहेगी तो समुद्र का ही हिस्सा।
यदि वह कहीं जाती हुई मालूम भी पड़ती है,तो वह समुद्र की मर्जी ही होगी तभी वह जा रही है। जब कोई यह समझ लेता है, तो वह जान जाता है कि मैं बड़े सपने में जी रहा था अब सपना तिरोहित हो गया है। मैं अब नहीं हूं ,मैं दोनों ही स्वप्न भी और स्वप्न देखने वाला भी ।
लेकिन अब केवल 'समग्र' ही हूं। प्राणायाम वह स्थिति निर्मित करता है जहां 'लौटना' संभव हो जाता है, क्योंकि अब कोई शत्रुता,कोई संघर्ष या कहीं जाने को नहीं रहता। यदि तुम संघर्ष छोड़ दो, बाहर जाना समाप्त कर दो ।तो अपनी अंतस सत्ता की ओर बहने लगते, और यह स्वाभाविक है।
महृषि पतंजलि कहते 'प्राणायाम के बाद, फिर उस आवरण का विसर्जन हो जाता है, जो प्रकाश को ढंके हुए है। 'व्यक्ति प्रकाश को उपलब्ध हो जाता है' परन्तु इसका अर्थ यह नहीं हैं कि तुम प्रत्याहार में ही अपने लक्ष्य ,अपने अंतरतम केंद्र तक पहुंच गए ।
फिर धारणा ,ध्यान, समाधि का क्या अर्थ है। आवरण का विसर्जन' ...प्रकाश की उपलब्धि नहीं हैं.. ये दोनों अलग बातें हैं। आवरण का हटना केवल प्रकाश पाने की संभावना निर्मित करता है। यदि अंधकार का लंबा अभ्यास तुम्हारी आंखों का हिस्सा बन चुका है।
तो सूर्य तुम्हारे सामने मौजूद होगा, लेकिन तुम उसे देख न पाओगे। क्योकि वहां पलकों का स्थूल आवरण नहीं है, लेकिन अंधकार का एक सूक्ष्म आवरण अभी भी मौजूद है। और यदि तुम बहुत जन्म अंधकार में जीए तो सूर्य तुम्हारी आंखों के लिए बहुत ज्यादा चमकदार होगा।
तुम्हारी आंखें इतनी कमजोर होंगी कि वे इतनी तेज रोशनी बरदाश्त न कर पाएंगी। जब रोशनी.. तुम्हारी बरदाश्त करने की क्षमता से ज्यादा होती है। तो वह अंधकार बन जाती है। यदि कभी थोड़ी देर सूरज की तरफ देखने की कोशिश करोगे तो तुम पाओगे तुम्हारी आंखों में अंधेरा छा रहा है।
देखने की ज्यादा कोशिश तुम्हे अँधा भी बना सकती है।अथार्त बहुत ज्यादा रोशनी भी अंधेरा बन सकती है।वास्तव में तुम नहीं जानते कि तुम कितने जन्मों से अंधकार में जीते रहे हो। इसीलिए अंधकार ही तुम्हारा एकमात्र अनुभव रहा है।
प्रकाश इतना अपरिचित है कि उसे पहचानना असंभव होगा। आवरण के हटने मात्र से ही तुम उसे नहीं पहचान पाओगे। अगर कोई औषधि तुम्हारी मदद कर सकती है,तो बीमारी दूर हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि तुमने स्वास्थ्य पा लिया है। तुम्हें थोड़े दिन आराम करना होगा ।
जरूरी नहीं कि बीमारी का दूर हो जाना स्वास्थ्य का मिलना हो। स्वास्थ्य पॉजिटिव घटना ,बीमारी नेगेटिव घटना है। डाक्टर तुम्हें सर्टिफिकेट नहीं दे सकता कि तुम स्वस्थ हो; वह तुम्हें केवल यही सर्टिफिकेट दे सकता है कि तुम बीमार नहीं हो। कोई उपाय नहीं है कि तुम स्वस्थ हो या नहीं।
बीमार न होना स्वस्थ होने की मूलभूत शर्त है। लेकिन यदि तुम बीमार नहीं हो, तो जरूरी नहीं है कि तुम स्वस्थ हो। कभी -कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति बूढ़ा, बीमार,जीवन से हारा ,जीवन के प्रति कोई रस नहीं।जीने की चाह ही मिट गई है। तुम निरोग होने में उसकी मदद कर सकते हो ।
लेकिन वह स्वस्थ भी नहीं है। उसकी जीने की इच्छा ही नहीं है तो कोई उसकी मदद नहीं कर सकता। अब कोई आवरण न रहा'...इसका यह अर्थ नहीं है कि तुमने प्रकाश को जान लिया। अभी तीन चरण और शेष हैं। धीरे -धीरे तुम्हें उस प्रकाश को अनुभव करने ,जानने आत्मसात करने के लिए अपने अंतर्दृष्टि को तैयार करना होगा और इस तैयारी में समय लगता।
अब कोई बाधा नहीं रहती,अवरोध मिट जाता है, लेकिन दूरी अभी भी होती है।अब पहले से अधिक ध्यानपूर्वक चलना होगा, क्योंकि तुम भी सोचने की वही गलती कर सकते हो कि अब सब मिल गया। अवरोध हट गया है ,अब वापस घर लौट आया।
लेकिन तब तुम मंजिल पर पहुंचने के पहले ही रुक गए। बहुत से योगी है जो पांचवें पर रुक गए है। वास्तव में यदि तुम बहुत अहंकारी हो तो तुम इसी सूत्र पर ठहर जाओगे। अगर अवरोध हो तो अहंकार के पास कुछ लड़ने के लिए होता है। आवरण हो,तो तुम उसे हटाने की, कोशिश करते रहते हो।
स्वर विज्ञान: भगवान शिव कहते है: - 'ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।''
इस सूत्र को तीन हिस्सों में बांट कर समझ सकते है। ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास को टिकाना , स्वास का सूक्ष्म, अदृष्य, अपार्थिव अंश को अनुभव करना। और अदृश्य प्राण को ह्रदय तक जाते देखना और नींद ,सपनों और स्वयं मृत्यु के प्रति भी सजग होना।
श्वास के भीतर जो प्राण है, जो उसका सूक्ष्म, अदृष्य, अपार्थिव अंश है, उसे अनुभव करना होगा। उस सूक्ष्म प्राण को जानने का सबसे सुगम मार्ग है, तीसरी आँख में स्थिर होना। यदि तुम सूक्ष्म श्वास को, प्राण को महसूस करने लगे। तो संसारिक मृत्यु छह माह पहले जान लेते हो।
ठीक वैसे जैसे, संत अपनी मृत्यु की तिथि बना देते है? क्योंकि यदि तुम प्राण के प्रवाह को जानते हो तब उसको भी तुम जान लोगे। मृत्यु के छह महीने पहले प्रक्रिया उलट जाती है। तुम्हारी प्राण ऊर्जा बाहर जाने लगती है। तब श्वास इसे भीतर नहीं ले जाती।
बल्कि उलटे बाहर ले जाने लगती है । सामान्य जन इसे नही जान पाते है ,क्योंकि स्वास, वाहन है सब वाहन को देख रहे । वाहन के भीतर कोन स्वार है? अभी श्वास प्राण को भीतर ले जाती है और वहां छोड़ देती है। फिर वाहन बाहर खाली वापस जाता है।
और प्राण से पुन: भरकर भीतर जाता है। ध्यान रहे , कि भीतर आने वाली श्वास और बाहर जाने वाली श्वास, दोनों एक नहीं है। वाहन के रूप में तो पूरक श्वास और रेचक श्वास एक ही है, लेकिन जहां पूरक प्राण से भरा होता है। वहीं रेचक उससे रिक्त रहता है।
शरीर ने प्राण को पी लिया और श्वास खाली हो गई। जब कोई मृत्यु के करीब होता ,तब उलटी प्रक्रिया चालू होती है। भीतर आने वाली श्वास प्राण विहीन ,रिक्त आती है। क्योंकि शरीर अस्तित्व से प्राण को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है।
फिर जब श्वास बाहर जाती है, जब प्राण को साथ लिए बाहर जाती है। इस लिए जिसने सूक्ष्म प्राण को जान लिया वह अपनी मृत्यु का दिन भी तुरंत जान सकता है। यह सूत्र बहुत महत्वपूर्ण है। जब तुम नींद में उतर रहे हो, तभी इस विधि को साधना है।
सोने का समय इस विधि के अभ्यास के लिए उपयुक्त समय है। तुम नींद में उतर रहे हो, धीरे-धीरे नींद तुम पर हावी हो रही है। कुछ ही क्षणों के भीतर तुम्हारी चेतना लुप्त होगी। तुम अचेत हो जाओगे। उस क्षण के आने के पहले अपनी श्वास और उसके सूक्ष्म अंश प्राण के प्रति सजग हो जाओ।
और उसे ह्रदय तक जाते हुए अनुभव करो। अनुभव करते जाओ कि वह ह्रदय तक आ रहा है। प्राण ह्रदय से होकर शरीर में प्रवेश करता है, इसलिए यह अनुभव करते ही जाओ कि प्राण ह्रदय तक आ रहा है। और इस निरंतर अनुभव के बीच ही नींद को आने दो।
यदि यह संभव हो जाए कि तुम अदृश्य प्राण को ह्रदय तक जाते देखो और नींद को भी, तो तुम अपने सपनों के प्रति भी सजग हो जाओगे। तब तुमको बोध रहेगा। क्या तुमने किसी को नींद में देखा है। उसकी आंखे ऊपर चली जाती है, और तीसरी आँख में स्थिर हो जाती है।
यदि नहीं देखा तो देखो। तुम्हारा बच्चा सोया है, उसकी आंखे खोलकर देखो कि उसकी आंखे कहां है। उसकी आँख की पुतलियाँ ऊपर को चढ़ी है और त्रिनेत्र पर केंद्रित है। बच्चों को देखो, व्यस्को को नहीं क्योंकि वे भरोसे योग्य नहीं है। वे सोचते भर है कि सोये है लेकिन नींद गहरी नहीं है।
इसी तीसरी आँख में स्थिरता के कारण तुम अपने सपनों को सच मानते हो। तुम यह नहीं समझ सकते की वे सपने है। वह तुम तब जानोंगे, जब सुबह जागोगे। तब तुम जानोंगे कि यह स्वप्न है। यदि समझ जाओ तो दो तल हो गए..स्वप्न है और तुम सजग हो।
जो स्वप्न के प्रति जाग सके, उसके लिए यह सूत्र चमत्कारिक है। यह सूत्र कहता है: ‘’स्वप्न पर और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा। यदि तुम स्वप्न के प्रति जागरूक हो जाओ तो तुम स्वप्न पैदा कर सकते हो और दूसरा तुम अपने स्वप्नों के मालिक हो सकते हो।
स्वप्न तुम में घटित होता है परन्तु तुम कुछ नहीं कर सकते हो। न तुम उसे रोक सकते हो, न उसे पैदा कर सकते हो। लेकिन अगर तुम यह देखते हुए नींद में उतरो कि ह्रदय प्राण से भर रहा है। निरंतर हर श्वास में प्राण से स्पर्शित हो रहा है तो तुम अपने स्वप्नों के मालिक हो जाओगे।
एक बार स्वप्न के मालिक हो गए तो फिर तुम कभी स्वप्न नहीं देखोगें क्योंकि जरूरत नहीं रही। जैसे ही तुम अपने स्वप्नों के मालिक होते हो, स्वप्न बंद हो जाते है क्योंकि उनकी जरूरत नहीं रहती। और जब स्वप्न बंद हो जाते है, तब तुम्हारी नींद का गुण धर्म ही और होता है।
वह गुणधर्म वही है, जो मृत्यु का है। वास्तव में,मृत्यु गहन नींद है। अगर तुम्हारी नींद मृत्यु की तरह गहरी हो जाए तो उसका अर्थ है कि सपने विदा हो गए। और जब सपने नहीं रहते, तब तुम नींद के सागर में उतर जाते हो। उसकी गहराई छू लेते है और वही मृत्यु है।
नींद छोटी मृत्यु है और मृत्यु लंबी नींद है। दोनों समान है। प्रतिदिन जब तुम थक जाते हो, तुम सो जाते हो, और दूसरी सुबह तुम फिर अपनी शक्ति और अपनी जीवंतता को वापस पा लेते हो। तुम मानो फिर से जन्म लेते हो। वैसे अस्सी वर्ष के जीवन के बाद तुम पूरी तरह थक जाते हो।
अब छोटी अविधि की मृत्यु से काम नहीं चलेगा, अब तुमको बड़ी मृत्यु की जरूरत है। उस बड़ी मृत्यु या नींद के बाद तुम बिलकुल नए शरीर के साथ पुनर्जन्म लेते हो। यदि एक बार तुम स्वप्न- शून्य नींद को जान जाओ और उसमे बोध पूर्वक रहो तो फिर मृत्यु का भय जाता रहता है।
संसार में कुछ असंभव है तो वह, मृत्यु है क्योंकि अस्तित्व जीवन है। तुम फिर और फिर जन्मते हो। लेकिन नींद ऐसी गहरी है कि पुरानी पहचान भूल जाते हो। तुम्हारे मन से स्मृतियां पोंछ दी जाती है। जब तुम मरते हो ओर फिर जन्म लेते हो तब तुमको याद नहीं रहता है ।
तुम फिर से शुरू करते हो। इसलिए यह सूत्र कहता है: “स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।” और तब तुम जानोंगे कि मृत्यु एक लंबी नींद है और सहयोगी है, और सुंदर है। क्योंकि वह तुमको नव जीवन देती है ,सब कुछ नया देती है, फिर तो मृत्यु भी समाप्त हो जाती है।
मृत्यु पर नियंत्रण पाने, अधिकार पाने का दूसरा अर्थ भी है। अगर तुम समझ लो कि मृत्यु नींद है तो तुम उसको दिशा दे सकते हो। अगर तुम अपने सपनों को दिशा दे सकते हो। तो मृत्यु को भी दे सकते हो। तब तुम चुनाव कर सकते हो, कि कहां पैदा हो?
कब पैदा हो, किससे पैदा हो, और किस रूप में पैदा हो, तब तुम अपने जीवन के मालिक होते हो। अंतिम जन्म के पूर्व के जन्म में जब बुद्ध की मृत्यु हुई, तब मरने के पूर्व उन्होंने कहा , ’मैं यहां पैदा होऊंगा। ऐसी मेरी मां होगी, ऐसे मेरे पिता होंगे,
मेरी मां मेरे जन्म के बाद ही मर जायेगी। जब मैं मां के पेट में होऊंगा, तब मेरी मां ये-ये स्वप्न देखेगी। और जब कोई इस क्रम से इन स्वप्नों को देखे, तब तुम समझ जाना की मैं जन्म लेने वाला हूं और ऐसा ही हुआ। बुद्ध की माता ने उसी क्रम से सपने देखे।
और यह केवल गौतम बुद्ध के लिए ही सही नहीं है ; कई अन्यों के लिए भी सही है। प्रत्येक जैन तीर्थंकर ने अपने पिछले जन्म में भविष्यवाणी की थी कि उनका जन्म किस तरह होगा। उन्होंने भी स्वप्नों के क्रम , प्रतीक बताए थे, और कहा था कि किस तरह सब कुछ घटित होने वाला है।
एक बार तुम अपने स्वप्नों को दिशा देने लगो तो सब कुछ को दिशा दे सकते हो। क्योंकि यह संसार स्वप्नों का ही बना हुआ है। और स्वप्नों का ही यह जीवन बना है। इसलिए जब तुम्हारा अधिकार सपने पर हुआ तब सब कुछ पर हो गया।
स्वर विज्ञान: बीमार न होना स्वस्थ होने की मूलभूत शर्त है। लेकिन यदि तुम बीमार नहीं हो, तो जरूरी नहीं है कि तुम स्वस्थ हो। कभी -कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति बूढ़ा, बीमार,जीवन से हारा ,जीवन के प्रति कोई रस नहीं। जीने की चाह ही मिट गई है।
तुम निरोग होने में उसकी मदद कर सकते हो । लेकिन वह स्वस्थ भी नहीं है। उसकी जीने की इच्छा ही नहीं है तो कोई उसकी मदद नहीं कर सकता। अब कोई आवरण न रहा'...इसका यह अर्थ नहीं है कि तुमने प्रकाश को जान लिया। अभी तीन चरण और शेष हैं।
धीरे -धीरे तुम्हें उस प्रकाश को अनुभव करने ,जानने आत्मसात करने के लिए अपने अंतर्दृष्टि को तैयार करना होगा,इस तैयारी में समय लगता। अब कोई बाधा नहीं रहती,अवरोध मिट जाता है, लेकिन दूरी अभी भी होती है।अब पहले से अधिक ध्यानपूर्वक चलना होगा।
क्योंकि तुम भी सोचने की वही गलती कर सकते हो कि अब सब मिल गया। अवरोध हट गया है , लेकिन तब तुम मंजिल पर पहुंचने के पहले ही रुक गए। बहुत से योगी है जो पांचवें पर रुक गए है। वास्तव में यदि तुम बहुत अहंकारी हो तो तुम इसी सूत्र पर ठहर जाओगे।
अगर अवरोध हो तो अहंकार के पास कुछ लड़ने के लिए होता है। आवरण हो,तो तुम उसे हटाने की, कोशिश करते रहते हो। जब वह हट जाता है, तो लड़ने के लिए कुछ नहीं रहता। जैसे कि तुम जिस चीज से संघर्ष कर रहे थे, वह अचानक खो जाए तो ।
जीवन का सारा अर्थ उसके साथ खो जाता है। अब तुम नहीं जानते कि क्या करें।उदाहरण के लिए बहुत लोग दूसरों के साथ एक गहरी प्रतियोगिता में उलझे हैं । व्यापार में, राजनीति में, इधर उधर की बातों में। अगर वे थोड़े भी बुद्धिमान हैं, तो फिर वे थक जाते हैं।
फिर वे अपने अहंकार से ही लड़ने लगते हैं, जो कि एक आवरण है। एक दिन वह आवरण भी हट जाता है, तब लड़ने के लिए, संघर्ष करने के लिए कुछ बचता नहीं। जब संघर्ष करने के लिए कुछ नहीं बचता। तो अहंकार के लिए रह पाना असंभव हो जाता है।
क्योंकि अहंकार केवल संघर्ष में ही रहता है ; या तो दूसरे के साथ या फिर अपने अहंकार के साथ। जब लड़ने , संघर्ष करने के लिए ,कहीं जाने के लिए कुछ नहीं रहता। कोई बाधा नहीं रहती, तो तुम ठहर जाते हो। लेकिन तीन चरण अभी भी शेष हैं।
धारणा केवल एकाग्रता नहीं है एकाग्रता से बहुत बड़ी बात है। धर्म भी धारणा से आता है। धारणा का अर्थ होता है।धारण करने की क्षमता। जब प्राणायाम के बाद तुम समग्र के साथ लयबद्ध हो जाते हो। तो धारण करने की विराट क्षमता बन जाते हो।
तुम इतने विराट हो जाते हो कि सब कुछ समाहित कर सकते हो। लेकिन 'धारणा' का अनुवाद 'एकाग्रता' की भांति किया जाता रहा है क्योंकि इसमें एकाग्रता की थोड़ी झलक मिलती है। एक ही विचार को लंबे समय तक धारण किए रहना एकाग्रता है।
वास्तव में,मन के लिए किसी चीज पर एकाग्र रहना बड़ा कठिन है। मन बहुत संकुचित है..विराट नहीं। वह किसी चीज के साथ कुछ क्षणों के लिए ही रह सकता है, फिर वह उससे हट जाता है। किसी चीज पर न ठहरना मनुष्यता की गहरी समस्याओं में से एक है।
यदि तुम अपने लक्ष्य तक पहुंच भी जाते हो, तो जल्दी ही तुम वहां से हट जाते हो। यही हमेशा से हो रहा है... तुम कहीं रुक नहीं सकते। धारणा का अर्थ है धारण करने की क्षमता। क्योंकि यदि तुम परमात्मा को जानना चाहते हो, तो तुम्हें उसे धारण करने की क्षमता जुटानी होगी।
यदि तुम अपने अंतरस्थ केंद्र को जानना चाहते हो। तो तुम्हें उसके लिए स्वयं को पुन: जन्म देना होगा। पृथ्वी वृक्ष के बीज को महीनों तक धारण करती है। जब बीज भूमि के साथ एक हो जाता है; भय छोड़ देता है; निश्चित अनुभव करने लगता है तो खोल टूटती है।
और अंकुर फूट पड़ते हैं। जब बीज को लगता है कि यह पृथ्वी मां जैसी है तो स्वयं की सुरक्षा करने,अपने चारों ओर खोल का कवच बनाए रखने की कोई जरूरत नहीं रहती और वह शिथिल हो जाता है। तब धीरे-धीरे खोल टूटता है और पृथ्वी में खो जाता तुम्हें स्वयं को जन्म देना है।
स्वयं को गर्भ में धारण करना है। एकाग्रता उसी का हिस्सा है। यदि तुम एक ही विचार के साथ ज्यादा देर तक रह सकते हो। तो तुम अपने साथ भी ज्यादा देर तक रहने में सक्षम हो जाते हो। क्योंकि यदि तुम लंबे समय तक स्वयं में नहीं रह सकते तो।
तुम वस्तुओं द्वारा आकर्षित होते रहोगे उनमें भटकते रहोगे और घर वापस न आ पाओगे। लौटना तभी संभव होता है;जब कोई वस्तु तुम्हारे चित्त को भटकाती नहीं। जिस मन में गहन धैर्य है... जो प्रतीक्षा कर सकता है, स्थिर रह सकता है, केवल वही मन स्वयं को जान सकता है।
मन की उस क्षमता की पुनर्स्थापना है जिससे बाह्य विषय जनित विक्षेपों से मुक्त हो इंद्रियां वश में हो जाती हैं। उदाहरण के लिए तुम्हारा मोबाइल बार -बार बजता है, तो तुम कैसे ध्यान कर सकते हो? तुम्हें मोबाइल साइलेंट करना है। जब तुम ध्यान करने की कोशिश कर रहे हो।
तुम्हारे आसपास बहुत कुछ चल रहा हैं। मन का दूसरा हिस्सा कुछ और ही कहता है -और मन में हजारों बातें चलती रहती हैं। वे सब बातें तुम्हारा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रही हैं। यदि यही चलता रहा, तो प्रत्याहार संभव नहीं है।
तुम भीतर नहीं जा सकते विक्षेपों से मुक्त होना कठिन है मात्र प्रतिज्ञा करने से यह संभव नहीं है। वास्तव में प्रतिज्ञा से उलटा ही होता है। यदि तुम जबरदस्ती, बिना समझ के कुछ छोड़ते हो, तो और ज्यादा मुश्किल में पड़ जाते हो। बहुत से लोग ऐसे ही छोड़ने की कोशिश करते रहे हैं।
संकल्प तो अहंकार का ही हिस्सा है इसीलिए समझ आवश्यक है। जब तुम किसी वस्तु या आदत के विरुद्ध संकल्प करते हो। तो तुम दो हिस्सों में बंट जाते हो ;अपनें से ही लड़ने लगते हो। वास्तव में तुम अब भी आकर्षित हो और कोई सहारा खोज रहे हो जहां तुम इसे छोड़ सको।
तुम्हारा संकल्प तुम्हारी अपनी ही कामना/वासना से लड़ रहा है। यह ऐसे ही है जैसे बायां हाथ तुम्हारे ही दाएं हाथ से लड़ रहा हो। यह नासमझी है जो तुम समझ से , अनुभव से छोड़ सकते हो। लेकिन किसी प्रतिज्ञा से कभी नहीं ...।
यदि तुम कोई चीज छोड़ना चाहते हो, तो उसे पूरा जीओं, उसके गहरे में उतरो, ताकि तुम समझ सको। एक बार बात समझ में आ जाती है, तो उसे बिना किसी प्रयास के छोड़ा जा सकता है। संकल्पपूर्वक कुछ भी मत करो,संकल्प ही उलझन खड़ी करता है।
जीवन पाठशाला है जिससे गुजरना जरूरी है। अनुभव ही एकमात्र उपाय है। इसमें थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता। यह कहना ठीक नहीं। बाहरी वस्तुओ द्वारा होने वाले असंयम का त्याग करने से व्यक्ति प्रत्याहार के योग्य हो जाता है।
जब बाहर के संसार में कोई रस नहीं रहता, तब तुम स्वयं को जानना चाहते हो। स्वयं को जानने की आकांक्षा बाकी सारी आकांक्षाओं का स्थान ले लेती है। जब तुम घर लौट आते हो, भीतर आ जाते हो, तो फिर समस्त इंद्रियों पर पूर्ण वश हो जाता है।
अचानक तुम मालिक हो जाते हो। यही इस प्रक्रिया का सौंदर्य है। यदि तुम बाहर भटकते रहते हो। तो तुम गुलाम रहते हो और तुम्हारी गुलामी अनंत होती है। क्योंकि तुम्हारी आकांक्षा के विषय भी अनंत होते हैं। एक मनुष्य महल में रहकर भी संत हो सकता है।
और एक मनुष्य झोपड़ी में रहकर भी शायद संत न हो। संत होने की गुणवत्ता तुम्हारे मालिक होने पर निर्भर है। यदि तुम वस्तुओ का उपयोग करते हो तो ठीक है। लेकिन यदि तुम्हारा उपयोग किया जा रहा है तो तुम मूढ़तापूर्ण व्यवहार कर रहे हो।
जब तुम्हारी जिंदगी में आत्मज्ञान सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है; तब अंतस-सत्ता के लिए हर वस्तु छोड़ी जा सकती है राज्य मूल्यहीन हो जाते हैं। तुम्हें अपने आंतरिक राज्य और बाहरी राज्य के बीच चुनना हो। तो तुम आंतरिक राज्य चुनोगे।
उस क्षण, तुम स्वामी हो जाते हो। स्वामी का अर्थ होता है मालिक अथार्त इंद्रियों का मालिक। इसीलिए संन्यासियों के लिए हम 'स्वामी' शब्द का प्रयोग करते रहे हैं। अधिकांश मनुष्य भौतिक संसार के गुलाम हैं । और जब तक वे मालिक नहीं हो जाते, कुरूप ही रहेगे , नरक में ही रहेगे।
स्वयं का मालिक होना है ...स्वर्ग में प्रवेश करना। प्रत्याहार तुम्हें मालिक बना देता है ।अथार्त अब तुम वस्तुओ के पीछे नहीं भटक रहे उनकी खोज में नहीं हो। वही ऊर्जा जो संसार में भटक रही थी, अब केंद्र पर लौट आती है।
जब ऊर्जा केंद्र में लौटती है, तब रहस्यों पर रहस्य खुलते चले जाते हैं। तुम पहली बार स्वयं के सामने प्रकट होते हो , तुम जानते हो कि तुम कौन हो। और यह जानना कि ''मैं कौन हूं'' तुम्हें शिव बना देता है।
स्वर विज्ञान: महाऋषि पतंजलि ने यम, नियम,आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा के बाद सातवे स्थान पर ध्यान को रखा उसके बाद केवल समाधी है इसका अर्थ यह हुआ कि ध्यान योग में काफी उच्चावस्था है। अब इस अवस्था तक कैसे पहुंचे यह महत्त्वपूर्ण है।
ध्यान से नीचे की अवस्था निर्विचारिता की स्तिथि है और हम जहाँ खड़े वहाँ विचारो का संघटन हमारे साथ है। तो हम मनन, एकाग्रता ओर निर्विचारिता के रास्ते हम ध्यान की अवस्था तक पहुंचने की सीढ़ी बनाते। मनन का अर्थ है -दिशाबद्ध विचारना।
हम सब विचार करतें हैं, लेकिन वह मनन नहीं है। वह विचारना दिशा रहित है, अस्पष्ट है। वास्तव में, हम अनजाने ही एक विचार से दूसरे विचार को जन्म दिए जाते है। संगठन के कारण एक विचार अपने आप ही दूसरे विचार पर चला जाता है।
तुमने एक पक्षी को देखा तो तुम्हारा मन पक्षी के संबंध में सोचने लगा और संगठन के प्रभाव के कारण तुम पक्षी को लेकर अपने बचपन के स्वप्न देखने लगते हो। और फिर बचपन के साथ जुड़ी हुई अनेक चीजें आती हैं, और तुम उनके बीच चक्कर काटने लगते हो।
जब तुम्हें समय हो तो तुम सोचने से पीछे चलो, विचारने से पीछे हटकर वहां जाओ जहां से विचार आया। तब तुम पाओगे कि वहां कोई दूसरा विचार था जो इस विचार को लाया। तुम्हारे बचपन के साथ इस पक्षी का कोई ज्यादा लेना- देना नहीं है।
यह मात्र मन का संगठन है। किसी दूसरे व्यक्ति को वह पक्षी कहीं और ले जाएगा। हरेक व्यक्ति के मन में संगठन की श्रृंखला है। कोई भी घटना उस श्रृंखला से जुड़ जाती है। तब मन कंप्यूटर की भांति काम करने लगता है। तब एक चीज से दूसरी चीज, दूसरी से तीसरी निकलती चली जाती है।
यही तुम दिन भर करते रहते हो। जो भी तुम्हारे मन में आए उसे ईमानदारी से एक कागज के टुकड़े पर लिख लो। तुम हैरान होओगे कि यह मेरे मन में क्या चल रहा है ..दो विचारों के बीच कोई संबंध ही नहीं है। और तुम इसी तरह के विचार करते रहते हो। तुम उनके साथ बह रहे हो।
विचार तब मनन बनता है जब वह श्रृंखला के कारण नहीं, तुम्हारे निर्देशन से चलता है। अगर तुम किसी खास समस्या पर काम कर रहे हो तो तुम सब संगठन की श्रृंखला को अलग कर देते हो और उसी एक समस्या के साथ गति करते हो। तब तुम अपने मन को निर्देश देते हो।
मन तब भी इधर -उधर से किसी श्रृंखला पकड़कर भागने की चेष्टा करेगा। लेकिन तुम सभी अन्य रास्तों को रोक देते हो और मन को एक मार्ग से ले चलते हो। तब तुम अपने मन को दिशा देते हो। किसी समस्या में संलग्न एक वैज्ञानिक मनन में होता है।
वैसे ही किसी समस्या में उलझा हुआ तार्किक या गणितज्ञ मनन करता है। जब कवि किसी फूल पर मनन करता है तब शेष संसार उसके मन से ओझल हो जाता है। तब दो ही होते हैं,फूल और कवि, और कवि फूल के साथ यात्रा करता है।
रास्ते के किनारों से अनेक चीजें आकर्षित करेंगी, लेकिन वह अपने मन को कहीं नहीं जाने देता है। मन एक ही 'निर्देशित' दिशा में गति करता है। यह मनन है। विज्ञान मनन पर आधारित है। कोई भी तार्किक विचार मनन है। उसमें विचार निर्देशित है, दिशाबद्ध है।
विचार की दिशा निश्चित है। सामान्य विचारना तो व्यर्थ है। मनन तर्कपूर्ण है, बुद्धिपूर्ण है। फिर एकाग्रता है। एकाग्रता एक बिंदु पर ठहर जाना है। यह विचारना नहीं है, एक बिंदु पर होने को एकाग्रता कहते हैं। सामान्य विचारणा में मन पागल की तरह गति करता है।
मनन में पागल मन निर्देशित हो जाता है और एकाग्रता में मन को गति की ही छूट नहीं रहती। साधारण विचारणा में मन कहीं भी गति कर सकता है; मनन में किसी दिशा विशेष में ही गति कर सकता है; एकाग्रता में वह कहीं भी गति नहीं कर सकता।
एकाग्रता में उसे एक बिंदु पर ही रहने दिया जाता है। सारी ऊर्जा, सारी गति एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है। योग का संबंध एकाग्रता से है। साधारण मन दिशाहीन, अनियंत्रित विचार से संबंधित है और वैज्ञानिक मन दिशाबद्ध विचार से। ये चार अवस्थाएं हैं ।
साधारण विचारना, मनन, एकाग्रता और फिर निर्विचारिता की स्तिथि अर्थात अ-मन। उसमें एकाग्रता के लिए भी गुंजाइश नहीं है; मन के होने की ही गुंजाइश नहीं है। एकाग्रता तक मन की पहुंच है, मन की पकड़ है। मन एकाग्रता को समझ सकता है।
लेकिन' मन निर्विचारिता को नहीं समझ सकता। वहां मन की पहुंच बिलकुल नहीं है। एकाग्रता में मन को एक बिंदु पर रहने दिया जाता है; निर्विरारिता में वह बिंदु भी हटा लिया जाता है। मनन और एकाग्रता मन की प्रक्रियाएं हैंमन और चित्त को बहुधा हमसब एक ही अर्थ में प्रयोग करते हैं ।
परंतु इन दोनो में सूक्ष्म अंतर है। जिस प्रकार तालाब में पत्थर फेंकने पर उसमें तरंगे उत्पन्न होती हैं उसी तरह चित्त पर जब किसी उद्दीपक का प्रभाव पड़ता है तो चित्त से वृतियां पैदा होती हैं। इन्ही उत्पन्न वृत्तियों को मन कहते हैं। अर्थात मन लहर है और चित सागर।
सागर में तीव्र लहरे है तो सागर अर्थात चित अशांत है अ मन को शांति कहा गया अर्थात लहर नही होने पर सागर शांत है। मन को अंग्रेजी में माइंड कहते हैं जबकि चित्त को माइंड स्टफ कहते हैं। वृतियां वेव्स हैं। वृत्तियों के बनने से रोकने की प्रक्रिया को योग कहते हैं।
महाऋषि पतञ्जलि कहते है। योग चित्त वृत्ति निरोधः। इसका अर्थ है कि चित्त में बनने वाली वृत्तियों को रोक देना ही योग की स्थिति है। मन के न रहने से चित शांत होता। फिर मन का कार्य चित करता निर्देशन में साधारण विचारणा प्रथम अवस्था ओर ध्यान उसकी उच्चतम संभावना है।
बहुत से लोग नाम जप करते कुछ मन्त्र करते वो ध्यान नही है। भक्ति भाव से इष्ट के स्वप्न में रहना भी ध्यान नही है। ध्यान तक पहुचने के लिए प्रथम मनन को समझना होगा विस्तार से यही सीढ़ी का प्रथम पायदान है किंतु प्रथम पायदान पर पॉव तभी रख सकते।
जब तक हम श्रवण को नही समझते। श्रवण का अर्थ हम जानते सुनना होता तो पहले हमे सुनना आना सीखना होगा तभी हम सुने पर दिशा देकर विचार करना समझते । अगली पोस्ट में हम विस्तार से समझते श्रवण क्या है फिर मनन को समझेंगे ओर ध्यान तक कि यात्रा करते।
स्वर विज्ञान: जब तुम्हारे चित्त ने यह फैसला किया कि आत्मा अविनाशी है और वह अंदर ही है; तो आनंद की जो तलाश बाहर थी, वह रुकेगी और अंदर बैठना शुरू होगा। इस बैठने को ही हम उपासना कहते हैं। यह जो सुनते हैं ..उसे श्रवण कहते हैं।
’तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव—ब्रह्म की एकतारूप अर्थ का अनुसंधान करना, यह श्रवण है। और जो कुछ सुना गया है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, यह मनन है। जब चेतना, मन और शरीर तीनों लग जाते हैं, तो साधना।
जब चेतना और मन दोनों लगते हैं, तो मनन। और जब चेतना शुद्ध अकेली सुनती है, तो सम्यक श्रवण। सुनकर ही हो जाए, तो शुद्ध चैतन्य में घट जाता है। सुनकर न हो, तो मन की सहायता की जरूरत है; तो मनन। अगर मनन से भी न हो, तो फिर शरीर की भी साधना में जरूरत है।
चार शब्दों का प्रयोग हुआ है। एक -एक शब्द अपने आप में एक -एक जगत है। वे चार शब्द हैं श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि। इन चार शब्दों में सत्य की सारी यात्रा समाहित हो जाती है। ये चार चरण जो सम्यक-रूपेण, पूरा कर ले, उसे कुछ और करने को शेष नहीं रह जाता है।
इन चार शब्दों के आस -पास ही समस्त साधना विकसित हुई है। इसलिए एक -एक शब्द को गहराई से, सूक्ष्मता से समझ लेना उपयोगी है। पहला शब्द है, श्रवण। श्रवण का अर्थ मात्र सुनना नहीं है। हम सभी सुनते हैं। सुनने के लिए कान होना काफी है।
सुनना एक यांत्रिक घटना है। ध्वनि हुई, कान पर आवाज पड़ी, कान सुनने के लिए जरूरी है, आवश्यक है, लेक़िन पर्याप्त नहीं है। भीतर कुछ और भी चाहिए। श्रवण का अर्थ है, कान भी वहां हों और आप भी वहां हों ..तो श्रवण घटित होता है।
कान के साथ होना साधना की बात है। श्रवण का अर्थ है कि जब आप सुनते हों तो आपकी सारी चेतना कान हो जाए; सुनना ही रह जाए, बाकी कुछ भी न हो; क्योंकि भीतर अगर विचार चलता है, तो आपका ध्यान विचार पर चला जाता है, कान सुन रहा है, लेकिन कान ने जो सुना है।
चैतन्य तक पहुंचाने के लिए ध्यान का जो सेतु चाहिए, वह हट गया है इस लिए कान सुनते हैं,लेक़िन आप नहीं सुन पाते। आप और कान के बीच में जो संबंध है, वह टूट गया है। वास्तव में ,ध्यान बड़ी सूक्ष्म चीज है। जरा सा विचार भीतर चल रहा हो, तो ध्यान वहां चला जाता है।
पैर में चींटी काट रही हो तो जितनी देर के लिए आपको पता चलता है कि पैर में चींटी काट रही है, उतनी देर तक श्रवण खो जाता है। सुनना होता है लेक़िन ध्यान हट जाता है। ध्यान की एक और तकलीफ है कि ध्यान एक साथ दो चीजों पर नहीं हो सकता।
एक चीज पर एक बारगी होता है। जब दूसरी चीज पर होता है, एक से तत्काल हट जाता है। आप ऐसा कर सकते हैं कि छलांग लगा सकते हैं। हम छलांग लगाते रहते हैं। पैर में चींटी ने काटा, ध्यान वहां गया; फिर वापस ध्यान लौटा, सुना। खुजली आ गई, ध्यान वहां गया, फिर सुना।
बीच -बीच में जब ध्यान हट जाता है, तो श्रवण में अंतराल पड़ जाते हैं ।और इसलिए जो आप सुनते हैं, उसमें से बहुत अर्थ नहीं निकल पाता, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो जाता है। और कई बार जो अर्थ आप निकालते हैं, वह आपका ही होता है।
फिर, क्योंकि उसमें बहुत कुछ खो गया है। फिर जोड़ कर आप जो सोच लेते हैं, वह आपका ही है। जो कहा गया है उसे तो वही समझ सकता है जो श्रवण को उपलब्ध हो। अगर आप सिर्फ सुन रहे हैं, तो आप वही समझेंगे जो आप समझ सकते हैं ।
वह नहीं, जो कहा गया है। क्योंकि बीच में बहुत कुछ खो जाएगा। और वह जो खो जाएगा, उसको आप अपने से भर देंगे , क्योंकि खाली जगह भर दी जाती है। आपका मन, आपकी स्मृति, आपकी जानकारी, आपका ज्ञान, अनुभव, वह उसमें समा जाएगा।
फिर जो अंतिम रूप बनेगा, उसके निर्माता आप ही हैं । श्रवण का अर्थ है, कान के पास ही चेतना आ जाए। भीतर कोई विचार , कोई चिंतन , कोई तर्क न चलता हो। इसका यह मतलब नहीं कि जो कहा जाए उसको आप बिना समझे स्वीकार कर लें।
श्रवण में स्वीकार का कोई अर्थ नहीं है। श्रवण का अर्थ है सिर्फ सुन लें, स्वीकार -अस्वीकार बाद की बात है; जल्दी न करें। हम क्या करते हैं कि सुनते वक्त ही स्वीकार -अस्वीकार करते रहते हैं। लोगों के सिर हिलते रहते हैं कि बिलकुल ठीक, कोई कहता है कि नहीं जंच रहा।
वह सिर ही नहीं हिल रहा है, भीतर ध्यान हिल रहा है। उस ध्यान की वजह से सिर हिल रहा है। उतने कंपन में आपका श्रवण खो गया। इसका मतलब यह कि आप भीतर सुनने के साथ निर्णय भी ले रहे हैं । तो जितनी देर आप निर्णय लेंगे उतनी देर श्रवण चूक जाएगा।
श्रवण करते समय ठीक से वही सुन लेना है जो कहा गया। तब तो आप पीछे निर्णय कर सकेंगे कि स्वीकार करूं या अस्वीकार करूं? तो स्वीकार—अस्वीकार की प्रक्रिया को सुनते समय बीच में ले आना, श्रवण से चूक जाना है। मन दो काम नहीं कर सकता।
जो सोचते हैं वे सुन नहीं पाते, जो सुनते हैं उन्हें सोचने के लिए उस समय कोई उपाय नहीं है। सोचना बाद में भी हो सकता है।और यही न्यायसंगत भी है कि पहले सुन लिया जाए, फिर सोचा जाए। क्योंकि अगर आपने ठीक से सुना ही नहीं है, जो सुना है उसमें अपना जोड दिया है।
या जो सुना है उसमें बीच -बीच में अंतराल रह गए हैं, तो आप जो सोचेंगे, उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता। सम्यक सुना न गया हो तो सोचना व्यर्थ हो जाता है। इसलिए ऋषियों ने पहली सीढ़ी 'श्रवण' कही है। किसी संत के पास कोई आता है तो वे पहले कहते है कि तुम ठीक से श्रावक बनो।
सुनने की कला जिसे आ गई हो वह श्रावक है।आपका मन बिलकुल रुक जाना चाहिए, उसकी धारा रुक जानी चाहिए, तो श्रवण घटित होता है और श्रवण पहली सीढ़ी है और जितनी महत्वपूर्ण बात हो, उतना ही श्रवण प्रगाढ़ हो, तभी समझी जा सकेगी।
श्रवण का स्वीकार से कोई संबंध ही नहीं है। श्रवण का संबंध सिर्फ इस बात को ठीक से सुन लेने से है कि क्या कहा गया है। यही मन दुश्मन है और यही है आपका नियंता; इसी को मिटाने चले हैं और इसी के सहारे मिटाने चले हैं; तो कभी न मिटा पाएंगे।
तो जरा सी एक बात आपको खटक जाए, कि आपकी मान्यताओं में यह बात नहीं जंचती बस मन आपका द्वार बंद कर लेता है। कि अब सुनो ही मत , अनसुना कर दो या भीतर विरोध करते जाओ । मनसविद कहते हैं कि आपसे अगर सौ बातें कही जाएं।
तो आपका मन पांच बातों को मुश्किल से भीतर जाने देता है। पंचानबे को बाहर लौटा देता है ..घुसने ही नहीं देता। क्योंकि आपकी मान्यताएं अतीत पर निर्भर हैं, तय हैं। मन अपने अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को छोड़ देता है।
इसी मन को मिटाना है; और यह अनुकूल को चुनता है और प्रतिकूल को सुनता नहीं, तो यह मिटेगा कैसे? हम अपनी सुरक्षा में लगे हैं, जैसे कोई संघर्ष चल रहा है। फिर श्रवण नहीं हो पाएगा। श्रवण के लिए कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।
सुनते समय सुनना ही हो जाएं। सुनने वाला भूल जाए, कान ही रह जाएं; आपका सारा शरीर कान बन जाए; सब तरफ से सुनने लगें, और भीतर कोई चिंतन न हो। सारा चित्त एकाग्र रूप से सुनने में डूब जाए। यही शुद्ध श्रवण है।
स्वर विज्ञान: श्रवण के बाद आता मनन, यह मनन जो कहा गया है , सुन कर , उसकी प्रामाणिकता में करना, यह मनन की पहली शर्त है। आपने अपने मतलब का चुन लिया, उस पर मनन किया, वह मनन नहीं है, वह धोखा है। तो मनन की पहली शर्त..सुन लिया।
निंदा, प्रशंसा, स्वीकार-अस्वीकार कुछ भी नहीं, कोई मूल्यांकन नहीं। कोई निर्णय नहीं। न पक्ष न विपक्ष; मौन, तटस्थ सुन लिया, क्या कहा है उसे हृदय के कोने तक उतर जाने दिया ताकि उससे परिचय हो जाए जिस से परिचय है, उसी का तो मनन हो सकता है।
यही चिंतन और मनन का फर्क है। चिंतन हम उसका करते हैं, जिसका कोई ठीक से परिचय ही नहीं है। चिंतन है अपरिचित के साथ बुद्धि की प्रक्रिया, व्यायाम। मनन है परिचित के साथ जिसे आत्मसात किया, उसे अपने में भीतर डुबा लिया , उस पर विचार किया।
चिंतन और मनन दोनों में बड़ा फर्क है। चिंतन में कलह है, मनन में सहानु भूति है। चिंतन में द्वंद्व है, मनन में विमर्श है। चिंतन का मतलब है, आप लड़ रहे हैं किसी चीज से। अगर न जीत पाए, तो मान लेंगे। लेकिन मानने में पीडा रहेगी। इसलिए जब आप किसी से विवाद करते हैं।
और उससे तर्क नहीं कर पाते, और आपको मानना पड़ता है, तो आपको पता है, भीतर कैसी पीड़ा होती है! मान लेते हैं, क्योंकि अब तर्क नहीं कर सकते हैं; लेकिन भीतर तैयारी रहती है कि आज नहीं कल, उखाड़ कर फेंक देंगे ..कल, अस्वीकार कर देंगे।
इस लिए इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति को तर्क से रूपांतरित नहीं किया जा सकता; क्योंकि तर्क का मतलब है, पराजय। अगर उसको तर्क से कोई चीज सिद्ध भी कर दी, तो वह हारा हुआ अनुभव करेगा कि ठीक है, मैं कुछ जवाब नहीं दे पा रहा हूं, तर्क नहीं खोज पा रहा हूं।
जिस दिन तर्क खोज लूंगा, देखूंगा। और ध्यान रहे, हारा हुआ व्यक्ति कभी भी बदला हुआ व्यक्ति नहीं होता। आप किसी को तर्क से रूपांतरित नहीं कर सकते। और बात भी ठीक है, तर्क से रूपांतरित किसी को होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जब दो व्यक्ति विवाद करते हैं।
तो जो हार जाता है। जरूरी नहीं है कि वह गलत रहा हो, जो जीत जाता है, जरूरी नहीं है कि सही रहा हो। इतना ही जरूरी है कि जो जीत गया है, वह ज्यादा तर्क कर सकता था; जो हार गया है, वह कम तर्क कर सकता था। इससे ज्यादा कुछ भी पक्का नहीं है।
तो स्वाभाविक है कि तर्क से कोई कभी बदलता नहीं। तर्क से अहंकार को,आघात लगता है और अहंकार बदला लेना चाहता है। तर्क एक संघर्ष है। चिंतन में भीतर एक संघर्ष है। आप जो भी चिंतन करते हैं, उससे आप जूझते हैं, लड़ते हैं; एक भीतरी लडाई चलती है।
आप अपनी सारी अतीत की स्मृति और सारे अतीत के विचारों को उसके खिलाफ खड़ा कर देते हैं। फिर भी अगर हार जाते हैं, तो मान लेते हैं; लेकिन मानने में एक पीड़ा, एक दंश, एक कांटा चुभता रहता है। वह मानना मजबूरी का है।
उस मानने में कोई प्रफुल्लता घटित नहीं होती। इसलिए विचारकों के चेहरे पर प्रफुल्लता नहीं बल्कि चेहरे पर चिंतन की रेखाएं दिखाई पड़ेगी।विचार बोझ दे जाएगा; कमर झुक जाएगी। विचारक चिंतित मालूम पड़ने लगेगा।चिंतन और चिंता में कोई गुणात्मक फर्क नहीं है।
सब चिंतन चिंता का ही रूप है। उसमें छिपी हुई बेचैनी है ; एक तनाव है। क्योंकि एक भीतरी संघर्ष है, कलह है, लड़ाई है । ये मनन और चिंतन का फर्क है। तो मनन और चिंतन का पहला फर्क... चिंतन शुरू होता है तर्क से,संघर्ष से,विरोध से, और वहां सहानुभूति नहीं है।
मनन शुरू होता है श्रवण से। श्रवण ग्राहकता है, सहानुभूति है , कोई संघर्ष नहीं है। जब आप किसी चीज को सहानुभूति से सोचते हैं, तो आपकी पूरी आंतरिक आकांक्षा यह होती है कि जो मैंने सुना है वह सही हो सकता है; और सही हो, तो मेरे लाभ का हो सकता है।
इसलिए आप पहले वे बिंदु खोजते हैं , जो सही हों। जब आप चिंतन करते हैं, तो आप यह मान कर चलते हैं कि जो सुना है, वह गलत है।इसलिए आप पहले वे बिंदु खोजते हैं ,जो गलत हों। ऐसा समझें कि कोई व्यक्ति गुलाब के फूलों की क्यारी के पास खड़ा है।
अगर वह चिंतन कर रहा है तो पहले वह कांटे गिनेगा, अगर वह मनन कर रहा है तो पहले वह फूल गिनेगा। और इससे बुनियादी फर्क पड़ता है कि आप कहां से शुरू करते हैं क्योंकि जो व्यक्ति पहले कांटे गिनेगा, उसका विरोधी रुख जाहिर है। पहले वह कांटे गिनेगा।
और कांटे गिनने में हाथ में कांटे चुभेंगे भी, खून भी निकलेगा। वह कांटो की संख्या ,उनका चुभना और खून का बह जाना फूलों की खिलाफत के लिए आधार बन जाएगा। और फिर जब सेकड़ो कांटे गिन लेगा और एकाध फूल दिखाई पड़ेंगे। तो मन कहेगा कि ये फूल धोखे के हैं।
ये सच नहीं हो सकते। क्योंकि जहां इतने काटे हैं, वहां फूल हो कैसे सकते हैं। यह असंभव मालूम पडता है। और फिर अगर मान भी लेगा कि फूल हैं भी, तो वह कहेगा, कोई मूल्य नहीं यह जो फूल है, कांटो को छिपाए हुए है और उनके षड्यंत्र का भागीदार है।
परन्तु जो व्यक्ति फूल से शुरू करेगा ..पहले फूलों को छुएगा, फूलों की सुवास उसके हाथों में भर जाएगी; फूलों का रंग उसकी आंखों में उतर जाएगा; फूलों की कोमलता उसके स्पर्श में लीन होने लगेगी, फूल का सौंदर्य उसे आच्छादित कर लेगा।
फिर फूलों को देखने, जानने के बाद वह कांटो के पास आएगा ।अब उसकी दृष्टि में कांटे और ही तरह के होंगे। वह समझेगा कि कांटे फूलों की रक्षा के लिए हैं ; फूलों के विपरीत नहीं हैं। और जिसको एक फूल भी ठीक से दिखाई पड़ गया तो कांटे बेकार हो जाएंगे।
अगर इतने कांटो के बीच फूल खिल सकता है, तो असंभव भी हो सकता है! तो इस व्यक्ति को दिखाई पड़ेगा कि मैं जरा और खोज करूं, शायद कांटे भी फूल ही सिद्ध हों! इस प्रकार मनन सहानुभूति से शुरू होता है; चिंतन विरोध से शुरू होता है, श्रवण की शर्त पूरी हो जाए तो।
सहानुभूति जग जाती है और चिंतन की धारा ही विपरीत होकर मनन बन जाती है। लेक़िन कोई यह न सोचे कि मनन का अर्थ भी अंधे होकर स्वीकार कर लेना है। इसलिए ऋषि ने कहा है’जो सुना गया है, श्रवण हुआ है उसके अर्थ को युक्तिपूर्वक विचार करना, मनन है।
न तो श्रवण का अर्थ स्वीकार कर लेना है,और न ही मनन का अर्थ स्वीकार कर लेना है, बल्कि युक्ति का उपयोग करना है। युक्ति अपने आप में तटस्थ है जैसे एक तलवार तटस्थ है। चाहो तो किसी की जान ले लो या चाहो तो किसी की जान बचा लो। युक्ति अपने में बुरी नहीं है ।
लेक़िन अलग अलग ढांचे में युक्ति का अर्थ बदल जाता है। अगर विरोध से, संघर्ष से भरा हुआ चित्त हो, तो तर्क हिंसात्मक हो जाता है। अगर सहानु भूति से, श्रवण से, प्रेम से, सत्य की खोज और अभीप्सा से भरा चित्त हो, तो युक्ति रक्षा करने वाली तलवार बन जाती है।
इसलिए दो तरह के तर्क माने जाते हैं.. तर्क और कुतर्क। कुतर्क भी तर्क है और कभी -कभी तो कुतर्क तर्क से भी ज्यादा तर्कपूर्ण मालूम पड़ता है, क्योंकि उसमें पैनी धार होती है, जो मारने के लिए सक्षम होती है। परन्तु फर्क कैसे करेंगे कि क्या कुतर्क है और क्या तर्क है?
फर्क केवल यही है कि तर्क शुभ की, सत्य की खोज के लिए है, फूलों से शुरू करता है और फिर कांटों पर जाता है।इसीलिए अगर आप गलत खोजने को ही सुन रहे हों, तो आप कभी भी मनन न कर पाएंगे।और गलत की खोज आपके भीतरी विकास में कोई तरह का सहारा नहीं बनेगी।
आप कितना ही तय कर लें, कि कहां -कहां गलत है, आप सारी दुनिया की सारी गलतियां जान लें, फिर भी उससे आपकी कोई इनर ग्रोथ नहीं होगी।तो जो खोज में लगा है और अपने विकास में उत्सुक है, वह इसकी चिंता नहीं करता कि क्या गलत है, बल्कि वह इसकी चिंता करता है कि क्या ठीक है।
जो ठीक से शुरू करता है तो किसी दिन उस जगह पहुंच जाता है कि जो उसे गलत दिखाई पड़ता था उसका भी कोई अर्थ है, कोई मूल्य है। और वह जो पहले गलत मालूम पड़ता था, वह पीछे ठीक मालूम पड़ सके। कुतर्क गलत को खोजता है, वहीं से यात्रा शुरू करता है।
वह अंडरलाइन करके ले आएगा कि यह देखो, यह लिखा हुआ कहां और क्या -क्या गलत है, उसमें उनके जैसा कोई भी कुशल नहीं तो गलत काफी मिल जाएगा।इस संसार में कांटो की कोई कमी नहीं है! पर कांटो की न मालाएं बनानी हैं :न गले में डालनी हैं। प्रयोजन तो केवल फूलों से ह
मनन करने वाला व्यक्ति फूलों की खोज में है; चिंतन करने वाला व्यक्ति कांटो की खोज में है। वह आपको तय कर लेना चाहिए। एक बात खयाल रखनी हैं कि जो आप खोजेंगे, उसी से घिर जाएंगे। कांटे खोजेंगे, कांटो से घिर जाएंगे; फूल खोजेंगे, तो फूलों से घिर जाएंगे।
तो ध्यान रखना है कि कांटे खोज कर आप किसी और का अहित नहीं कर रहे हैं, अपना ही अहित कर रहे हैं; क्योंकि जो खोजेंगे, वही मिलेगा। हम सब कांटो के खोजी हैं। धीरे -धीरे हम सबमें भूलें देख लेते हैं, और फिर हमें उन्हीं के बीच रहना पड़ता है, तब जगत नर्क हो जाता है।
क्योंकि चारों तरफ गलत व्यक्ति ही दिखते हैं, कोई ठीक तो दिखाई ही नहीं पड़ता। इसलिए नहीं कि कोई ठीक नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि आपकी खोज ही गलत व्यक्ति की है। जिंदगी में दोनों हैं ..यहाँ रात भी है और दिन भी, और यहाँ बुरा भी है और भला भी।
आप यह मत सोचना कि स्वर्ग कहीं और है जमीन से और नर्क कहीं और है, आपकी दृष्टि में निर्भर है। इसी जमीन पर लोग स्वर्ग में रहते हैं और इसी जमीन पर लोग नर्क में रहते हैं।आप क्या खोजते हैं, वही आपका जगत बन जाता है।
मनन फूलों के प्रति सहानुभूति से यात्रा शुरू करता है। गलत पर जल्दी से हमला नहीं करता, सही को पहले आत्मसात कर लेता है। और जब सही पूरी तरह आत्मसात हो जाता है, तो ही जो पहले गलत जैसा दिखा था, उस पर सोचता है।
इस दृष्टि के रूपांतरण से बुनियादी अंतर बाद में दिखाई पड़ने शुरू होते हैं। ऐसा व्यक्ति धीरे -धीरे विकसित होता है और सही को आत्मसात करते -करते सही हो जाता है। और गलत की खोज करते करते, गलत को आत्मसात करते -करते गलत हो जाता है।
जो व्यक्ति दूसरों में बेईमानी और चोरी और गलत ही देखता है, ज्यादा दिन तक ईमानदार नहीं रह सकता। सच तो यह है कि पहले से ही ईमानदार नहीं हो सकता।
वास्तव में कोई चोर किसी दूसरे व्यक्ति आदमी को मान नहीं सकता कि चोर नहीं है। चोर के सोचने का सारा ढंग चोरी का हो जाता है।वह दूसरों में भी तत्काल चोरी खोजता है, देखता है।इसी प्रकार व्यभिचारी यह नहीं मान सकता कि कोई चरित्रवान है।
क्योंकि उसका अनुभव बाधा बनता है मानने में।लेकिन यह बड़े आश्चर्य की बात है व्यभिचारी कभी नहीं मानते कि कोई ब्रह्मचारी है अगर आपको कोई साधु मिले जो दूसरों को असाधु मानता हो, तो समझ लेना कि अभी वो साधु हो नहीं पाया है।
साधु होने का मतलब ही यह है कि सारा जगत तत्क्षण साधु हो जाएगा। सारी बात ही बदल गई, क्योंकि देखने का ढंग बदल गया। एक व्यक्ति जब भीतर साधु हो जाता है तो सारे जगत में उसे साधुता दिखाई पड़ने लगती है, क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर दिखाई पड़ता है।
अगर आपको सब चोर, बेईमान दिखाई पड़ते हों, तो उनकी फिक्र छोड़ कर अपनी फिक्र में लगना। जो दिखाई पड़ता है, वह आपके भीतर है। वही तत्काल दिखाई पड़ता है, क्योंकि भीतर से उसकी तत्काल संगति बैठ जाती है। हम सबकी सदा यही कोशिश है कि 'मैं सही हूं'!
हमारे जीवन की सबसे बड़ी झंझट, सबसे बड़ी परेशानी और संताप यही है कि हम मान कर चलते हैं कि मैं सही हूं। अब जो मेरे अनुकूल न पड़े वह गलत है। साधक को यह तय कर लेना चाहिए कि यह मूढ़तापूर्ण विचार प्रस्थान न बने कि मैं सही हु।
जीवन का जो , शुक्ल पक्ष है, उससे 'मनन' शुरू होता है।जीवन का जो कृष्ण, अंधेरा पक्ष है,उससे ' चिंतन' शुरू होता है। यह ध्यान में रहे तो फिर पूरी निष्ठा से युक्ति की जा सकती है और फिर युक्ति से नुकसान नहीं होता क्योंकि सहयोगी , मित्र बन जाती है।
स्वर विज्ञान: श्रवण, मनन, एकाग्रता एव निर्विचारिता अ मन अर्थात मन का न रहना यही अवस्था है जिसे ध्यान कहते। ध्यान की कितनी अवस्था है यह केवल ध्यान करके ही पता लग पाता है क्योंकि ध्यान में हर बार कुछ नया ही घटता है और हर किसी के अनुभव अलग अलग होते हैं ।
श्रवण ओर मनन बारे आप पूर्व की पोस्ट से समझ चुके अब एकाग्रता और निर्विचारिता की स्तिथि तक कैसे पहुंचे उसे समझते। एकाग्रता का अर्थ होता किसी एक विषय पर मन को विचार करने की अनुमति देना अर्थात आपके निर्देशन में विचार करे।
निम्नतम है सामान्य विचारना, और उच्चतम शिखर है ध्यान, अ-मन। एकाग्र होने में हमे त्राटक क्रिया मदद करती। इसका अभ्यास किया जाता। त्राटक का अर्थ होता टकटकी लगाकर देखना। इसे हम अगली पोस्टो में कहते कि त्राटक कितने प्रकार के होते व कैसे किये जाते।
मन हमारा ही अर्थात आत्मा का हिस्सा है यह हमारा ही सचिव है अगर हम सुप्तावस्था में है तो हमारा राजपाठ स्वयं मन चला लेता। सब निर्णय स्वयं लेता ओर अगर हम जागृत होते तो सब निर्णय में हमारी आज्ञा लेता किन्तु चतुर इतना कि सब निर्णय उसके ही होते।
इसे उदाहरण में समझे तो यू है कि कोई मंत्री जिसे सचिव मिलता जो आई ए एस होता ओर आईएएस कलेक्टर पद से उन्नति करते हुए मन्त्रालयो में सचिव बनते। उनका अनुभव और पढ़ाई बहुत उच्च होती । अब कोई जाग्रत मंत्री ही इतनी उच्चावस्था के सेक्रेटरी को निर्देश दे सकता।
क्योंकि नियमानुसार ही कार्य होते । मंत्री नियम नही जानता तो उसके हर निर्देश को सचिव नियमों का हवाला दे अपनी बात कहता। उस मंत्री को सब कार्ये सेक्रेटरी की इच्छा से ही करने होते। वही एक कलेक्टर को भी सचिव मिलता पर वो सेक्रेटरी कलेक्टर के निर्देश में कार्ये करता।
क्योकि उसे ज्ञान नही होता कलेक्टर जितना। अब एक बात समझे कि आप मंत्री है और सब कार्यो को सेक्रेटरी की सलाह से करते अब आपको फोन आया घर से पत्नी का , आप को इस विषय में सेक्रेटरी की कोई जरूरत नही तो आप सेक्रेटरी को हाथ से इशारा कर जाने को कहते।
अब सेक्रेटरी नही आता जब तक नही बुलाये। अब कोई नही कहता कि यह करना वो करना कोई बाधा नही आपके ओर पत्नी के बीच। यही है एकाग्रता एक विषय मे। किन्तु मन शुक्ष्म है इसे निर्देश देने में आपकों तयारी करनी पड़ती। यहीं साधना है।
सामान्य एकाग्रता होती ही है सब के पास पर प्रायः भूले रहते। जब आप सांसारिक कार्ये से कलेक्टर के ऑफिस जाते तो वार्ता में एक विषय बिंटू ही रहता। आप कुछ भी नही कहते इधर उधर की ओर कलेक्टर तो क्यो कहने लगा विषय से हटकर।
तो दस मिनट की वार्ता के समय आप एकाग्रता बनाये रखते है। यही एकाग्रता की आवश्यकता होती साधना में। तुम्हारा मन उस अवस्था को पैदा करने में प्रयत्नशील कैसे हो सकता है जो मन की अवस्था नहीं है? वास्तव में,मन विचारने की प्रक्रिया है ।
और अ-मन की दशा विचारने की प्रक्रिया का अभाव है। अगर तुम अपने विचारने की प्रक्रिया को घटाते जाओ, अपनी विचारणा को विसर्जित करते जाओ, तो तुम धीरे -धीरे अ-मन की अवस्था को पहुंच जाओगे। मन का अर्थ है विचारना और अ-मन का अर्थ है निर्विचार।
और मन सहयोगी हो सकता है । अगर विचार करने की प्रक्रिया गहरी होती जाए तो तुम मन से अधिक मन की ओर बढ़ रहे हो। और मन सहयोगी हो सकता है अगर विचार की प्रक्रिया क्षीण होती जाए, विरल होती जाए, तो तुम अ-मन की ओर बढ़ने में अपनी मदद कर रहे हो।
यह तुम पर निर्भर है। अगर तुम उसके साथ बिना कुछ किए अपनी चेतना को अपने पर छोड़ दो तो वह ध्यान बन जाती है। तो दो संभावनाएं हैं। एक यह कि धीरे-धीरे, क्रमश: तुम अपने मन को कम करो, घटाओ। अगर वह एक प्रतिशत घटे तो तुम्हारे भीतर निन्यानबे प्रतिशत मन है ।
और एक प्रतिशत अ-मन। यह ऐसा है जैसे तुम अपने कमरे से फर्नीचर हटा रहे हो, और अगर तुमने कुछ फर्नीचर हटा दिया तो थोड़ा खाली स्थान, थोड़ा आकाश वहां पैदा हो गया। फिर और ज्यादा फर्नीचर हटाया तो और ज्यादा आकाश पैदा हो गया।
और जब सब फर्नीचर हटा दिया तो समूचा कमरा आकाश हो गया। सच तो यह है कि फर्नीचर हटाने से कमरे में आकाश नहीं पैदा हुआ, आकाश तो वहां था ही। वह आकाश फर्नीचर से भरा था। जब तुम फर्नीचर हटाते हो तो वहां कहीं बाहर से आकाश नहीं आता है।
तुमने फर्नीचर हटा दिया और आकाश फिर से उपलब्ध हो गया। गहरे में मन भी आकाश है जो विचारों से भरा है, दबा है। तुम थोड़े से विचारों को हटा दो और आकाश फिर से प्राप्त हो जाएगा। अगर तुम विचारों को हटाते जाओ तो तुम आकाश को फिर से हासिल कर लोगे।
यही आकाश ध्यान है। यह बात क्रमिक भी हो सकती है और अचानक भी । क्योंकि उस प्रक्रिया की भी अपनी कठिनाई है। जब धीरे -धीरे फर्नीचर हटाते हो तो पहले एक प्रतिशत आकाश पैदा होता है और शेष निन्यानबे प्रतिशत भरा का भरा रहता है।
अब यह निन्यानबे प्रतिशत आकाश एक प्रतिशत खाली आकाश के संबंध में अच्छा नहीं अनुभव करेगा, वह उसे फिर से भरने की चेष्टा करेगा। तो व्यक्ति एक तरफ से विचारों को कम करता है और दूसरी तरफ से नए -नए विचार पैदा किए जाता है।
सुबह तुम थोड़ी देर के लिए ध्यान करते हो, उसमें तुम्हारी विचार की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। फिर तुम बाजार जाते हो जहां विचारों की दौड़ शुरू हो जाती है। स्पेस, आकाश फिर से भर गया। दूसरे दिन तुम फिर वही सिलसिला दोहराते हो।
विचारो को बाहर निकालना, फिर उन्हें भीतर लेना। तुम सब फर्नीचर इकट्ठा भी बाहर फेंक सकते हो। यह तुम्हारा निर्णय है। यह कठिन जरूर है, क्योंकि तुम फर्नीचर के आदी हो गए हो। तुम्हें फर्नीचर के बिना अड़चन अनुभव होगी, तुम्हें समझ में नहीं आएगा ।
कि स्पेस का, आकाश का क्या करें। तुम उसमें गति करने से भी डरोगे, तुमने ऐसी स्वतंत्रता में कोई गति नहीं की है। मन एक संस्कार है। हम विचारों के आदी हो गए हैं और रोज वही-वही विचार दोहराते रहते पुरानी आदतें संस्कार के रूप में सहायता करती हैं।
एक बच्चे को खिलौना चाहिए, उसे खिलौना मिल जाए तो उसे नींद आ जाएगी। और तब तुम उससे खिलौना ले सकते हो। लेकिन खिलौना न रहे तो बच्चे को नींद न आएगी। यह भी संस्कार है। जैसे ही उसे खिलौना मिलता है कि उसके मन में कुछ प्रेरणा होती है।
वह नींद में उतरने के लिए राजी हो जाता है। वही बात तुम्हारे साथ हो रही है। खिलौनों में फर्क हो सकता है। किसी को तब तक नींद नहीं आती है जब तक वह मंत्र का उच्चार न करे। तब तक वह सो नहीं सकता है। तुम्हें एक नए कमरे में नींद आने में कठिनाई होती है।
अगर तुम किसी खास ढंग के पकड़े पहनकर सोने के आदी हो तो तुम्हें रोज उन्हीं खास कपड़ों की जरूरत पड़ेगी। पुरानी आदतों के साथ आराम अनुभव होता,वह सुविधाजनक है। वैसे ही सोचने के ढंग भी आदतें हैं। रोज वही विचार, वही दिनचर्या तो तुम्हें आराम मालूम देता है।
तुम्हें लगता है, सब ठीक चल रहा है। तुम्हारे विचारों में तुम्हारा स्वार्थ है और वही समस्या है। तुम्हारा फर्नीचर महज कचरा नहीं है जिसे फेंक दिया जाए, उसमें तुमने बहुत कुछ पूंजी लगा रखी है। सब फर्नीचर तुरंत और इकट्ठा फेंका जा सकता है, वह हो सकता है , उसके उपाय भी हैं।
इसी क्षण तुम अपने सारे मानसिक फर्नीचर से मुक्त हो सकते हो।लेकिन तब तुम अचानक रिक्त, खाली, शून्य हो जाओगे और तुम्हें पता नहीं रहेगा कि तुम कौन हो। अब तुम्हें यह भी पता नहीं चलेगा कि क्या करें। क्योंकि पहली दफा तुम्हारे पुराने ढंग -ढांचे तुम्हारे पास नहीं होंगे।
उसका धक्का, उसकी चोट इतनी त्वरित हो सकती है कि तुम पागल भी हो सकते हो। इसलिए जब तक कोई तैयार न हो ;त्वरित विधियां प्रयोग में नहीं लायी जाती हैं। क्योंकि उसके पुराने अटकाव नहीं रहे। अतीत तुरंत विदा हो जाता है , इसलिए तुम भविष्य की भी नहीं सोच सकते।
क्योंकि भविष्य को तो हम सदा अतीत की भाषा में सोचते हैं। सिर्फ वर्तमान बचा रहता है, और तुम कभी वर्तमान में रहे नहीं। या तो तुम अतीत में रहते हो या भविष्य में। इसलिए जब तुम पहली बार मात्र वर्तमान में होओगे तो तुम्हें लगेगा कि तुम पागल हो गए हो।
इसलिए क्रमिक विधियां ही अच्छी हैं। वे लंबा समय लेती हैं, लेकिन तुम धीरे-धीरे आकाश के आदी हो जाते हो। तुम आकाश को, उसके सौंदर्य को, उसके आनंद को अनुभव करने लगते हो। और तुम्हारा फर्नीचर धीरे-धीरे हट जाता है, निकल जाता है।
इसलिए साधारण विचार से श्रवण ,मनन पर जाना अच्छा है, वह क्रमिक विधि है। मनन से एकाग्रता पर जाना अच्छा है, वह क्रमिक विधि है। और एकाग्रता से ध्यान पर छलांग लगाना अच्छा है। तब तुम धीरे-धीरे गति करते हो-जमीन को प्रत्येक कदम पर अनुभव करते हुए।
और जब यथार्थत: प्रत्येक कदम में तुम्हारी जड़ जम जाती है तभी तुम अगला कदम शुरू करने केंद्रित, होते हो। अगली पोस्ट में हम समझे गे विचार है क्या ओर निर्विचारिता की ओर बढ़ेगे।
स्वर विज्ञान: निर्विचारिता की स्तिथि के लिए हमे समझना होगा कि विचार कैसे पैदा होते हैं यह जानना जरूरी है, तभी उन्हें रोका जा सकता है। क्योकि उनकी उत्पत्ति के सत्य को जाने बिना ही हम उनके दमन में लग जाए तो विमुक्त नहीं हो सकते ।
विचार के दमन से कोई अंतर नहीं पड़ता है, क्योंकि वे प्रतिक्षण नये -नये उत्पन्न हो जाते हैं। विचारों को मारने कीआवश्यकता नहीं हैं क्योकि वे स्वयं ही प्रतिक्षण मरते रहते हैं। विचार बहुत अल्पजीवी है। कोई भी विचार ज्यादा नहीं टिकता, पर विचार प्रक्रिया टिकती है।
एक -एक विचार तो अपने आप मर जाता है, पर विचार- प्रवाह नहीं मरता है। एक विचार मर भी नहीं पाता है कि दूसरा उसका स्थान ले लेता है। यह स्थान पूर्ति बहुत त्वरित है और यही समस्या है। जो विचार की उत्पति के विज्ञान को समझ लेता, वह मुक्त होने का मार्ग सहज ही पा जाता है।
और जो यह नहीं समझता है, वह स्वयं ही एक ओर विचार पैदा किए जाता है और दूसरी ओर उनसे लड़ता भी है। इससे विचार तो नहीं टूटते, किंतु वह स्वयं ही टूट जाता है। हम सब जानते हैं कि चित्त चंचल है। इसका अर्थ है कि कोई भी विचार दीर्घजीवी नहीं ,पलजीवी है।
वह तो जन्मता है और मर जाता है। उसके जन्म को रोक लें तो उसकी हत्या की हिंसा से बच जाएंगे और वह अपने आप विलीन भी हो जाता है विचार की उत्पत्ति कैसे होती है वास्तव में,विचार की उत्पत्ति, बाह्य जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया, रिएक्शन से होता है।
बाहर घटनाओं और वस्तुओं का जगत है। इस जगत के प्रति हमारी प्रति क्रिया ही हमारे विचारों की जन्मदात्री है। कोई एक फूल को देखता है तो ‘ देखना’ कोई विचार नहीं है और यदि वह देखता ही रहे तो कोई विचार पैदा नहीं होगा।
पर समस्या यह है कि वह देखते ही कहता है कि ‘ फूल बहुत सुंदर है ‘ और विचार का जन्म हो जाता है। मात्र देखने से सौंदर्य की अनुभूति तो होगी, पर विचार का जन्म नहीं होगा। पर अनुभूति होते ही हम उसे शब्द देने में लग जाते हैं। अनुभूति को शब्द देते ही विचार का जन्म हो जाता है।
यह प्रतिक्रिया, यह शब्द देने की आदत, अनुभूति को, दर्शन को ..विचार से आच्छादित कर देती है। अनुभूति दब जाती है, और शब्द चित्त में तैरते रह जाते हैं। ये शब्द ही विचार हैं। इसके पहले कि एक विचार मरे हम दूसरी अनुभूति को विचार में परिणत कर लेते हैं।
यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती, और हम शब्दों से इतने भर जाते और कि स्वयं को ही उनमें खो देते हैं। दर्शन को शब्द देने की आदत छोड़ने से विचार का जन्म निषेध हो जाता है। कोई मात्र देखे, कोई शब्द न दे तो बड़ी क्रांति होगी शब्द बीच आकर उस क्रांति को रोक लेते हैं।
मात्र देखने से एक अलौकिक शांति भीतर अवतरित हो जाती है, एक शून्य व्याप्त हो जाता है। क्योंकि शब्द का न होना ही शून्य है, और इस शून्य में चेतना की दिशा परिवर्तित होती है, एक नवजात शिशु जगत को बिना शब्द के देखता है। वह शुद्ध प्रत्यक्षीकरण है।
फिर धीरे -धीरे वह शब्द की आदत सीखता है। क्योंकि बाह्य जगत और बाह्य जीवन के लिए वह सहयोगी और उपयोगी है पर वही अंतस जीवन को जानने में बाधा हो जाता है। और इसलिए एक बार फिर वृद्धों को भी नव जात शिशु के शुद्ध दर्शन को जगाना पड़ता है।
ताकि वे स्वयं को जान सकें। शब्द से जगत को जाना, फिर शून्य से स्वयं को जानना होता है। विचार का स्वरूप "नहीं' है। विचार "हां' को जानता ही नहीं और "नहीं' शब्द में विचार की प्रक्रिया समा जाती है। विचार सदा ही अंत में निराशाजनक होता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति नकरात्मक है।
विचार को उसके तार्किक अंत तक ले जाया जाए तो नास्तिकता के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता। ध्यान सकारात्मक है; वह अस्तित्व में ले जाता है। विचार निषेध है; वह तुम्हारे भ्रमों को तोड़ देता है। विचारक की यह मजबूरी है कि जितना सोचेगा उतना ही उदास होता जाएगा।
क्योंकि जितना सोचेगा उतने जीवन के भ्रम टूटेंगे । भ्रम टूटने से रिक्तता हाथ लगती है। और रिक्तता वही नहीं है जिसे शून्य कहा गया है। क्योकि शून्य तो रस से सरोबोर होता है। लेकिन रिक्तता में कुछ भी नहीं है खालीपन है। विचार का उपयोग किया जाता है , किंतु ध्यान के सेवक की तरह।
अगर किसी ने विचार को मालिक बना लिया तो बहुत पछताएगा। सत्य भी बहुत खतरनाक है क्योंकि जिसके भी जीवन के भ्रम टूट जाते हैं उसका जीना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा करता है। वह मानता है कि उसकी पूजा परमात्मा तक पहुंच रही है।
वह मानता है तो सुखी है। फिर विचार जगे,सोचने लगे कहां परमात्मा, कैसा परमात्मा! कभी देखा तो नहीं। यह पत्थर की मूर्ति है जिसके सामने मैं पूजा कर रहा हूं। यह मैं ही बाजार से खरीद लाया हूं। यह मनुष्य की बनायी हुई मूर्ति है। परमात्मा तो वह है जिसने मनुष्य को बनाया।
यह परमात्मा नहीं हो सकता। तब पूजा का थाल हाथ से गिर जाएगा ,फूल बिखर जाएंगे और प्रार्थना खंडित हो जाएगी। इस व्यक्ति के जीवन में अमावस आ गई। अब इसके आगे विचार की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और ध्यान की प्रक्रिया शुरू होती है
ध्यान यहीं से शुरू होता है। अब भीतर मुड़ो बाहर के मंदिर व्यर्थ हो गए, अब भीतर के मंदिर में तलाशो, हमने वहीं से शुरुआत मानी और असली तीर्थयात्रा वहीं से शुरू हुई है। फिर हमने निर्विचार में झांका... मौन हुए। फिर हमने आंखें बंद कीं और आंखें बंद करके देखा।
तर्क छोड़ा, सिर्फ देखा अथार्त भीतर साक्षी बने। लेकिन सोचा नहीं, केवल देखा कि भीतर क्या है .यह मैं कौन हूं। यह मेरा अस्तित्व क्या है ..मेरा चैतन्य क्या है। ध्यान सत्य को देता वास्तव में, जिस दिन मनुष्य के सारे भ्रम टूट जाएंगे। ध्यान यहीं से शुरू होता है।
अब भीतर मुड़ो बाहर के मंदिर व्यर्थ हो गए, अब भीतर के मंदिर में तलाशो। लेकिन हम वहीं नहीं रुके। हमने वहीं से शुरुआत मानी और असली तीर्थ यात्रा वहीं से शुरू हुई है। फिर हमने निर्विचार में झांका... मौन हुए। फिर हमने आंखें बंद कीं और आंखें बंद करके देखा।
तर्क छोड़ा, सिर्फ देखा अथार्त भीतर साक्षी बने। केवल देखा कि भीतर क्या है ..यह मैं कौन हूं। यह मेरा अस्तित्व क्या है ..मेरा चैतन्य क्या है। विचार भ्रम तोड़ता है, ध्यान सत्य को देता है। वास्तव में, जिस दिन मनुष्य के सारे भ्रम टूट जाएंगे उस दिन वह जी न सकेगा।
मनुष्य के पैर के नीचे की जमीन मत खींच लो। जब उसके सारे भ्रम टूट गए तो विक्षिप्त न होगा तो और क्या करेगा। धन व्यर्थ है, आसक्ति व्यर्थ है, पद व्यर्थ है, प्रतिष्ठा व्यर्थ है ..सब कुछ व्यर्थ है अब परमात्मा व्यर्थ हो गया तो अब कैसे जिये कैसे।
मनुष्य बिना भ्रमों के नहीं जी सकता। भ्रम उसका आधार है, लेकिन यह बात अधूरी है और अधूरे सत्य असत्यों से भी ज्यादा भयंकर होते हैं। तुम कुछ छीन तो लेते हैं , लेकिन तुम्हें देते कुछ नहीं। हाथ में कांटा था, वह तो छिन जाता है लेकिन फूल नहीं आता।
माना कांटा दुःख भी दे रहा था तो भी कम से कम कुछ तो हाथ में था कुछ व्यस्त होने का उपाय तो था ..वह भी गया। वास्तवमें, मनुष्य रिक्तता की बजाय बीमारियां ,उलझनें पसंद करेगा। कम से कम उलझा तो रहता है ..रिक्तता तो बहुत भयानक है, बहुत घबराहट वाली है।
रिक्तता में जिसने भी झांका.. वह पागल हो जाएगा। उसने एक ऐसे जगत में देख लिया जहां कोई अर्थ नहीं है। पशु-पक्षी अपनी जाति को नहीं मारते। पृथ्वी पर, मनुष्य अकेला प्राणी है, जो मनुष्य को मारता है। पशु -पक्षी दूसरी जातियों को भी मारते हैं .तो सिर्फ भोजन की दृष्टि से --भूख के कारण।
वे शिकार खेलने नहीं जाते। मनुष्य अकेला है जो शिकार खेलता है। कोई सिंह शिकार नहीं खेलता और तभी मारता है जब भूखा हो। सिर्फ मनुष्य खेल में भी मारता है; मारने में भी रस लेता है। मारने में ,ध्वंस में एक कुत्सित रस है। मनुष्य बस, बातें करने में कुशल हो गया है लेकिन भीतर?
ऊपर सम्हला दिखता है, भीतर बिल्कुल पागल है। इसलिए उसको सपना देखने दो ..उसका सपना तोड़ दोगे,तो फिर उसे सुलाना मुश्किल हो जाएगा। एक बार नींद टूट गई तो फिर कोई उपाय उसे सुलाने का नहीं है।मगर यह बात अधूरी है।
हमने और आगे भी तलाश की है। जहां विचार के पार .ध्यान में झांकते हो ..तो रिक्तता मिट जाती है, वहां पूर्ण का अवतरण होता है। ध्यान परम आलोक से भर जाता है। शाश्वत जीवन की प्रतीति होने लगती है। लेकिन सुबह होने के पहले रात खूब काली हो जाती है ।
स्वर विज्ञान: जहां विचार के पार .ध्यान में झांकते हो ..तो रिक्तता मिट जाती है, वहां पूर्ण का अवतरण होता है। ध्यान परम आलोक से भर जाता है। शाश्वत जीवन की प्रतीति होने लगती है। लेकिन सुबह होने के पहले रात खूब काली हो जाती है । यह निराशा एक बड़ी आशा का जन्म बन सकती है।
ध्यान भीतरी घटना है, बाहर से देखने का कोई उपाय नहीं है। हीरे तुम्हारे भीतर हैं ..कंकड़ पत्थर बाहर हैं। अगर परमात्मा को खोजना है तो भीतर खोजो। अकेले ,अपने भीतर चलो ..जहां कोई न रह जाए, कोई दूसरा , दूसरे की छाया भी न रह जाए।
जहां सब निर्विचार हो, उसी निर्विचार चैतन्य में तुम जानोगे कि ईश्वर है और तब श्रद्धा का आविर्भाव होता है जो ज्ञान से उपलब्ध होती है। विश्वास अज्ञान में उत्पन्न होता है और विश्वास को श्रद्धा मत समझ लेना क्योकि वह धोखा है। विश्वास झूठा सिक्का है; जो श्रद्धा जैसा लगता है ।
विश्वास ने व्यक्ति को बहुत भरमाया है, भटकाया है और अगर विश्वास छीन लोगे, तो व्यक्ति घबड़ा जाएगा। इसलिए केवल सद्गुरु ही विश्वास छीन सकता है। क्योंकि उसे भरोसा है कि जब तुम रिक्त हो जाओगे तो वह तुम्हें शून्य होने की कला भी सिखा देगा।
रिक्तता और शून्यता पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। केवल भाषा कोश में पर्यायवाची हैं, जीवन के कोष में नहीं हैं। रिक्तता का मतलब है, कुछ भी नहीं है। शून्य का मतलब है ...सब कुछ का स्रोत । शून्य सकारात्मक शब्द है और शून्य में ''पूर्ण ''समाया हुआ है, ओर रिक्त में कुछ भी नहीं है ।
अगर व्यक्ति रिक्त हो गया तो फिर अपना ही सत्य मार डालेगा; फिर उससे छुटकारा पाना मुश्किल है। वास्तव में, असत्य का छूटना सत्य का हो जाना नहीं है। पैर से कांटा निकल गया, इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हारे हाथ में फूल आ गए।
पैर से कांटा निकल गया, वह अच्छा हुआ। कांटा चुभा रहता तो फूल को खोजना मुश्किल था। अब पैर स्वस्थ हैं, अब तुम चल सकते हो .. फूल की खोज हो सकती है। विचार का कांटा निकल जाए तो ध्यान का फल खोजा जा सकता है।
इसलिए समस्त ध्यानियों ने निर्विचार को समाधि कहा है। सत्य तो मुक्त करता है। तुमने जिसे सत्य मान रखा है वह सत्य नहीं है। इसलिए जब तुम थोड़े जागोगे, थोड़ा सोचोगे तो पहले तो घबड़ाहट आएगी।विश्वास तो छीनने ही पड़ेंगे। जगह खाली करनी पड़ेगी कचरे से, तभी परमात्मा आएगा।
छोटे बच्चे के खिलौने छीन लो तो छोटा बच्चा जिएगा कैसे। लेकिन कभी ऐसी प्रौढ़ता आती है ..जब खिलौने बच्चा खुद ही छोड़ देता है। एक दिन ऐसा लगता था कि बच्चा बिना खिलौनों के नहीं जी सकता। रात भी अपने खिलौने अपने साथ छाती से लगाकर सोता है।
सुबह होते ही पहले अपने खिलौने को तलाशता है। पर हम जानते हैं कि कल प्रौढ़ हो जाएगा, यह खिलौना आज जो इतना प्यारा है, किसी दिन कोने में पड़ा रह जाएगा, कचरे में फेंक दिया जाएगा। फिर इस पर ध्यान भी न आएगा। ऐसे ही तुम्हारे विश्वास बचपन के खिलौने हैं।
उन्हें तो छोड़ना ही होगा ..जो पीड़ादायी भी है ।जब कांटा निकाला जाता है तो भी तो तकलीफ होती है। मवाद भरी हो और उसे देह से निकालना हो तो भी तो तकलीफ होती है। सभी तरह की सर्जरी तकलीफ की होती है। और यह तो देह की ही सर्जरी नहीं है, आत्मा की सर्जरी है।
लेकिन एक बार सारी मवाद निकल जाए, सारे भ्रम गिर जाएं तो तुम तैयार हो जाओगे उड़ान भरने को। हां, वहां रुकना नहीं है उससेआगे जाना है शून्य की खोज में । वेदांत का नियम है। जड़ को कहे कि तू जीव है इसका अर्थ होता कि जो स्वयं को शरीर समझ रहा वो जड़ है।
उसे कहा जाए तू जीव है जीव का अर्थ होता जो जानता में शरीर और आत्मा से मिल बना हु किन्तु यहाँ चेतना भृमित होती। फिर जब योग साधना से आत्मा की प्रतीति होने लगे तब वेदांत कहता कि तुम जीव नही साक्षी हो तब शरीर की आसक्ति समाप्त होने लगती।
साक्षी को ही कहा जा सकता तत्वमसिह जिसका अर्थ होता जिसे तू ढूंढ रहा तू वही है। तब सार्थक होता अहम्ब्रह्मास्मि। किसी जड़ को कहा जाए तो अहम्ब्रह्मास्मि उसके लिए एक शब्द से ज्यादा नही है। क्योंकि मन के रहते सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता।
मन कभी शांत , नहीं होता क्योंकि मन का स्वभाव ही है तनावग्रस्त होना, उलझन में पड़ रहना है । मन कभी भी स्पष्ट नहीं होता, क्योंकि मन स्वभाव से उलझन है, अस्पष्टता है। स्पष्टता तभी संभव है जब मन ना हो , इसलिय कभी शांत मन को पाने की चेष्ठा ना करें।
यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम आरम्भ से ही एक असंभव आयाम में जा रहे हो। सदा स्मरण रखें कि जो कुछ भी तुम्हारे आस-पास घट रहा है उन सब की जड़े तुम्हारे मन में निहित है। मन ही सदा कारण होता है। वह प्रक्षेपण करने वाला यंत्र है, और बाहर केवल पर्दे ही पर्दे हैं।
तुम उन पर्दों पर अपने आप को प्रक्षेपित कर लेते हो। यदि तुम्हे प्रतीत होता है कि जो कुछ भी मन से आ रहा है वह नारकीय है और भयानक है, तो मन को गिरा दो। मन पर कार्य करना है, परदे पर नहीं; परंतु एक समस्या है, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम मन हो तो तुम इसे गिरा कैसे सकते हो?
तुम सब-कुछ गिरा सकते हो, सब कुछ बदल सकते हो, उसे फिर से रंग सकते हो, फिर से संवार सकते हो, पुनर्व्यवस्थित कर सकते हो, किन्तु तुम खुद को कैसे गिरा सकते हो? यही सारे उपद्रव की जड़ है। वास्तव में, तुम मन नहीं हो, तुम मन के पार हो।
यह सत्य है कि तुमने उसके साथ तादात्म बना लिया है । और तुम्हे यही छोटी झलकियां दिखाना कि तुम मन नहीं हो..ध्यान का उद्देश्य है। यदि कुछ क्षण के लिए भी मन ठहर जाए, तुम तब भी वहीँ के वहीँ हो! इसके विपरीत तुम्हारी उपस्थिति और भी ज्यादा प्रवाहमान हो जाती है।
मन का ठहर जाना ऐसा होता है जैसे एक जल-निकास जो लगातार तुम्हे खाली कर रहा था, रुक जाये। अचानक तुम ऊर्जा से भर गए। तुम और संवेदनशील हो गए। यदि तुम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जाओ कि मन नहीं है, केवल "मैं हूँ ।
तुम सत्य के भीतरी केंद्र तक पहुँच गए। तब मन को गिरा देना सरल हो जाएगा। लेकिन पहले तादात्म को गिराना होगा, तब मन को गिराया जा सकता है। जब मन के साथ सारे तादात्म गिरा दिए जाये, तब तुम पर्वत पर बैठे एक द्रष्टा रह जाते हो ।
और मन अँधेरी घाटियों की गहराइयों में छूट जाता है। तब तुम सूर्य से प्रकाशित शिखरों पर होते हो, बस शुद्ध साक्षी, द्रष्टा मात्र, देखते हुए, परंतु किसी भी चीज़ से कोई तादात्म्य ना बनाते हुए। उस द्रष्टा भाव में सब प्रश्न मिट जातें हैं..अच्छा या बुरा, पापी या पुण्यात्मा।
स्वर विज्ञान: मन का ठहर जाना ऐसा होता है जैसे एक जल-निकास जो लगातार तुम्हे खाली कर रहा था, रुक जाये। अचानक तुम ऊर्जा से भर गए। तुम और संवेदनशील हो गए। यदि तुम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जाओ कि मन नहीं है, केवल "मैं हूँ ।
तुम सत्य के भीतरी केंद्र तक पहुँच गए। तब मन को गिरा देना सरल हो जाएगा। लेकिन पहले तादात्म को गिराना होगा, तब मन को गिराया जा सकता है। जब मन के साथ सारे तादात्म गिरा दिए जाये, तब तुम पर्वत पर बैठे एक द्रष्टा रह जाते हो ।
और मन अँधेरी घाटियों की गहराइयों में छूट जाता है।तब तुम सूर्य से प्रकाशित शिखरों पर होते हो, बस शुद्ध साक्षी, द्रष्टा मात्र, देखते हुए, परंतु किसी भी चीज़ से कोई तादात्म्य ना बनाते हुए। उस द्रष्टा भाव में सब प्रश्न मिट जातें हैं..अच्छा या बुरा, पापी या पुण्यात्मा।
यह या वह, केवल एक शुभ उपस्तिथी,एक श्वांस, एक धड़कता हुआ ह्रदय रहता है, मन मिट जाता है, पिघल जाता है, भाप बन कर उड़ जाता है। तुम बस एक शुद्ध आत्मा की तरह रह जाते हो,..क्षण में पूर्णता .. ना अतीत, ना भविष्य इसलिए वर्तमान भी नहीं ।
मन भ्रामक है, माया है, मात्र एक स्वप्न है, एक प्रक्षेपण है...एक पानी का बुलबुला--जिस में कुछ भी नहीं है, परन्तु ये एक पानी का बुलबुला नदी में तैरता प्रतीत होता है । सूरज बस उग ही रहा है, किरने बुलबुले में प्रवेश करती हैं और इंद्रधनुष निर्मित हो जाता है ।
और उस में कुछ भी नहीं है। जब तुम बुलबुले को छूते हो तो वह टूट जाता है और सब-कुछ मिट जाता है ..वो इंद्रधनुष, वो सौन्दर्य--कुछ भी नहीं बचता। केवल शून्यता ही अनंत शून्य के साथ एक हो जाती है। तुम्हारा मन एक बस एक बुलबुले की दीवार है : छेद दो, और मन विदा हो जाएगा।
केवल वे ही लोग जो मन के बिना होना जान लेते हैं ...मन का उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं । यह मन ही है जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है, परन्तु मन बहुत चालाक है, वह तुम्हे धोखा दिए चला जाता है कि "तुम मेरा उपयोग कर रहे हो। यह मन तुम्हारा मालिक बन गया है।
तुम उसके गुलाम, परन्तु वह कहता है "मैं केवल एक उपकरण हूं, तुम मेरे मालिक हो।तुम्हे लगता है कि तुम इसका उपयोग कर रहे हो। परन्तु तुम उसका उपयोग तभी कर सकते हो जब तुम्हे पता हो कि तुम इसस ।चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है; मन बस एक परिधि है।
समाज द्वारा तुम्हारे आस-पास निर्मित की हुई, तुम्हारी संस्कृति द्वारा, तुम्हारी शिक्षा ,संस्कार द्वारा। और जब तक यह मन मिट नहीं जाता तुम भीतर प्रवेश नहीं कर सकते। तुम मूलतया अपने स्वभाव को नहीं जान सकते, प्रमाणिक रूप से तुम्हारा क्या आस्तित्व है, तुम्हारा चैतन्य क्या है ।
ध्यान के लिए संघर्ष करना मन के विरुद्ध संघर्ष करना है। मन कभी ध्यान पूर्ण नहीं होता और न ही मन कभी शांत होता है। तो "शांत-मन" कहना एक निरर्थक बात है। यह ऐसा कहना है जैसे कि "एक स्वस्थ रोग।" यह अर्थहीन है। रोग तो रोग है, और स्वास्थ्य रोग का आभाव है।
शांत मन जैसी कोई चीज़ नहीं जब शान्ति होती है तब मन नहीं होता। जब मन होता है तब शान्ति नहीं होती। मन, एक तरह से उपद्रव है, एक रोग। ध्यान अ-मन की चित्त-दशा है । मौन मन की ,स्वस्थ मन की या एकाग्र मन की नहीं ध्यान अ-मन की स्थिति है।
तुम्हारे भीतर कोई समाज नहीं, कोई संस्कृति नहीं- बस तुम, तुम्हारी शुद्ध चेतना के साथ होते हो । हमारे अंदर लगातार पॉजिटिव और नेगेटिव विचार श्रंखला चलती रहती है । प्रसन्न रहने के लिए और खुशी पाने के लिए हमें इन विचारों से ऊपर उठना होगा।
निर्विचारिता की स्थिति हमारे अंदर गहन शांति का एहसास कराती है।जिस से हमें एक ऐसी खुशी का अनुभव होता है जो किसी भी चीज़ से प्राप्त नहीं हो सकती। नश्वर वस्तुओं से प्राप्त होने वाली खुशी स्थाई नहीं होती। अंदर चलने वाले विचारों को कम करने का अभ्यास करना चाहिए।
हमें यह ध्यान देना चाहिए की जो विचार आते - जाते हैं उन्हें हम सिर्फ साक्षी भाव से और सजगता से देखें । हमारे अंदर उठने वाले सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रकार के विचारों का प्रभाव हम पर ना पड़े, और इसका एक ही उपाय है कि हम वर्तमान में ही रहे ।
भूतकाल और भविष्य काल के बारे में ना सोचे। इसके है लिए जरूरी कि पूरे दिन में आप अपने शौक को पूरा करने वाले कार्य के लिए अवश्य समय निकालें। इससे आपके ध्यान को एकाग्रता मिलेगी। मस्तिष्क को विचार शून्य रखें यही निर्विचारिता है।
जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की सृष्टि का पूरा आनंद लेने लगते हैं, बीच में कोई वाधा नहीं रहती है । विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है। हर काम करते वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं।
और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता है । निर्विचारिता एक औलौकिक स्थिति है जहॉ से परमात्मा के दर्शन होते हैं, निर्विचारिता की अवस्था में जो भी घटित होता है। वह प्रकाशवान होता है।
निर्विचारिता में आपके मन में जो विचार आता है वह एक अन्तःप्रेरणा होती है। निर्विचारिता में आप परमात्मा की शक्ति के साथ एक रूप हो जाते है,अर्थात आप परमात्मा में आकर मिल जाते हैं। परमात्मा की शक्ति आपके अन्दर आ जाती है।
कोई भी निर्णय लेने से पहले निर्विचारिता में जाओ, अब जो निर्णय सामने आ जाए, वही सबसे उपयुक्त, आलौकिक व चमत्कारिक निर्णय होगा, क्यों कि उसमें आपका ईगो और सुपर ईगो दोनों काम करते हैं। आप ऎसा निर्णय लेंगे जो बडे-बडे लोगों के बस में नहीं।
निर्विचारिता में रहना सीखें ..यही आपका स्थान है, आपका धन, आपका बल, शक्ति, आपका स्वरूप, सौन्दर्य तथा यही आपका जीवन है। निर्विचार होते ही बाहर का यन्त्र पूरा आपके हाथ में घूमने लग जाता है। सिर्फ जीवंतता का दर्शन होगा, जहॉ से जीवन की धारा बहती है।
स्वर विज्ञान: हमें यह ध्यान देना चाहिए की जो विचार आते - जाते हैं उन्हें हम सिर्फ साक्षी भाव से और सजगता से देखें । हमारे अंदर उठने वाले सकारात्मक या नकारात्मक दोनों प्रकार के विचारों का प्रभाव हम पर ना पड़े, और इसका एक ही उपाय है कि हम वर्तमान में ही रहे ।
भूतकाल और भविष्य काल के बारे में ना सोचे। इसके है लिए जरूरी कि पूरे दिन में आप अपने शौक को पूरा करने वाले कार्य के लिए अवश्य समय निकालें। इससे आपके ध्यान को एकाग्रता मिलेगी। मस्तिष्क को विचार शून्य रखें यही निर्विचारिता है।
जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की सृष्टि का पूरा आनंद लेने लगते हैं, बीच में कोई वाधा नहीं रहती है । विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है। हर काम करते वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं।
और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता है । निर्विचारिता एक औलौकिक स्थिति है जहॉ से परमात्मा के दर्शन होते हैं, निर्विचारिता की अवस्था में जो भी घटित होता है। वह प्रकाशवान होता है।
निर्विचारिता में आपके मन में जो विचार आता है वह एक अन्तःप्रेरणा होती है। निर्विचारिता में आप परमात्मा की शक्ति के साथ एक रूप हो जाते है,अर्थात आप परमात्मा में आकर मिल जाते हैं। परमात्मा की शक्ति आपके अन्दर आ जाती है।
कोई भी निर्णय लेने से पहले निर्विचारिता में जाओ, अब जो निर्णय सामने आ जाए, वही सबसे उपयुक्त, आलौकिक व चमत्कारिक निर्णय होगा, क्यों कि उसमें आपका ईगो और सुपर ईगो दोनों काम करते हैं। आप ऎसा निर्णय लेंगे जो बडे-बडे लोगों के बस में नहीं।
निर्विचारिता में रहना सीखें ..यही आपका स्थान है, आपका धन, आपका बल, शक्ति, आपका स्वरूप, सौन्दर्य तथा यही आपका जीवन है। निर्विचार होते ही बाहर का यन्त्र पूरा आपके हाथ में घूमने लग जाता है। सिर्फ जीवंतता का दर्शन होगा, जहॉ से जीवन की धारा बहती है।
इसलिए निर्विचारिता समाधि से स्वयं को ज्योतिर्मय बनाइये ..यह कार्य कठिन नहीं है। यह स्थिति आपके अन्दर है,क्योंकि विचार तो इधर या उधर से आते है। ये आपके मस्तिष्क की लहरियॉ नहीं बल्कि आपकी प्रतिक्रियायें हैं । लेकिन ध्यान धारण करने पर आप निर्विचार चेतना में चले जाते हैं।
यह स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है और तब आपके मस्तिष्क में आने वाले मूर्खता पूर्ण एवं व्यर्थ विचार समाप्त हो जाते है। इन विचारों को समाप्त होने पर ही आपका उत्थान सम्भव है तभी हम उन्नत होते हैं। जिसे निर्विचार होना हो, उसे व्यर्थ के विचारों को लेना बंद कर देना चाहिए ।
इसकी सजगता उसके भीतर होनी चाहिए कि व्यर्थ के विचारों का पोषण न करे, उन्हें अंगीकार न करे, उन्हें स्वीकार न करे और सचेत रहे कि मेरे भीतर विचार इकट्ठे न हो जाएं। इसे करने के लिए जरूरी होगा कि वह विचारों में जितना भी रस हो, उसको छोड़ दे। हमें विचारों में बहुत रस है।
अगर आप एक धर्म को मानते हैं, तो उस धर्म के विचारों में आपको बहुत रस है। निर्विचार होना है, तो विचारों के प्रति विरस हो जाना चाहिए। उसे यह सोचना चाहिए कि विचार से कोई प्रयोजन नहीं और यह संभव होगा विचारों के प्रति जागरूकता से।
अगर हम अपने विचारों के साक्षी बन सकें तो क्रमशः जिस मात्रा में आपका साक्षी होना विकसित होता है, उसी मात्रा में विचार शून्य होने लगते हैं।विचार को शून्य करने का उपाय है विचार के प्रति पूर्ण सजग हो जाना। उदाहरण के लिए घर में रौशनी होगी तो चोर न आएंगे ।
और घर में अंधकार होगा तो चोर झांकेंगे और अंदर आना चाहेंगे। भीतर जो होश को जगा लेता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं। भीतर जितनी मूर्च्छा होती है , जितना सोयापन होता है, उतने ज्यादा विचारों का आगमन होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं।
विचारों के प्रति साक्षी-भाव को साधना। कोई एक क्षण में , एक दिन में सध जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता है लेकिन अगर निरंतर प्रयास हो, कभी घंटे भर को किसी एकांत कोने में बैठ जाएं और कुछ भी न करें, सिर्फ विचारों को देखते रहें।
और देखते-देखते ही धीरे-धीरे आपको पता चलेगा, वे कम होने लगे हैं। देखना जैसे-जैसे गहरा होगा, वैसे-वैसे वे विलीन होने लगेंगे। जिस दिन देखना पूरा हो जाएगा, जिस दिन आप अपने भीतर आर-पार देख सकेंगे, जिस दिन आपकी आंख बंद होगी और आपकी दृष्टि भीतर पूरी की पूरी देख रही होगी।
उस दिन आप पाएंगे..कोई विचार का कोलाहल नहीं है, वे गए। और जब वे चले गए होंगे, उसी शांत क्षण में आपको अदभुत दृष्टि, अदभुत दर्शन, अदभुत आलोक का अनुभव होगा। वह अनुभव ही सत्य का दर्शन है। और वही अनुभव स्वयं का दर्शन है।
ज्ञान की उपलब्धि निर्विचार में होती है। स्वयं के माध्यम से ही सत्य जाना जाता है और कोई द्वार नहीं है और सत्य को जान लेना आनंद में प्रतिष्ठित हो जाना है।असत्य में होना दुख में ,अज्ञान में होना है और सत्य की उस ज्ञान दशा में आनंद उपलब्ध होता है।
आनंद और आत्मा अलग न समझें। आनंद और सत्य अलग न समझें। स्वयं और सत्य अलग न समझें। ऐसी जो प्रक्रिया का उपयोग क्रमशः अपने जीवन में करेगा, वह निर्विचार को अनुभव कर लेता है ओर निर्विचार को जो अनुभव कर लेता है, उसकी पूरी विचार की शक्ति जाग्रत हो जाती है।
जैसे किसी ने अंधेरे में प्रकाश कर दिया हो या जैसे किसी ने अंधे को आंख दे दी हों, ऐसा उसे अनु
भव होता है। ज्ञान निर्विचार अवस्था में ही रहता है और उपलब्धि हो जाए तो वह हर अवस्था में अथार्त विचार की अवस्था में भी रहता है।
फिर तो उसे खोने का कोई उपाय नहीं है।अभिव्यक्ति विचार से भी हो सकती है, लेकिन उपलब्धि निर्विचार में होती है। क्योंकि विचार की तरंगें मन को दर्पण नहीं बनने देतीं। लेकिन अगर सोचते हों कि विचार से उपलब्धि कर लेंगे, तो कभी न होगी, विचार बहुत बाधा डालेगा।
जब तक विचार चलते हैं, तब तक निर्विचार का खयाल भी सिर्फ एक विचार है । मैं निर्विचार हूं; और इधर विचार चल रहे हैं । क्योंकि इसकी स्थिति तो तभी स्मरण में आएगी, जब विचार नहीं चल रहे होंगे। असल में मन की तरकीब ही यही है कि आप कुछ भी कहो।
वह उसको वासना में निर्मित कर देता है। वह कहता है, मोक्ष चाहिए ..उस मे बड़ा आनंद है कोशिश करो, खोजो, मिल जाएगा। अब मोक्ष की खोज शुरू हो गई। और जिस मोक्ष को मन खोजता है, वह मोक्ष नहीं है। असल में, जहां मन नहीं होता.. वहां मोक्ष है।
इसलिए मन का खोजा हुआ मोक्ष तो मोक्ष नहीं हो सकता। निर्विचार की बात सुनते-सुनते मन में बैठ जाता है, निर्विचार होना चाहिए। अब अगर इस विचार पर आप जिद्द देकर पड़ जाएं, तो मन आपको दूसरा धोखा देगा। वह कहेगा कि देखो, भीतर तो निर्विचार है।
आस-पास विचार घूम रहे हैं; आर-पार चल रहे हैं विचार, मैं तो बाहर खड़ा हुआ हूं। लेकिन मैं जो बाहर खड़ा हुआ हूं, यह क्या है? वास्तवमें, यह भी एक विचार है। पर इससे भी थोड़ा सुख , थोड़ी शांति मिलेगी जो कि मन को सदा मिलती है, जब भी वह अपनी किसी वासना को पूरा कर लेता है।
स्वर विज्ञान: जब तक विचार चलते हैं, तब तक निर्विचार का खयाल भी सिर्फ एक विचार है । मैं निर्विचार हूं; और इधर विचार चल रहे हैं । क्योंकि इसकी स्थिति तो तभी स्मरण में आएगी, जब विचार नहीं चल रहे होंगे। असल में मन की तरकीब ही यही है कि आप कुछ भी कहो।
वह उसको वासना में निर्मित कर देता है। वह कहता है, मोक्ष चाहिए ..उस मे बड़ा आनंद है कोशिश करो, खोजो, मिल जाएगा। अब मोक्ष की खोज शुरू हो गई। और जिस मोक्ष को मन खोजता है, वह मोक्ष नहीं है। असल में, जहां मन नहीं होता.. वहां मोक्ष है।
इसलिए मन का खोजा हुआ मोक्ष तो मोक्ष नहीं हो सकता। निर्विचार की बात सुनते-सुनते मन में बैठ जाता है, निर्विचार होना चाहिए। अब अगर इस विचार पर आप जिद्द देकर पड़ जाएं, तो मन आपको दूसरा धोखा देगा। वह कहेगा कि देखो, भीतर तो निर्विचार है।
आस-पास विचार घूम रहे हैं; आर-पार चल रहे हैं विचार, मैं तो बाहर खड़ा हुआ हूं। लेकिन मैं जो बाहर खड़ा हुआ हूं, यह क्या है? वास्तवमें, यह भी एक विचार है। पर इससे भी थोड़ा सुख , थोड़ी शांति मिलेगी जो कि मन को सदा मिलती है, जब भी वह अपनी किसी वासना को पूरा कर लेता है।
लेकिन मैं जो बाहर खड़ा हुआ हूं, यह क्या है?वास्तवमें, यह भी एक विचार है। पर इससे भी थोड़ा सुख , थोड़ी शांति मिलेगी जो कि मन को सदा मिलती है, जब भी वह अपनी किसी वासना को पूरा कर लेता है। लेकिन वह शांति नहीं, जो कालजयी है;, जिसका कोई नाम नहीं है।
उदाहरण के लिए दीया जलता है,आग जलती है, लौ जलती है। लौ पहले तेल को जलाती रहती है। फिर तेल चुक जाता है। फिर लौ बाती को जलाने लगती है। फिर बाती चुक जाती है। फिर लौ खो जाती है। अथार्त लौ पहले तेल जला देती है, फिर बाती को जला देती है, फिर स्वयं को जला लेती है।
विचार को छोड़ दें, फिर स्वयं को भी छोड़ दें। तब कुछ नहीं बचता। तुम अशांत हो और मन तुम्हें धोखा दे रहा है कि तुम शांत हो। तुम्हें कुछ पता नहीं है और तुम कहते हो, मुझे मालूम है कि भीतर आत्मा है। तुम्हें कुछ पता नहीं और तुम कहते हो, यह सारा संसार परमात्मा ने बनाया है।
तुम्हें कुछ भी पता नहीं है और तुम कहते हो कि आत्मा अमर है। मन के इस धोखे में जो पड़ेगा, वह फिर उसे न जान पाएगा जो जानने जैसा है। और उसे न जान पाए, इसलिए मन ये सारे धोखे निर्मित करता है। तो जब तक तुम्हें पता चलता हो कि विचार चल रहा है।
तब तक तुम जानना कि मन ने अपने दो हिस्से किए: एक हिस्सा विचार चलाने वाला, और एक हिस्सा एक विचार का कि मैं विचार नहीं हूं, मैं निर्विचार हूं। यह मन का ही द्वैत है। सच तो यह है कि मन के बाहर द्वैत होता ही नहीं। मन के बाहर अद्वैत हो जाता है।
और अद्वैत का कोई बोध नहीं होता, कि तुम कह सको, ऐसा है। ज्यादा से ज्यादा तुम इतना ही कह सकोगे, ऐसा नहीं है।तब एक निर्विकार भाव अवस्था, एक निर्विकार अस्तित्व, एक मौन-शांत सत्ता, शेष एक्जिस्टेंस रह जाता है, जहां मैं का भंवर नहीं बनता।
पानी में चक्कर से भंवर बनता है। और भंवर की एक खूबी होती है, आप कुछ भी डाल दो तो वह भंवर उसको फौरन खींच कर घुमाने लगता है। 'मन एक भंवर है। जिसमें आप कुछ भी डालें, वह किसी भी चीज को पकड़ कर घुमाने लगेगा।
इस निर्विचार, निरहंकार स्थिति में कोई भंवर नहीं रह जाता, कोई घूमने की स्थिति नहीं रह जाती। और तब जिसे कैवल्य कहते हैं..घटित होता । कैवल्य का अर्थ है, कुछ भी न बचा, केवल होना ही बचा; कोई उपाधि न रही, कोई विशेषण न रहा; सिर्फ अस्तित्व रह गया। मात्र होना, की हु बस।
जैसे कोई खुले आकाश में झांके--न कोई बादल, न कोई तारे, खाली आकाश रह गया। ऐसा ही जब भीतर रह जाता है, झांकने वाला भी नहीं रह जाता, सिर्फ खालीपन रह जाता है, तब पता चलता है उसका, उस पथ का, जिस पर विचरण संभव नहीं है, उस पथ का, जो अविकारी है।
तब पता चलता है उस सत्य का, जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता, जो कालजयी है, जो कालातीत है, जो सदा एकरस है, जो केवल स्वयं है महा ऋषि कहते है, अंकुशो मार्ग: अथार्त अंकुश ही मार्ग है। बड़े छोटे सूत्रों में बड़ी अमृत सूचनाएं हैं।
इस मन पर जो फैलाव करता , स्वप्नों को जन्माता है, प्रक्षेपण करता है...इस मन को रोकना, इस मन को ठहराना, इस मन को न चलने देना, इस मन को गतिमान न होने देना, इस मन को सक्रिय न होने देना-..इस पर अंकुश ही मार्ग है।
धीरे -धीरे, इस मन को विसर्जित कर देना ही सिद्धि है।उदाहरण के लिए एक शिष्य जब अपने गुरु के पास गया तो उसने कहा, मैं मन को कैसा बनाऊं कि सत्य को जान सकूं? तो गुरु बहुत हंसने लगा। उसने कहा, मन को तू कैसा भी बना, सत्य को तू न जान सकेगा।
तो उसने पूछा कि क्या मैं सत्य को जान ही न सकूंगा? गुरु ने कहा, यह मैंने नहीं कहा। सत्य को तू जान सकेगा, लेकिन कृपा कर मन को छोड़ दे।ऋषि कहते है, इस मन पर अंकुश रखना पड़े, इस मन को धीरे—धीरे विसर्जित करना पड़े और वह क्षण लाना पड़े, जहां हम कह सकें, अब कोई मन नहीं।
वास्तव में, जहां मन नहीं, चेतना और सत्य का मिलन हो जाता है। वहीं आनंद है और वहीं नित्य की प्रतीति और अनुभूति है। वास्तव में, मन का न होना ...ध्यान है। तू मन को बनाने की कोशिश मत कर कि ऐसा बनाऊं, अच्छा बनाऊं, बुरा बनाऊं। यह रंग दूं वह रंग दूं।
साधु का बनाऊं, संत का बनाऊं। किसका मन बनाऊं? मन से नहीं होगा, क्योंकि मन कैसा भी होगा, तो प्रक्षेपण करेगा। अच्छा मन अच्छे प्रक्षेपण करेगा, बुरा मन बुरे प्रक्षेपण करेगा। लेकिन प्रक्षेपण जारी रहेगा। मन ही न हो, तो हमारे और जगत के बीच।
हमारे और सत्य के बीच जो -जो जाल है, वह तत्काल गिर जाता। हम वही देख पाते हैं, जो है। ध्यान भी अ-मन अथार्त मन को फेंक देना है, हटा देना है। पहले तो, धीरे -धीरे अंकुश से ही यात्रा शुरू करनी पड़ेगी। उदाहरण के लिए बैठे हैं, धूप पड़ रही है। मन कहेगा, बड़ी तकलीफ हो रही है।
मन को कहें कि तू चुप रह। मुझे जरा धूप को अनुभव करने दे कि क्या हो रहा है। मन कहेगा,धूप में बड़ा आनंद आ रहा है । तो कहना, तू जरा चुप रह, तू बीच में मत आ। धूप और मुझे सीधा मिलने दे। और तब बड़े फर्क पड़ेंगे। तब धूप जैसी है, वैसी ही अनुभव में आएगी।
स्वर विज्ञान: धूप पड़ रही है। मन कहेगा, बड़ी तकलीफ हो रही है। मन को कहें कि तू चुप रह। मुझे जरा धूप को अनुभव करने दे कि क्या हो रहा है। मन कहेगा,धूप में बड़ा आनंद आ रहा है । तो कहना, तू जरा चुप रह, तू बीच में मत आ। धूप और मुझे सीधा मिलने दे।
तब बड़े फर्क पड़ेंगे। तब धूप जैसी है, वैसी ही अनुभव में आएगी। ..यह बीच में मन व्याख्या न करेगा। ये सारी व्याख्याएं हैं और एक दफा फैशन बदल जाए, तो व्याख्याएं बदल जाती हैं। फैशन के बदलने के साथ सब बदल जाता है। मन का ही सारा खेल है।
जैसा हम पकड़ लें, बस वैसा ही मालूम होने लगता है। तो तुम्हे सबसे पहले अवधान साधना होगा और उसे करके ही तुम उसका विकास कर सकते हो; इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। अवधान का अर्थ है कि जब तुम कुछ देखते हो तो तुम मात्र देखते ही हो।
कोई दूसरा काम नहीं करते हो-मानो मन ठहर गया है, अब कोई विचारणा नहीं है, यदि यह संभव हो तो अचानक तुम्हारा अवधान दृश्य से लौट कर दृस्था पर आ जाएगा। एक वर्तुल बन जाएगा। तुम दृश्य को देखोगे और वह दृष्टि वापस लौटेगी; दृश्य उसे वापस कर देगा।
द्रष्टा पर ही लौटा देगा। अगर विचार न हो तो यह घटित होता है। तब तुम दृश्य को ही नहीं देखते, तुम देखने वाले को भी देखते हो। तब देखने वाला और दृश्य दो आब्जेक्ट हो जाते हैं और तुम दोनों के साक्षी हो जाते हो। लेकिन पहले अवधान को प्रशिक्षित करना होगा।
तुम एक क्षण के लिए भी अवधानपूर्ण नहीं रहते हो। अवधान दो, उसे बढ़ाते जाओ; प्रयोग से वह विकसित होगा। टकटकी लगाना अर्थात त्राटक यही अभ्यास है। कुछ भी करते हुए, कहीं भी तुम अवधान को विकसित कर सकते हो।
तुम कार में या रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे हो, वहीं अवधान को बढ़ाने का प्रयोग करो। समय मत गंवाओ। तुम बस वहां होओ, विचार मत करो। किसी व्यक्ति को देखो, रेलगाड़ी को देखो या बाहर देखो, पर द्रष्टा रहो। तुम्हारी दृष्टि सीधी, प्रत्यक्ष और गहरी हो जाएगी।
और तब सब तरफ से तुम्हारी दृष्टि वापस लौटने लगेगी और तुम द्रष्टा के प्रति बोध से भर जाओगे। तुम्हें अपना बोध नहीं है। तुम अपने प्रति सावचेत नहीं हो। क्योंकि विचारों की एक दीवार है। पूरे दिन तुम अनेक चीजों पर यह प्रयोग कर सकते हो।
धीरे-धीरे तुम्हारा अवधान विकसित होगा। तुम जो भी कर रहे हो, भोजन कर रहे हो, या स्नान कर रहे हो, बस अवधानपूर्ण होओ। लेकिन समस्या यह है कि हम सब काम मन के द्वारा करते हैं और हम निरंतर भविष्य के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं।
तुम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हो और तुम्हारा मन किन्हीं दूसरी यात्राओं के आयोजन में व्यस्त है, उनके कार्यक'म बनाने में संलग्न है। इसे बंद करो।एक संत ने कहा है: 'मैं यही एक ध्यान जानता हूं। जब मैं भोजन करता हूं तो भोजन करता हूं। जब मैं चलता हूं तो चलता हूं।
और जब मुझे नींद आती है तो मैं सो जाता हूं। जो भी होता है, होता है; उसमें मैं कभी हस्तक्षेप नहीं करता।' इतना ही करने को है कि हस्तक्षेप न करो। और जो भी घटित होता हो उसे घटित होने दो। तुम सिर्फ वहां मौजूद रहो। यही चीज तुम्हें अवधानपूर्ण बनाएगी।
तुम स्वयं पर लौट आओगे। सारा अस्तित्व दर्पण बन जाएगा; पूरा अस्तित्व तुम्हें प्रतिबिंबित करेगा। जब समस्त अस्तित्व दर्पण बन जाता है, केवल तभी तुम प्रतिबिंबित हो सकते हो और केवल तभी तुम स्वयं को जान सकते हो, बस, स्वयं को स्मरण करो।
इस विधि के सहयोगी होने का एक गहरा कारण है। तुम एक गेंद को दीवार पर मारो; गेंद वापस लौट आएगी। जब किसी चेहरे को देखते हो तो तुम्हारी कुछ ऊर्जा उस दिशा में गति कर रही है। तुम्हारा देखना ही ऊर्जा है। तुम्हें पता नहीं है कि जब तुम देखते हो तो तुम ऊर्जा फेंक रहे हो।
तुम्हारी ऊर्जा का, तुम्हारी जीवन-ऊर्जा का एक अंश फेंका जा रहा है। यही कारण है कि दिन भर रास्ते पर देखते-देखते तुम थक जाते हो और आराम करने के लिए आंखें बंद कर लेना चाहते हो। क्योकि तुम ऊर्जा फेंकते रहे हो। बुद्ध और महावीर दोनों इस पर जोर देते है।
कि उनके शिष्य चलते हुए ज्यादा दूर तक न देखें, जमीन पर दृष्टि रख कर चलें। बुद्ध कहते हैं कि तुम सिर्फ चार फीट आगे तक देख सकते हो। इधर उधर कहीं मत देखो, सिर्फ अपनी राह को देखो जिस पर चल रहे हो। चार फीट आगे देखना काफी है।
क्योंकि जब तुम चार फीट चल चुकोगे, तुम्हारी दृष्टि चार फीट आगे सरक जाएगी। उससे ज्यादा दूर मत देखो, क्योंकि तुम्हें अकारण अपनी ऊर्जा का अपव्यय नहीं करना है। जब तुम देखते होतो तुम थोड़ी ऊर्जा बाहर फेंकते हो। रुको, मौन प्रतीक्षा करो, उस ऊर्जा को वापस आने दो।
और तुम चकित हो जाओगे; अगर तुम ऊर्जा को वापस आने देते हो तो तुम कभी थकोगे नहीं। इसे प्रयोग करो। कल सुबह इस विधि का प्रयोग करो। शांत हो जाओ, किसी चीज को देखो , उसके बारे में विचार मत करो, और एक क्षण धैर्य से प्रतीक्षा करो।
ऊर्जा वापस आएगी; असल में, तुम और भी प्राणवान हो जाओगे। निर्विचार अवस्था में ऊर्जा लौट आती है; कोई बाधा नहीं पड़ती है। और अगर तुम वहां मौजूद हो तो तुम उसे पुनः आत्मसात कर लेते हो। और वह पुनः आत्मसात करना तुम्हें पुन जीवित कर देता है।
स्वर विज्ञान: जब 'मन का होना' समाप्त होता है, साक्षी स्वयं में स्थापित हो जाता है। जब तुम केवल देख सको बिना मन के साथ तादात्म्य बनाये, बिना निर्णय किये, बिना प्रशंसा या आलोचना किये, बिना चुनाव किये केवल देखते रहो।जबकि मन बह रहा हो, तो ऐसा क्षण आ जाता है ।
जब स्वयं ही मन रुक जाता है। थम जाता है। जब मन नहीं है, तब तुम अपने साक्षी में प्रतिष्ठित हो जाते हो। तब तुम साक्षी बन गये -केवल देखने वाले, एक द्रष्टा। तब तुम कर्ता न रहे, विचारक न रहे। तब बस, 'तुम हो'... शुद्धतम अस्तित्व। तब साक्षी स्वयं में स्थापित हो गया।
साक्षी के अतिरिक्त और दूसरी सभी अवस्थाओं में मन के साथ तुम्हारा तादात्म्य बना रहता है। तुम विचारों के प्रवाह के साथ एक हो जाते हो; एक हो जाते हो बादलों के साथ : कई बार सफेद बादलों के साथ, कई बार वर्षा से भरे बादलों के साथ, तो कई बार वर्षा रिक्त खाली बादलों के साथ।
लेकिन कुछ भी हो, तुम किसी विचार के साथ, किसी बादल के साथ एक हो ही जाते हो। और इस तरह तुम आकाश की शुद्धता गंवा देते हो, खो देते हो अंतरिक्ष की शुद्धता। तुम जैसे बादलों में घिर जाते हो। और बादलों का यह घेराव घटित होता है।
क्योंकि तुम तादात्म्य जोड़ लेते हो, तुम विचारों के साथ एक हो जाते हो। उदाहरण के लिए,तुम्हे खयाल आता है कि तुम भूखे हो और विचार मन में कौंध जाता है। विचार इतना भर है कि भूख है, कि पेट को भूख लगी है। उसी क्षण तुम तादात्म्य स्थापित कर लेते हो।
तुम कह देते हो, 'मुझे भूख लगी है।’ यही तादात्म्य है। बुद्ध भी भूख महसूस करते हैं, पतंजलि भी भूख महसूस करते हैं। लेकिन पतंजलि कभी नहीं कहेंगे 'मुझे भूख लगी है।’ वे कहेंगे कि ''शरीर भूखा है ..मेरा पेट भूख महसूस कर रहा है।
मैं इस विचार का साक्षी बना हूं जो पेट द्वारा दिमाग तक कौंध गया, कि 'मुझे भूख लगी है'''। पतंजलि तो उसके साक्षीमात्र बने रहेंगे। लेकिन तुम तादात्म्य बना लेते हो, विचार के साथ एक हो जाते हो अन्य अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है''।(’वृत्तिसास्वषमितरत्र।)
यही परिभाषा है : 'योग मन की समाप्ति है।’ जब मन थमता है, समाप्त होता है, तुम अपनी साक्षी सत्ता में अवस्थ’त होते हो। इस अवस्था के अतिरिक्त बाकी सभी अवस्थाओं में तादात्म्य बना ही रहता है। ये तादात्म्य ही संसार बनाते रहते हैं.. वे ही हैं संसार।
यदि तुम इन तादात्म्य में हो, तब तुम संसार में हो, दुख में हो। और यदि तुम इन तादात्म्यों के परे हो गये, तब तुम मुक्त हुए। तब तुम सिद्ध हो गये, तुमने निर्वाण पा लिया। तुम इस दुख-भरे संसार के पार चले गये और आनंद के जगत में प्रविष्ट हुए। और वह जगत अभी और यहां है।
बिलकुल, इसी क्षण। तुम्हें इसके लिए एक पल भी प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मन के साक्षी भर बन जाओ और तुम उस जगत में प्रविष्ट कर जाओगे। मन के साथ तादात्म्य जोड़ लो, तो उसे खो दोगे। यही है बुनियादी परिभाषा। साधक को अ-मन की अवस्था उपलब्ध करनी है।
हमे बहुत से संदेश मिले की मन के न रहने से सांसारिक कार्य कैसे पूर्ण होंगे तो इसका उत्तर है हमे समझना होगा कि मन,ओर चित में मामूली अंतर है उदहारण के लिए आप किसी तालाब में पत्थर फेंके तब तालाब में परिधि पर एक वृत्ति बनती ।
यह वृति ही मन कहा गया भीतर तलाब शांत है इसे चित कहते। चित वृति निरोध इसे ही योग कहते। संसार मे कुछ भी घटता तो उसकी वृति हमारे चित में हलचल करती । एशे समझे कि सागर चित है और लहर मन। वायु के प्रभाव से सागर की परिधि पर लहर उतपन होती।
लहर है तो सागर का हिस्सा ही । लहर के न रहने से सागर का अस्तित्व कम नही होगा । तुम सागर में उठती लहरों को देखते हो। वे प्रकट होती है; एक अर्थ में वे है, और फिर भी किसी गहरे अर्थ में वे नहीं है। लहर के संबंध में समझने की यह पहली बात है।
यह केवल गहरे अर्थ में प्रकट होता है;कि एक लहर है। लेकिन किसी गहरे अर्थ में लहर नहीं है .. सिर्फ सागर है। सागर के बिना लहर नहीं हो सकती। और जब लहर है भी तो भी यह सागर ही है। लहर रूप भर है सागर सत्य है लेकिन लहर केवल रूप है।
भाषा के कारण अनेक समस्याएं उठ खड़ी होती है क्योंकि हम लहर कहते है। बेहतर हो कि हम लहर न कहकर लहराना कहें। लहराना कोई वस्तु पदार्थ या तत्व सत्य नहीं है...एक क्रिया है,एक गति है, प्रक्रिया है। पदार्थ या तत्व तो सागर है; लहर एक रूप भर है। सागर शांत हो सकता है।
लेकिन तब लहरें विलीन हो जाएंगी ..परन्तु सागर तो रहेगा। सागर शांत हो सकता है ,बहुत सक्रिय और क्षुब्ध हो सकता है; या सागर निष्क्रिय हो सकता है। लेकिन तुम्हें कोई शांत लहर देखने को नहीं मिलेगी। लहर सक्रियता है, सत्य नहीं।
जब सक्रियता है तो लहर है; यह लहराना है, गति है ..एक साधारण सी हलचल। लेकिन जब शांति आती है ,निष्क्रियता आती है तो लहर नहीं रहती। लेकिन सागर रहता है। दोनों अवस्थाओं में सागर सत्य है। लहर उसका एक खेल है ;लहर उठती है और खो जाती है।
लेकिन सागर रहता है। दूसरी बात लहरें अलग-अलग दिखती है।प्रत्येक लहर का अपना व्यक्तित्व है ..अनूठा औरों से भिन्न। कोई दो लहरें समान नहीं होती। कोई लहर बड़ी होती है तो कोई छोटी ..उनके अपने-अपने विशिष्ट लक्षण होते है। प्रत्येक लहर का निजी ढंग होता है।
एक लहर उठ रही होती है,दूसरी मिट रही होती है। जब एक उठती है तो दूसरी गिरती है। दोनों एक नहीं हो सकती। क्योंकि एक जन्म ले रही होती है और दूसरी मिट रही होती है। फिर भी दोनों लहरों के पीछे जो सत्य है वह एक ही है।
लेकिन संभव है कि उठती हुई लहर मिटने वाली लहर से ऊर्जा ग्रहण कर रही हो। मिटने वाली लहर अपनी मृत्यु के द्वारा उसे उठने में मदद कर रही हो। बिखरने वाली लहर उस लहर के लिए कारण बन सकती है जो उठ रही है। बहुत गहरे में वे एक ही सागर से जुड़ी है।
वे भिन्न या पृथक नहीं है। उनका व्यक्तित्व झूठ है, भ्रामक है। वे जुड़ी है ,उनका द्वैत भासता है ;लेकिन है नहीं। उनका अद्वैत सत्य है। जो लोग संसार मे मन की स्तिथि में जीते है वो लहरों में ही गोते लगाते रहते ओर जो गहरे सागर में स्वयं को केंद्रित करते वो विचलित नही होते।
उनका चित शांत रहता गहरे सागर की भांति वो देखते की परिधि पर तूफान चल रहा यही प्रकृति है सबके जीवन मे तूफान आते पर स्तिथि में अंतर होता शांत चित्त से सब कार्य अच्छे से हो सकते इस लिए अ मन होने पर जोर दिया गया।
वैयक्तिकता झूठी है, भ्रामक है। वह भासती है; लेकिन सत्य नहीं है। सत्य तो अखंड है, सागर है,अद्वैत है। यही कारण है कि प्रत्येक धर्म अहंकार के विरोध में है। निराकार और साकार एक ही सिक्के के दो पह्लू है। हम भले ही साकार ईश्वर को न माने ;परन्तु निराकार सत्ता को तो मानना ही पड़ेगा।
अहंकार रहित मन के लिए ईश्वर में विश्वास की भी जरूरत नहीं है। निर हंकारी व्यक्ति अपने आप ही, सहज ही.. परमात्मा में लीन हो जाता है। निरहंकारी होकर तुम लहर से नहीं चिपके रह सकते हो; तुम्हें सागर में गिरना ही होगा।
स्वर विज्ञान: आपने पिछली पोस्ट में श्रवण,मनन,एकाग्रता और निर्विचारिता को समझा अब बात करते ध्यान की। ध्यान अक्रिया है। क्रिया हम उसे कहते हैं जिसको हम चाहें तो करें, चाहें तो न करें। स्वभाव क्रिया नहीं है। यह चित की एक अवस्था है। वह हमारा करना न करना, नहीं है।
उदाहरण के लिए ज्ञान और दर्शन स्वभाव के अंग हैं। वे हमारी सत्ता हैं। हम कुछ भी न करें, तब भी वे होंगे ही।स्वभाव की उपस्थिति हममें अविच्छिन्न है। जो सतत और अविच्छिन्न है, उसे ही स्वभाव कहा जाता है। वह हमारा निर्माण नहीं, हमारा आधार है।
हम उसे नहीं बनाते हैं, वही हमें धारण किए हुए है, इसलिए उसे स्वभाव, शुद्ध सत्ता,अस्तित्व । यह अविच्छिन्न स्वभाव क्रियाओं के विच्छिन्न प्रवाह में दब जाता है। सागर को जैसे लहरें ढांक लेती हैं, सूरज को जैसे बदलियां ढांक लेती हैं, ऐसे ही हम अपनी ही क्रियाओं से ढंक जाते हैं।
सतह पर क्रियाओं का आवरण, जो गहरे में है उसे छिपा लेता है। कैसा आश्चर्य है कि क्षुद्र से विराट दब जाता है? आँख में गिरा छोटा सा तिनका पर्वतों को ओझल कर देता है। पर सागर लहरों में मिटता नहीं है। लहरों का भी प्राण वही है और लहरों में भी वह उपस्थित है।
जो जानते हैं, वे उसे लहरों में भी जानते हैं, पर जो नहीं जानते हैं, उन्हें लहरों के शांत होने तक प्रतीक्षा करनी होती है। ध्यान एक चित्त अवस्था है। ध्यान में हम उस स्थिति को अनुभव करते हैं, जब बस केवल हम होते हैं,और कोई क्रिया हममें नहीं होती है।
बस ‘मैं’ ही रह जाता हूं। यह विचार भी नहीं रह जाता है कि ‘ मैं हूं।’ बस ‘ होना मात्र’ ही रह जाता है। इसे ही शून्य समझें। यही वह बिंदु है जहां से संसार का नहीं, सत्य का दर्शन होता है। इस शून्य में ही वह दीवार गिर जाती है, जो हमें स्वयं को जानने से रोके हुए है।
विचार के पर्दे उठ जाते हैं और प्रज्ञा का आविर्भाव होता है। इस सीमा में विचार नहीं, यहां साक्षात दर्शन है। यद्यपि न ‘दर्शन’ शब्द ठीक है, न ‘साक्षात’ शब्द ठीक है। क्योंकि यहां ज्ञाता और ज्ञेय का भेद नहीं है, क्योंकि यहां दृश्य, ऑब्जेक्ट और द्रष्टा, सब्जेक्ट का भेद नहीं है।
यहां न ज्ञेय न ज्ञाता है। यहां तो केवल ज्ञान ही है। यहां तो कोई भी शब्द ठीक नहीं है; केवल निःशब्द ही ठीक है। ध्यान सबमे ,सदैव है । क्रिया द्वारा मात्र दिशा दी जाती की सबमे शुक्ल ध्यान की अवस्था हो। शास्त्र मत से ध्यान की चार अवस्था कहि गयी।
यह है ,आतर ध्यान , रौद्रध्यान , धर्म ध्यान , ओर शुक्ल ध्यान अर्थात हम जान सकते हम ध्यान की किस अवस्था मे है । ध्यान स्वयं घटता आप अनुभव कर सकते। हम जिस अवस्था मे होते वैसा ध्यान घटता। हम क्रियाओं द्वारा अपनी अवस्था को बदल सकते।
आर्त्त ध्यान - आर्त्त का अर्थ है पीड़ा अथवा वेदना । अनुकूलता में कमी होने पर अथवा समय प्रतिकूल आने पर संसारी जीव प्रायः पीड़ा का अनुभव करते है। उस समय मन ,वचन व शरीर को एकाग्र कर के पीड़ा के कारणों पर विचार करते रहना ही आर्त्त ध्यान है ।
जो वस्तु , व्यक्ति, परिस्तिथि व्यक्ति के अनुकूल लगती है उसे इष्ट कहा गया है । अनिष्ट हम से सदा दूर रहे ओर इष्ट सदा हमारे पास रहे इस तरह की योजनायें बनाने में लगे रहना ही आर्त्त ध्यान होता ।
रौद्रध्यान - रौद्र का अर्थ है क्रूरता के भाव हिंसा के भाव । दुष्ट आचरण का चिंतन करना रौद्रध्यान कहलाता है । अर्थात प्राणी को कष्ट देने में आनन्द महसूस हो असत्य वचन बोल कर या मारपीट कर दुसरो की तकलीफ में देख के आनंद महसूस करना ।
जिस से नफरत करते उसके प्रति स्वयं ही दुःखद घटनाओं को निर्मित कर आंनद लेना । और उसकी सम्पति की चोरी होना जल जाना यह देखना ही रौद्र ध्यान होता । बइस ध्यान में क्रूरता के कारण कुछ से द्वेष ओर कुछ से आसक्ति के परिणाम रागात्मक भी हो जाते है ।
धर्म ध्यान - आत्मा को शुद्ध बनाने वाले ध्यान को धर्म ध्यान कहते है । देवो की आज्ञा को सत्य मान तत्वों का चिंतन करना राग द्वेष आदि पापो ओर उनके फल चिंतन करना । कर्म के कट्टू फल का चिंतन लोक के आकार का चिंतन करना आत्म स्वरूप का चिंतन ही धर्म ध्यान कहलाता है ।
इसमे ज्ञान दर्शन ओर तप रूप मोक्ष का मार्ग समझ कर मन ,वचन, ओर काया को एकाग्र कर निरीक्षण परीक्षण करते है संसार की असारता का चिंतन ही धर्म ध्यान है।
शुक्लध्यान- शुक्ल अर्थात निर्मल आत्मस्वरूप , आत्मा की विविध पर्यायों का , पर्याय बनने के अंतरंग व ब्रह्य्ये निमितो का एकाग्रचित हो कर विचार करना तथा अपने आत्मस्वरूप में लीन होना शुक्ल ध्यान है । दूसरे शब्दों में शरीर का छेदन भेदन होने पर भी आत्मस्वरूप में स्थिर हुआ चित लेशमात्र भी चलित नही होता उसे शुक्लध्यान कहते है ।
जो ध्यान कर्म मल को तीव्र गति से दूर करता वह भी शुक्ल ध्यान है । आर्त्त ध्यान और रौद्रध्यान दोनों कर्म बंधन के हेतु ओर आत्मा को विषम भावरूपी विभावो में भटकाने वाले होने से अप्रशस्त ध्यान कहलाते है ।धर्म और शुक्ल ध्यान स्वभाव दशा की ओर ले जाने में सहायक होने की वजह से प्रशस्त ध्यान कहलाते है ।
ध्यान सभी जीवों में पर्याप्त अवस्था मे होता है। किँतु जो आर्त्त ओर रौद्र ध्यान करते वो धर्म और शुक्ल में ध्यान चाह कर भी दस मिनट नही लगा सकते । सीधा सा मतलब है कि शुक्ल ध्यान लगाना तो आर्त्त ओर रौद्र ध्यान को छोड़ना होगा । सब साधना इस परिवर्तन के लिए ही है।
स्वर विज्ञान: नमन सभी को
अब हम समझेंगे हमारे पांच कोश बारे । एक और बात कहना चाहते की सभी सदस्य अपनी क्रिया साधना बारे हमे अवगत कराते रहे ।
स्वर विज्ञान: यह विषय काफी बड़ा है तो हम श्रृंखला में भागो में भेजते। इससे हमारा पूरा अस्तित्व समझ में आता।🙏
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष ........भाग 1
ऋग्वेद में हमारे पांच कोषों को पांच ऋषियों की संज्ञा दी गयी है जिसे हम जीवन रहते ही पवित्र बना सकते है ।
(1) अन्नमय कोष - अन्न तथा भोजन से बना हमारा शरीर और मस्तिक्ष यह हमारा सबसे ऊपर का आवरण है । यहाँ हमारा लिखने का भाव की (हम आत्मा है) कोई हमारी आत्मा का आवरण से भी समझ सकता ।
इसकी शुद्धि के उपाय - योग , आसन , प्राणायाम , व्यायाम , व्रत और खानपान की जानकारी । इसके लाभ - निरोगिता , चिर यौवन , दीर्घ जीवन ।
(2) प्राण मय कोष - प्राण ऊर्जा से बना ।
शुद्धि के उपाय - ज्यादा से ज्यादा प्राण ऊर्जा के सेवन, प्राणायाम , बंध, मुद्रायें ।
लाभ - ऐश्वर्य , ओज , तेज, यश , ओर पुरुषार्थ ।
(3) मनोमय कोष - मन से बना
शुद्धि के उपाय केवल ध्यान , त्राटक , साधना ।
लाभ - धर्य , मानसिक संतुलन , एकाग्रता ।
(4) विज्ञानमय कोष - सहज ज्ञान , आत्मज्ञान , विशेष ज्ञान से बना ।
शुद्धि के उपाय - स्वर संयम , सोहम साधना , ग्रन्थि भेदन ।
लाभ - दैवीय गुण , सज्जनता, सह्रदयता , अद्वितीय क्षमता , दिव्य दृष्टि ।
(5) आनंदमय कोष - आनँदभूति से बना ।
शुद्धि के उपाय - नाद साधना , बिंदु साधना , तुरीयावस्था ।
लाभ - अखण्ड आंनद , आत्म साक्षात्कार , ईश्वर दर्शन ।
हमारे शरीर भी तीन होते ।
(1) स्थूल शरीर । जो हमे दिखता हड्डी मास का बना ।
(2) शुक्ष्म शरीर । यह शुक्ष्म होने के कारण दिखता नही । इसमे हम यानी आत्मा , मन, बुद्धि , चित, अहंकार , सब होते।यह सब हमारी मृत्यु से अगले जन्मों जन्म साथ ही रहते।यहाँ तक कि सृष्टि के अंत मे भी यानी प्रलय में भी , केवल महालय में हमे यानी आत्मा को छोड़ जाते ।
(3) कारण शरीर - इसमे आत्मा और अहंकार ही रहता। यह आत्मा का ही स्वरूप होता अंत उसमे ही मिल जाता । इसका महालय में भी नाश नही होता जैसे मिट्टी का घड़ा नष्ट हो सकता किन्तु मिट्टी नष्ट नही हो सकती । जब सृस्टि का आरम्भ होता तो यही मिट्टी से सब दुबारा बनता ।
हमारे पांच कोषों में पहला अन्नमय कोष यहाँ मय का प्रयोग विकार अर्थ में किया गया है । अन्न के विकार अथवा संयोग से बना हुआ कोष 'अन्नमय, कहलाता है । यह आत्मा का सबसे बाहरी आवरण है । पशु ओर अविकसित - मानव भी , जो शरीर को स्वयं मानता है इसी धरातल पर जीता है ।
अन्न तथा भोजन से निर्मित शरीर सम्पूर्ण , द्रश्यमान जगत ,ग्रह-नक्षत्र,तारे,ओर हमारी पृथ्वी आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है । इसलिए वैदिक ऋषियो ने अन्न को ब्रह्म कहा है । अन्न का सात्विक अर्थ है , पृथ्वी का रस, पृथ्वी से जल , अनाज, फल ,ओर घास पैदा होता ।
उन्ही से दूध ,घी ,ओर मास आदि भी बनते । इन सभी से वीर्य , रज बनते । इससे ही देह बढ़ती ओर पृष्ठ होती ओर अंत मे यही पृथ्वी में ही मिल जाती । अन्न से उतपन होने वाला और उसी में जाने वाला यह देह इसी प्रधानता के कारण अन्न मय कोष कहा गया ।
क्रमशः
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......2
जो आत्मा इस शरीर को ही सब कुछ मानकर भोग-विलास में निरंतर रहती है वही तमोगुणी कहलाती है। इस शरीर, इस जड़-प्रकृति जगत से बढ़कर भी कुछ है। जड़ का अस्तित्व मानव से पहले अथार्त प्राणियों से पहले का है।
पहले पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी आकाश) की सत्ता ही विद्यमान थी। इस जड़ को ही शक्ति कहते हैं। इस अन्नमय कोश को प्राणमय कोश ने, प्राणमय को मनोमय, मनोमय को विज्ञानमय और विज्ञानमय को आनंदमय कोश ने ढाँक रखा है।
यह आत्मा की पूर्ण सुप्तावस्था, अधोगति है । फिर जड़ में प्राण,मन,बुद्धि,आदि सुप्त है। इस को पुष्ट ओर शुद्ध करने को ही तरह तरह के प्रावधान है । यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह क्या सिर्फ शरीर के तल पर ही जी रहा है या कि उससे ऊपर के आवरणों में।
किसी तल पर जीने का अर्थ है कि हमारी चेतना या जागरण की स्थिति क्या है जड़ बुद्धि का मतलब ही यही है वह इतना बेहोश है कि उसे अपने होने का होश नहीं जैसे पत्थर और पशु। चिकित्सा पद्धतियों की पहुच स्थूल शरीर तक है ।
जबकी कितने ही रोग ऐसे हैं जो अन्नमय कोश की विकृति के कारण उत्पन्न होते हैं और जिसे चिकित्सक ठीक करने मे प्रायः असमर्थ हो जाते हैं। अन्नमय कोश की स्थिति के अनुसार शरीर का ढांचा और रंग -रूप बनता है | उसी के अनुसार इन्द्रियों की शक्तियां होती हैं ।
शरीर जिस अन्न से बनता, बढ़ता है उसके भीतर सूक्ष्म जीवन तत्व रहता है जो की अन्नमय कोश को बनाता है | जैसे हमारे पांच कोश हैं वैसे ही अन्न मे भी तीन कोश हैं ।
1-स्थूल कोश
2-सूक्ष्म कोश
3-कारण कोश
स्थूल मे स्वाद और भार , सूक्ष्म मे पराजय और गुण तथा कारण कोश मे अन्न का संस्कार होता है। जिह्वा से केवल अन्न का स्वाद मालुम होता है , पेट उसके भार का अनुभव करता है , रस मे उसकी मादकता , उष्णता प्रकट होती है |
अन्नमय कोश पर उसका संस्कार होता।माँस आदि कितने अभक्ष्य पदार्थ ऐसे हैं जो जीभ को स्वादिष्ट लगते हैं ओर भार भी बढ़ता पर उनमे सूक्ष्म संस्कार ऐसा होता है जो अन्नमय कोश को विकृत कर देता है |
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....3
शुद्वि के उपाय ,खानपान ,व्रत योग, व्यायाम कैसे प्रभाव डालते हम पर इसे समझने के लिए हम मानव देह की व्यवस्था को समझते पहले ।योग राजोपनिषद् के अनुसार सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड मनुष्य के नाभि चक्र में समाहित है।
जहाँ से निकलने वाली विद्युतीय तरंगें न केवल शरीर तंत्र को नियंत्रित करती हैं, वरन् समूचे ब्रह्माण्ड में अपने स्तर की हलचलें उत्पन्न करती हैं।नाभि चक्र को कमलाकार बताते हुए कहा गया है कि इससे 24 नाड़ियाँ निकलती हैं ।
जिनमें से दस नाड़ियाँ ऊपर की ओर जाती हैं और शब्द, रस, गंध आदि प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती हैं। दस शिरायें शरीर के निचले भाग को जाती हैं और सम्बन्धित अंग-अवयवों को नियंत्रित करती हैं।
इसके अतिरिक्त चार और नाड़ियाँ निकल कर कई शाखा-प्रशाखाओं में बंट जाती हैं और छोटे-छोटे स्थानों की आपूर्ति करती हैं शक्ति केन्द्र सुषुम्ना में मणि रत्नों की भाँति धागे से जुड़ा होता इसीलिए इसे ‘मणिपूर चक्र’ कहते हैं।
इसे दस पंखुड़ियों वाले कमल पुष्प के रूप में उल्लेख करते हुए कहा है कि यह रुद्र का स्थान है जो समस्त सृष्टि का पोषण करते हैं। इसे विकसित कर लेने पर मनुष्य सभी प्रकार की व्यथाओं एवं कामनाओं पर विजय पा लेता है।
उसमें परकाया प्रवेश,सामर्थ्य आ जाती है। नाभि चक्र सूर्य का अधिष्ठान स्थल होने के कारण तेजस का, ज्ञान शक्ति का केन्द्र है। इस पर सविता का ध्यान करने से आत्म सूर्य अर्थात् अंतर्ज्योति मन की मलिनताएँ तथा विकृतियाँ दूर होती है ।
और जीवन में उच्चस्तरीय उत्साह का संचार होता है।ओजस तेजस की अभिवृद्धि होती है। हमारी वृत्तियों से इसका गहरा सम्बन्ध है। चैतन्य अवस्था में जब यह सक्रिय रहता है, तब भावनाएँ एवं वृत्तियाँ उच्चस्तरीय होती हैं।
मन में प्रसन्नता की, स्फूर्ति की तरंगें प्रवाहित होती रहती हैं। किन्तु संकुचित अवस्था में अशुभ वृत्तियाँ उभरती और मन खिन्न तथा उदास बना रहता है। सामान्य रूप से इस शक्ति केन्द्र में सौरशक्ति का नैसर्गिक प्रवाह सतत होता रहता है।
किन्तु जब कभी मनुष्य अपने स्वयं के चिन्तन, आचरण या क्रिया-व्यवहारों के द्वारा उस प्रवाह में बाधा उत्पन्न कर लेता है।तो जीवन तत्व-प्राण ऊर्जा की कमी के कारण अनेकानेक व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है। नाभि सूर्य का प्रतीक है।
प्राण चेतना की उत्पत्ति इसी केन्द्र से होती है। प्राणायाम एवं सविता साधना द्वारा वस्तुतः सूर्य चक्र का ही जागरण किया जाता है जिससे आत्मा अपना, सम्बन्ध सीधे सूर्य से जोड़कर प्राणाग्नि का विकास करती रहती है।
इस केन्द्र को जाग्रत करने का अर्थ है शक्ति पुँज बन जाना, महाप्राण बन जाना।अग्नि तत्व की प्रधानता होने के कारण यह प्राण शक्ति की प्रबलता का, साहस और वीरता का, संकल्प एवं पराक्रम का भी केन्द्र है। इसका सम्बन्ध निद्रा, भूख, प्यास लगने से है।
भ्रूण विज्ञान के अंतर्गत नाभि संस्थान का विशेष महत्व है। जीवधारी भ्रूणावस्था से लेकर परिपक्व विकसित शिशु बनने तक जितने दिनों गर्भावस्था में रहता है, तब तक वह माता के शरीर के साथ अपने नाभि केन्द्र से एक नलिका द्वारा जुड़ा होता है।
जिसे अम्बिलिकल कार्ड या गर्भनाल कहते हैं।इसके माध्यम से ही जननी की प्राण ऊर्जा, रस-रक्त एवं अन्यान्य पोषक तत्व उसके शरीर में पहुँचते हैं और वह एक बिंदु कलल से विकसित होता हुआ शिशु रूप धारण करता है।
प्रसव के उपरान्त ही शिशु को पृथक इकाई के रूप में अपना-अपना कार्य अपने बल बूते करने का अवसर मिलता है। इससे पूर्व नाभि मार्ग से ही शिशु पोषण प्राप्त करता है।
इसीलिए नाभि केन्द्र को जीवनी शक्ति का, प्राण ऊर्जा का केन्द्र बताया है।वैज्ञानिकों ने इसे दूसरे मस्तिष्क ‘एबडोमिनल ब्रेन’ की संज्ञा दी है कुण्डलिनी जागरण में ‘मणिपूर चक्र’ का विशेष महत्व है।
कुण्डलिनी महाशक्ति का उद्गम स्थल मूलाधार चक्र है, पर उसका उद्गम छह अंगुल ऊँचाई पर नाभि की सीध में है।मूला धार को जो ऊर्जा अपने कार्य संचालन के लिए उपलब्ध होती है, वह वस्तुतः नाभि द्वारा ही बाहर से भीतर तक पहुँचती है।
हमारे पांच कोष भाग .........4
प्रमुख कारण है नाभि में सूर्य का उपस्थित होना।शास्त्रों में इस सम्बन्ध में कहा गया है- पेट में यम और नाभि मंडल में सूर्य विद्यमान है और इसमें संयम करने से भुवन का अर्थात् लोक-लोकाँतरों का ज्ञान प्रा प्त होता है।
सूर्य से सम्बन्धित होने के कारण मणिपुर चक्र की प्रकाश किरणें संपूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाती हैं और शरीर तथा सृष्टि का सारा रहस्य साधक के सम्मुख प्रकट हो जाता है।गर्भ काल में बच्चा जितनी तेजी से बढ़ता है वह आश्चर्य जनक है।
उसे अपने शरीर के अनुपात से इतनी अधिक खुराक की जरूरत पड़ती है जितनी जन्म लेने के उपरान्त फिर कभी नहीं पड़ती। उन सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नाभि मार्ग से ही होती रहती है। गर्भाशय में भ्रूण का पोषण माता के शरीर की सामग्री से होता है।
आरंभ में भ्रूण, मात्र एक बुलबुले की तरह होता है।तदुपरान्त वह तेजी से बढ़ना आरंभ करता है। तब न मुँह खुला होता है और न पाचन यंत्र ही सक्षम होते हैं। पका हुआ, पचा हुआ आहार उस स्थिति में उसे अपनी नाभि द्वारा ही उपलब्ध होता है।
प्रसव के समय जब बालक बाहर आता है तो देखा जाता है कि उसकी नाभि में एक नाल रज्जु ,बँधी है और वह माता को नाभि स्थली के साथ जुड़ी है। उसे काटना पड़ता है तब दोनों अलग होते हैं।
यह नाल ही वह द्वार है जिसके द्वारा माता के शरीर से निकल कर आवश्यक रस द्रव्य बालक के शरीर में निरन्तर पहुँचते।इस दृष्टि से प्रथम मुख नाभि को ही कहा जा सकता है।भ्रूण के फेफड़े गर्भावस्था के नौ महीने प्रायः निष्क्रिय ही रहते हैं।
श्वास प्रश्वास की आवश्यकता माता और भ्रूण के दो जुड़े अवयव पूरी करते हैं। माता के ‘यूटेरस’ में स्थित बच्चे के ‘प्लेसेन्टा’ ही फेफड़े का भी काम करते हैं। जन्म के उपरान्त जैसे ही बालक रोता, हाथ पैर चलाता और साँस लेता है वैसे ही रक्त संचार आरंभ हो जाता है।
नाल काटने पर बच्चे का ‘अम्ब कार्ड’ माता के ‘प्लेसेन्टा’ से कट कर अलग हो जाता है। तब फिर दोनों के बीच बने हुए सम्बन्ध सूत्र का विच्छेद हो जाता है और इस कार्य के सम्पन्न करती रहने वाली ‘अम्ब वेन’ निष्क्रिय हो जाती है।
बच्चे के फेफड़े हृदय आदि ठीक तरह अपना काम करने लगते हैं और उस स्व संचालित प्रक्रिया के सहारे नवजात शिशु की जीवन यात्रा स्वावलंबन पूर्वक जाती है। माता का सहयोग समाप्त हो जाता है।
तब उस केन्द्र की उपयोगिता भी समाप्त हो जाती है। इस के बाद उस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया का केन्द्र नाभि बाह्य दृष्टि से एक सामान्य गड्ढे के रूप में रह जाती है। स्थूल विज्ञान के अनुसार अन्दर उस स्थान के यह सूत्र एकदम निष्प्राण नहीं होते ।
बल्कि जब रोग ग्रस्त हो जाता है । तो उस पर पड़ने वाले रक्त के दबाव को कम करने के लिए यह सूत्र पुनः सक्रिय हो उठते हैं। शरीर के विकास की दृष्टि से नाभि की भूमिका समाप्त हो जाती है किन्तु अध्यात्म विज्ञान की मान्यता इससे भिन्न है।
उसने नाभि को ‘नाभिकीय’ केन्द्र माना है। जिस प्रकार सौर मण्डल का संचालन सूर्य द्वारा होता है उसी प्रकार शरीर का मध्य बिन्दु नाभि है और उसमें नाभिकीय क्षमता विद्यमान् है। मस्तिष्क का सूक्ष्म शरीर का आज्ञाचक्र है।
नाभि केन्द्र के चुम्बकत्व में आदान,प्रदान की उभय पक्षीय क्षमता विद्यमान् है।अनन्त अन्तरिक्ष से आवश्यक शक्ति खींचने और धारण करने अदृश्य एवं अविज्ञान सामर्थ्य प्रदान करने का कार्य इस चुम्बकत्व का ही है।
शरीर को अनेक प्रकार की ऊर्जा चाहिए; जिन्हें वह अपनी चुम्बक शक्ति के द्वारा खींचता है। यदि नाभि चक्र के चुम्बकत्व को साधना योग द्वारा जाग्रत किया जा सके तो उसकी आकर्षण क्षमता सहज हो बढ़ जाएगी ।
और उसकी प्रखरता के आधार पर अदृश्य अनुदान प्राप्त किया जा सकेगा । अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार नाभि चक्र है। इस केन्द्र की उपयोगिता सदा बनी रहती है। दिव्य शक्तियों का शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है।
नाभि कन्द के नीचे कुण्डलिनी शक्ति का निवास है।अष्ट प्रकृति की प्रतीक अष्ट सिद्धियाँ उसमें कुण्डली मारकर बैठी हुई है। रावण किसी शस्त्र से मर नहीं सकता था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत का कुण्ड था।
यह भेद राम को विभीषण ने बताया कि रावण की नाभि में कुण्डलाकार स्थित अमृत को अग्निबाण से सुखा दें, तभी उसकी मृत्यु होगी । राम ने वह कुण्ड सुखाकर रावण मारा। इससे प्रकट है ।
कि शरीर की स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए नाभि चक्र के माध्यम से कितनी बड़ी सफलता प्राप्त की जा सकती आत्म-विद्या के अनुसार नाभि चक्र प्राण सत्ता का ,साहस, पराक्रम एवं प्रतिभा का केन्द्र माना गया है ।
इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण-शक्ति को दिशा नियोजित किया जाता फलतः उसके सत परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं। रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि मज्जा, वीर्य आदि सप्त धातुओं के योग से प्राणी के पिण्डों की उत्पत्ति होती है।
उनमें से नाभि मण्डल में अन्नमय पिण्ड है।नाभि चक्र में यह भौतिक जगत अवस्थित है। ''नाभि चक्र से संयम करने से शरीर की रचना का ज्ञान होता है। पाँच तत्त्वों से निर्मित विद्युत शक्ति का इसमें ध्यान करना चाहिए।
क्रमशः
हमारे पांच कोष भाग ......5
क्या है अन्नमय कोश की शुद्धि के साधन। विकारों की जड़ अन्नमय कोश मे ही होती है | उनका निवारण यौगिक साधनों से हो सकता है । इन साधन के द्वारा अन्न मय कोश को परिमार्जित एवँ परिपुष्ट किया जा सकता है ।
और विविध शारीरिक अपूर्णताओं से छुटकारा पाया जा सकता है। आहार- विहार की शुद्धता तथा उपासना की नियमितता से अन्नमय कोश की साधना आगे बढ़ती है और व्यक्ति स्वस्थ शक्ति सम्पन्न, स्फूर्तिवान बनता है।
इस तथ्य को हमारे ऋषियों ने अनिवार्य समझा था। इसी कारण हर महीने कई उपवासों का धार्मिक महत्व स्थापित किया था अन्नमय कोश की शुद्धि के लिए उपवास का विशेष महत्व है |
शरीर मे भिन्न 96 जाति की ‘ नाड़ी -गुच्छक' देखी जाती हैं। इनकी अधिकता भिन्न -भिन्न प्रकार के रोगों के कारण बनते हैं। वैज्ञानिक इनका कुछ विशेष परिचय अभी प्राप्त नहीं कर पाए हैं , पर योगी लोग जानते हैं।
कि ये शरीर मे अन्नमय कोश की बंधन ग्रंथियां हैं | मृत्यु होते ही सब बंधन खुल जाते हैं और फिर एक भी गुच्छक दृष्टिगोचर नहीं होता। अन्नमय कोश को शरीर से बांधने वाली ये उपत्यिकाएँ शारीरिक एवँ मानसिक अकर्मों मे उलझकर विकृत होती हैं ।
तथा सत्कर्मों से सुव्यवस्थित रहती है । प्रकृति के आदेशों पर चलने वालों की उपत्यिकाएँ आहार विहार का संयम ,सात्विक दिनचर्या तथा कुछ अन्य यौगिक उपाय से सुव्यवस्थित रहती हैं |
ऋतुओं के अनुसार शरीर की 6 अग्नियाँ न्यूनाधिक होती रहती हैं। ऊष्मा , बहुवृच , ह्वादी, रोहिता , आत्पता , व्याती यह 6 शरीरगत अग्नियाँ ग्रीष्म से लेकर बसंत तक 6 ऋतुओं मे क्रियाशील रहती हैं |
1 उत्तरायण , दक्षिणायन की गोलार्ध स्थिति
2- चन्द्रमा की बढ़ती घटती कलाएं
3-नक्षत्रों का भूमि पर आने वाला प्रभाव
4-सूर्य की अंश किरणों का मार्ग ,,इनसे ऋतू अग्नियों का सम्बन्ध है अतः ऋषियों ने ऐसे पुण्य पर्व निश्चित किये हैं जिससे अमुक प्रकार से उपवास करने पर अमुक प्रभाव हो |
उपवासों के पांच भेद हैं ।
आत्मिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप कौन सा उपवास उपयुक्त होगा और उसके क्या नियमोपनियम होने चाहिए इसका निर्णय करने के लिए गंभीरता की आवश्यकता है ।
पाचक ( जो पेट की अपच , अजीर्ण , कोष्ठबद्धता को पचाते हैं )
शोधक ( जो भूखे रहने पर रोगों को नष्ट करते हैं इन्हें लंघन भी कहते हैं )
शामक ( जो कुविचारों , मानसिक विकारों , दुष्प्रवृतियों एवँ विकृत उपत्यिकाओं को शमन करते हैं )
आनस ( जो किसी विशेष प्रयोजन के लिए , दैवी शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किये जाते हैं )
पावस ( जो पापों के प्रायश्चित के लिए होते हैं )
पाचक उपवास मे भोजन तब तक छोड़ देना चाहिये जब तक भूख ना लगे | एक दो दिन का उपवास करने से कब्ज पच जाता है | पाचक उपवास मे नीम्बू का रस या अन्य पाचक औषधि की सहायता ली जा सकती है |
शोधक उपवास के साथ विश्राम आवश्यक है यह लगातार आवश्यक है जबतक रोग खतरनाक स्थिति से अलग हट जाए । शामक उपवास दूध , छाछ फलों का रस आदि पर चलते हैं ।
इसमें स्वाध्याय , मनन , एकांत सेवन , मौन , जप , ध्यान , पूजा , प्रार्थना आदि आत्म शुद्धि के उपचार भी साथ मे करने चाहिए | अनास उपवास मे सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवी शक्ति का आह्वान करना चाहिए |
पावस उपवास मे केवल जल लेना चाहिए और सच्चे ह्रदय से प्रभु से क्षमा याचना करना चाहिए की भविष्य मे वैसा अपराध नहीं होगा | आहार-विहार सम्बन्धी शुद्धता के बिना सूक्ष्म साधनाओं का अभ्यास असम्भव है।
आहार शुद्धि पर इसलिए जोर दिया जाता है कि मन की शुद्धता-अशुद्धता का आधार वही है। यदि अन्न अशुद्ध होगा, तो मन भी अशुद्ध रहेगा और अशुद्ध मन न कभी ध्यान, भजन में एकाग्र होता है।
और न श्रद्धा-विश्वास को ही ग्रहण करता है। मन का परिशोधन अन्न की शुद्धि पर निर्भर है। इसलिए साधना समर में उतरने वाले को सबसे पहले आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ता है।
भोजन स्वाद के लिए ही नहीं, वरन् शरीर रक्षा के लिए ही खाया जाना चाहिए। पेट की थैली को देखते हुए उसमें आधा आहार, चौथाई जल और चौथाई वायु के लिए स्थान रहने देना चाहिए।
अर्थात् भोजन की मात्रा इतनी रहनी चाहिए जिससे पेट पर अनावश्यक भार न पड़े, आलस्य न आवे जल्दी जल्दी नहीं, हीं वरन् धीरे-धीरे अच्छी तरह चबा कर ग्रास की उदरस्थ किया जाय।
क्रमशः
10/02/2024, 4:58 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...6
साधना का प्रथम चरण अन्न की शुद्धि है।अन्नमय कोश की साधना को दो जरूरी बातें हैं। एक सप्ताह में दो दिन नमक, शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन और दूसरा भोजन में एक बार में खाद्य वस्तुओं की संख्या दो तक सीमित रखना ।
अस्वाद व्रत एवं उपवास आत्मिक साधना के आवश्यक अंग हैं। साधक के भोजन में एक समय एक साथ अनेक प्रकार की वस्तुएँ न होनी चाहिए। भोगों को, स्वादों को सीमित करना, मन को वश में करने का, इन्द्रिय निग्रह का एक मात्र उपाय है।
भोजन में जितने अधिक प्रकार वस्तुओं का समावेश किया जायेगा उतनी ही पाचन क्रिया खराब होगी, उतना ही खर्च बढ़ेगा और उतना ही मन चंचल होगा। इसलिए संयम का अवलम्बन करते हुए ही साधना पथ के पथिक को अग्रसर होना पड़ता है।
उपवास का क्रम भी सप्ताह में एक दिन रखना चाहिए। प्रारम्भ में पन्द्रह दिन में एक्र दिन या सप्ताह में आधा दिन का उपवास रख सकते हैं। उपवास के दिन जल पर्याप्त मात्रा में ग्रहण करना आवश्यक है।
इसके साथ नीबू या शहद मिलाकर ले सकते हैं। जिन्हें दुर्बलता प्रतीत होती है, उन्हें शहद का प्रयोग लाभ पहुँचाएगा। नीबू से पाचन संस्थान की सफाई में सहायता मिलेगी।
अन्न के साथ-साथ जल की शुद्धता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। ग्रहण करने की शक्ति जल में अन्न से भी अधिक रहती है, यदि तमोगुणी स्थिति का जल प्रयोग किया जाय तो उससे साधना क्रम में बाधा ही पड़ेगी।
समय का एक क्षण भी बर्बाद न करना, निरन्तर काम में लगे रहना, प्रातःकाल दिनचर्या बना कर उसे पूरा करने में मशीन की तरह लगे रहना तथा उपासना का नियमित क्रम सदैव निभाना ये साधक के आवश्यक कर्तव्य हैं ।
क्रमशः
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......7
दूसरा कोष प्राणमय कोष की शुद्धि प्राणायाम ,बंध और मुद्राओं से की जाती है।उससे पहले हम प्राणों ओर उनके कार्यो को समझना जरूरी है फिर उपाय पर आते प्राण वायु बहुत मूल्यवान है।
असल में, जितनी मात्रा में हम अपने शरीर को प्राणवायु से, आक्सीजन से भर लेंगे उतनी ही स्पीड से हम शरीर के अनुभव से आत्म-अनुभव की तरफ झुक जायेगे क्योंकि शरीर हमारा डेड एंड है।
यानी हमारा वह हिस्सा, जो मर चुका है। इसलिए वह दिखाई पड़ रहा है और आत्मा हमारा वह हिस्सा है जो तरल है, ठोस नहीं ; हवाई है, इसलिए पकड़ में नहीं आता। तो हमारे भीतर जितनी ज्यादा प्राण ऊर्जा होगी।
और जागरण होगा, उतना ही हम इन दोनों के बीच साफ फासला तय कर पाएंगे। प्राणमय कोश की भूमिका को पार करते हुए दस प्राणों को संशोधत करना पड़ता है।
जहां भी प्राणवायु जल रही है, वहां जीवन है। चाहे वह वृक्ष में हो, चाहे मनुष्य में, चाहे दीये में, चाहे सूरज में--कहीं भी हो। तो जितना तुम प्राणवायु को जला सको, उतनी तुम्हारी जीवन की ज्योति प्रगाढ़ हो जाएगी।
मनुष्य शरीर में दस जाति के प्राणों का निवास है । इनमे से पांच को महाप्राण और पांच को लघुप्राण कहते हैं।प्राण, अपान, सामान, उदान, व्यान यह पांच महाप्राण हैं ।
नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय, यह पांच लघुप्राण हैं। पाँच महाप्राणो को ओजस् और पांच लघुप्राणो को रेतस कहते हैं दोनों प्राण एक दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं ।
दोनों नेत्र, दोनों नथुने, दोनों कान, दोनों हाथ पैर एक दूसरे में सहायक एवं साथी है। इसी प्रकार, महाप्राण व् लघुप्राण भी आपस में सम्बद्ध व् सहायक हैं । इनको एक ही प्राण के दो भाग कहा जा सकता है।
एक होते हुए भी कुछ भेदों के कारण मस्तिष्क को अगला व् पिछला दो भागो में बांटा गया है, वैसे ही प्राण तत्वों में भी दो तरह के विभाजन हुए हैं । प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है। नाग भी उसके समीप रहता है।
अपान गुदा और मूत्रेंद्रियो के बिच में मूलाधार के निकट रहता है, उसी के पास कूर्म लघुप्राण का निवास है । समान और कृकल नाभि में रहते हैं । उदान और देवदत्त का स्थान कंठ है।
व्यान और धनञ्जय में आकाश तत्व का अधिक मिश्रण रहने से ये सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहते हैं पर उसका प्रधान केंद्र मस्तिष्क का मध्य भाग है। साधारणतः ऐसा माना जाता है कि प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है ।
अपान से मल मूत्र स्वेद आदि का विसर्जन होता है।समान से पाचन, परिपाक, और उष्णता का संचार होता है।उदान विविध वस्तुएं बाहर से शरीर में ग्रहण करता है। व्यान का काम रक्त संचार है ।
लघु प्राणों में ,नाग से डकार आती है। कूर्म से पलक झपकने के क्रिया होती है। कृकल से छींके और देवदत्त से जम्हाई आती है। धनञ्जय जीवित अवस्था में शरीर का पोषण करता है ।
और मरने पर देह को सड़ा गला कर शीघ्र नष्ट करने का प्रबंध करता है। ये मान्यताएं सर्वांगपूर्ण नहीं है। जिस स्थान पर जिस प्राण का निवास बताया गया है, वहां एक प्रकार के वायु भ्रमर होते हैं , जिनमें प्राणों का विशेष संचार रहता है।
गर्मी के दिनों में जलवायु अधिक गरम हो जाती है तो एक प्रकार के वायु भ्रमर उत्पन्न होते हैं , जो घूमते हुये नाचते हुये अंधड़ की तरह आगे चलते हैं , उसी प्रकार के कुछ भ्रमर शरीर में पाये जाते हैं ।
क्रमशः
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......8
सूक्ष्म निरीक्षण करने पर पता चलता है कि इन स्थानों पर शरीरगत वायु और प्राण की उष्णता के कारण एक प्रकार के भ्रमर चक्र उत्पन्न हो जाते हैं । भ्रमर सदा ऊपर चौड़े होते हैं और नीचे की तरफ ढलवां होते जाते हैं।
तथा अंत में बहुत ही छोटे नोक मात्र हो जाते हैं । ऊपर के सबसे चौड़े भाग को स्तर और नीचे के सबसे नुकीले भाग को बिंदु कहते हैं। इसी प्रकार भ्रमर के ऊर्ध्व भाग को महाप्राण और अधो भाग को लघुप्राण कहा जाता है ।
एक स्तर है तो दूसरा बिंदु। वस्तुतः दोनों एक ही महातत्व के दो विभाग मात्र हैं ।पांच उप प्राण इन्हीं पांच प्रमुखों के साथ उसी तरह जुड़े हुए हैं जैसे मिनिस्टरों के साथ सेक्रेटरी रहते हैं। प्राण का कार्य है--जीवनचक्र चलाना।
प्राण के द्वारा ह्रदय धड़कता है और उसके बाद रक्तसंचार होता है। इसलिए जब नवजात शिशु पैदा होता है, यदि वह नहीं रोता है तो उसे उल्टा कर थाप दी जाती है और जैसे ही बच्चा रोना शुरू करता है, प्राण का संचार उसी पल से शुरू हो जाता है।
उसका ह्रदय धड़कने लगता है और सारा शरीर कार्य करने लगता है। जैसे-जैसे प्राण शिथिल होता जाता है, वैसे/ वैसे जीवनी शक्ति घटती जाती है। प्राण तत्व को ही एक चेतन ऊर्जा (लाइव एनर्जी) कहा गया है।
भौतिक विज्ञान के अनुसार एनर्जी के छह प्रकार माने जाते हैं।
1. ताप (हीट)
2. प्रकाश (लाइट)
3. चुम्बकीय (मैगनेटिक)
4. विद्युत (इलेक्ट्रिकसिटी)
5. ध्वनि (साउण्ड)
6. घर्षण (फ्रिक्शन) अथवा यांत्रिक (मैकेनिकल)।
एक प्रकार की एनर्जी को किसी भी दूसरे प्रकार की एनर्जी में बदला भी जा सकता है। शरीरस्थ चेतन क्षमता /लाइव एनर्जी इन विज्ञान सम्मत प्रकारों से भिन्न होते हुए भी उनके माध्यम से जानी समझी जा सकती है।
एनर्जी के बारे में वैज्ञानिक मान्यता है कि वह नष्ट नहीं होती बल्कि उसका केवल रूपान्तरण होता है। यह भी माना जाता है कि एनर्जी किसी भी स्थूल पदार्थ से सम्बद्ध रह सकती है।
फिर भी उसका अस्तित्व उससे भिन्न है और वह एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में स्थानांतरित (ट्रांसफर) की जा सकती है। प्राण के सन्दर्भ में भी भारतीय दृष्टाओं का यही कथन है।
क्रमशः
11/02/2024, 9:57 am - +91 98877 80007: 🙏
11/02/2024, 10:15 am - स्वर विज्ञान added +91 98556 58786
12/02/2024, 9:14 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग......9
अब हम सभी 5प्राण ओर 5 उप प्राण के कार्ये ओर उनके शुद्ध होने से क्या लाभ होते है उन्हें समझते । प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है । इसका कार्य श्वास-प्रश्वास क्रिया का सम्पादन है।
इस तत्व की ध्यानावस्था में अनुभूति पीले रंग की होती है। और षटचक्र वेधन की प्रक्रिया में यह अनाहत चक्र को प्रभावित करता है। इसका नाम अनाहत चक्र इसलिए है कि यहाँ बाहर से आने वाले प्राण(आक्सीजन )ओर अंदर से वापस आने वाले प्राण (कार्बनडाई साइड) आपस मे टकराते है ।
किन्तु कोई हताहत नही होता इसलिए अनाहत कहते । यह स्थान ह्रदय से थोड़ी दूर होता । प्राण के द्वारा हृदय की धड़कन होती है , फिर उससे रक्त संचार होता है , साँस आ जाती है, इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती है।
प्राण में शिथिलता आने पर जीवनी शक्ति घट जाती है और उसके अत्यंत न्यून होने पर हृदय की धड़कन बंद हो जाती है । प्राण के साथ नाग जुड़े हुए हैं जो डकार का कार्य संचालित करता है।
यह प्राण और अपान के मध्य उत्पन्न रुकावटों को दूर करता है और पाचन तन्त्र में वात (गैस) का बनना रोकता है। डकार को लगातार रोके रखने से हृदय-तन्त्र में गड़बड़ी हो सकती है।
अन्य क्रियाओं में अपचन के कारण मितली को रोकने और समान प्राण के अवरोधों का हल करना सम्मिलित है। समाधि लगाने वाले महात्मा दीर्घ काल तक निस्तब्ध रहते हैं पर जब चाहते हैं ।
तब शरीर में प्राण का स्पंदन बढ़ाकर हृदय का धड़कना आरम्भ कर देते हैं और साधारण जीवन जीने लगते हैं ।जब तक उनका प्राण खींचकर ब्रह्माण्ड में संचित किया रहता है तब तक हृदय की धड़कन बंद रहती है ।
और शरीर मृत्युतुल्य हो जाता है, इसलिए उनको दीर्घ कालीन समाधि का सुख मिलता रहता है । प्राण पर अधिकार प्राप्त किये बिना लंबे समय तक स्थिर समाधि नहीं लग सकती।
प्राण पर अधिकार करके दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखना, मृत्यु को इच्छानुवर्ति बना लेना सम्भव है। एक मनुष्य दूसरे को प्राणदान दे सकता है। जैसे एक मनुष्य का रक्त दूसरे के शरीर में पहुंचाया जा सकता है।
वैसे ही एक का प्राण दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उसे जीवन एवं मनोबल दे सकता है। कुछ निश्चित व्यायाम विधियां विशेष प्राण-शक्ति को सक्रिय करती हैं, ये हैं भस्त्रिका, नाड़ी-शोधन और उज्जायी - प्राणायाम इसके बारे हम आगे बताते ।
क्रमशः
12/02/2024, 9:14 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....10
आइए समझते है महाप्राण अपान ओर उपप्राण कूर्म के कार्ये ओर शुद्धि से उनके लाभ । शुद्धि के उपाय अगली पोस्टो में आते । अपान का स्थूल कार्य मलों का ठीक प्रकार विसर्जन करना है ।
यह नारंगी रंग की आभा में अनुभव किया है और मूलाधार चक्र को प्रभावित करता है। देह के भीतर सदा पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, आदि विजातीय व् त्याज्य पदार्थ को अपान अनेक छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकालता रहता है ।
यदि अपान अपनी क्रिया न करे शरीर में मल निकालने की शक्ति घट जायेगी और अपच, जुकाम आदि रोग पैदा हो जायेंगे।इसके अतिरिक्त अपान की सूक्ष्म क्रिया जननेन्द्रिय में होती है ।
काम वासना का आधार इसी पर निर्भर है।अपान का सहवर्ती कूर्म लघुप्राण यदि सुषुप्त अवस्था में होगा तो, शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भ के स्थापना कभी न हो सकेगी।
रूप सौंदर्य पर नहीं , कामतुष्टि अपान की समानता पर निर्भर करती है। पुरुष में अपान और स्त्री में कूर्म प्रधान होता है दोनों के परस्पर मिलन से एक प्राण ऊर्जा का विस्फोट होता है ।
वो शारीरिक और मानसिक अभावों की पूर्ती करता है और नर-नारी को आकर्षित करने और उन्हें आपस में बांधने का एक महत्वपूर्ण कार्य करता है।
अपान पर अधिकार की पद्धति न जानते जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्रायः किन्ही रोगों से ग्रसित रहते हैं । जिनमे अपान की समानता है , वे अकारण ही आपस में घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं ।
उन्हें एक दूसरे के साथ रहने में बड़ी शांति मिलती है । ऐसे मित्रों को ही प्राणसखा कहते हैं । उन्हें आपसी वियोग मर्मान्तक वियोग देता है। अश्विनि मुद्रा और मूल-बन्ध विधियां अपान प्राण को मजबूत और शुद्ध करने का कार्य करती हैं।
क्रमशः
13/02/2024, 6:32 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग....11
आइए देखे महाप्राण समान ओर उप प्राण कर्कल के कार्य और शुद्वि कर्ण से लाभ । सामान प्राण उदर में नाभि के नीचे रहता है और पाचन इसका प्रमुख कार्य है । यह हरे रंग की आभा और मणिपूर चक्र से सम्बन्धित है।
समान अति महत्त्वपूर्ण प्राण है,येदो मुख्य चक्रों- अनाहत एवं मणिपुर चक्रों को जोड़ता है। गर्मी उष्णता एवं पित्त को समान का प्रतीक कहते हैं । शरीर में चंचलता , स्फूर्ति, उत्साह, छरहरापन, एवं चमक इसी के कारण होती है।
त्वचा की चिकनाई, कोमलता, चमक में कृकल प्राण का अस्तित्व परिलक्षित होता है । खूब भूख लगना, अधिक आहार करना, जल्दी पचा लेना, सर्दी के प्रभाव से व्यथित न होना समान की विशेषता है ।
जिनमे यह प्राण कम होगा, वे सर्दी बर्दाश्त न कर सकेंगे, जाड़ो में उनकी देह लुंज पुंज सी हो जायेगी । कानों को उंगलियो को, पैरों को बड़ी ठण्ड लगेगी, ठन्डे जल में जाड़े के दिनों में स्नान करना उन्हें बड़ा कष्टकर लगेगा।
अधिक कपडे लादे रहने पर भी ठण्ड न छूटेगी । ऐसे लोगो का जरा से भोजन से पेट भर जाता है। गरम पदार्थ खाने की , धुप या अग्नि के निकट बैठने की इच्छा रहती है ।
ऐसे मनुष्य अपनी दुर्बलता के कारण सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर पाते, पर गर्मी का मौसम उनकी प्रकृति के अनुकूल पड़ता है। समान की न्यूनता के कारण शरीर में उष्णता कम रहती है, उसकी पूर्ती गर्म मौसम से हो जाती है।
समान का स्वास्थ्य से बड़ा सम्बन्ध है। स्वादिष्ट पदार्थ, मनोरम दृष्टि, मधुर ध्वनि, सुखद स्पर्श , सुरभित गंध, को भली प्रकार ग्रहण करने और इससे आनंदित होने की क्षमता समान प्राण वालो में होती है।
जिसका समान घट जाता है वह सब प्रकार की सुखद परिस्थितियों के होते हुए भी झुंझलाया हुआ रहेगा, देह का कोई न कोई अंग बीमारी का कष्ट पाता रहेगा।
ऐसे लोगों को सन्निपात, मोतीझरा, आदि तीव्र रोग तो नहीं होते पर जुकाम , खांसी, पेट का भारीपन , सर दर्द, दांतो का हिलना, आँखों की कमजोरी , देह का टूटना, थकान जैसे मंद रोग घेरे रहेगे।
एक से पीछा छूटने से पहले ही नया उत्पन्न हो जायेगा।समान पित्त का प्रतीक है। कृकल कफ का प्रतिनिधि है जिससे छींके आती है। दोनों के मिलने से वात् बनता है ।
छींकने से सिर-दर्द में आराम हो सकता है, क्योंकि यह सिर और गर्दन में ऊर्जा प्रवाह की रुकावटों को दूर कर सुगम कर देता है। छींक को दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे ग्रीवा रीढ़ में कशेरुका प्रभावित हो सकती है।
लोक-कथाओं में कहा जाता है कि जो जोर से और दृढ़तापूर्वक छींकता है, वह दीर्घकाल तक जीवित रहता है। कमजोर छींक कमजोर स्फूर्ति को दर्शाता है। कहा जाता है कि बीमारी की जड़ पेट में है।
इसका अर्थ यही है कि नाभि चक्र के निवासी समान और क्रकल ही हमारे स्वास्थ्य के अधिपति हैं। इन पर अधिकार होने से चिरस्थायी स्वास्थ्य का स्वामित्व प्राप्त होता है ।
समान प्राण को जाग्रत करने की सबसे प्रभावकारी विधि क्रिया योग है। क्रिया योग का अभ्यास पूरे शरीर को गरम करता है। यह समान प्राण के जाग्रत होने से होता है।
क्रमशः
13/02/2024, 6:32 am - स्वर विज्ञान: हमारे महाकोश भाग .....12
उदान’ प्राण का निवास कण्ठ है। यह श्री और समृद्धि का स्थान है। लक्ष्मी जी का केन्द्र कण्ठ- कूप की ‘स्फुटा’ ग्रन्थि को माना गया है। निद्रावस्था तथा मृत्यु के उपरान्त का विश्राम सम्भव करना इसी का काम है।
स्थान कण्ठ, रंग बैगनी तथा चक्र विशुद्ध है। लक्ष्मी जी की पूजा एवं ‘स्फुटा’ के उत्तेजन से निर्मित कण्ठ में स्वर्णाभूषण धारण किये जाते हैं। ‘स्फुटों’ पर धातुओं और रत्नों का जो प्रभाव पड़ता है,।
उसे जानने वाले गले में रत्न, कवच, आभूषण एवं मालायें बनाकर कण्ठ में धारण करते हैं और उनके सूक्ष्म परिणामों से लाभान्वित होते हैं। उदान के परिपूर्ण होने से मनुष्य को वे योग्यताएं, सामर्थ्य, शक्तियां, विशेषताएं, एवं प्रचुरताएं प्राप्त होती हैं।
जिनके कारण सांसारिक, आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती रहती हैं। जिनकी स्फुटा ग्रंथि जाग्रत है, वे कभी भी अभावग्रस्त नहीं रह सकते, उनकी हर उचित आवश्यक्ता समय पर पूरी हो जाती है।
जब तक स्फुटा जागृत रहती है, तब तक बड़ी-बड़ी हानि होने पर भी स्थायी रूप से दरिद्रता नहीं आ सकती। कारण यह है कि स्फुटा में उदान प्राण के सम्पर्क से एक ऐसी चैतन्य स्कुरणा उत्पन्न होती है।
जो अदृश्य लोक में छिपे हुए भविष्य का परिचय पाती रहती है। उसे अज्ञात रूप से अनायास ही ऐसा आभास होता रहता है कि यह करना ठीक है और यह करना अनिष्टकारक होगा।
एक अज्ञात शक्ति उसका पथ प्रदर्शन करती सी मालूम होती है। वह खतरों से बचाती है, आगे बढ़ने का मार्ग बताती है और कठिन परिस्थितियों में सहारा देती है।
उदान द्वारा चैतन्य स्फुटा को शरीर-वासिनी लक्ष्मी कहा जाता है। जिसका कण्ठ-कूप का ‘देवदत्त’ प्रबुद्ध होता है, वह चमत्कारी, परम सिद्ध पुरुष बन जाता है। देवदत्त’ सूक्ष्म प्राण आध्यात्मिकता और सम्प्रदायों का स्वामी है।
अष्ट सिद्धियाँ, नव निद्धियाँ देवदत्त से सम्बन्धित हैं। शाप-वरदान, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, अणिमा, महिमा, लघिमा आदि चमत्कारों का केन्द्र यही है।
अमीर, सम्पन्न, बड़े आदमी, व्यापारी, धनी, लक्ष्मीपति बनना, वैसे घर में जन्म माना, वैसी आकस्मिक सहायताये प्राप्त होना, वैसे अवसर, सुझाव या मित्र मिल जाना उदान-प्राण के शक्तिशाली होने पर निर्भर हैं।
जब यह प्राण निर्बल हो जाता है तो लक्ष्मी विदा होते देर नहीं लगती। ऐसे गलत कदम उठ जाते हैं, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनके कारण घाटे पर घाटा होने लगता है।
चोट पर चोट लगती है और मनुष्य कुछ दिनों में निर्धन एवं दीन-हीन बन जाता है। उदान प्राण वह उच्च आरोही ऊर्जा है, जो हृदय से सिर और मस्तिष्क में प्रवाहित होती है।
उदान प्राण कुण्डलिनि शक्ति के जाग्रत होने पर उसके साथ होती है। उदान प्राण की सहायता से आकाशीय शरीर (पिण्ड) स्वयं को शारीरिक शरीर से अलग कर लेता है। दृढ़ उदान प्राण मृत्यु के चरण को सुगम कर देता है।
उदान के नियन्त्रण से शरीर बहुत हल्का हो जाता है और व्यक्ति में हवा में उठ जाने की योग्यता आ जाती है। जब उदान प्राण हमारे नियन्त्रण में होता है, तब बाह्य बाधाएं जैसे जल, भूमि या पत्थर हमें बाधा नहीं डाल सकते।
योगी जो जंगलों में रहते हैं और गर्मी, सर्दी, कांटों और कीड़ों से प्रभावित नहीं होते, उदान प्राण के नियन्त्रण से ही सुरक्षित रहते हैं।
उज्जायी प्राणायाम, भ्रमरी प्राणायाम और विपरीत करणी मुद्रा के अभ्यास से भी उदान प्राण सक्रिय हो जाता है।इनके बारे आगे बताया जाता ।
क्रमशः
13/02/2024, 6:55 am - +91 98877 80007: 🙏
14/02/2024, 8:15 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......13
हम समझे गे महाप्राण व्यान ओर लघु प्राण धनन्जय के कार्य और शुद्वि से लाभ । व्यान का स्थान मस्तिष्क का मध्य भाग है। यह चार अन्य प्राणों का नियंत्रण करता है। दोनों कानों के बीच एक रेखा खींची जाये ।
और दूसरी रेखा भूमध्य भाग से लेकर सिर के पीछे तक खींची जाये तो दोनों जहाँ मिलेंगी, वह स्थान त्रिकुटी कहा जायेगा। यही ‘ध्यान’ का स्थान माना जाता है। इसका सहायक ‘धनञ्जय’ है।
व्यान को कृष्ण, धनञ्जय को अर्जुन कहते हैं। इसी त्रिकुटी में, युद्धस्थली के मध्य भाग में कृष्णार्जुन सम्वाद रूपी गीता का आविर्भाव होता है। व्यान प्राण मानव शरीर के नाड़ी मार्ग से प्रवाहित होता है।
इसका प्रभाव पूरे शरीर पर और विशेष रूप में नस, नाडिय़ों पर होता है। व्यान-प्राण में कमी से ही रक्त प्रवाह में कमी, नाड़ी संचरण में खराबी और स्नायु संबंधी गति-हीनता होती है।
व्यान प्राण का स्थान सम्पूर्ण शरीर में है; रंग, गुलाबी और चक्र स्वाधिष्ठान है। मध्य मस्तक में शतदल कमल में अवस्थिति जिस अमृतकलश का योगशास्त्रों में वर्णन है, उसे ध्यान और धनञ्जय का प्रसाद ही समझना चाहिये।
व्यान’ के प्रबुद्ध होने से ऋतम्भरा प्रज्ञा मिलती, ऋतम्भरा प्रज्ञा उस उच्च विचारधारा को कहते हैं, जो जीव को आत्मकल्याण की ओर ले जाती है। सत्कर्म ,शुभ-संकल्प, सद्वृत्ति आदि दैवी गुण कर्म स्वभावों का प्रकाश व्यान द्वारा ही होता है।
आत्म-साक्षात्कार ईश्वर-दर्शन, ब्रह्म-प्राप्ति, दिव्य-दृष्टि एवं समाधि का केन्द्र व्यान है। व्यान को गरुड़ कहा गया है। भगवान का वाहन गरुड़ है। जिसका व्यान जागृत हो गया उसके मानस में परमात्मा का प्रत्यक्ष विकास परिलक्षित होने लगता है।
मस्तिष्क में अनेक शक्तियों जिनके कारण मनुष्य अपनी सर्वोपरि प्रधानता सिद्ध करता है। धनन्जय समस्त शरीर को प्रभावित करता है,विशेष रूप से हृदय की मांसपेशियों को - हृदय के वाल्वों को खोल एवं बन्द करके।
मानव शरीर में 4 क्षेत्र ऐसे हैं, जहां प्राण का प्रवाह विशेष रूप में गहन होता है- दोनों पैरों के तलवों व दोनों हाथों की हथेलियों के माध्यम से। पैरों का पृथ्वी तत्व से निकटतम संबंध है ।
और वे ऋणात्मक ध्रुव का प्रतिनिधित्व करते हैं। अत: ध्यान में कभी भी पैरों (चरणों) पर चित्त एकाग्र नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत, हथेलियों की ऊर्जा हृदय से उद्भूत होती है।
इसका संबंध हवा तत्व से है और धनात्मक ध्रुवत्व पैदा करती है। संसार में ऐसे कितने ही महापुरुष हुए हैं, जिनकी अद्भुत मानसिक योग्यता एवं प्रतिभा ने लोगों को हैरत में डाल दिया है।
यह धनञ्जय प्राण के विकास का चमत्कार है। मस्तिष्क में अनेक शक्तियों का निवास है।सभी प्रकार की भली-बुरी ,तुच्छ-महान, शक्तियों का भण्डार मस्तिष्क है।
इस आधार की सुव्यवस्था एवं अव्यवस्था का आधार धनञ्जय प्राण है। यदि उसमें कुछ गड़बड़ी हो तो ऐसे लोग मूर्ख, मन्दबुद्धि चिंतित, दुःखी एवं उलझनों में उलझे रहते हैं।
किसी व्यक्ति का पूर्ण मस्तिष्कीय विकास तभी हो सकता है जब उसका व्यान ठीक हो और उसका मंत्री ‘धनञ्जय’ जागृत होकर काम करे। व्यान प्राण कुंभक (श्वास संग्रह कर रखना) के अभ्यास से सुदृढ़ और सक्रिय होता है।
क्रमशः
14/02/2024, 8:15 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...14
हम शरीर मे प्राणों के कार्य और लाभ का वर्णन कर चुके पिछली पोस्टों में । उनकी शुद्धि प्राणायाम , बंध ओर मुद्राओं से संभव है । इस पोस्ट में हम 9 प्राणायाम का वर्णन कर रहे।
दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण कि शक्ति पर परिपूर्ण अधिकार एवं आत्मिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए प्राण-विद्या’ का जानना आवश्यक है।
जो इस विद्या को जानता है, उसको प्राण सम्बन्धी न्यूनता एवं विकृति के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ दुःख नहीं देती । प्राण विद्या को ही हठयोग भी कहते हैं। हठयोग के अन्तर्गत प्राणायाम, बंध, मुद्रा बताये गये हैं।
(1) अनुलोम-विलोम प्राणायाम;-
सिद्धासन या पद्मासन में मूलबन्ध लगाकर बैठें। मेरुदण्ड को सीधा रखें। भीतर भरी हुई साँस बाहर निकाल दें। अब नासिका से साँस खींचिये और जालंधर बंध लगाकर उड्डियान बंध लगाकर दाहिने नथुने से धीरे-धीरे वायु निकाल दीजिये।
फिर एक सैकण्ड बिना वायु के रहिये, तत्पश्चात् दाहिने नथुने से साँस खींचिये, फिर कुछ देर भीतर साँस रोक कर बाएँ नथुने से उसे बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार दो प्राणायाम हो जाते हैं।
पुनः एक सेकण्ड बाह्य-कुम्भक करके पहिले की भाँति दुहराना चाहिये। इस प्रकार आरम्भ में 10 प्राणायाम करने चाहिये । और प्रति नथुने से रेचक या पूरक करना हो, साँस छोड़ना या खींचना हो ।
तो हाथ की अनामिका और कनिष्ठा उँगलियों से बाएँ नथुने को बन्द कर लें। इसी प्रकार जब बाएँ नथुने से वायु ग्रहण करनी या छोड़नी है तो दाहिने हाथ के अँगूठे से बाएँ हाथ के नथुने को बन्द करें।
(2) सूर्य-भेदन प्राणायाम;-
दाहिने नथुने से वायु खिंचे यथाशक्ति कुम्भक करे और बाएँ नथुने से बाहर निकाल दीजिये। इस प्रकार इस क्रिया को बार-बार करें। यही सूर्य भेदन प्राणायाम है।अनुलोम, विलोम, प्राणायाम में नथुनों से पूरक और रेचक होता है।
परन्तु इसमें एक ही नथुने से (दाहिने में पूरक और बाएँ से रेचक) होता है। इस प्राणायाम से शरीर में उष्णता बढ़ती है, इसलिए यह शीत प्रकृति वालों के लिए अथवा शीत ऋतु में विशेष उपयोगी सिद्ध होता है।
(3) शीतकारी प्राणायाम;-
दोनों नथुने बन्द करके जिह्वा और होठों द्वारा वायु खींचें। यथाशक्ति रोके रहें और फिर धीरे-धीरे दोनों नथुनों से वायु को बाहर निकाल दें।
दाँतों के बीच जिह्वा को बाहर होठों तक निकालकर होठों को फुलाकर मुख के बीच में सीत्कार करते हुए श्वास खींचने की क्रिया प्रधान होने के कारण इसे शीतकारी प्राणायाम कहते हैं।
इस प्राणायाम में जिह्वा के सहारे वायु भीतर प्रवेश करती है। यह प्राणायाम शीतल है इसलिए उष्ण प्रवृति वालों के लिए अथवा ग्रीष्म ऋतु में यह विशेष उपयोगी है।
यह शरीर को निर्विष बनाता है। कहते हैं कि काक भुशुण्डि जी ने इसी विधि से प्राणायाम में सिद्धि प्राप्त की थी।
(4) शीतली प्राणायाम;-
दोनों नथुने बन्द कर दीजिए। होठों को कौए की चोंच की तरह बनाकर जिह्वा को उनमें से थोड़ा बाहर निकाल दीजिए। फिर मुख द्वारा धीरे-धीरे वायु भीतर खींचिए। यथाशक्ति कुम्भक करके दोनों नथुनों से धीरे-धीरे वायु बाहर निकाल दीजिए।
यह शीतली प्राणायाम कहलाता है। यह भी शीतल प्रकृति का है। रूप लावण्य में वृद्धि करता है।
(5) भस्त्रिका प्राणायाम;-
पद्मासन लगाकर बायीं नासिका से वेगपूर्वक जल्दी-जल्दी दस बार लगातार पूरक रेचक कीजिए। कुम्भक करने की आवश्यकता नहीं है।
फिर ग्यारहवीं बार उसी नासिका से लम्बा पूरक कीजिए। यथाशक्ति कुम्भक करने के उपरान्त दाहिने नथुने से धीरे-धीरे वायु को बाहर निकाल दीजिए।
फिर इसी क्रिया को दाहिने-नथुने से दुहुराइये। यह भस्त्रिका प्राणायाम है। आरम्भ में इसे पाँच-पाँच बार से अधिक नहीं करना चाहिये। यह सम-शीतोष्ण है। ब्रह्मग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि तीनों का यह भेदन करता है।
इसके द्वारा सुषुम्ना में से प्राण-तत्व की विहंगम गति ऊर्ध्व-प्रदेश की ओर बढ़ती है। इसी से अग्नितत्व प्रदीप्त होता है।इसे आरम्भ में अधिक संख्या में या अधिक वेग से नहीं करना चाहिये।
(6) भ्रामरी प्राणायाम;-
पद्मासन लगाकर नेत्र बन्द करके बैठिये। भ्रकुटी के मध्य भाग में ध्यान कीजिए। जालंधर बंध लगाइये फिर नाक द्वारा भ्रमर नाद के समान गुञ्जन स्वर करते हुए पूरक कीजिए।
पश्चात् तीन सेकण्ड कुम्भक करके धीरे-धीरे भ्रमर गुञ्जन ध्वनि के साथ रेचक कीजिए। यही भ्रमरी प्राणायाम हैं।
कोई योगी दोनों नासापुटों से वायु खींचने और छोड़ने के पक्ष में है और कोई लोम-विलोम प्राणायाम की भाँति दाएँ-बाएँ नथुनों से इसे करने को अच्छा बताते हैं।
कुम्भक की अवस्था में रुकी हुई वायु को मस्तिष्क मे बायीं ओर से दायीं ओर लगातार कई बार घुमाकर तथा रेचक करते हैं। इस वायु को भ्रमण कराने की क्रिया के कारण तथा भ्रमण-नाद जैसी धनि होने के कारण इस प्राणायाम का नाम भ्रामरी रखा गया है।
यह मन की एकाग्रता एवं प्राण की स्थिरता के लिए लाभदायक है।
(7) मूर्छा प्राणायाम;-
दोनों हाथों के अँगूठे दोनों कानों में, दोनों तर्जनी दोनों आँखों पर, दोनों, मध्यमा नासिका पुटों पर और अनामिकायें तथा कनिष्ठकायें मुख पर रखकर मूल बंध तथा जालंधर बंध को आरम्भ से अन्त तक स्थिर करके बाएँ नथुने से पूरक करें।
यथाशक्ति कुम्भक करके दहिने नथुने से रेचक करें। यह मूर्छा प्राणायाम हुआ। इस प्राणायाम में रेचक करते समय बन्द नेत्रों से भूमध्य भागों में ध्यान करने पर पञ्च तत्वों के रंग दिखाई पड़ते हैं।
शरीर में जो तत्व अधिक होगा, उसी का रंग अधिक दृष्टिगोचर होगा। पृथ्वी का रंग पीला, जल का नीला , अग्नि का लाल, वायु का हरा और आकाश का सफेद होता है। इन तत्वों का शोधन करने से नादानुसंधान तथा समाधि में सुविधा रहती है।
(8) प्लाविनी प्राणायाम;-
पद्मासन से बैठिए। दोनों भुजाओं को ऊपर की ओर लम्बी तथा सीधी रखिए। अब दोनों नथुनों से पूरक कीजिए और सीधा लेट जाइए। लेटते समय दोनों हाथों को समेट कर तकिए की तरह सिर के नीचे लगा लीजिए, कुम्भक कीजिए और जब तक कुम्भक रहे, तब तक भावना कीजिए कि मेरी देह रुई के समान हल्की है।
फिर बैठकर पूर्व स्थिति में आ जाइए और धीरे-धीरे दोनों नथुनों से वायु को बाहर निकाल दीजिए। यह प्लाविनी प्राणायाम है। इनसे ऋद्धियों और सिद्धियों का मार्ग प्रशस्त होता है।
(9)उज्जायी प्राणायाम;-
'उज्जायी' शब्द का अर्थ होता है- विजयी या जीतने वाला। इस प्राणायाम के अभ्यास से वायु को जीता जाता है। योग में उज्जायी क्रिया और प्राणायाम के माध्यम से बहुत से गंभीर रोगों से बचा जा सकता है ।
पहली विधि;-सुखासन में बैठ कर मुंह को बंद करके नाक के दोनों छिद्रों से वायु को तब तक अन्दर खींचें (पूरक करें) जब तक वायु फेफड़े में भर न जाए। फिर कुछ देर आंतरिक कुंभक (वायु को अंदर ही रोकना) करें।फिर नाक के दाएं छिद्र को बंद करके बाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें (रेचन करें)।
वायु को अंदर खींचते व बाहर छोड़ते समय गले से खर्राटें की आवाज निकलनी चाहिए। इस तरह इस क्रिया का पहले 5 बार अभ्यास करें और धीरे-धीरे अभ्यास की संख्या बढ़ाते हुए 20 बार तक ले जाएं।
दूसरी विधि :-कंठ को सिकोड़ कर या कंठ कूप/Throat Follicle में हथेली लगाकर श्वास इस प्रकार लें व छोड़ें की श्वास नलिका से घर्षण करते हुए आए और जाए। इसको करने से उसी प्रकार की आवाज उत्पन्न होगी जैसे कबूतर गुटुर-गूं करते हैं। उस दौरान मूलबंध भी लगाएं।
पांच से दस बार श्वास इसी प्रकार लें और छोड़ें। फिर इसी प्रकार से श्वास अंदर भरकर जालंधर बंध (कंठ का संकुचन) शिथिल करें ।
क्रमशः
15/02/2024, 10:04 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......15
किस प्राणायाम को, किस मात्रा, किस प्रयोजन के लिए, किस प्रकार जागृत किया जाये। इसका निर्णय करना इतना सुगम नहीं है। कारण यह है कि साधक की आन्तरिक स्थिति, सांसारिक परिस्थिति, शरीर का गठन, आयु मनोभूमि, संस्कार आदि के आधार पर ही विचार किया जा सकता है ।
कि उनके लिए वर्तमान स्थिति में किस प्रकार की साधना उपयोगी एवं आवश्यक है। प्राणायाम कोश की सुव्यवस्था करने के लिए साधारणतः बन्ध मुद्रा तथा प्राणायाम की क्रियायें ही प्रयुक्त होती हैं। हम बंध के बारे बता रहे है ।
(1) मूल बंध;-
प्राणायाम करते समय गुदा के छिद्रों को सिकोड़कर ऊपर की ओर खींचे रखना मूल-बंध कहलाता है। गुदा को संकुचित करने से ‘अपान’ स्थिर रहता है। वीर्य का अधः प्रभाव रुककर स्थिरता आती है।
प्राण की अधोगति रुककर ऊर्ध्वगति होती है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में मूल-बंध से चैतन्यता उत्पन्न होती है। आँतें बलवान होती हैं, मलावरोध नहीं होता रक्त-संचार की गति ठीक रहती है।
अपान और कूर्म दोनों पर ही मूल-बंध का प्रभाव रहता है। वे जिन तन्तुओं में बिखरे हुए फैले रहते हैं, उनका संकुचन होने से यह बिखरापन एक केन्द्र में एकत्रित होने लगता है।
2) जालंधर बंध-
मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ-कूप ( कण्ठ में पसलियों के जोड़ पर गड्डा है, उसे कण्ठ-कूप कहते हैं ) में लगाने को जालंधर-बंध कहते हैं। जालंधर बंध से श्वास-प्रश्वास क्रिया परअधिकार होता है।
ज्ञान-तन्तु बलवान होते हैं। हठयोग में बताया गया है कि इस बन्ध का सोलह स्थान की नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। 1-पादांगुष्ठ, 2-गुल्फ, 3-घुटने, 4-जंघा, 5-सीवनी, 6-लिंग, 7-नाभि, 8-हदय, 9-ग्रीवा 10-कण्ठ 11-लम्बिका, 12-नासिका, 13-भ्रू, 14-कपाल, 15- मूर्धा और 16- -ब्रह्मरंध्र।
यह सोलह स्थान जालंधर बंध के प्रभाव क्षेत्र हैं, विशुद्धि चक्र के जागरण में जालंधर बन्ध से बड़ी सहायता मिलती है।
3) उड्डियान बंध-
पेट में स्थित आँतों को पीठ की ओर खींचने की क्रिया को उड्डियान बंध कहते हैं। पेट को ऊपर की ओर जितना खींचा जा सके उतना खींचकर उसे पीछे की ओर पीठ में चिपका देने का प्रयत्न इस बंध में किया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है।जीवनी शक्ति को बढ़ाकर दीर्घायु तक जीवन स्थिर रखने का लाभ उड्डियान से मिलता है। आँतों की निष्क्रियता दूर होती है।
जलोदर, यकृत वृद्धि, बहु मूत्र सरीखे उदर तथा मूत्राशय के रोगों में इस बंध से बड़ा लाभ होता है। नाभि स्थित ‘समान’ और ‘कृकल’ प्राणों से स्थिरता तथा बात, पित्त कफ की शुद्धि होती है।
सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है और स्वाधिष्ठान चक्र में चेतना आने से वह स्वल्प श्रम से ही जागृत होने योग्य हो जाता है।
क्रमशः
15/02/2024, 10:04 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....16
मुद्राओं से ध्यान में तथा चित्त को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है। इनका प्रभाव शरीर की आंतरिक ग्रन्थियों पर पड़ता है। इन मुद्राओं के माध्यम से शरीर के अवयवों तथा उनकी क्रियाओं को प्रभावित, नियन्त्रित किया जा सकता है।
विभिन्न प्रकार के साधना के उपचार क्रमों में इन्हें विशिष्ट आसन, बंध तथा प्राणायामों के साथ किया जाता है। यों तो अनेक मुद्रायें हठयोग के अन्तर्गत वर्णित हैं। अनेक प्रयोजनों के लिए उनका अलग-अलग महत्व है।
उनमें कुछ ध्यान के लिए उपयुक्त हैं, कुछ आसनों की पूरक हैं, कुछ तान्त्रिक प्रयोगों एवं हठयोग के अंगों के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
नभो मुद्रा, महा-बंध शक्तिचालिनी मुद्रा, ताडगी, माण्डवी, अधोधारण ,आम्भसी, वैश्वानरी, बायवी, नभोधारणा, अश्वनी, पाशनी, काकी, मातंगी, धुजांगिनी आदि 25 मुद्राओं का घेरण्ड-सहिता में सविस्तार वर्णन है।
सभी अनेक प्रयोजनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पंचकोश अनावरण प्राणमय कोश के अनावरण में जिन मुद्राओं का प्रमुख कार्य है, उनका वर्णन विवरण निम्न है।
(1)महामुद्रा
(2) खेचरी मुद्रा
(3) विपरीत करणी मुद्रा
(4) योनि मुद्रा
(5) शाम्भवी मुद्रा
(6) अगोचरी मुद्रा
(7 )भूचरी मुद्रा
महामुद्रा;- बाएँ पैर की एडी़ को गुदा तक मूत्रेन्द्रिय के बीच सीवन भाग में लगावें और दाहिना पैर लम्बा कर दीजिए। लम्बे किये हुए पैर के अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़े रहिये।
सिर को घुटने से लगाने का प्रयत्न कीजिए। नासिका के बाएँ छिद्र से साँस पूरक खींचकर कुछ देर कुम्भक करते हुए दाहिने छिद्र से रेचक प्राणायाम कीजिए।
आरम्भ में पाँच प्राणायाम बाईं मुद्रा से करने चाहिये, फिर दाएँ पैर को सकोड़कर गुदा भाग से लगायें और बाएँ पैर को फैलाकर दोनों हाथों से उसका अँगूठा पकड़ने की क्रिया करनी चाहिये।
इस दशा में दाएँ नथुने से पूरक और बाएँ से रेचक करना चाहिये। जितनी देर बाएँ भाग से यह मुद्रा की थी उतनी ही देर दाएँ भाग से करनी चाहिये। इस महा-मुद्रा से कपिल मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी।
इससे अहंकार, अविद्या, भय द्वेष, मोह आदि के पंच क्लेशदायक विकारों का शमन होता है। भगन्दर, बवासीर, सग्रहिणी, प्रमेह आदि रोग दूर होते हैं। शरीर का तेज बढ़ता है और वृद्धावस्था दूर हटती जाती है
खेचरी मुद्रा; जीभ को उलटी करके उसे उलटना और तालू के गड़्ढे में जिह्वा का अग्र भाग लगा देने को खेचरी मुद्रा कहते हैं। तालू के गट्टे भाग में एक पोला स्थान है जिसमें आगे चलकर माँस की एक सूँड सी लटकती है, उसे कपिल कुहर भी कहते हैं।
यही स्थान जिह्वा के अग्रभाग को लगाने का होता है। प्राचीनकाल में जिह्वा को लम्बी करने के लिए कुछ ऐसे उपाय काम में लाये गये थे, जो वर्तमान परिस्थिति में आवश्यक नहीं है।
जिह्वा को इस तरह दुहना जैसे पशु के थन को दुहते है जिह्वा को शहद, कालीमिर्च आदि से सहलाते हुए आगे की ओर सूँतना या खींचना, ३-जीभ के नीचे नाड़ी तन्तुओं को काट देना, ४-लोहे की शलाका से दबा-दबा कर जीभ बढ़ाना।
यह क्रिया देश, काल, ज्ञान की वर्तमान स्थिति के अनुरूप नहीं है। जैसे अब प्राचीनकाल की भाँति हजारों वर्ष तक निराहार तप कोई नहीं कर सकता, वैसे ही खेचरी मुद्रा के लिए जिह्वा बढ़ाने के लिए कष्टसाध्य उपाय भी अब असामयिक हैं।
काली मिर्च और शहद की जिह्वा पर हल्की मालिश कर देने से वहाँ के तन्तुओं में उत्तेजना आ जाती है और उसे पीछे की ओर लौटने में सहायता मिलती है। इस रीति से जिह्वा के अग्रभाग को तालु गह्वर में लगाने का प्रयत्न करना चाहिये।
जिह्वा धीरे-धीरे चलती रहे, जिसमें तालु गह्वर की हल्की सी मालिश होती रहे। भूमध्य भाग में रखनी चाहिये। खेचरी मुद्रा कपाल गह्वर में होकर प्राण-शक्ति का संचार होने लगता है ।
और सहस्रदल कमल में अवस्थित अमृत निर्झर झरने लगता है, जिसके आस्वादन से एक बड़ा ही दिव्य आनन्द आता है। प्राण की उधर्वगति हो जाने से मृत्यु काल में जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर ही प्रयाण करता है।
इसलिए उसे मुक्ति या सद्गति प्राप्त होती है। गुदा आदि अधोमार्गों से प्राण निकलता है, वह नरकगामी तथा मुख, नाक, कान से प्राण छोड़ने वाला मृत्युलोक में भ्रमण करता है।
जिसका जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर जायेगा वह अवश्य ही सद्गति को प्राप्त करेगा। खेचरी मुद्रा द्वारा ब्रह्माण्डस्थित शेषशायी सहस्रदल निवासी परमात्मा से साक्षात्कार होता है। यह मुद्रा बड़ी ही महत्वपूर्ण है।
क्रमशः
15/02/2024, 7:01 pm - +91 98877 80007: क्रिया योग में कोन कोन सी क्रिया है ...🙏
15/02/2024, 7:06 pm - स्वर विज्ञान: मगध जी आप कोई भी क्रिया करना शुरू करते, उसे क्रिया योग ही कहते।
15/02/2024, 7:10 pm - +91 98877 80007: हां जी, समान प्राण को शुद्ध करने के लिए विशेष रूप में कोन सी क्रिया योग करना है, <This message was edited>
15/02/2024, 7:30 pm - स्वर विज्ञान: जी प्रभु प्राणों को शुद्ध नही करना होता। इसे शक्तिशाली बनाना होता, यह मुद्राओं से होता। जैसे आप प्राण और अपान मुद्रा कर रहे ठीक वैसे ही समान मुद्रा होती।
15/02/2024, 8:15 pm - +91 98877 80007: 🙏
16/02/2024, 9:58 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....17
विपरीतकरणी एक संस्कृत शब्द है जिसमें विपरीत का अर्थ होता है उलटा। इस आसन में पैर ऊपर होता है और सिर नीचे। मस्तक को जमीन पर रखकर दोनों हाथों को उसके समीप रखना ।
और पैरों को सीधे ऊपर की ओर उल्टे करना इसे विपरीत करणी मुद्रा कहते हैं। शीर्षासन भी इसी का नाम है। सिर का नीचा और पैर का ऊपर होना इसका प्रधान लक्षण है।
तालू के मूल से चन्द्र नाड़ी और नाभि के मूल से सूर्य नाड़ी निकलती है। इन दोनों के उद्गम स्थान विपरीत-करणी मुद्रा द्वारा सम्बन्धित हो जाते हैं। ऋषि-प्राण और धनप्राण का इस मुद्रा द्वारा एकीकरण होता है।
जिससे मस्तिष्क को बल मिलता है। विपरीतकरणी मुद्रा एक ऐसा योगाभ्यास है जो शरीर के सातों चक्र को सक्रिय करने में अत्यंत मददगार है और कुण्डलिनी जागरण में सहायक है।
इस योगाभ्यास में शरीर अर्ध कंधे पर खड़ा जैसा लगता है। सबसे पहले आप पीठ के बल आराम से लेट जाएं और पैरों को एक साथ रखें। सांस लेते हुए पैरों को सीधे रखते हुए धीरे धीरे ऊपर उठाएं।
हाथों को नितंब के नीचे लाकर नितंब को उठाएं कोहनियां को जमीन पर रखते हुए हाथों से कमर को सहारा दें। धीरे धीरे सांस लें और धीरे धीरे सांस छोड़े। इस स्थिति को कुछ समय के लिए मेन्टेन करें।
फिर लम्बा सांस छोड़ते हुए पैरों को धीरे धीरे नीचे लाएं।यह एक चक्र हुआ।इस तरह आप 3 से 5 चक्र करें।
योनि मुद्रा;- इसे षड्मुखी भी कहते हैं। पद्मासन पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों कान, दोनों हाथ की तर्जानियों से दोनों आँखें, दोनों मध्यमाओं से दोनों कानों के छिद्र और अनामिकाओं से मुँह बन्द कर देना चाहिये।
होठों को कौए की चोंच की तरह बाहर निकाल कर धीरे-धीरे साँस खींचते हुए उसे गुदा तक ले जाना चाहिये। फिर उल्टे क्रम से धीरे-धीरे निकाल देना चाहिये। योनि मुद्रा की यह साधना योग सिद्धि में बड़ी सहायक सिद्ध होती है।
शाम्भवी मुद्रा;- आसन लगाकर दोनों भौहों के बीच में दृष्टि को जमाकर भ्रकुटी में ध्यान करने को शाम्भवी मुद्रा कहते हैं। कहीं-कहीं अधखुले नेत्र और ऊपर चढ़ी हुई पुतलियों से जो शान्त चित्त ध्यान किया जाता है ।
उसे भी शाम्भवी मुद्रा कहा है। भगवान शम्भू के द्वारा साधित होने के कारण इन साधनाओं का नाम शाम्भवी मुद्रा पड़ा है।
अगोचरी मुद्रा;- अगोचरी मुद्रा अथार्त नाक से चार उँगली आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिन्दु पर केन्द्रित करके ध्यान लगाना। ये मुद्रा कई तरह के नाम ध्यान में प्रयोग की जाती है।
अंगूठे के पास वाली दोनों उंगली ..दोनों कानों में इतनी टाइट ,मगर इतनी सहनीय घुसायें कि कान बाहरी आवाज के प्रति साउंडप्रूफ़ हो जाँय ।
अब बीच वाली दोनों बङी उंगली से , दोनों आँखे मूँदते हुये ,थोङा ही टाइट ( ताकि दुखने न लगें ) रखकर दबायें रहें ।शेष बची दोनों उंगलियाँ ,मुँह बन्द करते हुये होठों पर रखकर हल्का सा दबायें रहें।
दोनों अंगूठे .. गर्दन पर या आपकी शरीर की बनाबट के अनुसार जहाँ भी सरलता से आरामदायक स्थिति में रख जाँय ..रख लें । इनके कहीं भी होने से कुछ ज्यादा अंतर नहीं होता ।
अभ्यास करते समय असुविधा और कष्ट महसूस न हो।अब बस अंदर मष्तिष्क के बीचो बीच में स्वत सुनाई देने वाली आवाज को सुनते रहना है। यह बेहद आसानी से हरेक को पहली ही बार में सुनाई देगी ।
शुरू में रथ के पहियों के दौङने की घङघङाहट सुनाई देगी। यह सूर्य का रथ है। इसको काल पहिया या चक्र भी कह सकते हैं। पर एक काल-चक्र दूसरा भी होता हैं। ये आवाज किसी किसी को घर की चाकी चलने से निकलने वाली आवाज जैसी भी सुनाई देती है।
इस रथ की आवाज के बाद ,आपको किसी बाग में चहकती अनेकों चिङियों की आवाज सुनाई देगी। इसके बाद निरंजन यानी रामधुनि यानी ररंकार सुनाई देगा।यही ध्वनि रूपी असली राम का नाम है।
उनमनी मुद्रा;- उनमनी मुद्रा यानी भोंहो के मध्य ध्यान टिकाना। नासिका से चार अंगुल आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिंदु पर केंद्रित करना चाहिए।
शुरूआत करते समय खुली आँखों से कुछ देर तक नाक की नोक को देखते रहें । इससे सुरति एकाग्र होकर स्वतः ही नाक की जङ (बिन्दी या तिलक के ठीक नीचे का स्थान .. भ्रूमध्य के ठीक नीचे) पर पहुँच जायेगी ।
और आपकी आँखे स्वयं बन्द होती चली जायेंगी ।अपने को ढीला छोङ दें और इसके बाद कुछ न करते हुये जो हो रहा है उसको होने दें। कुछ अभ्यास के बाद इसी स्थिति के बीच लेट जाने का प्रयत्न करें।
इसके लिये आरामदायक गद्दे पर अभ्यास करें इसकी सही क्रिया जान लेने पर यह मुद्रा आंतरिक लोकों की सहज यात्रा कराती है । उनमनी याने संसार से उदासीनता का भाव।
उन (यानी प्रभु )मनी (मन लगा देना ) प्रभु से मन लगा देना।कहने का आशय यह है कि ध्यान के समय संसार से उदासीन होकर प्रभु से प्रेम भाव से मन को जोङना।
सहस्त्रार (जो सिर की चोटी वाला स्थान है) में पूर्ण एकाग्रता के साथ मन को लगाने का अभ्यास करने से आत्मा परमात्मा की ओर गमन करने लगती है व्यक्ति ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ने लगता है।
क्रमशः
16/02/2024, 9:58 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....18
अब हम बात करेंगे हमारे तीसरे कोष मनोमय कोष की। बात सांसारिक सफलता की हो या आध्यात्मिक या चमत्कारी सिद्धियों की सब इस मनोमय कोष से अर्जित होती है ।
पहले हम मनोमय कोष के बारे जानेंगे फिर मनोमय कोश की साधनायें तथा सिद्धियाँ अथार्त ध्यान ,त्राटक, जप, और तन्मात्रा साधना के बारे बात करते । क्या है मनोमय कोश का मनोलय योग ।
पंचकोशों में तीसरा मनोमय कोश है। मन में प्रचण्ड प्रेरक शक्ति है।वश में किया हुआ मन भूलोक का कल्प-वृक्ष है।यह सुख प्राप्ति की अनेक कल्पनाएँ किया करता है। मन में जैसी कल्पनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ आकांक्षाएँ, तृष्णाएँ उठती हैं उसी ओर शरीर चल पड़ता है।
मेस्मरेजम, हिम्नोटिज्म, परसन मैग्नेटिज्म ,मेण्टलथैरेपी, आकल्ट साइन्स, मेण्टल हीलिंग, स्प्रिचुअलिज्म और समाधि सुख आदि भी 'मनोबल' का ही एक चमत्कार है।
तन्त्र क्रिया, मन्त्र-शक्ति, प्राण विनियम और चमत्कारी शक्तिया आदि सब एकाग्र मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति के द्वारा ही होते हैं। महाऋषि पातंजलि ने योग की परिभाषा करते हुए कहा कि 'चित्त की वृत्तियों का निरोध करना, रोककर एकाग्र करना ही योग है।
योग साधना ही इसलिए है कि चित्त वृत्तियाँ एक बिन्दु पर केन्द्रित होने लगें तथा आत्मा के आदेशानुसार उनकी गतिविधि हो। इस कार्य में सफलता मिलते ही आत्मा अपने पिता परमात्मा में सन्निहित समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
वश में किया हुआ मन ऐसा शक्तिशाली अस्त्र है कि उसे जिस ओर भी प्रयुक्त किया जायेगा उसी ओर आश्चर्य जनक चमत्कार उपस्थित हो जायेंगे। संकल्प की पूर्ण शक्ति से हमारे पूजनीय पूर्वज परिचित थे।
उस शक्ति के थोड़े-थोड़े भौतिक चमत्कारों को लेकर अनेकों व्यक्तियों ने रावण जैसी उधम मचायी थी, परन्तु अधिकांश योगियों ने मन की एकाग्रता से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड शक्ति को परकल्याण में लगाया था।
अर्जुन को पता था कि मन को वश करने से कैसी अद्भुत सिद्धियाँ मिल सकती हैं। इसलिए उसने गीता में भगवान् क्या से पूछा- ''हे अच्युत्! मन को वश में करने की विधि मुझे बताइये, क्योंकि वह वायु को वश में करने के समान कठिन है।
अर्जुन ने ठीक कहा है कि मन को वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है। वायु को तो यंत्रों द्वारा किसी डिब्बे में बन्द भी किया जा सकता है, पर मन को वश में करने का तो कोई यन्त्र भी नही है।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दो उपाय मन को वश में करने के बताये...
(1) अभ्यास और (2) वैराग्य। अभ्यास का अर्थ है- वे योग साधनायें जो मन को रोकती हैं।वैराग्य का वास्तविक तात्पर्य है- राग से निवृत्त होना.. व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना।
बुरी भावनाओं और आदतों से बचने का अभ्यास करने के लिए ऐसे वातावरण में रहना पड़ता हैं, जहाँ उनसे बचने का अवसर हो। पानी से दूर रहकर तैरना नहीं आ सकता। इसी प्रकार राग- द्वेष जहाँ उत्पन्न होता है ।
उस क्षेत्र में रहकर उन बुराइयों पर विजय प्राप्त करना ही वैराग्य की सफलता है। कोई व्यक्ति जंगल में एकान्तवासी रहे तो नहीं कहा जा सकता कि वैराग्य हो गया क्योंकि जंगल में वैराग्य की अपेक्षा ही नहीं होती।
जब तक परीक्षा द्वारा यह नहीं जान लिया गया कि हमने राग उत्पन्न करने वाले अवसर होते हुए भी उस पर विजय प्राप्त कर ली। तब तक यह नहीं समझना चाहिए कि कोई एकान्तवासी वस्तुत: वैरागी ही है।
प्रलोभन को जीतना ही वैराग्य है और यह विजय वहीं हो सकती है, जहाँ वे बुराइयाँ मौजूदा हों। इसलिए गृहस्थ में, सांसारिक जीवन में सुव्यवस्थित रहकर मन पर विजय प्राप्त करने को वैराग्य कहना चाहिए।
अभ्यास के लिए योगशास्त्रों में ऐसी कितनी ही साधना का वर्णन है, जिनके द्वारा मन की चंचलता, विषय लोलुपता और एषणा प्रवृत्ति को रोककर उसे ऋतम्भरा बुद्धि के, अंतरात्मा के अधीन किया जा सकता है।
इन साधनाओं को मनोलय योग कहते हैं। मनोलय के अंतर्गत चार साधन प्रधान रूप से आते हैं। इन चारों का मनोमय कोश की साधना में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।
1- ध्यान
2- त्राटक
3- जप
4- तन्मात्रा साधना
इनके बारे अगली पोस्टों पर कहते ।
क्रमशः
16/02/2024, 10:05 am - स्वर विज्ञान: नमन सभी को ।
इस ग्रुप में सब सदस्यो को उनकी सहमति से जोड़ा गया है और सबको बताया गया की यह शशुल्क ग्रुप है । दो सी रुपए मासिक सेवा शुल्क देना होगा।
हमने फरवरी माह के सेवा शुल्क के लिए सबको वॉट्सएप पर संदेश भेजा है। किंतु बहुत से सदस्य कोई उत्तर नही दे रहे। अगर कोई नही रहना चाहता तो उनको ग्रुप छोड़ देना चाइए।
अगर रहना चाहते तो नियम से स्वर साधना ग्रुप का मासिक सेवा शुल्क दो सौ रुपए 7082097077 पर ptm अथवा गूगल , फोन पे से जमा कर हमे स्क्रीन शॉट भेज देवे। 🙏
17/02/2024, 8:21 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....19
इस पोस्ट में हम बात करेंगे कि मनोमय कोष की जागृति के लिए ध्यान के बारे । क्या है ''ध्यान''?-
ध्यान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार किसी वस्तु की स्थापना अपने मन:क्षेत्र में की जाती है। चुम्बक पत्थर अपने चारों ओर बिखरे हुए लौहकणो को सब दिशाओं से खींचकर अपने पास जमा कर लेता है।
इसी प्रकार ध्यान द्वारा मन सब ओर से खींचकर एक केन्द्र बिन्दु पर एकाग्र होता है, बिखरी हुई चित्त-प्रवृतियाँ एक जगह सिमट जाती हैं। कोई आदर्श, लक्ष्य इष्ट निधारित करके उसमें तन्मय होने को ध्यान कहते हैं।
जैसा ध्यान किया मनुष्य वैसा ही बनने लगता है।साँचे में गीली मिट्टी को दबाने से वैसी आकृति बन जाती है, जैसी उस साँचे में होती है। कीट-भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है।
भृंग, झींगुर को पकड़ ले जाता है और उसके चारों ओर लगातार गुंजन करता है। झींगुर इस गुंजन को तन्मय होकर सुनता है और भृंग के रूप को उसकी चेष्टाओं को एकाग्र भाव से निहारता है।
झींगुर का मन भृंगमय हो जाने से उसका शरीर भी उसी ढाँचे में ढलना आरम्भ हो जाता है। उसके रक्त, माँस, नस, नाड़ी, त्वचा आदि में मन के साथ ही परिवर्तन आरम्भ हो जाता है ।
और थोड़े समय में वह झींगुर मन से और शरीर से भी असली भृंग के समान बन जाता है। इसी प्रकार ध्यान शक्ति द्वारा साधक का सर्वागपूर्ण काया-कल्प होता है।
साधारण ध्यान से मनुष्य का शरीर परिवर्तन नहीं होता। इसके लिए विशेष रूप से गहन साधनाएँ करनी पड़ती हैं। परन्तु मानसिक काया-कल्प करने में हर मनुष्य ध्यान साधना से भरपूर लाभ उठा सकता है।
ऋषियों ने इस बात पर जोर दिया है कि हर साधक को इष्टदेव चुन लेना चाहिए। इष्टदेव चुनने का अर्थ है- जीवन का प्रधान लक्ष्य निर्धारित करना। इष्टदेव उपासना का अर्थ है- उस लक्ष्य में अपनी मानसिक चेतना को तन्मय कर देना।
इस प्रकार की तन्मयता का परिणाम यह होता है कि मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एक बिन्दु पर एकत्रित हो जाती हैं। एक स्थानीय एकाग्रता के कारण उसी दिशा में सभी मानसिक शक्तियाँ लग जाती हैं।
फ्लस्वरूप साधक के गुण, स्वभाव, विचार उपाय एवं काम अद्भुत गति से बढ़ते हैं, जो उसे अभीष्ट लक्ष्य तक सरलतापूर्वक स्वल्प काल में ही पहुँचा देते हैं। इसी को इष्ट सिद्धि कहते हैं।
यहाँ किसी को भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं। अनेक देवताओं का कोई स्वतन्त्र आधार नहीं है। ईश्वर एक है। उसकी अनेक शक्तियाँ ही अनेक देवों के नाम से पुकारी जाती हैं।
ध्यान साधना के लिए ही आदर्शो को दिव्य रूपधारी देवताओं के रूप में मानकर उनमें मानसिक तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है। ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने के लिए दस ध्यान है वे सभी आन्तर-त्राटक हैं इनके बारे हम अगली पोस्टो पर बताते ।
क्रमशः
17/02/2024, 8:21 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....20
इस पोस्ट में हम कई तरह के ध्यान का वर्णन करेंगे जो सुगम एवं सर्वोपरि हैं। जो सरल हैं और प्रतिबन्ध रहित हैं। इनके लिए किन्हीं विशेष नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं होती।
जब चित्त शान्त हो तो, इन ध्यानों में से, अपनी रुचि के अनुकूल ध्यान किया जा सकता है। इन ध्यानों में मन को संयत, एकाग्र करने की बड़ी शक्ति है। साथ ही उपासना का आध्यात्मिक लाभ भी मिलने से यह ध्यान दुहरा हित साधन करते हैं।
ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने की, वश में करने की विधि के लिए दस ध्यान नीचे दिये जा रहे हैं.. वे सभी आन्तर-त्राटक हैं। चिकने पत्थर की या धातु की सुन्दर-सी इष्टदेव की प्रतिमा लीजिए।
उसे एक सुसज्जित आसन पर स्थापित कीजिए। प्रतिदिन उसका जल, धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प आदि मांगलिक द्रव्यों पूजन कीजिए। इस प्रकार नित्य-प्रति पूजन आरम्भिक साधकों के लिए श्रद्धा बढ़ाने वाला मन की प्रवृत्तियों को इस ओर झुकाने वाला होता है।
साधक में अरुचि को हटाकर रुचि उत्पन्न करने का प्रथम सोपान, यह पार्थिव पूजन ही है। मन्दिरों में मूर्ति पूजा का आधार यह प्राथमिक शिक्षा के रूप में साधना का आरम्भ करना ही है।
पूर्व को ओर मुँह करके, आसन पर बैठिए। सामने इष्टदेव का चित्र रख लीजिए। विशेष मनोयोगपूर्वक उसकी मुखाकृति या अंग-प्रत्यंगों को देखिये। फिर नेत्र बन्द कर लीजिए।
ध्यान द्वारा उस चित्र की बारीकियाँ भी ध्यानावस्था में भली-भाँति परिलक्षित होने लगेंगी। इस प्रतिमा को मानसिक साष्टाग प्रणाम कीजिए और अनुभव कीजिए कि उत्तर में आपको आर्शीर्वाद प्राप्त हो रहा है।
एकान्त स्थान में सुस्थिर होकर बैठिए। ध्यान कीजिए कि निखिल नील आकाश में और कोई वस्तु नहीं है, केवल एक स्वर्णिम वर्ण का सूर्य दिशा में चमक रहा है। उस सूर्य को ध्यानावस्था में मनोयोगपूर्वक देखिए।
उसके बीच में इष्टदेव की धुँधली-सी छवि दृष्टिगोचर होगी, अभ्यास से धीरे-धीरे यह छवि स्पष्ट दिखने लगेगी।भावना कीजिए कि इस सूर्य की स्वर्णिम किरणें मेरे नग्न शरीर पर पड़ रही हैं ।
और वे रोमकूपों में होकर प्रवेश हुई आभा से देह के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म अंगों को अपने प्रकाश से पूरित कर रही है । दिव्य तेजयुक्त,अत्यन्त सुन्दर, इतनी जितनी कि आप अधिक-से-अधिक कल्पना कर सकते हों।
आकाश में दिव्य वस्त्रों, आभूषणों से सुसज्जित इष्टदेव का ध्यान कीजिए। किसी सुन्दर चित्र के आधार पर ऐसा ध्यान करने की होती है। इष्टदेव के एक-एक अंग को विशेष मोनोयोगपूर्वक देखिए।
उसकी मुखाकृति, चितवन, मुसकान, भाव-भंगिमा पर विशेष ध्यान दीजिए।इष्टदेव अपनी अस्पष्ट वाणी, चेष्टा तथा संकेतों द्वारा आपके मन:क्षेत्र में नवीन भावों का संचार करेंगे।
शरीर को बिल्कुल ढीला कर दीजिए। आराम कुर्सी, मसनद या दीवार का सहारा लेकर, शरीर की नस-नाडि़यों को निर्जीव की भाँति शिथिल कर दीजिए। भावना कीजिए कि सुन्दर आकाश में अत्यधिक ऊँचाई पर अवस्थित ध्रुव तारे से निकल कर एक नीलवर्ण की शुभ्र किरण सुधा धारा अपनी ओर चली आ रही है ।
और अपने मस्तिष्क या हृदय में ऋतुम्भरा बुद्धि के रूप में ..तरणतारिणी प्रज्ञा के रूप में प्रवेश कर रही है। उस परम दिव्य परम प्रेरक शक्ति को पाकर अपने हृदय और मस्तिष्क में सद्विचार उसी प्रकार उमड़ रहें है ।
जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा उमड़ते हैं।वह ध्रुव तारा जो इस धरा में प्रेरक है ...सत्लोकवासी इष्टदेव ही है और भावना कीजिए कि आप उनकी गोद में खेल और क्रीड़ा कर रहे हैं।
मेरुदण्ड को सीधा करके पद्मासन से बैठिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। भू-मध्य भाग (भृकुटी) में शुभ्र वर्ण दीपक की लौ के समान दिव्य ज्योति का ध्यान कीजिए।
यह ज्योति विद्युत की भांति क्रियाशील होकर अपनी शक्ति से मस्तिष्क क्षेत्र में बिखरी हुई अनेक शक्तियों का पोषक एवं जागरण कर रही है ऐसा विश्वास कीजिए।
भावना कीजिए कि आपका शरीर एक सुन्दर रथ है। उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी घोड़े जुते हैं। इस रथ में दिव्य तेजोमय इष्टदेव विराजमान हैं और घोड़ों की लगाम उसने अपने हाथ में थाम रखी है।
जो घोड़ा बिचकता है वह चाबुक से उसका अनुशासन करते है ।और लगाम झटककर उसको सीधे मार्ग पर ठीक रीति से चलने में सफल पथ-प्रदर्शन करते है। घोड़े भी इष्टदेव के अंकुश को स्वीकार करते हैं।
हृदय स्थान के निकट, सूर्य चक्र में सूर्य जैसे छोटे प्रकाश की ध्यान कीजिए यह आत्मा का प्रकाश है। इसमें इष्टदेव की शक्ति मिलती है और प्रकाश बढ़ता है। इस बढ़े हुए प्रकाश में आत्मा से वस्तु स्वरूप की झाँकी होती आत्मा साक्षात्कार का केन्द्र यह सूर्य चक्र है।
ध्यान कीजिए कि चारों ओर अन्धकार है। उसमें होली की तरह पृथ्वी से लेकर आकाश तक प्रचण्ड तेज जाज्वल् यमान हो रहा है। उसमें प्रवेश करने से अपने शरीर का प्रत्येक अंग, मन: क्षेत्र से उस परम तेज के समान अग्निमय हो गया है ।
अपने समस्त पाप-ताप, विकार-संस्कार जल गये हैं और शुद्ध सच्चिदानन्द शेष रह गया है।
क्रमशः
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18/02/2024, 10:06 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....21
इस पोस्ट में हम मनोमय कोष की शुद्वि के लिए त्राटक को समझते । त्राटक क्या है?--‘त्रि’ और ‘टकटकी बंधने’ से मिलकर बना शब्द त्राटक वास्तव में त्र्याटक है, जिसके विश्लेषण में कहा गया है ।
कि जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर अपनी नजर और मन को बांध लेता है, तो वह क्रिया त्राटक कहलाती है। उस वस्तु को कुछ समय तक देखने पर द्वाटक और उसे लगातार लंबे समय तक देखते रहना ही त्राटक है।
इसके लिए दृष्टि की शक्ति को जाग्रत करते हुए मजबूत बनानी होती है। यह क्रिया हठ योग के अंतरगत आती है। यह कहें कि त्राटक से किसी वस्तु को अपलक देखते रहने की अद्भुत शक्ति हासिल होती है।
ऐसी स्थिति में एकाग्रता आती है और मन का भटकाव नहीं होने पाता है। त्राटक साधना से अगर शरीर की सुप्त शक्तियां जागृत हो जाती हैं और निर्मल-निरोगी काया में सम्मोहन, आकर्षण और वशीकरण जैसे भाव भी समाहित हो जाते हैं।
इस अनुसार त्राटक का वास्तविक रूप अपनी चेतना को भटकने से रोकने के संघर्ष में जीत हासिल कर लेती है।त्राटक भी ध्यान का एक अंग है या त्राटक का ही एक अंग ध्यान है।
“त्राटक” तीन प्रकार के होते हैं ।
1-आन्तर त्राटक-
किसी भी आसन में बैठकर या श्वासन में लेटकर, भूमध्य, ह्रदय की धड़कन या किसी “वस्तु-विशेष” का “मानसिक ध्यान” ”आन्तर-त्राटक” कहलाता है।
नेत्र बन्द करके किसी एक वस्तु पर भावना को जमाने और उसे आन्तरिक नेत्रों से देखते रहने की क्रिया आन्तर-त्राटक कहलाती है।
मैस्मरेजम के ढंग से जो लोग अन्तर-त्राटक करते हैं वे केवल प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करते हैं। इससे एकांगी लाभ होता है। प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करने से मन तो एकाग्र होता है, पर उपासना का आत्म-लाभ नही मिल पाता।
इसलिए भारतीय योगी सदा ही आन्तर-त्राटक का इष्ट ध्यान के रूप में प्रयोग करते रहे हैं। आन्तर-त्राटक को योगी इस प्रकार करते हैं कि दीपक की अग्नि-शिखा, सूर्य-चन्द्रमा आदि कोई चमकता प्रकाश पन्द्रह सैकण्ड खुले नेत्रों से देखा, फिर आँखें बन्द कर ली और ध्यान किया कि वह प्रकाश मेरे सामने मौजूद है।
एकटक दृष्टि से मैं उसे घूर रहा हूँ तथा अपनी सारी इच्छा शक्ति को तेज नोंकदार कील की तरह उसमें घुसाकर आर-पार कर रहा हूँ।त्राटक के अभ्यास के लिए स्वस्थ नेत्रों का होना आवश्यक है।
जिनके नेत्र कमजोर हों या कोई रोग हो, उन्हें बाह्य-त्राटक की अपेक्षा आन्तर-त्राटक उपयुक्त है ।
2-मध्य त्राटक;-
किसी 1×1 के सफेद कागज के बीचों बीच I रूपये के सिक्के के आकार का गोला बनाये व उसमेें चटकीला काला रंग भर दें या फिर “शक्ति-चक्र” का चित्र बना कर उसे अपनी आंखों के सामने दिवार पर इस प्रकार टांगे कि गोला आंखों के ठीक सामने पड़े।
आंखों व उस गोले के बीच में ढाई से तीन फिट की दूरी रखें। गोले को ‘एकाग्र’ मन से तब तक देखे, जब तक आंखों में पानी न आ जाये।आंखों में पानी आने के बाद उस दिन का अभ्यास बन्द कर दें।
उसके बाद नेत्रों को शीतल जल से धोयें। कुछ दिनों तक लगातार अभ्यास करते रहने से, बिन्दु या “शक्ति-चक्र” पर हिलता-डुलता प्रकाश दिखायी देने लगता है। चारों ओर रंग-बिरंगे प्रकाश की किरणें भी दिखाई देने लगती है।
साधक को केवल बिन्दु या “शक्ति-चक्र” पर पड़ रहे प्रकाश पर ध्यान एकाग्र करना है। जितना प्रकाश गहरा होता जायेगा, साधक की एकाग्रता भी उतनी ही बढ़ती जायेगी।
3-बाह्य त्राटक;-
इस त्राटक में चन्द्रमा या किसी विशेष तारे का, उदय होते हुए सूर्य का, या किसी पहाड़ की चोटी, या पेड़ की फुनगी पर द्रष्टि जमा कर अभ्यास किया जाता है।
प्रारम्भ में अभ्यास 2-3 मिनट तक करें, धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाये।बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्य-साधकों के आधार पर मन को वश में करना एवं चित्त प्रवृत्तियों का एकीकरण करना है।
मन की शक्ति प्रधानतया नेत्रों द्वारा बाहर आती है। दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर उसमें 'मन को तन्मयतापूर्वक प्रवेश कराने से नेत्रों द्वारा चुम्बकत्व पैदा हो सकता है।
इससे एक तो एकाग्रता बढ़ती है। दूसरे नेत्रों का प्रवाह चुम्बकत्व बढ़ जाता है। ऐसी बढ़ी हुई आकर्षण शक्ति वाली दृष्टि को 'बेधक-दृष्टि' कहते हैं जिससे किसी व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है।
मैस्मरेजम करने वाले अपने नेत्रों में त्राटक द्वारा ही इतना विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर लेते हैं कि उसे जिस किसी शरीर में प्रवेश कर दिया जाय, वह तुरन्त बेहोश एवं वशवर्ती हो जाता है।
मैस्मरेजम द्वारा सत्संकल्प, दान, रोग निवारण, मानसिक त्रुटियों का परिमार्जन आदि लाभ हो सकते हैं और उससे ऊँची अवस्था में जाकर अज्ञात वस्तुओं का पता लगाना, अप्रकट बातों को मालूम करना ।
आदि कार्य भी हो सकते हैं।परन्तु दुष्ट प्रकृति के बेधक दृष्टि वाले अपने दृष्टि तेज से कहीं स्त्री-पुरुषों के मस्तिष्क पर अपना अधिकार करके उन्हें भ्रमग्रस्त कर देते हैं।
आन्तर-त्राटक और बाह्य-त्राटक दोनों का उद्देश्य मन को एकाग्र करना है।कोई भी व्यक्ति अपनी प्रबल इच्छा शक्ति के जरिए त्राटक साधन की अद्भुत सिद्धियां हासिल कर सकता है।
अगली पोस्टो में हम त्राटक साधना का वर्णन करेंगे ।
क्रमशः
18/02/2024, 10:06 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......22
इस पोस्ट में हम त्राटक साधना और बिंदु ओर ज्योति त्राटक को समझे गे। आन्तर-त्राटक और बाह्य-त्राटक दोनों का उद्देश्य मन को एकाग्र करना है।कोई भी व्यक्ति अपनी प्रबल इच्छा शक्ति से त्राटक साधन की अद्भुत सिद्धियां हासिल कर सकता है।
मन की एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बताई गई अनेकों योग पद्धतियों में त्राटक साधना को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। इसके लिए व्यक्ति में असीम श्रद्धा, धैर्य और मन की शुद्धता का होना जरूरी है। यह कई तरह से किया जा सकता है। जिसमें ज्योति त्राटक, बिंदु त्राटक और दपर्ण त्राटक मुख्य हैं।
1-बिंदु त्राटकः-
यह त्राटक साधना का एक असान तरीका है, जिसके द्वारा इस क्रिया की शुरुआत की जाती है। इसके लिए किसी वस्तु, जैसे पेंसिल, फूल या कोई छोटी वस्तु को एकटक देखकर साधना की जाती है। यह एक ऐसी साधना है, जिसे सिद्ध करने वाले व्यक्ति में ऐसी शक्ति आ जाती है कि वह अपने विचारों से दूसरों के मन में पहुंच जाता है और वह व्यक्ति वशीभूत हो जाता है।
इसतरह से वशीकरण होने पर दूसरों के मनोभावों या विचारों को पढ़ा-समझा जा सकता है। इसकी मुख्य बात यह है कि इसके लिए किसी भी तरह के तंत्र-मंत्र संबंधी अनुष्ठान आदि नहीं किए जाते हैं।
यह एक तरह से आभासी ज्ञान, वशीकरण की अद्भुत शक्ति, प्रभाव, तेज और आत्मविश्वास को बढ़ा देता है।इसके लिए एक वर्गफूट के आकार का एक सफेद कागज लें, जो ड्राईंग पेपर हो सकता है।
उसके बीच में काली स्याही से भरा हुआ तीन इंच व्यास का एक वृत बना लें। उस पेपर को अपने बैठने वाले आसन के सामने करीब तीन फीट की दूरी लिए हुए कमरे की दीवार पर इस तरह से टांग दें कि उसका वृत्त आपकी आंखों के ठीक सामने रहे।
कमरे में हल्की रोशनी का होनी चाहिए। इस प्रयोग को रात्रि के समय शांत वातावरण में करने से अच्छा रहता है। उस वृत्त पर तब तक दृष्टि जमाए रहें जबतक कि उसपर कोई चमकीली न दिखने लगे।
अर्थात ज्यों-ज्यों एकाग्रता बढ़ेगी, त्यों-त्यों वृत्त का कालापन खत्म होता चला जाएगा और एक स्थिति ऐसी भी आएगी जब वह एकदम से गायब ही हो जाएगा।
इस अभ्यास को प्रतिदिन पंद्रह मिनट तक करते हुए लगातार 51 दिनों तक करने के बाद त्राटक साधना की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस दौरान मन में बाहरी विचारों को नहीं आने देना चाहिए।
2-ज्योति त्राटक ;-
इसकी सिद्धि रात्रि या घुप्प अंधेरे में प्रतिदिन करीब एक निश्चित समय पर बीस मिनट तक कर प्राप्त की जा सकती है। इस साधना के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा या अशांति नहीं पैदा होनी चहिए।
ढीलेढाले परिधानों में आसन लगाकर करीब तीन फुट की दूरी पर एक दीपक या मोमबत्ती को जलाकर उपासना की जानी चाहिए। ध्यान रहे दीपक या मोमबत्ती की लौ में हवा या दूसरी वजहों से कंपन नहीं होने पाए या वह ध्यान के बीच में ही बुझे नहीं।
उसे लौ की ज्योति या कहें मधुर प्रकाश पुंज को स्थिर आंखों से एकाग्रता के साथ देखना चाहिए। आंखों की पलकें नहीं झपकनी चाहिए। ऐसा तबतक करना चाहिए, जबतक कि आंखों में किसी भी तरह की पीड़ा या असहनशीलता की स्थिति नहीं आए।
इस सिलसिले को प्रतिदिन जारी रखने पर ज्योति का तेज बढ़ता हुए ऐहसास होगा। कुछ दिनों के बाद तो साधना के दौरान ज्योति के प्रकाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखेगा।
साथ ही प्रकाश पुंज में संकल्पित कार्य या व्यक्ति का स्वरूप दिखेगा, तो उस आकृति के अनुरूप घटित घटनाओं से आंखों की गजब के तेज की अनुभूति होगी और मनोवांछित कार्यों में सफलता मिलेगी।
इस तरह से मिलने वाली सिद्धि सकारात्मक कार्यों के लिए हो तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। एक मान्यता के अनुसार सिद्ध योगियों में दृष्टिमात्र से ही अग्नि उत्पन्न करने की क्षमता त्राटक सिद्धि से ही हासिल होती है।
क्रमशः
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....23
इस पोस्ट में हम समझते दर्पण त्राटक ओर अन्य त्राटक के बारे ।
दर्पण त्राटकः- इस तरीके में दर्पण का उपयोग किया जाता जिसमें अभ्यास के दौरान चेहरा नहीं दिखता है।इस साधन के दौरान व्यक्ति की स्थिति गहन ध्यान अर्थात शून्य मे विचरण की होती है ।
और उसके द्वारा विचारी जाने वाली बातें साकार होने लगती हैं। इस साधना को संपन्न करने वाला व्यक्ति के चेहरे पर जहां तेज और आत्मविश्वास झलकता है, वहीं लंबे समय तक विचारशून्य बना रहता है।
वह किसी को भी आसानी से सम्मोहित या वशीभूत कर लेता है। इसके अभ्यास के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। दर्पण का आकार दस इंच लंबा और छह इंच चौड़ा होना चाहिए।
यानि कि उसमें नजदीक से केवल चेहरा दिखने लायक हो। उसके सामने इस तरह से बैठना चाहिए ताकि दर्पण में सिर्फ आपकी दोनों आंखों की पुतली ही दिखाई दे।
दर्पण को एकटक से निहारते समय अपनी सांसों को नियंत्रित रखना चाहिए। उसमे उतार-चढ़ाव आने से एकाग्रता भंग हो सकती है। यदि आपकी सांस एकदम रूकी हुई तो इससे आपकी वैचारिकता में स्थिरता आने की संभावना प्रबल हो जाती है।
दर्पण में दिखने वाली सिर्फ पुतली पर ही ध्यान देना चाहिए, न कि दर्पण की फ्रेम या आस-पास की दीवारों पर। यह त्राटक लंबे समय तक प्रभावकारी रह सकता है।
इस दौरान समय का अंदाजा लगाना मुश्किल है।दर्पण त्राटक से आत्मविश्वास, विचार शून्यता, सम्मोहन और प्राण ऊर्जा के अभ्यास किए जा सकते हैं।
अन्य त्राटकः- एक फुट लम्बे-चौड़े दर्पण के बीच रूपये के सिक्के के आकार के बराबर काले रंग के कागज का एक गोल टुकड़ा काटकर, चिपका दिया जाता है। उस कागज के मध्य में सरसों के बराबर पीला बिन्दु बनाते हैं।
इस बिन्दु पर दृष्टि स्थिर करते हैं। इस अभ्यास को एक एक मिनट बढ़ाते जाते हैं। जब इस तरह की दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब और भी आगे का अभ्यास शुरू हो जाता है। दर्पण पर चुपके हुए कागज को छुड़ा देते हैं ।
और उसमें अपना मुँह देखते हुए अपनी बाई आँरव की पुतली पर दृष्टि जमा कर लेते हैं और उस पुतली में ध्यानपूर्वक अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं। दृष्टि को स्थिर करने पर देखेंगे कि उस काले गोले में तरह-तरह की आकृतियों पैदा होती हैं।
कभी वह सफेद रंग का हो जायेगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, कभी चिन्गारियाँ-सी उड़ती दीखेगी, कभी बादल से छाये हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार यह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा।
किन्तु जैसे-जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू हो जायेगी। उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जायेंगी और बहुत देर तक देखते रहने पर भी गोला ज्यों का ज्यों बना रहेगा।
2 - गो घृत का दीपक जलाकर नेत्रों की सीध में चार फुट की दूरी पर रखिए। दीपक की लौ आध इन्च से कम उठी हुई न हो इसलिए मोटी बत्ती डालना और पिघला हुआ घृत भरना आवश्यक है।
बिना पलक झपकाये इस अग्नि-शिखा पर दृष्टिपात कीजिए और भावना कीजिए कि आपके नेत्रों की ज्योति दीपक की लौ से टकराकर उसी में घुली जा रही है।
3- प्रातःकाल के सुनहरे सूर्य पर या रात्रि को चन्द्रमा पर भी त्राटक किया जाता है। सूर्य या चन्द्रमा जब मध्य आकाश में होंगे तब त्राटक नहीं हो सकता।
कारण कि उस समय तो सिर ऊपर को करना पड़ेगा या लेटकर ऊपर को आँखें करनी पड़ेगी, यह दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं। इसलिए उदय होता सूर्य या चन्द्रमा ही त्राटक के लिए उपयुक्त माना जाता है।
साधना का कमरा ऐसा होना चाहिए कि जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अंधेरा। न अधिक सर्दी हो, न गर्मी। पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखते हुए बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान हो उस पर दृष्टि जमाओ।
चित्त की सारी भावनायें एक़त्रित करके, उस बिन्दु को इस प्रकार देखो, मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है।
कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगेगा और पानी बहने लगेगा, तब अभ्यास बन्द कर दो।अभ्यास के लिए प्रातःकाल का समय ठीक है। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आँखें थक जाती हैं और पानी आ जाता है।
पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है प्रतिदिन उससे एक या आधी मिनट बढा़ते जाओ।त्राटक साधन के लिए खुद को नियमों से बंधना होगा, तो इस उगते सूर्य, मोम बत्ती या दीपक की लौ, कोई यंत्र, दीवार या सफेद कागज पर बना बिंदु आदि को देखकर किया जा सकता है।
इससे आंखों और मस्तिष्क के भीतर गर्मी बढ़ जाती है और अधिक देर तक करने से आंखों से आंसू तक निकल आते हैं। इस स्थिति में अभ्यास थोड़े समय के लिए रोक देना चाहिए।
अपनी सुविधा स्थिति या रुचि के अनुरूप इन त्राटकों में से किसी को चुन लेना चाहिए और उसे नियत समय पर नियमपूर्वक करते रहना चाहिए मन एकाग्र होता है और दृष्टि में बेधकता, पारदर्शिता एवं प्रभावोत्पादकता की अभिवृद्धि होती है।
त्राटक पर से उठने के पश्चात् गुलाब जल से आँखों को धो डालना चाहिए। गुलाब जल न मिले तो स्वच्छ छना हुआ ताजा पानी भी काम में लाया ला सकता है।आँख धोने के लिए छोटी काँच की प्यालियाँ सुविधाजनक होती हैं।
पानी भरके उसमें आँख खोलकर डुबाने और पलक हिलाने से आँख धुल जाती हैं। इस प्रकार के नेत्र स्नान से त्राटक के कारण उत्पन्न हुई आँखों की उष्णता शान्त हो जाती है।
त्राटक का अभ्यास समाप्त करने के उपरान्त साधना के कारण बढ़ी हुई मानसिक गर्मी के समाधान के लिए दूध, दही, लस्सी, मक्ख्न, मिश्री, फल, शर्बत, ठण्डाई आदि कोई ठण्डी पौष्टिक चीजें, ऋतु का ध्यान रखते हुए सेवन करनी चाहिए।
जाड़े के दिनों में बादाम की हलुआ, च्यवनप्राश आदि वस्तुएँ भी उपयोगी होती हैं। पित्त-प्रकृति’ वाले व्यक्तियों को ‘सूर्य-त्राटक’ (उगते हुए सूर्य का ध्यान) तथा कफ-प्रकृति’ वाले व्यक्तियों को ‘चंद्र त्राटक’ नहीें करना चाहिए।
क्रमशः
स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .......24
मनोमय कोश स्थिति एवं एकाग्रता के लिए जप का साधन बड़ा ही उपयोगी है। इसकी उपयोगिता इससे निर्विवाद है कि सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय इसकी आवश्यकता को स्वीकार करते हैं।
जप करने से मन की प्रवृत्तियों को एक ही दिशा में लगा देना सरल हो जाता है। उदाहरण के लिए एक बार एक मनुष्य ने किसी भूत को सिद्ध कर लिया। भूत बड़ा बलवान था उसने कहा ।
मैं तुम्हारे वश में आ गया ठीक है, जो आज्ञा होगी सो करूँगा, मुझसे बेकार नहीं बैठा जाता है। यदि बेकार रहा तोआपको ही खा जाऊँगा। यह मेरी शर्त अच्छी तरह समझ लीजिए।
उस आदमी ने भूत को बहुत काम बताये, उसने थोड़ी थोड़ी देर में सब काम कर दिये। भूत की बेकारी से उत्पन्न होने वाला संकट उस सिद्ध को बेतरह परेशान कर रहा था। तब वह दुःखी होकर अपने गुरु के पास गया।
गुरु ने सिद्ध को बताया कि आँगन में एक बाँस गाढ़ दिया जाय और भूत से कह दो कि जब तक दूसरा काम न बताया जाया करे, तब तक उस बाँस पर बार-बार चढ़े और बार-बार उतरे।
यह काम मिल जाने पर भूत से काम लेते रहने की भी सुविधा हो गई और सिद्ध के आगे उपस्थिति रहने वाला संकट हट गया। मन ऐसा ही भूत है, जो जब भी निरर्थक बैठता है, तभी कुछ- न- कुछ खुराफात करता है।
इसलिए यह जब भी काम से छुट्टी पावे तभी इसे जप पर लगा देना चाहिए। जप केवल समय काटने के लिए ही नहीं है, वरन् वह एक बड़ा ही उत्पादक एवं निर्माणात्मक, मनोवैज्ञानिक श्रम है।
निरन्तर पुनरावृत्ति करते रहने से मन में उस प्रकार का अभ्यास एवं संस्कार बन जाता है, जिससे वह स्वभावत: उसी ओर चलने लगता है। पत्थर को बार-बार रस्सी की रगड़ लगने से उसमें गड्ढा पड़ जाता है।
निरन्तर अभ्यास से मन भी ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि अपने दीर्घकाल तक सेवन किए गये कार्यक्रम में अनायास ही प्रवृत्त हो जाता है। एक-एक बूँद जमा करने से घड़ा भर जाता है।
चींटी एक-एक दाना ले जाकर अपने बिलों में मनों अनाज जमा कर लेती है। जप में भी वही होता है। माला का एक-एक दाना फेरने से बहुत जमा हो जाता है। इसलिए योग ग्रन्थों में जप को, यज्ञ बताया गया है।
गीता के अध्याय 10 श्लोक 25 में कहा गया है कि 'समस्त यज्ञों में जप-यज्ञ श्रेष्ठ हैं। अन्य यज्ञों में हिंसा होती है, पर जप-यज्ञ में नहीं होती। जितने कर्म, यज्ञ, दान तप हैं, जप-यज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं होते।
समस्त पुण्य साधना में जप-यज्ञ सर्वश्रेष्ठ हैं।'' इस प्रकार जप, मन को वश में करने का रामवाण अस्त्र है और मन को वश में करना इतनी बड़ी सफलता है कि उसकी प्राप्ति होने पर जीवन को धन्य माना जा सकता है।
समस्त आत्मिक और भौतिक सम्पदायें, संयत मन से ही उपलब्ध की जाती हैं। जप मन को वश में करने एवं मनोमय कोश को सुविकसित करने में बड़ा महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है।
जप-यज्ञ के सम्बन्ध में कुछ आवश्यक जानकारियाँ;-
जप के लिए प्रातःकाल एवं सर्वोत्तम काल है। दो घण्टे रात में रहने से सूर्योदय तक ब्रह्म-मुहूर्त कहलाता है। सूर्योदय से दो घण्टे दिन चढ़े तक प्रातःकाल होता है।
प्रातःकाल से भी ब्रह्म-मुहूर्त अधिक श्रेष्ठ है।सन्ध्या को जप करना हो, तो सूर्य अस्त से एक घण्टा उपरान्त तक जप समाप्त कर लेना चाहिए। जप के लिए पवित्र, एकान्त स्थान चुनना चाहिए।
मन्दिर, तीर्थ, बगीचा, जलाशय आदि एकान्त के शुद्ध स्थान जप के लिए अधिक उपयुक्त हैं। घर में यह करना हो, तो भी ऐसी जगह चुननी चाहिए जहाँ अधिक खटपट न हो।
जप के लिए शुद्ध वस्त्रों से बैठना चाहिये। सामान्य स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है पर किसी विवशता ऋतु प्रतिकूलता या अस्वस्थता की दशा मुँह धोकर या गीले कपड़ों से शरीर पोंछकर भी काम चलाया जा सकता है।
नित्य धुले वस्त्रों की व्यवस्था न हो सके तो रेशमी या ऊनी वस्त्रों से काम लेना चाहिए। जप के लिए बिना बिछाये न बैठना चाहिये। कुश का आसन, चटाई आदि घास के बने आसन अधिक उपयुक्त हैं।
पशुओं के चमड़े, मृगछाला आदि आजकल उनकी हिंसा से प्राप्त होते हैं, इसलिए वे निषिद्ध हैं।पद्मासन में पालती मारकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए जप के लिए बैठना चाहिए। मुँह प्रात: पूर्व की ओर सायंकाल पश्चिम की ओर रहे।
माला जपते समय सुमेरु (माला के प्रारम्भ का सबसे बड़ा केन्द्रीय दाना का) उल्लंघन न करना चाहिए। एक माला पूरी करके उसे मस्तिष्क तथा नेत्रों से लगाकर पीछे की तरफ उल्टा ही वापिस कर लेना चाहिये।
इस प्रकार माला पूरी होने पर हर बार उलट कर ही नया आरम्भ करना चाहिए। लम्बे सफर में, स्वयं रोगी हो जाने पर, किसी रोगी की सेवा में संलग्न होने पर, जन्म- मृत्यु का सूतक लग जाने पर स्नान आदि पवित्रताओं की सुविधा नहीं रहती है।
ऐसी दशा में मानसिक जप चालू रखना चाहिये। मानसिक जप बिस्तर पर पड़े-पड़े, रास्ता या किसी भी पवित्र, अपवित्र दशा में किया जा सकता है जप इस प्रकार करना चाहिए कि कण्ठ से ध्वनि होती रहे।
होठ हिलते रहें परन्तु समीप बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को न सुन सके। मल-मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य कार्य के लिये साधना के बीच में ही उठना पड़े तो शुद्ध जल से साफ होकर तब दुबारा बैठना चाहिये।
जपकाल में यथासम्भव मौन रहना उचित है। कोई बात कहना आवश्यक हो तो इशारे से कह देनी चाहिये।जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में इष्टदेव को, प्रकाश ज्योति का ध्यान करते रहना चाहिए।
साधक का आहार तथा व्यवहार सात्विक होना चाहिये। मन शुद्ध होना चाहिये।
मनोमय कोष की जागृति के लिए तन्मात्रा साधना महत्वपूर्ण है इस पोस्ट से हम समझते। तन्मात्रा साधना क्या है ।
हमारा शरीर एवं समस्त संचार तन्त्र पंचतत्वों का बना हुआ है। पृथ्वी, जल, वायु अग्नि और आकाश इन पाँच तत्वों की मात्रा में अन्तर होने के कारण विविध आकार प्रकार और गुणधर्म की वस्तुएँ बन जाती हैं।
पाँच तत्वों की जो सूक्ष्म शक्तियाँ हैं, इनकी इन्द्रियजन्य अनुभूति को 'तन्मात्रा' कहते हैं। शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। यह पाँच तत्वों से बने हुए पदार्थों के संसर्ग में आने पर जैसा अनुभव करती हैं।
उस अनुभव को 'तन्मात्रा' नाम से पुकारते हैं। शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श ये पाँच तन्मात्राएँ हैं। परमात्मा ने पंच तत्वों में तन्मात्रायें उत्पन्न कर और उनके अनुभव के लिये शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ बनाकर, शरीर और संसार को आपस में घनिष्ठ आकर्षण के साथ सम्बद्ध कर दिया है।
यदि तत्वों में तन्मात्रायें होती पर शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ न होतीं तो जैसे वायु में फिरते रहने वाले कीटाणु केवल जीवन धारण ही करते हैं उन्हें संसार में किसी प्रकार की रसानुभूति नहीं होती।
इसी प्रकार मानव-जीवन भी नीरस हो जाता है।इन्द्रियों की संवेदना-शक्ति और तत्वों की तन्मात्रायें मिलकर प्राणी को ऐसे अनेक शारीरिक और मानसिक रस अनुभव कराती जिनके लोभ से वह जीवन धारण किये रहता है।
इस संसार को छोड़ना नहीं चाहता। उसकी यह चाहना ही जन्म-मरण के चक्र में भव-बन्धन में बँधे रहने के लिए बाध्य करती है। पाँच इन्द्रियों के खूँटे से, पाँच तन्मात्राओं के रस्सों से जीव बँधा हुआ है।
यह रस्से बड़े ही आकर्षक हैं,खूँटे चाँदी सोने के बने हुए हैं, उनमें हीरे जवाहरात जगमगा रहे हैं। जीवन रूपी घोड़ा इन रस्सों से बँधा है। वह बन्धन के दुःख को भूल जाता है और खूँटों की सुन्दरता को देखकर छुटकारे की इच्छा तक करना छोड़ देता है। उसे वह बन्धन भी अच्छा लगता है।
इसी बुद्धि की अदूरदर्शिता की, वास्तविकता न समझने को शास्त्रों में अविद्या माया, भ्रान्ति आदि नियमों को पुकारा गया है। और इस भूल से बचने के लिए अनेक प्रकार की धार्मिक कथा, उपासनाओं एवं साधनाओं का विधान किया गया है।
वास्तव में, मन स्वयं एक इन्द्रिय है। उसका लगाव सदा तन्मात्राओं की ओर रहता है। मन का विषय ही रसानुभूति है। साधनात्मक रसानुभूति में उसे लगा दिया जाय तो वह अपने विषय में भी लगता है ।
और जो सूक्ष्म परिश्रम करना पड़ता है उसके कारण अति सूक्ष्म मनःशक्तियों का जागरण होने से अनेक प्रकार के मानसिक लाभ भी होते हैं। पाँचों तन्मात्राओं की छोटी- सरल साधनायें करने से बुद्धि यह अनुभव कर लेती है ।
कि शब्द रूप रस, गंध, स्पर्श का जीवन को चलाने में केवल उतना ही उपयोग है, जितना मशीन के पुर्जों में तेल का। इनमें आसक्त होने की आवश्यक नहीं है।आकाश की तन्मात्रा 'शब्द' है। वह कान द्वारा हमें अनुभव होता है।
कान भी आकाश तत्व की प्रधानता वाली इन्द्रिय हैं।इसी प्रकार वायु की तन्मात्रा 'स्पर्श' का ज्ञान त्वचा को होता है। त्वचा में फैले हुए ज्ञान तन्तु दूसरी वस्तुओं का ताप, भार, घनत्व उसके स्पर्श की प्रतिक्रिया का अनुभव कराते हैं।
अग्नि तत्व की तन्मात्रा 'रूप' है। यह अग्नि- प्रधान इन्द्रिय नेत्र द्वारा अनुभव किया जाता है। रूप को आँखें देखती हैं। जल तत्व की तन्मात्रा 'रस' है। रस का जल-प्रधान इन्द्रिय जिह्वा द्वारा अनुभव होता है।
षटरसों का खट्टे, मीठे, खारी, तीखे, कड़ुवे, कसैले का स्वाद जीभ पहचानती है। पृथ्वी तत्व की तमन्मात्रा 'गन्ध' को पृथ्वी गुण प्रधान नासिका इन्द्रिय मालूम करती है।पंच ज्ञानेन्द्रियों के पाँच प्रकार की पंच तन्मात्राओं की साधनायें इस प्रकार हैं ।
1-शब्द साधना- आकाश तत्व
2-स्पर्श साधना- वायु तत्व
3- रूप साधना- अग्नि तत्व
4-रस साधना - जल तत्व
5-गंध साधना- पृथ्वी तत्व
इन सब साधनाओ को हम विस्तार से अगली पोस्टो में बताएंगे ।
क्रमशः
20/02/2024, 10:54 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग....26
आज हम मनोमय मय कोष के लिए पंचतत्वों की तन्मात्रा साधना के आकाश तत्व की शब्द साधना का वर्णन करेंगे शब्द साधना के लिए एकान्त स्थान में जाइये जहाँ किसी प्रकार शब्द या कोलाहल न होते हों।
बाहर के शब्द भी न सुनाई पड़ते हों। रात्रि को जब चारों ओर शांति हो जाती हो तब साधना के लिए बड़ा अच्छा अवसर मिलता है। दिन में करना हो तो कमरे के किवाड़ बन्द कर लेना चाहिए ताकि बाहर से शब्द भीतर न आवें।
शांत चित्त से पद्मासन लगाकर बैठिये। नेत्र बन्द कर लीजिए। एक छोटी घड़ी कान के पास ले जाइये और उसक टिक-टिक की ध्यानपूर्वक सुनिये। अब धीरे-धीरे घड़ी को कान से दूर हटाते जाइये ।
और ध्यान देकर उसकी टिक-टिक को सुनने का प्रयत्न कीजिए। घड़ी और कान की दूरी को बढ़ाते जाइये। धीरे धीरे अभ्यास से घड़ी बहुत दूर रखी होने पर भी टिक-टिक कान में आती रहेगी।
बीच में जब ध्वनि प्रभाव शिथिल हो जाय, तो घड़ी कान के पास लगाकर कुछ देर तक उस ध्वनि को अच्छी तरह सुन लेना चाहिए और फिर दूर हटा कर सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से उस शब्द प्रवाह को सुनने का प्रयत्न करना चाहिए।
घड़ियाल में एक चोट मारकर, उसकी आवाज को बहुत देर तक सुनते रहना और फिर बहुत देर तक उसे सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से सुनने का प्रयत्न करना। जब पूर्व ध्यान शिथिल हो जाय ।
तो फिर घड़ियाल में हथौड़ी मारकर, फिर उस ध्यान को ताजा कर लेना, इसी साधना का 'मुष्टि योग' नाम से योग ग्रन्थों में वर्णन है।
किसी झरने के निकट या नहर की झील के निकट जाइये जहाँ प्रपात का शब्द हो रहा हो। शान्त चित्त से इस शब्द प्रवाह को कुछ देर सुनते रहिए। फिर कानों को उँगली डालकर बन्द कर लीजिए ।
और सूक्ष्म कणन्द्रिय द्वारा उस ध्वनि को सुनिये। बीच में जब शब्द शिथिल हो जाय तो उँगली ढीली करके उसे सुनिये और कान बन्द करके फिर उसी प्रकार ध्यान द्वारा ध्वनि ग्रहण कीजिए।
इन शब्द साधनाओं में लगे रहने से मन एकाग्र होता है। साथ ही सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय जाग्रत होती है, जिनके कारण दूर बैठकर बात करने वाले लोगों के शब्द सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय में आ जाते हैं।
आगे चलकर यही साधना 'कर्ण पिशाचिनी' सिद्धि के रूप में प्रकट होती है। कहाँ क्या हो रहा है, किसके मन में क्या विचार उठ रहा है, किसकी वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा वाणियाँ क्या-क्या कर रही हैं ।
भविष्य में क्या होने वाला है ? आदि बातों को कोई शक्ति सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय में आकर इस प्रकार कह जाती है मानो कोई अदृश्य प्राणी कान पर मुँह रखकर सारी बात कह रहा है। इस सफलता को 'कर्ण पिशाचिनी सिद्धि' कहते हैं।
अगली पोस्ट में हम स्पर्श साधना का वर्णन करते ।
क्रमशः
20/02/2024, 4:01 pm - +91 90110 36142: This message was deleted
20/02/2024, 4:43 pm - +91 90110 36142: गुरुजी आपने मुझे अपनी पीछली बार बात हुए तभी एक उपाय बताया था उससे मुझे बोहोत राहत मीली है . मेरा चढाई पे दम लगना कम हुवा है सास फुलना कम हुवा है और प्राणायाम मै भी दिक्कत हो रही थी श्वास की वजह से वो भी धीरे धिरे कम हो रही है .. स्फूर्ती और ऊर्जावान मेहसुस हो रहा है . ध्यान व्यायाम और प्रणायाम मै सहायक है .. आपका अनेक अनेक धन्यवाद आभार ..🙏🏻🙏🏻🙏🏻 शतशः नमन गुरु चरणों मै 🔱ॐ नम: शिवाय
21/02/2024, 6:42 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....27
आज हम मनोमय कोष की जागृति के लिए पंचतत्व की तन्मात्रा साधनाओ में स्पर्श साधना का वर्णन करते। स्पर्श साधना के लिए बर्फ या कोई अन्य शीतल वस्तु शरीर पर एक मिनट लगा कर फिर उसे उठावें ।
और दो मिनट तक अनुभव करें कि वह ठण्डक मिल रही है। किसी समतल भूमि पर एक बहुत ही मुलायम गद्दा बिछाकर उस पर चित्त लेटे रहिये, कुछ देर तक उसकी कोमलता का स्पर्श सुख अनुभव करते रहिये।
इसके बाद बिना गद्दा की कठोर जमीन या तख्त पर लेट जाइये। कठोर भूमि पर पड़े रहकर कोमल गद्दे के स्पर्श की भावना कीजिए फिर पलटकर गद्दे पर आ जाइये और कठोर भूमि की कल्पना कीजिए।
इस प्रकार भिन्न परिस्थिति में भिन्न वातावरण की भावना से तितिक्षा की सिद्धि मिलती है। स्पर्श- साधना की सफलता से शारीरिक कष्टों को हँसते-हँसते सहने की शक्ति पैदा होती है।
योगीजन मरुस्थल की तपती गर्मी में ऊपर गर्म कंबल ओढ़ सहज बैठे रहते । पसीना नही आता और सर्द बर्फ में बिना कपड़ों के बैठते तो ठंड नही लगती। यह सब मन को साधने से संभव हो पाता।
उदाहरण के लिए भीष्म पितामह उत्तरायण सूर्य आने की प्रतीक्षा में कई महीने वाणों से छिदे हुए पड़े रहे थे। तिल तिल बाण लगे थे कष्ट से चिल्लाना तो दूर वे उपस्थित लोगों को बड़े ही गढ़ विषयों का उपदेश देते रहे।
ऐसा करना उनके लिए तभी सम्भव हो सका जब उन्हें तितिक्षा की सिद्धि थी अन्यथा हजारों बाणों में छिदा होना तो दूर एक सुई या काँटा लग जाने पर लोग होश हवास भूल जाते हैं ।
स्पर्श- साधना से चित्त की वृत्तियाँ एकाग्र होती हैं और उनके अतिरिक्त तितिक्षा की सिद्धि भी साथ में हो जाती है जिससे कर्मयोग एवं प्रकृति प्रवाह से शरीर को होने वाले कष्टों को भोगने से साधक बच जाता है।
वश में किया हुआ मन सबसे बड़ा मित्र है वह सांसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार के अनेक ऐसे अद्भुत उपहार निरन्तर प्रदान करता रहता है जिन्हें पाकर मानव- जीवन धन्य हो जाता है।
अनियन्त्रित मन अनेक विपत्तियों की जड़ है। अग्नि जहाँ रखी जायेगी उसी स्थान को जलावेगी। जिस देह में असंयत मन रहेगा उसमें नित नई विपत्तियों, कठिनाइयाँ, आपदायें, बुराइयाँ बरसती रहेंगी।
इसलिए मनोमय कोश को सुव्यवस्थित कर लेना मानो तीसरे बन्धन को खोल लेना है।आत्मोन्नति की तीसरी कक्षा पार कर लेना है। अगली पोस्ट में हम रूप साधना का वर्णन करते ।
क्रमशः
21/02/2024, 6:42 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....28
आज हम पंच तत्व की तनमन्या साधनाओ में रूप साधना का वर्णन करेंगे । रूप साधना के लिए माता सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी या श्रीराम, श्रीकृष्ण, आदि इष्टदेव का जो सबसे सुन्दर चित्र या प्रतिमा मिले, उसे लीजिए।
एकान्त स्थान में ऐसी जगह बैठिये जहाँ पर्याप्त प्रकाश हो, चित्र या प्रतिमा के अंग-प्रत्यंगों को मनोयोगपूर्वक , खूब बारीकी के साथ देखिये। एक मिनट इस प्रकार देखने के बाद नेत्रों को बन्द कर लीजिये।
अब उस चित्र के रूप का ध्यान कीजिए जो विशेषताएँ अथवा सुन्दरताएँ चित्र में देखी थीं उन सबको कल्पना शक्ति द्वारा ध्यान के चित्र में आरोपित कीजिए। फिर नेत्र खोल लीजिए और छवि को ध्यान से देखिए ।
इस प्रकार बार-बार करने से वह रूप मन में बस जायेगा। ओर दिव्य नेत्रों से दर्शन करते बड़ा आनन्द आवेगा। धीरे धीरे इस चित्र की मुखाकृति बदलती मालूम देगी, हँसती नाराज होती, उपेक्षा करती हुई भावभंगीमा दिखाई देगी।
यह प्रतिमा स्वप्न में अथवा जागृति अवस्था में, नेत्रों के सामने आवेगी और कभी ऐसा अवसर आ सकता है, जिसे प्रत्यक्ष साक्षात्कार कहा जा सके।आरम्भ में यह साक्षात्कार धुंधला होता है।
फिर धीरे-धीरे ध्यान सिद्ध होने से वह छवि अधिक स्पष्ट होने लगती है। पहले दिव्य दर्शन ध्यान क्षेत्र में ही रहता है, फिर प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगता है।
किसी मनुष्य के रूप का ध्यान, जिन भावनाओं के साथ, प्रबल मनोयोगपूर्वक किया जायेगा, उन भावनाओं के अनुरूप उस व्यक्ति पर प्रभाव पड़ेगा।
किसी के विचारों को बदलने, द्वेष मिटाने मधुर संबन्ध उत्पन्न करने, बुरी आदतें छुड़ाने, आशीर्वाद या शाप से लाभ हानि पहुँचाने आदि के प्रयोग इस साधना के आधार पर होते हैं ।
छाया पुरुष की सिद्धि भी रूप-साधना का एक अंग है। शुद्ध शरीर और शुद्ध वस्त्रों से तथा बिना भोजन किये मनुष्य की लम्बाई के दर्पण के सामने खड़े होकर अपनी आकृति ध्यानपूर्वक देखिये ।
थोड़ी देर बाद नेत्र बन्द कर लीजिए और उस दर्पण की आकृति का ध्यान कीजिए। आपको अपनी छवि दृष्टिगोचर होने लगेगी।
कई व्यक्ति दर्पण की अपेक्षा स्वच्छ पानी में , तेल तथा घी में अपनी छवि को देखकर उसका ध्यान करते हैं। दर्पण की साधना-शान्तिदायक, तेल की संहारक और घी की उत्पादक होती है।
सूर्य और चन्द्रमा जब मध्य आकाश में ऐसे स्थान पर हों कि उनके प्रकाश में खड़े होने पर अपनी छाया 3.5 हाथ रहे उस समय अपनी छाया पर भी उस प्रकार ध्यान कल्याणकारक माना गया है।
दर्पण, जल, तेल, घृत आदि में मुखाकृति स्पष्ट दीखती है और नेत्र बन्द करके वैसा ही ध्यान हो जाता है। सूर्य-चन्द्र की ओर पीठ करके खड़े होने से अपनी छाया सामने आती है।
उसे खुले नेत्रों से भली प्रकार देखने के उपरान्त आँखें बन्द करके उसकी छाया का ध्यान करते हैं। कुछ दिनों के नियमित अभ्यास से उस छाया में अपनी आकृति भी दिखाई देने लगती है।
कुछ काल निरन्तर इस छाया- साधना को करते रहा जाय तो अपनी आकृति की एक अलग सत्ता बन जाती है और उसमें अपने संकल्प एवं प्राण का सम्मिश्रण होते जाने से वह एक स्वतंत्र चेतना का प्राणी बन जाता है।
इसको 'अपना जीवित भूत' कह सकते हैं। आरम्भिक अवस्था में यह आकाश में उड़ता या अपने आस-पास फिरता दिखाई देता है। फिर उस पर जब अपना नियंत्रण हो जाता है तो आज्ञानुसार प्रकट होता तथा आचरण करता है।
जिनका प्राण निर्बल है उनका यह मानस-पुत्र, भी निर्बल होगा और अपना रूप दिखाने के अतिरिक्त और कुछ विशेष कार्य न कर सकेगा। पर जिनका प्राण प्रबल होता है उनका छाया अदृश्य शरीर की भाति कार्य करता है।
एक स्थूल और दूसरी सूक्ष्म देह ..दो प्रकट देहें पाकर साधक बहुत से महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त कर लेता है।साथ ही रूप- साधना द्वारा मन का वश में होना तथा एकाग्र होना तो प्रत्यक्ष लाभ ही हैं।
अगली पोस्ट में हम रस साधना का वर्णन करते ।
क्रमशः
22/02/2024, 7:51 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...29
आज हम पंचतत्व की तनमन्या साधनाओ में रस साधना का वर्णन कर रहे । रस साधना के लिए जो फल आपको स्वादिष्ट लगता हो उसे इस साधना के लिए लीजिए।जैसे आपको आम अधिक रुचिकर है।
तो उसके छोटे-छोटे पाँच टुकड़े कीजिए। एक टुकड़ा जिह्वा के अग्रभाग पर एक मिनट तक रखा रहने दें और उसके स्वाद का स्मरण इस प्रकार करें कि बिना आम के भी आम का स्वाद जिह्वा को होता रहे।
दो मिनट में वह अनुभव शिथिल होने लगेगा, फिर दूसरा टुकड़ा जीभ पर रखिये और पूर्ववत् उसे फेंक कर आम के स्वाद का अनुभव कीजिए। इस प्रकार पाँच बार करने में पन्द्रह मिनट लगते हैं।
धीरे- धीरे जिह्वा पर कोई वस्तु रखने का समय कम करना चाहिए और बिना किसी वस्तु के रस के अनुभव करने का समय बढ़ाना चाहिए। कुछ समय पश्चात् बिना किसी वस्तु को जीभ पर रखे ।
केवल भावना मात्र से इच्छित वस्तु का पर्याप्त समय तक रसास्वादन किया जा सकता। शरीर के लिए जिन रसों की आवश्यकता है, वे पर्याप्त मात्रा में आकाश में भ्रमण करते रहते हैं।
संसार में जितने पदार्थ हैं उनका कुछ अंश वायु रूप में, कुछ तरल रूप में और कुछ ठोस आकृति में रहता है।अन्न को हम ठोस आकृति में ही देखते हैं। भूमि में, जल में वह परमाणु रूप से रहता है ।
और आकाश में अन्न का वायु अंश उड़ता रहता है।साधना की सिद्धि हो जाने पर आकाश में उड़ते फिरने वाले अन्नों को मनोबल द्वारा, संकल्प-शक्ति के आकर्षण द्वारा खींच कर उदरस्थ किया जा सकता है।
प्राचीनकाल में ऋषि लोग दीर्घकाल तक बिना अन्न जल के तपस्यायें करते थे। वे इस सिद्धि द्वारा आकश में से ही अभीष्ट आहार प्राप्त कर लेते थे, इसलिए बिना अन्न जल के भी उनका काम चलता था।
इस साधना का साधक बहुमूल्य पौष्टिक पदार्थ, औषधियों एवं स्वादिष्ट रसों का उपभोग अपने साधन बल द्वारा ही कर सकता है तथा दूसरों के लिए वह वस्तुयें आकाश में उत्पन्न करके इस तरह दे सकता है, मानो किसी के द्वारा कहीं से मँगाकर दी हों।
अगले पोस्ट में हम गंध साधना का वर्णन करते ।
क्रमशः
22/02/2024, 7:51 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...30
आज हम हमारे मनोमय कोष की जागृति के लिए पंचतत्व की तनमन्या साधना में गंध साधना का वर्णन करेंगे । गंध साधना के लिए नासिका के अग्र भाग पर त्राटक करना इस साधना में आवश्यक है।
दोनों नेत्रों से एक साथ नासिका के अग्र भाग पर त्राटक नहीं हो सकता.. इसलिए एक मिनट दाहिनी ओर तथा एक मिनट बाई ओर करना उचित है। दाहिने नेत्र को प्रधानता देकर उससे नाक के दाहिने हिस्से को और फिर बाएँ नेत्र को प्रधानता देकर बाएँ हिस्से को गम्भीर दृष्टि से देखना चाहिए।
आरम्भ में एक-एक मिनट से करके अन्त में पाँच-पाँच मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। इस त्राटक में नासिका की सूक्ष्म शक्तियों जाग्रत होती हैं। इस त्राटक के बाद कोई सुगन्धित तथा सुन्दर पुष्प लीजिए।
उसे नासिका के समीप ले जाकर कर एक मिनट तक धीरे-धीरे सूँघिये और उसी गन्ध का भली प्रकार स्मरण कीजिए। इसके बाद फूल को फेंक दीजिए और बिना फूल के ही उस गन्ध का दो मिनट तक स्मरण कीजिए ।
इसके बाद दूसरा फूल लेकर फिरसी क्रम की पुनरावृत्ति कीजिए।पाँच फूलों पर पन्द्रह मिनट प्रयोग करना चाहिए।
स्मरण रहे कम-से-कम एक सप्ताह तक एक ही फूल का प्रयोग होना चाहिए।
इसी प्रकार रस साधना में एक फल का एक सप्ताह तक प्रयोग होना चाहिए। कोई भी सुन्दर पुष्प गन्ध- साधना के लिए लिया जा सकता हैं। प्रत्येक पुष्प में कुछ सूक्ष्म गुण होते हैं।
गुलाब- प्रेमोत्पादक, चमेली- बुद्धिवर्धक, गेंदा- उत्साह बढ़ाने वाला, चम्पा- सौन्दर्यदायक, मोगरा- सन्तानवर्धक, केतकी- रोग नाशक, कदम्ब- शान्तिदायक, कन्नेर- उष्ण, सूर्यमुखी- ओजवर्धक है।
जिस पुष्प को सामने रखकर उसका ध्यान किया जायेगा उसी सूक्ष्म गुण अपने में बढ़ेंगे। हवन, गन्ध- योग से सम्बन्धित है। किन्हीं पदार्थों की सूक्ष्म प्राण शक्ति को प्राप्त करने के लिए उनसे विधिपूर्वक हवन किया जाता है।
जिससे उनका स्थूल रूप तो जल जाता है, पर सूक्ष्म रूप से वायु के साथ चारों ओर फैलकर निकटस्थ लोगों की प्राण-शक्ति में अभिवृद्धि करता है। सुगन्धित वातावरण में अनुकूल प्राण की मात्रा अधिक होती है
इससे उसे नासिका द्वारा प्राप्त करते हुए अन्तःकरण प्रसन्न होता है। गन्ध- साधना से मन की एकाग्रता के अतिरिक्त भविष्य का आभास प्राप्त करने की शक्ति बढ़ती है।
सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर सिद्ध हो जाने पर साधक अच्छा भविष्य- ज्ञाता हो सकता है। नासिका द्वारा साधा जाने वाला स्वर-योग भी गन्ध-साधना की एक शाखा है।
मनोमय कोष की जानकारी पूर्ण हुई हम अगले पोस्ट में चौथे विज्ञानमय कोष की जानकारी शुरू करते ।
क्रमशः
23/02/2024, 6:09 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....31
मनोमय कोष के बाद हम जानेंगे चौथे कोष यानी विज्ञानमय कोष के बारे आपको यह भी जानना चाइये विज्ञान संस्कृत का शब्द दो शब्दों से मिलकर बना इसका अर्थ होता विशेष ज्ञान ।
कहने का अर्थ यह है कि साधारण बुद्धि जीव यह उच्च स्तरीय ज्ञान नही समझ सकता । जो समझ सके वो साधरण नही विशेष ज्ञानी है वो खोज कर सकता। विज्ञान मय कोष के चार अंग है ।
एक : उच्चस्तरीय सो८हम साधना
दो : ग्रन्थि - भेदन
तीन : स्वर संयम
चार : आत्म -अनुभूति योग
पहले हम उच्चस्तरीय सो८हम साधना को जानते ।उच्च
स्तरीय सोऽहम् साधना में प्राणयोग प्रक्रिया भी सम्मिलित है। इन दोनों में कमर को सीधी रख कर, पालथी मार कर सुखासन में बैठना पड़ता है।
ध्यान साधनाओं में शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है इसलिए उनमें आराम कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने कीआवश्यकता पढ़ती है।
सोऽहम् साधना को अजपा साधना भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम्’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना यही है संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना।
वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेग पूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहाँ बाँस बहुत उगे होते हैं ।
वहाँ अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ सुनने को मिलती हैं। कारण कि बाँसों में कही-कही कीड़े छेद कर देते हैं।और उन छिद्रों से जब हवा वेग पूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर प्रवाह सुनने का मिलता है।
वृक्षों से टकरा कर जब द्रुत गति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रिया है। नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छिद्रों की तरह है।
उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है पर इतनी धीमी रहती है कि कान सरलता पूर्वक नहीं सुन सकते।
प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते है। प्राणायाम मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे-धीरे उसे वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए।
गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता हैं इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके।
कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है। चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मंद अनु भूति होने लगे ।।
क्रमशः
23/02/2024, 6:09 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....32
विज्ञानमय कोष का प्रथम अंग उच्च स्तरीय सोहम का भाग 2
चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब साँस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम्’ ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा है।
आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती किन्तु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है। और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है वरन् आनन्द का अनुभव होता है।
सो’ का तात्पर्य परमात्मा और ‘हम्’ का जीवचेतना-समझा जाना चाहिए। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग प्रत्यंग में जीवकोष तथा नाड़ी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने संपर्क संसर्ग का लाभ प्रदान करता है।
यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए और ‘हम्’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस काय कलेवर पर से अपना कब्जा छोड़ कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए।
प्रकारान्तर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनः क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारणा है। जीव भाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध लोभ मोह भरी मद मत्सरता अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा भी दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है।
इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। काय कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव धारणा की वेदखली यही है।
सोऽहम् साधना का तत्त्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से-सो और हम् ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता है कि अपना स्वरूप बदल रहा है अब शरीर ओर मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है।
शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारों शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान सत्य न्याय ओर प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है।।
क्रमशः
23/02/2024, 7:45 am - +91 98877 80007: 🙏
23/02/2024, 11:36 am - स्वर विज्ञान: नमन सभी को 🙏
जो क्रिया हमने बताई उस से क्या प्रभाव पड़ा हमे अवगत कराए सभी सदस्य। और अगर कोई नही कर रहा क्रिया तो कारण बताए।🙏
25/02/2024, 10:17 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग.....33
विज्ञानमय कोष के प्रथम अंग उच्चस्तरीय सोहम साधना भाग ..3
शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारों शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान सत्य न्याय ओर प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है।
सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
सोऽहम् साधना के अभ्यास में प्रायः पौन घण्टा प्रतिदिन लगता है। इसमें से आरम्भ के पन्द्रह मिनट श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अतिमन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय।
इसके उपरान्त शेष आधा घण्टे में चिन्तन का स्तर यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है वरन्! प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है।
एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय, फुफ्फुस, आमाशय, आँखें, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया रक्त के साथ प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित किया।
बाह्य अंगों ने पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वही बोलेगी जो ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना चखना आदि इन्द्रियजन्य गति-विधियाँ दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी।
जननेन्द्रिय का उपयोग, वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए निवापर्य आवश्यकता का धर्म संकट सामने आ खड़ा होने पर ही किया जाएगा। हाथ पाँव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो।
मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएँ न जमने पायेंगी।
क्रमशः
25/02/2024, 10:17 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......34
विज्ञानमय कोष के प्रथम अंग की उच्चस्तरीय सोहम साधना भाग ..4
कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी।
चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएँ न जमने पायेंगी। अहंता का स्तर नर कीटक जैसा नहीं नर नारायण जैसा होगा। यही है वे भावनाएँ जो शरीर और मन पर भगवान् के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती है।
यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए वरन् उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए किस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों।
अन्यथा स्वप्नदर्शी शेखचिल्ली ऐसे ही बैठे-ठाले मन मोदक खाते रहते है। उनसे कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकता। सोऽहम् साधना के पूर्वार्द्ध में अपने काय कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की-परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है ।
कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे। इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का-आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृतियों की, मन से लोभ-मोह जैसी तृष्णाओं का, अन्तराल से जीव भावी अहन्ता का, निवारण-निराकरण हो रहा है।
ऐसी भावनाएँ अत्यंत प्रगाढ़ होनी चाहिए दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियाँ और दुष्टताएँ-क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही हैं-सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दिखना चाहिए।
अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त ही हलकापन जो सन्तोष-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरंतर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बना गया।
क्रमशः
26/02/2024, 10:34 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....35
विज्ञानमय कोष के प्रथम अंग उच्च स्तरीय साधना 'सो,हम भाग.... 5
भावोत्कर्ष की दृष्टि से ‘सोऽहम्’ साधना के साथ-साथ उपर्युक्त भाव चित्रों को मनः क्षेत्र पर अति सघन चित्रित किया जाना चाहिए इससे वह चिन्तन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आन्तरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है।
ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाय पर वस्तुतः आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यन्त महान ही है अध्यात्म मूल्याँकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है।
राजा जनक यों साँसारिक दृष्टि के कारण से सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गये। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं यदि सोऽहम् साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अन्तःकरण में जड़ जमा लें ।
और वे कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा हुआ यों सोऽहम् साधना का चमत्कारी प्रयोजन भी कम नहीं है। यह प्राणयोग की महती साधना है।
दस प्रधान और चौवन गौण इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताये गये है। इन सबमें सर्वप्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्’ साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है।
जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है। षट्चक्र वेधन के लिए प्राण तत्व के बरमे ही छेद करने का काम करते है॥
आज्ञाचक्र तक नालिका द्वारा प्राण-तत्व खींचने का कार्य एक ही ढंग चलता है। पीछे उसके दो भाग हो जाते हैं, एक भावपरक दूसरा शक्ति परक। भाव परक में फेफड़ों में पहुँचा हुआ प्राण समस्त शरीर के अंग-प्रत्यंगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत् का निवारण सम्पन्न करता है। आज्ञा चक्र में एक दूसरी प्राणधारा पिछले मस्तिष्क को स्पष्ट करती हुई मेरु-दण्ड में निकल जाती है। वही ब्रह्म नाड़ी का महाशक्ति नद है।
क्रमशः
26/02/2024, 10:34 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग....36
विज्ञानमय कोष के प्रथम अंग ,उच्च स्तरीय 'सो,हम साधना भाग 6
आज्ञा चक्र में एक दूसरी प्राणधारा पिछले मस्तिष्क को स्पष्ट करती हुई मेरु-दण्ड में निकल जाती है। वही ब्रह्म नाड़ी का महाशक्ति नद है। इड़ा और पिंगला की दो विद्युत धाराएँ इसी में प्रवाहित होती हैं। वे मूलाधार चक्र तक पहुँचती हैं और सुषुम्ना सम्मिलन के बाद वापस लौट आती है।
षट्चक्र इसी मेरुदण्ड में स्थित ब्रह्मनाड़ी महानन्द के अंतर्गत पड़ने वाले भँवर हैं। इनमें ही लोक लोकान्तरों से-अति मानवी शक्ति संस्थानों से सम्बन्ध मिलाने वाली रहस्यमय कुञ्जियाँ सुरक्षित रखी हुई है। षट्चक्रों में से जो जितने रत्न से सम्बन्ध स्थापित करले वह उतना ही महान् बन सकता है।
कुण्डलिनी शक्ति को भौतिक और आत्मिक शक्तियों का आदान-प्रदान सम्पन्न करने वाली महत्त्व भूमिका कह सकते है।उसका जागरण षट्चक्र वेधन के उपरान्त ही होता है चक्रवेधन के लिए प्राणतत्त्व पर आधिपत्य स्थापित करने वाले वेधक प्राणायामों का अभ्यास करना पड़ता है।
जो प्राणायाम षट्चक्र वेधन में सहायता करते है उनसे सोऽहम् का प्राणयोग सर्वप्रथम और सर्वसुलभ है। पंचकोशों के अनावरण का क्रम भी चक्रवेधन स्तर का ही है। उसके लिए प्राण-प्रखरता बढ़ानी पड़ती है। यह प्रयोजन भी सोऽहम् साधना से ही पूरा होता है।
कहा जा चुका है कि सोऽहम् की भावना साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदण्ड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है।
सोऽहम् साधन के हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति संवर्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है-इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे करती हैं।
शक्ति सम्पन्न और भावोत्कर्ष की उभय पक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्मिक हैं। उसे प्राप्त करने में सोऽहम् साधना कितनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र सूर्य स्वर, शरीर और मन की स्थिति में ऋण और धन विद्युत के आवेश घटाते-बढ़ाते रहते हैं।
इस स्थिति का सही ज्ञान रहने पर मनुष्य यह जान सकता है कि उसकी अन्तः क्षमता किस कार्य को कर सकने में समक्ष अथवा क्या करने में असमर्थ है।
क्रमशः
27/02/2024, 11:56 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....37
विज्ञानमय कोष के प्रथम अंग उच्च स्तरीय 'सो,हम साधना शेष भाग।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र सूर्य स्वर, शरीर और मन की स्थिति में ऋण और धन विद्युत के आवेश घटाते-बढ़ाते रहते हैं। इस स्थिति का सही ज्ञान रहने पर मनुष्य यह जान सकता है ।
कि उसकी अन्तः क्षमता किस कार्य को कर सकने में समक्ष अथवा क्या करने में असमर्थ है। अन्तर्जगत् की वस्तुस्थिति का सही ज्ञान होने पर मनुष्य के लिए ऐसा कदम सरल हो जाता है, जिसके आधार पर सफलता का पथ अधिक प्रशस्त हो सके।
किस स्वर की स्थिति में मनुष्य दूसरों की क्या सहायता कर सकता है। इसकी जानकारी भी स्वरयोग से मिलती है। तदनुसार दूसरों की स्वल्प सहायता करके भी उन्हें अधिक मात्रा में लाभान्वित किया जा सकता है।
सामान्य वृद्धि से जो अविज्ञात जानकारियाँ प्रायः नहीं जानी जा सकतीं उन्हें भी स्वरयोग के माध्यम से अधिक खूब और खूबसूरती से समझा जा सकता है। स्वरयोग की साधना के यों कई अभ्यास हैं, पर उनमें अधिक सरल और अधिक सफल सोऽहम् साधना ही रहती है।
यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुण्डलिनी जागरण, स्वर साधन, गन्धानुभूति, भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं। जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
सोहम साधना की उन्नति जैसे जैसे होती जाती वैसे ही वैसे विज्ञानमय कोष का परिष्कार होता जाता आत्मज्ञान बढ़ता है और धीरे -धीरे आत्म साक्षात्कार की स्तिथि निकट आती जाती है । अगली पोस्ट में हम विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन पर बात करते ।
क्रमशः
27/02/2024, 11:56 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....38
विज्ञानमय कोष का प्रथम अंग पूर्ण हुआ अब हम समझते इसके दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन के बारे । विज्ञान -मय कोष में तीन बंधन हैं ,जो भौतिक शरीर न रहने पर भी देव , गंधर्व ,यक्ष , भूत , पिशाच , आदि योनियों में भी वैसे ही बंधन बंधे रहते हैं |
इन्हें रूद्र , विष्णु , और ब्रह्म ग्रंथियां कहते हैं |अर्थात तम ,रज, सत द्वारा स्थूल , सूक्ष्म , और कारण शरीर बने हुऐ हैं | इन तीन ग्रंथियों से ही जीव बंधा हुआ है | इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृ - ऋण ,ऋषि -ऋण व देव -ऋण कहलाता है ।
तम को प्रकृति , रज को जीव और सत को आत्मा कहते हैं |संसार में तम को सांसारिक जीवन , रज को व्यक्तिगत जीवन व सत को आध्यात्मिक जीवन कह सकते हैं | देश ,जाति, और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना पितृ -ऋण से उऋण होने का मार्ग है |
व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक ,बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से संपन्न बनाना , अपने को मनुष्य - सुलभ गुणों से युक्त बनाना ऋषि- ऋण से छूटना है ।सत्संग ,भक्ति ,चिंतन ,मनन ,आदि साधनाओं द्वारा काम, क्रोध लोभ,मोह मद ,मत्सर आदि को हटाकर आत्मा को निर्मल ,देव-तुल्य बनाना।
यह देव -ऋण से उऋण होना है | साधक को विज्ञान -मय कोष में तीनों गांठों का अनुभव होता है | प्रथम मूत्राशय के समीप ,रूद्र ,दूसरी आमाशय के उपर भाग में ,विष्णु ,और तीसरी सिर के मध्य केंद्र में ,ब्रह्म ,ग्रंथि कहलाती है | इन्हें दूसरे शब्दों में महाकाली , महालक्ष्मी , महा-सरस्वती भी कहते हैं |
प्रत्येक की दो दो सहायक ग्रन्थियाँ होती हैं | इन्हें चक्र भी कहते हैं । रूद्र की [ मूलाधार , स्वाधिष्ठान ] , विष्णु की [ मणिपुर , अनाहत ] , ब्रह्म की [ विशुद्धि , आज्ञा ] चक्र कहा जाता है | हठ-योग की विधि से भी इन छ: चक्रों का वेधन किया जाता है |
सिद्धों ने इन ग्रंथियों की अंदर की झांकी के अनुसार शिव , विष्णु और ब्रह्मा के चित्रों का निरूपण किया है| एक ही ग्रंथी ,दायें भाग से देखने पर पुरुष - प्रधान ,व बाएं भाग से देखने पर स्त्री -प्रधान आकार की होती है| ब्रह्म - ग्रंथि मध्य-मस्तिष्क में है | इससे उपर सहस्रार शतदल कमल है |
यह ग्रंथि उपर से चतुष्कोण [ चार कोने ] और नीचे से फ़ैली हुई है | इसका नीचे का एक तंतु ब्रह्म -रंध्र से जुडा हुआ है | इसी को सहस्रार -मुख वाले शेषनाग की शय्या पर सोते हुए भगवान की नाभि -कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है |
वाम भाग में यही ग्रंथि चतुर्भुजी सरस्वती है | वीणा की झंकार से ओंकार - ध्वनी का यहाँ निरंतर गुंजार होता है | यही तीन ग्रंथियां ,जीव को बाँधे हुए हैं | जब ये खुल जाती हैं ,तो मुक्ति का अधिकार अपने आप मिल जाता है और शक्ति , सम्पन्नता ,और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हाथ में आ जाता है |
विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचने पर जीव को प्रतीत होता है कि तीन सूक्ष्म बन्धन ही मुझे बाँधे हुए हैं। पञ्च-तत्त्वों से शरीर बना है, उस शरीर में पाँच कोश हैं। इन पाँच बन्धनों को खोलने के लिए कोशों की अलग-अलग साधनाएँ बताई गई हैं।
क्रमशः
28/02/2024, 10:55 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....39 विज्ञानमय कोष ग्रन्थि भेदन ...आगे
इन तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर, ऊँचा उठ जाने पर ही आत्मा शान्ति और आनन्द का अधिकारी होता है। इन तीन ग्रन्थियों को खोलने के महत्त्व पूर्ण कार्य को ध्यान में रखने के लिए कन्धे पर तीन तार का यज्ञोपवीत धारण किया जाता है।
इसका तात्पर्य यह है कि तम, रज, सत् के तीन गुणों द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर बने हुए हैं। यज्ञोपवीत के अन्तिम भाग में तीन ग्रन्थियाँ लगाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्मग्रन्थि से जीव बँधा पड़ा है।
दार्शनिक दृष्टि से विचार करने पर तम का अर्थ होता है-शक्ति, रज का अर्थ होता है-साधन, सत् का अर्थ होता है-ज्ञान।इन तीनों की न्यूनता एवं विकृत अवस्था ..बन्धन कारक तथा अनेक उलझनों, कठिनाइयों और बुराइयों को उत्पन्न करने वाली होती है।
किन्तु जब तीनों की स्थिति सन्तोषजनक होती है, तब त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की सृष्टि में कोई भी शक्ति या पदार्थ दूषित अथवा भ्रष्ट नहीं है। यदि उसका सदुपयोग किया जाए तो वह कल्याणकारी सिद्ध होगा।
साधक जब विज्ञानमय कोश की स्थिति में होता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है मानो उसके भीतर तीन कठोर, गठीली, चमकदार, हलचल करती हुई हलकी गाँठें हैं। इनमें से एक गाँठ मूत्राशय के समीप, दूसरी आमाशय के ऊर्ध्व भाग में और तीसरी मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में विदित होती है।
रुद्रग्रन्थि का आकार बेर के समान ऊपर को नुकीला, नीचे को भारी, पैंदे में गड्ढा लिए होता है। इसका वर्ण कालापन मिला हुआ लाल होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं। दक्षिण भाग को रुद्र और वाम भाग को काली कहते हैं।दक्षिण भाग के अन्तरंग गह्वर में प्रवेश करके जब उसकी झाँकी की जाती है।
तो ऊर्ध्व भाग में श्वेत रंग की छोटी-सी नाड़ी हलका-सा श्वेत रस प्रवाहित करती है; एक तन्तु तिरछा पीत वर्ण की ज्योति-सा चमकता है। मध्य भाग में एक काले वर्ण की नाड़ी साँप की तरह मूलाधार से लिपटी हुई है। प्राणवायु का जब उस भाग से सम्पर्क होता है।
तो डिम-डिम जैसी ध्वनि उसमें से निकलती है। रुद्रग्रन्थि की आन्तरिक स्थिति की झाँकी करके ऋषियों ने रुद्र का चित्र अंकित किया है मस्तक पर गंगा की धारा, जटा में चन्द्रमा, गले में सर्प, डमरू की डिम-डिम ध्वनि, ऊर्ध्व भाग में त्रिशूल।
चित्र में आलंकारिक रूप से रुद्रग्रन्थि की वास्तविकताएँ ही भरी गई हैं उस ग्रन्थि का वाम भाग जिस स्थिति में है, उसी के अनुरूप काली का सुन्दर चित्र सूक्ष्मदर्शी आध्यात्मिक चित्रकारों ने अंकित कर दिया है। रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए ग्रन्थि के मूल भाग में निवास करने वाली बीज शक्तियों का सञ्चार करना पड़ता है।
रुद्रग्रन्थि के अधोभाग में बेर के डण्ठल की तरह एक सूक्ष्म प्राण अभिप्रेत होता है, उसे ‘क्लीं’ बीज कहते हैं। मूलबन्ध बाँधते हुए एक ओर से अपान और दूसरी ओर से कूर्मप्राण को चिमटे की तरह बनाकर रुद्रग्रन्थि को पकड़कर रेचक प्राणायाम द्वारा दबाते हैं।
इस दबाव की गर्मी से क्लीं बीज जाग्रत् हो जाता है। वह नोकदार डण्ठल आकृति का बीज अपनी ध्वनि और रक्त वर्ण प्रकाश-ज्योति के साथ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। इस जाग्रत् क्लीं बीज की अग्रिम नोंक से कुंचुकि क्रिया की जाती है।
जैसे किसी वस्तु में छेद करने के लिए नोंकदार कील कोंची जाती है; इस प्रकार की वेधन-साधना को ‘कुंचुकी क्रिया’ कहते हैं। रुद्रग्रन्थि के मूल केन्द्र में क्लीं बीज की अग्र शिखा से जब निरन्तर कुंचुकी होती है, तो कलिका में भीतर एक विशेष प्रकार के लहलहाते हुए तड़ित प्रवाह उठाने पड़ते हैं।
इनकी आकृति एवं गति सर्प जैसी होती है। इन तड़ित प्रवाहों को ही शम्भु के गले में फुफकारने वाले सर्प बताया है। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत के उच्च शिखर पर धूम्र मिश्रित अग्नि निकलती है, उसी प्रकार रुद्रग्रन्थि के ऊपरी भाग में पहले क्लीं बीज की अग्निजिह्वा प्रकट होती है।
इसी को काली की बाहर निकली हुई जीभ माना गया है। इसको शम्भु का तीसरा नेत्र भी कहते हैं। मूलबन्ध, अपान और कूर्म प्राण के आघात से जाग्रत् हुई क्लीं बीज की कुंचुकी -क्रिया से धीरे-धीरे रुद्रग्रन्थि शिथिल होकर वैसे ही खुलने लगती है, जैसे कली धीरे-धीरे खिलकर फूल बन जाती है।
इस कमल पुष्प के खिलने को पद्मासन कहा गया है। त्रिदेव के कमलासन पर विराजमान होने के चित्रों का तात्पर्य यही है कि वे विकसित रूप से परिलक्षित हो रहे हैं। साधक के प्रयत्न के अनुरूप खुली हुई रुद्रग्रन्थि का तीसरा भाग जब प्रकटित होता है।
तब साक्षात् रुद्र का, काली का अथवा रक्त वर्ण सर्प के समान लहलहाती हुई, क्लीं-घोष करती हुई अग्नि शिखा का साक्षात्कार होता है।बयह रुद्र जागरण साधक में अनेक प्रकार की गुप्त-प्रकट शक्तियाँ भर देता है। संसार की सब शक्तियों का मूल केन्द्र रुद्र ही है।
उसे रुद्रलोक या कैलाश भी कहते हैं। प्रलय काल में संसार संचालिनी शक्ति व्यय होते-होते पूर्ण शिथिल होकर जब सुषुप्त अवस्था में चली जाती है, तब रुद्र का ताण्डव नृत्य होता है। उस महामन्थन से इतनी शक्ति फिर उत्पन्न हो जाती है जिससे आगामी प्रलय तक काम चलता रहे।
घड़ी में चाबी भरने के समान रुद्र का प्रलय ताण्डव होता है। रुद्रशक्ति की शिथिलता से जीवों की तथा पदार्थों की मृत्यु हो जाती है, इसलिए रुद्र को मृत्यु का देवता माना गया है। क्या है विष्णुग्रन्थि का आकार अगली पोस्ट में ।
क्रमशः
28/02/2024, 10:55 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...40
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थी भेदन आगे विष्णु ग्रन्थि ।
विष्णुग्रन्थि किस वर्ण की, किस गुण की, किस आकार की, किस आन्तरिक स्थिति की, किस ध्वनि की, किस आकृति की है, यह सब हमें विष्णु के चित्र से सहज ही प्रतीत हो जाता है। नील वर्ण, गोल आकार, शंख-ध्वनि, कौस्तुभ मणि, वनमाला यह चित्र उस मध्यग्रन्थि का सहज प्रतिबिम्ब है।
जैसे मनुष्य को मुख की ओर से देखा जाए तो उसकी झाँकी दूसरे प्रकार की होती है और पीठ की ओर से देखा जाए, तब यह आकृति दूसरे ही प्रकार की होती है। एक ही मनुष्य के दो पहलू दो प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार एक ही ग्रन्थि दक्षिण भाग से देखने में पुरुषत्व प्रधान आकार की और बाईं ओर से देखने पर स्त्रीत्व प्रधान आकार की होती है।
एक ही ग्रन्थि को रुद्र या शक्तिग्रन्थि कहा जा सकता है। विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा और सरस्वती का संयोग भी इसी प्रकार है। विष्णुग्रन्थि के मूल में ‘श्रीं’ का निवास है। विष्णुग्रन्थि को जाग्रत् करने के लिए जालन्धर बन्ध बाँधकर ‘समान’ और ‘उदान’ प्राणों द्वारा दबाया जाता है।
तो उसके मूल भाग का ‘श्रीं’ बीज जाग्रत् होता है। यह गोल गेंद की तरह है और इसकी अपनी धुरी पर द्रुत गति से घूमने की क्रिया होती है। इस घूर्णन क्रिया के साथ-साथ एक ऐसी सनसनाती हुई सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसको दिव्य श्रोत्रों से ‘श्रीं’ जैसे सुना जाता है।
श्रीं बीज को विष्णुग्रन्थि की बाह्य परिधि में भ्रामरी क्रिया के अनुसार घुमाया जाता है।जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उसी प्रकार परिभ्रमण करने को भ्रामरी कहते हैं। विवाह में वर-वधू की भाँवर या फेरे पड़ना, देव-मन्दिरों तथा यज्ञ की परिक्रमा या प्रदक्षिणा होना भ्रामरी क्रिया का रूप है।
विष्णु की उँगली पर घूमता हुआ चक्र सुदर्शन चित्रित करके योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किए गए इसी रहस्य को प्रकट किया है। श्रीं’ बीज विष्णुग्रन्थि की भ्रामरी गति से परिक्रमा करने लगता है, तब उस महातत्त्व का जागरण होता है।
पूरक प्राणायाम की प्रेरणा देकर समान और उदान द्वारा जाग्रत् किए गए श्रीं बीज से जब विष्णुग्रन्थि के बाह्य आवरण की मध्य परिधि में भ्रामरी क्रिया की जाती है, तो उसके गुञ्जन से उसका भीतरी भाग चैतन्य होने लगता है।
इस चेतना की विद्युत् तरंगें इस प्रकार उठती हैं जैसे पक्षी के पंख दोनों बाजुओं में हिलते हैं। उसी गति के आधार पर विष्णु का वाहन गरुड़ निर्धारित किया गया है। इस साधना से विष्णुग्रन्थि खुलती है और साधक की मानसिक स्थिति के अनुरूप विष्णु, लक्ष्मी या पीत वर्ण की अग्निशिखा की लपटों के समान ज्योतिपुञ्ज का साक्षात्कार होता है।
विष्णु का पीताम्बर इस पीत ज्योतिपुञ्ज का प्रतीक है। इस ग्रन्थि का खुलना ही बैकुण्ठ, स्वर्ग एवं विष्णुलोक को प्राप्त करना है। बैकुण्ठ या स्वर्ग को अनन्त ऐश्वर्य का केन्द्र माना जाता है। वहाँ सर्वोत्कृष्ट सुख-साधन जो सम्भव हो सकते हैं, वे प्रस्तुत हैं।
विष्णुग्रन्थि वैभव का केन्द्र है, जो उसे खोल लेता है, उसे विश्व के ऐश्वर्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है। क्या है ब्रह्मग्रन्थि का आकार और बीज अगली पोस्ट में
क्रमशः
28/02/2024, 10:06 pm - स्वर विज्ञान removed +91 70090 03151
28/02/2024, 10:06 pm - स्वर विज्ञान removed +91 92121 45231
28/02/2024, 10:07 pm - स्वर विज्ञान removed +91 96722 22800
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28/02/2024, 10:07 pm - स्वर विज्ञान removed +91 94053 32669
28/02/2024, 10:08 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....41
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में आज ब्रह्म ग्रन्थि के बारे समझते । ब्रह्मग्रन्थि मध्य मस्तिष्क में है। इससे ऊपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रन्थि ऊपर से चतुष्कोण और नीचे से फैली हुई है। इसका नीचे का एक तन्तु ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ा हुआ है।
इसी को सहस्रमुख वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए भगवान् की नाभि कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है।वाम भाग में यही ग्रन्थि चतुर्भुजी सरस्वती है। वीणा की झंकार-से ओंकार ध्वनि का यहाँ निरन्तर गुञ्जार होता है। तीनों ग्रन्थियाँ जब तक सुप्त अवस्था में रहती हैं।
तब तक जीव साधारण दीन-हीन दशा में पड़ा रहता है। अशक्ति, अभाव और अज्ञान उसे नाना प्रकार से दु:ख देते रहते हैं। पर जब इनका खुलना आरम्भ होता है तो उनका वैभव बिखर पड़ता है। मुँह बन्द कली में न रूप है, न सौन्दर्य और न आकर्षण।
पर जब वह कली खिल पड़ती है और पुष्प के रूप में प्रकट होती है, तो एक सुन्दर दृश्य उपस्थित हो जाता है। ब्रह्मग्रन्थि के नीचे ‘ह्रीं’ तत्त्व का अवस्थान है। ब्रह्म ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्रदल कमल की छाया में अवस्थित है। उसे अमृत कलश कहते हैं।
बताया गया है कि सुरलोक में अमृत कलश की रक्षा सहस्र फनों वाले शेषनाग करते हैं। इसका अभिप्राय इसी ब्रह्म ग्रन्थि से है।उड्डियान बन्ध लगाकर व्यान और धनञ्जय प्राणों द्वारा ब्रह्मग्रन्थि को पकाया जाता है। पकाने से उसके मूलाधार में वास करने वाली ह्रीं शक्ति जाग्रत् होती है।
इसकी गति को प्लावनी कहते हैं। जैसे जल में लहरें उत्पन्न होती हैं और निरन्तर आगे को ही लहराती हुई चलती हैं, उसी प्रकार ह्रीं बीज की प्लावनी गति से ब्रह्मग्रन्थि को दक्षिणायन से उत्तरायण को प्रेरित करते हैं। चतुष्कोण ग्रन्थि के ऊर्ध्व भाग में यही ह्रीं तत्त्व रुक-रुककर गाँठें सी बनाता हुआ आगे की ओर चलता है ।
और अन्त में परिक्रमा करके अपने मूल संस्थान को लौट आता है। गाँठ बाँधते चलने की नीची-ऊँची गति के आधार पर माला के दाने बनाए गए हैं।108 दचके लगाकर तब एक परिधि पूरी होती है, इसलिए माला के 108 दाने होते हैं। इस ह्रीं तत्त्व की तरंगें मन्थर गति से इस प्रकार चलती हैं ।
जैसे हंस चलता है। ब्रह्मा या सरस्वती का वाहन हंस इसीलिए माना गया है।
वीणा के तारों की झंकार से मिलती-जुलती ‘ह्रीं’ ध्वनि सरस्वती की वीणा का परिचय देती है। कुम्भक प्राणायाम की प्रेरणा से ह्रीं बीज की प्लावनी क्रिया आरम्भ होती है।
यह क्रिया निरन्तर होते रहने पर ब्रह्मग्रन्थि खुल जाती है। तब उसका ब्रह्म के रूप में, सरस्वती के रूप में अथवा श्वेत वर्ण प्रकम्पित शुभ्र ज्योति शिखा के समान साक्षात्कार होता है। यह स्थिति आत्मज्ञान, ब्रह्मप्राप्ति, ब्राह्मी स्थिति की है। ब्रह्मलोक एवं गोलोक भी इसको कहते हैं।
इस स्थिति को उपलब्ध साधक ज्ञान-बल से परिपूर्ण हो जाता है। इसकी आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत् होकर परमेश्वर के समीप पहुँचा देती हैं, उसे अपने पिता का उत्तराधिकार उसे मिलता है और वह जीवन्मुक्त होकर ब्राह्मीस्थिति का आनन्द.. ब्रह्मानन्द उपलब्ध करता है।
षट्चक्र का हठयोग-सम्मत विधान अथवा महायोग का यह ग्रन्थिभेद, दोनों ही समान स्थिति के हैं। साधक अपनी स्थिति के अनुसार उन्हें अपनाते हैं और दोनों से ही विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता है।
अगली पोस्ट में सहस्रार चक्र का महत्व समझते ।
क्रमशः
28/02/2024, 10:08 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...42
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में हम समझते सहस्त्रार चक्र का महत्व ।पृथ्वी की समस्त शक्तियों , विशेषताओं और विभूतियों के केन्द्र उसके सन्तुलन बिन्दु ..उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं। यहीं से वह सूत्र संचालन होता है।
जिसके कारण यह धरती एक सजीव पिण्ड एवं अगणित जीव-धारियों की क्रीड़ा-स्थली बनी हुई है। यदि ध्रुवों की स्थिति में किसी प्रकार आघात पहुंच जाय या परिवर्तन उपस्थित हो जाय तो फिर इस भू-मण्डल का स्वरूप बदल कर कुछ और ही तरह का हो जायेगा।
कारण स्पष्ट है .. दोनों ध्रुव ही तो उसकी क्रिया और चेतना के केन्द्र बिन्दु हैं। जिस प्रकार पृथ्वी में चेतना एवं क्रिया उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों से प्राप्त होती है उसी प्रकार मानव पिण्ड देह के भी दो ही अति सूक्ष्म संस्थान हैं। उत्तरी ध्रुव ब्रह्मरन्ध्र ,सहस्रार कमल और दक्षिणी ध्रुव है कुण्डलिनी केन्द्र मूलाधार चक्र।
सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अंदर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में ‘‘महाविवर’’ नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुंज के रूप में अवस्थित है। कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है।
इसलिये इसे ‘‘दशम द्वार’’ या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं। सहस्त्रार का वर्णन चक्र की तरह किया जाता है जबकि सहस्त्रार एक अवस्था है जो की आज्ञा चक्र के उपर कुण्डलिनी शक्ति गति करती है उसके बाद यह अवस्था आता है इस अवस्था में अति आनन्द की अनुभूति होती है जो वर्णन के परे है ।
क्योंकि इस अवस्था में मन भी आपका साथ छोड़ देता है और जब मन नहीं होगा तो उस अवस्था की सूचना कौन देगा। मस्तिष्क क्षेत्र अगणित रहस्य मय शक्तियों से भरा है। मस्तिष्क के सम्बन्ध में वर्तमान वैज्ञानिक मान्यताओं की संगति इस सम्बन्ध में भारतीय दार्शनिक मान्यताओं से भी बैठती है।
मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पांच भागों में विभक्त किया जाता है। (1) वृहद् मस्तिष्क (सेरिश्रम) (2) लघुमस्तिष्क (सेरिबेलम) (3) माध्यमिक मस्तिष् (मिडब्रेन) (4) मस्तिष्क सेतु (पॉन्स) (5) सुषुम्ना शीर्ष (मैडुला ऑबलांगेटा)।
इनमें से अन्तिम तीन अर्थात् मिडब्रेन, पॉन्स एवं मैडुला को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ (ब्रेनस्टेम) भी कहते हैं।अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तेतीस कोटि देवता रहते हैं, पर उनमें से पांच मुख्य हैं। इन्हीं का समस्त देव संस्थान पर नियन्त्रण है।
मस्तिष्कीय पांच क्षेत्रों को पांच देव परिधि कह सकते हैं। इन्हीं के द्वारा पांच कोशों की पांच शक्तियों का संचार संचालन होता है । इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।
सहस्रार चक्र को अमृत कलश भी कहा गया है। उसमें से सोम रसस्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधापान करते और अमर बनते हैं। वर्तमान वैज्ञानिक मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव ‘‘सैरिव्रो स्पाइनल फ्ल्यूड’’ भरा रहता है।
यही मस्तिष्क के भिन्न भिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता है।मस्तिष्क की झिल्लियों से यह झरता रहना है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता है।
क्रमशः
01/03/2024, 5:15 pm - स्वर विज्ञान removed Raajesh Sainnbhi
01/03/2024, 5:16 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....43
सहस्त्रार चक्र का महत्व ..आगे
अमृत कलश के सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं कहीं सहस्रार की 16 पंखुरियों का भी वर्णन है। यह मस्तिष्क के ही 16 महत्वपूर्ण विभाग विभाजन हैं। शिव संहिता में भी सहस्रार की 16 कलाओं का वर्णन है -कपाल के मध्य चन्द्रमा के समान प्रकाशवान् सोलह कला युक्त सहस्रार चक्र का ध्यान करें।
सहस्रार की यह सोलह कलाएं मस्तिष्क के ‘‘सैरिव्रोस्माइनल फ्ल्यूड’’ से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह विभाग हैं। पूर्वोक्त पांच स्थूल विभागों को अधिक विस्तार से व्यक्त किया जाय तो उसके निम्नांकित 16 विभाग होते हैं ।
(1) वृहद्मस्तिष्क (सैरिब्रम)
(2) लघुमस्तिष्क (सैरिेबेलम)
(3) सुषुम्ना शीर्ष (मैट्रुला ऑबलॉगेटा)
(4) सेतु (पॉन्स)
(5) मध्य मस्तिष्क (मिडब्रेन)
(6) महासंयोजक (कॉर्पस कलोसम)
(7) रखी पिण्ड (कॉपर्स स्ट्रेटम) (8) पीयूस ग्रन्थि (पिट्यूटरी ग्लैण्ड)
(9) शीर्ष ग्रन्थि (पीनियल ग्लैण्ड (10) चेतक (थैलोमस)
(11) अधःचेतक (हाइपो थैलेमस)
(12) उपचेतक (सब थैलेमस)
(13) अनुचेतक (मैटा थैलेमस)
(14) ऊर्ध्व चेतक (एपी थैलेमस)
(15) संचार जालिकाएं (कॉराडप्लैक्सैसेज)
(16) प्रकोष्ठ (वैन्ट्रिक्लस)।
इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं युक्त अनेक केन्द्र हैं। सहस्रार अमृत कलश को जागृत करके उन्हें अत्यधिक सक्रिय बना कर असाधारण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।
शिव संहिता के अनुसार कपाल की गुफा में क्षीर सागर समुद्र का तथा सहस्र दल कमल में चन्द्रमा जैसे प्रकाश का ध्यान करें। जो योगी सहस्रार से स्रवित हो रहे पीयूष का निरन्तर पान करता है, वह मृत्यु की ही मृत्यु का विधान रचने में समर्थ होता है।
अर्थात् मृत्यु उसे मृत्यु के समान नहीं प्रतीत होती, वह मृत्यु से परे का जीवन जीता है। यहीं इसी सहस्रार में कुण्डलिनी-शक्ति का लय होता है और तब चारों प्रकार की सृष्टि परमात्मा में ही लीन हो जाती है, सभी कुछ परमात्मामय हो जाता है।
सहस्र दल कमल तथा शेषनाग के सहस्र फन माने जाने की उक्ति का आधार भी यही है। ब्रह्मलोक एवं क्षीरसागर के मध्य विष्णु भगवान का कुंडलि भरे हुए शेष नाग पर शयन करना, यह आकृति भी सहस्रार की स्थिति समझने की दृष्टि से ही बनी है।
सहस्रार चक्र का सम्बन्ध ब्रह्मरन्ध्र से है। ब्रह्म रन्ध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार तो दो नथुने, दो आंखें, दो कान, एक मुख, दो मलमूत्र छिद्र सर्व विदित हैं। दशवां द्वार ब्रह्म रन्ध्र है। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्व गति प्राप्त करे।
ब्रह्म सत्ता का ,ब्रह्माण्डीय चेतना का ..मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। इसी ब्रह्मरन्ध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे ऊपरी रहस्यमय कही जाने वाली शीर्ष ग्रन्थि (पीमियल ग्लैण्ड) का स्थान है।
यह ब्रह्मरन्ध्र विशिष्ट मार्ग द्वार है। योगी अन्त समय में इसी मार्ग से प्राण निष्कासन करके ब्रह्मलीन होते हैं। स्पष्ट है कि जीवन काल में यह ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क के सहस्रार चक्र के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है।
सहस्रार चक्र और ब्रह्मरन्ध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई-यूनिट के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।
सहस्रार चक्र - अपनी महाशक्ति के साथ।
(1) स्थान - तालु के ऊपर मस्तिष्क में , ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर सब शक्तियों का केन्द्र है।
(2) आकृति - नाना रंग के प्रकाश से प्रकाशित सहस्र (1000) पंखुड़ियों (दलों ) वाले कमल के समान है।
(3) दलों के अक्षर - अ से लेकर क्ष तक सभी स्वर और वर्ण हैं।
(4) तत्व - तत्वातीत है।
(5) तत्व बीज - विसर्ग है।
(6) तत्व बीज गति - बिन्दु है।
(7) लोक - सत्यम् है।
(8) तत्व बीज वाहन - बिन्दु है।
क्रमशः
01/03/2024, 5:16 pm - स्वर विज्ञान: हमारे महाकोश भाग .....44
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में हम समझते आज्ञाचक्र का महत्व । आज्ञाचक्र को हमारा तीसरा नेत्र भी कहा गया है । भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है।
बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है। सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है।
हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है।
साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते।
आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवन चर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है और इस प्रकार लगाया गया है कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे।
मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं। जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दीखता है। शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उचले तभी उसे काम की वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है।
अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है। कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है। आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है।
खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले। घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता ।
वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है। प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं। चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं।
क्रमशः
03/03/2024, 3:11 pm - +91 98877 80007: 🙏
04/03/2024, 8:36 am - स्वर विज्ञान: हमारे महाकोष भाग ....45
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में आज्ञाचक्र का महत्व ।
चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं। उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी सिर उठाती है ।
कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है। मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 रंग बनते हैं।
इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं। टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है। वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे ।
जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दिखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं तो उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई। मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है।
दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है। मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है।
आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है। प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है।
प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है, अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है।
क्रमशः
04/03/2024, 8:36 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....46
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में आज्ञाचक्र का महत्व : आगे -
यह अंधों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है।मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं।
समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है।
मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है। पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है।
इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप से महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार-चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है।
वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है।
इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों या डरने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधारभूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है।
कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैं। इसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है। इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं।
यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है। इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है।
क्रमशः
05/03/2024, 10:06 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .... 47
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में आज्ञाचक्र का महत्व ।
मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी से सम्बन्धित है। शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर ।
उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं।चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है।
उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए ।
अपनी दक्षता ,क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे। पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।
मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है।
इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है। जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 12 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है ।
और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का एक अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम के लिए पर्याप्त समझा है और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है।
यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है।
क्रमशः
05/03/2024, 10:06 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....48
विज्ञानमय कोष के दूसरे अंग ग्रन्थि भेदन में आज्ञा चक्र का महत्व ।
सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे। किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी।
इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है।
ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा से 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है।
फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी।पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है। आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है।
शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना, संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं।
मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं। चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय,।
उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है। यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है।
ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं। तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए।
क्रमशः
06/03/2024, 9:44 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...49
इस पोस्ट पर हम समझते ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन;-
अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है। "उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है तथा "म" रुद्र का वाचक है और उसका त्याग तालुमध्य में होता है। इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है।
तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है । भ्रूमध्य /आज्ञा चक्र में बिंदु का त्याग होता है। कपाल में ब्रह्मरन्ध्र ,मूर्धनी/ अधिपति, शिवरन्ध्र ..ये तीन मर्म स्थान है;जो क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु , शिव का प्रतीक है । नाद सदाशिव रूपी है; इसीलिए ललाट से मूर्धा /मुँह के अंदर का तालु तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है।
यहाँ तक का अनुभव स्थूल है। इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं। भ्रूमध्य / आज्ञा चक्र में बिंदु का तथा ब्रह्मरन्ध्र में स्पर्श अनुभूति का भी त्याग हो जाता है।
एवं उसके ऊपर मूर्धनी/ अधिपति में व्यापिनी शक्ति का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है। यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है।इसके उपरांत कुछ समय तक मन के विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दिखती है।
इसके बाद अंत में परम अनुग्रह प्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में अथार्त शिवरन्ध्र में प्रवेश होता है। इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है।
इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त अथार्त माया /प्रकृति के छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती है। ॐ शब्द 3½ मात्रा का एकाक्षर है। ओमकार आपको शारीरिक, मानसिक भावनात्मक रूप से आराम देता है।
ॐ के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा निकलती है वह आपके आसपास के वातावरण को शांतिपूर्ण तथा आनंदमयी बना देती है। इस प्राणायाम के द्वारा मन के मोह, अहंकार और मल को दूर करने में सहायता मिलती है।
इस को साधक जितना चाहे उतना कर सकता है। योगाभ्यास मेंओम के उच्चारण का अनन्य महत्व है। इसमें ओंकार का उच्चारण सुनना व बोलना दोनों का अंतर्भाव होता है। इसका लाभ उसे ही मिलता है जो स्वयं इसका अनुभव लेता है।
ओंकार प्राणायाम का अधिक लाभ सामूहिक रीति से एक लय व सुरताल में करने से होता है। ओंकार प्राणायाम को ओंकार साधना/प्रणव साधना/प्रणवोच्चार कहते हैं। इस प्राणायाम के द्वारा सर्वशक्तिमान परमात्मा को संबोधित करते हैं। ओंकार ही उस परमात्मा का प्रतीक हो सकता है।
ओम शब्द साढ़े तीन (3½ ) मात्रा का एकाक्षर है, यह नाम वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण व सिद्ध है।
अकार-1 मात्रा-कंठमूल से उत्पत्ति-ब्रह्म-उत्पत्ति।
ऊकार-2 मात्रा-होंठों से उत्पत्ति-विष्णु-स्थिति।
मकार-3 मात्रा-बंद होंठों से उत्पत्ति-शिव-लय।
हलंत-1/2 मात्रा। ओंकार सभी अक्षरों को व्याप्त करता है। जैसे सारी सृष्टि का प्रतिनिधित्व परमात्मा करता है वैसे ही सारे अक्षरों का प्रतिनिधित्व ओंकार करता है। ओंकार प्राणायाम कैसे करें अगले पोस्ट में
क्रमशः
06/03/2024, 9:44 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ..50
इस पोस्ट में समझते ओंकार प्राणायाम कैसे करें । इसे करने के लिए एकांत स्थान चुन ले। ध्यान रहे की स्थान बार बार ना बदले | सुखासन या पद्मासन की स्थिति में बैठ जाए। ध्यान रहे की सिर, पीठ, गर्दन और कमर सीधी रेखा में रहे।
शांति से आँखे बंद करे और ध्यान करे की सारी इन्द्रियां अपने स्थान पर सजग ह। | 3 बार लम्बी सांसे ले और सांसो को तेजी से छोड़ दे। इस क्रिया को दीर्घ श्वसन कहते है। ऐसे ही 3 से 4 बार दीर्घ श्वसन करने के उपरान्त जितना हो सके लंबी साँस ले।
दीर्घ श्वसन/ साँस को भीतर रोककर, मुँह खोलकर 'अ' का उच्चारण करे।इसका स्पंदन /वाइब्रेशन आपको अनाहत चक्र/ हृदय में महसूस होगा। इस तरह आप 7 बार ऐसा उच्चारण करें। पुनः लंबी सांस लेकर,साँस को रोक करके 'उ' का उच्चारण करें।
इसमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि आपको अपना मुंह गोल करके 'उ' उच्चारण करना होगा। इसका वाइब्रेशन आपको कंठ / विशुद्धि चक्र में होगा। यहां भी आप 7 बार ऐसा उच्चारण करें। इसके बाद पुनः लंबी सांस लेकर,साँस को रोक करके 'म' का उच्चारण करें।
इसमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि आपको मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके म' उच्चारण करना होगा। इसका स्पंदन आपको तालुमध्य ..आज्ञा चक्र तक में महसूस होगा। ऐसा 7 बार उच्चारण करें।
इसके बाद मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके ओम का उच्चारण करें। इसका स्पंदन आपको ब्रह्मरंध में होगा। इस प्रकार से इस ओंकार के उच्चारण की अनुभूति खुद ही करे। आरम्भ के समय में बराबर और दीर्घ उच्चारण अच्छे से नहीं हो पाता है।
परन्तु धीरे धीरे अभ्यास के साथ आप इसका उच्चारण करने लगेंगे। ओंकार का उच्चारण करने से एक प्रकार का दीर्घ कंपन पैदा होता है ;जिसका अनुभव मुख, गुहा, नाभि चक्र, कान के पास से होकर पूरे शरीर में होता है।
शारीरिक लाभ की दृष्टि से कंपन जरूरी है। यह ओंकार की साधना जब तक साधक को आनंद दे, तब तक वह करे।
ओंकार प्राणायाम से लाभ;-
ओंकार प्राणायाम से साधक को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक लाभ होता है। शरीर का सबसे छोटा हिस्सा ऊतकों को नवनिर्मित करनेका कार्यओंकार प्राणायाम करता है। ओंकार से प्रत्येक ऊतक चैतन्य से परिपूर्ण हो जाती है, इससे चेतना की जागृति होती है।
शरीर की आंतरिक इंद्रियों की सफाई होती है। सूक्ष्म मल दूर होता है। शरीर स्वस्थ, सुंदर व पवित्र बनता है। कंठनाली में स्वरतंतु की ट्यूनिंग होती ओर लंग्स की कार्यक्षमता बढ़ती है। श्वसन विकार दूर होते हैं। रक्तशुद्धि होती है। हृदय को विश्राम मिलता है। मज्जा संस्थान सक्रिय होता है।
पाचन क्रिया व उत्सर्जक क्रिया सुधरती है। मन के मल, मोह, अहंकार, मद से छुटकारा मिलता है। मन शांत, प्रसन्न रहता है। मन की आकलन शक्ति बढ़ती है। मन रिक्त, स्वच्छ, पवित्र व हल्कापन महसूस करता है।
इतना ही नहीं, एक मंगलमय वातावरण निर्मित होता है। हमारे दैनिक व्यवहार में आने वाले तनाव के कारण आने वाली निराशा , उदासी व अशांति ओंकार के स्पष्ट व दीर्घउच्चारण से नष्ट होती है।
ओंकार के नियमित उच्चारण से रक्तदान, दमा आदि तकलीफें दूर होती हैं। अत: स्रावी संस्थान चुस्त होता है। नर को नारायण बनानेकी क्रिया ओंकार प्राणायाम में है। बुद्धि तीव्र, निर्णायक क्षमता व स्मरण शक्ति बढ़ती है। शरीर, मन व बुद्धि को स्वस्थ रखने वाला अष्टांगों का सार ओंकार है।
ओंकार से अष्टांग योग का भी पालन हो जाता है। जिस प्रकार मन पर उत्तम संस्कार होनेके लिए जप, तप, कीर्तन, भजन आदि कर्मसाधन प्रचलित हैं, उसी प्रकार ध्यान की कल्पना करें तो ओंकार एक साधना प्रतीत होती है किन्तु इसका नियमित अभ्यास आवश्यक है।
अत: ऊषा काल में, ब्रह्म मुहूर्त में किसी रम्य स्थान में जाकर सूर्योदय के समय प्रसन्नचित्त बैठ कर यदि ओंकार का नियमित अभ्यास किया जाए तो यह उच्चारण सुमधुर, हृदय को प्रसन्न करने वाला होता है। प्रत्येक योग प्रेमी को नियमित रूप से श्रद्धा भाव से ओंकार का उच्चारण करना चाहिए।
क्रमशः
07/03/2024, 10:57 am - +91 82002 98756: "राम"
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07/03/2024, 2:17 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....51
अब समझते विज्ञान मय कोष के तीसरे चरण स्वर संयम के बारे । विज्ञान मय कोश वायु प्रधान कोश होने के कारण उसकी स्थिति में वायु संस्थान विशेष रूप से सजग रहता है। इस वायु तत्त्व पर यदि अधिकार प्राप्त कर लिया जाए तो अनेक प्रकार से अपना हित सम्पादन किया जा सकता है।
स्वर शास्त्र के अनुसार श्वास-प्रश्वास के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाड़ियों की संख्या 72000 है। इनको नसें न समझना चाहिए, स्पष्टत: यह प्राण-वायु आवागमन के मार्ग हैं। नाभि में इसी प्रकार की एक नाड़ी कुण्डली के आकार में है।
जिसमें से (1) इड़ा, (2) पिङ्गला, (3) सुषुम्ना, (4) गान्धारी, (5) हस्त-जिह्वा, (6) पूषा, (7) यशश्विनी, (8) अलम्बुषा, (9) कुहू तथा (10) शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ निकली हैं ।और यह शरीर के विभिन्न भागों की ओर चली जाती हैं। इनमें से पहली तीन प्रधान हैं।
इड़ा को ‘चन्द्र’ कहते हैं जो बाएँ नथुने में है। पिंगला को ‘सूर्य कहते हैं, यह दाहिने नथुने में है। सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य में है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चन्द्र नियमित रूप से अपना-अपना काम करते हैं।
उसी प्रकार इड़ा, पिंगला भी इस जीवन में अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं। इन तीनों के अतिरिक्त अन्य सात प्रमुख नाड़ियों के स्थान इस प्रकार हैं।
गान्धारी बायीं आँख में ।
हस्तजिह्वा दाहिनी आँख में ।
पूषा दाहिने कान में।
यशश्विनी बाएँ कान में ।
अलम्बुषा मुख में।
कुहू लिंग देश में ।
शंखिनी गुदा (मूलाधार) में।
इस प्रकार शरीर के दस द्वारों में दस नाड़ियाँ हैं। हठयोग में नाभिकन्द अर्थात् कुण्डलिनी स्थान गुदा द्वार से लिंग देश की ओर दो अँगुल हटकर मूलाधार चक्र माना गया है। स्वर योग में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से सम्बन्ध रखता है ।
और शरीर की नाभि या मध्य केन्द्र गुदा-मूल में नहीं, वरन् उदर की टुण्डी में ही हो सकता है। इसलिए यहाँ ‘नाभि देश’ का तात्पर्य उदर की टुण्डी मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष सम्बन्ध उदर से ही है, इसलिए प्राणायाम द्वारा उदर संस्थान तक प्राण वायु को ले जाकर नाभि केन्द्र से इस प्रकार घर्षण किया जाता है कि वहाँ की सुप्त शक्तियों का जागरण हो सके।
चन्द्र और सूर्य की अदृश्य रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा का गुण शीतल और सूर्य का उष्ण है। शीतलता से स्थिरता, गम्भीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चञ्चलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है।
मनुष्य को सांसारिक जीवन में शान्तिपूर्ण और अशान्तिपूर्ण दोनों ही तरह के काम करने पड़ते हैं। किसी भी काम का अन्तिम परिणाम उसके आरम्भ पर निर्भर है। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कर्मों को आरम्भ करते समय यह देख लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार काम करने के अनुकूल है कि नहीं।
एक विद्यार्थी को रात में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए जबकि उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद न कर सकेगा। यदि यही पाठ उसे प्रात:काल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए तो आसानी से सफलता मिल जाएगी।
क्रमशः
07/03/2024, 2:17 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......52
विज्ञानमय कोष का तीसरा चरण स्वर संयम आगे :-
ध्यान, भजन, पूजा, मनन, चिन्तन के लिए एकान्त की आवश्यकता है, किन्तु उत्साह भरने और युद्ध के लिए कोलाहलपूर्ण वातावरण की, बाजों की घोर ध्वनि की आवश्यकता होती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए कार्य अवश्य ही फलीभूत होते हैं।
इसी दृष्टिकोण के आधार पर स्वर-योगियों ने आदेश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चन्द्र स्वर में किए जाने चाइये। जैसे—विवाह, दान, मन्दिर, कुआँ, तालाब बनाना, नवीन वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण बनवाना, शान्ति के काम, पुष्टि के काम।
शफाखाना, औषधि देना, रसायन बनाना, मैत्री, व्यापार, बीज बोना, दूर की यात्रा, विद्याभ्यास, योग क्रिया आदि। यह सब कार्य ऐसे हैं जिनमें अधिक गम्भीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है, इसलिए इनका आरम्भ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए।
जब शरीर के सूक्ष्म कोश चन्द्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहे हों। उत्तेजना, आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है; जैसे ..क्रूर कार्य, युद्ध करना, मद्य पीना, काठ, पत्थर, एवं रत्न को तोड़ना; खेलकूद ,व्यायाम, नदी पार करना आदि।
संघर्ष और युद्ध आदि कार्य देश, समाज अथवा आश्रित की रक्षार्थ भी हो सकते हैं और उनको सब कोई प्रशंसनीय बतलाता है। इसी प्रकार विशेष परिश्रम के कार्यों का सम्पादन भी समाज और परिवार के लिए अनिवार्य होता है। वे भी सूर्य स्वर में उत्तमतायुक्त होते हैं।
कुछ क्षण के लिए जब दोनों नाड़ी इड़ा, पिंगला रुककर, सुषुम्ना चलती है, तब प्राय: शरीर सन्धि अवस्था में होता है। वह सन्ध्याकाल है। दिन के उदय और अस्त को भी सन्ध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत् होती हैं ।
और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है। स्वर की सन्ध्या से भी मनुष्य का चित्त सांसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ, कुछ आत्म-चिन्तन की ओर झुकता है।
वह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है, अल्पकाल के लिए आती है, इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिन्तन और ईश्वराराधना का अभ्यास किया जाए, तो नि:सन्देह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है।
किन्तु सांसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है, इसलिए सुषुम्ना स्वर में आरम्भ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता, वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा बहुत उदय होता है।
इसलिए इस समय में दिए हुए शाप या वरदान अधिकांश फलीभूत होते क्यों कि इन भावनाओं के साथ आत्म-तत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है।इड़ा शीत ऋतु है तो पिंगला ग्रीष्म ऋतु। जिस प्रकार शीत ऋतु के महीनों में शीत की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार चन्द्र नाड़ी शीतल होती है।
और ग्रीष्म ऋतु के महीनों में जिस प्रकार गर्मी की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार सूर्य नाड़ी में उष्णता एवं उत्तेजना का प्राधान्य होता है। स्वर बदलना कुछ विशेष कार्यों के सम्बन्ध में स्वर शास्त्रज्ञों के जो अनुभव हैं, उनकी जानकारी सर्वसाधारण के लिए बहुत ही सुविधाजनक होगी।
बताया गया है कि प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श करके उस चलित स्वर वाले कदम को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए।
क्रमशः
08/03/2024, 10:39 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....53
विज्ञानमय कोष का तीसरा चरण स्वर संयम आगे :-
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो अचलित स्वर (जो स्वर न चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करनी चाहिए। इसी रीति से उसकी बढ़ी हुई उष्णता को अपना अचलित स्वर की ओर का ।
शान्त भाग अपनी आकर्षण विद्युत् से खींचकर शान्त बना देगा और मनोरथ में सिद्धि प्राप्त होगी। गुरु, मित्र, अफसर, राजदरबार से जबकि बाम स्वर चलित हो, तब वार्तालाप या कार्यारम्भ करना ठीक है। कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यन्त ही आवश्यक हो सकता है।
किन्तु उस समय स्वर विपरीत चलता है। तब क्या उस कार्य के किए बिना ही बैठा रहना चाहिए? नहीं, ऐसा करने की जरूरत नहीं है। जिस प्रकार जब रात को निद्रा आती है ओर उस समय कुछ कार्य करना आवश्यक हो तब चाय आदि किसी उत्तेजक पदार्थ की सहायता से शरीर को चैतन्य करते हैं, उसी प्रकार हम कुछ उपायों द्वारा स्वर को बदल भी सकते हैं।
जो स्वर नहीं चल रहा, उसे अँगूठे से दबाएँ और जिस नथुने से साँस चलती है, उससे हवा खींचें। फिर जिससे साँस खींची है, उसे दबाकर पहले नथुने से-यानी जिस स्वर को चलाना है, उससे श्वास छोड़ें। इस प्रकार कुछ देर तक बार-बार करें, श्वास की चाल बदल जायेगी।
जिस नथुने से श्वास चल रहा हो, उसी करवट से लेट जायें, तो स्वर बदल जायेगा। इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है। जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उस ओर की काँख (बगल) में कोई सख्त चीज कुछ देर दबाकर रखो तो स्वर बदल जाता है।
योगी लोग मंत्र दण्ड रखते है । घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना कहा जाता है। चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रूई का फाया रखने से स्वर बदलता है।
क्रमशः
08/03/2024, 10:39 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......54
विज्ञानमय कोष का तीसरा चरण स्वर संयम आगे :-
एक हंस = श्वास को लंबा या दीर्घ समय तक रोकने की कोशिश करनी चाहिये । एक श्वास लेने और छोडने को एक हँसा कहते है । एक हँसा और दूसरे हँसा के बीच मे जितनॆ समय तक स्वास रोक सकते है अपनी-अपनी शक्ती के अनुसार रोकना चाहिये।
सामान्य आदमी एक मिनट में 15 हंस लेता जबकि बीमार ज्यादा लेता आप जितने कम लेते अभ्यास में तो आपकी स्वास स्वयं वैसे शिथिर होती हर एक मनुष्य दिन-रात में 21600 श्वास लेता है। इससे कम श्वास लेने वाला दीर्घजीवी होता है।
क्योंकि अपने धन का जितना कम व्यय होगा, उतने ही अधिक काल तक वह सञ्चित रहेगा।हमारे श्वास की पूँजी की भी यही दशा है। विश्व के समस्त प्राणियों में जो जीव जितना कम श्वास लेता है, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रहता है। इस तालिका से इसका स्पष्टीकरण हो जाता है ...
1-खरगोश ....38 बार......8 वर्ष
2 बन्दर .....32 बार.......10वर्ष
3-कुत्ता...... 29 बार.... 11वर्ष
4-घोड़ा......19 बार.....35 वर्ष
5-मनुष्य.... 13 बार.... 120 वर्ष
6-साँप.....8 बार.....1000 वर्ष
7-कछुआ....5 बार... 2000वर्ष
किसी योगी का उद्देश्य होता कि मिनट में 3 हंसा तक पहुंच सके । मनुष्य साधारण काम-काज में 12 बार, दौड़-धूप करने में 18 और मैथुन करते समय 36 बार प्रति मिनट के हिसाब से श्वास चलता है। इसलिए विषयी और लम्पट मनुष्य की आयु घट जाती है।
और प्राणायाम करने वाले योगाभ्यासी दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। साँस सदा पूरी और गहरी लेनी चाहिए तथा झुककर कभी न बैठना चाहिए। नाभि तक पूरी साँस लेने पर श्वासों की संख्या कम हो जाती है। मेरुदण्ड के भीतर एक प्रकार का तरल जीवन तत्त्व प्रवाहित होता रहता है।
जो सुषुम्ना को बलवान् बनाए रखता है, तदनुसार मस्तिष्क की पुष्टि होती रहती है। यदि मेरुदण्ड को झुका हुआ रखा जाए तो उस तरल तत्त्व का प्रवाह रुक जाता है और निर्बल सुषुम्ना मस्तिष्क का पोषण करने से वञ्चित रह जाती है।
सोते समय चित होकर नहीं लेटना चाहिए, इससे सुषुम्ना स्वर चलकर विघ्न पैदा होने की सम्भावना रहती है। ऐसी दशा में अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसलिए भोजनोपरान्त पहले बाएँ, फिर दाहिने करवट लेटना चाहिए।
भोजन के बाद कम से कम 15 मिनट आराम किए बिना यात्रा करना भी उचित नहीं है। शीतलता से अग्नि मन्द पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है। सूर्य स्वर में पाचन शक्ति की वृद्धि रहती है, अतएव इसी स्वर में भोजन करना उत्तम है।
इस नियम को सब लोग जानते हैं कि भोजन के उपरान्त बाएँ करवट से लेटे रहना चाहिए। उद्देश्य यही है कि बाएँ करवट लेटने से दक्षिण स्वर चलता है जिससे पाचन शक्ति प्रदीप्त होती है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की गतिविधि पर ध्यान रखने से वायु-तत्त्व पर अपना अधिकार होता है।
वायु के माध्यम से कितनी ही ऐसी बातें जानी जा सकती हैं, जिन्हें साधारण लोग नहीं जानते। मकड़ी को वर्षा से बहुत पहले पता लग जाता है कि मेघ बरसने वाला है, तदनुसार वह अपनी रक्षा का प्रबन्ध पहले से ही कर लेती है।
कारण यह है कि वायु के साथ वर्षा का सूक्ष्म संयोग मिला रहता है, उसे मनुष्य समझ नहीं पाता; पर मकड़ी अपनी चेतना से यह अनुभव कर लेती है कि इतने समय बाद इतने वेग से पानी बरसने वाला है। मकड़ी में जैसी सूक्ष्म वायु परीक्षण चेतना होती है।
उससे भी अधिक प्रबुद्ध चेतना स्वर-योगी को मिल जाती है। वह वर्षा, गर्मी को ही नहीं वरन् उससे भी सूक्ष्म बातें, भविष्य की सम्भावनाएँ, दुर्घटनाएँ, परिवर्तनशीलताएँ, विलक्षणताएँ अपनी दिव्यदृष्टि से जान लेता है। कई स्वर-ज्ञाता ज्योतिषियों की भाँति इस विद्या द्वारा भविष्यवक्ताओं जैसा व्यवसाय करते हैं।
स्वर के आधार पर ही मूक प्रश्न, तेजी-मन्दी, खोई वस्तु का पता, शुभ-अशुभ मुहूर्त आदि बातें बताते हैं। असफल होने की आशंका वाले, दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाले लोग भी स्वर का आश्रय लेकर अपना काम करते हैं।
क्रमशः
09/03/2024, 5:41 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....55
विज्ञानमय कोष का तीसरा चरण स्वर संयम में समझते क्या है वायु साधना शान्त वातावरण में मेरुदंड सीधा करके बैठ जाइए और नाभि चक्र में श्वेत; चमकीली ज्योति मंडल का ध्यान कीजिए। उस ज्योति केन्द्र में समुद्र के ज्वार भाटे की तरह हिलोरें उठती हुई दिखाई देगी।
यदि बांया स्वर चल रहा होगा तो उस ज्योति केन्द्र का वर्ण चन्द्रमा के समान पीला होगा और उसके बांये भाग से निकलने वाली इड़ा नाड़ी में होकर श्वांस प्रवाह का आवागमन होगा। नाभि से नीचे की ओर मूलाधार चक्र (गुदा और लिंग का मध्यवर्ती भाग) में होती हुई मेरुदंड में होकर मस्तिष्क के ऊपरी भाग की परिक्रमा करती हुई नासिका के बांए नथुने तक इड़ा नाड़ी जाती है।
नाभि केन्द्र के वाम भाग को क्रिया शीलता के कारण यह नाड़ी काम करती है और बांया स्वर चलता है। इस तथ्य को भावना के दिव्य नेत्रों द्वारा भली भांति, चित्रवत् देखे ..इड़ा ..पिंगला नाड़ी। यदि दाहिना स्वर चल रहा होगा तो नाभि केन्द्र का ज्योति मंडल सूर्य के समान तनिक नीलिमा लिये हुए श्वेत वर्ण का होगा ।
और उसके दाहिने भाग में से निकलने वाले पिंगला नाड़ी में होकर श्वांस प्रश्वांस क्रिया होगी। नाभि से नीचे मूलाधार में होकर मेरुदंड तथा मस्तिष्क में होती हुई दाहिने नथुने तक पिंगला नाड़ी गई है और नाभि चक्र के दाहिने भाग में चैतन्यता होती है और दाहिना स्वर चलता है।
इस सूक्ष्म क्रिया को ध्यान शक्ति द्वारा ऐसे मनोयोग पूर्वक निरीक्षण करना चाहिए कि वस्तु स्थिति ध्यान क्षेत्र में चित्र के समान स्पष्ट रूप से दिखने लगे। जब स्वर संधि होती है तो वह नाभि चक्र स्थिर हो जाता है। उसमें कोई हलचल नहीं होती और न उतनी देर तक वायु का आवागमन होता है।
इस संधि काल में एक तीसरी नाड़ी मेरुदंड में अत्यन्त द्रुत वेग से बिजली के समान कोंधती है साधारणतः एक क्षण के सौवें भाग में यह कोंध जाती है, इसे ही सुषुम्ना कहते हैं। सुषुम्ना का जो विद्युत प्रवाह है वही आत्मा की चंचल झांकी है।
आरम्भ में यह झांकी एक हलके झटके के समान किंचित प्रकाश की मंद किरण जैसी होती है। साधना से यह चमक अधिक प्रकाशवान और अधिक देर ठहरने वाली होती है। कुछ दिन बाद वर्षा काल में बादलों के मध्य चमकने वाली बिजली के समान उसका प्रकाश और विस्तार होने लगता है।
सुषुम्ना ज्योति में किन्हीं रंगों की आभा होना, उसका सीधा टेढ़ा तिरछा या वर्तुलाकार होना आत्मिक स्थिति का परिचायक है। तीन गुण, पांच तत्व, संस्कार एवं अन्तःकरण की जैसी स्थिति होती है उसी के अनुरूप सुषुम्ना का रूप ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होता है।
इड़ा पिंगला की क्रियाएं जब स्पष्ट दिखने लगें तब उनको साक्षी रूप से अवलोकन कीजिए। नाभि चक्र के जिस भाग में ज्वार भाटा आ रहा होगा वही स्वर चल रहा होगा और केन्द्र के उसी आधार पर सूर्य या चन्द्रमा का रंग होगा। यह क्रिया जैसे जैसे हो रही है उसको स्वाभाविक रीति से होते हुए देखते रहना चाहिए।
क्रमशः
09/03/2024, 5:41 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....56
विज्ञानमय कोष के तीसरे चरण स्वर संयम में वायु साधना आगे :-
एक सांस के भीतर पूरा प्रवेश होने पर जब वह लौटती है तो उसे ‘‘आभ्यांतर संधि’’ और जब सांस पूरी तरह बाहर निकल कर नई सांस भीतर निकलना आरम्भ करती है तब उसे ‘वाह्य संधि’ कहते हैं। इन कुम्भक कालों में सुषुम्ना की द्रुत गति गामिनी विद्युत आभा का अत्यन्त चपल प्रकाश विशेष सजगता पूर्वक दिव्य नेत्रों से देखना चाहिए।
सांस लेने और सांस छोड़ने के बीच के समयान्तराल को कुम्भक कहते हैं। किसी भी प्रकार का प्राणायाम करते समय तीन क्रियाएँ की जातीं हैं- पूरक, कुम्भक और रेचक। कुम्भक भी दो प्रकार का होता है- आन्तरिक कुम्भक और वाह्य कुम्भक। श्वास को अन्दर रोकने की क्रिया को आन्तरिक कुम्भक तथा श्वास को बाहर रोकने की क्रिया को बाहरी कुम्भक कहते हैं।
कुम्भक करते समय श्वास को अन्दर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है।आन्तरिक कुम्भक- इसके अन्तर्गत नाक के छिद्रों से वायु को अन्दर खींचकर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, उतनी देर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ दिया जाता है।
वाह्य कुम्भक - इसके अन्तर्गत वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, रोककर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचा लिया जाता है। जब इड़ा बदल कर पिंगला में या पिंगला बदल कर इड़ा में जाती है। अर्थात् एक स्वर जब दूसरे में परिवर्तित होता है तब सुषुम्ना की संधि बेला आती है।
अपने आप स्वर बदलने के अवसर पर स्वाभाविक सुषुम्ना का प्राप्त होना प्रायः कठिन होता है। इसलिए स्वर विद्या के साधक बताये गये स्वर बदलने के उपायों से वह परिवर्तन करते हैं और महा सुषुम्ना की संधि आने पर आत्म ज्योति का दर्शन करते हैं।
यह ज्योति आरम्भ में चंचल और विविध आकृतियों की होती है पर अन्त में स्थिर एवं मंडलाकार हो जाती है। यह स्थिरता ही विज्ञानमय कोश की सफलता है। इसी स्थिति में आत्म साक्षात्कार होता है। सुषुम्ना में अवस्थित होना, वायु पर अपना अधिकार कर लेना है।
इस सफलता के द्वारा लोक लोकान्तरों तक अपनी पहुंच हो जाती है और विश्व ब्रह्माण्ड पर अपना प्रभुत्व अनुभव होता है। प्राचीन काल में स्वर शक्ति द्वारा अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियां प्राप्त होती थी। आज के युग प्रवाह में वैसा तो नहीं होता पर ऐसे अनुभव होते हैं जिससे मनुष्य शरीर रहते हुए भी मानसिक आवरण में देव तत्व की प्रचुरता हो जाती है।
विज्ञानमय कोश के विजयी को भूदेव या मनुष्य तन धारी दिव्य आत्मा कह सकते हैं।
क्रमशः
10/03/2024, 12:06 pm - स्वर विज्ञान: This message was deleted
10/03/2024, 12:06 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....57
इस पोस्ट में हम समझे गे विज्ञानमय कोष के चौथे चरण आत्मानुभूति को किन्तु पहिले कुछ कहना चाहते आपको ।
ज्ञान प्राप्त करने के बहुत रास्ते है वेद शास्त्र ,साहित्य, किन्तु मुख्य श्रोत्र गुरु से कृपा होता ।
सिद्धान्त गुरु जी ने एक बात सिखाया की ज्ञान कहि से प्राप्त करो उसपर शोध करो सत्य को आत्मसात करो फिर वो ज्ञान तुम्हारा है ।
सब ज्ञान अनुभव ही है महापुरषो के , प्रमाणिकता केवल तब सिद्ध होती जब उस ज्ञान से आपको अनुभव होते सफलता मिलती ।
ज्ञान की गंगा गुरु परम्परा में जो बहती वो अनुभव के मामलों में शास्त्रों से ज्यादा करीब होती उसकी प्रमाणिकता में कोई शंका नही होती । इसलिए हर बात के लिए शास्त्र प्रमाण मांगना उचित नही ।
हमारा यह कहना नही की वेद शास्त्र गलत है हम यह कहना चाहते कि सबसे पहले, हर शब्द का मूल निहित 'अर्थ', एक और एकल ही होता है।
फिर आती है, शब्द की 'परिभाषा' जो अर्थ को विस्तार से कम से कम शब्दों में समझाने के लिए बनाई/बताई जाती है।
उसके बाद आता है भावार्थ अर्थात वह अर्थ जो हर व्यक्ति, अपनी समझ के अनुसार वह बताता है यानी व्यक्ति का उस शब्द के अर्थ के बारे में उसका अपना मतार्थ होता है।
पर यहाँ स्मरण रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है किये सब अर्थ, परिभाषा या मतार्थ या भावार्थ, सब के सब, शब्द के मूल अर्थ से अलग या परे नहीं हो सकते या उसको भ्रष्ट नहीं कर सकते।
इसीलिए आप पाएँगे कि अधिकतर श्लोकों और मंत्रों आदि का, ज्ञानीजनों और विद्वानों के द्वारा भावार्थ ही लिखा मिलता है।
शब्द या श्लोक के भावार्थ को अधिकतर तब भी लिखा जाता है जब प्रसंग के अनुसार अर्थ को समझाने का प्रयास हो।
पर यहाँ समस्या और त्रुटि तब हो जाती है जब ज्ञानीजनों के द्वारा किसी श्लोक के शब्दों का भावार्थ, लिखा जाता है और उनका लिखा भावार्थ उन शब्दों के मूल व निहित अर्थ से अलग-थलग होता है।
गलत होता है और उनके द्वारा सही अर्थ-ज्ञान के नाँ होने से वह अर्थ भ्रष्ट हो जाना होता है।
शुद्ध ज्ञान गुरु परम्परा से मिलता इस श्रृंखला में ज्ञान शोध के तप से कुंदन होता जाता ।
यह लिखने का उद्देश्य मात्र यह है कि बिना कारण हम पर किसी प्रकार का आरोप लगाना उचित नही।
हाँ विषय पर कोई शंका है तो आप उसका समाधान कर सकते हमारा फोन न0 ओर वाट्सअप न0 पेज पर अंकित है ।
सब ज्ञान यही से अर्जित करते जीवन मे लाभ लेते और आगे देते जाते यहिं परम्परा है । जैसे पिता ने आपको पैदा किया आप भी सन्तान पैदा कर प्रकृति चक्र चलाने में भूमिका अदा करते ।
आप भी विषय को समझो ओर आगे समझाओ ज्ञान पर कोई मोहर लगाता की मेरा है तो वो अज्ञानी ही है । अगली पोस्ट से फिर विषय पर आते ।
कलम को विराम देते यह आशा करते की हमारे प्रयासों को अपनी बुरी भावनाओं से न जोड़े । बुराई आप मे है आपको सुधार करना ।
10/03/2024, 12:07 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....58
अब हम समझते विज्ञानमय कोष के चौथे चरण आत्म अनुभूति को ।
आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है ।
जो आत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है। आमतौर से सभी लोग यह जानते हैं कि हम शरीर से भिन्न है। पर यह हमारा ज्ञान मस्तिष्क के अग्रभाव तक ही सीमित होता है। हम इस तथ्य को जानते तो हैं पर मानते नहीं।
व्यवहार में लोग अपने को शरीर ही अनुभव करते हैं और शरीर को जिन कामों में लाभ होता है ,सुख मिलता है, मनोरंजन होता है- उन्हें करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं। धन कमाने में और इन्द्रिय भोगों में आमतौर से लोगों का समय खर्च होता है।
जिन चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं ;वे शरीर के लाभ हानि से ही सम्बन्धित होती हैं। शरीर के लिए आत्मा की परवाह नहीं की जाती, पाप, अनीति, छल, दुराचार असत्य को अपनाकर भी लोग स्वार्थ साधन करते हैं.. वह शरीर से ही सम्बन्धित होते हैं।
जन साधारण का स्वार्थ शरीर स्वार्थ से ही सम्बन्धित होता है। संसार में शरीर को ही ‘मैं’ समझने की आम प्रवृत्ति है। ‘मैं’ का अर्थ आत्मा है इसे जानते जरूर हैं पर व्यवहार में मानते यह हैं कि ‘मैं’ का अर्थ है- मेरा शरीर। इस दृष्टि कोण से जीवन की गतिविधि में भारी अन्तर आ जाता है।
आत्मवादी और भौतिक दृष्टि कोण में वैसे बहुत थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है पर अन्तर के कारण जो परिणाम उपस्थित होते हैं। उनमें उतना ही भेद होता है जितना आकाश पाताल में। रेल की पटरी में लाइन बदलने की कैंची जहाँ लगी होती है ।
वहाँ कोई बहुत भारी अन्तर दिखाई नहीं देता पर जब एक गाड़ी एक तरफ की गुजरती है और दूसरी गाड़ी दूसरी तरफ से तो अन्त में जब चलते-चलते दोनों गाड़ियाँ पहुँचती हैं उन स्थानों में सैंकड़ों हजारों मील का अन्तर होता है।
एक पूर्व में पहुँचती है तो दूसरी पश्चिमी में, कैंची के काटने में दो चार अंगुल का फर्क होता है पर अन्त में उसका प्रतिफल बहुत ही भिन्न होता है। ठीक यही हालत आत्मिक और भौतिक दृष्टिकोणों के बीच में है। जो व्यक्ति स्वयं को आत्मा मानता है ।
वह अपना स्वार्थ उसे समझता है.. जिससे आत्मकल्याण होता है। वह आत्मकल्याण करने वाले विचार और कार्यों को अपनाता है। असंख्य मनुष्य स्वर्ग- नरक की, मुक्ति- बंधन की चिन्ता न करके आत्म हनन करते हुए भौतिक संपदायें कमाते हैं जिससे मनोवाँछित सुख सामग्री प्राप्त हो सके। ‘
मैं शरीर हूँ', इसलिये शरीर सुख के लिए धर्म अधर्म की परवाह न करता हुआ भौतिक संपदाएं कमाता है उसी में जीवन का प्रत्येक क्षण लगाता है। आज के इस लोकव्यापी दृष्टिकोण में परिवर्तन किये बिना कोई मनुष्य, कोई समाज, कोई राष्ट्र, सुख शान्ति से नहीं रह सकता।
“मैं आत्मा हूँ, ईश्वर का अविनाशी राजकुमार हूँ, अपने औजार शरीर और मन का उपयोग केवल उन्हीं कार्यों में करूंगा -जो मेरे गौरव के, कर्तव्य के, अनुकूल हैं।”यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण जिन व्यक्तियों ने अपना लिया है उनका जीवन क्रम एक सतोगुणी ढाँचे में ढल जाता है।
भौतिक दृष्टिकोण मनुष्य को चिन्ता, क्रोध, शोक, द्वेष, कलह, ईर्ष्या, मद, प्रस्तर, मोह, रोग, उद्वेग आवेश का नारकीय प्रतिफल उपस्थित करता है और आत्मिक दृष्टिकोण के कारण प्रेम सहयोग, प्रसन्नता, साहस, अभय, सन्तोष एवं सात्विक आनन्द का उपहार प्राप्त होता है। इनमें एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग कहा जा सकता है।
क्रमशः
11/03/2024, 8:56 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....59
विज्ञानमय कोष के चौथे चरण आत्म अनुभूति आगे :-
योग साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का प्रथम द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है।
सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि ''मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ। केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।
यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर आत्म जागरण योग टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए।
लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता है। इसको आत्मिक भूमिका का जागरण कहते हैं आत्म अनुभूति/आत्मज्ञान शास्त्र से नहीं, स्वयं से उत्पन्न होता है।
शब्द से नहीं, निशब्द से उत्पन्न होता है ; विचार से नहीं निर्विचार से उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान विकल्पों के इकट्ठा करने से नहीं निर्विकल्प समाधि में समाधान में उत्पन्न होता है। इसलिए शास्त्र आत्मज्ञता नहीं देता, स्वयं का बोध ही, स्वयं के प्रति जागना ही आत्मज्ञान है।
इंजीनियरिंग , डाक्टरी पढ़नी हो शास्त्रज्ञान से हो जाएगा। पर स्व के संबंध में बोध शास्त्र से नहीं हो सकता। शास्त्र तो विचार को परिपक्व कर देंगे। आत्म ज्ञान तो विचार के टूटने से होता है। शास्त्र तो बुद्धि को एक विशिष्ट तर्क भर देंगे और आप सोचते हैं कि आपको आत्मा का ज्ञान हो गया है ।
तो आप भी गलती में हैं। एक प्रचार आपके चित्त में बैठा है कि आत्मा है, ईश्वर है। प्रचार से एक विचार परिपक्व हो जाता है, अनुभव नहीं होता।अगर आपको आत्म-सत्य का अनुभव करना है तो प्रचार के प्रभाव छोड़ देने होंगे। जो स्वयं में भीतर है उसका निष्प्रभाव स्थिति में जागरण होता है।
प्रभाव बाह्य है। प्रभाव के अभाव में ही स्वयं का बोध अनुभव होता इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित होने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है।
स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं। आंख बाहर ही देख सकती है ;भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन योगियों ने कहा है, ''लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा''। लौटाने का मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ।
जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो देखने वाला बाहर न जाकर अपनी तरफ लौट आएगा। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है।
स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ बाहर की ध्वनि ,तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है ;वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है।
उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है। जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी।
ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं बोध संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना ,देना नहीं है।
कमरे में, कितना ही गहन अंधकार हो आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा। कोई भी स्थिति हो आप तो रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है।
इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म अनुभव प्रत्यक्ष है। यह बड़ी उलटी बात है क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं ।
कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम आंख है। आंख धोखा दे सकती है। नास्तिकों ने एक ही प्रत्यक्ष प्रमाण माना है कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे। लेकिन आंख रात में सपने भी देखती है ।
वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है और जब आंख रस्सी में, सांप देखती तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग -मरीचिका दिखाई पड़ जाती है।
इसलिए इंद्रियों का इतना भरोसा नहीं है । सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है। मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं हैं। लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है ।
इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है।और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है। आत्मा स्वयं प्रकाशित है। उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है।
अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला। उससे शरीर की सामर्थ्य से कोई भेद नहीं पड़ता। सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है।
लेकिन दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है। आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा। अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है।
इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है। लेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता, संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।
जगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं।एक छोटा सा जीवकोष्ठ है अमीबा'- उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है।उसे स्पर्श का अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो जगत को जानने की दृष्टि से अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है किन्तु आत्मा की दृष्टि से नहीं ।
जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है। कोई आश्चर्य न होगा कि किसी ग्रह पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए।हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
कि छठवीं इंद्रिय क्या होगी क्योंकि हमारा ज्ञान पांच का है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पांचवी इंद्रिय क्या होगी ।
क्रमशः
11/03/2024, 8:56 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...60
विज्ञान मय कोष के चौथे चरण आत्म अनुभूति आगे :-
एक अंधा व्यक्ति सोच भी नहीं सकता कि प्रकाश क्या होगा। वास्तव में आपके ज्ञान का अस्सी प्रतिशत आंख से आता है, बाकी चार इंद्रियों से तो केवल बीस प्रतिशत आता है। इसलिए अंधे पर हमें बहुत दया आती है।दया का कारण है कि उसका अस्सी प्रतिशत जीवन अंधेरे में है।
अस्सी प्रतिशत ज्ञान की उसे कोई संभावना नहीं है।परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं इसलिए अधिक मनुष्य प्राय: बाहर की वस्तुओं को देखने में ही जीवन व्यतीत कर देते अंतरात्मा को नहीं । किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरत्व को पाने की आकांक्षा से चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से हटाकर अंतरात्मा को देखा है।
सारे ध्यान के प्रयोग, अलग—अलग विधियों वाले प्रयोग, एक चीज को मौलिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आपकी सारी इंद्रियां शांत हो जाएं। किस ढंग से शांत हो, इसमें भेद है, लेकिन शांत हो जाएं, इसमें कोई विवाद नहीं है।
सब इंद्रिया शांत हो जाएं और आप भीतर रह जाएं। जगत बाहर रह जाए आप भीतर रह जाएं और बीच में कोई सेतु न रहे, कोई जोड़ न रहे। उस क्षण में अंतरात्मा आविर्भूत होती है, प्रगट हो जाती है।इंद्रियों को थका डालें, इतना थका डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए।
जो बाल बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं। किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को भी नहीं चाहते। विवेक का अर्थ इतना ही है कि जो निरर्थक है, वह हमें निरर्थक दिखाई पड़ जाए; जो सार्थक है, वह सार्थक दिखाई पड़ जाए।
जगत में हम कुछ भी चाहें, अगर न मिले तो दुख, और मिल जाए तो भी सुख नहीं। मनुष्य जहां है, वहीं दुखी है। सुखी मनुष्य खोजना कठिन है।सुखी मनुष्य वही हो सकता है, जो जहां है वहीं सुखी है। लेकिन जो जहां है वहीं सुखी है, ऐसे मनुष्य का नाम ही संन्यासी है।
और जो जहां है वहीं दुखी है, वह हमेशा भविष्य में ही जी रहा है। कल उसका सुख है। स्वर्ग कल है, आज कुछ भी नहीं। आज को समर्पित करेगा, लगाएगा ..कल के लिए। आज को जलाएगा कल के लिए, ताकि कल का स्वर्ग मिल जाए। कल कभी आता नहीं।
कल जब आएगा, वह आज ही होगा। वह उस आज को फिर कल के लिए लगाएगा। ऐसे वह लगाता जाता है। और एक दिन सिवाय मृत्यु के हाथ में कुछ भी नहीं आता। जो इस सत्य को जानकर कि बाहर कभी किसी को न कोई आनंद मिला है और न मिल सकता है।
अपने ही जीवन के प्रयोगों से इस रहस्य को समझकर, जो बाहर के अनित्य भोगों की आकांक्षा छोड़ देता है, वही विवेकशील है।बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ना और बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाना बिलकुल और बात है। कुछ नासमझ बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाते हैं।
बाहर की वस्तु को तो वही छोड़ने में लगता है, जो पहले बाहर की वस्तु को पकड़ने में लगा था। अब वह छोड़ने में लगता है। लेकिन उसकी नजर बाहर की वस्तु पर ही लगी रहती है। बाहर की वस्तु न तो पकड़ने योग्य है और न छोड़ने योग्य। न तुम उसे पकड़ सकते हो, न तुम उसे छोड़ सकते हो।
तुम हो कौन ..तुमने पकड़ा, वह तुम्हारी भ्रांति थी। तुम छोड़ रहे हो, यह तुम्हारी भ्रांति है। बाहर की वस्तु को न तुम्हारे पकड़ने से कुछ फर्क पड़ता है, न तुम्हारे छोड़ने से कुछ फर्क पड़ता है। तुम कल कहते थे, यह मकान मेरा है। मकान ने कभी नहीं कहा था कि तुम मेरे मालिक हो।
क्योंकि तुमसे पहले कोई और यही कह रहा था। उससे पहले कोई और यही कह रहा था और फिर एक दिन तुम कहते हो कि मैंने त्याग कर दिया है इस मकान का। न मकान तुम्हारा था, न तुम त्याग कर सकते हो। त्याग करना उतना ही पागलपन की बात है, जितना मालकियत की घोषणा थी।
त्याग तो मालिक कर सकता है। ज्ञानी इस सत्य को जान लेता है कि मैं मालिक ही नहीं हूं तो किसी चीज का छोडंगूा -पकडूगा कैसे। इस बोध का भीतर गहरा हो जाना कि न इस जगत में कुछ पकड़ा जा सकता है और न छोड़ा जा सकता है..वासना का त्याग है ।
पकड़ना, छोड़ना, दोनों ही नासमझी हैं। इस जगत में न पकड़ने योग्य कुछ है और न छोड़ने योग्य कुछ है। ऐसी तटस्थता में जो मनुष्य ठहर जाता है, वह विवेकशील है। उसकी वासना गिर जाती है। वह बाहर के जगत में दौड़ना बंद कर देता है।
तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, वह जो कांशसनेस है, वह जो बोध की शक्ति है, वह जो तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा ।यहां इस जगत में जो रस, सौंदर्य, सुख, जिसके कारण भोग रहे हैं, जो इस सबके भीतर छिपा है, जिसके बिना यह कोई भी घटना न घट पाएगी ।
आप रस ले रहे हैं, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप भीतर से तिरोहित हो जाएंगे, शरीर कोई रस न ले सकेगा। आपको सुगंध मालूम पड़ रही है, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप मौजूद न होंगे, सुगंध मालूम न पड़ेगी। इस जगत के जो भी अनुभव हो रहे हैं।
वे उस चैतन्य के आधार पर हो रहे हैं, जो भीतर छिपा है।तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, वही तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा। जब फूल में सुगंध आती है, तो हमारा ध्यान फूल पर जाता है। हमारा ध्यान उस पर नहीं जाता, जिसको सुगंध आ रही है।
फूल खिला, सुगंध फैली, आप पास में बैठे हैं या खड़े हैं ..सुगंध आई। यहां तीन हैं। एक तो फूल है, एक आप हैं, और दोनों के बीच में तैरती हुई सुगंध है।एक ज्ञेय है, एक ज्ञाता है, और एक ज्ञान है। हर जगह त्रिवेणी है। हर जगह ये तीन मौजूद हैं।
लेकिन हमारा ध्यान हमेशा ज्ञेय पर जाता है, आब्जेक्ट पर, वह जो जाना गया। हम कहते हैं, कैसा सुंदर फूल है! हम यह नहीं कहते कि कैसी सुंदर आत्मा है कि फूल की गंध ले सकी! ,वह भीतर जो छिपा है, कैसा सुंदर चैतन्य हैं,उसका हमें स्मरण ही नहीं आता।
न तो सुगंध उतनी कीमती है,न फूल उतना कीमती है, जितना वह कीमती है जिसके आधार पर ये सब घट रहा है। इस जीवन में जो भी हो रहा है,उस सबके पीछे छिपी हुई चेतना है।सभी स्वप्न स्वप्न के भीतर सत्य होते हैं।
स्वप्न के बाहर जब आप जागते हैं, तब असत्य हो जाते हैं। जैसे ही आप जागते हैं और पाते हैं कि अपने कमरे में सोया हुआ ..आप कहते हैं, सब झूठा था।स्वप्न जागृति से भी ज्यादा गहरा अनुभव है। क्योंकि जागृति स्वप्न को पूरी तरह नहीं पोंछ पाती, सुबह कुछ न कुछ याद रह जाता है।
लेकिन स्वप्न पूरी तरह आपकी जागृति को पोंछ डालता है..कुछ भी याद नहीं रहता। स्वप्न में जागरण असत्य हो जाता है। जागरण में स्वप्न असत्य हो जाता है। फिर सत्य क्या है? वास्तव में , सत्य दोनों में से कोई भी नहीं है। सत्य तो सिर्फ देखने वाला है, जिसको दोनों ही असत्य नहीं कर पाते।
क्रमशः
11/03/2024, 3:46 pm - Your security code with +91 95986 10251 changed. Tap to learn more.
13/03/2024, 10:13 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....61
विज्ञानमय कोष के चौथे चरण आत्म अनुभूति से आगे :-
रात में भी एक चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; सपने देखता है। और दिन में भी चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; जागृति के अनुभव देखता है।सपने बदल जाते हैं, जागरण बदल जाता है, लेकिन देखने वाला अपरिवर्तित रूप से सतत मौजूद रहता है।
स्मरण रखें, असत्य देखने के लिए भी सत्य देखने वाला चाहिए। झूठ स्वप्न को भी देखने के लिए एक सच्चा देखने वाला चाहिए। अगर आपको द्रष्टा का अनुभव होने लगे—दर्शन से आंख हटे, दृश्य से आंख हटे और पीछे छिपे द्रष्टा से थोड़ा सा भी तालमेल बैठने लगे।
तो आप पाएंगे कि परमात्मा से ज्यादा समीप और कोई भी नहीं। अभी उससे ज्यादा दूर और कोई भी नहीं है। अभी परमात्मा सिर्फ कोरा शब्द है। और जब भी हम सोचते हैं, तो ऐसा लगता है कि आकाश में कहीं बहुत दूर परमात्मा बैठा होगा ..किसी सिंहासन पर। यात्रा लंबी मालूम पड़ती है।
और परमात्मा यहां बैठा. है, ठीक सासों के पीछे!तो परमात्मा पास से भी पास है, क्योंकि तुम स्वयं वही हो। लेकिन यह खयाल तभी आएगा जब द्रष्टा पर ध्यान जाने लगे। तो परमात्मा एकदम निकट है। और जिसको परमात्मा इतना निकट मालूम होगा अपने भीतर, ध्यान रहे।
उसे सबके भीतर भी मालूम होने लगेगा।यह एक जीवन का अनिवार्य नियम है कि जो आपको अपने भीतर दिखाई पड़ता है, वही आपको दूसरों के भीतर दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। अगर आप चोर हैं, तो आपको चारों तरफ चोर दिखाई पड़ते हैं।
और लगता है, सब साजिश कर रहे हैं। अगर आप बेईमान हैं, तो आपको कोई ईमानदार नहीं दिखाई पड़ता। लगता है कि सब बेईमान हैं जल्दी धोखा देंगे। दूसरे के संबंध में, हमारी जो भी धारणा होती है, वह बहुत गहरे में अपनी ही धारणा होती है।
इसलिए बुरा व्यक्ति कभी नहीं मान पाता कि कोई अच्छा व्यक्ति हो सकता है। अगर आप उससे कहें कि फलां व्यक्ति अच्छा है, तो अविश्वास से सिर हिलाएगा। वह कहेगा कि ठहरो, थोड़े दिन में समझोगे। ज्यादा देर तक चीजें छिपी नहीं रहतीं ..पता चल ही जाएगा।
वह पता लगाने की पूरी कोशिश करेगा कि बुरा होना तो पक्का भरोसा है अच्छा होना तो आवरण ही हो सकता है। सिर्फ अच्छा व्यक्ति ही भरोसा करता है कि दूसरा अच्छा हो सकता है। अच्छा व्यक्ति मुश्किल पाता है कि कोई बुरा कैसे हो सकता है?
और ध्यान रहे, अगर आपको दूसरे के बुरे होने पर तत्काल भरोसा आ जाता हो, तो भूलकर मत समझना कि आप अच्छे व्यक्ति हैं। वह कसौटी है। अच्छे व्यक्ति को तो बड़ा मुश्किल है यह भरोसा लाना कि दूसरा बुरा है ..बुरा हो तो भी। ठीक वैसे ही जैसे बुरे व्यक्ति को भरोसा लाना मुश्किल है ।
कि दूसरा अच्छा है ..अच्छा हो तो भी। हम अपने से बाहर सोच ही नहीं सकते । इसलिए जिस व्यक्ति को द्रष्टा का अनुभव होने लगता है, उसे सबके भीतर भी द्रष्टा का अनुभव होने लगता है। वह आपके शरीर को नहीं देखता, आपके भीतर की झलक उसे मिलने लगती है।
उसे सब तरफ परमात्मा मौजूद मालूम होता है। इसलिए निंदा असंभव हो जाती है। निंदा असंभव तभी हो सकती है,जब दूसरे में हमें परमात्मा दिखाई पड़ने लगे। तब तो स्तुति हो सकती है, निंदा होने का कोई कारण नहीं रह जाता।
हमें सब तरफ शैतान दिखाई पड़ता है, इसलिए निंदा चलती है। शैतान को शैतान दिखाई पड़ता है, परमात्मा को परमात्मा दिखाई पड़ता है। आप जो हैं, वही आपके जगत का अनुभव है..उसी का फैलाव है। उसी दिन समझना कि आपके भीतर संतत्व का उदय हुआ।
जिस दिन आपको शैतान दिखाई पड़ना मुश्किल हो जाए। जैसे ही किसी व्यक्ति को अनुभव होता है कि वह समीपतम है, उसके बाद वह किसी की निंदा नहीं करता .. स्तुति सहज हो जाती है। उसे सबके भीतर उसकी झलक दिखाई पड़ने लगती है ।
सब दीयों में उसी की रोशनी। शरीर की गुफा में छिपा हुआ कोई अजन्मा है, जिसका कोई जन्म नहीं हुआ है और जो कभी मिटेगा नहीं,उसे जो देखता है, वही देखता है। बस उसके पास ही आंख है, भीतर की दृष्टि से ..बाकी सब अंधे हैं। बाहर कितना ही दिखाई पड़ता हो।
जो स्वयं को ही नहीं देख पाते, उनका आंखों का होना- न होना है। केवल वही ठीक देखता है जो अजन्मा को हृदय की गुफा में पहचान लेता है।जो देवी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है; जो हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहीं रहने वाली है उसे जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है।
प्राण की ऊर्जा जीवन ऊर्जा का नाम अदिति है। यह जो भीतर जीवन की धारा बह रही है,जो इस धारा को पहचान लेता है ..यही है वह परमात्मा।
क्रमशः
13/03/2024, 10:13 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......62
विज्ञानमय कोष के चौथे चरण आत्म अनुभूति से आगे :-
अग्नि की पूजा बड़ी प्राचीन है।अग्नि की एक खूबी है कि वह सदा ऊपर की तरफ जाती है,उसकी गति सदा ऊपर की तरफ है।अगर आप दीए को उलटा भी कर दें, तो भी ली ऊपर की तरफ जाएगी। और अग्नि की पूजा का मौलिक कारण यही है।
जैसे अग्नि छिपी होती है पदार्थों में और प्रगट करनी पड़ती है, वैसे ही परमात्मा भी छिपा है और प्रगट करना पड़ता है। पानी नीचे की तरफ बहता है, आग ऊपर की तरफ बहती है। आग का सहारा अगर पानी भी ले ले तो पानी तक ऊपर की तरफ बहने लगता है।
गरम हो जाए, उबल जाए, भाप बन जाए यात्रा बदल जाती है। पानी का गुणधर्म बदल जाता है। वह जो नीचे की तरफ बहता था, वह भी आकाश की तरफ उठने लगता है। पुराने दिनों में मनुष्य को अनुभव हुआ कि आग के अतिरिक्त किसी चीज में ऊपर की तरफ जाने की क्षमता नहीं है।
आग ग्रेविटेशन के विपरीत है। जमीन खींचती है, आग को नहीं खींच पाती। आग ऊपर की तरफ जाती है, जमीन उस पर कुछ भी नहीं कर पाती। जो चेतना ऊपर की तरफ जाने लगती है, वह आग उसका प्रतीक बन गई। और परमात्मा निरंतर ऊपर की तरफ जाती हुई चेतना का नाम है।
यह आग सबके भीतर छिपी है। थोड़ी सी रगड़ की जरूरत है। उस रगड़ का नाम साधना है। थोड़ा भीतर छिपी हुई अरणियों को टकराना पड़ेगा। पुराने जमाने में जब आग को पैदा करने के और कोई उपाय न थे, तो दो लकड़ियों को रगड़कर आग पैदा की जाती थी।
जिस लकड़ी को रगड़कर आग पैदा करते थे, उसका नाम अरणि था। रगड़ से कोई चीज पैदा नहीं होती, केवल प्रगट हो सकती है। जो छिपी हो, वह प्रगट हो सकती है। ध्यान के प्रयोग वस्तुत: अरणियों का टकराना हैं।आपके भीतर की ऊर्जा को थोड़ा संघर्षण से गुजरना पड़ेगा।
उस आग को जगाने के लिए श्रम जरूरी है। परमेश्वर सबका मूल उदगम और सबका अंतिम अंत है। उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं। परमात्मा का कोई अतिक्रमण नहीं हो सकता, क्योंकि सभी चीजों का अतिक्रमण करके जो उपलब्ध होता है, वह परमात्मा है।अस्तित्व की आखिरी सीमा है ।
अगर कोई कहता हो कि परमात्मा यहां नहीं वहां है, तो वह भ्रांति में है। क्योंकि वह सब जगह है। परलोक में परमात्मा है, ऐसा नहीं है, इस लोक में भी वही है। देखने वाली आंख चाहिए। और जिसके पास देखने वाली आंख है, उसे यहां ही दिखाई पड़ जाएगा।
और ध्यान रहे, जिसे यहां दिखाई नहीं पड़ता, उसे वहां भी दिखाई नहीं पड़ेगा। वह आंख पैदा हो जाए, तो सब जगह वह प्रगट हो जाता है। वह आंख पास में न हो, तो वह कहीं भी प्रगट नहीं होता। लेकिन लोग अपने को धोखा देते रहते हैं।
वे कहते हैं, वह यहां प्रगट नहीं हो रहा है क्योंकि यहां नहीं है, वहां परलोक में है। इस तरह अंधे अपना बचाव कर लेते हैं। उनको फिर यह खयाल नहीं होता कि हम अंधे हैं इसलिए दिखाई नहीं पड़ रहा। वह उनकी इस बात की कोशिश है कि हममें कोई गलती नहीं है कि वह हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है।
यहां है ही नहीं, वह परलोक में है। जब हम परलोक पहुंचेंगे, तब वह दिखाई पड़ेगा। इससे अंधों को बड़ी सुविधा हो जाती है, सांत्वना मिलती है।इसीलिए जैसे- जैसे मनुष्य बूढ़ा होने लगता है और परलोक करीब आने लगता है, वैसे -वैसे धार्मिक होने लगता है।
मंदिरों में, बूढ़े इकट्ठे हैं, जवान वहां दिखाई नहीं पड़ते। और कभी कोई जवान भी दिख जाए, तो समझना कि कोई न कोई गड़बड़ हो गई है। बूढ़े भी अपने बेटों को समझाते हैं कि धर्म अभी तुम्हारे काम का नहीं। इसकी एक उम्र होती है। जब बूढ़े हो जाओ, तब।
असल में मरने की घटना जब बिलकुल करीब आने लगे, कि अब परलोक जाना ही पड़ेगा, तो मनुष्य धार्मिक होना शुरू होता है। क्योंकि इस लोक में तो परमात्मा है नहीं। लेकिन यह व्यवस्था धोखे की है। जो यहां धार्मिक नहीं है, वह सिर्फ मौत के कारण धार्मिक नहीं हो जाएगा।
लेकिन मुक्तपुरुष को यहां इस संसार में भी मोक्ष ही दिखाई पड़ता है। कुछ और दिखाई पड़ने का उपाय नहीं है क्योंकि जो परब्रह्म यहां है. वही वहां परलोक में भी है। जो वहां है वही यहां इस लोक में भी है। इस जगत में जितना भी अस्तित्व है, जितने रूप हैं, वे एक के ही प्रतिबिंब हैं।
आपके भीतर, एक सरोवर की भांति आपकी चेतना में, उस एक की ही छाया बनी है। हम इस जगत को अनेक की भांति देखते हैं। वृक्ष, पत्थर अलग,आप अलग,मैं अलग, पड़ोसी अलग; सब अलग ..सब टूटे हुए, खंड -खंड । आकाश में, एक ही चांद होता है ।
पानी में ,झीलें सरोवर आदि में हजारों -लाखों प्रतिबिंब बनते हैं। जो इस जगत में उस परमात्मा को अनेक की भांति देखता है;वह भटकता है जन्म-मरण में। वह मनुष्य बारंबार जन्म-मरण को प्राप्त होता है । जो यहां भी उसे एक की भांति देख लेता है , वह तत्क्षण मुक्त हो जाता है।
अगली पोस्ट में हम समझते आत्म जागरण साधना के बारे ।
क्रमशः
13/03/2024, 11:04 am - +91 82002 98756: "राम"🙏
15/03/2024, 10:26 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग.....63
विज्ञानमय कोष के चौथे चरण में अब हम समझते आत्म जागरण साधना को । किसी शान्त या एकान्त स्थान में जाइए। निर्जन, कोलाहल रहित स्थान इस साधना के लिए चुनना चा हिए। इस प्रकार के स्थान पर घर का स्वच्छ, हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी।
हाथ मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आराम कुर्सी पर अथवा दीवार वृक्ष या मसनद के सहारे बैठ कर यह साधना भली प्रकार होती है। सुविधापूर्वक बैठ जाइए। तीन लम्बे-लम्बे साँस लीजिए पेट में भरी हुई वायु को पूर्ण रूप से बाहर निकालना ।
और फिर फेफड़ों में पूरी हवा भरना एक पूरा साँस कहलाता है। तीन पूरे साँस लेने से हृदय की भी उसी प्रकार एक धार्मिक शुद्धि होती है जैसे स्नान करने, हाथ पाँव धोकर बैठने से शरीर की शुद्धि होती है। तीन पूरे साँस लेने के बाद शरीर को शिथिल कीजिए शरीर के हर अंग में से खिंच कर प्राण शक्ति हृदय में एकत्रित हो रही है ऐसा ध्यान कीजिए।
हाथ पाँव आदि सभी अंग प्रत्यंग शिथिल ढीले निर्जीव, निष्प्राण हो गये हैं ऐसी भावना करनी चाहिए। मस्तिष्क से सब विचारधाराएं और कल्पनाएं शान्त हो गई हैं, और समस्त शरीर के अन्दर एक शान्त नील आकाश व्याप्त हो रहा है। इस शान्त शिथिल व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ दिन लगातार प्रयत्न करना पड़ता है।
अभ्यास से अधिक शिथिलता एवं शान्ति अनुभव होती जाती है। शरीर के भली प्रकार शिथिल हो जाने पर हृदय स्थान में एकत्रित अंगूठे के बराबर शुभ श्वेत ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करना चाहिए। ''अजर, अमर, शुद्ध, बुद्धि चेतन, पवित्र ईश्वरीय अंश आत्मा मैं हूँ।
मेरा वास्तविक स्वरूप वही है। मैं सत् चित आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ''। उस ज्योति के कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुए उपरोक्त भावनाएं मन में रखनी चाहिए।उपरोक्त शिथिलासन के साथ आत्म दर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है।
आत्म जागरण योग की दूसरी साधना; -
जब पहली साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। ऊपर लिखी हुई शिथिलावस्था में अखिल आकाश में नील वर्ण आकाश का ध्यान कीजिए। उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखिए।
“मैं ही यह प्रकाशवान आत्मा हूँ,” ऐसा निश्चित संकल्प कीजिए। अपने शरीर को नीचे भूतल पर निस्पंद अवस्था में पड़ा हुआ देखिए उसके अंग प्रत्यंगों का निरीक्षण एवं परीक्षण कीजिए। ''वह हर एक कल पुर्जा मेरा औजार है।
मेरा वस्त्र है ,यह यंत्र मेरी इच्छानुसार क्रिया करने के लिए प्राप्त हुआ है''- इस बात को बार-बार मन में दुहराइए। इस निस्पंद में मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में देखिए। वे दोनों हाथ बाँधे आपकी इच्छानुसार कार्य करने के लिए नतमस्तक खड़े हैं।
मैं इस शरीर और मन बुद्धि का उपयोग सच्चे आत्मस्वार्थ के लिए ही करूंगा- यह भावनाएं बराबर उस ध्यानावस्था में आपके मन में गूँजती रहनी चाहिए।
आत्म जागरण योग की तीसरी साधना;-
जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए। अपने को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखिए। ''मैं समस्त भूमंडल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्म क्षेत्र और लीला भूमि है।
भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को इच्छित प्रयोजन के लिए काम में लाता हूँ पर ये मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं। पंच भूतों की गतिविधि के कारण जो हलचलें संसार में हर घड़ी होती हैं वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजक आत्म जागरण योग दृश्य मात्र हैं।
मैं किसी की साँसारिक हानि लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध चैतन्य सत्यस्वरूप पवित्र निर्लिप्त अविनाशी आत्मा हूँ। मैं आत्मा हूँ, महान आत्मा हूँ। महान परमात्मा का विशुद्ध स्फुल्लिंग हूँ।
''तीसरी भूमिका का ध्यान जब अभ्यास में कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाय और हर घड़ी वही भावना रोम रोम में प्रतिभाषित होने लगे तो समझना चाहिए कि इस साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई यही जागृत समाधि या जीवन मुक्त अवस्थ है ।
क्रमशः
15/03/2024, 10:26 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....64
अब हम जानेंगे हमारे पांचवे कोष आनंदमय के बारे । आनन्दमय कोश के चार चरण प्रधान हैं। इन साधनों द्वारा साधक अपनी पंचम भूमिका को उत्तीर्ण कर लेता है , तो उसे और प्राप्त करना कुछ शेष नहीं रह जाता।
1- नाद,
2- बिंदु
3- कला
4-तुरीया
सबसे पहले प्रथम चरण नाद साधना को समझते ।
शब्द-ब्रह्म का दूसरा रूप जो विचार सन्देश की अपेक्षा कुछ सूक्ष्म है, वह नाद है। प्रकृति के अन्तराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण उठती रहती है, जिसकी प्रेरणा से आघातों द्वारा परमाणुओं में गति उत्पन्न हुई है और सृष्टि का समस्त क्रिया-कलाप चलता है।
यह प्रारम्भिक शब्द ‘ॐ’ है, यह ‘ॐ’ ध्वनि जैसे-जैसे अन्य तत्वों के क्षेत्र में होकर गुजरती है, वैसे ही वैसे उसकी ध्वनि में अन्तर आता है। बंशी के छिद्रों में हवा फेंकते हैं, तो उसमें एक ध्वनि उत्पन्न होती है। पर आगे के छिद्रों में से जिस छिद्र से जितनी हवा निकाली जाती है।
उसी के अनुसार भिन्न-भिन्न स्वरों की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार ॐ ध्वनि भी विभिन्न तत्वों के सम्पर्क में आकर विविध प्रकार की स्वर लहरियों में परिणत हो जाती हैं। इन स्वर लहरियों का सुनना ही नाद योग है।पंच तत्वों की प्रतिध्वनित हुई ॐकार की स्वर लहरियों को सुनने की।
नाद-योग साधना कई दृष्टियों से बड़ी महत्त्वपूर्ण है। प्रथम तो इस दिव्य संगीत के सुनने में इतना आनन्द आता है, जितना किसी मधुर से मधुर वाद्य या गायन सुनने में नहीं आता। दूसरे इस नाद श्रवण से मानसिक तन्तुओं का प्रस्फुटन होता है।
सर्प जब संगीत सुनता है, तो उसकी नाड़ी में एक विद्युत लहर प्रवाहित हो उठती है, मृग का मस्तिष्क मधुर संगीत सुनकर इतना उत्साहित हो जाता है कि उसे तन बदन का होश नहीं रहता। गायें दुहते समय मधुर बाजे बजाये जाते हैं, जिससे उनका स्नायु समूह उत्तेजित होकर अधिक मात्रा में दूध उत्पन्न करता है।
नाम का दिव्य संगीत सुनकर मानव-मस्तिष्क में ऐसी स्पंदन होती है, जिसके कारण अनेक गुप्त मानसिक शक्तियाँ विकसित होती हैं। इस प्रकार भौतिक और आत्मिक दोनों ही दिशाओं में गति होती है। तीसरा लाभ एकाग्रता है। नाद पर एकाग्र होने से मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एकत्रित होती हैं ।
और इस प्रकार मन को वश में करने तथा निश्चित कार्य पर उसे पूरी तरह लगा देने की साधना सफल हो जाती है। मानव- प्राणी अपने सुविस्तृत शरीर में बिखरी हुई अनन्त दिव्य शक्तियों का एकीकरण कर ऐसी महान् शक्ति उत्पन्न कर सकता है, जिसके द्वारा इस संसार को हिलाया जा सकता है ।
और अपने लिए आकाश में मार्ग बनाया जा सकता है।नाद की स्वर लहरियों को पकड़ते-पकड़ते साधक ऊँची रस्सी को पकड़ता हुआ उस उद्गम ब्रह्म तक पहुँच जाता है, जो आत्मा का अभीष्ट स्थान है। ब्रह्मलोक की प्राप्ति, दूसरे शब्दों में मुक्ति, निर्वाण परमपद आदि नामों से पुकारी जाती है।
नाद के आधार पर मनोलय करता हुआ साधक योग की अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचता है,और अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। आनन्दमय कोश की साधना में आनन्द का रसास्वादन होता है। इस प्रकार की आनन्दमयी साधनाओं में से कुछ महासाधनाऐं बड़ी महत्वपूर्ण हैं।‘
हमारे चारों ओर जितनी भी ठोस , द्रव व गैस आदि जितने भी मौलिक व कृत्रिम पदार्थ है । उन सबको यदि लगातार बिभाजित करते जायँ तो अणु , परमाणु , स्ट्रिंग , हाइज ओर बोसॉन जैसे अनेक अवस्थाओं को पार करने के बाद शब्द रूपी तरंगों के दर्शन होते हैं ।
इसलिए शब्द को कण कण मैं व ब्रह्म को शब्द मैं स्थित कहा गया है । शब्द’ को ब्रह्मा कहा है क्योंकि ईश्वर और जीव को एक श्रृंखला में बाँधने का काम शब्द के द्वारा ही होता है। सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारम्भ भी शब्द से हुआ है। पंच तत्वों में सबसे पहले आकाश बना, आकाश की तन्मात्रा शब्द है।
समस्त पदार्थों की भाँति शब्द भी दो प्रकार का है, सूक्ष्म और स्थूल। सूक्ष्म शब्द को विचार कहते हैं और स्थूल शब्द को ''नाद''। ब्रह्म लोक से हमारे लिए ईश्वरीय शब्द प्रवाह सदैव प्रवाहित होता है। ईश्वर हमारे साथ वार्तालाप करना चाहता है ।
क्रमशः
15/03/2024, 11:25 am - +91 82002 98756: "राम"
🙏🙏🙏🙏🙏
16/03/2024, 11:05 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग......67
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में अनहद नाद से आगे :- अपने को केंद्र समझने पर जोर है क्योंकि केंद्र में कोई ध्वनि नहीं है; केंद्र ध्वनि-शून्य है। यही कारण है कि हमे ध्वनि सुनाई पड़ती है; अन्यथा नहीं सुनाई पड़ती। ध्वनि ,ध्वनि को नहीं सुन सकती।
अपने केंद्र पर ध्वनि-शून्य होने के कारण हमे ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। केंद्र तो बिलकुल ही मौन है, शांत है। इसीलिए हम ध्वनि को अपनी ओर आते, अपने भीतर प्रवेश करते, अपने को घेरते हुए सुनते है । अगर तुम खोज लो कि यह केंद्र कहां है, तुम्हारे भीतर वह जगह कहां है ।
जहां सब ध्वनियां बह कर आ रही हैं तो अचानक सब ध्वनियां विलीन हो जाएंगी और तुम निर्ध्वनि में, ध्वनि-शून्यता में प्रवेश कर जाओगे।अगर तुम उस केंद्र को महसूस कर सको जहां सब ध्वनियां सुनी जाती हैं तो अचानक चेतना मुड़ जाती है।
एक क्षण तुम निर्ध्वनि से भरे संसार को सुनोगे और दूसरे ही क्षण तुम्हारी चेतना भीतर की ओर मुड़ जाएगी और तुम बस ध्वनि को, मौन को सुनोगे जो जीवन का केंद्र है। और एक बार तुमने उस ध्वनि को सुन लिया तो कोई भी ध्वनि तुम्हें विचलित नहीं कर सकती।
ध्वनि तुम्हारी ओर आती है; लेकिन वह कभी तुम तक पहुंच नहीं पाती। एक बिंदु है जहां कोई ध्वनि नहीं प्रवेश करती है; वह बिंदु तुम हो।अचानक हमारे विचार रुक जाते हैं! और हम 'अतीत' और 'भविष्य' दोनों के विचारों से मुक्त हो 'वर्तमान' समय में में आ खड़े होते हैं।
हमारे मन में कोई विचार नहीं होते हैं, सिर्फ एक सन्नाटा होता है । जो कि विचारों की अनुपस्थिति में आ खड़ा होता है। श्वास गहरी हो कर नाभि को छूती है। सिर में सांय - सांय की आवाज सुनाई पड़ती है| यही सांय - सांय की आवाज या सन्नाटा ....चौथे अनाहत चक्र का सन्नाटा है ।
जिसे अनहद नाद कहा गया है। यही है वर्तमान और 'वर्तमान' में जब हमारे मन में विचार नहीं होते हैं, तब दिल की धड़कनें सुनाई पड़ती है और हम प्रेम से भर जाते हैं। ध्यान में भी यही घटना घटती है। ध्यान में जब हम बैठते हैं तो हम अपनी श्वास को गहरी जाने देते हैं।
श्वास नाभि को छूती है और नाभि को छूते ही शरीर शिथिल होने लगता है और ज्यों ही शरीर शिथिल होता है विचार भी शिथिल होने लगते हैं ।और विचारों के शिथिल होते ही हम अतीत और भविष्य से मुक्त हो वर्तमान समय में आ जाते हैं ।
और वर्तमान में आते ही सिर में विचारों की जगह एक सन्नाटा सुनाई पड़ता है, अनहद नाद सुनाई पड़ता है और यह सिर्फ और सिर्फ वर्तमान में सुनाई पड़ता है, इसे हम अतीत और भविष्य में नहीं सुन सकते। सन्नाटा सुनाई पड़ने के साथ ही हमें अपनी श्वास की आवाज और दिल की धड़कनें साफ सुनाई पड़ने लगती है और हम आनंदित होने लगते हैं।
यदि ध्यान में दिल की धड़कनें सुनाई नहीं पड़ती है तो समझो हमारा ध्यान में प्रवेश हुआ ही नहीं है। ध्यान में हम मष्तिष्क से ह्रदय पर आ जाते हैं और ह्रदय पर आते हैं तो हमें ह्रदय की धड़कने सुनाई पड़ेंगी । वास्तव में ,सब हदें मनुष्य की बनाई हैं। परमात्मा तो स्वयं अनहद है.. असीम है।
उसके बोली को जो सुनने लगा, वह भी मानवीय हदों के पार निकल जाता है। ऐसा बोध अगर हो, तो जीवन में क्रांति हो जाती है। तब पहली बार तुम्हारे जीवन में धर्म के सूर्य का उदय होता है। परम शून्य में, परम शांति में, जहां लहर भी नहीं उठती।
ऐसे शांत सागर में या शांत झील में, जहां कोई विचार की तरंग नहीं, वासना की कोई उमंग नहीं, जहां शून्य संगीत बजता है, जहां अनाहत नाद गूंज रहा है वहीं हमारा घर है। अनहद में बिसराम..और जिसने उस शून्य को पा लिया, उसने ही विश्राम पाया। और उस विश्राम की कोई हद नहीं है.. कोई सीमा नहीं है।
क्रमशः
16/03/2024, 11:05 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....68
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते अनहद नाद के प्रकार ;- परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिए किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद बिंदूपनिषद् के 33 से 41 वें मन्त्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है।
इन मन्त्रों में बताया गया है जब पहली बार अभ्यास किया जाता है तो ‘नाद’ कई तरह का और बड़े जोर जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेघ और समुद्र की हरहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, वंशी की तरह गुंजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है।
चौंसठ अनाहत अब तक गिने गये हैं, पर उन्हें सुनना हर किसी के लिए सम्भव नहीं। जिसकी आत्मिक शक्ति जितनी ऊँची होगी, वे उतने ही सूक्ष्म शब्दों को सुनेंगे, पर उपरोक्त दस शब्द सामान्य आत्मबल वाले भी आसानी से सुन सकते हैं।
ध्यान को धीरे धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है।नादयोग के दस मंडल साधना ग्रन्थों में गिनाये गये । कहीं कहीं इन्हें लोक भी कहा गया है। एक ॐ कार ध्वनि और शेष नौ शब्द इन्हें मिलाकर दस शब्द बनते हैं। इन्हीं की श्रवण साधना शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहलाती है।
नादयोग के 'नौ' मंडल ;-
1-घोष नाद :- यह आत्मशुद्धि करता है, शरीर भाव को धीरे धीरे नष्ट कर के व मन को वशीभूत करके अपनी और खींचता है।
2-कांस्य नाद :- यह नाद जड़ भाव नष्ट कर के चेतन भाव की तरफ साधक को ले जाता हैं।
3-श्रृंग नाद :- यह नाद जब सुनाई देता हैं तब साधक की वासनाएं और इच्छाए नष्ट होने लगती हैं।
4-घंट नाद :- इसका उच्चारण साक्षात शिव करते हैं, यह साधक को वैराग्य भाव की तरफ ले जाती हैं।
5- वीणा नाद :- यहाँ इस नाद को जब साधक सुनता हैं तब मन के पार की झलक का पता चलता हैं ।
6-वंशी नाद :- इसके ध्यान से सम्पूर्ण तत्व के ज्ञान का अनुभव होता हैं।
7-दुन्दुभी नाद :- इसके ध्यान से साधक जरा व मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है।
8-शंख नाद :- इसके ध्यान व अभ्यास से स्वम् का निराकार भाव प्राप्त होता हैं।
9-मेघनाद :- जब ये सुनाई दे तब मन के पार की अवस्था का अनुभव होता हैं तथा शून्य भाव प्राप्त होता हैं।
इन सबको छोड़कर जो अन्य शब्द सुनाई देता है वह तुंकार कहलाता है, तुंकार का ध्यान करने से साक्षात् शिवत्व की प्राप्ति होती है।
अनहद नाद(अनहद धुनी) का प्रभाव;-
1-हमें बिना बजाये अंदर घंटे, शंख, नगाड़े बजते सुनाई देते है जिसे कोई बहरा भी सुन सकता है। जब हम शून्य के पथ पर आगे बढ़ते है तो पहले झींगुर की ध्वनि की तरह की आवाज़ सुनाई पड़ती है तथा जब चिड़िया की ध्वनि की तरह की आवाज़ सुनाई देती है तब पूरा शरीर टूटने लगता है जैसे मलेरिया बुखार हुआ हो।
2-जब घंटे की आवाज़ सुनाई पड़ती है तो मन खिन्न हो जाता है ।जब शंख की आवाज़ सुनाई पड़ती है तब पूरा सिर भन्ना उठता है ।गहराई से जब वीणा की आवाज़ सुनाई देती है तब मन मस्त हो जाता है तथा अमृत प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाता है । जब बांसुरी की आवाज़ सुनाई पड़ने लगती है तब गुप्त रहस्य का ज्ञान हो जाता है तथा मन प्रभु के प्रेम में रम जाता है।
3-जब तबले की ध्वनि अंदर सुनाई देती है तब परावाणी की प्राप्ति हो जाती है ।जब भेरी की आवाज़ सुनाई पड़ती है तब भय समाप्त हो जाता है तथा दिव्य दृष्टि साधक को प्राप्त हो जाती है तथा मेघनाद सुनाई देने पर परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।
यह अनहद सूक्ष्म लोगों की दिव्य भावना है। सूक्ष्म जगत में किसी स्थान पर क्या हो रहा है, किसी प्रायोजन के लिए कहाँ क्या आयोजन हो रहा है, इस प्रकार के गुप्त रहस्य इन शब्दों द्वारा जाने जा सकते हैं। कौन साधक किस ध्वनि को अधिक स्पष्ट और किस ध्वनि को मन्द सुनेगा यह उसकी अपनी मनोभूमि की विशेषता पर निर्भर है।
अनहद नाद कैसे सुना जाये ?
1-108 प्रधान उपनिषदों में से नाद-बिंदु एक उपनिषद है, जिसमें बहुत से श्लोक इस नाद पर आधारित हैं। नाद को जब आप करते हो तो यह इसकी पहली अवस्था है । दूसरी अवस्था है जहाँ नाद करोगे नहीं .. सिर्फ़ अपने कानों को बंद किया और भीतर सूक्ष्म ध्वनि को सुनने की चेष्टा करना। यह सूक्ष्म ध्वनि आपके भीतर हो रही है।
इसे अनाहत शब्द कहते हैं पर तुम्हारा मन इतना बहिर्मुख है, बाहरी स्थूल शब्दों को सुनने में तुम इतने व्यस्त हो कि तुम्हारे भीतर जो दैवी शब्द हो रहे हैं, तुम उनको सुन भी नहीं पा रहे। कहाँ से ये शब्द उत्पन्न हो रहे हैं, ये शब्द सुनाई भी पड़ रहे हैं या नहीं, तुम्हे कुछ नहीं पता। यह ध्वनि बहुत ही सूक्ष्म है।
2-अनाहत शब्द योगाभ्यास द्वारा सुनने और जानने में आते हैं। श्वांस-प्रश्वांस के समय ''सो'' एवं ''हम्'' की ध्वनियाँ होती रहती हैं। यह स्पष्ट रूप से कानों के द्वारा तो नहीं सुनी जाती पर, ध्यान एकाग्र करने पर उस ध्वनि का आभास होता है।
अभ्यास करने से वह कल्पना प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में समझ पड़ती है। इसके बाद कानों के छेद बन्द करके ध्यान की एकाग्रता के रहते, घण्टा, घड़ियाल, शंख, वंशी, झींगुर, बादल गरजन जैसे कई प्रकार के शब्द सुनाई देने लगते हैं।आरम्भ में यह बहुत धीमे और कल्पना स्तर के ही होते हैं ।
किन्तु पीछेअधिक एकाग्रता के होने से वे शब्द अधिक स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। इसे एकाग्रता की चरम परिणति भी कह सकते हैं और अंतरिक्ष में अनेकानेक घटनाओं की सूचना देने वाले सूक्ष्म संकेत भी।
3-आकाश में अदृश्य घटनाक्रमों के कम्पन चलते रहते हैं। जो हो चुका है या होने वाला है, उसका घटनाक्रम ध्वनि तरंगों के रूप में आकाश में गूँजता रहता है। नाद योग की एकाग्रता का सही अभ्यास होने पर आकाश में गूँजने वाली विभिन्न ध्वनियों के आधार पर भूतकाल में जो घटित हो चुका है या भविष्य में जो घटित होने वाला है ।
उसका आभास भी प्राप्त किया जा सका है।यह एक असामान्य सिद्धि है।यदि हम अंदर की ध्वनि को सुनने में चित्त को लगायेंगे तो हमारा ध्यान लगेगा क्योंकि चित्त ध्वनि की ओर आकर्षित होता है।अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधी रखकर बैठ जाए। अंगुठे या तर्जनी अंगुली से कान बंद कर दे या कानों में रूई डाल दे तथा मन को बाहरी ध्वनि से हटाकर अन्दर की ध्वनि सुनने की कोशिश करे।
4-इसे दाहिने कान के अंदर सुनना है अर्थात चित्त को वहॉ लगाना है शुरू में आपको श्वास की आवाज़ सुनाई पड़ेगी आगे ओर गहराई में जाओंगे तो आपको अलग-अलग आवाज़े सुनाई पड़ेगी । गहराई में जाते जाना है अन्त में मेघनाद सुनाई पड़ेगा तथा परमात्मा का दर्शन होगा।नाद सुनने की प्रेक्टिस करने पर मन थकता नहीं है तथा आनन्द आता है।
पंच तत्वो का अभ्यास ही नाद से सिद्ध हो जाता है। जब नाद सुनाई देने लगता है तब बिना कानों में अंगुली ड़ाले सहज ही उसे सुन सकते है। मन को हमेशा नाद सुनने में लगाये रखना ही सच्ची भक्ति है तथा मुक्ति का साधन है। अगली पोस्ट में समझते नाद साधना का अभ्यास कैसे करे ।
क्रमशः
16/03/2024, 1:03 pm - +91 82002 98756: "राम"
🙏🙏🙏🙏🙏
17/03/2024, 10:46 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...69
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते अनाहत शब्द का अभ्यास यह शिव पुराण से लिया गया। भगवान शिव माँ पार्वती से कहते "एकांत स्थान पर सुखासन में बैठ जाएँ। ईश्वर का स्मरण करे। तेजी से तीन बार सांस अन्दर खींचकर फिर तेजी से पूरी सांस बाहर छोड़कर रोक लें।
श्वास इतनी जोर से बाहर छोड़ें कि इसकी आवाज पास बैठे व्यक्ति को भी सुनाई दे। इस प्रकार सांस बाहर छोड़ने से वह बहुत देर तक बाहर रुकी रहती है। श्वास रुकने से मन भी रुक जाता है और आँखों की पुतलियाँ भी रुक जाती हैं।
साथ ही आज्ञा चक्र पर दबाव पड़ता और खुलने लगता। श्वास व मन के रुकने से अपने आप ही ध्यान होने लगता है और आत्मा का प्रकाश दिखाई देने लगता है। यह विधि शीघ्र ही आज्ञा चक्र को जाग्रत कर देती है।
2-शिवजी ने माँ पार्वती से कहा :-रात्रि में एकांत में बैठ जाएँ,आँख बंद करें। हाथों की अँगुलियों से आँखों की पुतलियों को दबाएँ। इस प्रकार दबाने से तारे-सितारे दिखाई देंगे। कुछ देर दबाये रखें फिर धीरे-धीरे अँगुलियों का दबाव कम करते हुए छोड़ दें ।
तो आपको सूर्य के सामान तेजस्वी गोला दिखाई देगा... इसे तैजस ब्रह्म कहते हैं। इसे देखते रहने का अभ्यास करें। कुछ समय के अभ्यास के बाद आप इसे खुली आँखों से भी आकाश में देख सकते हैं। इसके अभ्यास से समस्त विकार नष्ट होते हैं, मन शांत होता है और परमात्मा का बोध होता है।
3- शिवजी ने माँ पार्वतीसे कहा :- रात्रि में ध्वनिरहित, अंधकारयुक्त, एकांत स्थान पर बैठें।तर्जनी अंगुली से दोनों कानों को बंद करें,आँखें बंद रखें। कुछ ही समय के अभ्यास से अग्नि प्रेरित शब्द सुनाई देगा. ..इसे शब्द-ब्रह्म कहते हैं।
यह शब्द या ध्वनि नौ प्रकार की होती है। इसको सुनने का अभ्यास करना शब्द-ब्रह्म का ध्यान करना है। इससे संध्या के बाद खाया हुआ अन्न क्षण भर में ही पच जाता है और संपूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत से उपद्रवों का शीघ्र ही नाश करता है।
यह शब्द ब्रह्म न ॐकार है, न मंत्र है, न बीज है, न अक्षर है... यह अनाहत नाद है (अनाहत अर्थात बिना आघात के या बिना बजाये उत्पन्न होने वाला शब्द). इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता है। नाद-योग गहरी साधना है।
नाद-योग की साधना करने से पहले भ्रामरी, ऊँकार के गुंजन उससे भी पहले ऊँ के उच्चारण का अभ्यास करें। फिर ऊँ का गुंजन हो। इसके साथ ही साथ योगनिद्रा चल रही हो तो धीरे-धीरे तीन से चार महीने में अथवा छह महीने में आप नाद-योग की साधना सिद्ध कर सकेंगे।
इसकी सिद्ध होते ही ईश्वरीय सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त होने लगती हैं। अगली पोस्ट में समझते अनहद नाद शुरुवात में सुनने का उपाय ।
क्रमशः
17/03/2024, 10:46 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग....70
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते अनहद नाद शुरुवात में सुनने का उपाय । नाद क्रिया के दो भाग है-बाह्य और अन्तर। बाह्य नाद में बाहर की दिव्य आवाजें सुनी जाती हैं और बाह्य जगत की हलचलों की जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।
और ब्रह्माण्डीय शक्ति धाराओं को आकर्षित करके, अपने में धारण किया जाता है। अन्तः नाद में भीतर से शब्द उत्पन्न करके-भीतर ही भीतर परिपक्व करते और परिपुष्टि होने पर उसे किसी लक्ष्य विशेष पर किसी व्यक्ति के अथवा क्षेत्र के लिए फेंका जाता है ।
और उससे अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति की जाती है। इसे धनुषबाण चलाने के समतुल्य समझा जा सकता है। अन्तःनाद के लिए भी बैठना तो ब्रह्मनाद की तरह ही होता है, पर अन्तर ग्रहण एवं प्रेषण का होता है। सुखासन में मेरुदंड को सीधा रखते हुए षडमुखी मुद्रा में बैठने का विधान है।
षडमुखी मुद्रा का अर्थ है-दोनों अँगूठों से दोनों कान बन्द करना। दोनों हाथों की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से दोनों नथुनों पर दबाव डालना। नथुना पर इतना दबाव नहीं डाला जाता कि साँस का आवागमन ही रुक जाय।
''होठ बन्द, जीभ बन्द ..मात्र भीतर ही पराशन्ति वाणियों से ॐ कार का गुँजार प्रयास'' यही है अन्तःनाद उत्थान। इसमें कंठ से मन्द ध्वनि होती रहती है। अपने आपको उसका अनुभव होता है और अन्तः चेतना उसे सुनती है।
ध्यान रहे यह ॐ कार का जप या उच्चारण नहीं गुँजार है। गुँजार का तात्पर्य है शंख जैसी ध्वनि, धारा एवं घड़ियाल जैसी थरथराहट का सम्मिश्रणइसका स्वरूप लिखकर ठीक तरह नहीं समझा समझाया जा सकता। इसे अनुभवी साधकों से सुना और अनुकरण करके सीखा जा सकता है।
साधना आरम्भ करने के दिनों में, दस-दस सेकेण्ड के तीन गुँजार बीच-बीच में पाँच-पाँच सेकेण्ड रुकते हुए करने चाहिए। इस प्रकार 40 सेकेण्ड का एक शब्द उत्थान हो जाएगा ।इतना करके उच्चार बन्द और उसकी प्रतिध्वनि सुनने का प्रयत्न करना चाहिए।
जिस प्रकार गुम्बजों में, पक्के कुओं में, विशाल भवनों में, पहाड़ों की घाटियों में जोर से शब्द करने पर उसकी प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार अपने अंतःक्षेत्र में ॐ कार गुँजार के छोड़े हुए शब्द प्रवाह की प्रतिध्वनि उत्पन्न हुई अनुभव करनी चाहिए।
पूरी ध्यान एकाग्र करके इस सूक्ष्म प्रतिध्वनि का आभास होता है आरम्भ में बहुत प्रयत्न से, बहुत थोड़ी-सी ,अतीव मन्द,रुक- रुककर सुनाई पड़ती है, किन्तु धीरे धीरे उसका उभार बढ़ता चलता है और ॐ कार की प्रतिध्वनि अपने ही अन्तराल में अधिक स्पष्ट सुनाई पड़ने लगती है।
स्पष्टता को इस साधना की सफलता का चिह्न माना जा सकता है।ओंकार की उठती हुई प्रतिध्वनि अंतःक्षेत्र के प्रत्येक विभाग को-क्षेत्र को - प्रखर बनाती है। उन संस्थानों की प्रसुप्त शक्ति जगाती है। उससे आत्मबल बढ़ता है। और छिपी हुई दिव्य शक्तियाँ प्रकट एवं परिपुष्ट होती है।
समयानुसार इसका उपयोग शब्दबेधी बाण की तरह-प्रक्षेपास्त्र की तरह हो सकता है। भौतिक एवं आत्मिक हित-साधन के लिए इस शक्ति को समीप वर्ती अथवा दूरवर्ती व्यक्तियों तक भेजा जा सकता है और उनको कष्टों से उबारने तथा प्रगति पथ पर अग्रसर करने के लिए किया जा सकता है।
वरदान देने कीक्षमता-परिस्थितियों में परिवर्तन कर सकने जितनी समर्थता जिस शब्द ब्रह्म के माध्यम से सम्भव होती है उसे ॐ कार गुँजार के आधार पर भी उत्पन्न एवं परिपुष्ट किया जाता है।
पुरानी परिपाटी में षडमुखी मुद्रा का उल्लेख है। मध्यकाल में उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई और कान को कपड़े में बँधे मोम की पोटली से कर्ण छिद्रों का बन्द कर लेना पर्याप्त समझा गया । इससे दोनों हाथों को गोदी में रखने और नेत्र अर्धोन्मीलित रखने की ध्यान मुद्रा ठीक तरह सधती और सुविधा रहती थी।
अब अनेक आधुनिक अनुभवी शवासन शिथिलीकरण मुद्रा में अधिक अच्छी तरह ध्यान लगने का लाभ देखते हैं। आराम कुर्सी का सहारा लेकर शरीर को ढीला छोड़ते हुए नादानुसन्धान मेंअधिक सुविधा अनुभव करते हैं।
कान बन्द करने के लिए ईयर प्लग प्रयोग कर लिया जाता है। इनमें से जिसे जो प्रयोग अनुकूल पड़े वह उसे अपना सकता है। अनहद शब्द हमारे भीतर गूंज रहा है और उसे सुनने के लिए हमें कोई ऐसी विधि सीखनी होगी ।
जिससे हम अपने मन को शांत कर सकें और फिर अपने भीतर विद्यमान दिव्य शक्ति से संपर्क कर सकें। अगली पोस्ट में समझते नाद साधना विधि ।
क्रमशः
17/03/2024, 11:47 am - +91 98877 80007: प्रणाम...
65 - 66, पोस्ट रिसीव नहीं हुई है, कृपया यह भी पोस्ट कर दो...🙏
17/03/2024, 12:08 pm - स्वर विज्ञान: जी अवश्य प्रभुजी 🙏🌹
17/03/2024, 12:08 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ......65
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना आगे :- ईश्वर हमारे साथ वार्तालाप करना चाहता है, पर हममें से बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो उसे सुनना चाहते हैं या सुनने की इच्छा करते हैं, ईश्वरीय शब्द निरन्तर एक ऐसी विचारधारा प्रेरित करते हैं जो हमारे लिए अतीव कल्याणकारी होती हैं।
उसको यदि सुना और समझा जा सके तथा उसके अनुसार मार्ग निर्धारित किया जा सके तो निस्सन्देह जीवनोद्देश्य की ओर तीव्र गति से अग्रसर हुआ जा सकता है। यह विचारधारा हमारी आत्मा से टकराती है। हमारा अन्तःकरण एक रेडियो है।
जिसकी ओर यदि अभिमुख हुआ जाय, अपनी-वृत्तियों को अन्तर्मुख बना कर आत्मा में प्रस्फुटित होने वाली दिव्य विचार-लहरियों को सुना जाय।तो ईश्वरीय वाणी हमें प्रत्यक्ष में सुनाई पड़ सकती हैं, इसी को आकाशवाणी कहते हैं। हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं ?
हमारे लिए क्या उचित ,अनुचित ? इसका प्रत्यक्ष सन्देश ईश्वर की ओर से प्राप्त होता है। अन्तःकरण की पुकार, आत्मा का आदेश, ईश्वरीय सन्देश, आकाशवाणी विज्ञान आदि नामों से इसी विचारधारा को पुकारते हैं।अपनी आत्मा के यन्त्र को स्वच्छ करके जो इस दिव्य सन्देश को सुनने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, वे आत्मदर्शी एवं ईश्वर-परायण कहलाते हैं।
ईश्वर उनके लिए बिलकुल समीप होता है, जो ईश्वर की बातें सुनते हैं और अपनी उससे कहते हैं। इस दिव्य मिलन के लिए हाड़-माँस के स्थूल नेत्र या कानों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आत्मा की समीपता में बैठा हुआ अन्तःकरण अपनी दिव्य इन्द्रियों की सहायता से इस कार्य को आसानी से पूरा कर लेता है।
जितनी आन्तरिक पवित्रता बढ़ती जाती है, उतने ही दिव्य सन्देश बिलकुल स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। आरम्भ में अपने लिए कर्तव्य का बोध होता है, पाप- पुण्य का संकेत होता है, बुरा कर्म करते समय अन्तर में भय, घृणा, लज्जा, संकोच आदि का होना तथा उत्तम कार्य करते समय आत्मःसन्तोष, प्रसन्नता, उत्साह होना ...इसी स्थिति का बोधक है।
यह दिव्य सन्देश आगे चलकर भूत, भविष्य, वर्तमान की सभी घटनाओं को प्रकट करता है। किसके लिए क्या मन्तव्य बन रहा है और भविष्य में किसके लिए क्या घटना घटित होने वाली है ?सब कुछ उससे प्रकट हो जाता है और ऊंची स्थिति पर पहुँचने पर उसके लिए सृष्टि के सब रहस्य खुल जाते हैं।
कोई ऐसी बात नहीं है, जो उससे छिपी हो, परन्तु जैसे ही इतना बड़ा ज्ञान उसे मिलता है, वैसे ही वह उसका उपयोग करने में अत्यन्त सावधान हो जाता है। बाल-बुद्धि के लोगों के हाथों में यह दिव्य ज्ञान पड़ जाय, तो वे उसे बाजीगरी के खिलवाड़ करने में ही नष्ट कर दें।
अधिकारी पुरुष अपनी शक्ति का किसी को परिचय तक नहीं होने देते और उसे भौतिक बखेड़ों से पूर्णतया बचाकर अपनी तथा दूसरों की आत्मोन्नति में लगाते हैं।
क्रमशः
17/03/2024, 12:08 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....66
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते अनहद नाद क्या है :- अनहद नाद का शुद्ध रूप है अनाहत नाद। ‘आहत’ नाद वे होते हैं, जो किसी प्रेरणा या आघात से उत्पन्न होते हैं। वाणी के आकाश तत्व से टकराने अथवा किन्हीं दो वस्तुओं के टकराने वाले शब्द ‘आहत’ कहे जाते हैं ।
बिना किसी आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें “अनाहत या अनहद” कहते हैं। वे अनाहत या अनहद शब्द प्रमुखतः दस होते हैं, जिनके नाम हैं ।
1- संहारक
2- पालक
3- सृजक
4-सहस्रदल
5-आनन्द मण्डल
6-चिदानन्द
7-सच्चिदानन्द
8-अखण्ड,
9-अगम
10-अलख हैं।
इनकी ध्वनियाँ क्रमशः पायजेब की झंकार कीं-सी सागर की लहर की, बुलबुल की-सी होती हैं। जैसे अनेक रेडियो स्टेशनों से एक ही समय में अनेक प्रोग्राम ब्राडकास्ट होते रहते हैं। वैसेअनेक प्रकार के अनाहत शब्द भी प्रस्फुटित होते रहते हैं।उनके कारण, उपयोग और रहस्य उपरोक्त प्रकार हैं।
मुसलमान फ़कीर इसे अनहद कहते है अर्थात एक कभी न खत्म होने वाला कलाम/ध्वनि जो नश्वर नहीं है।सदगुरूओं ने कहा है कि अनहद शब्द के अन्दर प्रकाश है और उससे ध्वनि उत्पन्न होती है । यह ध्वनि नित्य होती रहती है ।
प्रत्येक के अन्दर यह ध्वनि निरन्तर हो रही है ।अपने चित्त को नौ द्वारो से हटाकर दसवे द्वार पर लगाया जाय तो यह नाद सुनायी दोता है।अनहद नाद ही परमात्मा के मिलाप का साधन है। इसके प्रकट होने पर आत्मा परमात्मा का रस प्राप्त करती है। गुरू मुख होकर इस शब्द को सुना जा सकता है।
इसके अभ्यास द्वारा पाप, मैल व सब ताप दूर होते है। जन्म-जन्मांतरों के दुखों की निवृति होकर आनन्द और सुख की प्राप्ति होती है। यह अपूर्व आनन्द की स्थिति होती है तथा निज घर में वास मिलता है संतो की आत्मा पिण्ड़(शरीर) को छोड़कर शब्द में लीन हो जाती है।
हम जब ध्यान करने बैठते है तो बाहर कोई भी आवाज़(ध्वनि) हो वह हमें आकर्षित करती है । जिससे हमारा चित्त उस ध्वनि की ओर आकर्षित होता है तथा ध्यान उचट जाता है।हम अंदर की ध्वनि को सुनने में चित्त लगायेंगे तो हमारा ध्यान लगेगा क्योंकि चित्त ध्वनि की ओर आकर्षित होता है।
अनहद नाद एक बिना तार की दैवी सन्देश प्रणाली है। साधक इसे जानकर सब कुछ जान सकता है। ध्वनि के केंद्र में स्नान करो, मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्वनि में स्नान कर रहे हो। कानों में अंगुली डाल कर नादों के नाद, अनाहत को सुनो।
इसका प्रयोग कई ढंग से किया जा सकता है। एक ढंग यह है कि कहीं भी बैठ कर इसे शुरू कर दो। ध्वनियां तो सदा मौजूद हैं।चाहे बाजार हो या हिमालय की गुफा, ध्वनियां सब जगह हैं। चुप होकर बैठ जाओ। और ध्वनियों के साथ एक बड़ी विशेषता है ।
जहां भी, जब भी कोई ध्वनि होगी, तुम उसके केंद्र होगे।सभी ध्वनियां तुम्हारे पास आती हैं, चाहे वे कहीं से आएं, किसी दिशा से आएं। आंख के साथ, अथार्त देखने के साथ यह बात नहीं है। दृष्टि रेखाबद्ध है, लेकिन ध्वनि वर्तुलाकार है; वह रेखाबद्ध नहीं है।
सभी ध्वनियां वर्तुल में आती हैं और तुम जहां भी हो, तुम सदा ध्वनि के केंद्र हो। ध्वनियों के लिए तुम सदा परमात्मा हो--समूचे ब्रह्मांड का केंद्र। हरेक ध्वनि वर्तुल में तुम्हारी तरफ यात्रा कर रही है। 'ध्वनि के केंद्र में स्नान '' करने के लिए तुम जहां भी हो वहीं आंखें बंद कर लो ।
और भाव करो कि सारा ब्रह्मांड ध्वनियों से भरा है । हरेक ध्वनि तुम्हारी ओर बही आ रही है और तुम उसके केंद्र हो। यह भाव भी कि मैं केंद्र हूं तुम्हें गहरी शांति से भर देगा। सारा ब्रह्मांड परिधि बन जाता है और तुम उसके केंद्र होते हो। और हर चीज, हर ध्वनि तुम्हारी तरफ बह रही है।
'मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्वनि में स्नान कर रहे हो।अगर तुम किसी जलप्रपात के किनारे खड़े हो तो वहीं आंख बंद करो और अपने चारों ओर से ध्वनि को अपने ऊपर बरसते हुए अनुभव करो। और भाव करो कि तुम उसके केंद्र हो।
क्रमशः
17/03/2024, 12:52 pm - +91 98877 80007: 🙏
18/03/2024, 11:41 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग......67
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में अनहद नाद से आगे :- अपने को केंद्र समझने पर जोर है क्योंकि केंद्र में कोई ध्वनि नहीं है; केंद्र ध्वनि-शून्य है। यही कारण है कि हमे ध्वनि सुनाई पड़ती है; अन्यथा नहीं सुनाई पड़ती। ध्वनि ,ध्वनि को नहीं सुन सकती।
अपने केंद्र पर ध्वनि-शून्य होने के कारण हमे ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। केंद्र तो बिलकुल ही मौन है, शांत है। इसीलिए हम ध्वनि को अपनी ओर आते, अपने भीतर प्रवेश करते, अपने को घेरते हुए सुनते है । अगर तुम खोज लो कि यह केंद्र कहां है, तुम्हारे भीतर वह जगह कहां है ।
जहां सब ध्वनियां बह कर आ रही हैं तो अचानक सब ध्वनियां विलीन हो जाएंगी और तुम निर्ध्वनि में, ध्वनि-शून्यता में प्रवेश कर जाओगे।अगर तुम उस केंद्र को महसूस कर सको जहां सब ध्वनियां सुनी जाती हैं तो अचानक चेतना मुड़ जाती है।
एक क्षण तुम निर्ध्वनि से भरे संसार को सुनोगे और दूसरे ही क्षण तुम्हारी चेतना भीतर की ओर मुड़ जाएगी और तुम बस ध्वनि को, मौन को सुनोगे जो जीवन का केंद्र है। और एक बार तुमने उस ध्वनि को सुन लिया तो कोई भी ध्वनि तुम्हें विचलित नहीं कर सकती।
ध्वनि तुम्हारी ओर आती है; लेकिन वह कभी तुम तक पहुंच नहीं पाती। एक बिंदु है जहां कोई ध्वनि नहीं प्रवेश करती है; वह बिंदु तुम हो।अचानक हमारे विचार रुक जाते हैं! और हम 'अतीत' और 'भविष्य' दोनों के विचारों से मुक्त हो 'वर्तमान' समय में में आ खड़े होते हैं।
हमारे मन में कोई विचार नहीं होते हैं, सिर्फ एक सन्नाटा होता है । जो कि विचारों की अनुपस्थिति में आ खड़ा होता है। श्वास गहरी हो कर नाभि को छूती है। सिर में सांय - सांय की आवाज सुनाई पड़ती है| यही सांय - सांय की आवाज या सन्नाटा ....चौथे अनाहत चक्र का सन्नाटा है ।
जिसे अनहद नाद कहा गया है। यही है वर्तमान और 'वर्तमान' में जब हमारे मन में विचार नहीं होते हैं, तब दिल की धड़कनें सुनाई पड़ती है और हम प्रेम से भर जाते हैं। ध्यान में भी यही घटना घटती है। ध्यान में जब हम बैठते हैं तो हम अपनी श्वास को गहरी जाने देते हैं।
श्वास नाभि को छूती है और नाभि को छूते ही शरीर शिथिल होने लगता है और ज्यों ही शरीर शिथिल होता है विचार भी शिथिल होने लगते हैं ।और विचारों के शिथिल होते ही हम अतीत और भविष्य से मुक्त हो वर्तमान समय में आ जाते हैं ।
और वर्तमान में आते ही सिर में विचारों की जगह एक सन्नाटा सुनाई पड़ता है, अनहद नाद सुनाई पड़ता है और यह सिर्फ और सिर्फ वर्तमान में सुनाई पड़ता है, इसे हम अतीत और भविष्य में नहीं सुन सकते। सन्नाटा सुनाई पड़ने के साथ ही हमें अपनी श्वास की आवाज और दिल की धड़कनें साफ सुनाई पड़ने लगती है और हम आनंदित होने लगते हैं।
यदि ध्यान में दिल की धड़कनें सुनाई नहीं पड़ती है तो समझो हमारा ध्यान में प्रवेश हुआ ही नहीं है। ध्यान में हम मष्तिष्क से ह्रदय पर आ जाते हैं और ह्रदय पर आते हैं तो हमें ह्रदय की धड़कने सुनाई पड़ेंगी । वास्तव में ,सब हदें मनुष्य की बनाई हैं। परमात्मा तो स्वयं अनहद है.. असीम है।
उसके बोली को जो सुनने लगा, वह भी मानवीय हदों के पार निकल जाता है। ऐसा बोध अगर हो, तो जीवन में क्रांति हो जाती है। तब पहली बार तुम्हारे जीवन में धर्म के सूर्य का उदय होता है। परम शून्य में, परम शांति में, जहां लहर भी नहीं उठती।
ऐसे शांत सागर में या शांत झील में, जहां कोई विचार की तरंग नहीं, वासना की कोई उमंग नहीं, जहां शून्य संगीत बजता है, जहां अनाहत नाद गूंज रहा है वहीं हमारा घर है। अनहद में बिसराम..और जिसने उस शून्य को पा लिया, उसने ही विश्राम पाया। और उस विश्राम की कोई हद नहीं है.. कोई सीमा नहीं है।
क्रमशः
18/03/2024, 11:41 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....68
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते अनहद नाद के प्रकार ;- परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिए किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद बिंदूपनिषद् के 33 से 41 वें मन्त्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है।
इन मन्त्रों में बताया गया है जब पहली बार अभ्यास किया जाता है तो ‘नाद’ कई तरह का और बड़े जोर जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेघ और समुद्र की हरहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, वंशी की तरह गुंजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है।
चौंसठ अनाहत अब तक गिने गये हैं, पर उन्हें सुनना हर किसी के लिए सम्भव नहीं। जिसकी आत्मिक शक्ति जितनी ऊँची होगी, वे उतने ही सूक्ष्म शब्दों को सुनेंगे, पर उपरोक्त दस शब्द सामान्य आत्मबल वाले भी आसानी से सुन सकते हैं।
ध्यान को धीरे धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है।नादयोग के दस मंडल साधना ग्रन्थों में गिनाये गये । कहीं कहीं इन्हें लोक भी कहा गया है। एक ॐ कार ध्वनि और शेष नौ शब्द इन्हें मिलाकर दस शब्द बनते हैं। इन्हीं की श्रवण साधना शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहलाती है।
नादयोग के 'नौ' मंडल ;-
1-घोष नाद :- यह आत्मशुद्धि करता है, शरीर भाव को धीरे धीरे नष्ट कर के व मन को वशीभूत करके अपनी और खींचता है।
2-कांस्य नाद :- यह नाद जड़ भाव नष्ट कर के चेतन भाव की तरफ साधक को ले जाता हैं।
3-श्रृंग नाद :- यह नाद जब सुनाई देता हैं तब साधक की वासनाएं और इच्छाए नष्ट होने लगती हैं।
4-घंट नाद :- इसका उच्चारण साक्षात शिव करते हैं, यह साधक को वैराग्य भाव की तरफ ले जाती हैं।
5- वीणा नाद :- यहाँ इस नाद को जब साधक सुनता हैं तब मन के पार की झलक का पता चलता हैं ।
6-वंशी नाद :- इसके ध्यान से सम्पूर्ण तत्व के ज्ञान का अनुभव होता हैं।
7-दुन्दुभी नाद :- इसके ध्यान से साधक जरा व मृत्यु के कष्ट से छूट जाता है।
8-शंख नाद :- इसके ध्यान व अभ्यास से स्वम् का निराकार भाव प्राप्त होता हैं।
9-मेघनाद :- जब ये सुनाई दे तब मन के पार की अवस्था का अनुभव होता हैं तथा शून्य भाव प्राप्त होता हैं।
इन सबको छोड़कर जो अन्य शब्द सुनाई देता है वह तुंकार कहलाता है, तुंकार का ध्यान करने से साक्षात् शिवत्व की प्राप्ति होती है।
अनहद नाद(अनहद धुनी) का प्रभाव;-
1-हमें बिना बजाये अंदर घंटे, शंख, नगाड़े बजते सुनाई देते है जिसे कोई बहरा भी सुन सकता है। जब हम शून्य के पथ पर आगे बढ़ते है तो पहले झींगुर की ध्वनि की तरह की आवाज़ सुनाई पड़ती है तथा जब चिड़िया की ध्वनि की तरह की आवाज़ सुनाई देती है तब पूरा शरीर टूटने लगता है जैसे मलेरिया बुखार हुआ हो।
2-जब घंटे की आवाज़ सुनाई पड़ती है तो मन खिन्न हो जाता है ।जब शंख की आवाज़ सुनाई पड़ती है तब पूरा सिर भन्ना उठता है ।गहराई से जब वीणा की आवाज़ सुनाई देती है तब मन मस्त हो जाता है तथा अमृत प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाता है । जब बांसुरी की आवाज़ सुनाई पड़ने लगती है तब गुप्त रहस्य का ज्ञान हो जाता है तथा मन प्रभु के प्रेम में रम जाता है।
3-जब तबले की ध्वनि अंदर सुनाई देती है तब परावाणी की प्राप्ति हो जाती है ।जब भेरी की आवाज़ सुनाई पड़ती है तब भय समाप्त हो जाता है तथा दिव्य दृष्टि साधक को प्राप्त हो जाती है तथा मेघनाद सुनाई देने पर परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।
यह अनहद सूक्ष्म लोगों की दिव्य भावना है। सूक्ष्म जगत में किसी स्थान पर क्या हो रहा है, किसी प्रायोजन के लिए कहाँ क्या आयोजन हो रहा है, इस प्रकार के गुप्त रहस्य इन शब्दों द्वारा जाने जा सकते हैं। कौन साधक किस ध्वनि को अधिक स्पष्ट और किस ध्वनि को मन्द सुनेगा यह उसकी अपनी मनोभूमि की विशेषता पर निर्भर है।
अनहद नाद कैसे सुना जाये ?
1-108 प्रधान उपनिषदों में से नाद-बिंदु एक उपनिषद है, जिसमें बहुत से श्लोक इस नाद पर आधारित हैं। नाद को जब आप करते हो तो यह इसकी पहली अवस्था है । दूसरी अवस्था है जहाँ नाद करोगे नहीं .. सिर्फ़ अपने कानों को बंद किया और भीतर सूक्ष्म ध्वनि को सुनने की चेष्टा करना। यह सूक्ष्म ध्वनि आपके भीतर हो रही है।
इसे अनाहत शब्द कहते हैं पर तुम्हारा मन इतना बहिर्मुख है, बाहरी स्थूल शब्दों को सुनने में तुम इतने व्यस्त हो कि तुम्हारे भीतर जो दैवी शब्द हो रहे हैं, तुम उनको सुन भी नहीं पा रहे। कहाँ से ये शब्द उत्पन्न हो रहे हैं, ये शब्द सुनाई भी पड़ रहे हैं या नहीं, तुम्हे कुछ नहीं पता। यह ध्वनि बहुत ही सूक्ष्म है।
2-अनाहत शब्द योगाभ्यास द्वारा सुनने और जानने में आते हैं। श्वांस-प्रश्वांस के समय ''सो'' एवं ''हम्'' की ध्वनियाँ होती रहती हैं। यह स्पष्ट रूप से कानों के द्वारा तो नहीं सुनी जाती पर, ध्यान एकाग्र करने पर उस ध्वनि का आभास होता है।
अभ्यास करने से वह कल्पना प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में समझ पड़ती है। इसके बाद कानों के छेद बन्द करके ध्यान की एकाग्रता के रहते, घण्टा, घड़ियाल, शंख, वंशी, झींगुर, बादल गरजन जैसे कई प्रकार के शब्द सुनाई देने लगते हैं।आरम्भ में यह बहुत धीमे और कल्पना स्तर के ही होते हैं ।
किन्तु पीछेअधिक एकाग्रता के होने से वे शब्द अधिक स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। इसे एकाग्रता की चरम परिणति भी कह सकते हैं और अंतरिक्ष में अनेकानेक घटनाओं की सूचना देने वाले सूक्ष्म संकेत भी।
3-आकाश में अदृश्य घटनाक्रमों के कम्पन चलते रहते हैं। जो हो चुका है या होने वाला है, उसका घटनाक्रम ध्वनि तरंगों के रूप में आकाश में गूँजता रहता है। नाद योग की एकाग्रता का सही अभ्यास होने पर आकाश में गूँजने वाली विभिन्न ध्वनियों के आधार पर भूतकाल में जो घटित हो चुका है या भविष्य में जो घटित होने वाला है ।
उसका आभास भी प्राप्त किया जा सका है।यह एक असामान्य सिद्धि है।यदि हम अंदर की ध्वनि को सुनने में चित्त को लगायेंगे तो हमारा ध्यान लगेगा क्योंकि चित्त ध्वनि की ओर आकर्षित होता है।अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधी रखकर बैठ जाए। अंगुठे या तर्जनी अंगुली से कान बंद कर दे या कानों में रूई डाल दे तथा मन को बाहरी ध्वनि से हटाकर अन्दर की ध्वनि सुनने की कोशिश करे।
4-इसे दाहिने कान के अंदर सुनना है अर्थात चित्त को वहॉ लगाना है शुरू में आपको श्वास की आवाज़ सुनाई पड़ेगी आगे ओर गहराई में जाओंगे तो आपको अलग-अलग आवाज़े सुनाई पड़ेगी । गहराई में जाते जाना है अन्त में मेघनाद सुनाई पड़ेगा तथा परमात्मा का दर्शन होगा।नाद सुनने की प्रेक्टिस करने पर मन थकता नहीं है तथा आनन्द आता है।
पंच तत्वो का अभ्यास ही नाद से सिद्ध हो जाता है। जब नाद सुनाई देने लगता है तब बिना कानों में अंगुली ड़ाले सहज ही उसे सुन सकते है। मन को हमेशा नाद सुनने में लगाये रखना ही सच्ची भक्ति है तथा मुक्ति का साधन है। अगली पोस्ट में समझते नाद साधना का अभ्यास कैसे करे ।
क्रमशः
18/03/2024, 12:23 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग.....71
आनंदमय कोष के प्रथम चरण नाद साधना में समझते नाद साधना विधि :-
नाद का अभ्यास के लिए ऐसा स्थान प्राप्त कीजिए जो एकान्त हो और जहाँ बाहर की अधिक आवाज न आती हो। तीक्ष्ण प्रकाश इस अभ्यास में बाधक है। इसलिए कोई अँधेरी कोठरी ढूँढ़नी चाहिए। एक प्रहर रात हो जाने के बाद से लेकर सूर्योदय से पूर्व तक का समय इसके लिए बहुत ही अच्छा है।
यदि इस समय की व्यवस्था न हो सके तो प्रातः 9 बजे से और शाम को दिन छिपे बाद का कोई समय नियत किया जा सकता है। नियमित समय पर अभ्यास करना चाहिए अपने नियत कमरे में एक आसन या आराम कुर्सी बिछाकर बैठो।
अपना आसन एक कोने में लगाओ। जिस प्रकार शरीर को आराम मिले, उस तरह बैठ जाओ और अपने शरीर को ढीला छोड़ने का प्रयत्न करो। भावना करो कि मेरा शरीर रुई का ढेर मात्र है और मैं इस समय इसे पूरी तरह स्वतन्त्र छोड़ रहा हूँ।
थोड़ी देर में शरीर बिलकुल ढीला हो जायेगा और अपना भार अपने आप न सहकर इधर-उधर को ढुलने लगेगा। आराम कुर्सी, मसनद या दीवार का सहारा ले लेने से शरीर ठीक प्रकार अपने स्थान पर बना रहेगा। ईयर प्लग कानों में लगाओ कि बाहर की कोई आवाज भीतर प्रवेश न कर सके।
अब बाहर की कोई आवाज तुम्हें सुनाई न पड़ेगी, यदि पड़े भी तो उस ओर से ध्यान हटाकर अपने मूर्धा-स्थान, तालू पर ले जाओ और वहाँ जो शब्द हो रहे हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनने का प्रयत्न करो। आरम्भ में शायद कुछ भी सुनाई न पड़े।
पर दो-चार दिन प्रयत्न करने के बाद जैसे-जैसे सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय निर्मल होती जायेगी, वैसे ही वैसे शब्दों की स्पष्टता बढ़ती जायेगी। पहले कई शब्द सुनाई देते हैं शरीर में जो रक्त प्रवाह हो रहा है, उसकी आवाज रेल की तरह धक्-धक्, धक्-धक् सुनाई पड़ती है।
वायु के आने जाने की आवाज बादल गरजने जैसी होती है, रसों के पकने और उनके आगे की ओर गति करने की आवाज चटकने की सी होती है।यह तीन प्रकार के शब्द शरीर की क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार दो प्रकार के शब्द मानसिक क्रियाओं के हैं।
मन में चञ्चलता की लहरें उठती हैं वे मानस-तन्तुओं पर टकराकर ऐसे शब्द करती हैं, मानों टीन के ऊपर मेह बरस रहा हो और जब मस्तिष्क वाह्य ज्ञान को ग्रहण करके अपने में धारण करता है, तो ऐसा मालूम होता है मानो कोई प्राणी साँस ले रहा हो।
यह पाँचों शब्द शरीर और मन के हैं। कुछ ही दिन के अभ्यास से साधारणतः दो तीन सप्ताह के प्रयत्न से यह शब्द स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ते हैं। इन शब्दों के सुनने से सूक्ष्म इन्द्रियाँ निर्मल होती जाती हैं और गुप्त शक्तियों को ग्रहण करने की उनकी योग्यता बढ़ती जाती है।
जब नाद श्रवण करने की योग्यता बढ़ जाती है, तो बंशी या सीटी से मिलती-जुलती अनेक प्रकार की शब्दावलियाँ सुनाई पड़ती हैं यह सूक्ष्म लोक में होने वाली क्रियाओं का परिचायक है। बहुत दिनों से बिछुड़े हुए बच्चे को यदि उसकी माता की गोद में पहुँचाया जाता है।
तो वह आनन्द से विभोर हो जाता है ऐसा ही आनन्द सुनने वाले को आता है। जिन सूक्ष्म शब्द ध्वनियों को आज वह सुन रहा है, वास्तव में यह उसी तत्व के निकट से आ रही है, जहाँ से कि आत्मा और परमात्मा का विलगाव हुआ है।
और जहाँ पहुँच कर दोनों फिर एक हो सकते हैं । धीरे-धीरे यह शब्द स्पष्ट होने लगते हैं और अभ्यासी को उनके सुनने में अद्भुत आनन्द आने लगता है। कभी-कभी तो वह उन शब्दों में मस्त होकर आनन्द से विह्वल हो जाता है और अपने तन-मन की सुध भूल जाता है।
अन्तिम शब्द ॐ है, यह बहुत ही सूक्ष्म है। इसकी ध्वनि घण्टा ध्वनि के समान रहती है। घड़ियाल में हथौड़ी मार देने पर जैसे वह कुछ देर तक झनझनाती रहती है, उसी प्रकार ॐ का घण्टा शब्द सुनाई पड़ता है।ॐ कार ध्वनि जब सुनाई पड़ने लगती है।
तो निद्रा तन्द्रा या बेहोशी जैसी दशा उत्पन्न होने लगती है। साधक तन-मन की सुध भूल जाता है और समाधि सुख का, तृतीय अवस्था का आनन्द लेने लगता है। उसी स्थिति के ऊपर बढ़ने वाली आत्मा, परमात्मा में प्रवेश करती जाती है और अन्ततः पूर्णतया परमात्मा अवस्था प्राप्त कर लेती है।
क्रमशः
18/03/2024, 12:23 pm - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....72
अब हम समझते आनंदमय कोष के दूसरे अंग बिंदु साधना के बिंदु को ।
आनन्दमय कोश की साधना में बिन्दु का अर्थ होगा, परमाणु । सूक्ष्म से सूक्ष्म जो अणु हैं, वहाँ तक अपनी गति हो जाने पर भी ब्रह्म की समीपता तक पहुँचा जा सकता है और सामीप्य सुख का अनुभव किया जा सकता। बिन्दु साधना का एक अर्थ ब्रह्मचर्य भी है।
अन्नमय कोश के प्रकरण में इस बिन्दु का अर्थ ‘वीर्य’ किया गया है। किसी वस्तु को कूटकर यदि चूर्ण बना लें और चूर्ण को खुद माइक्रोस्कोप से देखें तो छोटे- छोटे टुकड़ों का एक ढेर दिखाई पड़ेगा, यह टुकड़े कई और टुकड़ों से मिलकर बने होते हैं।
इन्हें भी वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से कूटा जाय तो अन्त में जो न टूटने वाले ,न कुटने वाले टुकड़े रह जायेंगे, उन्हें परमाणु कहेंगे। इन परमाणुओं की लगभग सो जातियाँ अब तक पहिचानी जा चुकी हैं । जिन्हें अणुतत्व कहा जाता है। अणुओं के दो भाग हैं, एक सजीव दूसरे निर्जीव।
दोनों ही एक पिण्ड या ग्रह के रूप में मालूम पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके भीतर भी और टुकड़े हैं। प्रत्येक अणु अपनी धुरी पर बड़े वेग से परिभ्रमण करता है। पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा के लिए प्रति सैकिण्ड 18.5 मील की चाल से चलती है।
पर इन 100 परमाणुओं की गति चार हजार मील प्रति सेकेण्ड मानी जाती हैं। अणु और ब्रम्हाण्ड की समानता ... यह परमाणु भी अनेक विद्युत- कणों से मिलकर बने हैं, जिनकी दो जातियाँ हैं, 1- ऋण कण नेगटिव , 2- धन कण पॉजिटिव ।
धन कणों के चारों ओर ऋण-कण प्रति सैकिण्ड एक लाख अस्सी हजार मील की गति से परिभ्रमण करते हैं। उधर धन- कण, ऋण- कण की परिक्रमा के केन्द्र होते हुए भी शान्त नहीं बैठते। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती हैं ।
और सूर्य अपने सौर- मण्डल को लेकर ‘कृतिका’ नक्षत्र की परिक्रमा करता है, वैसे ही धन कण भी परमाणु की अन्तरगति का कारण होते हैं।ऋण- कण जो कि तीव्र गति से निरन्तर परिक्रमा में संलग्न हैं अपनी शक्ति सूर्य से अथवा विश्व- व्यापी अग्नि तत्व से प्राप्त करते हैं।
वैज्ञानिकों का कथन है कि यदि एक परमाणु के अन्दर का शक्ति- पुञ्ज फूट पड़े तो क्षण भर में लन्दन जैसे तीन नगरों को भस्म कर सकता है। इस परमाणु के विस्फोट की विधि मालूम करके ही ‘एटमबम’ का अविष्कार हुआ है। एक परमाणु के फोड़ देने से जो भयंकर विस्फोट होता है।
उसका परिचय गत महायुद्ध से मिल चुका है। इसकी भयंकरता का पूर्ण प्रकाश होना अभी बाकी है, जिसके लिए वैज्ञानिक लगे हुए हैं। यह तो परमाणु की शक्ति की बात रही, अभी उनके अंग ऋण-कण और धन-कणों के सूक्ष्म भागों का पता चला है।
वे भी अपने से अनेक गुने सूक्ष्म परमाणुओं से बने हुए हैं, जो ऋण- कणों के भीतर एक लाख, छियासी हजार, तीन सौ तीस मील प्रति सैकिण्ड की गति से परिभ्रमण करते हैं। अभी उनके भी अन्तर्गत की खोज हो रही हैं और विश्वास किया जाता है कि उन कर्षाणुओं के भीतर भी सर्गाणु हैं।
परमाणुओं की अपेक्षा ऋण कण तथा धन कणों की गति तथा शक्ति अनेकों गुनी है। उसी अनुपात से इन सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम अणुओं की गति तथा शक्ति होगी। जब परमाणुओं के विस्फोट की शक्ति लन्दन जैसे तीन शहरों को जला देने की है।
सर्गाणु की शक्ति एवं गति की कल्पना करना भी कठिन होगा उस के अन्तिम सूक्ष्म केन्द्र को अप्रितम,अचिन्त्य ही कह सकते हैं। देखने में पृथ्वी चपटी मालूम पड़ती है पर वस्तुतः वह लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घूमती रहती है। चौबीस घण्टे में उसका एक चक्कर पूरा हो जाता है।
जिससे दिन रात बनते है।पृथ्वी की दूसरी चाल भी है वह सूर्य की परिक्रमा करती है। इस चक्कर में उसे एक वर्ष लगता जिससे ऋतुएं बनती है तीसरी चाल पृथ्वी की यह है कि सूर्य अपने ग्रह- उपग्रहों को साथ लेकर बड़े वेग से अभिजित् नक्षत्र की ओर जा रहा है।
अनुमान है वह कृतिका नक्षत्र की परिक्रमा करता है। इसमें पृथ्वी भी साथ है। लट्टू जब अपनी धुरी पर घूमता है तो वह इधर-उधर उठता भी रहता है इसे मँडलाने को चाल कहते हैं, जिसका एक चक्कर करीब 26 हजार वर्ष में पूरा होता है।
कृतिका नक्षत्र भी सौरमण्डल आदि अपने उपग्रहों को लेकर ध्रुव की परिक्रमा करता है। उस दशा में पृथ्वी की गति पाँचवी हो जाती है। सूक्ष्म परमाणु के सूक्ष्मतम भाग सर्गाणु अर्थात् फोटॉन, मेसॉन, नियान आदि तक भी मानव बुद्धि पहुँच गयी है ।
बड़े से बड़े महा-अणुओं के रूप में पृथ्वी की पाँच गति विदित हुई। आकाश के असंख्य ग्रह-नक्षत्रों का पारस्परिक सम्बन्ध न जाने कितने बड़े महा अणु के रूप में पूरा होता होगा उस महानता की कल्पना भी बुद्धि को थका देती है। सूक्ष्म से सूक्ष्म और महत से महत केन्द्रों पर जाकर बुद्धि थक जाती है।
और उससे छोटे या बड़े की कल्पना नहीं हो सकती, उस केन्द्र को ‘बिन्दु’ कहते हैं। अणु को योग की भाषा में अण्ड भी कहते हैं। वीर्य का एक कण ‘अण्ड’ है। वह इतना छोटा होता है कि सूक्ष्मदर्शी से ही दिखाई देता है।पर जब विकसित होकर स्थूल रूप में आता है, तो वही बड़ा अण्डा हो जाता है।
अण्डे के भीतर जो पक्षी रहता है, उसके अनेक अंग-प्रत्यंग विभाग होते हैं, उन विभागों में असंख्य सूक्ष्म विभाग और उनमें भी अगणित कोषांड रहते हैं। यह शरीर भी एक अणु है, इसी को अण्ड या पिण्ड कहते हैं। अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में अगणित सौर मण्डल, आकाश- गंगा और ध्रुव-चक्र हैं।
क्रमशः
18/03/2024, 12:43 pm - +91 98877 80007: 🙏
18/03/2024, 10:38 pm - +91 82002 98756: "राम"
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19/03/2024, 10:55 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ...73
आनंदमय कोष के दूसरे अंग बिंदु साधना से आगे :-
पृथ्वी बहुत बड़ा पिण्ड है, सूर्य तो पृथ्वी से भी तेरह लाख गुना बड़ा है। सूर्य से भी करोड़ों गुने ग्रह आकाश में मौजूद हैं। इनकी दूरी का अनुमान इससे लगाया जाता है। प्रकाश की गति प्रति सैकिण्ड पौने दो लाख मील है और उन ग्रहों का प्रकाश पृथ्वी तक आने में 30 लाख वर्ष लगते हैं।
यदि कोई ग्रह आज नष्ट हो जाय तो उसका अस्तित्व न रहने पर भी उसकी प्रकाश किरणें आगामी तीस लाख वर्ष तक यहाँ आती रहेंगी। जिस नक्षत्र का प्रकाश पृथ्वी पर आता है, उसके अतिरिक्त ऐसे ग्रह बहुत अधिक हैं जो अत्यधिक दूरी के कारण पृथ्वी से दूरबीन से भी दिखाई नहीं देते।
इतने बड़े और दूरस्थ ग्रह जब अपनी परिक्रमा करते होंगे, अपने ग्रहमण्डल को साथ लेकर परिभ्रमण को निकलते होंगे, तो वे अपने कितने अधिक विस्तृत शून्य में घूम जाते होंगे। उस शून्य के विस्तार की कल्पना कर लेना मानव- मस्तिष्क के लिए बहुत कठिन है।
इतना बड़ा ब्रह्माण्ड भी एक अणु या अण्ड है। उसे ब्रह्म+अण्ड=ब्रह्माण्ड कहते हैं। पुराणों में वर्णन है कि जो ब्रह्माण्ड हमारी जानकारी में है, उसके अतिरिक्त भी ऐसे ही और अगणित ब्रह्माण्ड हैं ।और उन सबका समूह एक महा अण्ड है, उस ब्रह्माण्ड की तुलना में पृथ्वी उससे छोटी बैठती है।
जितना कि परमाणु की तुलना में सर्गाणु छोटा होता है। इस लघु से लघु और महान से महान अण्ड में जो शक्ति व्यापक हैं, जो इन सबको गतिशील, विकसित, परिवर्तित, चैतन्य रखती है। उस सत्ता को ‘बिन्दु’ कहा गया है। यह बिन्दु ही परमात्मा है। उसी को छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कहा जाता है।
बिन्दु का चिन्तन करने से आनन्दमय कोश की स्थिति जीव की उस परब्रह्म की रूप की कुछ झाँकी होती हैं ।और उसे प्रतीत होता है कि परब्रह्म की, महा-अण्ड की तुलना में मेरा अस्तित्व, मेरा पिण्ड कितना तुच्छ है। इस तुच्छता का भान होने से अहंकार और गर्व समाप्त हो जाते हैं।
दूसरी ओर जब सर्गाणु से अपने पिण्ड की, शरीर की तुलना करते हैं। तो प्रतीत होता है कि अटूट शक्ति के अक्षय भण्डार सर्गाणु की इतनी अटूट संख्या और शक्ति जब हमारे भीतर हैं तो हमें अपने को अशक्त समझने का कोई कारण नहीं है।
उस शक्ति का उपयोग जान लिया जाय, तो संसार में होने वाली कोई भी बात हमारे लिये असम्भव नहीं हो सकती। जैसे महा अण्ड की तुलना में हमारा शरीर क्षुद्र है और हमारी तुलना में उसका विस्तार अनुपम है, पर सर्गाणुओं की दृष्टि में हमारा पिण्ड एक महाब्रह्माण्ड जैसा विशाल होगा।
तब लगता है कि मैं मध्य बिन्दु हूँ, केन्द्र हूँ, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल मेरी व्यापकता है। अहम ब्रह्मास्मि । बिन्दु साधना के साधक को सांसारिक जीवन की वास्तविकता और तुच्छता का भली प्रकार बोध हो जाता है । कि मैं अनन्त का उद्गम होने के कारण इस सृष्टि का महत्त्वपूर्ण केन्द्र हूँ।
लघुता और महत्ता के चिन्तन की बिन्दु-साधना से आत्मा की आन्तरिक शक्ति का विकास होता है, जो स्व-पर कल्याण के लिए अत्यन्त ही महत्त्व पूर्ण है। बिन्दु- साधक की आत्म-स्थिति उज्ज्वल होती है।
उसके विकार मिट जाते हैं। फलस्वरूप उसे उस अनिर्वचनीय/ आनन्द की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करना जीवन- धारण का प्रधान उद्देश्य है। अगली पोस्ट में समझते बिन्दु चक्र मंत्र साधना के बारे।
क्रमशः
19/03/2024, 10:55 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .......74
आनंदमय कोष के दूसरे अंग बिंदु साधना में बिंदु चक्र मंत्र साधना ।
बिंदु का अर्थ है ...नोंक, बूँद ,अम्रत। बिन्दु चक्र सिर के शीर्ष भाग पर केशों के गुच्छे के नीचे स्थित है। बिन्दु चक्र में 23 पंखुडिय़ों वाला कमल होता है। इसका प्रतीक चिह्न चन्द्रमा है, जो वनस्पति की वृद्धि का पोषक है।
श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है : ”मैं मकरंद कोष चंद्रमा होने के कारण सभी वनस्पतियों का पोषण करता हूं”। इसके देवता भगवान शिव हैं, जिनके केशों में सदैव अर्धचन्द्र विद्यमान रहता है। मंत्र है...' शिवोहम्'(शिव हूं मैं)। यह चक्र रंगविहीन और पारदर्शी है।
बिन्दु चक्र स्वास्थ्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है,यह हमें स्वास्थ्य और मानसिक पुनर्लाभ प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र नेत्र दृष्टि को लाभ पहुंचाता है, भावनाओं को शांत करता है और आंतरिक सुव्यवस्था, स्पष्टता और संतुलन को बढ़ाता है।
इस चक्र की सहायता से हम भूख और प्यास पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो जाते हैं, और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाने की आदतों से दूर रहने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। बिन्दु पर एकाग्रचित्तता से चिन्ता एवं हताशा और अत्याचार की भावना तथा हृदय दमन से भी छुटकारा मिलता है।
बिन्दु चक्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, स्फूर्ति और यौवन प्रदान करता है, क्योंकि यह “अमरता का मधुरस” (अमृत) उत्पन्न करता है। यह अमृतरस साधारण रूप से मणिपुर चक्र में गिरता है, जहां यह शरीर द्वारा पूरी तरह से उपयोग में लाए बिना ही जठराग्नि से जल जाता है।
इसी कारण प्राचीन काल में ऋषियों ने इस मूल्यवान अमृतरस को संग्रह करने का उपाय सोचा और ज्ञात हुआ कि इस अमृतरस के प्रवाह को जिह्वा और विशुद्धि चक्र की सहायता से रोका जा सकता है। जिह्वा में सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र होते हैं, इनमें से हरेक का शरीर के अंग या क्षेत्र से संबंध होता है।
उज्जाई प्राणायाम और बिन्दु चक्र मंत्र योग विधियों से जिह्वा अमृतरस के प्रवाह को मोड़ देती है । इसे विशुद्धि चक्र में जमा कर देती है होम्योपैथिक दवा की तरह सूक्ष्म ऊर्जा माध्यमों द्वारा यह संपूर्ण शरीर में पुन: वितरित कर दी जाती है, जहां इसका आरोग्यकारी प्रभाव दिखाई देने लगते हैं।
त्राटक का अर्थ क्या होता है। किसी भी प्रकार के ऑब्जेक्ट को एकटक देखना देखना ही त्राटक की परिभाषा है लेकिन इसे पूर्ण करती है एकटक देखते हुए आपकी कल्पना शक्ति। आपकी सफलता और आपके अनुभव इसी शक्ति पर निर्भर करती है।
यही कारण है कि अक्सर साधक असफल हो जाते है क्योंकि वह त्राटक की परिभाषा को पूर्ण नहीं समझ पाते है। जब हम त्राटक करते है तो विचारों को खत्म करते है लेकिन उस वक्त हमारे दिमाग में एक विचार होना अनिवार्य है। वह कुछ भी ही सकता है ...जो आप पाना चाहते हैं।
जैसे सम्मोहन सीखना है तो आपको कल्पना करना चाहिए कि “मेरी आंखो में चुंबकीय शक्ति का विकास हो रहा है। मेरी आंखो में सम्मोहन शक्ति आ चुकी है।” यह कल्पना पूर्ण शक्ति से करना चाहिए जितनी अधिक गंभीरता पूर्वक यह कार्य होगा उतना ही अधिक सफलता का रास्ता साफ हो जाएगा।
यहां जो अनुभवों का वर्णन किया जा रहा है वह सभी एक साधकों में होना अनिवार्य नहीं है। इनमे से कुछ अनुभव आपको हो सकते है ..तो विचलित होने की आवश्कता नहीं है। प्रारंभ में आपकी समय सीमा कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट हो सकती है।
धीरे धीरे समय बढ़ाने पर आपको कुछ ही दिनों में यह समय सीमा बढ़कर 10-15 मिनट लगातार एकटक देखना हो जाएगी। इन 10-15 दिनों में कई अनुभव होते है जैसे साधकों को बिंदु घूमता हुआ नजर आता है कुछ साधकों को बिंदु हिलता- डुलता नजर आने लगता है।
वही कुछ ही दिनों में यह बिंदु एक से बढ़कर दो या तीन दिखने लगते है। ऐसी स्थिति में साधक को उसे एक देखने का प्रयास करना चाहिए।इस बीच देखने पर कभी कभी बिंदु गायब होता है तो कभी फिर से धुंधला सामने नजर आ जाता है।
कहीं बिंदु गायब होकर दूसरी जगह दिखने लगता है, तो आप समझ जाए कि आपकी मन की गहराइयों में संबंध स्थापित होने की स्थिति है। ऐसा बाह्य मन अंतर मन से कनेक्ट होने की वजह से होता है और अचानक कनेक्शन टूटने की वजह से गायब होना ,सामने आना जैसे क्रियाएं होती है।
इसका अर्थ है आप सही राह पर जा रहे है और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता है। कुछ ही दिनों में साधकों को आस पास हल्का प्रकाश का आवरण नजर आने लगता है। इस समय साधक को इस आवरण को बढ़ाने की आश्यकता होती है। और यह धीरे धीरे बढ़ने लगता है।
बहुत बार देखा गया है कि कई साधकों को यह प्रकाश अलग अलग रंगों में दिखाई देता है। यह साधक के अंदर 7 चक्र के प्रभाव से होता है। जिस साधक के अंदर जिस चक्र की शक्ति अधिक होती है ...उस साधक को उसी चक्र का रंग दिखाई देता है।
2 से 3 माह के बाद चक्र के अंदर सातो रंग क्रमशः दिखाई देता है उसी के साथ कुछ समय बाद बिंदु सूर्य के समान प्रकाशवान हो जाता है। इस समय साधक की एकटक देखने की समय सीमा लगभग 30-45 मिनट तक हो जाती है।
लगभग 6 माह बाद साधक को बहुत अनोखे अनुभव होने लगते है यह उनके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। किसी- किसी साधक को उनका पूर्व जन्म तो किसी साधक को भविष्य की झलकियां नजर आने लगती है। बहुत बार साधकों को बिंदु के अंदर कई दृश्य नजर आते है ।
जो कुछ इस जन्म के तो कुछ पूर्व जन्म के हो सकते है। कुछ दृश्य आनंद मय तो कुछ भयभीत करने वाले भी हो सकते है। अब लगभग 8-9 माह बाद साधक का समय शून्य होने लगता है अर्थात साधक को त्राटक खो जाने का अनुभव होता है जो बहुत आनंद दायक होता है।
इस स्थति में साधक कहीं भी विचरण करने जा सकता है। वह कही भी जाकर किसी को भी देख सकता है।मान लीजिए आपका कोई परिचित क्या कर रहा है आपको जानना है तो वहां आप पहुंच जाते है और आपको वह वीडियो के समान दिखाई देने लगता है।
यह सब मन की आंखो से होता है।12-15 महीने में साधकों को टेलीपैथी, वाक सिद्धि, विचार सम्प्रेशक, सम्मोहन शक्ति, भूत भविष्य,की उपलब्धियां उसके कल्पना शक्ति के आधार पर स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। साधक एक जगह बैठकर ब्रम्हांड की सैर कर सकता है।
साधक जीवन के विभिन्न रहस्यों को जान लेता है। लगातार अभ्यास करने पर साधक बहुत कुछ अनुभव करता है जिसको बताना कठिन है।
त्राटक के लाभ ;-
1यह अभ्यास आँखों को बलवान बनता है। आंखो की कमजोरी दूर होती है।आँखे त्राटक के अभ्यास के लिए अभ्यस्त होती है।
2-मन शांत रहता है। हम ज्यादा से ज्यादा अपने आप से जुड़ते है। यह आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करती है एवं मस्तिष्क के विकास में लाभकारी होती है।
3-यह आंतरिक ज्योति को प्रज्वलित करती है। यह स्मृति एवं एकाग्रता बढ़ाती है।
4-इसके अभ्यास से अल्फा तरंगें बढ़ती हैं, जो मस्तिष्क के विश्रामावस्था में होने का संकेत हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क के निश्चित भाग काम करना बंद कर देते हैं तथा मस्तिष्क की प्रक्रियाएं रुक जाती हैं, इस प्रकार मस्तिष्क को अत्यावश्यक विश्राम प्राप्त होता है।
बिंदु त्राटक;-
बिंदु त्राटक करने के लिए आप एक ऊनी आसन,गद्दा, या कुर्सी पर बैठ जाए। अपनी रीढ बिल्कुल सीधी रखे। दर्द होता हो या अधिक देर बैठने में असमर्थ है तो आप किसी भी तरह का सहारा लेकर बैठ सकते है। अब यह कल्पना करें कि आप हवा में उड़ रहे है ।
या पानी में तेैर रहे है या किसी गहरी गुफा में जा रहे है। इसी कल्पना के साथ कोई अन्य विचार नहीं होना चाहिए। कल्पना करते हुए विचारों पर कंट्रोल करे और कल्पना की गहराइयों में डूब जाए। इसे ध्यान अवस्था का चरण कहते है। ऐसा करने से आपके अंदर विचारों पर कंट्रोल होता है।
बाह्य मन अंतर मन से कनेक्ट होता है।जब विचारों पर कन्ट्रोल हो जाए तब आपको धीरे धीरे आंखो को खोलना है और आपके सामने जो बिंदु लगा हुआ है इसे बिना पलके झपकाए एकटक देखना है। हमेशा सोचिये – “मेरे विचार बिन्दु के पीछे जा रहे हैं”।
यह तब तक करना है जब तक कि आपकी आंखो से आंसू निकलने ना लगे। प्रारंभिक दिनों में हो सकता है कुछ ही सेकंड में आंसू आ जाए तो घबराना नहीं है। अभ्यास धीरे धीरे बढ़ाने पर बड़ जाएगा है। उत्साह के साथ धेर्य से अभ्यास करें हड़बड़ाहट में अधिक आंखो में जोर ना डाले।
आंखो से आंसू आने के बाद आप आंखो को बंद करके बिंदु को आंतरिक मन से देखने का प्रयास करे, इसे अंतः त्राटक कहते है। इसकी समय सीमा कम से कम आपकी उम्र के बराबर मिनटों में होना चाहिए उदाहरण के लिए आपकी क्रमशः उम्र 25,30,35 वर्ष है ।
तो आपको अंतः त्राटक क्रमशः 25,30,35 मिनट करना चाहिए। अंतः त्राटक आप समय से अधिक भी कर सकते है। अगली पोस्ट में समझेंगे कला साधना ।
क्रमशः
20/03/2024, 11:08 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....75
इस पोस्ट में समझेंगे आनंदमय कोष के तीसरे अंग कला साधना में कला क्या है । कला का अर्थ है –किरण।’ सूर्य प्रकाश से प्राप्त किरणें जीवन का स्त्रोत है। सूर्य सेह निकलकर अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाश तरंगें भूतल पर आती हैं, उनका एक समूह ही इस योग्य बन पाता है ।
कि नेत्रों से उसका अनुभव किया जा सके। सूर्य किरणों के सात रंग प्रसिद्ध हैं, परमाणुओं के अन्तर्गत जो ‘प्रमाणु’ होते हैं उनकी विद्युत तरंगें जब हमारे नेत्रों से टकराती है, तभी किसी रंग रूप का ज्ञान हमें होता है। रूप को प्रकाशवान् बनाकर प्रकट करने का काम कला द्वारा ही होता है।
कलाएँ दो प्रकार की होती हैं। 1- आप्ति 2- व्याप्ति।
आप्ति किरणें वे हैं, जो प्रकृति के अणुओं से प्रस्फुटित होती हैं। व्याप्ति वे है, जो पुरुष के अन्तराल से आविर्भूत होती हैं, इन्हें ‘तेजस्’ भी कहते हैं। वस्तुएँ पञ्च तत्वों से बनी होती हैं इसलिए परमाणु से निकलने वाली किरणें अपने प्रधान तत्व की विशेषता भी साथ लिए होती हैं।
वह विशेषता रंग द्वारा पहचानी जाती हैं। किसी वस्तु का प्राकृतिक रंग देखकर यह बताया जा सकता है कि इन पञ्च-तत्वों में कौन सा तत्व किस मात्रा में विद्यमान है व्याप्ति कला, किसी मनुष्य के ‘तेजस्’ में दिखती हैं, यह तेजस् मुख के आस- पास प्रकाश मण्डल की तरह फैला होता है।
यों तो यह सारे शरीर के आस- पास प्रकाशित रहता है। इसे अँग्रजी में ‘ओरा’ और संस्कृत में तेजोवलय’ कहते हैं। देवताओं के चित्र में उनके मुख के आस-पास एक प्रकाश का गोला सा चित्रित होता है, यह उनकी कला का ही चिन्ह है।
अवतारों के सम्बन्ध में उनकी शक्ति का माप उनकी कथित कलाओं से किया जाता है। परशुराम जी में तीन, रामचन्द्र जी में बारह, श्री कृष्ण में सोलह कलाएँ बताई गई हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उनमें साधारण मात्र से इतनी गुनी आत्मिक शक्ति थी।
सूक्ष्मदर्शी लोग किसी व्यक्ति या वस्तु की आन्तरिक स्थिति का पता उनके तेजोवलय और रंग, रूप, चमक और चैतन्यता को देखकर मालूम कर लेते हैं। जिसे 'कला’ विद्या की जानकारी है, वह भूमि के अन्तर्गत छिपे हुए पदार्थो को, वस्तुओं के अन्तर्गत छिपे हुए गुण, प्रभाव एवं महत्वों को आसानी से जान लेता है।
किस मनुष्य में कितनी कलाएँ हैं, उसमें क्या-क्या शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विशेषताएँ हैं तथा किन-किन गुण, दोष, योग्यताओं, सामर्थ्यों की उनमें कितनी न्यूनाधिकता है, यह सहज ही पता चल जाता है। कला-विज्ञान का ज्ञाता अपने शरीर की सात्विक न्यूनाधिकता का पता लगाकर इसे आत्म बल से ही सुधार सकता है।
और अपनी कलाओं में समुचित संशोधन- परिमार्जन एवं विकास कर सकता है। कला ही सामर्थ्य है। अपनी आत्मिक सामर्थ्य का, आत्मिक उन्नति का माप कलाओं की परीक्षा करके प्रकट हो जाता है और साधक यह निश्चित कर सकता है कि उन्नति हो रही है या नहीं ।
उसे सन्तोषजनक सफलता मिल रही है या नहीं।सब ओर से चित्त हटाकर नेत्र बन्द करके भृकुटी के मध्य भाग में ध्यान एकत्रित करने से मस्तिष्क में तथा उसके आस-पास रंग-बिरंगी धज्जियाँ, चिन्दियाँ तथा तितलियाँ-सी उड़ती दिखाई पड़ती हैं।
इनके रंगों का आधार तत्वों पर निर्भर होता है। पृथ्वी तत्व का रंग पीला, जल का नीला, अग्नि का लाल, वायु का हरा, आकाश का श्वेत होता है। जिस रंग की झिलमिल होती है, उसी के आधार पर यह जाना जा सकता है कि इस समय हममें किन तत्वों की अधिकता और किनकी न्यूनता है।
रंग और चक्रों सम्बन्ध ... प्रत्येक रंग में अपनी-अपनी विशेषता होती है। पीले रंग में क्षमा, गम्भीरता, उत्पादन, स्थिरता, वैभव, मजबूती, संजीदगी, भारीपन। श्वेत रंग में शान्ति, रसिकता, कोमलता, शीघ्र प्रभावित होना, तृप्ति, शीलता, सुन्दरता, बुद्धि, प्रेम।
लाल रंग में गर्मी, उष्णता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष अनिष्ट, शूरता, सामर्थ्य, उत्तेजना, कठोरता, कामुकता, तेज, प्रभावशीलता, चमक, स्फूर्ति। हरे रंग में चंचलता, कल्पना, स्वप्नशीलता, जकड़ना, दर्द, अपहरण धूर्तता, गतिशीलता, विनोद, प्रगतिशीलता, प्राण, पोषण, परिवर्तन।
नीले रंग में- विचारशीलता, बुद्धि सूक्ष्मता, विस्तार, सात्विकता, प्रेरणा, व्यापकता, संशोधन, आकर्षण आदि गुण होते हैं। जड़ या चेतन किसी भी पदार्थ के रंग एवं उससे निकलने वाली सूक्ष्म प्रकाश-ज्योति से यह जाना जा सकता है,कि वस्तु या प्राणी का गुण स्वभाव एवं प्रभाव कैसा हो सकता है ।
साधारणतः यह पाँच तत्वों की कला हैं, जिनके द्वारा यह कार्य हो सकता है ..
1- व्यक्तियों तथा पदार्थों की आन्तरिक स्थिति को समझना,
2- अपने शारीरिक तथा मानसिक क्षेत्र में असन्तुलित, किसी गुण- दोष को सन्तुलित करना,
3- दूसरों के शारीरिक तथा मन की विकृतियों का संशोधन करके सुव्यवस्था स्थापित करना,
4- तत्वों के मूल आधार पर पहुँचकर तत्वों की गति-विधि तथा क्रिया पद्धति को जानना,
5-तत्वों पर अधिकार करके सांसारिक पदार्थों का निर्माण, पोषण तथा विनाश करना।
क्रमशः
20/03/2024, 11:08 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग ....76
आनंदमय कोष के तीसरे अंग कला साधना से आगे :-
यह उपरोक्त पाँच लाभ ऐसे हैं, जिनकी व्यवस्था की जाय तो वे ऋद्धि सिद्धियों के समान आश्चर्यजनक प्रतीत होंगे। यह पाँच भौतिक कलाएँ हैं, जिनका उपयोग राजयोगी, हठयोगी, मन्त्रयोगी तथा तांत्रिक अपने-अपने ढंग से करते हैं ।
कला द्वारा सांसारिक भोग, वैभव भी मिल सकता है, आत्म-कल्याण भी हो सकता है और किसी को शापित,अभिचारित एवं दुख शोक सन्तृप्त भी बनाया जा सकता है। पञ्च तत्वों की कलाएँ ऐसी ही प्रभावपूर्ण होती हैं।
आत्मिक कलाएँ तीन होती हैं- सत, रज, तम। तमोगुणी कलाओं का माध्यम केन्द्र शिव है। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, कुम्भकरण, मेघनाद आदि असुर इन्हीं तामसिक कलाओं के सिद्ध पुरुष थे। रजोगुणी कलाएँ विष्णु से आती हैं।
इन्द्र, कुबेर, वरुण, वृहस्पति, ध्रुव, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, कर्ण आदि में इन राजसिक कलाओं की विशेषता थी। सतोगुणी सिद्धियाँ ब्रह्म से आविर्भूत होती हैं। व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, बुद्ध, महावीर, आदि ने सात्विकता के केन्द्र से ही शक्ति प्राप्त की थी।
आत्मिक कलाओं की साधना ग्रन्थि-भेद द्वारा होती है। रुद्र ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और ब्रह्म ग्रन्थि के खुलने से इन तीनों ही कलाओं का साक्षात्कार साधक को होता है। पूर्वकाल में लोगों के शरीर में आकाश तत्व अधिक था।
इसलिए इन्हें उन्हीं साधनाओं से अत्यधिक सामर्थ्य प्राप्त हो जाती थी, पर आज के युग में जन-समुदाय के शरीर में पृथ्वी-तत्व प्रधान हैं। इसलिए अणिमा, महिमा आदि तो नहीं पर सत्, रज, तम की शक्तियों की अधिकता से अब भी आश्चर्यजनक हित-साधना हो सकता है।
पाँचकलाओं द्वारा तात्विक साधना ;- 1-पृथ्वी तत्व;-
इस तत्व का स्थान मूलाधार चक्र अर्थात् गुदा से दो अंगुल अंडकोश की ओर हटकर सीवन में स्थित है। सुषुम्ना का आरम्भ इसी स्थान से होता है। प्रत्येक चक्र का आधार कमल के पुष्प जैसा है। यह ‘भूलोक’ का प्रतिनिधि है। पृथ्वी तत्व का ध्यान इसी मूलाधार चक्र में किया जाता है।
पृथ्वी तत्व की आकृति चतुष्कोण, रंग पीला, गुण गन्ध है। इसलिए इसको जानने की इन्द्रिय नासिका तथा कर्मेन्द्रिय गुदा है।शरीर में पीलिया, कमल वाय आदि रोग इसी तत्व की विकृति से पैदा होते हैं। भय आदि मानसिक विकारों में इसकी प्रधानता होती है। इस तत्व के विकार मूलाधार चक्र में ध्यान स्थित करने से अपने आप शान्त हो जाते हैं।
साधना विधि;-
सबेरे जब एक पहर अँधेरा रहे, तब किसी शान्त स्थान और पवित्र आसन पर दोनों पैरों को पीछे की ओर मोड़कर उन पर बैठें। दोनों हाथ उल्टे करके घुटनों पर इस प्रकार रखी, जिससे उँगलियों के छोर पेट की ओर रहें। फिर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए मूलाधार चक्र में ‘ल’ बीज वाली चौकोर पीले रंग की पृथ्वी पर ध्यान करें।
इस प्रकार करने से नासिका सुगन्धि से भर जाती है और शरीर उज्ज्वल कान्ति वाला हो जाता है। ध्यान करते समय ऊपर कहे पृथ्वी तत्व के समस्त गुणों को अच्छी तरह ध्यान में लाने का प्रयत्न करना चाहिए और 'लं' इस बीज मन्त्र का मन ही मन (शब्द रूप से नहीं, वरन् ध्यान रूप से) जप करते जाना चाहिए।
2-जल तत्व;-
स्वाधिष्ठान चक्र एवं बीज मंत्र जल तत्व- पेढू के नीचे जननेन्द्रिय के ऊपर मूल भाग में स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व का स्थान है। यह चक्र ‘भुव ’ लोक का प्रतिनिधि है, रंग नीला , आकृति अर्धचन्द्राकार और गुण रस है।
कटु, अम्ल, तिक्त मधुर आदि सब रसों का स्वाद इसी तत्व के कारण आता है। इसकी ज्ञानेन्द्रिय जिह्वा और कर्मेन्द्रिय लिंग है। मोहादि विकार इसी तत्व की विकृति से होते हैं।
साधना विधि;-
पृथ्वी तत्व का ध्यान करने के लिए बताई हुई विधि से आसन पर बैठकर 'वं' बीज वाले अर्धचन्द्राकार चन्द्रमा की तरह कान्ति वाले जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र में स्थान करना चाहिए। इनसे भूख-प्यास मिटती है और सहन- शक्ति उत्पन्न होती है।
3-अग्नि तत्व; -
मणिपूर चक्र एवं बीज मंत्र अग्नि तत्व-नाभि स्थान में स्थिति मणिपूरक चक्र में अग्नि तत्व का निवास है। यह ‘स्व’ लोक का प्रतिनिधि है। इस तत्व की आकृति त्रिकोण, लाल गुण रूप है। ज्ञानेन्द्रिय नेत्र और कर्मेन्द्रिय पाँव हैं।
क्रोधादि मानसिक विकार तथा सृजन आदि शारीरिक विकार इस तत्व की गड़बड़ी से होते हैं। इसके सिद्ध हो जाने पर मन्दाग्नि, अजीर्ण आदि पेट के विकार दूर हो जाते हैं और कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने में सहायता मिलती है।
साधना विधि;-
नियत समय पर बैठकर 'रं' बीज मन्त्र वाले त्रिकोण आकृति के और अग्नि के समान लाल प्रभा वाले अग्नि- तत्व का मणि पूरक चक्र में ध्यान करें। इस तत्व के सिद्ध हो जाने पर सहन करने की शक्ति बढ़ जाती है।
4-वायु तत्व;-
यह तत्व हृदय देश में स्थिति अनाहत चक्र में है एवं ‘महलोक’ का प्रतिनिधि है। रंग हरा, आकृति षट्कोण तथा गोल दोनों तरह की है, गुण-स्पर्श, ज्ञानेन्द्रिय-त्वचा और कर्मेन्द्रिय-हाथ हैं। वात-व्याधि, दमा आदि रोग इसी की विकृति से होते हैं।
साधना विधि;-
नियत विधि से स्थित होकर 'यं' बीज वाले गोलाकर, हरी आभा वाले वायु-तत्व का अनाहत चक्र में ध्यान करें। इससे शरीर और मन में हल्कापन आता है।
5-आकाश तत्व;-
शरीर में इसका निवास विशुद्ध चक्र में है। यह चक्र कण्ठ स्थान ‘जनलोक’ का प्रतिनिधि है।बइसका रंग श्वेत , आकृति अण्डे की तरह लम्बी, गोल, गुण शब्द, ज्ञानेन्द्रिय-कान तथा कर्मेन्द्रिय वाणी है।
साधना विधि;-
पूर्वोक्त आसन पर ‘हं’ बीज मन्त्र का जाप करते हुए चित्र- विचित्र रंग वाले आकाश- तत्व का विशुद्ध चक्र में ध्यान करना चाहिए।
इससे तीनों कालों का ज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।नित्य प्रति पाँच तत्वों का छः मास तक अभ्यास करते रहने से तत्व सिद्ध हो जाते हैं, फिर तत्व को पहचानना और उसे घटाना-बढ़ाना सरल हो जाता है।
तत्व की सामर्थ्य तथा कलाएँ बढ़ने से साधक कलाधारी बन जाता है। उसकी कलाएँ अपना चमत्कार प्रकट करती रहती हैं।
अगले पोस्ट में समझेंगे तुरीयावस्था के बारे
क्रमशः
20/03/2024, 6:36 pm - +91 97546 39119: आत्मिक कलाएँ तीन होती हैं- सत, रज, तम। तमोगुणी कलाओं का माध्यम केन्द्र शिव है। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, कुम्भकरण, मेघनाद आदि असुर इन्हीं तामसिक कलाओं के सिद्ध पुरुष थे। रजोगुणी कलाएँ विष्णु से आती हैं।
इन्द्र, कुबेर, वरुण, वृहस्पति, ध्रुव, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, कर्ण आदि में इन राजसिक कलाओं की विशेषता थी। सतोगुणी सिद्धियाँ ब्रह्म से आविर्भूत होती हैं। व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, बुद्ध, महावीर, आदि ने सात्विकता के केन्द्र से ही शक्ति प्राप्त की थी।
प्रभु जी इस पोस्ट में बताया गया है कि ब्रम्हा सतोगुण है और विष्णु रजोगुणी है यह बात अभी तक के जानने में नहीं आई। अभी तक हम यह समझते थे कि शिव =तमो, ब्रह्मा=रजो, विष्णु=सतोगुण है।
रावण रजोगुणी, कुम्भकर्ण, तमोगुणी और विभीषण सतोगुण के परिचायक है । कृपया इस पर थोड़ा प्रकाश डालकर मार्ग दर्शन करें 🙏🙏
21/03/2024, 11:30 am - स्वर विज्ञान: बाबू दास जी आप ऐसे समझे । सत, रज और तम यह तीन गुण प्रकृति के है।
साधना दो प्रकार की होती, एक शक्ति साधना और एक शांति साधना। जो इंद्रियों के वश में होकर संसारिक उन्नति और शक्तिमान होना चाहते वो शक्ति साधना करते।
शक्ति मान होकर अगर नीति से चलते तो रजो गुणी और अनीति से चलते तो तमो गुणी कहलाते। और जो अपने सुख से ज्यादा दूसरे के सुख हेतु जीवन जीते वह स्तोगुणी कहलाते।
21/03/2024, 11:50 am - स्वर विज्ञान: दूसरा प्रश्न है आपका कि विष्णु स्तोगुनी है और ब्रह्मा रजो , देखे विष्णु पालनहार है पूर्ण सत्य से संसार में पलना भी नही हो सकती। चुस्त और चालक लोग रजोगुणी होते।
ब्रह्मा जन्म के कारक है , नवजात शिशु स्तोगुण ले कर आता फिर माया वश रज या तम में गति करता। जो माया के प्रभाव में नही आए तो अवश्य सतोगुनी कह सकते।🙏
21/03/2024, 11:51 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग......77
आनंदमय कोष के चौथे अंग तुरीयावस्था को समझने से पहले हम यह जान ले कि यह अवस्था हमारी चौथी अवस्था है । तो इसे जानने से पहले हम अपनी तीन अवस्थाओं को जानते जिस में हम जीवन भर डूबे रहते जाग्रत, स्वप्र और सुषुप्ति के बारे ।
हमारे शरीर में जो कुछ भी जड़ है वह आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है। स्थूल शरीर हो, सूक्ष्म शरीर हो ,चाहे कारण शरीर हो ,उसमें सारी क्रियाओं का कारण यह आत्मा ही है। स्थूल शरीर में देखना, स्वाद लेना, सुनना, स्पर्श करना आदि।
कर्मेंद्रियों की सभी क्रियाओं का कारण यह आत्मशक्ति ही है।मन, बुद्धि चित्त, अहंकार का कारण भी यह चेतन तत्व ही है ।चेतना के अभाव में यह शरीर कुछ भी नहीं कर सकता । यह चेतन शक्ति चार अवस्थाओं में विद्यमान रहती है ।जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरिया अवस्था।
पहला तो जाग्रत, स्वप्र और सुषुप्ति केवल मन की ही दशाएं नहीं, हमारे जीवन के भी आधार स्तंभ हैं। इन तीन पर ही हम खड़े हैं। और वास्तव में जो स्वयं हैं-इन तीनो के पार चौथे हैं। इन तीन से भवन निर्मित होता है, लेकिन वह जो निवासी है वह चौथा है। इसलिए उसे 'तुरीय' कहा है।
तुरीय का अर्थ होता है चौथा, 'दि फोर्थ'। उसको कोई नाम नहीं दिया, सिर्फ चौथा कहा है। इन तीनों को नाम दिये हैं। उस चौथे को कोई नाम दिया नहीं जा सकता।
क्या है जागृत अवस्था ।
हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियां हैं तथा इनके पाँच विषय हैं। इनके द्वारा जो विशेष अनुभव प्राप्त होता है उसी को "जागृत अवस्था" कहते हैं। इस अवस्था में स्थूल शरीर का अभिमान रहने से आत्मा विश्व नाम वाला होता है । चेतना की इसी अवस्था को "वेश्वानर" कहते हैं ।
जिस प्रकार से वानर कभी भी एक स्थान पर टिक नहीं सकता उसी प्रकार से जागृत अवस्था में जीवात्मा की चेतन शक्ति चंचल बनी रहती है। ऐसा जीवात्मा स्थूल ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से इस संसार का अनुभव करता है ।
क्या है स्वप्नावस्था ।
जागृत अवस्था में मनुष्य को जो भी ज्ञान प्राप्त होता है। वह पांँचों ज्ञानेंद्रियों द्वारा होता है ;किंतु स्वप्नावस्था में इंद्रियां विषयों को ग्रहण नहीं कर सकती। जिससे उनसे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता । स्वप्न में जो भी दृश्य दिखाई देते हैं वे जागृत अवस्था में जो कुछ देखा, सुना गया है।
उसकी सूक्ष्म वासना मन में समाहित रहती है। मन की इसी वासना के कारण निद्रा काल में जगत का जो व्यवहार दिखाई देता है उसी को स्वप्नावस्था कहते हैं। इस अवस्था में स्थूल शरीर तो निष्क्रिय हो जाता है किंतु सूक्ष्म शरीर जागृत रहता है..उसी को स्वप्नावस्था कहते हैं।
क्या है सुषुप्तावस्था ।
जागृत अवस्था में ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से होता है। स्वप्नावस्था में यह ज्ञान मन से उसकी वासना के अनुसार होता है जबकि सुसुप्तावस्था में मन भी सुप्त हो जाता है। इस अवस्था में उसे किसी प्रकार का अनुभव नहीं होता मात्र निद्रा का अनुभव होता है ।
इस अवस्था में आत्म चेतना को अपने कारण शरीर का अभिमान रहता है । वह इसी को अपना वास्तविक स्वरूप मानता है ।आत्मा की यह अवस्था 'प्राज्ञ'कहलाती है जिसमें यह अनुभव स्वयं आत्मा द्वारा होता है। वास्तव में यदि देखा जाए तो जानने वाला केवल आत्मा है।
आत्मा की उपस्थिति में ही जानने योग्य विषय वस्तु को जाना जाता है । आत्मा सीधा ही ज्ञान का कारण है। जागृत अवस्था में ज्ञान का कारण शरीर की ज्ञानेंद्रियां होती है। स्वप्ना अवस्था में ज्ञान का कारण मन होता है । इस अवस्था में मन भी शांत हो जाता है ।
इसलिए यहां पर ज्ञान का बोध सिर्फ आत्मा के द्वारा किया जाता है। क्या है तुरियावस्था अगली पोस्ट में ।
क्रमशः
21/03/2024, 11:51 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग......78
आनंदमय कोष के चौथे अंग तुरीयावस्था में समझते क्या है यह तुरीयावस्था ?-
मन को पूर्णतया संकल्प रहित कर देने से रिक्त मन की निर्विषय स्थिति होती है, उसे तुरीयावस्था कहते हैं। जब मन में किसी भी प्रकार का एक भी संकल्प न रहे, ध्यान, भाव, विचार, संकल्प, इच्छा, कामना को पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया जाए।
भावरहित होकर केवल आत्मा के केन्द्र में अपने अन्त:करण को पूर्णतया समाविष्ट कर दिया जाए, तो साधक तुरीयावस्था में पहुँच जाता है। इस स्थिति में इतना आनन्द आता है कि उस आनन्द के अतिरेक में अपनेपन की सारी सुध-बुध छूट जाती है ।
और पूर्ण मनोयोग होने से बिखरा हुआ आनन्द एकीभूत होकर साधक को आनन्द से परितृप्त कर देता है, इसी स्थिति को समाधि कहते हैं। समाधि काल में अपना संकल्प ही एक सजीव एवं अनन्त शक्तिशाली देव बन जाता है।
जिस किसी को जब कभी ईश्वर का मूर्तिमान् साक्षात्कार होता है, तब समाधि अवस्था में उसका संकल्प ही मूर्तिमान् हुआ होता है। भावावेश में भी क्षणिक समाधि हो जाती है। भूत-प्रेत आवेश, देवोन्माद, हर्ष-शोक की मूर्च्छा, नृत्य-वाद्य में लहरा जाना।
क्रोध का व्यतिरेक, बिछुड़ों से मिलन का प्रेमावेश, कीर्तन आदि के समय भाव- विह्वलता, अश्रुपात, चीत्कार, आर्तनाद, करुण क्रन्दन, हूक आदि में आंशिक समाधि होती है। संकल्प में, भावना में आवेश की जितनी अधिक मात्रा होगी, उतनी ही गहरी समाधि होगी।
और उसका फल भी सुख या दु:ख के रूप में उतना ही अधिक होगा। भय या आवेश होने पर डर के मारे भावना मात्र से लोगों की मृत्यु तक होती देखी गई है। कई व्यक्ति फाँसी पर चढ़ने से पूर्व ही डर के मारे प्राण त्याग देते हैं।
आवेश की दशा में अन्तरंग शक्तियों और वृत्तियों का एकीकरण हो जाने से एक प्रचण्ड भावोद्वेग होता है। यह उद्वेग भिन्न-भिन्न दशाओं में मूर्च्छा , उन्माद, आवेश आदि नामों से पुकारा जाता है। पर जब वह दिव्य भूमिका में आत्म-तन्मयता के साथ होता है, तो उसे समाधि कहते हैं।
समाधि में पूर्ण तन्मयता के कारण पूर्णानन्द का अनुभव होता है। आरंभ स्वल्प मात्रा की आंशिक समाधि के साथ होता है। दैवी भावनाओं में एकाग्रता एवं तन्मयतापूर्ण भावावेश जब होता है, तो आँखें झपक जाती हैं।
सुस्ती , तन्द्रा या मूर्च्छा भी आने लगती है, माला हाथ से छूट जाती है, जप करते-करते जिह्वा रुक जाती है। अपने इष्ट की हलकी-सी झाँकी होती है और एक ऐसे आनन्द की क्षणिक अनुभूति होती है जैसा कि संसार के किसी पदार्थ में नहीं मिलता।
यह स्थिति आरम्भ में स्वल्प मात्रा में ही होती है, पर धीरे-धीरे उसका विकास होकर परिपूर्ण तुरीयावस्था की ओर चलने लगती है ।
क्रमशः
21/03/2024, 12:09 pm - स्वर विज्ञान: हमारे अनुसार अगर तुलना हो तो रावण तम, कुंभकर्ण रज, क्योंकि कुंभकर्ण के भीतर फिर भी कही नीति थी। और विभीषण सतगुण की विशेषता रखते थे।
एक बात और बताना चाहते कि जो परमात्मा को पाना चाहता उसे तीनों गुणों का त्याग करना होता क्योंकि परमात्मा त्रिगुणातीत है, अर्थाथ तीनों गुणों से परे है।
21/03/2024, 1:04 pm - +91 99286 78244: शंका समाधान , अलग बात है , और अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास अलग बात । यह ग्रुप शास्त्रार्थ के लिए न होकर जिज्ञासुओं का ही होना चाहिए, ऐसा मेरी अल्प बुद्धि से समझ में आता है । अगर मैं इतना ज्ञानी हूं कि कुछ सीखने के बजाए , अपना पांडित्य झाड़ने लगूं तो मुझे किसी शास्त्रार्थ के ग्रुप में शामिल होना चाहिए।
मेरी टिप्पणी के लिए गुरुजी मुझे क्षमा करें ।🙏✨️🙏
21/03/2024, 1:33 pm - स्वर विज्ञान: जी रूप सिंह जी आपका कथन सत्य है किंतु बाबूदास जी का प्रश्न हमारी पोस्ट से संबंधित था। अगर हमारी धारणा से अलग कुछ मिलता तो , नई धारणा ग्रहण करने में जब तक शंका का समाधान न हो तो थोड़ा कठिनाई होती।
आप इसे सहज लेवे प्रभुजी ।🙏😊
21/03/2024, 2:47 pm - +91 99286 78244: जी गुरुजी 🙏✨️🙏
21/03/2024, 3:28 pm - +91 97546 39119: जी प्रभु जी बहुत बहुत आभार 🙏
21/03/2024, 3:42 pm - +91 97546 39119: प्रभु जी यहाँ शास्त्रार्थ न होकर गुरु शिष्य संवाद हुआ है आप विचलित न हो आपको किसी प्रकार की ठेस पहुंची उसके लिए क्षमा प्रार्थी हुं पहले कहीं दूसरे जगह से ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ था शंका समाधान बस मार्ग दर्शन लिया है 🙏🙏🙏
21/03/2024, 3:51 pm - +91 99286 78244: जी , मेरी स्थिति एकदम शुरुआत की है , इसलिए ऐसा हुआ, मेरा अब तक का अनुभव यह कहता है कि गुरु वाक्यम् परम वाक्यम् , और इसलिए मैं ने शीघ्रता में सवाल उठा दिया , मैं गुरुजी और आपसे हृदय से क्षमा चाहता हूं । 🙏✨️🙏
21/03/2024, 3:53 pm - +91 97546 39119: 🙏🙏🙏
22/03/2024, 5:47 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....79
आनंदमय कोष के चोथे अंग तुरीयावस्था से आगे ।
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में आत्मा विश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्था में रहती है। इसकी चौथी अवस्था "तुरीया में सभी दृश्य तथा ज्ञान का विलय हो जाता है।केवल परब्रह्म के समान निर्विकल्प ,निर्विचार ,शून्य अवस्था प्राप्त हो जाती है।
इस स्थिति में सभी विकल्प समाप्त होकर केवल ज्ञान ही शेष रह जाता है। यही जीवात्मा की मुक्तावस्था है। आरंभ की तीन अवस्थाओं में जीव और आत्मा के बीच भेद बना रहता है।ज्ञाता और ज्ञान का भेद रहता है। अभेद का ज्ञान होने पर भी भेद बना रहता है।
जीव और ब्रह्म में भेद रहने से ही जीव ब्रह्म की साधना करता है । जीवात्मा उसी का अंश है किंतु प्रकृति के आवरण में आकर वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है। नाशवान जड़ तत्वों से बने हुए भौतिक शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगती है ।
इसी के दुख एवं सुख को अपना दुख एवं सुख मानने लगती है। जब निरंतर ध्यान के अभ्यास से उसे अपने वास्तविक स्वरूप का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर हो जाता है तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को ही धारण कर लेती है । साधक के हृदय में "आत्मवत् सर्वभूतेषु "की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
उसे संपूर्ण संसार अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है।न कोई अपना न कोई पराया ,सब कुछ अपना ही स्वरूप दिखाई देने लगता है अर्थात उसकी चेतना ब्रह्मांड व्यापी अस्तित्व को धारण कर लेती है। इस स्थिति में साधना की आवश्यकता ही नहीं रहती । अब कौन किसकी साधना करें?
तुझमें मुझमें बस भेद यही मैं नर हूंँ तू नारायण है ..किंतु यहां पर पहुंचने के बाद योगी की यह स्थिति समाप्त हो जाती है । फिर जो स्थिति उत्पन्न होती है उसमें साधक कह उठता है- तुझमें मुझमें अब भेद नहीं तू नारायण ,मैं भी नारायण हूँ। एक ही में साधना नहीं हो सकती ।
इसलिए तुरियावस्था में सभी साधनाएं समाप्त हो जाती हैं क्योंकि इसमें आत्मा को परमात्मा से एकत्त्व का अनुभव हो जाता है । नदी पार होने पर फिर नाव की आवश्यकता नहीं रहती।उसे भी छोड़ना पड़ता है। इस स्थिति में योगी को जगत अपना ही स्वरूप ज्ञात होने लगता है ।
वह वासना शून्य हो जाता है । वासना ही जन्म का कारण बनती है तथा वासना शून्य होना ही वास्तविक मुक्ति है । जिस साधक के मन में इस संसार के प्रति कोई वासना नहीं ,कोई आसक्ति नहीं! वह समस्त बंधनों से मुक्त होकर हमेशा हमेशा के लिए इस संसार के आवागमन से मुक्त हो जाता है।
उसके नाम का कोई पता भी नहीं है। और उसकी किसी से कोई तुलना नहीं हो सकती। इसलिए उसे सिर्फ चौथा कहा है। हम प्रत्येक दिन इन तीन में से गुजरते हैं। सुबह जब जागते हैं तो जाग्रत अवस्था में प्रवेश होता है। रात्रि में जब सोते हैं तो पहले स्वप्र में प्रवेश होता है।
फिर जब रूप भी खो जाते हैं तो सुषुप्ति में प्रवेश होता है। हम प्रतिदिन चौबीस घंटे में इन तीन अवस्थाओं में बार-बार घूमते रहते हैं, और अगर और सूक्ष्म में देखें, तो प्रतिपल भी इन तीन अवस्थाओं में डूबते रहते हैं।
अगली पोस्ट में समझते कैसे तुरीय अवस्था में, प्रवेश हो।
क्रमशः
22/03/2024, 5:47 am - स्वर विज्ञान: हमारे पांच कोष भाग .....80
आनंदमय कोष के चौथे अंग तुरीयावस्था में समझते ,कैसे प्रवेश हो तुरीयावस्था में । तुरीय अवस्था में प्रवेश के लिए पहला चरण है अपने शरीर के प्रति पूर्ण होश रखना। धीरे-धीरे व्यक्ति प्रत्येक भाव-भंगिमाओं के प्रति, हर गति के प्रति होश पूर्ण हो जाता है।
और जैसे ही तुम होशपूर्ण होने लगते हो, एक चमत्कार घटित होने लगता है :अनेक बातें जो तुम पहले करते थे, सहज ही गिर जाती है। तुम्हारा शरीर ज्यादा विश्रामपूर्ण, ज्यादा लयबद्ध हो जाता है। शरीर तक में एक गहन शांति फैल जाती है । फिर अपने विचारों के प्रति होशपूर्ण होना शुरू करो।
जैसे शरीर के प्रति होश साधा, वैसे ही अब विचारों के प्रति करो। विचार शरीर से ज्यादा सूक्ष्म है, और फलत: ज्यादा कठिन भी है। और जब तुम विचारों के प्रति जागोगे, तब तुम आश्चर्यचकित होओगे कि भीतर क्या - क्या चलता है; उसे लिख डालो, तो तुम चकित होओगे।
तुम भरोसा ही न कर पाओगे कि भीतर क्या चलता है। फिर दस मिनट के बाद इसे पढ़ो - तुम पाओगे कि भीतर एक पागल मन बैठा हुआ है! चूंकि हम होशपूर्ण नहीं होते, इसलिए यह सब पागलपन अंतर्धारा की तरह चलता रहता है।
यह प्रभावित करता है और इन सब का जोड़ ही तुम्हारा जीवन बनने वाला है। इसलिए इस भीतर के पागल व्यक्ति को बदलना होगा। और होश का चमत्कार यह है कि तुम्हे और कुछ भी नहीं करना है सिवाय होशपूर्ण होने के। इसे देखने की घटना मात्र ही इसका रूपांतरण है।
धीरे-धीरे यह पागलपन विसर्जित हो जाता है। धीरे-धीरे विचार एक लय बद्धता ग्रहण करने लगते हैं, उनकी अराजकता हट जाती है और उनकी एक सुसंगतता प्रकट होने लगती है। और फिर एक ज्यादा गहन शांति उतरती है। फिर जब तुम्हारा शरीर और मन शांतिपूर्ण है ।
तब तुम देखोगे कि वे परस्पर भी लयबद्ध हैं, उनके बीच एक सेतु है। वे अब विभिन्न दिशाओं में नहीं दौड़ते। पहली बार एक सुख - चैन आता है और यह सुख - चैन तीसरे तल पर ध्यान साधने में बहुत सहायक होता है। तीसरे तल पर अपनी अनुभूतियों और भावदशाओं के प्रति होशपूर्ण होना होता है ।
यह सूक्ष्मतम तल है और सबसे कठिन भी। लेकिन यदि तुम विचारों के प्रति होशपूर्ण हुए हो, तब यह केवल एक कदम आगे है। कुछ ज्यादा गहन होश और तुम अपने भावों और अनुभूतियों के प्रति सजग हो जाओगे। एक बार तुम इन तीन आयामों में होशपूर्ण हो जाते हो।
फिर ये तीनों जुड़कर एक ही घटना बन जाते हैं। जब ये तीन एक साथ हो जाते हैं —एक साथ क्रियाशील हो उठते हैं, तब तुम इनका संगीत अनुभव कर सकते हो, वे तीनों एक सुरताल बन जाते हैं। तब चौथा चरण "तुरीय" घटता है...उसे तुम कर नहीं सकते।
चौथा अपने से होता है। यह समग्र अस्तित्व से आया उपहार है, जो प्रथम तीन चरणों को साध चुके हैं, उनके लिए यह एक पुरस्कार है। चौथा चरण होश का चरम शिखर है, जो व्यक्ति को जाग्रत बना देता है। वह बुद्ध व्यक्ति हो जाता है, जाग जाता है।
इस जागरण में ही अनुभूति होती है कि परम आनंद क्या है। वास्तव में ,शरीर केवल देह-सुख जानता है ,मन जानता है प्रसन्नता ,ह्रदय जानता है हर्षोल्लास और केवल चौथा, तुरीय ही आनंद जानता है । संन्यास का, सत्य के खोजी का लक्ष्य है 'आनंद ' जागरूकता ही उसके लिए मार्ग है ।
23/03/2024, 7:48 am - स्वर विज्ञान: पांच कोशी अध्याय पूर्ण हुआ। अब हम समझेंगे कुंडलिनी शक्ति बारे विस्तार से।
23/03/2024, 7:48 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की ...भाग 1
प्याज के छिलके के भीतर दूसरा छिलका दूसरे के भीतर तीसरा। केले के तने को में एक के भीतर दूसरी परत निकलती है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु है वह अकेला दीखते हुए भी अकेला नहीं है।
उसके भीतर मध्यवर्ती नाभिक होता है उसके इर्द गिर्द इलेक्ट्रॉन प्रोटोन न्यूट्रोन आदि छोटी इकाइयाँ परिभ्रमण करती रहती है। सौर मण्डल एक घेरा है। पर उनकी परिधि के अंतर्गत नवग्रह और 43 उपग्रह अपनी-अपनी धुरी एवं कक्षा में परिभ्रमण करते हैं।
परमाणु भी एक सौर मण्डल है। उसके भीतर भी सौर मण्डल की प्रक्रिया काम करती है। मिट्टी का एक ढेला तोड़ा जाय तो उसमें से थोड़ा-सा रेत बिखर जायेगा पर यदि परमाणु के मध्यवर्ती नाभिक को तोड़ा जाय तो उसमें में एक बड़े पर्वत को गला देने वाली ऊर्जा निकलती है।
स्पष्ट है कि स्थूल को जितना सूक्ष्म दिया जाता है उतना ही वह अधिक शक्तिशाली होता है। शरीर में अरबों खरबों जीवन कोशिकाएँ है, पर उनके अन्तराल में जो जीन्स छिपे रहते है। उनमें से प्रत्येक में एक प्राणी की प्रोटोटाइप निहित हैं ।
उनमें से प्रत्येक हर मनुष्य की काया में समष्टिगत ब्रह्माण्ड की तरह अरबों खरबों प्राणी निवास करते हैं। इनमें से एक को संभोग क्रिया के अवसर पर नारी डिम्ब में प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है।
बस इतने भर से एक भ्रूण बनता है और उसका पृथक सत्ता पृथक काया बननी आरम्भ हो जाता है। नौ महीने में भ्रूण परिपक्व हो जाता है और माता के योनिमार्ग में बाहर निकल कर संसार में विचरण करना आरम्भ कर देता है।
इस नवजात शिशु में अपने माता पिता नाना नानी, दादा दादी आदि कितनी ही पीढ़ियों की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं की समावेश होता है। यह विशेषताएँ विभूतियों के रूप में इतनी सूक्ष्म होती हैं।
कि जीवन प्राण जीन्स का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण करने पर भी वस्तुस्थिति का पता नहीं चलता उनकी स्थिति तब प्रकट होती है, जब शिशु विकसित होते होते प्रौढ़ बन जाता है और अपनी विशेषताओं का स्पष्ट परिचय देना आरम्भ कर देता है।
इसका तात्पर्य यह हुआ कि कच्ची स्थिति में उन विशेषताओं का भी पता नहीं चलता जो प्रौढ़ होने पर प्रकट होती हैं। शिशु का विश्लेषण करने पर उस परम्परागत प्रकृति का आभास नहीं मिलता।।
मात्र चेहरे पर त्वचा पर अभिभावकों का कुछ असर दृष्टिगोचर होता है। सूक्ष्मता चिरकाल तक अपरिपक्व स्थिति में ही बनी रहती है और समयानुसार परिपक्व होने पर अपनी स्थिति एवं सत्ता का परिचय देती है।
सूक्ष्म के भीतर सूक्ष्म का इतना बड़ा उपक्रम है कि प्याज के छिलके और केले के तने की उपमा उसके आगे वस्तुतः उपहासास्पद-सी ही प्रतीत होती है बीजों के ढेर का इकट्ठा कर लिया जाय तो उसके रंग रूप वजन आदि में थोड़ा बहुत ही अन्तर दिखाई पड़ता है ।
पर जब उन्हें बोया जाता है तो अन्तर अंकुरों की आकृति से आरम्भ होकर पत्तों में, पत्तों के बाद तनों में, तनों के बाद टहनी में इसके उपरांत फूल फल की आकृति में प्रत्यक्ष होता चला जाता है।
बड़े पेड़ों का अन्तर स्पष्ट दिखने लगता है। उनके फूलों की आकृति सुगंध तथा फलों के स्वाद गुण में इतना अधिक अन्तर हो जाता है कि उनका वर्गीकरण सहज ही पृथक पृथक किया जा सकता है।
यह अन्तर असाधारण होता है। उनकी पृथकता बीज के अन्तराल में छिपी होती है। जिसे आरम्भिक स्थिति में देखा समझा नहीं जा सकता। मानव शरीर की कोशाओं की सामान्य आकृति एक जैसी होती है ।
किन्तु उसके भीतर इतने रहस्य भरे होते हैं जिनकी थोड़ी-सी जानकारी भर मिलने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। भौतिक विज्ञान इस पर्यवेक्षण का स्थूल भाग ही खोजने में लगे हैं।
शरीर में कोशाएँ कितनी भिन्न भिन्न गतिविधियाँ अपनाती हैं और अपने-अपने पृथक पृथक कार्य करने में किस प्रकार संलग्न रहती है। इसका कुछ भाग शरीर शास्त्रीविज्ञानी वंशानुक्रम जान पाए हैं।
उसी आधार पर वे चिकित्सा एवं शल्यक्रिया करते हैं, मनुष्य की जीवन शक्ति की क्षमता तथा संभावनाओं का मूल्याँकन करते हैं। किन्तु विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि जीवन घटक मात्र पदार्थ से ही नहीं बने होते हैं।
उनमें रसायनों भर का सम्मिश्रण नहीं है। उनमें एक महत्वपूर्ण पक्ष चेतना का भी है, जिसे जैव विद्युत कहते हैं। अध्यात्म की भाषा में उसे प्राण कहा जाता है।
यह प्राण यों है तो एक पर विभिन्न अवयवों में पहुँचकर वह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढल जाता है।
मस्तिष्क क्षेत्र में वह आस्था, आकाँक्षा आदत विचारणा आदि के रूप में काम करता है। मन, बुद्धि चित आदि के रूप में उसकी व्यवस्था, विवेचना की जाती है ।
क्रमशः
24/03/2024, 7:49 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज , अन्तरयात्रा की भाग...2
यही प्राण ,तत्व ज्ञानेन्द्रियों में अपना प्रभाव रूप, रस, गंध स्पर्श, शब्द के रूप में ग्रहण करता है। और प्रजनन का ढाँचा खड़ा करता है। हर माँसपेशी का स्नायु तन्तु का अपने अपने ढंग का क्रिया कलाप और स्वभाव है।
शक्ति और ज्ञान दोनों ही इसमें गुँथे हुए हैं। काया के जड़ व चेतन को जानने, समझने के बाद निष्कर्ष निकलता है कि समूचे वृक्ष की सत्ता जिस प्रकार बीज में समायी रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की कायपिंड की हम वर्तमान कालीन स्थिति ही देख पाते हैं ।
पर वस्तुतः उसके साथ भूत और भविष्य भी जुड़ा होता है। काया एक दर्पण है, यदि उसकी गहन सूक्ष्मता तक उतरा जा सकें तो यह जानकर व देखकर आश्चर्य हो सकता है ।
कि यह विश्व व्यापी पदार्थ सत्ता और चेतन सत्ता के साथ हमारा काय पिण्ड कहाँ और किस रूप में किस सीमा तक जुड़ा हुआ है?
वस्तुतः मनुष्य के छोटे शरीर में इतना कुछ भरा पड़ा है जिसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि वह शक्तियों के संयुक्त परिकर की तुलना में अकेला ही अधिक शक्तिशाली है।
किन्तु कठिनाई एक ही है कि यह शक्तिभंडार प्रसुप्त स्थिति में है। इन्हें जानने के लिए तप साधना स्तर के प्रयत्न करने पड़ते हैं, यदि उन्हें न किया जाय तो वे सदा सर्वदा प्रसुप्त ही पड़े रहते हैं ।
और नर पशु से अधिक बड़े स्तर का और कुछ कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए अध्यात्म क्षेत्र में प्रवीण पारंगत बनने के लिए हर किसी को साधना रत होने की आवश्यकता पड़ती है।
कायविज्ञान का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर पाते हैं कि यह सभी विभूतियाँ मनुष्य के भीतर ही है। उनकी दिव्य क्षमताओं को कार्यान्वित कर सिद्धियों को हस्तगत भी किया जा सकता है। सूक्ष्मकाया में षट्चक्र है।
(1)मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपूर (4) अनाहत (5) विशुद्धि (6) आज्ञाचक्र। यह कार्य कलेवर के अंतर्गत ही हैं। इस गणना में मस्तिष्क को छोड़ दिया गया है। उसके मध्य में सहस्रार कमल है।
इसे भी जोड़ देने से सात चक्र हो जाते हैं और सप्त लोकों में जो वैभव है सप्त तीर्थों में जो विभूतिवान पुण्य प्रयोजन हैं उन सबका परिचय मिलने लगता है। आवश्यक केवल विकास जागरण की है।
शुक्राणु का नारी गर्भ में जब पोषण होता है, तब उसका शिशु रूप में विकास और जन्म होता है । बीज कोठे में बन्द रहने पर विकसित नहीं होता, उसे खाद पानी की सुविधा उपलब्ध कराने पर ही यह सम्भव होता है।
कि पौधा पेड़ बने और फूलों से लदा हुआ विशालकाय शोभायमान दृष्टिगोचर हो। मेरुदण्ड को राजमार्ग महामार्ग कहते हैं। इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा जाता है। इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं।
आत्म और परमात्मा के मध्य सप्तलोकों को विराम स्थल माना गया है। लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए बीच बीच में विराम भी लेने होते हैं। रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती कोयला, पानी लेती चलती है।
काय विद्युत के इन विराम स्थलों को ही चक्र कहा गया है। चक्रों की व्याख्या दो रूपों में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है। वेधन कला की समुचित अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है।
अभिमन्यु उसमें फंस गया था वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था। चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं। इस अलंकारिक प्रसंग को आत्म का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं।
भौतिक आकर्षणों की भ्रान्तियों की विकृतियों की दीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है। इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है।
भागवत महात्म्य में धुन्धकारी प्रेत का बाँस की सात गांठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है। इसे चक्रवेधन का संकेत समझा जा सकता है।
क्रमशः
25/03/2024, 10:31 am - स्वर विज्ञान: कुन्डलिनीशक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की , भाग ..3
साधना में अपनी निज की कोई विशेष शक्ति नहीं है। उसकी प्रमुखता एक ही है कि वह सोई हुई शक्ति को जगाती है। जिसमें निज की क्षमता नहीं है या उसके लिए साधना कुछ विशेष कारगर नहीं होती।
सरकस के पशु ट्रेनर उन्हीं को पशुओँ को चुनते हैं। जिनमें निजी चतुरता या सूझबूझ होती है। अर्थात स्वयं की पात्रता बढ़ाना जरूरी होता। साधनाएँ सभी कलात्मक हैं। वे भावना की पृष्ठभूमि पर उगती और फलती फूलती है।
इसलिए दृष्टिकोण का भाव संस्थान का संयम परिष्कार करना होता है। साथ ही चिन्तन और चरित्र को भी परिमार्जित करना होता है। यह प्रारम्भिक शर्त है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।
किस साधना को कितने समय करना चाहिए? इसका सब के लिए एक जैसा निर्धारण नहीं हो सकता यह मनोभूमि के ऊपर निर्भर है। जिसके व्यक्तित्व में आत्मवादी गुणों का पहले से ही समावेश हो चुका है।
वह थोड़े ही समय में थोड़े ही श्रम में उत्साहवर्धक लाभ प्राप्त कर सकता है। किन्तु जिन सत्प्रवृत्तियों आधार पर यह उपार्जन किया जाता है उन्हीं में वह खर्च भी होता रहता है।
गिरों को उठाने में दुखों को घटाने में डूबतों को उबारने में चढ़ते को चढ़ाने में इस शक्ति का समापन होता रहता है। तप के बदले पुण्य बढ़ता रहता है। इस प्रकार संतुलन बना रहता है ।
और योगी यती साम्य सात्विक देवोपम जीवन जीते रहते हैं उनका दृष्टिकोण स्वर्गोपम और आचरण जीवन मुक्त जैसा रहता है। आत्म गौरव के रूप में आत्म साक्षात्कार होता है ।
और विश्व वसुधा के कण-कण में समाये हुए परमेश्वर का दर्शन विवेक चक्षुओं से निरन्तर होता रहता है। वही वह स्थिति है जिसमें पुरुष पुरुषोत्तम नर नारायण कहलाता है।
किन्तु यदि चिन्तन और चरित्र पर आश्रित व्यक्तित्व उज्ज्वल न हो उसमें वीभत्स स्तर की निकृष्टता भरी हो तो रहस्यमयी शक्तियों के उपार्जन कर लेने पर मनुष्य मदोन्मत्त हो जाता है ।
और ऐसे कुकृत्य करने लगता है जिससे उसकी गणना राक्षस, असुर दैत्य वर्ग होती है। धन, बल, वैभव पराक्रम आदि शक्तियों का यदि सदुपयोग न हो तो वे संचित नहीं रह सकती, कुमार्ग में चल पड़ती है।
अंगूर सड़ने पर मदिरा बन सकता है। इसी प्रकार रहस्यमयी आन्तरिक शक्तियों का विकास हो किन्तु सत्प्रयोजनों में न लग सके तो फिर दूसरा विकल्प दुरुपयोग ही रह जाता है।
अध्यात्म का योगपरक दक्षिणमार्गी। उपयोग न होगा तो फिर वह दुष्टता पर उतारू होगा। कुकर्मी ताँत्रिक अघोरी, कापालिक भी असुरता पर उतर आते हैं और मारण मोहन वशीकरण, उच्चाटन जैसे घोर कर्म करते हैं।
असुरों को प्रायः आक्रमण करते और आतंक मचाते ही देखा जाता है। वृत्तासुर हिरण्यकश्यप महिषासुर कंस रावण आदि यही करते रहे।
उनके परिवार के खरदूषण कुम्भकरण मेघनाद हिरण्याक्ष, कंस, जरासंध, रक्तबीज आदि ने यही किया असुरों ने देवताओं को सताया। उनका वैभव लूटा ओर ऋषि रक्त को निचोड़ा था।
वे प्रजा का मात्र त्रास ही देते रहते थे और तनिक से स्वार्थ के लिए बड़े से बड़ा अनर्थ कर गुजरते थे। असुरों के दो वर्ग होते हैं, एक उद्धत आक्रमी आतंकवादी।
दूसरे मायावी छली, प्रपंच रचने वाले और षडयंत्र गढ़ने वाले आक्रमणकारी अपने पराक्रम की डींग हाँकते हैं और मायावी अपने छल कौशल को मयाचार को बढ़ चढ़कर बखानते हैं।
आक्रमणकारी बदनाम हो जाते हैं किन्तु मायावी पर्दे के पीछे बैठकर अपनी घात चलाते हैं। कई बार तो वे बाहर से सन्त और हितैषी जैसा आवरण ओढ़ते हैं। उदाहरण के लिए कालनेमि इस मायावी वर्ग का था।
रावण का कुटुम्बी असुर होते हुए भी वह आक्रमण नहीं करता था, पर दूसरों की बुद्धि पर सवार होकर उन्हें ऐसे कुमार्ग पर घसीट ले जाता था जहाँ से वे उभर तो सकते नहीं थे, दलदल में फँसकर रोते कलपते प्राण त्यागते थे।
अध्यात्म शक्तियों का उपार्जन तो किया जाय पर उसको सत्प्रयोजन में न लगाकर विलास वैभव चातुर्य छल पाखण्ड में लगाया जाय तो स्थिति कालनेमि जैसी बन जाती है।
असली आत्मशक्ति सम्पादन तो श्रेय मार्ग अपनाते पर ही बन पड़ता है। उसी में अपना तथा अन्य सबका भला भी है। आत्म विज्ञान का मूलभूत दर्शन यही है कि साधना का अवलम्बन लिया जाय।
प्राप्त सिद्धियों विभूतियों को परहित हेतु ही नियोजित किया जाय । स्वयं हित के लिए कभी साधना मार्ग नही अपनाना चाइये उसके लिए सांसारिक मार्ग है खूब सफलता प्राप्त कर सुख भोग सकते।
क्रमशः
26/03/2024, 10:50 am - स्वर विज्ञान: कुन्डलिनीशक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग ....4
मोटेतौर पर समझा यह जाता है कि परिस्थितियाँ भावना स्थिति को प्रभावित करती है। संसार में जो घटित हो रहा है, उसी से हम प्रभावित होते हैं। अपर आत्म विज्ञान की मान्यता इससे बहुत गहराई तक चली गई है।
और यहाँ तक पहुँची है कि वैयक्तिक चेतना के तन्तु समीपवर्ती और दूरवर्ती परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं। मनुष्य को अपना भाग्य विधाता कहा जाता है, पर तथ्य यह है कि ।
वह विकसित स्थिति में ब्रह्माण्ड का सूत्र संचालक भी है इतना तो इस संदर्भ में निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि अपने भीतरी और बाहरी क्षेत्र से सम्बन्ध रखने वाले परिकर को मन स्थिति के अनुरूप।
निश्चित रूप से ढाल सकते हैं विकसित स्थिति के अनुरूप निश्चित रूप में ढाल सकते हैं विकसित स्थिति में वह विश्व व्यापी गतिविधियों को भी मोड़ मरोड़ सकता है। इसी को अतीन्द्रिय क्षमता कहा गया है।
यही अतिमानव या अति मानस की स्थिति है जो कि साधारणतया अविज्ञात एवं प्रसुप्त स्थिति में ही बनी रहती है। इसे जागृत कैसे किया जाय? बलिष्ठ कैसे बनाया जाय?
और विभिन्न प्रयोजनों के लिए उसे काम में कैसे लाया जाय? इसी का नाम आत्मविज्ञान है। इसी को ब्रह्म विद्या कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी को जीवन्त जागृत स्तर तक पहुँचाने के लिए की जाती है।
कुण्डलिनी शक्ति की तुलना विद्युत शक्ति ऊर्जा एवं आभा से की गई है। तडिल्लता समरुचिवि द्यूल्लेखे़त्र भास्वरा सूत्र में उसे बिजली की लता रेखा जैसा ज्योतिर्मय बताया गया है।
एक अन्य स्थान पर उसका उल्लेख तडिल्लेखा तन्वी तपनशशि वैश्वानरमयी के रूप में किया गया है। अर्थात्- वह प्रचण्ड अग्निशिखा एवं दिव्य वैश्वानर अग्नि के समतुल्य है। योग कुंडल्योपनिषद् में कहा गया है:-
मूलाधारस्य ब्रहमायात्म तेजो मध्ये व्यवस्थिता। जीवशक्ति कुण्डलाख्या प्राणाकाराय तैजसी॥
मूलाधार के मध्य वह आत्मतेज ब्रह्मतेज रूपी कुण्डलिनी निवास करती है। वही जीवनी शक्ति है। तेजरूप है। एवं प्राण शक्ति है। इसी प्रकार महायोग विज्ञान में उल्लेख है मूलाधार चक्र में आत्म-ज्योति अग्नि रूप दीखती है।
स्वाधिष्ठान चक्र में वह प्रवाल अंकुर-सी प्रतीत होती है मणिपूर में विद्युत जैसी चमकती है। नाभिचक्र में वह तड़ित सम प्रकाशवान् है। हृदय कमल के अनाहत चक्र में वह लिंग आकृति की।
कंठ चक्र में श्वेत वर्ण की तालू चक्र में शुनरुाकार एकरस अनुभूत होती है। भू चक्र में अंगूठे के प्रमाण जलती दीप शिखा-सी भासती है। आज्ञा चक्र में धमशिखा जैसी और सहस्रार चक्र में चमकते परशु-सी दीखती है।
प्रस्तुत अलंकारिक व्याख्या कुण्डलिनी महाशक्ति की विद्युतमयी सत्ता की एक झांकी देती है। वैसे वैज्ञानिक प्रतिपादनों व प्रमाणों के आधार पर हम कुंडलिनी को मानवी विद्युत का प्रचंड अंश कह सकते है।
बारूद फुलझड़ी जलाने के काम भी आती है। और डाइनामाइट की तरह पहाड़ों के परखच्चे भी उड़ा देती है। मानवी विद्युत का हलका अंश चेहरे या शरीर के इर्द गिर्द फैले हुए तेजोवलय जैसे रूप में भी देखा जा सकता है।
और उसका प्रचण्ड रूप तृतीय नेत्र आज्ञा चक्र खोलकर शिव द्वारा काम देव जला देने जैसा विस्फोट भी कर सकती है। दमयंती के शाप से व्याध भस्म हो सकता है।
सगर राजा के हजारों उदत पुत्र जलकर भस्म हो सकते है। गौतम के कोप से इन्द्र ओर चन्द्रमा जैसों की दुर्गति हो सकती है। यादव कुल दुर्वासा के शाप से पारस्परिक कलह में नष्ट हो सकता है।
प्रचण्ड रूप धारण करने वाली मानवी विद्युत कुण्डलिनी है। प्रकारान्तर से डाइनामाइट कह सकते है। ऊर्जा मनुष्य के कण कण में विद्यमान है। वह मस्तिष्क हृदय और जननेन्द्रिय मूल में विशिष्ट मात्रा में पाई जाती है।
इन तीन अग्नियों को ही वैदिक भाषा में अहितग्नि दक्षिणग्नि गाहपत्याग्नि तीन अग्नियों के नाम से जाना जाता है। यही महाकाली महाचंडी ओर महादुर्गाएं है।
सामान्य ऊर्जा दो व्यक्तियों के सान्निध्य से दीर्घप्राण वाले का प्रभाव स्वल्प प्राण वाले पर डालती है। सत्संग ओर कुसरा के रूप में इसका भला बुरा प्रभाव होता है। नर नारी का संयोग इसी ऊर्जा का क्रीड़ा कल्लोल पक्ष है।
तपसी इसी योगाग्नि पर तपश्चर्या करते थे जठराग्नि भोजन पचाती और उसे वीर्य स्तर तक ले पहुँचती है। कामाग्नि से पीड़ित नर नारी दीपक की चमक पर पतंगे की तरह जल मरते है।
वाणी की अग्नि शत्रु मित्र बनाती शाप वरदान देती रहती है। ओजस तेजस एवं वर्चस का आलोक व्यक्ति की प्रतिभा में फूटता हुआ परिलक्षित होता है। ब्रह्माग्नि सहस्रदल कमल में रहती है
क्रमशः
27/03/2024, 11:41 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग ...5
वाणी की अग्नि शत्रु मित्र बनाती शाप वरदान देती रहती है। ओजस तेजस एवं वर्चस का आलोक व्यक्ति की प्रतिभा में फूटता हुआ परिलक्षित होता है। ब्रह्माग्नि सहस्रदल कमल में रहती है ।
और आत्मा को परमात्मा का दर्शन कराती है। हृदय की भावाग्नि दया करुणा मैत्री सेवा आदि के रूप में प्रस्फुटित होती है। कालाग्नि मरण का निमित्त कारण बनती है। मदाग्नि से मनुष्य आलसी ओर रोगी बन जाता है।
ऐसी अनेकों अग्नियों शरीर में है। प्राकृत अग्नि विज्ञान ऐसी 13 अग्नियों का वर्णन करता है। उनके अपने प्रभाव है। इनमें से प्राणाग्नि कुण्डलिनी है। जिसके कारण जीवनी शक्ति जीवट और हिम्मत मनुष्य में फुट फूट कर भरी रहती हैं यह माना गया है।
कि यह प्रसुप्त ऊर्जा स्रोत मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में 6 तालों की तिजोरी में बन्द है। ये 6 ताले ही षट्चक्र है। जो भंवर नाड़ी गुच्छक अथवा विद्युत प्रवाह के रूप में काया में अवस्थित है।
शास्त्रकारों ने चक्रों एवं कुण्डलिनी की अपनी अपनी तरह से अलंकारिक व्याख्याएं की है। शाम्भवी तंत्र का कथन है। जिस प्रकार ताली से ताला खोलकर घर में प्रवेश किया जाता है।
उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण के उपरान्त मनुष्य सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मलोक पहुंचता है। तैत्तरीय आरण्यक में चक्रों को देवलोक कहा गया है। सौंदर्य लहरी में इस महाशक्ति की व्याख्या करते हुए ।
आद्य शंकराचार्य ने आज्ञाचक्र तथा सहस्रार को ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधि माना है। तथा षट्चक्र वेधन करने पर कैसे कुण्डलिनी शक्ति ब्रह्मलोक तक पहुंचती व परब्रह्म से विहार करती है। इसका वर्णन इस प्रकार किया है।
मही मूलाधार कमपि मणिपूरे हतवहं स्थित स्वाधिष्ठाने हदि मरुतमाकाशमुपरि। मनोअपि भू्रमघ्ये सकलमपिभित्वा कुल पर्थ सहस्रार पदम सहरहसि पत्या विहरसि॥
अर्थात् है। कुण्डलिनी तुम मूलाधार में पृथ्वी को स्वाधिष्ठान में अग्नि को मणिपूर में जल को अनाहत में वायु को विशुद में आकाश को वेधन करती हई आज्ञाचक्र में मन को प्रकाश देती हो ।
योगदर्शान के समाधि पाद सूत्र 36 में कहा गया है। विशोका ज्योतिष्मती उनका यह संकेत कुण्डलिनी की और है। कि इस ज्योतिष्ती के प्रकाशवान होने पर मनुष्य दुख शाको से छूट जाता है।
तैंतीसकोटि देवताओं की हिंदू धर्म में मान्यता है। यह मेरुदंड में पाये जाने वाले 33 धटकों या गृटकों की और संकेत है। इन खंडों को कशेरु या र्वाटबी कहते हैं। मेरुदण्ड आकृति में सर्पाकार है।
प्रत्येक दो कशेरु के मध्य में एक मास निमित्त गद्दी-सी रहती है। जिस पर प्रत्येक कशेरु टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। इसी कारण यह अपनी धुरी पर हर दिशा में धुम सकता है। उसे पांच भागो में बाटा जा सकता है।
1 ग्रीवा सरवाइकल कशेरु 2 पीठ थोरक्स कशेरु 3 कटिप्रदेश लम्ब्र कशेरु 4 वस्तिगहवर त्रिक प्रदेश सेक्रल कशेरु 5 पुच्छिकास्थ्चिंचु काक्सीक्स कशेरु। इन तैंतीस खंडों में सन्निहित क्षमता को देवोपम माना गया है।
मेरु दण्ड पोला तो है पर ढोल की तरह खोखला नहीं उसमें मस्तिष्कीय मज्जा भरी हुई प्रत्येक कशेरु के पिछली और दायें बायें अर्धवृत्ताकार छिद्र होता है। जिसमें से छोटे नाड़ी सूत्रों से नाड़ियां बाहर निकलती है।
मेरुदण्ड का निचला भाग शंकु के आकार का है। जिसे फाइलमत टमानेल कहते हैं। चंचु प्रदेश के कशेरु जितने छोटे है उतने ही चौड़े है। वे अन्दर से पोले भी नहीं है। और एक दूसरे से जुड़े हुए है।
ये चार कशेरु मिलकर अण्डे की आकृति वाला अथवा फूल की कली के सदृश आकार बनता है। इसे काक्सीक्स कहते है। इस गोलक को कुण्डलिनी योग में कन्द एवं स्वयं भू लिंग के नाम से पुकारा गया है।
क्षेत्रों के हिसाब से चक्रों का क्रम इस प्रकार है। 1 चंचु प्रदेश मूलाधार 2 त्रिक प्रदेश स्वाधिष्ठान 3 कटि प्रदेश मणिपूर 4 वक्षस्थल अनाहत 5 गीवा विशद चक्र। मेरुदण्ड यही समाप्त हो जाता है।
आज्ञाचक्र मस्तिष्क के अग्रभाग में है। और सहस्रार मस्तिष्क के बीचों बीच। चक्र वेधन चक्र शोधन चक्र परिष्कार चक्र जागरण आदि नामों से इन्हीं गुह्य केंद्रों की क्षमता को प्रकट करने का प्रयत्न किया जाता है।
यहाँ एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि अध्यात्म शास्त्र में शरीर विज्ञान को विशुद्ध रूप से सूक्ष्म विद्या के रूप में माना जाता है। स्थूल शरीर में तो उसकी प्रतीक छाया ही देखी जा सकती है।
कभी किसी शारीरिक अंग को सूक्ष्म शरीर से नहीं जोड़ना चाहिए। मात्र उसे प्रतीक प्रतिनिधि भर मानना चाहिए।
क्रमशः
28/03/2024, 10:56 am - स्वर विज्ञान: कुन्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग ...6
गिरना हमेशा बुरे अर्थों में लिया जाता है एवं उठना अच्छे अर्थ में। यह सिद्धान्त कायसत्ता के क्षेत्र में विशेषकर जननेन्द्रियों में सन्निहित प्राणशक्ति के ऊपर विशेष रूप से लागू होता है।
मूलाधार को योनि एवं सहस्रार को लिंग बताते हुए अध्यात्मशास्त्र में अलंकारिक विवेचन तो किया गया है पर क्रिया प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। मूलाधार स्थित शक्ति को कामाचार में नष्ट न कर उर्घ्व करनाचाहिए ।
ताकि उसका सुनियोजन सद्ज्ञान संवर्धन ध्यान द्वारा प्रसुप्ति के जागरण में हो सके। सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति शिवलिंग के साथ लिपटी प्रसुप्त सर्पिणी की तरह पड़ी रहती है।
समुन्नत स्थिति में विकास होते होते यह शक्ति ऊँचे उठकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान क्षीरसागर मस्तिष्क के ग्रे मैटर में अवस्थित सूक्ष्म स्नायु तन्तुजाल सहस्रार पर जा बिराजती है।
एक छोटा-सा शिवलिंग ऊर्ध्वगमन के बाद कैलाश पर्वत का रूप ले लेता है। खिले हुए सहस्रदल कमल के रूप में उसका विकास होता है एवं क्रमश मस्तिष्क के सारे सोय केन्द्र जाग पड़ते हैं। यह लघु का विराट में विस्तार है।
नियंत्रण में मेरुदण्ड का आश्रय लिया जाना अत्यावश्यक है। उसे मोड़कर सुषुम्ना की चेतना धारा को उच्चस्तरीय प्रयोजनों में नियोजित किया जा सके तो विषयानन्द की तुलना से ज्यादाआनन्द ब्रह्मानन्द में पाया जा सकता है।
बंध मुद्राओं प्राणायाम आसनादिक के विभिन्न उपचार इसी उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं। सिद्धान्त या वज्रासन में शक्तिचालिनी मुद्रा व विशिष्ट बंधों व प्राणयोग का आश्रय लेकर मूलाधार की शक्ति के उद्दीपन जागरण उर्ध्वगमन एवं उसे पूर्णता के केन्द्र से जोड़ने का प्रयत्न किया जाता है।
इन सभी प्रयोगों को जो कि हठयोग या क्रियायोग से संबंधित है कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया का प्रारम्भिक माध्यम भर मानना चाहिए। भ्रान्तिवश इन्हीं उपचारों को सब कुछ मान लिया जाता है।
जबकि ये मात्र चौक के प्रयोग द्वारा ठण्डी मोटर गाड़ी में गर्मी पैदा करने के समतुल्य हैं। यह प्रसंग यहाँ करना अनिवार्य है क्योकि कुण्डलिनी को कामबीज भी कहा गया है।
इसके प्रतीक रूप में शिवलिंग की स्थापना की जाती है शिवलिंग का रुद्राभिषेक करते हैं तो तीन टाँग की तिपाही पर जलघट रखा जाता है और एक एक बूँद पानी गिराने का प्रबन्ध किया जाता है।।
यों नारी योनि में भी मदनाँकुर होता है। पुरुषशिशन के अधोभाग में भी नारी योनि है। इन्हीं विपरीतताओं के जागृत होने पर लिंग परिवर्तन के प्रसंब घटते रहते हैं। नर नारी बन जाती है और नारी नर।
इसका कारण प्रसुप्त क्षेत्रों में ऊर्जा आवेश का पहुँच जाना है। कामुकता भी इन्हीं कारणों से उभरती रहती है। यह अनुपयुक्त क्रम बनने न पाए, इसलिए मस्तिष्क का ज्ञान रूप अमृत टपका कर उसे शान्त करते रहा जाता है।
इसी अमृत को सोमरस कहते हैं। खेचरी मुद्रा की सोऽहम् साधना में सोमरस पान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। जिस तिपाही पर रुद्राभिषेक का जल घट रखा जाता है, वह इड़ा पिंगला सुषुम्ना इन तीन नाड़ियों का प्रतीक है।
रुद्राभिषेक को कुण्डलिनी साधना का एक दृश्य प्रतीक माना गया है। इस वर्णन में अलंकारिक माध्यम से इस तथ्य का प्रतिपादन है कि कुण्डलिनी के अधिपति शिव प्रत्यक्ष और समर्थ परमेश्वर है।
उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मान सरोवर की तरह पवित्र समझे जाँय, उन्हें नर नारी की घृणित जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय। वरन् उनकी पवित्रता और महत्ता के प्रति उच्च भाव रखते हुए उनके सदुपयोग शक्ति के सुनियोजन की आराधना में तत्पर रहा जाय।
साहस और कलाकारिता के पुरुषार्थ और लालित्य के कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर नारी की जननेन्द्रियों के निकटस्थ मूलाधार चप्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।
हठयोग के साधनाकाल के इस प्रचलन की अश्लील कल्पना करने वाले शिशन और नारी योनि के साथ संगति बिठाते हुए “संभोग से समाधि” की चर्चा करते है। यह कथन सही नहीं, बड़ा बेतुका भद्दा एवं दिशाहीन करने वाला है।
वस्तुतः हृदय मस्तक जैसे पवित्र इन स्थानों तक अनाचार की अतिवाद की गन्दगी नहीं पहुँचनी चाहिए। कि इन्हें अधिकाधिक पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। और ऊर्ध्वरेता बनना चाहिए। यह मर्यादा स्त्री और पुरुष दोनों को ही निबाहनी चाहिए।
क्रमशः
29/03/2024, 8:39 am - स्वर विज्ञान: कुन्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग .....7
शास्त्रकारों ने कुण्डलिनी की प्रकृति का निरूपण करते हुए कामकला से उसकी संगति बिठाई है। पर उसका अर्थ कामुकता नहीं वरन् कायसत्ता में उत्साह व उल्लास करने वाली शक्ति से लिया जाता है।
मूलाधार को कामबीज भी कहते हैं एवं सहस्रार को ज्ञानबीज। दोनों के समन्वय परिष्कार से विवेकयुक्त क्रिया बनती है। जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास व्यक्तित्व का परिष्कार चिन्तन के स्तर में निखार इसी शक्ति पर निर्भर है।
कुण्डलिनी योग इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था के निमित्त की जाने वाली साधना है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में कुण्डलिनी को “योगान्नि” अथवा नचिकेत अग्नि कहा गया है और उसकी तुलना पवित्र यज्ञाग्नि से की गई है।
कहा गया है कि जिसके शरीर में यह दिव्य अग्नि प्रज्वलित रहती है उसके न शरीर में रोग होता है न मन में विक्षोभ। चैनिक योग प्रदीपिका में आई लोहैन ने इसे स्प्रिट फायर कहा है ।
और आत्मा की ज्वलन्त अग्नि के रूप में उसकी विवेचना की है। योग विद्या विशारदो ने इसे विश्वव्यापी वैद्युतीय शक्ति कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी कहा है और इसकी गति को 345000 मील प्रति सेकेंड बताया है।
जबकि प्रकाश की गति 1, 85000 मील प्रति सेकेंड एवं विद्युत तरंगों की गति 2, 88000 मील प्रति सेकेंड है। वैज्ञानिकों के अनुसार विचार तरंगों की गति विद्युत तरंगों से सात गुनी अर्थात् 22,65120 मील प्रति सेकेंड है ।
विचार क्षण मात्र में ही पृथ्वी लगभग चालीस बार परिक्रमा लगा सकते हैं। अध्यात्मिक शक्ति होते हुए भी कुण्डलिनी की संगति पूर्णरूपेण शारीरिक विद्युत के साथ जुड़ जाती है।
डॉ. वसन्त जी रेले ने अपनी पुस्तक “द मिस्टीरियस कुण्डलिनी” में इसे नर्वस फोर्स कहा है। इस पुस्तक की भूमिका सर वुडरफ ने लिखी है। उनके अनुसार रेले जहाँ कुण्डलिनी की संगति दायीं वेगस नर्व से बिठाते हैं ।
वहाँ वे स्वयं उसे एक “गण्डपोटेन्शियल” और भी बड़ी शक्ति मानते हैं। कुण्डलिनी उनके अनुसार “डायनेमिक रियल” वह प्रसुप्त ऊर्जा है ।
जिसे पदार्थ सत्ता की इन्वाँल्यूशन प्रक्रिया के विपरीत इवाँल्यूशन के माध्यम से ऊँचा उठाकर व्यक्तित्व को प्रखर समुन्नत बनाया जा सकता है।मूलाधार शब्द के दो खंड है।
मूल आधार मूल अर्थात् जड़ बेस आधार अर्थात् सहायक सपोर्ट जीवन सत्ता का मूल भूत आधार होने के कारण उस शक्ति संस्थान को मूलाधार कहा जाता है। वह सूक्ष्म जगत में होने के कारण अदृश्य है।
अदृश्यों को प्रतीक चिन्ह प्रत्यक्ष शरीर में भी रहता है। जैसे दिव्य दृष्टि के आज्ञाचक्र को पिट्यूटरी और पीनियल रूपी दो आंखों में काम करते हुए देख सकते है। ब्रह्मचक्र के स्थान पर हृदय को गतिशील देखा जा सकता है।
मूलाधार सत्ता को मेरुदण्ड के सकेकल प्लेक्सस में देखा जा सकता है। अपनी चेतनात्मक विशेषताओं के कारण उसे वह पद एवं गौरव प्राप्त होना हर दृष्टि से उपयुक्त है। प्राण का उद्गम मूलाधार है।
पर उसका विस्तार व्यवहार और वितरण तो मेरुदण्ड माध्यम से ही सम्भव होता है।मूलाधार के कुछ ऊपर और स्वाधिष्ठान से कुछ नीचे वाले भाग में शरीर शास्त्र के अनुसार प्रोस्टैटे ग्लेण्ड है शुक्र संस्थान यही होता है।
इसमें उत्पन्न होने वाली तरंगें काम प्रवृत्ति बन कर उभरती है। इससे जो हारमोन उत्पन्न होते है। वे वीर्योत्पादन के लिए उत्तरदायी होते हैं। स्त्रियों का गर्भाशय भी यही होता है।
सुषुम्ना के निचले भाग में लम्बर और सेक्रल प्लैक्सस नाड़ी गुच्छक है। जननेंद्रियों की मूत्र त्याग तथा कामोत्तेजन दोनों क्रियाओं पर इन्हीं गुच्छाओं का नियन्त्रण रहता है।
यहां तनिक भी गड़बड़ी उत्पन्न होने पर इनमें से कोई एक अथवा दोनों ही क्रियाएँ अस्त व्यस्त हो जाती है। बहुमूत्र नपुंसकता अति कामुकता आदि के कारण प्रायः यही से उत्पन्न होते है।
सारी जीवनोपयोगी प्रेरणाओं को केन्द्र यही स्थान है। जिसे कन्द कुण्ड या कामबीज कह सकते हैं। कन्द का एक नाम कूर्म भी है। इसे कच्छपावतार का प्रतिनिधि माना गया है।
उसे पैरों को सिकुड़ने फैलाने के कारण वहाँ से निस्सृत शक्तिधाराओं का प्रतीक माना गया है। कन्द की आकृति एक अण्डे के समान मानी गयी है। उसे हाथ पाव सिकोड़े कछुए है उपमा भी दी गई है।
समुद्र मथन की कथा में रइ्र मदिरांचल पर्वत के नीचे ही भगवान कूमावतार के रूप में कच्छप बनकर बैठे थे ओर उस भार को अपनी पीठ पर उठाया था यह कूर्म यह कन्द की अंतर्जगत के मथन एवं शक्ति के ऊर्ध्वगमन के रूप में अलंकारिक व्याख्या है।
क्रमशः
30/03/2024, 11:46 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग ....8
षट्चक्रों से संगति बिठाने वाले मनीषियों ने अन्त प्रभावी ग्रन्थियों के समूह को उनका स्थूल प्रतीक रूप माना है। उनके अनुसार नर व नारी में इन चक्रों में प्रवाहित विद्युत की ही एक मोटी स्थूल प्रतिक्रिया पुरुषोचित दढता एवं स्त्रियोचित कोमलता के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है।
यह सामान्य जैविक क्रिया कलापों की एक झलक मात्र है। वैसे इन एण्डोका्रन ग्लैण्ड्स व उनसे निकलने वाले हारमोन्स के क्षेत्र को जादू का पिटारा कहा जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। ये 6 हारमोन ग्रंथियां इस प्रकार है।
1 पीनियल सिरोटोनिन व मेलेटोनिन
2 पिट्यूटरी गा्रेथ हारमोन
3 थायराइड थायरक्सीन
4 थाइमस रिप्रोडक्टीव हारमोन
5 एडीनेलीन ए सी टी एच
6 गोनेडस टैस्टोस्टेरान नर एवं इस्टोजन मादा।
साधारणतया सर्पिणी कुण्डलिनी एवं सहस्रार आज्ञाचक्र आदि कुण्डलिनी से संबंधित अवयव प्रसुप्त स्थिति में निष्क्रिय पड़े होते है। निद्रा या मूर्छा की स्थिति में मनुष्य भी मतकवत स्थिति में हो जाता है।
उसे कुछ भी होशो–हवास नहीं रहता। उसकी वस्तुओं को कोई उठा ले जा सकता है। कुछ ज्ञान नहीं रहता किन्तु जब जागृति की अवस्था होती है। तो उसे अपनी सामर्थ्य और हानि होने की जानकारी वापस लोट आती है।
शरीरगत विद्युत शक्ति का सामान्य प्रवाह निष्क्रिय पड़ा रहता है। पर उसे झकझोरकर साधना द्वारा जागृत और द्रुतगामी बना दिया जाता है। तो स्थिति में भारी अन्तर पड़ जाता है।
तेज हवा जब बांस के झुरमुटों में टकराती है। जो बंशी बजने जैसी आवाजें भी होती है ओर सूखे बांसों में रगड़ पड़ने से उनमें अग्नि भी प्रकट हो जाती है। रेल मोटर जैसे द्रुतगामी वाहनों के पीछे पत्ते तिनके धूलिकण भी उड़ते दौड़ते देखे गये है।
नदी के बीच पड़ी चट्टानों से पानी टकराता है। तो उछालने लगता है। पनचक्की के पंखे घूमते हैं। तो उनसे आटा पीसने जैसे काम लिए जाते है। भरने ऊपर से नीचे गिरते है। तो उन प्रपातों पर बिजली बनाने के यंत्र लगा दिये जाते है।
अंधड़ तूफान चक्रवात भंवर अपनी अपनी असाधारण शक्तियों का परिचय देते है। चक भी जब जागृत और उत्तेजित होते है। तो उनके द्वारा स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीर उफनने लगते है। अपनी असाधारण शक्ति का परिचय देते है।
विभिन्न अध्यात्म ग्रंथों में कुण्डलिनी के संदर्भ में अनेक अभिमत व्यक्त किये गए है। यथा त्रिपूरा तंत्र में कहा गया है। जो देवता भोग देते है। वे मोक्ष नहीं देते जो मोक्ष देते है। वे भोग नहीं देते। किन्तु कुण्डलिनी दोनों को ही प्रदान करती है।
महायोग विज्ञान में लिखा है। जिसकी मूलाधार शक्ति सो रही है। उसका संसार सो रहा है। जिसकी कुण्डलिनी जगी समझना चाहिए कि उसका भाग्य जग गया। महातंत्र में उल्लेख है। जिसकी कुण्डलिनी जगती है।
उसकी बैखरी मध्यमा परा और पश्यंति वाणी जागृत हो जाती है। उसका कथन सत्य होकर रहता है। योगिनी तंत्र में लिखा है। कुण्डलिनी के जगते ही अन्तराल में छिपा वैभव अनायास ही दृष्टिगोचर होने लगता है।
महाभारत का सुप्रसिद्ध आख्यान है। कि भीष्म पितामह दक्षिणायन सूर्य रहने पर शरीर त्याग नहीं चाहते थे उनकी इच्छा उत्तरायण समय आने पर शरीर त्याग की थी इसके लिए उन्होंने देवयान को पर लोक प्रयाण का पथ चुना।
इस में भी कुण्डलिनी प्रसंग है दक्षिणायन कुण्डलिनी अग्नि है। और उत्तरायण ब्रह्मरंध्र ऊर्जा देवयान मेरुदण्ड मार्ग है। भीष्म की कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया अधूरी थी वे उसी को पूर्ण करने में शरशैय्या पर पड़े प्रयत्न करते रहे उद्देश्यपूर्ण होने पर उन्होंने शरीर का त्याग किया।
अथर्व 12 38 1 में कहा गया है। है आत्माग्नि तेरे द्वारा मुझे प्रकाश तेज बल प्रतिभा पराक्रम ओजस सभी मेरे भीतर से उभर रहे है। है। अग्नि तेरे तैंतीस विभाग तेरे ऊपर अनुग्रह करें।
यजु 2 8 में कहा गया है। है दिव्य अग्नि तू आयु वर्चस सुसंतति धन मेधा रति पौरुष बनकर हमें अपना अनुग्रह प्रदान कर। आधुनिक मनोविज्ञानियों ने कुण्डलिनी को अचेतन मन की प्रसुप्त शक्ति कहा है।
चीन और जापान के योगाभ्यासी उसे ची की शक्ति का नाम देते रहे। अमेरिका के डॉ. ली सेनेल्या नपे अपनी कुण्डलिनी साइकोसिस एण्ड टान्सेन्डेस पुस्तक में कुण्डलिनी की महत्ता बताते हुए लिखा है।
कि उसके जागरण से मनुष्य की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। व्यक्तित्व निखरता है। और गृहस्थ मस्तिष्क की उन क्षमताओं का विस्तार होता है। जो आमतौर से सोई हुई ही पड़ी रहती है।
वृहज्जाबालोपनिषद का कथन है। यह कालाग्नि कुण्डलिनी जब अधोगामी होती है। मनुष्य को अशक्त बना देती है। पर जब वह ऊपर उठती है तो उच्च सिद्धियों को प्रदान करते हुए ब्रह्मलोक पहुंचाती है।
क्रमशः
31/03/2024, 7:12 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अन्तरयात्रा की भाग ....9
वृहज्जाबालोपनिषद का कथन है। यह कालाग्नि कुण्डलिनी जब अधोगामी होती है। मनुष्य को अशक्त बना देती है। पर जब वह ऊपर उठती है। जो उच्च सिद्धियों को प्रदान करती हुई ब्रह्मलोक तक पहुंचती है।
स्कंद पुराण में एक रोचक कथा आती है। सृष्टि.आरम्भ में ब्रह्माजी ने कठोर दीर्घकालीन तप किया उससे प्रचण्ड अग्नि उत्पन्न हई वह भूमि पर गिरी तो भूमि जलने लगी ऊपर उठी तो आकाश जलने लगा ।
उसमें से तेजस की चिनगारियां उठ उठकर देशों दिशाओं को जलाने लगी। अग्नि ने ब्रह्माजी से कहा में भूख से जली जा रही हूँ मुझे भोजन दीजिए ब्रह्माजी ने एक एक करके अपने शरीर के सारे अंग उसे खिला दिये ।
तो भी उसकी तृप्ति नहीं हुई ओर वह भूखा भूख कह कर चिल्ला कर रुदन करने लगी। ब्रह्माजी को कोई उपाय न सूझा तो उनने कहा तू कामुक व्यक्तियों के शरीर में घुस जा और उनकी समस्त धातुओं का भक्षण करना।
अग्नि ने ऐसा ही किया। उसने असंख्य कामुक नर नारियों को खा लिया किन्तु तृप्ति तब भी न हुई जब प्रजापति ने उसे देवता और ऋषियों के अन्त करण में प्रवेश करने के लिए कहा वहाँ अमृत भरा हुआ पाया ।
अग्नि उसका पान करके तृप्त हो गयी और प्रसन्नतापूर्वक वही रहने लगी इस कथन का तात्पर्य है। कि कुण्डलिनी का काम क्षेत्र में प्रवेश होता है। तो वह जर्जर कर देती है। किन्तु जब उसका प्रयोग दिव्य प्रयोजनों के लिए होता है।
तो वह स्वयं भी प्रसन्न रहती है। ओर आश्रयदाता को भी प्रसन्नतादायक वरदानों से भर देती है। कुण्डलिनी को दावानल कहा गया है। जो जंगलों को जलाकर खाक कर देती है। वह बड़वानल भी है।
जो समुद्र में से ज्वालमाल बनकर उठती और पानी से रहित कर देती है। धरती की मध्यवर्ती अग्नि जब फूटती है। तो भूकम्प आते ओर ज्वालामुखी फूट शक्ति तत्व कुण्डलिनी है।
जो ब्रह्मांडीय चेतन सत्ता के साथ जुड़ा है। और विश्व भंडार में से अपनी इच्छा एवं आवश्यकतानुसार शक्ति का खींचता ओर धारण करता रहता है। मूलाधार में बसी हुई सुप्त सर्पिणी कुण्ड में पड़ी पड़ी विष उगलती रहती है।
इस विष को अमृत बनाया जा सकता है। उसे अमृत रस पान सोम संपर्क हेतु ऊर्ध्वगामी बनाया जाय यही कुण्डलिनी साधना है।
हठयोग के ज्ञाता कहते है कि चमत्कारी शक्ति कुण्डलिनी को पवित्र मन और कामना रहित होकर किसी सुयोग्य योगज्ञाता गुरु के मार्गदर्शन में ही जागृत करना चाहिए।
अन्यथा कुण्डलिनी शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित होकर विषय वासनाओं और कामुक विचारों के आवेग को बढ़ा सकती है। फिर इस शक्ति का क्षरण वासना तृप्ति स्वार्थ साधन के रूप में होने लगता है।
जैन योगाचार्यों ने कुण्डलिनी शक्ति को तेजोलेश्या के रूप में वर्णित किया है। उसकी उपलब्धि के दो साधन बताये हैं। प्रथम है। अनन् और जल की अति सीमित मात्रा ग्रहण करते हुए तपस्या करना तथा दूसरा है।
सूर्य की आतापना लेना अर्थात् सूर्योपासना द्वारा शक्ति संग्रह करना तेजोलेश्या का उद्गम स्रोत सूक्ष्म द्वारा शरीर माना गया है। वही स्थान कुण्डलिनी शक्ति का भी है। तेजोलेश्या को सावित्री साधना का स्वरूप माना जा सकता है।
कुण्डलिनी शक्ति की व्याख्या करते हुए योग विज्ञानियों ने कहा है। कि यह वाइस ऑफ साइलेन्स मौन की भाषा है। लोग लौकिक अग्नि या विद्युत का प्रभाव जानते तथा उपयोग करते है।
यदि वे इस स्प्रिचुअल या मेटाफिजीकल अग्नि का प्रयोग भी जान ले तो आत्मिक क्षेत्र की असंख्यों सिद्धियां हस्तगत कर सकते है। डॉ. स्कॉट ने कहा है। कि यह क्रिस्टल है जिसके सहारे जीवनश् रूपी टाजिस्टर अपनी ध्वनि बजाता है।
शरीर शास्त्री अपने ढंग से उसकी व्याख्या करते है। और उसे स्पाइनल कार्ड तथा मूलाधार को गैग्लियान इम्पार के रूप में निरूपित करते है। उसकी उपमा जेनरेटर डायनेमो बैटरी चुम्बक आदि से की माना सभी ने यह है।
कि यह काम क्षेत्र में दहकता हुआ कुण्ड है और उससे ऊपर उठता हुआ प्रज्वल सचमुच असाधारण शक्ति का केन्द्र है। चैतन्य ने ब्रह्मांडव्यापी चेतन विद्युत भौतिक जगत में काम करने वाली बिजली के उद्गम स्रोतों की व्याख्या करने के साथ ही मानव शरीर में काम करने वाली बिजली की भी विवेचना की है।
ब्रह्मांड में पृथ्वी के चारों ओर विद्युत्चुम्बकीय धाराओं का एक जाल-सा फैला हुआ है। एवं यह धन विद्युत विभव तीन लाख वोल्ट की सामर्थ्य का है। हर जीवधारी पर 5 वोल्ट प्रतिमीटर की औसत से यह दबाव बना हुआ है।
इसी ब्रह्मांडीय विद्युत का व्यष्टिगत अंश कुण्डलिनी शक्ति के रूप में मेरुदण्ड में विराजमान होता है। चैतन्य ने कहा है।
क्रमशः
01/04/2024, 10:21 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की ..भाग 10
चैतन्य ने कहा है कि जीवकोशी नाड़ी तंतुओं तथा विभिन्न अवयवों के काम करने में बड़ी मात्रा में विद्युत शक्ति का निरन्तर व्यय होता रहता है। इसका उद्गम हृदय नहीं मस्तिष्क है। वही जीवन के उद्भव, अन्त का आधार है।
किन्तु यह उद्गम एकाकी नहीं हैं मेरुदण्ड के ऊपरी सिरे पर स्थिति मस्तिष्क ग्रेमैटर एवं सुषुम्ना का निचला हिस्सा दोनों ही इस प्राण विद्युत के उत्पादन में अपने, अपने पक्ष का निर्वाह के करते है।
मस्तिष्कीय ग्रेमैटर में रेटीकूलर एक्टीवेटिंग सिस्टम के रूप में विद्युत्स्फुल्लिंग निरन्तर उभरते रहते है। इस विद्युत का एक बहुत बड़ा भाग उस क्षेत्र का भी होता है। जिसे दक्षिणी ध्रुव या कामकेन्द्र की संज्ञा दी जाती है।
डॉ. हिरोशी मोटोयामा ने अपनी ए एम आई मशीन द्वारा विद्युत का सघन अनुपात इसी केन्द्र बिन्दु पर पाया है। वैज्ञानिकों ने काम केन्द्र पर जो विस्तृत अन्वेषण किया है। उसका कारण यह है।
कुण्डलिनी क्षेत्र जीवन संचार का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। नया प्राणी उत्पन्न करने के साधनों से भरपूर होने के कारण उसकी सत्ता शरीर के अन्य सब अवयवों की तुलना में विशेष रूप से संवेदनशील और क्षमता सम्पन्न है।
सेक्रल प्लेक्ससव व काडइक्वाईना की संरचना मस्तिष्क के समान ही अत्यन्त पेचीदा व फिजियोलॉजी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस तथ्य को भी ली सनेला ने अपनी पुस्तक कुण्डलिनी साइकोसिस आर टान्सेन्डेन्स में ।
डॉ. डी ई वुलरीज ने द मशीनरी ऑफ ब्रेन में एवं डॉ. सी नारन्जो आर आर्नस्टीर ने साइकोलॉजी ऑफ मेडीटेश में भिन्न भिन्न रूपों में अभिव्यक्त किया है। डॉ. केरिगटन ने अपनी आधुनिक मनोविज्ञान और भारतीय दर्शन पुस्तक में लिखा है।
ऐसे अनेक उदाहरण देखे गए है। जिनमें प्राण परमाणुओं वाला शरीर रहने या न रहने पर भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। उसके शरीर से जुड़ा रहने पर भी प्राण घटकों की सत्ता उसी क्षेत्र में बनी रहती है।
इसी शोध से संबंधित एक विलक्षण खोज योगियों के शरीर से ध्यान साधना की चरमावस्था समाधि प्रक्रिया के दौरान बाहर निकलने वाले आयडियोप्लाज्म अथवा साइकोप्लाज्म के रूप में की गया है।
वैज्ञानिक कहते है। कि यह वाष्प अवस्था में शरीर से बाहर निकलता रहता एवं सिर के शीर्षभाग स्तन उंगलियों के पोर होठ तथा चेहरा नाड़ी चक्र एवं जननेंद्रियों के आसपास इसका सघन अनुपात देखा गया है।
रूसी वैज्ञानिकों सेमियन किलियन द्वारा बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी के अध्ययन व चित्रांकन के बाद सूक्ष्मशरीर कुण्डलिनी की प्राण शक्ति के संबंध में इस अनुसंधान कार्य बड़ी ख्याति प्राप्त की है।
मेनुअल स्वीडनबोर्ग ने इसे ईथर के दश्य बादल की संज्ञा दी है। जिसे विशेष फिल्टस का प्रयोग कर हाईवोल्टेज प्रोजेक्शन द्वारा चित्रांकित किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने इसकी बनावट मकड़ीदार जाले व गंध ओजोन होने पर इसकी सघनता घटती बढ़ती है भावनाएं भी इसके प्रभाव को कम अधिक करती है।
इसकी उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण लायल वाटसन ने अपनी पुस्तक सुपरनेचर में दिया है जिसमें किसी व्यक्ति का कोई अंग कट जाने पर भी उसे उस अंग की प्रत्यक्ष अनुभूति दर्द जलन खुजली इस रूप में होती रहती है।
फेन्टम लिम्ब इफेक्ट नाम से जाने जाते इस प्रसंग में यह प्रमाणित है कि सूक्ष्मशरीर की सत्ता एक्टोप्लाज्म के रूप में बनी रहती है। एवं वही सारी संवेदनाएं प्रत्यक्ष ज्ञान के न होने पर भी मनुष्य को अनुभव होती रहती है।
टिवेटन बुक ऑफ डेड चाइनीज बुक ऑफ सोल में प्रत्यक्ष शरीर ओर प्राण शरीर की सत्ता पृथक पृथक मानी गई है। यद्यपि वे दोनों साथ साथ रहते है।
पर कभी कभी प्राण शरीर पृथक होकर अन्यत्र रहने लगता व आवश्यकतानुसार नया प्राण शरीर बना लेता है। इसी प्रकार मनुष्य की कई बार दुहरी उपस्थिति भी देखी गई है।
डॉ. सील एवं जे टैजर ने अपनी पुस्तक द पॉजेटिव साइन्सेज ऑफ एन्सीएण्ट हिन्दूज में लिखा है कि हिन्दू धर्म के साधना विधान और कर्मकाण्ड प्राण शरीर का अधिकतम उपयोग करते हुए सम्पन्न होते है।
इस प्राण शरीर को दिव्य चक्षुओं से देखा जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व थियोसोफीस्ट पत्रिका में एक लेख एनोटॉमी ऑफ तत्राज नाम से विषय छपा था।
क्रमशः
02/04/2024, 4:45 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग ....11
थियोसोफीस्ट वैज्ञानिक सी डब्यू लेडबीटर ने मेरुदण्ड में अवस्थित छह चक्रों का विवेचन अपनी द चका्रज पुस्तक में किया है। कि प्राण शरीर एक विशेष प्रकार की विद्युत से विनिर्मित होता व ऐसा ही कायसत्ता में विराजमान है।
जैसे कि घोंसले में पक्षी बैठा होता है। कितने ही अन्य वैज्ञानिकों ने प्राण को फायर ऑफ लाइफ कहा है। इस अग्नि की जितनी मात्रा शरीर में होती है। वह उतना ही चैतन्य उत्साही साहसी और प्रतिभावान होता है।
इसमें शिथिलता आने पर मोटा ताजा शरीर भी डरपोक आलसी और निराश प्रकृति का पाया जाता है। इस विद्युतशक्ति को प्रयत्नपूर्वक बढ़ाया भी जा सकता है। योगाभ्यासों की रचना इसी दृष्टि से हुई है।
कुण्डलिनी योग तो वस्तुतः प्राण विद्या के ऊपर ही आधारित है।कुण्डलिनी जागरण का सार संक्षेप यह है। कि निखिल ब्रह्मांड में से प्राण चेतना को आकर्षित करके अपने निज के प्राण में ।
उस महत चेतना की बड़ी मात्रा मिलाकर उच्च स्तरीय शक्ति प्राप्त की जाय और इस सामर्थ्य को अभीष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करने योग्य अभ्यास कर लिया जाय।
यह क्षमता संयम से बढ़ती है एवं शक्ति क्षरण करने पर क्रमश घटती है पुस्तक थियोसोफिकल प्रक्टिका में कुण्डलिनी जागरण व षट्चक्रों के प्रसंग में उसे गोपनीय रखने की भी हिदायत दी है।
क्यों कि इस दिशा में आगे बढ़ने से पूर्व हमे अच्छे से समझना होगा कि बहुमूल्य सम्पदाएँ पृथ्वी की गहराई में दबी पड़ी हैं। खनिज, कोयला, लोहा, सोना को प्राप्त करने के लिए भूमि को गहरा खोदना पड़ता है।
इतने श्रम के उपरान्त ये वस्तुएँ प्राप्त हो पाती हैं। मोती सामान्य नदी-नालों नहीं समुद्र की गहराई में पाया जाता है। दुस्साहसी उन्हें करतलगत करने के लिए जीवन की बाजी लगा देते हैं।
उथले पानी का पर्यवेक्षण करने वाले मछुआरे तो मछलियाँ ही प्राप्त कर पाते हैं। समुद्र के किनारे खड़े रहने वालों के हाथ पत्थर और बालू ही आता है। कीमती वस्तुओं की उपलब्धि के लिए।
अभीष्ट मात्रा में पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है और उसी अनुपात में साहस एवं मनोयोग की भी। प्रकृति की व्यवस्था भी कुछ ऐसी है कि बड़ी सम्पदाएँ पुरुषार्थी को ही मिलें।
यही कारण है कि उसने भौतिक सम्पदाओं को पृथ्वी के- समुद्र के धरातल में छिपाकर रखा है। ताकि पुरुषार्थ से हीन, आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति उन्हीं न प्राप्त कर सके।
मनुष्य शरीर को परमात्मा की सर्वोत्तम कृति माना गया है। सर्वोत्तम इन अर्थों में कि इसके विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं। काया के अन्तरंग में शक्ति के स्रोत छिपे पड़े हैं।
उन्हें जगाया एवं उपयोग में लाया जा सके तो मनुष्य असाधारण सामर्थ्य का स्वामी बन सकता है। अन्तःशक्ति स्रोतों को जगाने के लिए भी असामान्य साहस जुटाना पड़ता है।
साधना पुरुषार्थ का परिचय देना होता सामान्यतया शरीर उतनी ही आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाता है जितनी कि जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। खाने-पीने, सोने, श्रम करने सम्पत्ति उत्पादन जैसे प्रयोजन ही पूरे होते हैं।
शरीर सामर्थ्य की इतने में ही इतिश्री समझा ली जाती है। शरीर के अन्तराल में शक्ति के प्रचण्ड स्रोत भी हो सकते हैं इसका अनुमान भी नहीं ,जिन्हें होता भी है वे साधना के लिए इतना पुरुषार्थ साहस एवं धैर्य नहीं जुटा पाते।
फलतः असीम शक्ति के लाभों से वंचित बने रहते हैं। पेट और प्रजनन तक में ही उनका जीवन समाप्त हो जाता है। जबकि साधना के लिए साहस जुटाने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल में प्रविष्ट करते हैं।
इनका काम वैसा ही होता है जैसा कि एक वैज्ञानिक का धूल जैसे परमाणु कणों से परमाणविक ऊर्जा प्राप्त करना। फलतः शरीर के सूक्ष्म परतों में दबी शक्ति को करतलगत करके असीम शक्ति से सम्पन्न बन जाते ।
क्रमशः
03/04/2024, 10:50 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की ...भाग 12
प्रकृति की व्यवस्था भी कुछ ऐसी है कि बड़ी सम्पदाएँ पुरुषार्थी को ही मिलें। यही कारण है कि उसने भौतिक सम्पदाओं को पृथ्वी के- समुद्र के धरातल में छिपाकर रखा है।
ताकि पुरुषार्थ से हीन, आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति उन्हीं न प्राप्त कर सके। मनुष्य शरीर को परमात्मा की सर्वोत्तम कृति माना गया है। सर्वोत्तम इन अर्थों में कि इसके विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं।
काया के अन्तरंग में शक्ति के स्रोत छिपे हैं। उन्हें जगाया एवं उपयोग में लाया जा सके तो मनुष्य असाधारण सामर्थ्य का स्वामी बन सकता है। अन्तःशक्ति स्रोतों को जगाने के लिए भी असामान्य साहस जुटाना पड़ता है।
सामान्यतया शरीर उतनी ही आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाता है जितनी कि जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है। खाने-पीने, सोने, श्रम करने सम्पत्ति उत्पादन जैसे प्रयोजन ही पूरे होते हैं।
शरीर सामर्थ्य की इतने में ही इतिश्री समझा ली जाती है।शरीर के अन्तराल में शक्ति के प्रचण्ड स्रोत भी हो सकते हैं इसका अनुमान भी नहीं जिन्हें होता भी है वे साधना के लिए इतना पुरुषार्थ साहस एवं धैर्य नहीं जुटा पाते।
फलतः असीम शक्ति के लाभों से वंचित बने रहते हैं। पेट और प्रजनन तक में ही उनका जीवन समाप्त हो जाता है। जबकि साधना के लिए साहस जुटाने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल में प्रविष्ट करते हैं।
इनका काम वैसा ही होता है जैसा कि एक वैज्ञानिक का धूल जैसे परमाणु कणों से परमाणविक ऊर्जा प्राप्त करना। फलतः शरीर के सूक्ष्म परतों में दबी शक्ति को करतलगत करके असीम शक्ति से सम्पन्न बन जाते हैं।
योगी इसी स्तर के होते हैं।शरीर में अनेकों मर्म स्थान ऐसे हैं जिनका महत्व वैज्ञानिक दृष्टि से भी असाधारण है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी। विज्ञान को अभी इन केन्द्रों के सम्बन्ध में विशेष जानकारी तो नहीं मिल पायी है।
पर उनका विश्वास है कि शरीर संस्थान के संचालन में उनकी विशेष भूमिका होनी चाहिए। अध्यात्म विज्ञानवेत्ता इन मर्मस्थलों की शक्ति से परिचित रहे हैं। उनके जागरण का उपाय विभिन्न योग ग्रन्थों में दिया गया है।
ऐसे मर्मस्थलों में मेरुदण्ड शरीर का प्रमुख स्थान है। यह शरीर की आधारशिला है। मेरुदण्ड छोटे-छोटे तैंतीस अस्थि खण्डों से मिलकर बना है।ऐसे मर्मस्थलों में मेरुदण्ड शरीर का प्रमुख स्थान है।
यह शरीर की आधारशिला है। मेरुदण्ड छोटे-छोटे तैंतीस अस्थि खण्डों से मिलकर बना है। योगियों को प्रत्येक खण्डों में ऐसी विशेष शक्तियाँ परिलक्षित होती हैं जिनका सम्बन्ध दैवी शक्तियों से है।
देवताओं में जिन शक्तियों का केन्द्र होता है वे शक्तियाँ भिन्न-भिन्न रूप में इन अस्थि खण्डों में पाई जाती हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला गया कि मेरुदण्ड तैंतीस देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है।
आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, इन्द्र और प्रजापति इन तैतीसों की शक्तियाँ उसमें बीज रूप में उपस्थित रहती हैं। पुराणों में देवताओं का निवास स्थान सुमेरु पर्वत बताया गया है वह वस्तुतः मेरुदण्ड ही है।
उसके तैंतीस गुटके, तैंतीस देवता हैं। इस पोले मेरुदण्ड में शरीर विज्ञान के अनुसार अनेकों नाड़ियाँ हैं और वे विविध कार्यों में नियोजित रहती हैं आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार उनमें प्रमुख तीन नाड़ियाँ हैं।
इड़ा पिंगला और सुषुम्ना। इन तीनों को मेरुदण्ड को चीरने पर प्रत्यक्ष आँखों से तो नहीं देखा जा सकता क्योंकि उनका अस्तित्व सूक्ष्म है और सूक्ष्म जगत से सम्बन्धित है। यह एक प्रकार का विद्युत प्रवाह है।
जिस प्रकार बिजली से चलने वाले यन्त्रों में ऋण और धन, निगेटिव और पॉजिटिव धाराएँ दौड़ती हैं और इन दोनों का जहाँ मिलन होता है, वहीं शक्ति पैदा हो जाती है इसी प्रकार इड़ा को निगेटिव और पिंगला को पॉजिटिव कह सकते हैं।
इड़ा को चन्द्र नाड़ी और पिंगला को सूर्य नाड़ी भी कहते हैं। दोनों के मिलने से जो तीसरी शक्ति पैदा होती है उसे सुषुम्ना कहते हैं। प्रयाग में गंगा और यमुना मिलती है। इस मिलन से एक तीसरी सूक्ष्म शक्तिधारा सरस्वती की विनिर्मित होती है।
इन प्रकार दो नदियों के सम्मिलन से त्रिवेणी बन जाती है। मेरुदण्ड के अंतर्गत भी ऐसी अध्यात्मिक त्रिवेणी है। इड़ा पिंगला की दो धाराएँ मिलकर सुषुम्ना की सृष्टि करती हैं। इस प्रकार त्रिवर्ग बन जाता है।
यह त्रिवेणी ऊपर मस्तिष्क के मध्य केन्द्र से ब्रह्मरंध्र से सहस्रार कमल से सम्बन्धित और नीचे मेरुदंड का जहाँ नुकीला अन्त है वहाँ लिंग मूल और गुदा के बीच ‘सीवन’ स्थान के सीध में पहुँचकर रुक जाती है। यही त्रिवेणी का अन्त है। सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक और त्रिवर्ग है।
क्रमशः
04/04/2024, 11:25 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग... 13
सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक और त्रिवर्ग है। इसके अंतर्गत भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित हैं। जिन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्म नाड़ी कहते हैं। ब्रह्म नाड़ी सब नाड़ियों का मर्मस्थल केन्द्र एवं शक्ति स्रोत है।
ब्रह्म नाड़ी ही मस्तिष्क के केन्द्र में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है। इसी कारण उस स्थान को सहस्र दल कमल कहते हैं। सहस्र दल सूक्ष्म लोकों- विश्व व्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है।
यह मस्तिष्क का एरियल है जिसके द्वारा परमात्मा की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक से पकड़ा जाता , मेरुदण्ड के नीचे अन्तिम भाग में सुषुम्ना के भीतर रहने वाली ब्रह्म नाड़ी एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बंध जाती है।
षट्कोण परमाणु को यौगिक ग्रन्थों में अलंकारिक भाषा में कूर्म कहा गया है। उसकी आकृति कछुए जैसी होती है। पृथ्वी कूर्म भगवान पर टिकी है। शेषनाग के फन पर अवलम्बित है।
इस उक्ति का आधार ब्रह्मनाड़ी की वह आकृति है जिसमें वह इस कूर्म में लिपटकर बैठी हुई है और जीवन को धारण किए हुए है। यदि वह अपना आधार त्याग दे तो जीवन भूमि के चूर-चूर हो जाने में थोड़ी भी देरी न लगे।
कूर्म से ब्रह्म नाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलाकार होने के कारण ही उसका नाम कुण्डलिनी पड़ा। यह साढ़े तीन फेरे उस कूर्म में लगाये हुए है और मुँह नीचे की ओर है।
कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति एवं उपयोगिता इतनी अधिक है जितनी कि बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिए परमाणु एक चमत्कार बना हुआ है।
उसके तोड़ने की विधि प्राप्त हो जाने पर प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया है। अभी तो उसकी ऊर्जा के एक अंश का विध्वंसात्मक स्वरूप देखा गया है। रचनात्मक एवं शक्ति का एक बड़ा पक्ष अछूता है।
यह तो जड़ जगत के एक नगण्य से परमाणु की शक्ति की बात हुई जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता तो चैतन्य जगत का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की तुलना में अनन्त गुना शक्तिशाली है।
कितना अद्भुत होगा यह कल्पना की जा सकती विज्ञान की शक्ति एवं उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। योग की उपलब्धियाँ हैं ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ। जिस प्रकार परमाणु की शोध में अनेकों वैज्ञानिक जुटे हैं।
उसी प्रकार पूर्वकाल के आध्यात्मिक विज्ञान वेत्ताओं, तत्वदर्शी ऋषियों ने मानव शरीर के अंतर्गत एक बीज परमाणु की अत्यधिक शोध की थी ओर उसकी असीम शक्ति से लाभ उठाया।
दो परमाणुओं को तोड़ने, मिलाने या स्थानान्तरित करने का सर्वोत्तम स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में होता है क्योंकि अन्य सभी स्थानों के चैतन्य परमाणु गोल और चिकने होते हैं पर कुण्डलिनी में यह मिथुन के रूप में लिपटा हुआ है।
जिस प्रकार युरेनियम एवं प्लूटोनियम धातु के परमाणुओं का गुन्थन ऐसे टेढ़े-तिरछे ढंग से हुआ है कि उनका तोड़ा जाना अन्य पदार्थों के परमाणुओं की अपेक्षा अधिक सरल है ।
उसी प्रकार कुण्डलिनी स्फुल्लिंग परमाणुओं की गतिविधि का इच्छानुकूल संचालन अधिक सुगम है। अत एव पूर्वकाल के ऋषियों ने बड़ी तत्परता से कुण्डलिनी जागरण पर शोध की।
शोध के परीक्षण एवं प्रयोग के उपरांत उन्होंने इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर ली जिसे चमत्कार समझा जाता है।कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों का भण्डार-तिजोरी कहा गया है।
बहुमूल्य रत्नों को तिजोरी में रखकर किसी गुप्त स्थान में रख दिया जाता है। उसमें मजबूत ताले लगा दिये जाते हैं जिससे कोई अनाधिकारी बाहरी व्यक्ति न प्राप्त कर सके।परमात्मा ने भी मनुष्य की अनन्त शक्तियों के भण्डार दिए हैं पर उन पर छह ताले लगा दिए हैं।
इन्हें ही षट्चक्र कहते ,चक्रों के रूप में यह ताले इसलिए लगाये गये हैं कि कोई उन्हें कुपात्र न प्राप्त करले। कुण्डलिनी शक्ति पर लगे छह तालों- छह चक्रों को बेधना- खोलना पड़ता है।
सामान्यतया कुण्डलिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में मूलाधार में नीचे की ओर मुँह किए बैठी रहती है। उसे जगाने के लिए सविता की प्राण शक्ति का आश्रय लेना होता है। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है।
योग में प्राण साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है।
क्रमशः
05/04/2024, 2:31 pm - स्वर विज्ञान added +91 70118 70321
05/04/2024, 2:52 pm - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग....14
जब कुंडलिनी जागनी शुरू होती है तो वह कुछ ऐसे नये द्वारों पर भी चोट करती है जो सामान्य नहीं हैं। इनसे कुछ और चीजों का पता चलना शुरू होता है ;जो कि सामान्य आंखों,कानो ,हाथों से पता नहीं चलता था।
अथार्त तुम्हारी अंतर इंद्रियों पर चोट होनी शुरू हो जाती है। अभी भी तुम्हारी कुंडलिनी की शक्ति ही इन आंखों को और कानों को चला रही है, लेकिन ये बहिर इंद्रिया को बहुत छोटी सी मात्रा से कुंडलिनी इनको चला लेती है।
अगर तुम उस मात्रा में थोड़ी सी भी बढ़ती कर दो, तो तुम्हारे पास अतिरिक्त शक्ति होगी जो नये द्वारों पर चोट कर सके। उदाहरण के लिए हम पानी गिरा दे, पानी कुछ लकीर बना बहता हुआ चला जाएगा।
अब वही कुछ मात्रा में ओर पानी गिराए तो वो वही लकीरो से बहने लगता। लेकिन पानी की मात्रा एकदम से बढ़ जाए तो तत्काल नई धाराएं शुरू हो जाएंगी; क्योंकि उतने पानी को पुरानी धारा न ले जा सकेगी।
तो कुंडलिनी को जगाने का गहरा शारीरिक अर्थ यह है कि तुम्हारे पास इतनी ऊर्जा हो कि तुम्हारे पुराने द्वार उसको बहाने में समर्थ न रह जाएं। तब अनिवार्यरूपेण उस ऊर्जा को नये द्वारों पर चोट करनी पड़ेगी ।
और तुम्हारी नई इंद्रियां आनी शुरू हो जाएंगी। उन इंद्रियों में बहुत तरह की इंद्रियां हैं टेलीपैथी होगी, क्लेअरवायन्स होगा। तुम्हें कुछ चीजें दिखाई पड़ने लगेंगी, कुछ सुनाई पड़ने लगेंगी, जो कि कान की या आँख की नहीं हैं।
तुम्हारे भीतर नई इंद्रियां सक्रिय हो जाएंगी। और इन्हीं इंद्रियों की सक्रियता का गहरे से गहरा फल होगा। किन्तु यह एक पक्ष है । इसमे यह ध्यान रखना होता कि ऊर्जा
नई इन्द्रियो तक जिस मार्ग से जाती वो निर्मल हो।
अर्थात हर प्रकार से पहले नाड़ी शोधन किया जाए किसी प्रकार की मार्ग में रुकावट नही हो वरना वही ऊर्जा हानि पहुंचा सकती। अगर निर्मलता पा चुके तो तुम्हारे शरीर के भीतर जो अदृश्य लोक है ।
जो सूक्ष्मतम अदृश्य छोर है,जिसको आत्मा कहते रहे हैं.. उसकी प्रतीति होनी शुरू हो जाएगी।तो कुंडलिनी के जागने से ही तुम्हारे भीतर यह संभावनाएं बढ़ेगी। शरीर से काम शुरू होगा।
यह कुंडलिनी को जगाने का साधारणत: प्रयोग हुआ है।
पर फिर भी कुंडलिनी पूरा कुंड नहीं है। एक दूसरा प्रयोग भी है परन्तु पृथ्वी पर बहुत थोड़े से लोगों ने ही उस पर काम किया है।
वह कुंडलिनी जगाने का नहीं है, बल्कि कुंड में डूब जाने का है। समग्र चेतना को अपने उस कुंड में डुबा देना है। तब कोई नई इंद्रिय नहीं जागेगी; न ही कोई अतींद्रिय अनुभव नहीं होंगे।
और आत्मा का अनुभव एकदम खो जाएगा, परन्तु सीधा परमात्मा का अनुभव होगा। कुंडलिनी की शक्ति जगाकर जो अनुभव होंगे, वह तुम्हें पहले आत्मा का अनुभव होगा; और उसके साथ एक प्रतीति होगी ।
जिन लोगों ने कुंडलिनी की शक्ति जगाकर अनुभव किए हैं, वे अनेक आत्मवादी हैं; वे कहेंगे कि अनेक आत्माएं हैं, हर एक के भीतर अलग आत्मा है।लेकिन जिन लोगों ने कुंड में डुबकी लगाई है।
वे कहेंगे आत्मा है ही नहीं, परमात्मा ही है; अनेक नहीं हैं, एक ही है। क्योंकि उस कुंड में डुबकी लगते से ही तुम अपने ही कुंड में डुबकी नहीं लगाते । तुम, सबका जो सम्मिलित कुंड है, उसमें तत्काल प्रवेश कर जाते हो ।
मेरा कुंड और उनका कुंड अलग-अलग नहीं हैं। इसीलिए तो कुंड अनंत शक्तिवान है। तुम उसमें से कितना ही उठाओ, तो भी कुछ नहीं उठता। तुम उसमें से कितनी बाल्टी पानी अपने घर के काम के लिए भर लाए हो ।
उससे वहां कुछ फर्क नहीं पड़ता। हम सागर से कुछ ले आए हैं। लेकिन एक व्यक्ति सागर में डूब गया! तब वह कहता है कि पानी की बाल्टी की कोई बात नहीं है, और किसी का पानी अलग नहीं है।
सागर एक है, वह जिसे तुम घर ले गए हो, वह भी इसी का हिस्सा है। और कुछ दूर नहीं हो गया है, वह लौट आएगा। अभी धूप पड़ेगी और भाप बनेगी और बादल बनेंगे, वह सब लौट आएगा।
वह कहीं दूर नहीं गया है, वह दूर जा नहीं सकता, वह सब यहीं लौट आएगा। तो जिन लोगों ने कुंडलिनी को जगाने के प्रयोग किए, उन लोगों को अतींद्रिय अनुभव हुए। जो कि मनस की बड़ी अदभुत अनुभूतियां हैं।
उन्हें आत्मअनुभव हुआ।कि परमात्मा का सिर्फ एक अंश है; जहां से तुम परमात्मा को पकड़ रहे हो।आत्मा जो है.. वह परमात्मा को एक कोने से छूना है।और उसे छूने के लिए एक छोटी सी शक्ति भी जग जाए तो तुम छू लोगे।
कई बार ऐसा होता है कि लंबा रास्ता आसान रास्ता होता है, और निकटतम रास्ता कठिन रास्ता होता है।अब जैसे, किसी को अपनी ही शक्ल देखनी हो, तो भी एक आईना रखना पड़े।
अब यह फिजूल की लंबी यात्रा है कि आईने में शक्ल जाएगी और आईने से वापस लौटेगी, तब देख पाऊंगा। यह इतनी यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन अपनी शक्ल को सीधा देखना, निकटतम तो है, लेकिन कठिनतम भी है।
शक्ति ऊपर शिव से मिले लम्बी है यात्रा अगर शिव नीचे कुंड में छलांग लगा दे तो छोटी है यात्रा। तो यह कुंडलिनी शक्ति को उठाकर थोड़ी लंबी यात्रा तो होती है, क्योंकि अंतरइंद्रियों का सारा का सारा जगत खुलता है ।
और फिर वहां से छलांग तो लेनी ही है, लेकिन बड़ी सरल हो जाती है। क्योंकि जिसको आत्मअनुभव हुआ, जिसने अपने को जाना और आनंद पाया, वह आनंद उसे पुकारने लगता है।
कि अब अपने को भी खो दो तो और परम आनंद पा लोगे। अपने को जानने का ,पाने का एक आनंद है, और अपने को खोने का एक परम आनंद है। क्योंकि जब तुम अपने को जान लोगे ।
तब तुम्हें सिर्फ एक ही पीड़ा रह जाएगी कि मैं हूं ,यह मेरा होना भी क्यों है यह मेरा होना भी व्यर्थ, अनावश्यक है। इसलिए इससे भी तुम छलांग लगाओगे ही। क्योकि विराट के आगे यह नश्वर है।
एक दिन तुम कहोगे कि अब मैंने होना जान लिया, अब मैं न होना भी जानना चाहता हूं। मैंने जान लिया प्रकाश, अब मैं अंधकार भी जानना चाहता हूं।और प्रकाश कितना ही बड़ा हो, उसकी सीमा है; और अंधकार असीम है।
और बीइंग कितना ही महत्वपूर्ण हो, फिर भी सीमा है। अस्तित्व की सीमा होगी, अनस्तित्व की कोई सीमा नहीं।
क्रमशः
06/04/2024, 11:31 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ...15
आत्मा की उपलब्धि एक चरण है आत्मा को खोने की तैयारी का। लेकिन जो अभी वासना ही नहीं खो सका, उससे अगर सीधा कहो कि कुंड में डूब जाओ,अपने को ही खो दो, तो असंभव है।
क्योंकि वह कहेगा, अभी मुझे बहुत काम हैं। वास्तव में ,हम अपने को खोने से इसलिए डरते हैं कि काम तो बहुत करने को हैं, मैं खो दूंगा तो फिर ये काम कौन करेगा?
एक मकान बनाया, वह अधूरा है। तो उसे मैं पूरा बना लूं फिर तैयार हो जाऊंगा। लेकिन तब तक दूसरे काम अधूरे रह जाएंगे। वास्तव में काम की वासना...कुछ पूरा करना है, उसकी वजह से ही तो मैं अपने को चला रहा हूं।
तो जब तक वासना है तब तक अगर कोई कहे कि आत्मा को खो दो, तो तब तक बिलकुल संभव नहीं है।यह निकट का तो है, लेकिन संभव नहीं क्योंकि वह व्यक्ति जिसकी अभी वासना नहीं खोई, वह आत्मा को कैसे खोएगा?
हां, वासना खो जाए तो फिर एक दिन वह आत्मा को खोने को राजी हो सकता है, क्योंकि अब आत्मा का भी करना क्या है! जिसने अभी दुख नहीं खोया, उससे कहो कि आनंद को खो दो तो वह कहेगा,आप पागल हैं।
लेकिन जिस दिन दुख खो जाए, आनंद ही रह जाए, फिर आनंद का भी क्या करोगे? फिर आनंद को भी खोने के लिए तुम तैयार हो जाओगे। और जिस दिन कोई आनंद को भी खोने को तैयार है, उसी दिन कोई घटना घटती है।
दुख खोने को तो कोई भी तैयार हो जाता है, लेकिन एक घड़ी आती है जब हम आनंद को भी खोने को तैयार हो जाते हैं। तब उससे परम अस्तित्व में लीनता उपलब्ध होती है।
यह सीधा भी हो सकता हैअथार्त सीधा कुंड में जाया जा सकता है। लेकिन राजी होना मुश्किल होता है।धीरे धीरे राजी होना आसान हो जाता है। वासना खोती है, वृत्तियां खोती हैं, क्रिया खोती है, वह सब खो जाता है ।
जिनके सहारे तुम हो; फिर आखिर में तुम्हीं बचते हो जिसमें न नींव बची, न सहारे बचे। अब तुम कहते हो, इसको भी क्या बचाना! अब इसको भी जाने दे सकते हैं। तब तुम कुंड में डूब जाते हो।
अगर सीधा कोई डूबना चाहे तो कुंडलिनी मार्ग में नहीं आती। इसलिए कुछ मार्गों ने जिन्होंने सीधे ही डूबने की बात की,उसकी बात नहीं की; क्योकि उसकी कोई जरूरत नहीं थी।
लेकिन वह कभी एकाध लोगों के लिए संभव हो सकता है। इसलिए लंबे रास्ते ही जाना पड़ेगा। बहुत बार अपने घर पहुंचने के लिए भी दूसरों के घर के द्वार खटखटाने ही पड़ते हैं।
और अपनी ही शक्ल पहचानने के लिए भी न मालूम कितनी शक्लों को पहचानना पड़ता है। और खुद को प्रेम करने के लिए भी न मालूम कितने लोगों को प्रेम करना पड़ता है।
सीधा तो यही था कि अपने को प्रेम कर लेते। उचित तो यही था कि अपने घर में सीधे आ जाते। लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में, जब तक हम दूसरों के घरों में न भटक लें, तब तक अपने घर को पहचानना ही मुश्किल होता है।
और जब तक हम दूसरों से प्रेम न मांग लें और दूसरों को प्रेम न कर लें, तब तक यह पता ही नहीं चलता असली सवाल अपने को प्रेम करने का है। तभी तो यह कुंडलिनी शरीर की तैयारी है...अशरीर में आत्मा में प्रवेश की।
और तुम्हारी जितनी ऊर्जा अभी जगी है उससे तुम आत्मा में प्रवेश न कर सकोगे। क्योंकि तुम्हारी वह ऊर्जा तुम्हारे रोजमर्रा के काम में पूरी चुक जाती है। बल्कि करीबकरीब उसमें भी पूरी नहीं पड़ती, उसमें भी हम थक जाते हैं।
इतने से इसको नहीं ले जाया जा सकता। और इसीलिए संन्यास की वृत्ति पैदा हुई, ताकि रोजमर्रा का काम बंद कर दिया जाए। क्योंकि हमारे पास शक्ति तो इतनी सी ही है...अब इसको किसी और यात्रा पर लगाना है।
तो फिर काम बंद कर दो। लेकिन अगर वह किसी तरह बचा भी ले, तो बचाने में भी यह उतनी ही व्यय हो जाएगी। क्योंकि बचाने में भी बड़ी ताकत लग जाती है।
बहुत बार तो क्रोध करने में उतनी ताकत व्यय नहीं होती जितना क्रोध रोकने में व्यय हो जाती है। बहुत बार लड़ने में उतनी व्यय नहीं होती जितना लड़ने से बचने में व्यय हो जाती है।
तो यह कहना कि हम उधर से बचा लेते हैं, इधर से बचा लेते हैं। परन्तु कंजूसी के रास्ते से नहीं चलेगा। और जगा लो ..ऊर्जा तो अनंत है; बचाते क्यों हो।
07/04/2024, 10:38 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग...16
तुम्हारे पास इतनी ऊर्जा है कि तुम खर्च कर नहीं सकते , तो तुम उसे बचाने की फिक्र क्यों करते हो! उसे बचाने का सवाल नहीं है; और ऊर्जा है, उसे जगाने का सवाल है कोई डर रहा है।
कि अगर मैंने कार्य किया तो मेरी ऊर्जा खर्च होगी। तो परमात्मा तक कैसे पहुँचूँगा । क्योंकि उसके पास इतनी छोटी सी तो ऊर्जा है कि इसी में चुक जाएगी। तो वह कह रहा है, इससे बचा लें। अगर इसको बचा भी लिया।
तो इस बचाने में उसको लड़ना पड़ेगा; लड़ने में व्यय होगी। और इतनी छोटी सी ऊर्जा से, जिससे वह सांसारिक कार्य पूर्ण नही कर पाता तो उस ऊर्जा से परमात्मा तक कैसे पहुंच पाएगा ?
यानी उतना छोटा सा जो ब्रिज तुमने बनाया था, वह भी तो पूरा नहीं पहुंचता था। उसमें भी बीच में ही सीढ़ियां चुक जाती थीं। उतनी सी ऊर्जा बचाकर तुम अनंत तक सेतु बनाने की सोचने बैठे हो, तो पागलपन में पड़ गए हो।
एक बार वह अनंत ऊर्जा आनी शुरू हो जाए, तो वह जितनी जगती है, उतनी ही और जगने की संभावना प्रकट होने लगती है। उसका झरना फूटना शुरू हो जाए तो अनंत है।
जगने की अनंत संभावना है, कितना भी तुम जगा सकते हो। और जितना तुम जगाते हो, उतना और जगाने के लिए तुम शक्तिशाली होते चले जाते हो। और जब तुम्हारे पास अतिरिक्त ऊर्जा होता है।
तभी तुम उन रास्तों पर खर्च कर सकते हो जो अनजान हैं। एक व्यक्ति के पास अतिरिक्त धन है,तो वह सोचता है कि चांद की यात्रा कर आएं।हालांकि चांद पर कुछ मिलने को नहीं है;लेकिन हर्ज भी कुछ नहीं है।
क्योंकि उसके पास अतिरिक्त है, वह खो सकता है।जब तक तुम्हारे पास अतिरिक्त नहीं है,बल्कि उतना ही है जितनी तुम्हें जरूरत है या उससे भी कम है ;तब तक तुम इंच- इंच जांच -पड़ताल करके खर्च करोगे।
तुम ज्ञात की दुनिया से कभी बाहर न हटोगे अज्ञात में जाने के लिए तुम्हारे पास अतिरिक्त चाहिए। और कुंडलिनी की शक्ति तुम्हें अतिरिक्त से भर देती है। तुम्हारे पास इतनी शक्ति होती है।
कि तुम्हारे सामने सवाल होता है कि इसको कहां खर्च करें? और ध्यान रहे, जिनके पास अतिरिक्त शक्ति होती है, अचानक वे पाते हैं कि उनके जो पुराने द्वार थे, वे एकदम बंद हो गए।
क्योंकि उस अतिरिक्त शक्ति को बहाने में वे समर्थ नहीं होते। जैसे एक छोटी नदी हो और उसमें पूरा सागर आ गया है। वह नदी फौरन मिट जाएगी । उसका कहीं पता ही नहीं चलेगा कि वह कहां गई।
जिस दिन अतिरिक्त ऊर्जा आएगी, तुम्हारा क्रोध आदि के मार्ग अचानक खो जाएंगे। तुम अचानक पाओगे कि कुछ और ही हो गया! वह सब कहां गया जो कल छोटा -छोटा बचाकर कंजूस की तरह चल रहा था।
और क्रोध दबा रहा था, और यह कर रहा था, और वह कर रहा था; वह सब अब कहां है? क्योंकि वे नदियां न रहीं, वे नहरें न रहीं; अब तो यह पूरा सागर आ गया अब इसको खर्च करने का तुम्हारे पास जब उपाय नहीं है।
तब अनायास तुम पाते हो कि इसकी दूसरी यात्रा शुरू हो गई। यात्रा तो होगी ही, वह तो रुक नहीं सकती। ऊर्जा बहेगी ही, वह रुक नहीं सकती । तो एक बार जगा लेने की बात है।
और तब अनजान ,अपरिचित द्वार, जो बंद पड़े हैं, उनमें पहली दफे दरारें पड़ती हैं और उनसे ऊर्जा धक्के देकर बहने लगती है। तो वहां तुम्हें अतींद्रिय अनुभव शुरू हो जाते हैं।
और जैसे ही अतींद्रिय द्वार खुलते हैं वैसे ही तुम्हें अपने शरीर का अशरीरी छोर, जिसको आत्मा कहें, उसकी तुम्हें प्रतीति शुरू हो जाती है। कुंडलिनी साधना में कुंडलिनी के आरोहण की बात आती है।
वास्तव में,कुंड में डूबने में तो ये दोनों बातें ही नहीं हैं। वह उतरना ,चढ़ना नहीं है, मिट जाना है, बूंद जब सागर में गिरती है, न तो उतरती है,और न ही चढ़ती हैं। हां, बूंद जब सूरज की किरणों में सूखती है।
तब आकाश की तरफ चढ़ती है । और जब बादल में ठंडक पाती है तो जमीन की तरफ गिरती है अथार्त उतरती है। लेकिन जब सागर में जाती है तो फिर उतरना ,चढ़ना नहीं है ,डूबना है, मिटना है, मरना है।
तो यह जो अवरोहण , अवतरण की बात है, यह बहुत दूसरे अर्थों में है। यह इस अर्थ में है कि कुंड से जिस शक्ति को हम उठाते हैं, इसे बहुत बार वापस कुंड में भी भेज देना पड़ता है।
कई कारण हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारण तो यह होता है कि हम शक्ति सहने में समर्थ नही होते । शक्ति के लिए तैयार नहीं होते, शक्ति जग जाती है। उसे वापस लौटाना पड़ता है, अन्यथा खतरे हो सकते हैं।
हमारे झेलने की भी क्षमताएं हैं ...सुख झेलने की भी क्षमता है, दुख झेलने की भी क्षमता है, शक्ति झेलने की भी क्षमता है। अगर हमारी क्षमता से बहुत बड़ा आघात हमारे ऊपर हो जाए।
हमारा जो संस्थान है व्यक्तित्व का वह टूट सकता है। वह हितकर नहीं होगा। ऐसे प्रयोग हैं जो तुम्हारे भीतर आकस्मिक रूप से, जिनको सडन एनलाइटेनमेंट के प्रयोग कहते हैं।
जो तात्कालिक, इंस्टैंट शक्ति को जगा सकते हैं। शक्ति की कमी नही है ,कमी है उसे सहने की पात्रता की। उदहारण के लिए आग बुझाने की मशीन से पानी 20वी मंजिल तक फेंका जा सकता।
किन्तु यह तभी सम्भव जब पाइप में क्षमता हो क्योकि ऊर्जा का आघात पाइप की साइड में भी पड़ता उसके कमजोर होने से पानी ऊपर नही जाता पाइप फट जाता।
बिना क्षमता के ऐसे प्रयोग में सदा खतरा है ।
क्योंकि शक्ति इतनी आ जाए जिसके लिए तुम तैयार न थे। प्रथम कार्य पात्रता को बढ़ाने का होना चाइये क्योकि
वोल्टेज इतना हो सकता है कि तुम्हारा बल्व बुझ जाए, फ्यूज उड़ जाए, तुम्हारा पंखा जल जाए, तुम्हारी मोटर में आग लग जाए।
क्रमशः
08/04/2024, 5:21 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ...17
यदि एक बड़ा बांध अचानक टूट जाए तो उसके पानी से बड़ा भारी नुकसान हो जाएगा। लेकिन उससे नहरें निकालकर उसी पानी को सुविधानुसार नियंत्रित रूप से प्रवाहित किया जा सकता है।
भारत में ऐसा कभी नहीं हो सकता कि पूरे भारत की बिजली चली जाए क्योंकि एक- एक शहर/गांव का अलग -अलग इंतजाम है। लेकिन अमेरिका में हो सकता है, क्योंकि वह सब पूरा का पूरा इंटरकनेक्टेड है।
पूरे वक्त धाराएं एक शहर से दूसरे शहर शिफ्ट होती रहेंगी और कभी भी खतरा हो सकता है। मनुष्य के भीतर भी ठीक विद्युतधारा की तरह इंतजाम हैं।और ये विद्युतधाराएं जो हैं।
ये अगर तुम्हारी क्षमता से ज्यादा तुम्हारी तरफ प्रवाहित हो जाएं... और ऐसी विधियां हैं जिनसे प्रवाहित हो सकती हैं। यानी तुम बैठे हुए हो, और सामने पचास लोग बैठे हुए हैं।
तो ऐसे मेथड्स हैं कि तुम चाहो तो इन पचास लोगों की सारी विद्युतधारा तुम्हारी तरफ प्रवाहित हो जाए। ये सब पचास लोग यहां बिलकुल ही फेंट हालत में हो जाएं और तुम एकदम ऊर्जा के केंद्र बन जाओ।
लेकिन उसमें खतरे भी हैं क्योंकि वह इतनी ज्यादा भी हो सकती है कि तुम उसे न झेल पाओ। और इससे उलटा भी हो सकता है कि जिस मार्ग से विद्युतधारा तुम तक आई, उसी मार्ग से तुम्हारी भी सारी विद्युत को लेकर दूसरी तरफ बह जाए।
इन सबके प्रयोग हुए हैं। अगर कभी कोई अतिरिक्त मात्रा में तुम्हारी ही शक्ति ऊपर चली जाए, तो उसे वापस लौटाने की विधियां हैं। लेकिन एक विधि का प्रयोग तुम्हारे भीतर पहले पात्रता पैदा करता है, शक्ति को नहीं जगाता।
तुम्हारे भीतर जितनी पात्रता बनती जाएगी उतनी ही तुम्हारे भीतर शक्ति जगती जाएगी। पहले जगह बनेगी, फिर शक्ति आएगी। और इसलिए कभी तुम्हारे पास ऐसा नहीं होगा कि तुम्हें कुछ भी वापस लौटाना पड़े।
लेकिन एक दिन तुम खुद ही सब जानकर कुंड में छलांग लगा जाओगे , वह दूसरी बात है। दो तरह से हम परमात्म शक्ति को सोच सकते हैं,या तो अपने से ऊपर, या अपने से ऊपर कहीं आकाश में ,किसी भी ऊपर के भाव में।
अथवा अपने से गहरे, पाताल के भाव में। और जहां तक जगत की व्यवस्था का संबंध है, ऊपर और नीचे शब्द का कोई अर्थ नहीं है; ये सिर्फ हमारे सोचने की धारणाएं हैं कि हम कैसा सोचते हैं।
शीर्षासन करते हुए हम सब उलटे मालूम पड़ेंगे, और यह छत हमारे सिर के नीचे मालूम पड़ेगी। हम कहां से देखते हैं, इस पर सब निर्भर करता है। उदाहरण के लिए पूरब चलते जाओ, चलते जाओ, तो पश्चिम पहुंच जाओगे।
और पश्चिम चलते जाओ, चलते जाओ, तो पूरब पहुंच जाओगे। जिस पश्चिम में चलते -चलते पूरब पहुंच जाते हैं उसको पश्चिम कहने का कोई मतलब नहीं है; रिलेटिव है। यह हमारी कामचलाऊ सीमा रेखा है ।
कि यह रहा पूरब, यह रहा पश्चिम.. जिनसे हमें सुविधा बनती है। ठीक ऐसे ही, ऊपर ,नीचे दूसरे डायमेंशन में वर्टिकल कामचलाऊ बातें हैं। पूरब ,पश्चिम हॉरिजेंटल कामचलाऊ बातें हैं ।
न कुछ ऊपर है, न कुछ नीचे है; क्योंकि इस जगत की कोई छत नहीं है और कोई बाटम नहीं है। इसलिए ऊपर -नीचे की सब बातें बेमानी हैं। हमारी ये काम चलाऊ धारणाएं हमारे धर्म की धारणाओं में भी घुस जाती हैं।
तो कुछ लोग ईश्वर को अब ऊपर अनुभव करते हैं । तो जब शक्ति उतरेगी तो डिसेंड करेगी, हम तक आएगी। कुछ लोग ईश्वर को अनुभव करते हैं नीचे, रूट्स में। तो जब शक्ति आएगी तो चढेगी, उठेगी, हम तक आएगी।
लेकिन कोई मतलब नहीं है कि हम ईश्वर को कहां रखते हैं। लेकिन इस बात में भी अगर चुनाव करना हो, तो बजाय उतरने के, शक्ति का तुम्हारे भीतर से उठना ही ज्यादा सहयोगी होगा।
क्योंकि जब शक्ति के उठने की धारणा तुम पकड़ोगे, तो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा। और जब उतरने की बात है तो प्रार्थना रह जाएगी, और तुम कुछ भी न कर सकोगे। जब ऊपर से नीचे आना है ।
हम हाथ जोडकर सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं।इसलिए दुनिया में दो तरह के धर्म बने ध्यान करने वाले और प्रार्थना करने वाले। प्रार्थना करने वाले वे धर्म हैं जिन्होंने ईश्वर को कहीं ऊपर अनुभव किया ।
अब हम कर भी क्या सकते हैं ..उसको ला तो सकते नहीं! क्योंकि अगर लाएं तो उतने ऊपर हमको जाना पड़ेगा और उतने ऊपर हम जाएंगे कैसे? उतने ऊपर जाएंगे तो हम परमात्मा ही हो जाएंगे ।
वहां हम जा नहीं सकते, जहां हम खड़े हैं वहीं पर ही रहेंगे। हम चिल्लाकर प्रार्थना कर सकते हैं लेकिन जिन धर्मों ने और जिन धारणाओं ने इस तरह सोचा कि नीचे से उठाना है , कहीं हमारी ही जड़ों में सोया हुआ है ।
और हम ही कुछ करेंगे तो वह उठेगा, तो वे प्रार्थना के धर्म न बनकर फिर ध्यान के धर्म बने। तो ध्यान और प्राथना में इस ऊपर -नीचे की धारणा का फर्क है। प्रार्थना करने वाला धर्म ईश्वर को ऊपर मानता है।
ध्यान करनेवाला धर्म ईश्वर को जड़ों में मानता है, और वहां से उसको उठा लेता है। सनातन धर्म यानी हम कण, कण, में परमात्मा को मानते। कहि ऊपर नही मानते वो हमारे पास ही बल्कि हमारे भीतर ही है।
क्रमशः
09/04/2024, 5:06 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग...18
प्रार्थना करनेवाला धर्म ईश्वर को ऊपर मानता है, ध्यान करनेवाला धर्म ईश्वर को जड़ों में मानता है, और वहां से उसको उठा लेता है। और ध्यान रहे, प्रार्थना करने वाले धर्म धीरे -धीरे हारते जा रहे हैं ।
और ध्यान करने वाले धर्म की संभावना रोज प्रगाढ़ होती जा रही है। हमें पश्चिम जाना हो तो हम पश्चिम की तरफ चलना शुरू करते हैं। हालांकि पूरब की तरफ चलें तो चलते -चलते पश्चिम पहुंच जाएंगे।
लेकिन वह नाहक लंबा रास्ता हो जाएगा। तो साधक के लिए और भक्त के लिए फर्क पड़ेगा। भक्त ऊपर मानेगा, इसलिए हाथ जोड़कर प्रतीक्षा करेगा, साधक नीचे मानेगा, इसलिए कमर कसकर जगाने की कोशिश करेगा।
जब हम परमात्मा को नीचे मानते हैं, तो जिनको हम निम्न वृत्तियां कहते हैं,उनमें भी वह मौजूद रहता इसलिए हमारे चित्त में कुछ निम्न नहीं रह जाता। क्योंकि जब परमात्मा ही नीचे है।
जिसको हम निम्नतम कहते हैं, वहां भी वह मौजूद और वहां से भी जगेगा; यानी ऐसी कोई जगह ही नहीं हो सकती जहां वह न हो। लेकिन जैसे ही हम उसे ऊपर मानते हैं, तो निंदा शुरू हो जाता है।
कि जो नीचे है वह कंडेम्ड हो जाता है वहां परमात्मा नहीं है। और अनजाने ही स्वयं की भी हीनता शुरू हो जाती है कि हम नीचे हैं और वह ऊपर है। तो उसके मनोवैज्ञानिक रूप से घातक परिणाम हैं।
और फिर जितनी शक्ति से खड़े होना हो, उतना उचित है कि शक्ति नीचे से आए। क्योंकि तुम्हारी जड़ों तक जायेगी और तुम्हारे पैरों को मजबूत करेगी। शक्ति ऊपर से आए तो तुम्हारे सिर को स्पर्श करेगी।
और जब ऊपर से आएगी तो तुम्हें हमेशा विदेशी मालूम पड़ेगी। इसलिए जिन लोगों ने प्रार्थना की, वे कभी नहीं मान पाते कि भगवान और हम एक हैं। मुसलमानों का निरंतर सख्त विरोध रहा कि कोई कहे कि मैं भगवान हूं।
क्योंकि यह सबसे बड़ा एक कुफ्र ही है उनकी नजर में कहां वह ऊपर और कहां हम नीचे! क्योंकि कहां वह ऊपर और कहां तुम नीचे जमीन पर सरकते कीड़े -मकोड़े!और कहां वह परम।
तुम उसके साथ अपनी आइडेंटिटी नहीं जोड़ सकते।जब हम उसे ऊपर मानेंगे और अपने को नीचे मानेंगे, तो हम तत्काल दो हो जाएंगे। इसलिए इस्लाम को सूफी कभी पसंद नहीं पड़ सके।
क्योंकि सूफी इस बात का दावा कर रहे हैं कि हम और वह एक हैं। लेकिन हम और वह एक तभी हो सकते हैं जब वह जमीन से ही आता हो, आकाश से नहीं, तभी हम और वह एक हो सकते हैं।
जैसे ही हम परमात्मा को ऊपर रखेंगे, पृथ्वी का जीवन निंदित हो जाएगा, पाप हो जाएगा; और जन्म लेना पाप का फल हो जाएगा। और जैसे ही हम उसे नीचे रखेंगे, वैसे ही पृथ्वी का जीवन एक आनंद हो जाएगा।
वह पाप का फल नहीं, वह परमात्मा की अनुकंपा हो जाएगा। प्रत्येक चीज, चाहे वह कितनी ही अंधेरी हो, उसमें भी उसकी प्रकाश की किरण अनुभव होगी। और कैसा ही बुरा से बुरा आदमी हो।
कितना ही शैतान हो, फिर भी उसके अंतरतम कोर पर वह मौजूद रहेगा। इसलिए हम उसे नीचे से ऊपर की तरफ उठना मानें। जो जानता है उसके लिए धारणाओं में कोई फर्क नहीं है।
वह कहेगा, ऊपर ,नीचे दोनों बेकार की बातें हैं। लेकिन जब हम नहीं जानते हैं और यात्रा करनी है, तो उचित होगा कि हम वही मानें जिससे यात्रा आसान हो इसलिए साधक के लिए उचित यही है ।
कि वह समझे कि नीचे से शक्ति उठेगी और ऊपर की तरफ जाएगी; ऊपर की तरफ यात्रा है। इसलिए जिन्होंने ऊपर की तरफ की यात्रा को स्वीकार किया उन्होंने अग्नि को प्रतीक माना, वह निरंतर ऊपर की तरफ जा रही है।
दीया है, आग है, वे निरंतर ऊपर की तरफ जा रहे हैं, तो उन्होंने इसको परमात्मा का प्रतीक माना । इसलिए अग्नि बहुत गहनतम मन में हमारे परमात्मा का प्रतीक बन गई। उसका कुल कारण इतना था कि कुछ भी करो, वह ऊपर की तरफ ही जाती है।
और जितना ऊपर बढ़ती है, उतनी ही थोड़ी देर में खो जाती है, थोड़ी दूर तक दिखाई पड़ती है, फिर अदृश्य हो जाती है। ऐसा ही साधक भी ऊपर की तरफ जाएगा, थोड़ी देर तक दिखाई पड़ेगा और अदृश्य हो जाएगा।
क्रमशः
10/04/2024, 11:38 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ..19
अग्नि बहुत गहनतम मन में हमारे परमात्मा का प्रतीक बन गई। उसका कुल कारण इतना था कि कुछ भी करो, वह ऊपर की तरफ ही जाती है। और जितना ऊपर बढ़ती है, उतनी ही थोड़ी देर में खो जाती है।
थोड़ी दूर तक दिखाई पड़ती है, फिर अदृश्य हो जाती है।
ऐसा ही साधक भी ऊपर की तरफ जाएगा, थोड़ी देर तक दिखाई पड़ेगा और अदृश्य हो जाएगा। तीव्र श्वास प्रश्वास ,हू की ध्वनि और 'मैं कौन हूं' ।
पूछने के प्रयत्न से अपने को पूरी तरह से थका डालना है ताकि गहरे ध्यान में प्रवेश संभव हो सके। हू की ध्वनि नाभि के ठीक नीचे जीवनस्रोत पर सीधे चोट करती है। क्योंकि तुम अपने जीवन से, अपनी मां से नाभि द्वारा ही जुड़े थे।
नाभि के ठीक नीचे तुम्हारा अपना जीवनस्रोत है।जब तुम हू कहते हो तो नाभि के नीचे चोट पड़ती है। यदि तुम जीवन के बीज पर चोट करते हो तो यह मिट्टी में खोने लगता है, हरी पत्तियां, अंकुर निकलने लगते हैं।
लेकिन ध्यान में प्रवेश के लिए अतिरिक्त ऊर्जा चाहिए तो थकान की ऊर्जा क्षीणता से ध्यान में प्रवेश कैसे संभव होगा?
वास्तव में, थकान का मतलब ऊर्जा हीनता नहीं है। जब तुम अपने को थका डालते हो, तो दोहरी घटनाएं घटती हैं। तुम्हारी सारी इंद्रियां, तुम्हारा मन, तुम्हारा शरीर थक जाता है।
और किसी तरह की ऊर्जा को वहन करने के लिए तैयार नहीं होता, मन कर देता है। तो एक तरफ तो यह प्रयोग तुम्हारे शरीर को, तुम्हारे मन को, तुम्हारी इंद्रियों को थकाता है।
और दूसरी तरफ तुम्हारी कुंडलिनी पर चोट करता है।वहां से ऊर्जा जगती है और यहां से तुम थकते हो ..यह दोनों एक साथ चलता है। और उस शक्ति को वहन करने के योग्य भी तुम नहीं रहते, आंख देखना चाहे तो कहती है ।
थकी हूं देखने का मन नहीं, तुम्हारा मन सोचना चाहे तो मन कहता है ..थका हूं सोचने का मेरा मन नहीं, तुम्हारे पैर चलना चाहें तो पैर कहते हैं ..हम थके हैं, हम चल नहीं सकते।
तो अब अगर चलना है तो बिना पैरों की कोई यात्रा तुम्हारे भीतर करनी पड़ेगी; और अगर देखना है तो बिना आंखों के देखना पड़ेगा; क्योंकि आंख थकी है। तो तुम्हारा व्यक्तित्व जब थक जाता है।
वह इनकार करता है कि हमें कुछ नहीं करना और शक्ति जग गई है, जो कुछ करना चाहती है। तो तत्काल वह उन दरवाजों पर चोट करेगी जो थके हुए नहीं हैं। जो तुम्हारे भीतर सदा वहन करने के लिए तैयार हैं।
लेकिन उनको कभी मौका ही नहीं मिला था या तुम ही खुद इतने सशक्त थे।कि तुम सारी शक्ति को लगा डालते थे। तो जब देखने के लिए आंख इनकार कर दे और मन देखने की इच्छा से इनकार कर दे।
तब भी जो शक्ति जग गई है तो तुम उससे किसी और आयाम में देखना शुरू कर दोगे। वह तुम्हारा बिलकुल नया हिस्सा होगा। तुम्हारे देखने के साइकिक सेंटर खुलने शुरू हो जाएंगे।
तुम कुछ ऐसी चीजें देखने लगोगे जो तुमने कभी नहीं देखीं, और ऐसी जगह से देखने लगोगे ,जहां से तुमने कभी नहीं देखीं। इधर शरीर को थका डालना है, मन को थका डालना है ...तुम जो हो, उसको थका डालना है।
ताकि तुम जो अभी हो, लेकिन तुम्हें पता नहीं, वह तुम्हारे भीतर सक्रिय हो सके । और ऊर्जा जगेंगी, तो वह कहेगी काम चाहिए। और तुम्हारे अस्तित्व को उसे काम देना पड़ेगा। नही तो वह खुद काम खोज लेगी।
तुम्हारे कान थके हैं, तो भी वह ऊर्जा जग गई है, तो वह सुनना चाहेगी तो नाद सुनेगी।उन नादों के लिए तुम्हारे कान की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा प्रकाश देखेगी जिसके लिए तुम्हारी आंखों की कोई जरूरत नहीं है।
ऐसी सुगंध आने लगेगी जिसके लिए तुम्हारी नाक की कोई जरूरत नहीं है। तो तुम्हारे भीतर सूक्ष्मतर इंद्रियां, या अतींद्रियां ,जो भी हम नाम देना पसंद करें, वे सक्रिय हो जाएंगी।
क्रमशः
12/04/2024, 10:51 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ...20
हमारी सब इंद्रियों के साथ एक -एक अतींद्रिय का जोड़ है। यानी एक कान तो वह है जो बाहर से सुनता है, और एक कान और है तुम्हारे भीतर जो भीतर सुनता है।लेकिन उसको तो कभी मौका नहीं मिला।
तो जब तुम्हारा बाहर का कान थका है और ऊर्जा जगकर कान के पास आ गई है, और कान कहता है, मुझे सुनना नहीं। तब वह ऊर्जा तुम्हारे उस दूसरे कान को सक्रिय कर देगी ,जो सुन सकेगा, जिसने कभी नहीं सुना।
इसलिए ऐसी चीजें तुम सुनोगे, ऐसी चीजें देखोगे, कि तुम किसी से कहोगे तो वह कहेगा, पागल हो , ऐसा कहीं होता है। किसी वहम में पड़ गए होओगे, कोई सपना देख लिया होगा।
लेकिन तुम्हें तो वह भीतर की वीणा इतनी स्पष्ट होगी कि तुम कहोगे, हम कैसे मानें? अगर यह झूठ है तो फिर बाहर की वीणा का क्या होगा, वह तो बिलकुल ही झूठ हो जाएगी!
तो तुम्हारी इंद्रियों का थकना तुम्हारे अस्तित्व के नये द्वारों के खुलने के लिए प्रारंभिक रूप से जरूरी है। एक दफा खुल जाए, फिर तो कोई बात नहीं। क्योंकि फिर तो तुम्हारे पास तुलना भी होती है।
अगर देखना है तो फिर भीतर ही देखो,क्योंकी यह आनंद पूर्ण है। लेकिन अभी तुलना नहीं है तुम्हारे पास; अभी तो एक ही विकल्प है कि बाहर ही देखना है।एक बार तुम्हारी भीतर की आँख भी देखने लगे।
तब तुम्हारे सामने विकल्प साफ है। तो जब भी देखने का मन होगा, तुम भीतर देखना चाहोगे। बाहर देखने से क्या मतलब है।बिलकुल दो तल पर बात हो रही है, क्योंकि वह दो अलग इंद्रियों की बात हो रही है।
लेकिन अगर दूसरी इंद्रिय का तुम्हें पता नहीं, तो भीतर का कोई मतलब ही नहीं होता, बाहर का ही सब मतलब होता है। इस प्रयोग में थकाने का अर्थ ऊर्जाहीनता नहीं, ऊर्जा तो जग रही उसे जगाने के लिए ही सारा काम चल रहा है।
इंद्रियां थक रही हैं लेकिन वे ऊर्जा नहीं हैं, सिर्फ ऊर्जा के बहने के द्वार हैं। आँख कह रही है कि हम थक गए हैं, अब इधर से यात्रा मत करो। इंद्रियां थक रही हैं । और थकना उस अर्थ में प्राथमिक रूप से बडा सहयोगी है।
यह ऊर्जा यदि अधिक है तो टायर्डनेस नहीं फ्रेशनेस लगनी चाहिए। धीरे धीरे तो तुम्हें बहुत ताजगी लगेगी, जैसी ताजगी तुमने कभी नहीं जानी। लेकिन शुरू में थकान लगेगी कि ,तुम्हारी आइडेंटिटी इन इंद्रियों से है।
इन्हीं को तुम, मैं 'समझते हो । जब इंद्रियां थकती हैं, तो तुम कहते हो, मैं थक गया। तुम कहते हो मुझे भूख लगी में भूखा हु। वही योगी कहता कि मेरा पेट भूखा है योगी जब जठर में अग्नि जली तो उसकी पूर्ति करता।
कुछ भी डाल दो पूर्ति हो जाती जैसे कोई घोड़ा रखे और उसे चारा डाल दे दो समय हो गयी पूर्ति योगी शरीर को वाहन समझ पूर्ति करता। यह अंतर स्पस्ट है वो भोजन करता पर अंतर है।
क्रमशः
12/04/2024, 6:05 pm - स्वर विज्ञान: कुछ सदस्यो का आग्रह रहा है की राजयोग के आठ चरण हैं...यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । इस बारे विस्तार से बताए। तो आदरणीय दोस्तो प्रथम तो इन्हे चरण नही आयाम कहना उचित होगा क्योंकि चरण में हम आगे बढ़ते तो पिछला छूट जाता।
प्रथम हम कुछ शब्दों में योग को समझते। योग दर्शन का मूल ग्रंथ है योग सूत्र। यह सात दर्शनों में से एक शास्त्र है । इसकी की रचना पांच हजार साल पहले महाऋषि पतंजलि ने की। योगसूत्र में चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है।
अष्टांग योग : यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। इस पोस्ट में हम प्रथम आयाम यम बारे के बारे बताने का प्रयास करते और अगले आयामों बारे फिर अगली पोस्ट में भेजेगे।
यम : पांच सामाजिक नैतिकता
1 अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना। सभी प्रकार से ही हिंसा का परित्याग ।
2 सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना। वाणी तथा मन का अर्थ के अनुरूप रहना अर्थात् अर्थ का जैसे स्वरूप है उसी के अनुसार वाणी से कहना तथा मन से वैसा मनन करना ही सत्य है।
3 अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना। दूसरे के धन का अपहरण करना ही स्तेय या चोरी हैं। उस स्तेय का अभाव, दूसरे के धन, सत्त्व का अपहरण न करना ही अस्तेय है।
4 ब्रह्मचर्य - दो अर्थ हैं: चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना। सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना। मुख्यतः उपस्थ इन्द्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं।
5 अपरिग्रह -आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना। भोग के साधनों का स्वीकार न करना,
वास्तव में, यह योग का संपूर्ण विज्ञान है। उदाहरण के लिए हमारे हाथ, पैर, हृदय.. एक दूसरे से अलग नहीं हैं, वे जुड़े हुए हैं। यदि हृदय रुक जाए तो फिर हाथ नहीं चलेगा। वे सीढ़ी के सोपानों की भांति नहीं हैं, क्योंकि सीढ़ी का तो हर डंडा अलग होता है।
यदि एक डंडा टूट जाए तो पूरी सीढ़ी नहीं टूटती। इसलिए महृषि पतंजलि कहते हैं कि वे चरण हैं, क्योंकि उनका एक सुनिश्चित विकास है ;लेकिन यह शरीर के जीवंत अंग हैं। तुम उन में से किसी एक को नहीं छोड़ सकते हो;वे समग्र के साथ संबंधित हैं।
सीढ़ी के सोपान में तुम एक ही छलांग में दो चरण कूद सकते हो, लेकिन अंग नहीं छोड़े जा सकते हैं, तो योग के ये आठ अंग, चरण भी हैं और जीवंत इकाई भी हैं औरएक गहन संबद्धता में जुड़े हुए हैं। पहले को पहला होना है और आठवां , आठवां ही होगा।
पहला अंग 'यम' का अर्थ निषेध , दमन जैसा मालूम पड़ता है। लेकिन महृषि पतंजलि के लिए आत्म संयम का अर्थ स्वयं का, ऊर्जाओं का दमन नहीं बल्कि स्वयं के जीवन को सम्यक दिशा देना है। क्योंकि आप ऐसा जीवन जी सकते है, जो बहुत सी दिशाओं में जाता हो।
तब आप बहुत से रास्तों पर चल सकते हो, लेकिन जब तक तुम्हारे पास दिशा नहीं है, तुम व्यर्थ ही चल रहे हो । तुम कभी भी कहीं नहीं पहुंचोगे। और केवल निराशा अनुभव करोगे। जीवन ऊर्जा सीमित है । जो आपको प्रकृति से, अस्तित्व से, परमात्मा से मिली हैं।
यदि आप उसका उपयोग नासमझी और दिशा हीन ढंग से करते हो, तो तुम कहीं भी नहीं पहुंचोगे। तुम्हारी ऊर्जा चुक जाएगी और वह बिलकुल नकारात्मक खालीपन होगा ..भीतर खोखला..कुछ भी नहीं। तुम मरने के पहले ही मर जाओगे।
ये सीमित ऊर्जाएं इस ढंग से प्रयोग की जा सकती हैं कि वे असीम के लिए द्वार बन सकती हैं। यदि तुम अपनी सारी ऊर्जाओं को इकट्ठा कर एक ही दिशा में होशपूर्वक , बोधपूर्वक बढ़ते हो, तो तुम भीड़ नहीं रहते बल्कि एक संगठन हो जाते हो।
साधारणतया तुम एक भीड़ हो; तुम्हारे भीतर बहुत सी आवाजें हैं। एक कहती है, 'इस दिशा में जाओ।’ दूसरी कहती है, 'यह तो बेकार है। उधर जाओ। और यदि तुम आत्मवान ,अखंड नहीं हो, तो तुम जहां कहीं भी जाओगे; कभी कहीं चैन से नहीं रहने पाओगे।
तुम सदा ही कहीं न कहीं जा रहे होओगे और कभी कहीं नहीं पहुंचोगे। वह जीवन जो 'यम' के विपरीत है, विक्षिप्त हो जाएगा। जब तक तुम आत्मवान न हो जाओ, तुम मुक्त नहीं हो सकते हो। तुम्हारी स्वतंत्रता एक आडम्बर के सिवाय और कुछ न होगी।
तुम स्वयं को, अपनी संभावनाओं, अपनी ऊर्जाओं को नष्ट कर दोगे और अनुभव करोगे कि जीवन भर इतनी कोशिश की, लेकिन पाया कुछ भी नहीं...उससे कोई विकास नहीं हुआ। जब तक तुम आत्म संयमी नहीं होते, दूसरा चरण 'नियम' की संभावना नहीं है।'
नियम' का अर्थ हैं एक सुनिश्चित नियमन : वह जीवन जो अव्यवस्थित नहीं अनुशासित है। जब तक तुम्हारे जीवन में नियमितता , अनुशासन नहीं आता, तब तक तुम अपनी वृत्तियों के गुलाम ही रहोगे।
क्रमश:
13/04/2024, 6:19 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ...21
तुम्हारी पहचान टूटनी चाहिए जिस दिन तुम जानोगे कि मैं पेट नहीं हूं उस दिन तुम्हारी ताजगी और तरह से आनी शुरू होगी। इंद्रियां चूंकि थक गई हैं और काम नहीं कर रही हैं।
इसलिए बहुत सी ऊर्जा जो उनसे विकीर्ण होकर व्यर्थ हो जाती थी। वह तुम्हारे भीतर संरक्षित हो गई है और पुंज बन गई है। और तुम ज्यादा ऊर्जावान अनुभव करोगे।कि तुमने बहुत ऊर्जा बचाई जो तुम्हारी संपत्ति बन गई है।
और चूंकि बाहर नहीं गई, इसलिए तुम्हारे रोएं -रोएं में भीतर फैल गई है। लेकिन इससे तुम एक हो, यह तुम्हें जब खयाल आना शुरू होगा, तभी तुम्हें फर्क लगेगा। तो धीरे धीरे तो ध्यान के बाद बहुत ही ताजगी मालूम होगी।
तब शरीर में स्पंदन अर्थाथ चैतन्य लहरियों की अनुभूति होती यह ह्दय मे प्रकाश की टिमटिमाती लपट है,जो हर समय जलती रहती है। यह परमात्मा का प्रतिबिम्ब है। जब कुण्डलिनी उठती है तो प्रकाश दैदीप्यमान होता है।
और चैतन्य लहरियॉ हमारे अन्दर से बहने लगती हैं। ये चैतन्य लहरियॉ हमारे शरीर में बहने वाली सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह होना है । ये चैतन्य लहरियॉ हमें पूर्ण सन्तुलन प्रदान करती है।
हमारी शारीरिक,मानसिक एवं भावनात्मक समस्याओं का निवारण करती है। ये हमें परमात्मा से पूर्ण आध्यात्मिक एकाकारिता का विवेक प्रदान करती है,तथा परमात्मा से पूर्णतः एकरूप कर देती है ।
सुषुम्ना नाडी अत्यन्त पतली नाडी है,पापों और बुराइयों के कारण इतनी संकीर्ण हो जाती है कि कुण्डलिनी के सूक्ष्म तन्तु ही इसमें से गुजर सकते हैं । यह अत्यंत सूक्ष्म और गहन प्रक्रिया है।
मूलाधार के इस पतले मार्ग में कम से कम एक सूक्ष्म तन्तु गुजर सकता है, उसी एक तन्तु से ये ब्रह्मरन्द्र का भेदन करती है। आरम्भ में अधिकतर लोगों में यह घटना आसानी से घट जाती है ।
प्रकाश में देखने पर उन्हें लगता है कि ये सब चीजों उनके अन्दर निहित है और वे आनंदित हो जाते हैं । लेकिन बोझ के दवाव से पुनः नीचे की ओर खिंच जाती है,उन्हें बहुत बडा झटका लगता है ।
तब वे घबराकर संशयालु बन जाते हैं । जब आप निर्विचारिता में होते हैं तो आप परमात्मा की सृष्टि का पूरा आनंद लेने लगते हैं, और बीच में कोई वाधा नहीं रहती है ।
विचार आना हमारे और सृजनकर्ता के बीच की बाधा है हर काम करते वक्त आप निर्विचार हो सकते हैं, और निर्विचार होते ही उस काम की सुन्दरता,उसका सम्पूर्ण ज्ञान और उसका सारा आनंद आपको मिलने लगता है ।
समस्याओं को केवल निर्विचारिता को समर्पित कर दे । मनुष्य की उम्र.. जितनी बढ़ती जाएगी, उतना ही ध्यान करना, निर्विचारिता की स्थिति पाना कठिन हो जाएगा।
ध्यान की आदत बच्चो को बचपन से लगानी चाहिए।
क्योंकि बचपन मे बुरे अनुभवों का जहर मनुष्य के पास नहीं होता है। इसलिए बच्चों के जीवन मे विचारों का भंडार भी नही होता है। 12 वर्ष की आयु से ध्यान सीखना चाहिए।
आने वाले समय मे मन कि एकाग्रता की बड़ीआवश्यकता होगी। तब बच्चो के ध्यान की साधना ही काम आएगी क्योकि आनेवाला समय कठिन होगा।समय के साथ साथ विचारों का प्रदूषण बढ़ने लगेगा।
वैसे वैसे जीवन मे कठिनाइयां भी बढ़ने लगेगी। ध्यान निर्विचारिता की स्थिति नहीं है बल्कि ध्यान की स्थिति निर्विचारिता के उपर की स्थिति होती है। तो प्रथम निर्विचारिता की स्तिथि को पाना होगा।
इसके लिए विचार कैसे पैदा होते हैं यह जानना जरूरी है, तभी उन्हें रोका जा सकता है। क्योकि उनकी उत्पत्ति के सत्य को जाने बिना ही हम उनके दमन में लग जाए तो विमुक्त नहीं हो सकते ।
विचार के दमन से कोई अंतर नहीं पड़ता है, क्योंकि वे प्रतिक्षण नये -नये उत्पन्न हो जाते हैं। विचारों को मारने कीआवश्यकता नहीं हैं क्योकि वे स्वयं ही प्रतिक्षण मरते रहते हैं। विचार बहुत अल्पजीवी है।
कोई भी विचार ज्यादा नहीं टिकता, पर विचार प्रक्रिया टिकती है।एक -एक विचार तो अपने आप मर जाता है, पर विचार- प्रवाह नहीं मरता है। एक विचार मर भी नहीं पाता है कि दूसरा उसका स्थान ले लेता है।
यह स्थानपूर्ति बहुत त्वरित है और यही समस्या है। जो विचार की उत्पति के विज्ञान को समझ लेता है, वह उससे मुक्त होने का मार्ग सहज ही पा जाता है जो नहीं समझता है, वह स्वयं ही एक ओर विचार पैदा किए जाता है ।
और दूसरी ओर उनसे लड़ता भी है। इससे विचार तो नहीं टूटते, इसके विपरीत वह स्वयं ही टूट जाता है।
क्रमशः
14/04/2024, 10:17 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग...22
हम सब जानते हैं कि चित्त चंचल है। इसका अर्थ है कि कोई भी विचार दीर्घजीवी नहीं ..पलजीवी है। वह तो जन्मता है और मर जाता है। उसके जन्म को रोक लें तो उसकी हत्या की हिंसा से भी बच जाएंगे ।
वह स्वयं विलीन भी हो जाता है। विचार की उत्पत्ति कैसे होती है वास्तव में,विचार की उत्पत्ति, बाह्य जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया, रिएक्शन से होता है। बाहर घटनाओं और वस्तुओं का जगत है।
इस जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही हमारे विचारों की जन्मदात्री है। कोई एक फूल को देखता है तो ‘ देखना’ कोई विचार नहीं है और यदि वह देखता ही रहे तो कोई विचार पैदा नहीं होगा।
पर वह देखते ही कहता है कि ‘ फूल बहुत सुंदर है ‘ और विचार का जन्म हो जाता है। मात्र देखने से सौंदर्य की अनुभूति तो होगी, पर विचार का जन्म नहीं होगा। पर अनुभूति होते ही हम उसे शब्द देने में लग जाता।
यह प्रतिक्रिया, यह शब्द देने की आदत, अनुभूति को, दर्शन को ..विचार से आच्छादित कर देती है। अनुभूति दब जाती है, और शब्द चित्त में तैरते रह जाते हैं। ये शब्द ही विचार हैं।
इसके पहले कि एक विचार मरे हम दूसरीअनुभूति को विचार में परिणत कर लेते हैं। फिर यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है और हम शब्दों से इतने भर जाते और दब जाते हैं कि स्वयं को ही उनमें खो देते हैं।
दर्शन को शब्द देने की आदत छोड़ने से विचार का जन्म निषेध हो जाता है। कोई मात्र देखे ओर कोई शब्द न दे तो जीवन में इतनी बड़ी क्रांति होगी कि उससे बड़ी कोई क्रांति नहीं हो सकती है।
शब्द बीच में आकर उस क्रांति को रोक लेते हैं।मात्र देखने से एक अलौकिक शांति भीतर अवतरित हो जाती है, एक शून्य व्याप्त हो जाता है।क्योंकि शब्द का न होना ही शून्य है, और इस शून्य में चेतना की दिशा परिवर्तित होती है,
एक नवजात शिशु जगत को बिना शब्द के देखता है। वह शुद्ध प्रत्यक्षीकरण है। फिर धीरे -धीरे वह शब्द की आदत सीखता है। क्योंकि बाह्य जगत और बाह्य जीवन के लिए वह सहयोगी और उपयोगी है।
पर जो बाह्य जीवन के लिए सहयोगी है, वही अंतस जीवन को जानने में बाधा हो जाता है। और इसलिए एक बार फिर वृद्धों को भी नवजात शिशु के शुद्ध दर्शन को जगाना पड़ता है, ताकि वे स्वयं को जान सकें।
शब्द से जगत को जाना, फिर शून्य से स्वयं को जानना होता है। विचार का स्वरूप "नहीं' है। विचार "हां' को जानता ही नहीं और "नहीं' शब्द में विचार की प्रक्रिया समा जाती है।
विचार सदा ही अंत में निराशाजनक होता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति नेगेटिव है। विचार को उसके तार्किक अंत तक ले जाया जाए तो नास्तिकता के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता।
ध्यान पॉजिटिव है; वह अस्तित्व में ले जाता है। विचार निषेध है; वह तुम्हारे भ्रमों को तोड़ देता है। इसलिए विचारक की यह मजबूरी है कि जितना सोचेगा उतना ही उदास होता जाएगा।
जितना सोचेगा उतने जीवन के भ्रम टूटेंगे । भ्रम टूटने से रिक्तता हाथ लगती है। और रिक्तता वही नहीं है जिसे शून्य कहा गया है। क्योकि शून्य तो रस से सरोबोर होता है। लेकिन रिक्तता में कुछ भी नहीं है खालीपन है।
विचार का उपयोग किया जा सकता है लेकिन ध्यान के सेवक की तरह। अगर किसी ने विचार को मालिक बना लिया तो बहुत पछताएगा। सत्य भी बहुत खतरनाक है क्योंकि जिसके भी जीवन के भ्रम टूट जाते हैं ।
उसका जीना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा करता है। वह मानता है कि उसकी पूजा परमात्मा तक पहुंच रही है।वह मानता है तो सुखी है। फिर विचार जगे,सोचने लगे कहां परमात्मा।
कैसा परमात्मा! कभी देखा तो नहीं। किसने देखा यह पत्थर की मूर्ति है जिसके सामने मैं पूजा कर रहा हूं। यह मैं ही बाजार से खरीद लाया हूं। यह मनुष्य की बनायी हुई मूर्ति है। परमात्मा तो वह है जिसने मनुष्य को बनाया।
और यह कैसा परमात्मा, जिसको मनुष्य ने बनाया। यह परमात्मा नहीं हो सकता। तब पूजा का थाल हाथ से गिर जाएगा ,फूल बिखर जाएंगे और प्रार्थना खंडित हो जाएगी। इस व्यक्ति के जीवन में अमावस आ गई।
अब इसके आगे विचार की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और ध्यान की प्रक्रिया शुरू होती है ध्यान यहीं से शुरू होता है। अब भीतर मुड़ो बाहर के मंदिर व्यर्थ हो गए, अब भीतर के मंदिर में तलाशो।
लेकिन हम वहीं नहीं रुके। हमने वहीं से शुरुआत मानी और असली तीर्थयात्रा वहीं से शुरू हुई है। फिर हमने निर्विचार में झांका... मौन हुए। फिर हमने आंखें बंद कीं और आंखें बंद करके देखा।
तर्क छोड़ा, सिर्फ देखा अथार्त भीतर साक्षी बने। लेकिन सोचा नहीं, केवल देखा कि भीतर क्या है मैं कौन हूं। यह मेरा अस्तित्व क्या है ..मेरा चैतन्य क्या है यह विचार भ्रम तोड़ता है, ध्यान सत्य को देता है।
वास्तव में, जिस दिन मनुष्य के सारे भ्रम टूट जाएंगे उस दिन वह जी न सकेगा...विक्षिप्त हो जाएगा। इसीलिए उसको अपने भ्रमों में जीने दो ...करने दो उसे पूजा पाठ, जपने दो उसे मंत्र, फेरने दो उसे माला।
मानने दो उसे आकाश में किसी परमात्मा को, रहने दो भयभीत नरक से, भरा रहने दो लोभ से ,स्वर्ग के प्रति, करने दो कामना स्वर्ग की। मगर कहो मत। मनुष्य के पैर के नीचे की जमीन मत खींच लो।
जब उसके सारे भ्रम टूट गए तो विक्षिप्त न होगा तो और क्या करेगा। धन व्यर्थ है, प्रेम व्यर्थ है, परमात्मा भी व्यर्थ हो गया। पद व्यर्थ है, प्रतिष्ठा व्यर्थ है ..सब कुछ व्यर्थ हो गया, अब कैसे जिये।
मनुष्य बिना भ्रमों के नहीं जी सकता। भ्रम उसका आधार है, उसकी बुनियाद है। लेकिन यह बात अधूरी है और अधूरे सत्य असत्यों से भी ज्यादा भयंकर होते हैं। तुमसे कुछ छीन तो लेते हैं , लेकिन तुम्हें देते कुछ भी नहीं।
तुम्हारे हाथ में कांटा था, वह तो छिन जाता है लेकिन फूल नहीं आता। माना कि कांटा दुःख भी दे रहा था तो भी कम से कम कुछ तो हाथ में था। कुछ व्यस्त होने का उपाय तो था ..वह भी गया।
वास्तवमें, मनुष्य रिक्तता की बजाय बीमारियां ,उलझनें पसंद करेगा। कम से कम उलझा तो रहता है ..रिक्तता तो बहुत भयानक है, बहुत घबराहट वाली है। रिक्तता में जिसने भी झांका.. वह पागल हो जाएगा।
उसने एक ऐसे जगत में देख लिया जहां कोई अर्थ नहीं है। कोई पशु-पक्षी अपनी जाति को नहीं मारते। सारी पृथ्वी पर, सिर्फ मनुष्य अकेला प्राणी है, जो मनुष्य को मारता है।
क्रमशः
14/04/2024, 2:09 pm - स्वर विज्ञान: अष्टांग योग का दूसरा आयाम 'नियम' 'नियम' का अर्थ हैं एक सुनिश्चित नियमन : वह जीवन जो अव्यवस्थित नहीं अनुशासित है। जब तक तुम्हारे जीवन में नियमितता , अनुशासन नहीं आता, तब तक अपनी वृत्तियों के गुलाम ही रहोगे ।
तुम्हारे भीतर बहुत से अप्रकट मालिक होंगे ; और वे तुम पर शासन करते रहेंगे। जिसके पास नियमितता होती है, केवल वही मालिक हो सकता है। वास्तव में असली मालिक तभी प्रगट होता है जब आठवां चरण पा लिया जाता है ..जो कि लक्ष्य है।
तब व्यक्ति मुक्तिदाता हो जाता है क्योंकि यदि तुम मुक्ति पा गए हो, तो अचानक तुम दूसरों के लिए मुक्ति देने वाले हो जाते हो। तुम उन्हें मुक्ति देने की कोशिश नहीं करते हो..केवल तुम्हारी उपस्थिति ही एक मुक्तिदायी प्रभाव बन जाती है।
नियम: पाँच व्यक्तिगत नैतिकता
1 शरीर की शुद्धि। यानी बाहरी ओर आंतरिक हर प्रकार से स्वछ रहा जाए ।
2 सन्तुष्ट ,प्रसन्न रहना। किसी प्रकार की तृष्णा का न होना ही सन्तोष है।
3 तप से अनुशासित रहना। दूसरे शास्त्रों में वर्णन किये गये चान्द्रायण इत्यादि तप है।
4 स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना। प्रणव पूर्वक, ओंकार के साथ मन्त्रों का जप, पाठ करना स्वाध्याय है।
5 ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा।
क्रमश:
15/04/2024, 10:03 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग...23
कोई पशु -पक्षी दूसरी जातियों को भी मारते हैं ..तो सिर्फ भोजन की दृष्टि से --भूख के कारण।वे शिकार खेलने नहीं जाते। मनुष्य अकेला है जो शिकार खेलता है। कोई सिंह शिकार नहीं खेलता और तभी मारता है जब भूखा हो।
सिर्फ मनुष्य खेल में भी मारता है; मारने में भी रस लेता है। मारने में ,ध्वंस में एक कुत्सित रस है। मनुष्य बस, बातें करने में कुशल हो गया है लेकिन भीतर...। ऊपर सम्हला दिखता है, भीतर बिल्कुल पागल है।
इसलिए उसको सपना देखने दो ..उसका सपना तोड़ दोगे,तो फिर उसे सुलाना मुश्किल हो जाएगा। एक बार नींद टूट गई तो फिर कोई उपाय उसे सुलाने का नहीं है।मगर बात अधूरी है। हमने और आगे भी तलाश की है।
जहां विचार के पार .ध्यान में झांकते हो ..तो रिक्तता मिट जाती है, पूर्ण का अवतरण होता है। ध्यान परम आलोक से भर जाता है। शाश्वत जीवन की प्रतीति होने लगती है। लेकिन सुबह होने के पहले रात खूब काली हो जाती है ।
निराशा एक बड़ी आशा का जन्म बन सकती है।इसलिए ध्यान की तलाश शुरू हुई है। ध्यान भीतरी घटना है, बाहर से देखने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए बाहर की उत्सुकता ध्यान में नहीं बल्कि धन में है।
तुम लाख कहो कि भारत धार्मिक देश है कभी रहा होगा, अभी तो नहीं है। और तुम सदा यही दोहराते रहते हो कि हम धार्मिक हैं। तुमने धार्मिक होने को मान्यता की , विश्वास की बात बना ली है।
धार्मिक होना विश्वास की बात नहीं है, बल्कि एक जीवंत रूपांतरण है। जब तक तुम्हारे सारे विश्वास और तुम्हारी सब धारणाएं न गिर जाएं तब तक तुम जानने के मार्ग पर कदम नहीं उठा सकते।
हीरे तुम्हारे भीतर हैं ..कंकड़ पत्थर बाहर हैं। बाहर जो है, सब पाखंड है। अगर परमात्मा को खोजना है तो भीतर खोजो। अकेले ,अपने भीतर चलो ..जहां कोई न रह जाए, कोई दूसरा , दूसरे की छाया भी न रह जाए।
जहां सब निर्विचार हो, उसी निर्विचार चैतन्य में तुम जानोगे कि ईश्वर है और फिर वह ईश्वर न हिंदुओं का , न मुसलमानों का वह मात्र ईश्वर है। और तब श्रद्धा का आविर्भाव होता है जो ज्ञान से उपलब्ध होती है।
विश्वास अज्ञान में उत्पन्न होता है और विश्वास को श्रद्धा मत समझ लेना क्योकि वह धोखा है। विश्वास झूठा सिक्का है;जो श्रद्धा जैसा लगता है तभी तो बाजार में चल सकता है।
विश्वास ने व्यक्ति को बहुत भरमाया है, भटकाया है और अगर विश्वास छीन लोगे,तो व्यक्ति घबड़ा जाएगा।इसलिए केवल सद्गुरु ही विश्वास छीन सकता क्योंकि उसे भरोसा है कि जब तुम रिक्त हो जाओगे ।
तो वह तुम्हें शून्य होने की कला भी सिखा देगा। परन्तु रिक्तता और शून्यतापर्यायवाची शब्द नहीं हैं। केवल भाषा कोश में पर्यायवाची हैं, जीवन के कोष में नहीं हैं। रिक्तता का मतलब है, कुछ भी नहीं है।
शून्य का मतलब है ...सब कुछ का स्रोत । शून्य पॉजिटिव शब्द है और शून्य में ''पूर्ण ''समाया हुआ है, सोया हुआ है। रिक्त में कुछ भी नहीं है .. सिर्फ खाली है। अगर व्यक्ति रिक्त हो गया तो फिर अपना ही सत्य मार डालेगा।
फिर उससे छुटकारा पाना मुश्किल है। वास्तवमें, असत्य का छूटना सत्य का हो जाना नहीं है। पैर से कांटा निकल गया, इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हारे हाथ में फूल आ गए।
पैर से कांटा निकल गया, वह अच्छा हुआ। कांटा चुभा रहता तो फूल को खोजना मुश्किल था। अब पैर स्वस्थ हैं, अब तुम चल सकते हो फूल की खोज हो सकती विचार का कांटा निकल जाए तो ध्यान का फल खोज सकता है।
इसलिए समस्त ध्यानियों ने निर्विचार को समाधि कहा है।सत्य तो मुक्त करता है। तुमने जिसे सत्य मान रखा है वह सत्य नहीं है। इसलिए जब तुम थोड़े जागोगे, थोड़ा सोचोगे तो पहले तो घबड़ाहट आएगी।
विश्वास तो छीनने ही पड़ेंगे। जगह खाली करनी पड़ेगी कचरे से, तभी परमात्मा आएगा; तभी विराजेगा तुम्हारे भीतर। जैसे छोटे बच्चे के खिलौने छीन लो तो छोटा बच्चा जिएगा कैसे।
लेकिन कभी ऐसी प्रौढ़ता आती है ..जब खिलौने बच्चा खुद ही छोड़ देता है। एक दिन ऐसा लगता था कि बच्चा बिना खिलौनों के नहीं जी सकता। रात भी अपने खिलौने अपने साथ छाती से लगाकर सोता है।
सुबह होते ही पहले अपने खिलौने को तलाशता है। पर हम जानते हैं कि कल प्रौढ़ हो जाएगा, यह खिलौना आज जो इतना प्यारा है, किसी दिन कोने में पड़ा रह जाएगा, कचरे में फेंक दिया जाएगा।
फिर इस पर ध्यान भी न आएगा। ऐसे ही तुम्हारे विश्वास बचपन के खिलौने हैं।उन्हें छोड़ना ही होगा जो पीड़ादायी भी है । जब कांटा निकाला जाता है तो भी तो तकलीफ होती है। मवाद भरी हो और उसे देह से निकालना हो ।
तो भी तो तकलीफ होती है। सभी तरह की सर्जरी तकलीफ की होती है। और यह तो देह की ही सर्जरी नहीं है, आत्मा की सर्जरी है। लेकिन एक बार सारी मवाद निकल जाए ।
सारे भ्रम गिर जाएं तो तुम तैयार हो जाओगे उड़ान भरने को। तब चैतन्य लहरियॉ हमारे शरीर मे उतपन होने लगती जो हमें पूर्ण सन्तुलन प्रदान करती है,हमारी शारीरिक,मानसिक एवं भावनात्मक।
समस्याओं का निवारण करती है। ये हमें परमात्मा से पूर्ण आध्यात्मिक एकाकारिता का विवेक प्रदान करती है,तथा परमात्मा से पूर्णतः एकरूप कर देती है ।
सुषुम्ना नाडी अत्यन्त पतली नाडी है,पापों और बुराइयों के कारण इतनी संकीर्ण हो जाती है कि कुण्डलिनी के सूक्ष्म तन्तु ही इसमें से गुजर सकते हैं ।
क्रमशः
16/04/2024, 11:03 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग ....24
ध्यान निर्विचारिता की स्थिति नहीं है बल्कि ध्यान की स्थिति निर्विचारिता के उपर की स्थिति होती है। और जब तालू भाग में स्पंदन का अनुभव होने लगता है तो हमें एक आत्मानंद प्राप्त होता है।
इसी स्थिति का वर्णन संत कबीर ने किया है..’’ शून्य शिखर पर अनहत बाजे’’ यानी जब आप शून्य शिखर यानी इस सहस्त्रार चक्र पर पहुंच जाते हैं तो आपको अनहत का नाद ..वह स्पंदन का नाद सुनाई देने लगता है।
यह वही अनुभव कर सकता है जो इस चक्र तक पहुंचा हो। आत्म साक्षात्कार के बाद आप चक्रों की तरह घूमते हुय़े बहुत से छल्ले देख सकते हैं। आत्मा सभी तत्वों के कारण-कार्य़ सम्बन्धों से लीला करती है ।
और ये सात छल्ले बनाती है ।आत्म साक्षात्कार के पश्चात आप चक्रों के इर्द-गिर्द घूमते हुये और एक छल्ले को दूसरे छल्ले में जाते हुये बहुत से छल्लों को देख सकते हैं।कभी कभी तो एक छल्ले में बहुत से छल्ले और ।
कभी एक छल्ले में चिंगारियों जैसे अर्धविराम चिन्ह भी आप देख सकते हैं ।ये चेतन्य होता है अथार्त मृत आत्मायें होती हैं । लेकिन व्यक्ति पर कोई अन्य आत्मा बैठती है तो वह कोषाणु पर प्रतिविम्बित होती है।
ये आत्मा किसी भी चक्र से या सभी चक्रों से जुड सकती है। जिससे व्यक्ति अचेतन हो जाता है और मादकता, मिर्गी, रोगों का कारण बनती है। मूलाधार चक्र सबसे अधिक कोमल और सबसे अधिक शक्तिशाली है ।
इसकी बहुत सी सतहें हैं और बहुत से आयाम। यदि मूलाधार ठीक नहीं है तो आपकी याददास्त खराब हो जायेगी .. आप में दिशा विवेक नहीं रहेगा। बहुत से असाध्य रोग दुर्बल मूलाधार के कारण कारण आते हैं ।
90 प्रतिशत मानसिक रोगी दुर्बल मूलाधार के कारण होते हैं। यदि व्यक्ति का मूलाधार शक्तिशाली है तो उसे किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी । आप मस्तिष्क को दोष देते हैं यह मूलाधार के कारण होता है।
इसलिए मूलाधार के प्रति विवेकशील रहें । आज्ञा चक्र में 2 नाड़ियां मिलकर कमल की आकृति बनाती है। यहां 2 ध्वनियां निकलती रहती है। आज्ञाचक्र पर दो दलों वाला कमल है, जिस पर 'हं' और 'क्षं 'विराजित हैं।
तपःलोक है इसका। लिंगाकार यन्त्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूटरी 2 ग्रंथि मिलती है। योग शास्त्र में इस स्थान का विशेष महत्व है।यह एक अति प्रधान प्रवेश द्वार भी है।
ज्ञानदाता शिव अपनी शक्ति हाकिनी के साथ विराजते हैं।इस चक्र पर ध्यान करने से सम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता आती है। मूलाधार से ´इड़ा´, ´पिंगला´ अलग अलग प्रवाहित होते हुए इसी स्थान पर मिलती है।
योग में इस चक्र को त्रिवेणी भी कहा गया है।क्षमा प्रार्थना आज्ञा चक्र का मंत्र हैं।हं और क्षं इसके दो पक्ष हैं ।हं अर्थात ‘मैं हूं’ और “क्षं‘अर्थात ‘मैं क्षमा करता हूं ‘। अतः जब आज्ञा चक्र पकडता है ।
तो आपको कहना पडता है “ मै क्षमा करता हूं“आपके अन्दर यदि प्रति अहं है तो भी आपको कहना होगा “मैं क्षमा करता हूं” । यदि हमारे अन्दर अहंकार है तो हमें कहना चाहिए ‘मैं हूं मै हूं’ तो ‘हं’ और ‘क्षं’ बीज मंत्र हैं।
ये प्रार्थना के –क्षमा प्रवचन के बीज हैं। जब किसी चीज से अधिक लगाव होता है तो मेरा,तेरा शव्द का प्रयोग होने लगता है । मेरा घर है ..मेरा शव्द को त्याग देना चाहिए, इसके स्थान पर हम शव्द का प्रयोग करें।
हम अर्थात सब एक हैं..आप उस परमात्मा के अंग प्रत्यंग हैं। मेरा बच्चा है, निसंदेह आपने अपनी पति पत्नी ,बच्चों की देख-भाल करनी है क्योंकि यह आपकी जिम्मेदारी है, लेकिन जितना आप अपने बच्चों के लिए करते हैं।
उससे अधिक अन्य बच्चों के लिए भी करें ,आपको विश्वास करना होगा कि आपका परिवार आपके पिता (परमात्मा) का परिवार है और आपकी मॉ (आदिशक्ति) इसकी देख-भाल कर रही है ।
किसी चीज को अपने तक सीमित न रखें, आप तभी करते हैं जब वह करवाता है ..डोर तो उसके हाथ में है ।
मस्तिष्क में जब कुण्डलिनी का प्रकाश आता है तो मस्तिष्क के माध्यम से सत्य को समझा जा सकता है।
इसी कारण इसे सत्य खण्ड कहा जाता,अर्थात मस्तिष्क द्वारा समझे गये सत्य को आप देखने लगते हैं। क्योंकि अभी तक मस्तिष्क द्वारा जो कुछ भी आप देख रहे थे वह सत्य नहीं था,वह सिर्फ वाह्य पक्ष था।
हर शव्द का अपना महत्व है,और मंत्र इन्हीं शव्दों से बनें होते हैं, जैसे हमारे शरीर के अन्दर तीन देवियॉ विराजमान हैं महॉ सरस्वती , महॉलक्ष्मी, और महॉ काली,तो इन्हैं ऐं,हीं, क्लीं कहते हैं ।
क्षं शब्द का अर्थ है क्षमा करना। सहज योग प्रेम का पथ है,प्रेम में अधिक विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं है। छोटे से शव्द प्रेम को संमझ लेने मात्र से ही व्यक्ति पंडित हो जाता है।
कुण्डलिनी जब उठती है तो स्वर उत्पन्न करती है, सभी स्वरों के अलग-अलग अर्थ होते हैं । और चक्रो पर जो स्वर सुनाई देते हैं उनका उच्चारण इस प्रकार है-
1-मूलाधार , चार पंखुडियॉ , चार स्वर निकलते हैं- व,श,ष,स। मंत्र – ‘ लं ‘
2-स्वादिष्ठान , छः पंखुडियॉ छः स्वर निकलते हैं-ब,भ,म,य,र,ल मंत्र – ‘ वं ‘
3-मणिपुर , दस पंखुडियॉ दस स्वर उत्पन्न होते हैं –ड, ढ,ण,त,थ,द,ध,न,प,फ मंत्र – ‘ रं ‘
4-अनाहत चक्र , बारह पंखुडियॉ हैं- बारह स्वर उत्पन्न होते हैं –क,ख,ग,घ,ड.च,छ,ज,झ,ञ,ट,ठ – मंत्र – ‘ यं ‘
5-विशुद्धि चक्र , सोलह पंखुडियॉ सोलह स्वर उत्पन्न होते हैं-अ,आ, इ,ई,उ,ऊ,ऋं ,ॠं,ळं ,लृं,ए,ऐ,ओ,औं ,अं,अः मंत्र- 'हं'
6-आज्ञा चक्र , दो पंखुडियॉ दो स्वर उत्पन्न होते हैं---ह, क्ष मंत्र – ‘ ॐ ‘
अपने मस्तिष्क द्वारा आप दिव्यता के विषय में कुछ नहीं जान पाते हैं।,जब तक कुण्डलिनी इस भाग में नहीं पहुंच जाती या जब तक आत्मा का प्रकाश मस्तिष्क में चमकने न लग जाय।
वैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ह्दय में होती है अर्थात आत्मा का केन्द्र ह्दय में होता है , लेकिन वास्तव में आत्मा की पीठ ऊपर है जिसे हम सर्व शक्तिमान परमात्मा ,,सदा शिव, कहते हैं ।
क्रमशः
17/04/2024, 9:39 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग ..25
कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है । यह समस्या भवसागर से आती है,इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। सहस्रार का अर्थ है.. =हजार, अनंत, असंख्य ।
इन सब चक्रों के ऊपर, महाचक्र है,जिसे सहस्रार के नाम से जाना जाता है। हजार दलों वालें महापद्म पर,जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है।
सारी तैयारी उसी की साधना की है। मनुष्य शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे गुरुजी कहते हैं कि “विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो ।
सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं | मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंदलहरी में स्नान करते हैं” । सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है ।
और कोई स्वर नहीं निकलता है | ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप । ये सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ओं …होता है। सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं ।
या स्वर्णिम रंग की किरणें । ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है । आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं ।
कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आपकी आत्मा प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य लहरियॉ
वाइब्रेशन्स आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है।
और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप शीतल लहरियॉ महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में दूसरो लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं।
तथा और भी बहुत से कार्य कर सकते हैं। परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है । आपको याद रखना होगा कि ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है।
ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता ,सारा शरीर बेकार हो जाता है। कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है ।
तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं । और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे जितनी क्षद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है।
हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है। वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं । गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।
श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं ; पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं । मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन करते हैं गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते ।
क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, इतना ही नहीं बल्कि कुण्डलिनी के चक्र भेदन करने के बाद श्री गणेश उस चक्र को बन्द कर देते हैं।
ताकि कुण्लिनी फिर नीचे न चली जाय। शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है।वास्तव में,सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं।
आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर ।पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है। हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का। जब तक दोनों ... मस्तिष्क और आत्मा में यह वाइब्रेशन नहीं पहुंचता ।
हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होनापरमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है।
जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है। सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है।
पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है।यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता हैआत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है।
सहस्रार को कैलास पर्वत के रूप में इंगित करने भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं। सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों सेभी लगभग तीन-तीन इंच अंदर ।
मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। तत्व दर्शीयों के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है।
सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है।
और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है उस का संपादन करता है। इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है ।
क्रमशः
18/04/2024, 10:44 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग...26
अवचेतन मन मे पिछले जन्मों की करोडों वासनाऐ उपस्थित रहती है। जो काम अधूरे रह जाते है उनको वासनाऐ कहते है ऐसी करोडों वासनायें होती है। इन सब वासनाओं को योगसमाधि स्थिति द्वारा निकाल सकते है।
जो योगी समाधि स्थिति पाता है वह स्वयं का लाभ तो करता ही है साथ ही साथ अपने चारों और के लोगों को भी लाभ पहुँचाता है।सुषुप्ति यानी तुरीय स्थिति मे पहुंचने वाले योगी के स्थिति को थीटा तरंग स्थिति कहते है।
इस स्थिति मे योगी कम ग्लूकोज़ खर्च करते है।परमात्मा के साथ अनुसंधान करना ही हर साधक का अंतिम लक्ष्य है।भेजा हर प्रकार के भौतिक विषयों को देखता है और मन हर प्रकार की अंतरंग यानि आंतरंगिक विषयों की देखभाल करता है।
इसलिये दिव्यत्व पाने के लिये साधक को अंतर्मुखी होना चाहिए, मन को स्थिर करने के लिये दो मार्ग है एक ध्यान और दूसरा ज्ञान । खोपडी के अंदर का सेरेब्रम चेतना केंद्र और स्वैच्छिक पद्धति का स्थान है।
सेरेबेल्लम सहयोग करनेवाला स्थान है। ये सेरेबेल्लम चेतना और स्वैच्छिक पद्धति का स्थान है। ये सेरेबेल्लम अपना काम बिना किसी संदेह सेरेब्रम के साथ करके शांति सौख्य देता है। मगर इस संयोग्यता मे कुछ रुकावट नही आना चाहिये।
अगर कुछ रुकावट आती है तो यह(सेरेबेल्लम) सेरेब्रम के साथ संदेहात्मक स्थिति मे काम करना शुरु करेगा । सेरेबेल्लम जितनी संदेहात्मक स्थिति मे रहेगा उतनी ही व्याकुलता से काम करेगा।
अति व्याकुलता की वजह से मनुष्य उतनी ही गलतियाँ करना शुरु करेगा यानि जितनी व्यकुलता उतना ही लोभ, मोह, बदला लेने का स्वभाव और कंजूसी का स्वभाव वगैरा-वगैरा आयेगा।
अवचेतन मे झूठ बोलने की आदत बढती जाएगी यानि नकारात्मक गुणो की वृद्धि होगी। जब साधक को सकारात्मक गुणो की वृद्धि होती है तब उसका दिव्यत्व बढता है और ओं का पवित्र शब्द सुनाई देता है।
इसका मतलब साधक की कुंडलिनी शक्ति जाग्रत हो रही है। डयनसेफलान इस कुंडलिनी शक्ति के जागरण मे और बढौती करेगा।अधिचेतन स्थिति का कारण होती है सेरेब्रम और पिनियल ग्लांड्स।
अधिचेतन स्थिति की कारणभूत सेरेब्रम और पिनियल ग्लांड्स को ही आध्यात्मिक केंद्र कहते है। पिनियल ग्लांड्स सात साल की आयु से सुखना शुरु हो जाती है, इसकी वजह से सकारात्मक गुणो मे बाधा आती है।
सुक्ष्म शरीर यानि मानसिक प्रवर्तना का कारण है ।सुक्ष्म शरीर यानि मानसिक प्रवर्तना का कारण है खोपड़ी के अंदर का लिंबिक सिस्टम। इस लिंबिक सिस्टम को ही आदिदैविक केंद्र कहते है।
लिंबिक सिस्टेम के अंदर होती है है पोथेल्मस ग्लांड। असली मे यह हैपोथेल्मस ग्लांड ही मानसिक प्रवर्तना का कारण है। दोनों आंखों के बीच की जगह को कूटस्थ या आज्ञाचक्र कहते है!
पिट्युटरी ग्लांड कूटस्थ के पीछे होती है। यह आज्ञाचक्र भौतिक यानि स्थूल शरीर को नियंत्रण करता है एवम स्थूल शरीर को आवश्यक निर्देश देता है। इस आज्ञाचक्र को आधिभौतिक केंद्र कहते है।
आधिभौतिक केंद्र और आध्यात्मिक केंद्र इन दोनो को सहयोग देनेवाला है सेरेबेल्लम।निर्माणात्मक भावनाओ के लिये पिनियल ग्लांड्स को उत्तेजित करना होता है।
इसके लिये कूटस्थ स्थित तीसरी आँख को उत्तेजित करना आवश्यक होता है और इस प्रक्रिय के लिय क्रियायोग की और गायत्री मंत्र की जारूरत होती है।
इन योग पद्धतियों द्वारा तीसरी आँख को खोलने से मानसिक और भौतिक शरीर आरोग्यवंत और उत्साह भरित होते है। मेलटोनियम नामक एक रसायन की जरूरत होती है ।
अच्छी नींद के लिये, इस मेलटोनियम रसायन की तीस मिनट तक सत्क्रियता काफी है अच्छी नींद के लिये! मेलटोनियम रसायन का आयोजन करता है पिनियल ग्लांड्स!
पिनियल ग्लांड्स सूखने की वजह से हमको गेहरी नींद नही आती है और इसिलिये अविश्रांति रहती है। बाकि नीचे के चक्रो को कूटस्थस्थित आज्ञाचक्र पिट्युटरी ग्लांड्स द्वारा अपना आदेश भेजता है !
आज्ञाचक्र के इन संदेशों को एक्सोक्रिन और एन्डोक्रिन ग्लांड्स स्वीकर करते है। एक्सोक्रिन ग्लांड्स पाचनक्रिया सम्बंधित कार्यक्रम को सहयोग करता है। एनडोक्रिन ग्लांड्स नलिकारहित है।
ये हार्मोनों को रक्त मे सीधा छोड देता है। रक्त इस हार्मोनों को लिवर, फेफडो इत्यादि अंगों मे ले जाता है। ये हार्मोन विभिन्न कोशिकाओ(सेल्स) द्वारा कार्बोहैड्रेट, प्रोटीन को बढाना या घटाना कर देते है।
नया प्रोटीन बनाने मे ये हार्मोन सेल्स को सहायता करते है ताकि ये सेल्स नये सेल्स बना सके साथ ही एनडोक्रिन ग्लांड्स को नियंत्रित करके अपना अपना काम निभाने मे भी सहायता करते है ये हार्मोन।
क्रमशः
20/04/2024, 4:51 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग....27
नाभी के पिछे मेरुदंदड मे होता है मणिपुरचक्र, इसमे अड्रेनल ग्लांड होती है। अनाहतचक्र हृदय के पिछे मेरुदंड मे होता है, इसमे थैमस ग्लांड होता है। गले मे थायरायिड् ग्लांड होती है।
इस थॉयरायिड ग्लांड को सूचनाए आज्ञाचक्र से मिलती है। योग करना बहुत आवश्यक इसलिये भी है कि आज्ञा चक्र से सूचनाए बाकी नीचे के चक्रों को अच्छी तरह से मिलती रहे! ऐसा होने से ही तंदुरुस्ती बनी रहेगी।
प्रातःकाल सूर्य उदय से पूर्व उठना प्राणायाम करना, दंतधावन, स्नान इत्यादि कार्यक्रम पूरा करने के पश्चात सूर्यनमस्कार करने ओर सात्विक आहार से मूलाधारचक्र और उसके संबधित अंग अच्छी तरह काम करेगे!
कोई भी पदार्थ अग्नि के संपर्क में आने के 15 घण्टे ही सात्विक रहता है। फिर तामसिक होना शुरू हो जाता । तामसिक भोजन जड़ता लाता। मेहनत ओर स्तय के मार्ग से कमा के खाने से ओर शुद्ध जल पीने से।
स्वाधिस्ठानचक्र और उसके संबधित अंग अच्छी तरह काम करेगे । जल तांबे के लोटे में सेवन करें। प्रकृतिक सौंदर्य का आस्वादन करने से मणिपुरचक्र और उससे संबधित अंग अच्छी तरह काम करेगे।
शास्त्रीय और मथुर संगीत सुनने से, ॐ शब्द को सुनने का प्रयत्न करने से विशुद्धचक्र और उससे संबधित अंग अच्छी तरह काम करेगे। पवित्र ॐ शब्द को ध्यान लगाकर सुनने से कुंडलिनी जागृत होती है!
ह्रदय के पिछे मेरुदंड मे अनाहतचक्र है, इसमे थैमस ग्लांड है। इस थैमस ग्लांड को अच्छी तरह काम करने के लिये योग की आवश्यकता है, इससे हमारे शरीर का रक्तप्रसारण अच्छा हो जाएगा ।
तब सभी सेल्स को प्राणवायु मिलेगी,जिससे सिंपथटिक और पारा सिंपथटिक नसे अच्छी तरह मिल-जुलके काम करेगी मश्तिष्क मे तीन प्रकार के न्यूरो हार्मोंस होते हैवात, पित्त ,कफकी उत्पत्ती का कारण ये ही न्यूरो हार्मोंस है।
अच्छे आरोग्य के लिये वात, पित्त और श्लेष्मों(कफ) को संतुलित करना जरूरी है। इसके लिये इम्यून सिस्टम यानि प्रतिरक्षा प्रणाली का शक्तिवंत होना आवश्यक है और इसके लिये सेल्सो(कोशिकाओ) मे मिठोखोंड्रिया की वृद्धि रखना जरूरी है।
मिठोखोंड्रिया एक शक्तिमान जेनेरेटर की तरह होता है जो की सेल्सो (कोशिकाओ) मे रहता है। अगर श्वास पद्धति ठीक नही है तो राक्त के अंदर के कारबन को निकालने और फेफडों मे प्राणवायु को भरने मे रुकावट आती है।
फेफडों का कार्य है एक सेकंड मे 15 बार रक्त को प्राण वायु देके शुद्धि करना। इसी को पल्स रेट कहते है।सो साल पहले प्रकृति मे 35 फिसदी प्राणवायु थी परंतु अब पेडो की कटाई, प्राकृतिक दोहन, अति उद्योगीकरण।
की वजह से 19 फिसदी प्राणवायु रह गई है। यानि 16 फिसदी कम हो गई है। प्रत्येक जीव के लिए प्राणवायु की अत्यंत आवश्यक है जिससे वह आरोग्यवंत दिर्घायु पा सके। तो प्रश्न यह उठता है कि अब क्या करे?
पहला उत्तर है हम लोग उपर बताए गए अमर्यादित एवम असंतुलित कर्मो को तुरंत रोके और दुसरा उत्तर है योग, क्योंकि योगी ही सहन कर सकते है ।प्रकृती मे प्राणवायु के इस कमी पन को अपने प्राणायाम पद्धतियों द्वारा।
अब हम इस दुर स्थिती मे पहुंचे चुके है कि जापान जैसे पारिश्रामिक देशों मे प्राणवायु भी होटलो के किसी सेलूनों मे 15 मिनिटों के लिए इतना-इतना धन दे कर खरीद रहे है।
माईक्रोवेव टावर्स से जो रेडियो तरंगे निकलती है उन की वजह से प्रकृति सिद्ध पक्षियों का भी नाश हो रहा, साधक अपनी पल्स रेट बाह्य कुंभक प्राणायाम पद्धतियों द्वारा बढा सकता है!
हम प्राणायाम पद्धतियों द्वारा ऑटोनॉमस नरवस सिस्टेम को नियंत्रित कर सकते है और व्याधिनिरोधक शक्ति को बढा सकते है। ॐ शब्द को सुनने से अपने हानि हुए यानि व्याधिग्रस्त अंगों को पुनः आरोग्यपूरित कर सकते है।
अपनी कुंडलिनी शक्ति को बढा के साधक निरोगी, प्रसन्न, शांत और संतुष्ट रहता है। योगी को अपने समस्त प्रश्नो के उत्तर समाधि की स्थिति मे मिल जाते है।
समाधि मे उत्तर कैसे मिलते है? यह प्रश्न तर्क के पार है, इसके लिए साधक को समाधि की स्थिती मे पहुँच कर स्वयं अनुभव करना होगा, इसी को सहजबोध कहते है।
क्रमशः
21/04/2024, 7:21 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग....28
सहजबोध को मेघा बुद्धि ( तर्क-वितर्क) के साथ नही जोडना चाहिए क्योंकि मेधा का अवलोकन कभी सही और कभी गलत हो सकता है। मगर सहजबोध का अवलोकन सर्वदा सही ही होंगा।
प्रत्येक व्यक्ति को कार्य शक्ति प्राप्त करने के लिए चालीस हजार प्रोटींस की आवश्यकता होती है। नित्य सुबह-शाम क्रियायोग कर हम इन प्रोटींस मे वृद्धि कर सकते है एवम वृद्धावस्था और व्याधियों का भी निवारण कर सकते है।
फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दो इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलन ही वृद्धावस्था और व्याधियों का प्रमुख कारण है। जेनेस ही व्याधिग्रस्थ कोशिकाओ(सेल्सो) को आरोग्यवंत करा सकते है।
हम क्रियायोग द्वारा इन जेनेस को जो आवश्यक प्रेरणा है वह देकर फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दा इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलित को दूर कर सकते है।शरीर के भीतर की प्रत्येक कोशिका उस आदमी का प्रतिरूप होती है।
हर जीवित कोशिका मे जेने विध्यमान रहता है।जेने का अंदर क्रोमोजोम होते है और इन क्रोमोजोम के अंदर डी.एन.ए होते है! जीवित सेल के अंदर डी.एन.ए मालिक्यूल अति मुख्य साझेदारी रखता है।
प्रोटीन, जेने और ऐंजाईम्स का उत्पादन करने मे प्रत्येक कोशिका शक्तिशाली होती है।हम जेने से वंशपरंपराणुगत गुण निर्धारित कर सकते है। हार्मोंस इस जेनेस को आवश्यक उत्प्रेरणा देते है ।
जिसकी वजह से यह जेनेस आरोग्यता बनाए रखते है हजारों जेनेस मे से शास्त्रज्ञो ने व्याधिकारक जेनेस को पहचाना है। यदि हम नियम से चक्रों मे ध्यान, क्रियायोग इत्यादि करे तो जो 40 से 50 हजार प्रोटींस है ।
वह अपने-अपने शरीरिक स्वास्थ्य के लिये स्वयं ही तैयारी कर सकते है जिससे हम समस्त जीवन सुख और शांति से आराम से रह सकते है। इंद्रियों मे ज्यादा लालच या चंचलता होने पर हम ।
जीवकणो का सुधारस न पी सकते है और न ही अनुभव कर सकते है।हर एक जीवकण मे डियोक्सी अडेनिलिक, गुआनिलिक, रिबोसी, सिटेडिलिक, थैमिडिलिक और फास्फारिक नाम के छः अम्ल और मिठापन होता है!
साधक खेचरी मुद्रा मेंॐ का ध्यान करते हुवे सहस्रार चक्र मे पहुंच कर स्थिर हो जाता है तब ये मिठा-सा अमृत जैसे सोमरस का आस्वादन अवश्य मिलता है। पहले कारण शरीर मे फिर सूक्ष्मशरीर मे स्थूल शरीर मे प्रवेश करता है।
कुण्डलिनी शक्ति को व्यष्टि मे कुंडलिनी और समिष्ठि मे माया कहते हैकुंडलिनी शक्ती चर(चलनेवाली चीजो मे) और अचर (नही चलनेवाली चीजों मे) प्रपंच मे उपस्थित है।सृष्टि, स्थिति और लय कारक है यह कुंडलिनी शक्ति।
प्रत्येक प्राण कण मे प्राणशक्ति उपस्तिथ रहती है।यह प्राणशक्ति जेनेस के रूप मे होती है, ये जेने क्रोमोजोम मे उपस्थित रहते है।जेनेस वंशानुगत गुणों के वाहक होते है। जेनेस मे डी.एन.ए मालिक्यूल्स रहते है।
ये डी.एन.ए मालिक्यूल्स बहुत ही मुख्य एवम आवश्यक होते है, इन डी.एन.ए मालिक्यूल्स मे छः अम्ल होते।अगर हम इन छः अम्लों को संतुलित कर पाए तो हम वृद्धावस्था और व्याधियों का निवारण कर सकते है।
इस संसार मे प्रत्येक व्यक्ति का जेनेस 99.9 फिसदी मिलता-जुलता है । बाकी 0.01 फिसदी की भिन्नता से ही एक व्यक्ति और दुसरे व्यक्ती के रंग, गुण और प्रकृती मे परख होती है।
विस्तार इतना है कई बार कलम स्वयं बढ़ती जाती हमे वापस लौटना पड़ता । यह विषय पेढ की शाखाओं की तरह है और आगे से आगे अंनत विस्तृत है न लोटे तो मुख्य विषय ही छूट जाता।
इडा नाडी गंगा, पिंगला नाडी यमुना और शुषुम्ना नाडी सरस्वती नदी है। ये तीनों सूक्ष्म नाडिया जब कूटस्थ यानि आज्ञाचक्र मे मिल जाती है तब इसी मिलन को गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का त्रिवेणीसंग़म कहते है।
अधिक साधना से प्राणशक्ति कूटस्थ से आगे बढकर केवल शुषुम्ना नाडी द्वारा ही सहस्रारचक्र मे पहुंचती है, इडा और पिंगला नाडियाँ केवल कूटस्थ तक ही शुषुम्ना के साथ रहती है।
स्वास अंदर खींचने और कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भरने को पूरक कहते है, कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भर के थोडा देर रखने को यानि कुंम्भक करने को अंतः कुंभक कहते है बाहर निकालने को रेचक कहते है ।
प्राणशक्ति को बाहर थोडी देर रोकने को बाह्य कुंभक कहते है। पूरक करके प्राणशक्ति को कूटस्थ मे अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार रोककर फिर इस प्राणशक्ति को रेचक करके मूलाधारचक्र द्वारा छोडने से विद्युत अयस्कांत शक्ति का उत्पादन होता है!
स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग ..29
इडा, पिंगला, शुषुम्ना नाडियों को और प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पांच प्राणशक्तियों को परमात्मा को समर्पित करने को ही अभिषेक कहते है।
अंतःकरण को पूर्णरुप से परमात्मा को समर्पित करने को ही दीपप्रज्वलित करना कहते है। मूलाधार, स्वाधिस्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा इन छः चक्रों को परमात्मा को समर्पित करने को ही साधना कहते है।
अपनी समस्त अभिलाषाओ को परमात्मा को समर्पित करने को ही नैवेद्य चढाना कहते है। इसी को ईश्वर प्रणिधान अथवा परिपूर्ण समर्पण कहते ,क्रूरता, द्वेषभाव और चोरी की प्रवृत्ति जैसे दुर्गुण मूलाधारचक्र मे रहते है।
संदेहात्मकस्थिति वाले दुर्गुण स्वाधिस्ठान मे रहते ,दुसरो को नीचा दिखाना स्वयं के उच्चता के लिये कुछ भी करने की भावना जैसे दुर्गुण मणिपूरचक्र मे होते है। आवेशपूर्ण मन और मै सबसे अधिक हू जैसे दुर्गुण अनाहतचक्र मे।
लालच और वाचालता दुर्गुण विशुद्ध मे होते है। गर्व और जल्दबाजी दुर्गुण आज्ञाचक्र मे होते है। चक्रों मे ध्यान करके इन समस्त दुर्गुणों से साधक मुक्त हो सकता है।
एक यक्ष प्रश्न है-‘किमाश्चर्यं मतः परम’ अर्थात् सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? हम अपने आपको नहीं जानते यही सबसे बड़ा आश्चर्य है। हजारों वर्षों से आदमी के सामने प्रश्न है - कोऽहम् मैं कौन हूं।
’‘मैं कौन हूं’ इस प्रश्न के अन्वेषण में आदमी ने अपने अस्तित्व की कई परतें उघाड़ी। उसे प्रतीत हुआ-मेरा यह शरीर मैं नहीं है, मेरी इन्द्रियां, मेरी बुद्धि मैं नहीं है। एक बिन्दु आया, एक अन्तिम ठहराव आया।
साधक के अनुभव में, वह अनुभव था, ‘सोऽहम’ ‘मैं हूं’ मेरे सिवाय अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। अध्यात्म की यात्रा कोऽहम्’ से प्रारम्भ हुई एवं ‘सोऽहम्’ पर सम्पूर्ण हुई। अनन्तकाल से बेटा खोज रहा है ।
अपने परम पिता को और परमपिता बेटे के हृदय में बैठा
बैठा मुस्करा रहा है तथा कह रहा है-यह रहा मैं। आज मूल प्रश्न है-आदमी का जीवन कैसे बदले ? आदमी को परम शान्ति एवं परमानंद की प्राप्ति कैसे हो ?
स्वयं को बदलने के लिए अध्यात्मिक यात्रा परमावश्यक है। आध्यात्मिक साधना का अर्थ है-भीतर की यात्रा। आध्यात्म का अर्थ है-आत्मा के भीतर। आत्मा के बाहर-बाहर हम यात्रा कर रहे हैं।
भीतर जाने का समय नहीं मिला। हम मानते हैं दुनिया में जो कुछ सार है वह बाहर ही है भीतर कुछ भी नहीं। वास्तविकता यह है कि जो भीतर की यात्रा कर लेता है उसे बाहर का सत्य, असत्य प्रतिभासित होने लगता है।
जैसे दिन भर का थका हुआ पक्षी अपने घोंसले में आकर विश्राम करता है वैसे ही बहिर्मुखी प्रवृत्तियों से त्रस्त कहीं विश्राम ले सके; कहीं शान्ति का अनुभव कर सके वह स्थान-केवल अध्यात्म, केवल भीतर का प्रवेश।
साधना करते-करते अनुभव की चिन्गारियां उछलती है, अनुभव के स्फुलिंग बिखरते हैं, तब आदमी यह घोषणा करता है। बाहर निस्सार है, भीतर सार है। हमने भीतर को खोया-सब असार हाथ लगा।
हमने भीतर को पाया-सब सार ही सार प्रतीत हुआ समाधान यही मिलता है कि वैराग्य भाव प्रारब्ध कर्मजन्य है तो फिर बचता है अभ्यास।अभ्यास हर व्यक्ति, जो रूचि रखता है, कर सकता है। अभ्यास का अर्थ है-पुरुषार्थ।
पुरुषार्थ का अर्थ है-वर्तमान में जीना। महावीर ने कहा है-‘खणं जाणिए पंडिए’-साधक तुम क्षण हो जानो’ क्षण को जानना ही पुरुषार्थ है। हम या तो भूतकाल में जीते हैं या फिर भविष्य में। वर्तमान में जीना हमें नहीं आता।
वर्तमान में जीने का अर्थ है-पुरुषार्थ करना, अभ्यास करना। अभ्यास के लिए हमारे पास तीन आधार हैं ।
1. शरीर
2. वाणी अर्थात् शब्द
3. मन।
साधक को सर्व प्रथम शरीर को जानना एवं साधना बहुत जरूरी है। शरीर बहुत बड़ा यंत्र है। विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री भी इसके समक्ष छोटी पड़ती है। पूरे शरीर में 60 खरब न्यूरोन, सेल हैं जो स्वायतशासी हैं।
प्रत्येक सेल 11 जिम्मेदारियों का निर्वहन करता हैबिजली बनाता है, अपने क्षेत्र में बिजली सप्लाई करता है, ज्ञानग्राही तन्तुओं से सूचना प्राप्त करता है, ज्ञानग्राही तंतुओं से सूचना मस्तिष्क एवं शरीर में फैलाता है।
क्रियावाही तंतुओं को कार्य के लिए सूचित करता है। एक सेल, एक अदना सा सेल 1 लाख तक सूचनाएं संग्रहीत कर सकता है। मस्तिष्क में 1 खरब सेल एक साथ सक्रिय हैं। लाखों-करोड़ों स्मृतियों के प्रकोण हैं।
लाखों-करोड़ों आवेशों के प्रकोष्ठ हैं सबकी स्वचालित व्यवस्था है। पूरे ज्ञान तंतुओं की लम्बाई 1 लाख मील है जबकि पूरी पृथ्वी का क्षेत्रफल 25 हजार वर्ग मील है।
सामान्यतया हम हमारी क्षमता का मात्र 5 प्रतिशत प्रयोग करते हैं। कुछ लोग इससे भी कम प्रयोग कर पाते हैं। बड़े
बड़े महापुरुषों ने अपनी क्षमता का मात्र 12 प्रतिशत प्रयोग किया है।
विश्व का पूरा उद्योग तंत्र, राजतंत्र एवं समाज तंत्र इस शरीर तंत्र के समक्ष बहुत छोटा है। इसीलिए ‘पिण्डे सो ब्रह्माण्डे’ कहा गया है। पहला कार्य है-शरीर तंत्र की विराटता को समझे।
दूसरा कार्य है- शरीर को निवृत्त करना और प्रवृत्त करना।
प्रवृत्त करने में आसन, प्राणायाम, स्वांस की क्रियाएं, बैठने की सारी मुद्राएं आ जाती है। शरीर को निवृत्त करने का अर्थ है ।
शरीर को सारी क्रियाओं से मुक्त कर हल्का बना देना मानो कि शरीर है ही नहीं। शरीर को साधने के लिए अभ्यास जरूरी है। यदि एक आसन में हम एक घंटा भी नहीं बैठ पाते हैं, तो साधना करना बिल्कुल संभव नहीं है।
अभ्यास में साधना क्रम ही तो है। साधना के लिए शरीर को साधना बहुत जरूरी है। गोरखनाथ जी महाराज कहते हैं:- आसन दृढ़ आहार दृढ़ जे निद्रा दृढ़ होय। गोरख कहे सुनो रे पूता, मरे न बूढ़ा होय।।
दृढ़ आसन, दृढ़ आहार एवं दृढ़ निद्रा-साधना की पूर्व शर्तें हैं। बैठने का आसन दृढ़ होना चाहिए। भले ही वह सुखासन ही हो। तीन आसन साधना के लिए उपयोगी एवं व्यवहार्य है।
सुखासन, पद्मासन और सिद्धासन। इनमें से जो भी आसन आपको सुगम लगे, आरामदायक लगे उसे ही अपनाना चाहिए। आसन वहीं स्वीकार्य है जिसमें बैठकर आप तकलीफ महसूस न करें।
आसन तीनों में से जो चाहे अपना लें पर एक घंटा की लगातार बैठक का अभ्यास होना जरूरी है। एक घंटा की लगातार बैठक आप बिना किसी कष्ट के कर लेते हैं, इतना अभ्यास परम आवश्यक है।
शरीर को साधने के लिए दूसरी आवश्यकता है-संयमित आहार की। आयुर्वेद में अच्छे स्वास्थ्य के लिए तीन शर्तें बताई है आहार की
1. हितभुक्
2. मितभुक
3. ऋतुभुक।
वही खाया जाए तो शरीर के अनुकूल हो। शरीर की अपनी अपनी प्रकृति है।अनुसंधान कर जान लें कि मेरे शरीर को कौन-कौन सी खाद्य सामग्री अनुकूल पड़ती है।
जो अनुकूल खाद्य सामग्री है उसी का प्रयोग किया जाए।
बीच-बीच में उपवास भी किए जाए। अधिक आहार से मल संचित होते हैं। जिसके शरीर में मल संचित होते हैं, उसका नाड़ी संस्थान शुद्ध नहीं रहता और मन भी निर्मल नहीं रहता।
आगर आप प्रकोष्ठ बद्धता के शिकार हैं। ज्ञान और क्रिया, इन दोनों की अभिव्यक्ति का माध्यम नाड़ी संस्थान है।मलों के संचित होने पर ज्ञान और क्रिया दोनों में अवरोध पैदा हो जाता है।
फेफड़ों व आंतों को राहत देने के लिए भूख से कम भोजन उपादेयी होता है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर उपवास, मित भोजन और रस परित्याग सुझाए गए हैं।
ऋतुभुक का अर्थ है - खरी कमाई (कमाई) की रोटी खाई जाए। कुटिल तरीकों से अर्जित खाद्यान का उपयोग न किया जाए। जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन।
शरीर साधना की तीसरी आवश्यकता है - नींद पर काबू। नींद पर नियंत्रण का अर्थ यह नहीं है कि नींद ही न ली जाए। जितनी देर साधना क्रम अपनाया जाए, हम पूर्ण जागरूक रहें।
हमारा रोम रोम पूर्ण जाग्रत रहे। पूर्ण चैतन्य रहें। आप किसी जंगल से गुजर रहे हैं। उस निर्जन बीहड़ जंगल में आप छोटी सी आहट से ही चौंक जाते हैं उसके प्रति सजग हो जाते हो।
ऐसी ही चैतन्या जरूरी है। आसन दृढ़, दृढ़ आहार एवं दृढ़ निद्रा प्रारम्भिक तैयारी है। हमारा दूसरा आधार है - वाणी अर्थात् शब्द। शब्द की शक्ति असीमित है। गोरखनाथजी महाराज कहते हैं -
‘सबदहि ताला, सबदहि कूंची, सबदहि सबद जगाया।
सबदहि सबद सूं परचा हुआ, सबदहि सबद समाया।।’
ऐसी विराटता है शब्द की। यह शब्द क्या है ? यह शब्द है ॐ
(औंकार) सृष्टि की उत्पत्ति के समय बिग बैंग के रूप में ॐ शब्द का विस्फोट हुआ।
इसी ॐ महा शब्द के साथ अपने इष्ट का नाम जोड़कर हम किसी भी शब्द को अपनी साधना का आधार बना सकते हैं। नये साधक के लिए जप बहुत जरूरी है। हमारी वाणी शुद्धि के लिए जप बहुत जरूरी है।
ज्यों-ज्यों जप बढ़ता है, हमारे कायिक ब्रह्माण्ड में वह शब्द गूंजने लगता है। साधना के लिए तीसरा आधार है - मन। मन को नियंत्रित कैसे किया जाए ? मन को ‘अमन’ कैसे किया जाए?
अपने सूक्ष्म शरीर में मन एक प्रबल शक्ति है। इस मन के प्रसंग में गोरखनाथजी महाराज कहते है।
यह मन शक्ति, यह मन शिव।
यह मन पांच तत्व का जीव।
यह मन ले जे उन्मन रहे।
तो तीन लोक की बातां कहे।।
मन को ‘शिव’ बताया गया है, मन को शक्ति बताया गया है। यह मन ‘शक्ति’ रूप में हमें नचा रहा है, कठपुतलियों की भांति। यही मन ‘शिव’ बनकर हमें कल्याण का मार्ग दिखाता है।
यह मन जड़ है, पर चेतन से मिलाने का यही एक मात्र आधार है। जिसने इस मन को ‘अमन’ कर दिया, वह सर्वज्ञ हो गया। बाबाजी महाराज ने मन के सम्बन्ध में बड़ी मार्मिक उक्ति कही है:-
मन की चाल चरित घणी, मन ही ज्ञान-अज्ञान।
श्रद्धा’ मन को उलट दे, धरि उनमनि ध्यान।
यह उन्मनि ध्यान क्या है ? मन है - अज्ञान है, मन नहीं है-ज्ञान है। ‘उन्मनि ध्यान’ से तात्पर्य है-मन के अस्तित्व को समाप्त करना। मन के द्वारा मन को मारना।
क्रमशः
23/04/2024, 10:36 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ....30
श्वास की गति मनोदशा से बंधी है। जैसा मन होता, वैसी हो जाती श्वास की गति। जैसी होती अंतर स्थिति, श्वास के आंदोलन और तरंगें, वाइब्रेशंस, फ्रीक्वेंसीज बदल जाती हैं।
श्वास की फ्रीक्वेंसी, श्वास की तरंगों का आघात खबर देता है, कि मन की दशा कैसी है। अभी तो मेडिकल साइंस उसकी फिक्र नहीं कर पाई, क्योंकि अभी मेडिकल साइंस शरीर के पार नहीं हो पाई है।
इसलिए अभी प्राण पर उसकी पहचान नहीं हो पाई किँतु जैसे मेडिकल साइंस ब्लडप्रेशर को, खून के दबाव को नापती है। जब तक पता नहीं था, तब तक कोई खून के दबाव का सवाल नहीं था।
रक्तचाप, रक्त का परिभ्रमण भी नई खोज है। तीन सौ साल पहले आधुनिक विज्ञान को पता नहीं था कि शरीर में खून चलता है। खून के चलने का पता तीन सौ साल पहले ही लग पाया।
और जब खून के चलने का पता लगा, तो यह भी पता लगा धीरे-धीरे कि खून का जो प्रेशर है, वह व्यक्ति के स्वास्थ्य के गहरे अंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए ब्लड प्रेशर चिकित्सक के लिए नापने की खास चीज हो गई।
लेकिन जैसे ब्लडप्रेशर है, वैसा ब्रेथप्रेशर भी है। वैसे वायु का अधिक दबाव और कम दबाव, वायु की गति और तरंगों का आघात-भेद, व्यक्ति की अंतर मनोदशा को परिवर्तित करता ओर उसकी जीवन-ऊर्जा से संबंधित है।
उदाहरण के लिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी श्वास की गति बदल जाती है। वैसी ही नहीं रह जाती, जैसी साधारण होती है। इसका मतलब यह भी कि अगर आप श्वास की गति पर काबू पा लें।
तो आप फिर क्रोध पर काबू पा सकते हैं। अगर श्वास की गति न बदलने दें, तो क्रोध आना मुश्किल हो जाएगा।इसलिए जापान में बच्चों को घरों में प्राणयोग का ही एक सूत्र सिखाते हैं।
माता- पिता बच्चों को परंपरा से यह सिखाते हैं कि जब क्रोध आए, तब तुम श्वास को आहिस्ता लो, धीमे-धीमे लो। गहरी लो और धीमे लो। स्लोली एंड डीप, धीमे और गहरी।
बच्चों को वे यह नहीं कहते कि क्रोध मत करो, जैसा कि सारी दुनिया कहती है। क्रोध न करना, हाथ की बात नहीं है। और मजा तो यह है कि जो पिता बच्चे को कह रहा है, क्रोध मत करो।
अगर बच्चा न माने तो स्वयं ही क्रोध करके बता देता है कि ''नहीं मानता! इतना कहा कि क्रोध मत कर!'' वह भूल ही जाता है कि अब हम खुद ही वही कर रहे हैं, जो हम उसको मना किए थे।
क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है।
कुछ अंतर नहीं पड़ता है! योग का पुराना सूत्र, बुद्ध के द्वारा जापान में पहुंचा। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया। कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता।
इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया। क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है।
आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता।
बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो जाती है। जब कामवासना मन को पकड़ती है, श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है ,रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और टूट-फूट जाती है।
प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।
प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ बाहर जगत को छूती है।
और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस।
वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है। जो लोग भी ध्यान का कभी थोड़ा अनुभव किए हैं, उनको पता है। जो गहरा प्रयोग करते हैं।
वे कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि श्वास बंद हो गई, चलती ही नहीं! तो हम बहुत घबड़ा जाते हैं कि इससे कुछ खतरा तो न हो जाएगा। घबराने की जरा भी जरूरत नहीं है। घबराएं तब, जब श्वास बहुत जोर से चले।
जब बिलकुल लगे कि ठहर गई, जब लगे कि श्वास का कंपन ही नहीं है, तब आप उस बैलेंस को, उस संतुलन को उपलब्ध होते हैं। तब ऊपर की श्वास ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है।
बाहर की बाहर और भीतर की भीतर रह जाती है। और एक क्षण के लिए ठहराव आ जाता है। सब ठहर जाता है। न तो बाहर की श्वास भीतर जाती, न भीतर की श्वास बाहर आती।
न ऊपर की श्वास ऊपर जाती, न नीचे की श्वास नीचे जाती। सब ठहर जाता है।श्वास के इस ठहराव के क्षण में परम अनुभव की किरण उत्पन्न होती है। श्वास के इस पूरे ठहर जाने में अस्तित्व पूरा संतुलित हो जाता है।
फिर कोई आंदोलन नहीं। फिर कोई परिवर्तन नहीं। फिर कोई हेर-फेर नहीं, बदलाहट नहीं, कोई गति नहीं। उस क्षण में आदमी परमगति में उतर जाता है या शाश्वत में डूब जाता है या इटरनल, सनातन से संपर्क साध लेता है।
श्वास का आंदोलन हमारा परिवर्तनशील जगत से संबंध है। श्वास का आंदोलनरहित हो जाना, अपरिवर्तनशील नित्य जगत से संबंधित हो जाना है। इसलिए श्वास का यह ठहर जाना बड़ी अदभुत अनुभूति है।
कोशिश करके ठहराने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि कोशिश करके कभी नहीं ठहरा सकते। अगर आप कोशिश करके ठहराएंगे, तो भीतर की श्वास बाहर जाना चाहेगी, बाहर की श्वास भीतर जाना चाहेगी।
कोशिश करके कोई व्यक्ति श्वास को रोक नहीं सकता। हां, श्वास को आहिस्ता-आहिस्ता प्रशिक्षित किया जा सकता है, रिदमिक किया जा सकता है, तैयार किया जा सकता है लयबद्धता के लिए।
और अगर कोई प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान में गहरा उतरता चला जाए, तो एक क्षण ऐसा आ जाता है कि प्रशिक्षित श्वास और ध्यान की शांत स्थिति का कभी मेल, टयूनिंग हो जाती, तो श्वास ठहर जाती है।
और भी एक आश्चर्य की बात कि जब श्वास ठहरती है, तब तत्काल विचार ठहर जाते हैं। बिना श्वास के विचार नहीं चल सकते। इसे जरा देखें, कभी ऐसे ही एक सेकेंड को श्वास को ठहराकर।
इधर श्वास ठहरी, भीतर विचार ठहरे, एकदम ब्रेक! श्वास बिलकुल ब्रेक का काम करती है विचार पर। लेकिन जब आप ठहराते हैं, तब ज्यादा देर नहीं ठहर सकती। श्वास भी निकलना चाहेगी और विचार भी हमला करना चाहेंगे।
क्षणभर को ही गैप आएगा। लेकिन जब श्वास, प्रशिक्षित श्वास ध्यान के संयोग से अपने आप ठहर जाती है, तो कभी-कभी घंटों ठहरी रहती है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसे बहुत मौके हैं।
कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि वह छः-छः दिन तक ऐसे पड़े रहते कि जैसे मर गए! प्रियजन घबरा जाते, मित्र घबरा जाते, कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा! सब ठहर जाता।
उस ठहरे हुए क्षण में, इन दैट स्टिल मोमेंट.. चेतना समय के बाहर चली जाती, कालातीत हो जाती। विचार के बाहर हुए, निर्विचार में गए, ब्रह्म के द्वार पर खड़े हैं। विचार में आए, विचार में पड़े, कि संसार के बीच आ गए हैं।
संसार और मोक्ष के बीच पतली-सी विचार की पर्त के अतिरिक्त कोई फासला नहीं है। पदार्थ और परमात्मा के बीच पतले, झीने विचार के पर्दे के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है। लेकिन यह विचार का पर्दा कैसे जाए?
दो तरह से जा सकता है। या तो कोई सीधा विचार पर प्रयोग करे ध्यान का, साक्षी-भाव का, तो विचार चला जाता है। जिस दिन विचार शून्य होता है, उसी दिन श्वास भी शांत होकर खड़ी रह जाती है।
या फिर कोई प्राणयोग का प्रयोग करे, श्वास का। श्वास को गति दे, व्यवस्था दे, प्रशिक्षण दे; और ऐसी जगह ले आए, जहां श्वास अपने आप ठहर जाती है–बाहर की बाहर, भीतर की भीतर, ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे।
और बीच में गैप, अंतराल आ जाता है; खाली, वैक्यूम हो जाता है, जहां श्वास नहीं होती। वहीं से छलांग, दि जंप। उसी अंतराल में छलांग लग जाती है परमसत्ता की ओर।
क्रमशः
24/04/2024, 7:12 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग ...31
आज कुण्डलिनी विषय पर लिखने से पहले कुछ सदस्यो की शंका या प्रश्न पर कुछ कहना चाहते। उनका कहना है कि ठीक कह रहे आप समझ भी आता पर जहाँ हम खड़े आगे कैसे बढे हमें इसका लाभ कैसे मिल सकता ?
बात उनकी ठीक है और हम बताते भी रहते कमेंट के माध्यम से ओर यहाँ भी कह रहे कि शुरुवात प्राणायाम, योग,ध्यान से होगी। शक्ति तलवार में होती किँतु उसे चलाने का कौशल और बाजुओं में बल चाइये।
ऊपर से ध्यान अर्थात होशपूर्वक रहना तभी कोई योद्धा सफल होता। उदहारण के लिए विज्ञान भैरव तँत्र की ध्यान विधि 13 में भगवान शिव माँ पार्वती से कहते है कि।
अपने पूरे अवधान को अपने मेरुदंड के मध्य में कमल- तंतु सी कोमल स्नायु में स्थित करो और इसमे रूपांतरित हो जाओ।
अब यहाँ समझने की बात है कि शिव माँ से दो पंक्ति का सूत्र बताते कारण यह है कि माँ सब जानती है कैसे करना बस नही पता था तो सूत्र ,की क्या करना। सूत्र से ही मार्ग मिल जाता ओर अनुभव से माँ जान लेती।
अब नवसाधक समझे कि सूत्र में शिव विषय देते माँ को कि रीढ़ के मध्य एक कोमल स्नायु है उसपर केंद्रित हो जाओ तब अनुभव होगा। इस मे अनुसासन, योग, ध्यान सबकी जरुरत होगी।
माँ सक्षम है वो रीढ़ सीधा रख बेठ सकती। विषय पर केंद्रित हो सकती उन्हें विचार प्रभावित नही करते वो एकाग्रता से होशपूर्वक देख सकती क्योकि सब तरह के अभ्यास कर शक्षम हो चुकी।
जो साधक शक्षम होते उन्हें मात्र सूत्र मदद करते नवसाधक को कोई प्रयोग करने से पहले आसन दृढ़ करना होगा ताकि वो रीढ़ सीधा रख बैठ सके। ध्यान से पहले विषय पर एकाग्र होना सीखना होगा ताकि विचार प्रभावित नही करे।
निर्विचारिता की स्तिथि पर ही ध्यान लगता यह स्तिथि से पहले विचार को समझना होगा कहने का अर्थ यह है जब हम बैठने लगते तो यह प्राणायाम, योग, हमे समर्थ प्रदान कर रहा कि आने वाले समय हम प्रयोग कर सके।
उन प्रयोगों से कुण्डलिनी जागरण शुरू होगा और अनुभव मिलने शुरू होते न कि कोई आप को बैठना ही सिखाये ओर आप यह समझे कि एक घण्टा बैठा आज तो जरूर चक्र जागृत हुआ होगा।
इस तरह के विचार निराशा लाते । इस मे धैर्य से बढ़ना होता। और भी बहुत सी बातें होती जो बताएंगे समय पर अब शिव सूत्र पर बात करते। ध्यान की इस विधि के लिए तुम्हें अपनी आंखे बंद कर लेनी चाहिए ।
और अपने मेरुदंड को, अपनी रीढ़ की हड्डी को देखने का भाव करना चाहिए। अच्छा हो कि किसी शरीर शास्त्र की पुस्तक में शरीर की संरचना को देखो-समझ लो। तब आंखे बंद करो और मेरुदंड पर अवधान लगाओ।
उसे भीतर की आँखो से देखो और ठीक उसके मध्य से जाते हुए कमल तंतु जैसे कोमल स्नायु का भाव करो। ''और इसमे रूपांतरित हो जाओ।'' अगर संभव हो तो इस मेरुदंड पर अवधान को एकाग्र करो ।
और तब भीतर से, मध्य से जाते हुए कमल तंतु जैसे स्नायु पर एकाग्र होओ। और यही एकाग्रता तुम्हें तुम्हारे केंद्र पर आरूढ़ कर देगी।
क्योंकि मेरुदंड तुम्हारी समूची शरीर-संरचना का आधार है। सब कुछ उससे संयुक्त है, जुड़ा हुआ है। सच तो यह है कि तुम्हारा मस्तिष्क इसी मेरुदंड का एक छोर है। शरीर शास्त्री कहते है कि मस्तिष्क मेरुदंड का ही विस्तार है।
तुम्हारा मस्तिष्क मेरुदंड का विकास है । और तुम्हारी रीढ़ तुम्हारे सारे शरीर से संबंधित है... सब कुछ उससे संबंधित है। यही कारण है कि उसे रीढ़ आधार कहते है। इस रीढ़ के अंदर एक तंतु जैसा है।
लेकिन शरीर शास्त्री इसके संबंध में कुछ नहीं कह सकते क्योंकि यह भौतिक नहीं है। इस मेरुदंड के ठीक मध्य में एक रजत-रज्जु है, कोमल नाजुक स्नायु है। शारीरिक अर्थ में वह स्नायु भी नहीं है ।
क्योंकि तुम उसे काट-पीट कर नहीं निकाल सकते। वह वहां नहीं मिलेगा। लेकिन वह है, वह अपदार्थ है, अवस्तु है और गहरे ध्यान में वह देखा जाता है। वास्तव में,वह पदार्थ नहीं, ऊर्जा है ।
और यथार्थत: तुम्हारे मेरुदंड की वही ऊर्जा-रज्जु तुम्हारा जीवन है। उसके द्वारा ही तुम अदृश्य अस्तित्व के साथ संबंधित हो। वही दृश्य और अदृश्य के बीच सेतु है। उस तंतु के द्वारा ही तुम अपने शरीर से संबंधित हो।
और उस तंतु के द्वारा ही तुम आत्मा से संबंधित हो। तो पहले मेरुदंड की कल्पना करो, उसे मन की आंखों से देखो। और तुम्हें अद्भुत अनुभव होगा। अगर तुम मेरुदंड का मनोदर्शन करने की कोशिश करोगे।
तो यह दर्शन बिलकुल संभव है। और अगर तुम निरंतर चेष्टा में लगे रहे, तो कल्पना में ही नहीं, यथार्थ में भी तुम अपने शरीर और आत्मा से संबंधित हो जाओगे । एक साधक को इस विधि का प्रयोग करवाया गया ।
उसे शरीर-संस्थान का चित्र देखने को दिया गया। ताकि वह उसके जरिए अपने भीतर के मेरुदंड को मन की आंखों से देखने में समर्थ हो सके। उसने प्रयोग शुरू किया और सप्ताह भर के अंदर आकर उसने कहा।
''आश्चर्य की बात है कि मैने आपके दिए चित्र को देखने की कोशिश की, लेकिन अनेक बार वह चित्र मेरी आंखों के सामने से गायब हुआ एक दूसरा मेरुदंड मुझे दिखाई दिया। यह मेरुदंड चित्र वाले मेरुदंड जैसा नहीं था।
''वह साधक सही रास्ते पर था। उसे बताया गया कि अब चित्र को बिलकुल भूल जाओ। और उस मेरुदंड का चित्र बनाओ जो उसे दृश्य हुआ है।हम भीतर शरीर संस्थान को देख सकते है पर इसको देखने की कोशिश नहीं करते।
क्योंकि वह दृश्य डरावना है, वीभत्स है। जब तुम्हें तुम्हारे रक्त मांस और अस्थिपंजर दिखाई पड़ेंगे तो तुम भयभीत हो जाओगे। इसलिए हमने अपने मन को भीतर देखने से बिलकुल रोक रखा है।
वास्तव में, हम भी अपने शरीर को उसी तरह बाहर से देखते है जैसे दूसरे लोग देखते है। तुम तो सिर्फ बाहर से अपने शरीर को इस तरह देखते हो जिस तरह कोई दूसरा आदमी उसे देखता हो।
भीतर से तुमने अपने शरीर को नहीं देखा है। योग को शरीर की बुनियादी और महत्वपूर्ण चीजों के विषय में सब कुछ मालूम रहा है। लेकिन योग चीर फाड़ नहीं करता सच तो यह है कि शरीर को देखने जानने का एक दूसरा ही रास्ता उसे अंदर से देखना है।
तुम भीतर एकाग्र हो सको तो तुम अचानक अंदरूनी शरीर ,उसके भीतर रेखा चित्र को देखने लगोगे। योग इन सारी स्नायुओं को सभी केंद्रों को, शरीर के पूरी आंतरिक संस्थान को जान गया जो आज विज्ञान की खोज है।
लेकिन विज्ञान यह समझने में असमर्थ है कि योग को इनका पता कैसे चला। यह विधि उन लोगो के लिए उपयोगी है जो शरीर से जुडे है। अगर तुम भौतिकवादी हो, अगर तुम सोचते हो ।
कि तुम शरीर के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो, तो यह विधि तुम्हारे बहुत काम की होगी। अगर तुम चार्वाक या मार्क्स के मानने वाले हो, अगर तुम मानते हो कि मनुष्य शरीर के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम्हें यह विधि बहुत सहयोगी होगी।
तुम जाओ और मनुष्य के अस्थि संस्थान को देखो।तंत्र या योग की पुरानी परंपराओं में वे अनेक तरह की हड्डियों का उपयोग करते थे। अभी भी तांत्रिक अपने पास कोई न कोई हड्डी या खोपड़ी रखता है।
दरअसल वह भीतर से एकाग्रता साधने का उपाय हैपहले वह उस खोपड़ी पर एकाग्रता साधता है। फिर आंखें बंद करता है। और अपनी खोपड़ी का ध्यान करता है। वह बाहर की खोपड़ी की कल्पना भीतर करता जाता है ।
और इस तरह धीरे-धीर अपनी खोपड़ी की प्रतीति उसे होने लगती है। उसकी चेतना केंद्रित होने लगती है। वह बाहरी खोपड़ी उसका मनोदर्शन, उस पर ध्यान, सब उपाय है ।
और अगर तुम एक बार अपने भीतर केंद्रीभूत हो गए तो तुम अपने अंगूठे से सिर तक यात्रा कर सकते हो। तुम भीतर चलो, वहां एक बड़ा ब्रह्मांड है। तुम्हारा छोटा शरीर एक बड़ा ब्रह्मांड है।
यह सूत्र मेरुदंड का उपयोग करता है, क्योंकि मेरुदंड के भीतर ही जीवन रज्जु छिपा है। यही कारण है कि सीधी रीढ़ पर इतना जोर दिया जाता है।
क्रमशः
25/04/2024, 10:53 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ...32
यह सूत्र मेरुदंड का उपयोग करता है, क्योंकि मेरुदंड के भीतर ही जीवन रज्जु छिपा है। यही कारण है कि सीधी रीढ़ पर इतना जोर दिया जाता है। क्योंकि अगर रीढ़ सीधी न रही तो तुम भीतरी रज्जु को नहीं देख पाओगे।
वह बहुत नाजुक है। बहुत सूक्ष्म है। वह ऊर्जा का प्रवाह है। इसलिए अगर तुम्हारी रीढ़ सीधी है, बिलकुल सीधी, तभी तुम्हें उस सूक्ष्म जीवन रज्जु की झलक मिल सकती है। लेकिन हमारे मेरुदंड सीधे नहीं है।
गुरुकुल में बचपन से ही मेरुदंड को सीधा रखने का उपाय करते है। उनके बैठने, उठने चलने सोने तक के ढंग सीधी रीढ़ पर आधारित थे। और अगर रीढ़ सीधी नहीं है तो उसके भीतर तत्वों को देखना बहुत कठिन बहुत होगा।
क्योंकि वह नाजुक है, सूक्ष्म है, अपौदगलिक है, शक्ति है। इसलिए जब मेरुदंड बिलकुल सीधा होता है तो वह रज्जुवत शक्ति देखने में आती है। और अगर तुम इस रज्जु पर एकाग्र हुए।
तुमने उसकी अनुभूति और उपलब्धि की, तब तुम एक नए प्रकाश से भर जाओगे। वह प्रकाश तुम्हारे मेरुदंड से आता है जो तुम्हारे पूरे शरीर पर फैल जाएगा। वह शरीर के पार भी चला जाएगा।
और जब प्रकाश शरीर के पार जाता है तब प्रभामंडल दिखाई देते है। हरेक आदमी का प्रभामंडल है। लेकिन साधारणत: तुम्हारे प्रभामंडल छाया की तरह है। जिनमे प्रकाश नहीं होता।
तुम्हारे चारों और काली छाया की तरह फैले होते है। और वे प्रभामंडल तुम्हारे हर मनोभाव को अभिव्यक्त करते है। जब तुम क्रोध में होते हो तो तुम्हारा प्रभामंडल रक्त रंजित जैसा हो जाता है।
उसमे क्रोध लाल रंग में अभिव्यक्त होता है। जब तुम उदास, बुझे-बुझे हतप्रभ होते हो तो तुम्हारा प्रभामंडल काले तंतुओं से भरा होता है। मानों तुम मृत्यु के निकट हो ..सब मृत और बोझिल।
और जब यह मेरुदंड के भीतर का तंतु उपलब्ध होता है तब तुम्हारा प्रभामंडल सचमुच में प्रभा मंडित होता है।इस लिए श्रीराम , श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर आदि के लिए प्रभामंडल चित्रित किए जाते है।
जब तुम भीतर तुम बुद्धत्व को प्राप्त होते हो, तो बाहर तुम्हारा सारा शरीर प्रकाश, प्रकाश शरीर हो उठता है।तब तुम्हारा मेरुदंड प्रकाश विकिरणित करने लगता है। और तब उसकी प्रभा बाहर भी फैलने लगती है।
इसलिए किसी बुद्ध पुरूष के लिए किसी से यह पूछना जरूरी नहीं है कि तुम क्या हो क्योंकि तुम्हारा प्रभामंडल सब बता देता है। और जब कोई शिष्य बुद्धत्व प्राप्त करता है तो उसका प्रभामंडल सब प्रकट कर देता है।
आपके शब्दो से कोई पहचान लेता आपकी अवस्था एक महापंडित ने लिखा-''मन एक दर्पण है, जिस पर धूल जम जाती है; धूल को साफ कर दो। तो सत्य अनुभव में आ जाता है और बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है।
यही तो सब शास्त्रों का ,वेदों का सार था। परन्तु एक पूर्ण प्रभामंडल, ब्रह्मज्ञानी ने लिखा ''न कोई मन है,न कोई दर्पण,फिर धूल कहां जमेगी ? जो यह जान गया वह धर्म को उपलब्ध हो गया ।
वास्तव में, जब मेरुदंड का यह तंतु देख लिया जाता तब तुम्हारे चारों और एक प्रभामंडल बढ़ने लगता है। इसमें रूपांतरित हो जाओ ,उस प्रकाश से भर जाओ और रूपांतरित हो जाओ।
यह भी केंद्रित होना है, मेरुदंड में केंद्रित होना। अगर तुम शरीर वादी .कल्पनाशील हो तो यह तुम्हारे काम आयेगी। अगर नहीं तो यह कठिन है। तब भीतर से शरीर को देखना कठिन होगा।
लेकिन जो कोई भी आँख बंद कर अंदर शरीर को देख सकता है, उसके लिए यह विधि बहुत सहयोगी है। पहले अपने मेरुदंड को देखो, फिर उसके बीच से जाती हुई रजत-रज्जु को। पहले तो वह कल्पना ही होगी।
लेकिन धीरे-धीरे तुम पाओगे कि कल्पना विलीन हो गई है और जिस क्षण तुम आंतरिक तत्व को देखोगें तुम्हें तुम्हारे भीतर प्रकाश का विस्फोट अनुभव होगा। पहले तो वह रज्जु में सर्प अथार्त रस्सी में साँप का भ्रम अथवा सीप में रजत की भांति कल्पित माना जा सकता है।
परन्तु कभी-कभी यह घटना प्रयास के बिना भी घटती है।कई बार ऐसा हुआ है कि किसी दृश्य कारण के बिना ही कमरे की मेज पर से अचानक चीजें उछल कर नीचे गिर गई है।
बिजली की तरंगें छूटती है। और उसके कई प्रभाव और परिमाण हो सकते है। चीजें अचानक गिर सकती है ,हिल सकती है ,टूट सकती है। ऐसे प्रकाश के फोटो भी लिए गए है।
लेकिन यह प्रकाश सदा मेरुदंड के इर्द-गिर्द इकट्ठा होता है। भक्ति कहती है कि अध्यात्म के जिस जादू को आप खोज रहे हैं, उसे आप कहीं पढ़ नहीं सकते। देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते।
उसे तो केवल अनुभव किया जा सकता है… शब्दों में उसे वर्णित करना भी उसके साथ अन्याय होता है।किताबों में दर्ज ज्ञान व्यर्थ नहीं, लेकिन वो सिर्फ एक दिशा मापक है जो आपको उस ओर इंगित करता है जहां आपको जाना है, चलना तो खुद ही पड़ेगा।
वास्तव में, यात्रा का आनंद तभी ले सकोगे जब यात्रा पर निकलोगे, केवल किताबों में किसी स्थान के सुन्दर चित्र को देखने को आप यात्रा नहीं कह सकते । सृष्टि में जो कुछ है।
सबको हमारे ऋषि मुनियों ने शब्दों में वर्णित किया है; जिसे पढ़कर कोई भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। लेकिन भक्ति के प्रेम और समर्पण के साथ बहुत सी बातें हैं जो इतनी रहस्यपूर्ण हैं कि शब्दों में नहीं उतर सकता।
बल्कि कुछ विशेष तरंगों को शब्द देना उन तरंगों को विकृत कर सकता है। किसी विशेष स्थान पर ,विशेष समय में दो चेतनाओं का मिलना उन तरंगों को उत्पन्न करता है जिसे हम शिव और शक्ति का मिलना कहते हैं।
और उस समय ऊर्जा का वह वर्तुल पूरा होता है जहां कोई कायनाती घटना घटित होती है।आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता। और इस घटना के लिए ये कतई आवश्यक नहीं कि ये आत्मिक मिलन दैहिक भी हो।
केवल उन चेतनाओं को उस समय सृष्टि की छत के नीचे प्रेमपूर्ण हो जाना ही काफी होता है। प्रेम ही जीवन की पूर्णता है। प्रेम हृदय का अनुराग और करुणा है। प्रेम हृदय को सरल बनाने की विधि है।
जीवन के ऊबड़-खाबड़ पथ का अंतिम किनारा प्रेम है।भक्ति के प्रेम और समर्पण के साथ जब ज्ञान होता है ।तब भक्ति मोक्ष का हाथ थामे आसमान की ओर बढ़ जाती है और धीरे धीरे एक प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो जाती है ।
पुराणों में भगवान विष्णु के मत्स्यावतार का वर्णण है यथार्थ में मत्स्यावतार जलपरी/जलमानव अथवा ऊर्ध्वरेता निचले छोर के चक्रों को समाप्त करना और चेतना की शुद्ध, उत्क्रांति का प्रारम्भ है
महासाधना का आवश्यक चरण है साधक/साधिका का जलपरी बनना। ऊर्जा को उच्च चक्रों में स्थानांतरित
करना...यही है प्रेम का प्रारंभ..। ऊर्ध्वरेता बनना अर्थात् जीवन को, ओज को अपने उद्गम स्थल ललाट में लाना।
जहाँ से वह मूलाधार तक आया था, योग विद्या का काम है। कुण्डलिनी साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को प्रज्ज्वलित कर ऊर्जा को पकाया जाता है।
और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है, तब फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरु दण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है। साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचाता है।
शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहस्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऊर्ध्वरेता का गहरा आध्यात्मिक मिलन ईड़ा और पिंगला का मिलन है ..सुष्म्ना की अवस्था है
आंखें बंद कर लो ;विश्राम में उतर जाओ और मेरूदंड पर चित एकाग्र करो। और यह सूत्र बहुत सरल ढंग से कहता है:''इसमें रूपांतरित हो जाओगे।
क्रमशः
26/04/2024, 7:55 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग...33
दो आँख, दो कान, दो नाभि छिद्र, एक मुख इस प्रकार सिर में सात द्वार हुये आठवाँ गुद्दा द्वार और नौवाँ मूत्र द्वार सात द्वार देवताओं के ठहरने का स्थान है। इस पर रहने वाले समस्त देवता परस्पर एक दूसरे की भलाई के लिये अपने-अपने स्थान पर हर समय सतर्क व जागरुक हैं।
अग्निदेव, नेत्र और जठराग्नि के रूप में; पवनदेव श्वाँस-प्रश्वाँस व दस प्राणों के रूप में; वरुण देव जिह्वा और रक्त आदि के रूप में रहते हैं। इसी प्रकार अन्य देव भी शरीर के भिन्न-2 स्थानों में निवास करते है।
चैतन्य आत्मा और परमात्मा का यही निवास स्थान है। ये समस्त देव इस शरीर में सद्भाव और सहयोग से प्रीति पूर्वक रहते हैं सबके काम बंटे हुये हैं सब अपने कार्यों को सम्पादन करने में सभी सचेष्ट एवं दक्ष हैं।
नौ द्वार अर्थात नौ चक्र प्रकृति के है। तीन द्वार अधोमुखी तथा छह ऊर्ध्वमुखी हैं।भौतिक मृत्यु के समय हमारे कर्मों के फल के अनुसार ,किसी एक द्वार से हमारे प्राण निकलते हैं।
दशम द्वार जिसे शून्य चक्र भी कहते हैं; परमात्मा का स्थान है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं ।मरणो परान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी द्वार से होकर निकले और ऊर्ध्वगामी गति प्राप्त करे।
योगशास्त्रों के अनुसार ब्रह्मसत्ता का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। हमारे शरीर मे कुल 114 चक्र में से 7 मुख्य चक्र, 21 मध्यम चक्र और 86 सूक्ष्म चक्र है। इनमें से दो चक्र हमारे शरीर से बाहर रहते हैं।
मुख्य 7 चक्र में से एक सहस्रार चक्र शरीर से बाहर होता हैं।मध्यम 21चक्र आंखें, नाक, कान,कन्धा, हाथ, घुटना ,पैर आदि में होते है। शरीर मे 108 चक्र कार्यशील रहते हैं बाकी चार निष्क्रिय रहते है।
कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो इन चार में शक्ति का संचार हो उठता है। आठ चक्र अष्ट प्रकृति के प्रतीक है जैसे ;-
1 पृथ्वी
2 जल
3 अग्नि
4 वायु
5 आकाश
6 मन
7 बुद्धि
8 अहंकार का प्रतीक है।
आज्ञाचक्र में ऊर्जा के तीन स्तर है ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना या त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश की ऊर्जा।पहला तीन गुणों का प्रतीक है दूसरा उच्चतर शक्ति का प्रतीक है और तीसरी जो तीनो गुणों से परे जाती है।
मेरुदण्ड पोला है। उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ एक छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है । इसी के भीतर अदृश्य रूप से सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान है । ओर इसी में पाँच मुख्य चक्र हैं ।
परन्तु छठे आज्ञा चक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता। यह दोनों भवों के बीच होता है। यह मन का प्रतीक माना जाता। पहले हम आज्ञाचक्र के बारे विस्तार से समझते ।
भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है। बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है।
सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है।
हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है।
साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते।
आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवनचर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है ।और इस प्रकार लगाया गया है।
कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे। मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं।
जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दिखता है। मक्खी आदि शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उछले तो उसे वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है।
अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है। कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है।
आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है।खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले।
घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है । इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है।
प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं। चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं।
उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी सिर उठाती है कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है।
मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता है।
किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 के लगभग बनते हैं। इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं। टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है।
वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दीखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं ।
उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई। मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है।
दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है।मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह।
इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है।
क्रमशः
27/04/2024, 10:02 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....34
मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं।
न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है। प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है।
प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है।
अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है।
मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं। वे समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं।
जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है। मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है ।
जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है। पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है।इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं।
और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है। वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है ।
और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है।
इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधार भूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है।
कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैंइसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है।
इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं। यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है।
इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है। मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी क्षेत्र से सम्बन्धित है।
शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं।
चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है, उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं।
उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए और अपनी दक्षता तथा क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे।
पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है।
मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है।
इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है।
जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 7 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम आने के लिए पर्याप्त समझा है।
और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है। यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो ।
न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है। सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया ।
जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी।
इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है।
ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है।
फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी।पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है।
आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना।
संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं।
मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं।
क्रमशः
28/04/2024, 9:13 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....35
चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय, उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है।
यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है। ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं।
तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए।
बाई डाँगों अफ्रीका के गाँव मबाई तथा फ्राँस के ‘केन्ड्री’ स्थान में एक प्रकार का वृक्ष पाया जाता है। जो वनस्पति विज्ञान के सभी नियमों का उल्लंघन कर एक ऐसा अपवाद बन गया है ।
जिसका हल कोई भी वनस्पति शास्त्री आज तक खोज नहीं पाया। इस वृक्ष की जड़ें एक ऐसी कील या चूल की तरह होती है जिसमें रखकर किसी यन्त्र को चारों ओर घुमाया जा सके ।
कभी-कभी तूफान आते हैं तो प्रदेश के छोटे-बड़े हजारों पेड़-पौधे धराशायी हो जाते हैं किन्तु तूफान जब इस पेड़ के समीप से गुजरता है । तो वृक्ष चूल नुमा जड़ के सहारे चक्कर काटने लगता है जैसे कोई लट्टू नाचता है ।
कितनी देर तूफान-वृक्ष नाचता रहेगा, तूफान खतम-और नाच बन्द-पौधा अपनी विकास यात्रा प्रारम्भ कर देताजड़ें अपना काम शुरू कर देती है । वृक्ष लोगों के लिये आजतक आश्चर्य का विषय बना हुआ है ।
मनुष्य देह में भी बहुत कुछ ऐसा है जिसके बारे में हम नहीं जानते पर वह इतना आश्चर्यजनक अद्वितीय क्षमताओं से परिपूर्ण है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक उस जैसी मशीन आज तक बना नहीं पाये ।
अपनी विचार शक्ति को केन्द्रित कर भारतीय योगियों ने जब इस शरीर-गहर में प्रवेश कर उसका आद्योपान्त भ्रमण किया तो पाया कि जिसे हम शरीर कहते हैं। वह तो विराट् ब्रह्मांड है सात लोक और उन्हें धारण करने वाला विराट् आकाश इसी में छिपा बैठा है ।
बड़ी-बड़ी निहारिकाओं से लेकर आकाश गंगा और सौर मण्डल तक अपने-अपने ग्रह उपग्रह लिये इसमें चक्कर काट रहे है । मनुष्य शरीर दिखाई न दिया होता यदि इसमें पार्थिव कण विद्यमान न होते ।
स्थूल कणों की उपस्थिति स्वरूप अन्नमय कोश या प्रोटोप्लाज्मा की ईंटों से चुनाव की हुई इस बिल्डिंग में स्थूल भाग दृश्य है । इसलिये यह नहीं मान लेना चाहिए कि शरीर केवल मात्र एक स्थूल पिण्ड है ।
वरन् इसमें सूक्ष्म इतना है। कि सारा आकाश ही अपने सम्पूर्ण घटकों के साथ छिपा बैठा है । इस सूक्ष्म शरीर को न जानने के कारण ही मनुष्य शारीरिक इन्द्रिय लिप्सा और भौतिक सुखों के आकर्षण में पड़ा जिन्दगी के दिन गँवाया करता है ।
एक दिन मृत्यु आती है और इस ईश्वर-प्रदत्त महान् सौभाग्य को नष्ट करके चली जाती है । मृत्यु के भय और अमरत्व की इच्छा ने भारतीय आचार्यों को विचार की एक नई दिशा दी-उन्होंने खोज की-स्थूल शरीरं किम् ?
पन्चीकृत पन्च महाभूतः कृतं सर्त्कमजन्य सुख-दुःखादि भोगायतनं शरीरम् ।
अस्ति जायते, वर्धते, विपरिणामते, अपक्षीयते विनश्यतीति षड्विकारवदेतत्स्थूल शरीरम् ॥
(श्री शंकराचार्य कृत तत्वबोध)
अर्थात् -स्थूल शरीर किसे कहते हैं ? विश्लेषण से पाया गया कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पाँचों महाभूतों से किया गया कर्मों के द्वारा उत्पन्न। सुख-दुःख आदि के भोगने का प्रधान आश्रय, नाश होने वाला।
उत्पत्ति, वृद्धि, घटना, बढ़ना, ढीला पड़ना और नाश हो जाने वाला इन छः विकारों से युक्त यह शरीर है । इसमें अति सूक्ष्म आकाश है अर्थात् आकाश-तत्व से शरीर की रचना प्रारम्भ होती है ।
आकाश तत्व दो भागों में बँटकर रहता है आधा तो वह अपने ज्यों के त्यों स्वरूप में रहता है शेष आधे को वायु भाग में मिला देता इस सम्मिश्रित भाग का आधा भाग अग्नि तत्व से मिलकर प्राण के रूप में व्यक्त होता है ।
इस तेज का आधा भाग जल से मिलकर तरल भाग रक्त आदि का निर्माण करता है इसी जल वाले आधे भाग से पृथ्वी तत्व अर्थात् स्थूल शरीर का निर्माण होता है ।
इस दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि भारी भरकम और स्थूल दिखाई देने वाले शरीर में सर्वाधिक अंश आकाश है जिसके बारे में आज को विज्ञान कुछ भी नहीं जानता ।
और भारतीय योगियों ने उस सम्बन्ध में इतना अधिक जाना कि इसी शरीर में मूल चेतना-ब्रह्म को प्राप्त कर लिया-अमरत्व प्राप्त कर लिया । वेद में कहा गया है-
यस्मिन भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्पस्मित्र ध्याहिता । यत्राग्निश्रन्द्रमाः सूयों वातस्तिष्ठ न्त्यार्पिताः ॥ यस्य त्रय स्त्रिंशद्देव अंगे सर्वे समाहिताः ॥ -अर्थवेद 101711213
अर्थात्-भूमि अन्तरिक्ष और द्युलोक इसी शरीर में हो है जिसमें अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य और वायु रहते हैं तैंतीस देवता भी इसी शरीर में रहते हैं ।
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानाँ पूरयोध्या । अस्याँ हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्याँतिषावृतः ।
तस्मिन हिरण्यये कोशे अरे त्रिप्रतिष्ठिते । तस्मिन यद्यक्षमात्मन्वत् तद्वै ब्रहृविदो विदुः । -अथर्व 1012131-32
अर्थात्- यह देह देवताओं की पुरी अयोध्या है इसमें व चक्र है, नौ द्वार है सुनहरे कोशों से आच्छादित हृदय कमल है जो तेज से घिरे स्वर्ग के समान है । इस कोश में ही आत्मा विराजमान है उसे ब्रह्मज्ञानी ही जानते हैं ।
भारतीय दर्शन और जीवन पद्धति में स्थूलता को कम महत्व दिया गया और देव भाग को अधिक यह यहाँ की सर्वोपरि वानवादिता थी । अब शरीर-विद्या विशारद भी इन मान्यताओं पर उतरने लगे है ।
कि वस्तुतः शरीर का सारा संचालन अधिकाँश इन देव शक्तियों-ग्रहों-उपग्रहों या सूक्ष्म आकाश भाग से ही होता है ।“ओकाल्ट एनाटामी एण्ड दि बाइबिल” पुस्तक में डॉ. कोराहन हेलिन ने-कोलम्बिया विश्व-विद्यालय के डॉ. लुहस वर्मन के निबन्ध-व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रन्थियाँ (ग्लैण्ड्स रेगुलेटिग पर्सनालिटी) के हवाले से बताया है ।
कि मनुष्य के शरीर में कुछ ऐसी ग्रन्थियाँ है जो देखने में छोटी होती है पर उनका महत्व असाधारण है । पाचन क्रिया से लेकर मनोवेगों तक का सारा नियन्त्रण इन ग्रन्थियों से ही होता है इन्हें वाहिनी हीन (डक्ट लेस) ग्रन्थियाँ (ग्लैण्ड्स) कहा जाता है।
अंतःस्रावी हारमोन्स इन ग्रंथियों से ही स्रवित होकर शारीरिक उतार चढ़ाव, घटना, बढ़ना, बुढ़ापा, मृत्यु आदि का कारण बनते हैं । एनाटामी मेडिकल कालेज कर्नेल विश्व-विद्यालय के प्रोफेसर डॉ. चार्ल्स आर स्टार्क यार्ड ने इन ग्रन्थियों के आधार पर मनुष्य जीवन की एक नई धारणा प्रस्तुत है जो भारतीय आध्यात्मिक शोधों से शत-प्रतिशत मेल खाती है ।
षट्चक्रों की भारतीय खोज और जीव-शासित द्वारा वर्णित सात ग्रन्थियों के क्रिया विज्ञान में कि साम्य है इस मे आश्चर्य के जिन बातों को विज्ञान ने अत्यन्त कुशल मशीनों द्वारा भारतीयों ने योग-साधनाओं द्वारा उससे भी अधिक तरह प्राप्त कर लिया ।
डॉ. स्टाकर्ड लिखते हैं कि आँतरिक स्राव वाली ग्रन्थियाँ तक महान् शासक के रूप में धारण से लेकर मृत्यु तक स्त्रियों पुरुषों तथा समस्त रीड़ की हड्डी वाले जीवों तक का नियन्त्रण करती है।
क्रमशः
29/04/2024, 9:02 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....36
डॉ स्टाकर्ड लिखते हैं कि आँतरिक स्राव वाली ग्रन्थियाँ तक महान् शासक के रूप में धारण से लेकर मृत्यु तक स्त्रियों पुरुषों तथा समस्त रीड़ की हड्डी वाले जीवों तक का नियन्त्रण करती है।
“फिजियोलॉजी” तथा सोशलाजी की मान्यतायें भी अब “अन्राकश” के अस्तित्व और उसके प्रचंड प्रभाव को स्वीकार करने लगे है । “ग्लैण्ड्स आफ डेस्टिनी” के लेखक डॉ. ईबो गैकी काव ने तो यहाँ तक मान लिया।
कि अन्नस्रावी (इन्डोक्राइन ग्लैण्ड्स) ग्रन्थियों पर नियन्त्रण रखने वाले लोगों ने ही इतिहास पर अधिकार रखा है । और जर्मन को कहाँ से कहाँ बदल दिया है । नैपोलियन बोनापार्ट के उदाहरण देते हुये उन्होंने लिखा।
कि यदि वाटरलू के युद्ध के समय नैपोलियन बोनापार्ट की “पिचुट्री ग्लैण्ड” (पीयूष ग्रन्थि) में खराबी नहीं आ जाती तो वह हारता नहीं जो नैपोलियन अत्यन्त दूरदर्शी निर्णय भी तुरन्त ले लेने की क्षमता रखता था।
उसकी विवेक बुद्धि बुरी तरह लड़-खड़ा गई । जिस समय वह एल्ब में निर्वासित था, उस समय उसकी लेगर्ड ग्रन्थि लड़खड़ा गई । यह सारी बातें तब प्रकाश में आई जब सेंट हेलेना में उसके शव की अन्त्य परीक्षा की गई ।
जब तक उसने इन ग्रन्थियों पर नियन्त्रण रखा, जब तक उसकी अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ सशक्त रहीं नैपोलियन सारी दुनिया को जीतता रहा पर जैसे ही वह इन शक्तियों से वंचित हुआ वह नष्ट ही हो गया ।
योग साधनायें इन देव-शक्तियों के विकास का ही वैज्ञानिक उपक्रम है । आने वाले दिनों में जबकि अंतःस्रावी ग्रन्थियों के पदार्थ (मैटर) की खोज होगी और उसकी तुलना ग्रहों के पदार्थ से ही जायेगी ।
तो लोग आश्चर्य करेंगे कि मनुष्य शरीर में आकाश तत्व किस विलक्षणता के साथ उपस्थित है । और कितने आश्चर्यजनक ढंग से मनुष्य को अपनी इच्छा से बाँधें हुए है ।
“ओकाल्ट एनाटामी एण्ड दि बाइबिल” पुस्तक के वैज्ञानिक लेखक ने उस तरह का तुलनात्मक अध्ययन, जिस तरह “कुण्डलिनी तन्त्र” में भारतीय योगियों ने किया है ।
वैसा तो नहीं किया पर उसने माना है कि इन ग्रन्थियों का सम्बन्ध निश्चित रूप से नक्षत्रों (स्टार्स) से है । उन्होंने इन्हे अर्न्तनक्षत्र” (इन्टीरियर स्टार्स) लिखा है और बताया है कि सूर्य और हरिग्रह पीनियल ग्लैण्ड से सम्बन्ध रखते हैं।
इसे तृतीय नेत्र ग्रन्थि भी कहा जाता है उससे भू-मध्य में “आज्ञा-चक्र” का ही स्पष्ट प्रमाण मिलता है आज्ञा-चक्र जागृत करने वाला “ऊँ” ध्वनि सुन सकता है । सब तरफ की दूरवर्ती घटनायें देख सुन सकता है ।
यह सूर्य शक्ति का प्रभाव है । वरुण और चन्द्र का सम्बन्ध ‘पिचुट्री ग्रन्थि’ से है । चन्द्रमा के उतार चढ़ाव से मन पर उतार चढ़ाव होता है यह इन दोनों तत्वों की एकता का प्रमाण है।
बृहस्पति उपवृक्क (एड्रिलन) पर, प्रजनन ग्रन्थि (गोनाड्स) पर मंगल बुद्ध का गल ग्रन्थि (थायराइड्स) सूर्य का पैरा थायराइड्स (उपगल ग्रन्थि) से सम्बन्ध है।
इन ग्रहों के उतार चढ़ाव इन ग्रन्थियों को प्रभावित करते हैं । रामायण में कहा गया है कि- “उमादारु योषित की नाई, सबहिं नचावत राम गोसाईं”
हे गोरी ! जिस प्रकार डोरी उँगलियों में बाँधकर कलाकार कठपुतली को नचाता है परमात्मा उसी प्रकार सारी सृष्टि को । उसमें इसी तथ्य का प्रतिपादन है । मनुष्य इस आकाशीय प्रक्रिया से बँधा हुआ नाचता रहता है।
पर जो लोग अपने इस सूक्ष्म शरीर को विकसित करके अपनी चेतना का उत्तरोत्तर विकास कर विराट् पुरुष से जोड़े देते हैं वे इन ग्रन्थियों पर शरीर यन्त्र पर ही उसी तरह नियन्त्रण कर सकते हैं ।
जिस तरह कोई अत्यन्त सुदूरवर्ती केन्द्रस्थ विराट तारा समस्त ब्रह्मांड का नियंत्रण करता है ।आने वाली खोजें बतायेंगी कि सिद्ध योगी और ब्रह्मांड की-महाशक्ति में कोई अन्तर नहीं होता ।
पैरासेल्स ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है । कुछ समय पूर्व फ्राँस के क्लरमान्ट में ऐसी वर्षा हुई जिसे आज भी लोग लाल वर्षा या रक्त वर्षा के नाम से याद करते हैं । इस वर्षा में जो जल वर्षा वह लाल रक्त के समान था ।
वैज्ञानिक आज तक उसका रहस्योद्घाटन नहीं कर पाये कि उसका कारण क्या था, किसी का कहना था सहारा रेगिस्तान में लाल पत्थरों के महीन कण हवा में उड़ते हैं वह कण, भाप के साथ मिल गये होंगे-उसी से वर्षा हुई ।
इस निष्कर्ष से लोग संतुष्ट नहीं हुये तथापि पदार्थ विज्ञान के अनुसार कोई न कोई दूरवर्ती कारण तो है ही शारीरिक, बौद्धिक घटनायें और विलक्षणतायें जो समझ में नहीं आती वे भी ऐसी ही सूक्ष्म है ।
हमारे शरीर से प्रभावित होने पर भी समझा जा सकता हो । योग साधनाओं में मन को ही सूक्ष्म प्रखर और प्रकाश पूर्ण बनाया जाता है जिससे वह शरीर के अंग-प्रत्यंग का भेदन कर वहाँ की सूक्ष्म गतिविधियों का पता पा सके ।
शरीर में ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी विज्ञान के द्वारा जाना जा सका है । इन योग साधनाओं की वैज्ञानिक जाँच की जा सके तो मनुष्य जाति उन सूक्ष्म सत्यों से भी लाभान्वित हो सकती है ।
जिन्हें देववाद कहकर या भावनावाद कहकर ठुकरा दिया जाता है पर उनका महत्व इतना अधिक है मनुष्य का सारे का सारा जीवन ही इन्हीं के सहारे संचालित होता है ।
जिस तरह अफ्रीका पौधा अपवाद है मनुष्य का शरीर भी अपवाद और ईश्वरीय विलक्षणता से ओत-प्रोत है । इसमें ब्रह्मांड ही उतरा हुआ है । जो लोग इसे जान लेते हैं वह मुक्त हो जाते हैं, समर्थ हो जाते हैं ।
शरीर के नाश हो जाने पर भी उनका नाश नहीं होता । वे विराट् हो जाते हैं । बुद्धि का प्रतीक ललाट चक्र माथे के बीच स्थित होता है। ललाट पूरे माथे को कहा जाता ओर यह पीनियल ग्रन्थि और तन्त्रिका तन्त्र को नियन्त्रित करता है।
अहंकार का प्रतीक रोहिणी चक्र बिंदु चक्र के भीतर छुपा होता नवम द्वार जहाँ पर शून्य चक्र तक पहुंचने का सरलतम मार्ग हैं । बिंदु विसर्ग को संक्षेप में ‘बिंदु’ कहा जाता है। बिन्दु का अर्थ ‘बूँद’ है। विर्ग माने ‘गिरना’। इस प्रकार बिंदु विसर्ग का तात्पर्य ‘बूँद का गिरना’ हुआ।
उच्चस्तरीय साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं असाधारण कह सकते । संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है ।
ओर इसे सृष्टि का मूल माना गया है।तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है।शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है।
क्रमशः
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30/04/2024, 12:43 pm - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ....37
संपूर्ण मानव प्रगति काल के इतिहास में बिंदु की शक्ति अभी तक रहस्यात्मक ही बनी हुई है ओर इसे सृष्टि का मूल माना गया है। तंत्र में प्रत्येक बिन्दु शक्ति का केन्द्र है। यह शक्ति स्थायी चेतना के आधार की अभिव्यक्ति है।
शास्त्रों में बिन्दु को वह आदिस्रोत माना गया है। सिर के ऊपर खोपड़ी मे एक गडढा होता है। बच्चों मे यह स्पष्ट दिखाई देता है। गांव में इसे काग कहते हैं। योगी , तांत्रिक, सिद्ध महात्माओ के कपाल मे भी यह स्पष्ट रहता है।
साधारण मनुष्यों मे यह कडा हो जाता है। परन्तु आप इस पर ध्यान लगाकर इस बिन्दु को तलाश करेंगे तो स्पष्ट अनुभूत करेगा यहाँ से जो तरंग निकलती है वह आधा गोरी या महामाया है।
योगियों ने इसी सोम अर्थात चन्द्रमा से पम्प होने वाले मूल तत्त्व को सोमरस कहा है यह अमृत है इसी से जीवन है और जीवन की तमाम अनुभूतियां है। कपाल मे इस बिन्दू की सिद्धि से आयु की वृद्धि ।
सिद्धों को इच्छा मृत्यु व चेतना का तीव्र हो जाना,व्यापक होना सोहम की विलक्षण शक्ति श्वास ॐ का बिना प्राणायाम खुल जाना दृष्टि की शक्ति बढ जाना गम्भीर रोगों से छुटकारा आदि हो जाते है।
इसे प्राप्त करने के लिए साधक को तैयारी करनी पड़ती है। साधक को पहले उस बून्द के लिए रास्ता बनाना पड़ता है । अर्थात जब ये बून्द काग से नीचे की ओर गिरती है तो जो छिद्र हलक में जहाँ से श्वास नलिका प्रारंभ होती है वहाँ से श्लेष्म से बन्द हो जाता है ।
अतः साधक को पहले उसे खोलना आवश्यक होता उस के लिए साधक को पहले जल नेति, फिर रबर नेति बाद में सूत्र नेति से उस छिद्र को खोलना होता । नही तो अकसर वह छिद्र बन्द ही होता।
और ऊपर से गिरी अमृत की बूंद हलक में नही गिर पाती, चन्द्रमा ही उसको ग्रसित कर लेता । दूसरी बात जीभ को खेचरी मुद्रा में रखना होता । खेचरी मुद्रा बनाने के लिए साधक को जीभ लम्बी करनी होती ।
जीभ का दोहन करना होता , जैसे गाय या भैंस के दूध निकालने से पहले थन को खींचना होता वैसे ही जीभ को खींच कर लम्बा करने का अभ्यास करना होता फिर जीभ को नाक के अग्रभाग से लगाने की कोशिश करना होता ।
कुछ समय के अभ्यास से खेचरी मुद्रा लग जाती। अर्थात जीभ हलक में उस छिद्र तक पहुँच जाती । अगर किसी साधक की जीभ हलक में छिद्र तक नही जाती तो उस अमृत की बूंद को चन्द्रमा ग्रसित कर लेता ।
अतः साधक को कोई लाभ नही होता । साधक को लाभ तभी होता जब अमृत की बूंद जीभ पर गिरे । ऐसा गोरख कुण्डलिनी शास्त्र में भी लिखा है । जहाँ से सभी पदार्थों का प्रकटीकरण और जिसमें सभी का लय हो जाता है।
आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि सभी उसी की निष्पत्तियाँ है। ललाट चक्र और बिन्दु चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट नहीं होती है बल्कि आज्ञाचक्र में ही छिपी रहती है। इसीलिए आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणी कहते हैं।
आठवा चक्र तक प्रकृतिलय ही हैं। नवम द्वार ,बिन्दु चक्र आत्मा का स्थान हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव एवं शक्ति का नाम देते हैं। यह सृजन से पहले की अवस्था हैं,अर्थात ब्रह्मा की ऊर्जा।
शक्ति से मिलकर शिव आत्माराम हो जाते हैं अर्थात इड़ा और पिंगला का मिलन और सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवेश।दो चक्र हमारे शरीर से बाहर रहते हैं। सहस्रार चक्र ,जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं,तथा दूसरा हैं ,निर्वाण चक्र।
सहस्रार चक्र ,आत्मा का प्रतीक भौतिक शरीर से साढे 3 इंच ऊपर हजार पंखुड़ियों का कमल है ,और अद्वैत, निर्गुण,निराकार ब्रह्म: आसन हैं यह वास्तव में चक्र नहीं है बल्कि साक्षात तथा सम्पूर्ण परमात्मा और आत्मा है।
सहस्रार चक्र 6 सेंटीमीटर व्यास के एक अध खुले हुए कमल के फूल के समान होता है। ऊपर से देखने पर इस में कुल 972 पंखुड़ियां दिखाई देती है। इसमें नीचे 960 छोटी-छोटी पंखुड़ियां और उनके ऊपर मध्य में 12 सुनहरी पंखुड़ियां सुशोभित रहती हैं।
इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहते हैं। जो असीम आनन्द का केन्द्र होता है। इसमें इंद्रधनुष के सारे रंग दिखाई देते हैं लेकिन प्रमुख रंग बैंगनी होता है। इस चक्र में अ से क्ष तक की स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है।
पिट्यूट्री और पिनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इससे सम्बंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाई आंख को नियंत्रित करता है। यह आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, एकीकरण,स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केन्द्र है।
यह आत्मा का उच्चतम स्थान है। सहस्रार का सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है। पर फिर भी सूक्ष्म शरीर पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ वाले सभी सातों चक्रों को श्रृंखला में बाँधे हुए है।
सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह जुड़े हैं । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है ।
वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है । वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं । इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं।
उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों । इसलिए हजारों का उद्बोधक 'सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है।
यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं ।
क्रमशः
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01/05/2024, 9:22 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग .....38
यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं । सहस्रार चक्र के भीतर विद्यमान है निर्वाण चक्र जिसके भीतर निर्गुण, निराकार ब्रह्म: विराजमान है।
निर्वाण का सही अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है। सैद्धांतिक तौर पर निर्वाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो "न आ रहा है भाव, और न जा रहा है ।
विभाव और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, सामान्य मृत्यु में केवल हमारा स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। शेष छः शरीर बचे रहते हैं जिनसे जीवात्मा अपनी वासनानुसार अगला जन्म प्राप्त करती है ।
किंतु महामृत्यु में सभी छः शरीर नष्ट हो जाते हैं फ़िर पुनरागमन संभव नहीं होता। इसे ही मोक्ष,निर्वाण,कैवल्य कहा जाता है। मृत्यु के समय तक जिसका सहत्रार खुल गया फिर मोक्ष मिल जाती है।
स्थिरता, और शांति भी इसके अर्थ हैं। निर्वाण की प्राप्ति की तुलना अविद्या के अंत से की जाती है। जिससे उस मन:स्थिति की चेतना जागृत होती है जो जीवन चक्र से मुक्ति दिलाती है।
एक स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यक्ति निर्वाण को मानसिक चेतना की तरह अनुभव करता है। संसार मूलत: तृष्णा और अज्ञानता की उपज है। व्यक्ति बिना मृत्यु के भी निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है।
जब मृत्यु होती है, तो उस मृत्यु को मोक्ष कहते हैं।क्योंकि वह जीवन-मरण से छूट जाता है और उसका फिर से जन्म नहीं होता । पुराण कथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था।
भगवान् ने वामन रूप में उससे साढ़े तीन कदम भूमि की भीक्षा माँगी । बलि तैयार हो गये । तीन कदम में तीन लोक और आधे कदम में बलि का शरीर नाप कर विराट् ब्रह्म ने उस सबको अपना लिया।
हमारा शरीर साढ़े तीन हाथ लम्बा है । चक्रों के जागरण में यदि उसे लघु से महान्-अण्ड से विभु कर लिया जाय तो उसकी साढ़े तीन हाथ की लम्बाई लोक-लोकान्तरों तक विस्तृत हो सकती है ।
और उस उपलब्धि की याचना करने के लिए भगवान् वामन रूप धारण करके हमारे दरवाजे पर हाथ पसारे हुए उपस्थित हो सकते हैं । आज्ञा चक्र में एक दूसरी प्राणधारा पिछले मस्तिष्क को स्पष्ट करती हुई ।
मेरु-दण्ड में निकल जाती है। वही ब्रह्म नाड़ी का महा शक्ति नाद है। इड़ा और पिंगला की दो विद्युत धाराएँ इसी में प्रवाहित होती हैं। वे मूलाधार चक्र तक पहुँचती हैं और सुषुम्ना सम्मिलन के बाद वापस लौट आती है।
षट्चक्र इसी मेरुदण्ड में स्थित ब्रह्मनाड़ी महानन्द के अंतर्गत पड़ने वाले भँवर हैं। इनमें ही लोक लोकान्तरों से-अति मानवी शक्ति संस्थानों से-सम्बन्ध मिलाने वाली रहस्यमय कुञ्जियाँ सुरक्षित रखी हुई है।
षट्चक्रों में से जो जितने रत्न भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित करले वह उतना ही महान् बन सकता है। कुण्डलिनी शक्ति को भौतिक और आत्मिक शक्तियों का आदान प्रदान सम्पन्न करने वाली महत्त्व भूमिका कह सकते है।
उसका जागरण षट्चक्र वेधन के उपरान्त ही होता है चक्र वेधन के लिए प्राणतत्त्व पर आधिपत्य स्थापित करने वाले वेधक प्राणायामों का अभ्यास करना पड़ता है। जो प्राणायाम षट्चक्र वेधन में सहायता करते है।
उनसे सोऽहम् का प्राणयोग सर्वप्रथम और सर्वसुलभ है। पंचकोशों के अनावरण का क्रम भी चक्रवेधन स्तर का ही है। उसके लिए प्राण-प्रखरता बढ़ानी पड़ती है। यह प्रयोजन भी सोऽहम् साधना से ही पूरा होता है।
कहा जा चुका है कि सोऽहम् की भावना साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदण्ड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है।
सोऽहम् साधन के हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति संवर्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है-इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों प्रयोजन पूरे करती हैं।
शक्ति सम्पन्न, भावोत्कर्ष की उभय पक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्मिक हैं। उसे प्राप्त करने में सोऽहम् साधना कितनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र सूर्य स्वर, शरीर और मन की स्थिति में ऋण और धन विद्युत के आवेश घटाते-बढ़ाते रहते हैं।
इस स्थिति का सही ज्ञान रहने पर मनुष्य यह जान सकता है कि उसकी अन्तः क्षमता किस कार्य को कर सकने में समक्ष अथवा क्या करने में असमर्थ है।
क्रमशः
02/05/2024, 10:53 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....39
पृथ्वी की समस्त शक्तियों, विशेषताओं और विभूतियों के केन्द्र उसके सन्तुलन बिन्दु ..उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं। यहीं से वह सूत्र संचालन होता है, जिसके कारण यह धरती एक सजीव पिण्ड एवं अगणित जीव-धारियों की क्रीड़ा-स्थली बनी हुई है।
यदि ध्रुवों की स्थिति में किसी प्रकार आघात पहुंच जाय या परिवर्तन उपस्थित हो जाय तो फिर इस भू-मण्डल का स्वरूप बदल कर कुछ और ही तरह का हो जायेगा कारण स्पष्ट है .. दोनों ध्रुव ही तो उसकी क्रिया और चेतना के केन्द्र बिन्दु हैं।
जिस प्रकार पृथ्वी में चेतना एवं क्रिया उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों से प्राप्त होती है उसी प्रकार मानव पिण्ड देह के भी दो ही अति सूक्ष्म संस्थान हैं। उत्तरी ध्रुव है—ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क सहस्रार कमल और दक्षिणी ध्रुव है, कुण्डलिनी केन्द्र मूलाधार चक्र।
सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अंदर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में ‘‘महाविवर’’ नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुंज के रूप में अवस्थित है।
कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे ‘‘दशम द्वार’’ या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं। सहस्त्रार का वर्णन चक्र की तरह किया जाता है ।
जबकि सहस्त्रार एक अवस्था है जो की आज्ञा चक्र के उपर कुण्डलिनी शक्ति गति करती है उसके बाद यह अवस्था आता है | इस अवस्था में अति आनन्द की अनुभूति होती है जो वर्णन के परे है ।
क्योंकि इस अवस्था में मन भी आपका साथ छोड़ देता है और जब मन नहीं होगा तो उस अवस्था की सूचना कौन देगा। मस्तिष्क क्षेत्र अगणित रहस्यमय शक्तियों से भरा हुआ माना जाता है।
मस्तिष्क के सम्बन्ध में वर्तमान वैज्ञानिक मान्यताओं की संगति इस सम्बन्ध में भारतीय दार्शनिक मान्यताओं से भी बैठती है। मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पांच भागों में विभक्त किया जाता है।
(1) वृहद् मस्तिष्क (सेरिश्रम)
(2) लघुमस्तिष्क (सेरिबेलम)
(3) माध्यमिक मस्तिष् (मिडब्रेन)
(4) मस्तिष्क सेतु (पॉन्स)
(5) सुषुम्ना शीर्ष (मैडुला ऑबलांगेटा)।
इनमें से अन्तिम तीन अर्थात् मिडब्रेन, पॉन्स एवं मैडुला को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ भी कहते हैं।अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तेतीस कोटि देवता रहते हैं, पर उनमें से पांच मुख्य हैं।
इन्हीं का समस्त देव संस्थान पर नियन्त्रण है। मस्तिष्कीय पांच क्षेत्रों को पांच देव परिधि कह सकते हैं। इस ब्रह्म लोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।
वैज्ञानिक मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव ‘‘सैरिव्रो स्पाइनल फ्ल्यूड’’ भरा रहता है। यही मस्तिष्क के भिन्न भिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता ।मस्तिष्क की झिल्लियों से यह झरता रहना है।
और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता है। अमृत कलश के सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं कहीं सहस्रार की 16 पंखुरियों का भी वर्णन है। यह मस्तिष्क के ही 16 महत्वपूर्ण विभाग विभाजन हैं।
शिव संहिता में भी सहस्रार की 16 कलाओं का वर्णन है -कपाल के मध्य चन्द्रमा के समान प्रकाशवान् सोलह कला युक्त सहस्रार चक्र का ध्यान करें। सहस्रार की यह सोलह कलाएं मस्तिष्क के।
‘सैरिव्रोस्माइनल फ्ल्यूड’’ से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह विभाग हैं। पूर्वोक्त पांच स्थूल विभागों को अधिक विस्तार से व्यक्त किया जाय तो उसके निम्नांकित 16 विभाग होते हैं ।
(1) वृहद्मस्तिष्क (सैरिब्रम)
(2) लघुमस्तिष्क (सैरिेबेलम)
(3) सुषुम्ना शीर्ष (मैट्रुला ऑबलॉगेटा)
(4) सेतु (पॉन्स)
(5) मध्य मस्तिष्क (मिडब्रेन)
(6) महासंयोजक (कॉर्पस कलोसम)
(7) रखी पिण्ड (कॉपर्स स्ट्रेटम)
(8) पीयूस ग्रन्थि (पिट्यूटरी ग्लैण्ड)
(9) शीर्ष ग्रन्थि (पीनियल ग्लैण्ड )
(10) चेतक (थैलोमस)
(11) अधःचेतक (हाइपो थैलेमस)
(12) उपचेतक (सब थैलेमस)
(13) अनुचेतक (मैटा थैलेमस)
(14) ऊर्ध्व चेतक (एपी थैलेमस)
(15) संचार जालिकाएं (कॉराडप्लैक्सैसेज)
(16) प्रकोष्ठ (वैन्ट्रिक्लस)।
इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं युक्त अनेक केन्द्र हैं। सहस्रार अमृत कलश को जागृत करके उन्हें अत्यधिक सक्रिय बना कर असाधारण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।
जो योगी सहस्रार से स्रवित हो रहे पीयूष का निरन्तर पान करता है, वह मृत्यु की ही मृत्यु का विधान रचने में समर्थ होता है। अर्थात् मृत्यु उसे मृत्यु के समान नहीं प्रतीत होती, वह मृत्यु से परे का जीवन जीता है।
यहीं इसी सहस्रार में कुण्डलिनी-शक्ति का लय होता है और तब चारों प्रकार की सृष्टि परमात्मा में ही लीन हो जाती है, सभी कुछ परमात्मामय हो जाता है। सहस्र दल कमल तथा शेषनाग के सहस्र फन माने जाने की उक्ति का आधार भी यही है।
ब्रह्मलोक एवं क्षीरसागर के मध्य विष्णु भगवान का कुंडलि भरे हुए शेष नाग पर शयन करना, यह आकृति भी सहस्रार की स्थिति समझने की दृष्टि से बनी सहस्रार चक्र का सम्बन्ध ब्रह्मरन्ध्र से है।
ब्रह्म रन्ध्र को दशम द्वार कहा गया है। ,ब्रह्माण्डीय चेतना का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। ब्रह्मरन्ध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे ऊपरी रहस्यमय कही जाने वाली शीर्ष ग्रन्थि (पीमियल ग्लैण्ड) का स्थान है।
यह ब्रह्मरन्ध्र विशिष्ट मार्ग द्वार है। योगी अन्त समय में इसी मार्ग से प्राण निष्कासन करके ब्रह्मलीन होते हैं। स्पष्ट है कि जीवन काल में यह ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क के सहस्रार चक्र के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है।
सहस्रार चक्र और ब्रह्मरन्ध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई यूनिट के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।
क्रमशः
04/05/2024, 7:36 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग......40
हमारे तीन बंधन हैं ,जो भौतिक शरीर न रहने पर भी देव , गंधर्व ,यक्ष , भूत , पिशाच , आदि योनियों में भी वैसे ही बंधन बंधे रहते हैं ।इन्हें रूद्र, विष्णु , और ब्रह्म ग्रंथियां कहते हैं ।
अर्थात तम ,रज, सत द्वारा स्थूल , सूक्ष्म , और कारण शरीर बने हुऐ हैं ।इन तीन ग्रंथियों से ही जीव बंधा हुआ है इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृ - ऋण ,ऋषि -ऋण व देव -ऋण कहलाता है ।
तम को प्रकृति , रज को जीव और सत को आत्मा कहते हैं । संसार में तम को सांसारिक जीवन , रज को व्यक्तिगत जीवन व सत को आध्यात्मिक जीवन कहते देश ,जाति, और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना पितृ -ऋण से उऋण होने का मार्ग है |
व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक ,बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से संपन्न बनाना,अपने को मनुष्य - सुलभ गुणों से युक्त बनाना ऋषि- ऋण से छूटना सत्संग,भक्ति,चिंतन मनन ,आदि साधनाओं द्वारा ।
काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद ,मत्सर आदि को हटाकर आत्मा को निर्मल ,देव-तुल्य बनाना ,यह देव -ऋण से उऋण होना है ।साधक को तीनों गांठों का अनुभव होता है ।
प्रथम मूत्राशय के समीप ,रूद्र दूसरी आमाशय के उपर भाग में, विष्णु और तीसरी सिर के मध्य केंद्र में ,ब्रह्म ग्रंथि कहलाती है ।इन्हें दूसरे शब्दों में महाकाली , महालक्ष्मी , महा-सरस्वती भी कहते हैं |
प्रत्येक की दो दो सहायक ग्रन्थियाँ होती हैं | इन्हें चक्र भी कहते हैं । रूद्र की, मूलाधार , स्वाधिष्ठान , विष्णु की मणिपुर , अनाहत , ब्रह्म की विशुद्धि , आज्ञा चक्र कहा जाता है ।
हठ-योग की विधि से भी इन छ: चक्रों का वेधन किया जाता है । सिद्धों ने इन ग्रंथियों की अंदर की झांकी के अनुसार शिव , विष्णु और ब्रह्मा के चित्रों का निरूपण किया है।
ग्रंथी ,दायें भाग से देखने पर पुरुष - प्रधान ,व बाएं भाग से देखने पर स्त्री -प्रधान आकार की होती है। ब्रह्म ग्रंथि मध्य-मस्तिष्क में है । इससे उपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रंथि उपर से चतुष्कोन और नीचे से फ़ैली हुई है |
इसका नीचे का एक तंतु ब्रह्म -रंध्र से जुडा हुआ है | इसी को सहस्रार -मुख वाले शेषनाग की शय्या पर सोते हुए भगवान की नाभि -कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है ।
वाम भाग में यही ग्रंथि चतुर्भुजी सरस्वती है | वीणा की झंकार से ओंकार - ध्वनी का निरंतर गुंजार होता है यही तीन ग्रंथियां ,जीव को बाँधे हुए हैं | जब ये खुल जाती हैं ,तो मुक्ति का अधिकार अपने आप मिल जाता है ।
और शक्ति , सम्पन्नता ,और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हाथ में आ जाता है। पञ्च-तत्त्वों से शरीर बना है। तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर, ऊँचा उठ जाने पर ही आत्मा शान्ति और आनन्द का अधिकारी होता है।
इन तीन ग्रन्थियों को खोलने के महत्त्वपूर्ण कार्य को ध्यान में रखने के लिए कन्धे पर तीन तार का यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि तम, रज, सत् के तीन गुणों द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर बने हुए हैं।
यज्ञोपवीत के अन्तिम भाग में तीन ग्रन्थियाँ लगाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्मग्रन्थि से जीव बँधा पड़ा है। दार्शनिक दृष्टि से विचार करने पर तम का अर्थ होता है-शक्ति, रज का अर्थ होता है-साधन, सत् का अर्थ होता है-ज्ञान।
इन तीनों की न्यूनता एवं विकृत अवस्था ..बन्धन कारक तथा अनेक उलझनों, कठिनाइयों और बुराइयों को उत्पन्न करने वाली होती है; किन्तु जब तीनों की स्थिति सन्तोष जनक होती है, तब त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है।
हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की सृष्टि में कोई भी शक्ति या पदार्थ दूषित अथवा भ्रष्ट नहीं है। रुद्रग्रन्थि का आकार बेर के समान ऊपर को नुकीला, नीचे को भारी, पैंदे में गड्ढा लिए होता है।
इसका वर्ण कालापन मिला हुआ लाल होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं। दक्षिण भाग को रुद्र और वाम भाग को काली कहते हैं। दक्षिण भाग के अन्तरंग गह्वर में प्रवेश करके जब उसकी झाँकी की जाती है।
तो ऊर्ध्व भाग में श्वेत रंग की छोटी-सी नाड़ी हलका-सा श्वेत रस प्रवाहित करती है; एक तन्तु तिरछा पीत वर्ण की ज्योति-सा चमकता है। मध्य भाग में एक काले वर्ण की नाड़ी साँप की तरह मूलाधार से लिपटी हुई है।
प्राणवायु का जब उस भाग से सम्पर्क होता है, तो डिम डिम जैसी ध्वनि उसमें से निकलती है। रुद्रग्रन्थि की आन्तरिक स्थिति की झाँकी करके ऋषियों ने रुद्र का सुन्दर चित्र अंकित किया है ।
मस्तक पर गंगा की धारा, जटा में चन्द्रमा, गले में सर्प, डमरू की डिम-डिम ध्वनि, ऊर्ध्व भाग में त्रिशूल। उस चित्र में आलंकारिक रूप से रुद्रग्रन्थि की वास्तविकताएँ ही भरी गई हैं।
उस ग्रन्थि का वाम भाग जिस स्थिति में है, उसी के अनुरूप काली का सुन्दर चित्र सूक्ष्मदर्शी आध्यात्मिक चित्रकारों ने अंकित कर दिया है। रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए ग्रन्थि के मूल भाग में निवास करने वाली बीज शक्तियों का सञ्चार करना पड़ता है।
रुद्रग्रन्थि के अधोभाग में बेर के डण्ठल की तरह एक सूक्ष्म प्राण अभिप्रेत होता है, उसे ‘क्लीं’ बीज कहते हैं।मूल बन्ध बाँधते हुए एक ओर से अपान और दूसरी ओर से कूर्मप्राण को चिमटे की तरह बनाकर रुद्रग्रन्थि को पकड़कर रेचक प्राणायाम द्वारा दबाते हैं।
इस दबाव की गर्मी से क्लीं बीज जाग्रत् हो जाता है। वह नोकदार डण्ठल आकृति का बीज अपनी ध्वनि और रक्त वर्ण प्रकाश-ज्योति के साथ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है।
इस जाग्रत् क्लीं बीज की अग्रिम नोंक से कुंचुकि क्रिया की जाती है, जैसे किसी वस्तु में छेद करने के लिए नोंक दार कील कोंची जाती है; इस प्रकार की वेधन-साधना को ‘कुंचुकी क्रिया’ कहते हैं।
रुद्रग्रन्थि के मूल केन्द्र में क्लीं बीज की अग्र शिखा से जब निरन्तर कुंचुकी होती है, तो प्रस्तुत कलिका में भीतर ही भीतर विशेष प्रकार के लहलहाते हुए तड़ित प्रवाह उठाने पड़ते हैं; इनकी आकृति एवं गति सर्प जैसी होती है।
इन तड़ित प्रवाहों को ही शम्भु के गले में फुफकारने वाले सर्प बताया है। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत के उच्च शिखर पर धूम्र मिश्रित अग्नि निकलती है, उसी प्रकार रुद्रग्रन्थि के ऊपरी भाग में पहले क्लीं बीज की अग्नि जिह्वा प्रकट होती है।
इसी को काली की बाहर निकली हुई जीभ माना गया है। इसको शम्भु का तीसरा नेत्र भी कहते हैं।मूलबन्ध, अपान और कूर्म प्राण के आघात से जाग्रत् हुई क्लीं बीज की कुंचुकी -क्रिया से धीरे-धीरे रुद्रग्रन्थि शिथिल होकर वैसे ही खुलने लगती है।
जैसे कली धीरे-धीरे खिलकर फूल बन जाती । इस कमल पुष्प के खिलने को पद्मासन कहा गया है। त्रिदेव के कमलासन पर विराजमान होने के चित्रों का तात्पर्य यही है कि वे विकसित रूप से परिलक्षित हो रहे हैं।
साधक के प्रयत्न के अनुरूप खुली हुई रुद्रग्रन्थि का तीसरा भाग जब प्रकटित होता है, तब साक्षात् रुद्र का, काली का अथवा रक्त वर्ण सर्प के समान लहलहाती हुई, क्लीं-घोष करती हुई अग्नि शिखा का साक्षात्कार होता है।
यह रुद्र जागरण साधक में अनेक प्रकार की गुप्त-प्रकट शक्तियाँ भर देता है। संसार की सब शक्तियों का मूल केन्द्र रुद्र ही है। उसे रुद्रलोक या कैलाश भी कहते हैं। प्रलय काल में संसार संचालिनी शक्ति व्यय होते-होते पूर्ण शिथिल होकर जब सुषुप्त अवस्था में चली जाती है।
तब रुद्र का ताण्डव नृत्य होता है। उस महामन्थन से इतनी शक्ति फिर उत्पन्न हो जाती है जिससे आगामी प्रलय तक काम चलता रहे। घड़ी में चाबी भरने के समान रुद्र का प्रलय ताण्डव होता है।
रुद्रशक्ति की शिथिलता से जीवों की तथा पदार्थों की मृत्यु हो जाती है, इसलिए रुद्र को मृत्यु का देवता माना । विष्णु ग्रन्थि किस वर्ण की, किस गुण की, किस आकार की, किस आन्तरिक स्थिति की, किस ध्वनि की, किस आकृति की है, यह सब हमें विष्णु के चित्र से सहज ही प्रतीत हो जाता है।
नील वर्ण, गोल आकार, शंख-ध्वनि, कौस्तुभ मणि, वनमाला यह मध्यग्रन्थि का सहज प्रतिबिम्ब है।जैसे मनुष्य को मुख की ओर से देखा जाए तो उसकी झाँकी दूसरे प्रकार की होती है और पीठ की ओर से देखा जाए, तब यह आकृति दूसरे ही प्रकार की होती है।
एक ही मनुष्य के दो पहलू दो प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार एक ही ग्रन्थि दक्षिण भाग से देखने में पुरुषत्व प्रधान आकार की और बाईं ओर से देखने पर स्त्रीत्व प्रधान आकार की होती है।
एक ग्रन्थि को रुद्र या शक्तिग्रन्थि कहा जा सकता।विष्णु लक्ष्मी, ब्रह्मा और सरस्वती का संयोग भी इसी प्रकार है। विष्णुग्रन्थि के मूल में ‘श्रीं’ का निवास है। विष्णुग्रन्थि को जाग्रत् करने के लिए जालन्धर बन्ध बाँधकर ‘समान’ और ‘उदान’ प्राणों द्वारा दबाया जाता है।
तो उसके मूल भाग का ‘श्रीं’ बीज जाग्रत् होता है। यह गोल गेंद की तरह है और इसकी अपनी धुरी पर द्रुत गति से घूमने की क्रिया होती है। इस घूर्णन क्रिया के साथसाथ एक ऐसी सनसनाती हुई सूक्ष्म ध्वनि होती है।
जिसको दिव्य श्रोत्रों से ‘श्रीं’ जैसे सुना जाता है। श्रीं बीज को विष्णुग्रन्थि की बाह्य परिधि में भ्रामरी क्रिया के अनुसार घुमाया जाता है।जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती ,उसी प्रकार परिभ्रमण करने को भ्रामरी कहते हैं।
विवाह में वर-वधू की भाँवर या फेरे पड़ना, देव-मन्दिरों तथा यज्ञ की परिक्रमा या प्रदक्षिणा होना भ्रामरी क्रिया का रूप है। विष्णु की उँगली पर घूमता हुआ चक्र सुदर्शन चित्रित करके योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किए गए इसी रहस्य को प्रकट किया है।
‘श्रीं’ बीज विष्णुग्रन्थि की भ्रामरी गति से परिक्रमा करने लगता है, तब उस महातत्त्व का जागरण होता है। पूरक प्राणायाम की प्रेरणा देकर समान और उदान द्वारा जाग्रत् किए गए श्रीं बीज से जब विष्णुग्रन्थि के बाह्य आवरण की मध्य परिधि में भ्रामरी क्रिया की जाती है, तो उसके गुञ्जन से उसका भीतरी भाग चैतन्य होने लगता है।
इस चेतना की विद्युत् तरंगें इस प्रकार उठती हैं जैसे पक्षी के पंख दोनों बाजुओं में हिलते हैं। उसी गति के आधार पर विष्णु का वाहन गरुड़ निर्धारित किया गया है। इस साधना से विष्णुग्रन्थि खुलती है ।
और साधक की मानसिक स्थिति के अनुरूप विष्णु, लक्ष्मी या पीत वर्ण की अग्निशिखा की लपटों के समान ज्योतिपुञ्ज का साक्षात्कार होता है। विष्णु का पीताम्बर इस पीत ज्योतिपुञ्ज का प्रतीक है।
इस ग्रन्थि का खुलना ही बैकुण्ठ, स्वर्ग एवं विष्णुलोक को प्राप्त करना है। बैकुण्ठ या स्वर्ग को अनन्त ऐश्वर्य का केन्द्र माना जाता है। विष्णुग्रन्थि वैभव का केन्द्र है, जो उसे खोल लेता है, उसे विश्व के ऐश्वर्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है।
क्रमशः
05/05/2024, 11:26 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ....41
ब्रह्मग्रन्थि मध्य मस्तिष्क में है। इससे ऊपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रन्थि ऊपर से चतुष्कोण और नीचे से फैली हुई है। इसका नीचे का एक तन्तु ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ा हुआ है।
इसी को सहस्रमुख वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए भगवान् की नाभि कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है। वाम भाग में यही ग्रन्थि चतुर्भुजी सरस्वती है।
वीणा की झंकार-से ओंकार ध्वनि का निरन्तर गुञ्जार होता है। यह तीनों ग्रन्थियाँ जब तक सुप्त अवस्था में रहती हैं, बँधी हुई रहती हैं, तब तक जीव साधारण दीन हीन दशा में पड़ा रहता है।
अशक्ति, अभाव और अज्ञान उसे नाना प्रकार से दु:ख देते रहते हैं। पर जब इनका खुलना आरम्भ होता है तो उनका वैभव बिखर पड़ता है। मुँह बन्द कली में न रूप है, न सौन्दर्य और न आकर्षण।
जब कली खिल पड़ती है और पुष्प के रूप में प्रकट होती है, तो एक सुन्दर दृश्य उपस्थित हो जाता है।ब्रह्मग्रन्थि के नीचे ‘ह्रीं’ तत्त्व का अवस्थान है। ब्रह्म ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्रदल कमल की छाया में अवस्थित है।
उसे अमृत कलश कहते हैं। बताया गया है कि सुरलोक में अमृत कलश की रक्षा सहस्र फनों वाले शेषनाग करते हैं। इसका अभिप्राय इसी ब्रह्म ग्रन्थि से है। उड्डियान बन्ध लगाकर व्यान और धनञ्जय प्राणों द्वारा ब्रह्मग्रन्थि को पकाया जाता है।
पकाने से उसके मूलाधार में वास करने वाली ह्रीं शक्ति जाग्रत् होती है। इसकी गति को प्लावनी कहते हैं। जैसे जल में लहरें उत्पन्न होती हैं और निरन्तर आगे को ही लहराती हुई चलती हैं।
उसी प्रकार ह्रीं बीज की प्लावनी गति से ब्रह्मग्रन्थि को दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रेरित करते हैं। चतु ष्कोण ग्रन्थि के ऊर्ध्व भाग में यही ह्रीं तत्त्व रुक-रुककर गाँठें सी बनाता हुआ आगे की ओर चलता है ।
और अन्त में परिक्रमा करके अपने मूल संस्थान को लौट आता है। गाँठ बाँधते चलने की नीची-ऊँची गति के आधार पर माला के दाने बनाए गए हैं।। 108 दचके लगाकर तब एक परिधि पूरी होती है।
इसलिए माला के 108 दाने होते हैं। इस ह्रीं तत्त्व की तरंगें मन्थर गति से इस प्रकार चलती हैं जैसे हंस चलता है। ब्रह्मा या सरस्वती का वाहन हंस इसीलिए माना गया है।
वीणा के तारों की झंकार से मिलती-जुलती ‘ह्रीं’ ध्वनि सरस्वती की वीणा का परिचय देती है।कुम्भक प्राणायाम की प्रेरणा से ह्रीं बीज की प्लावनी क्रिया आरम्भ होती है।
यह क्रिया निरन्तर होते रहने पर ब्रह्मग्रन्थि खुल जाती है। तब उसका ब्रह्म के रूप में, सरस्वती के रूप में अथवा श्वेत वर्ण प्रकम्पित शुभ्र ज्योति शिखा के समान साक्षात्कार होता है।
यह स्थिति आत्मज्ञान, ब्रह्मप्राप्ति, ब्राह्मी स्थिति की है। ब्रह्मलोक एवं गोलोक भी इसको कहते हैं। इस स्थिति को उपलब्ध करने वाला साधक ज्ञान-बल से परिपूर्ण हो जाता है।
इसकी आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत् होकर परमेश्वर के समीप पहुँचा देती हैं, उसे अपने पिता का उत्तराधिकार उसे मिलता है और वह जीवन्मुक्त होकर ब्राह्मीस्थिति का आनन्द.. ब्रह्मानन्द उपलब्ध करता है।
अ" ब्रह्मा का वाचक है; उच्चारण द्वारा हृदय में उसका त्याग होता है।
"उ" विष्णु का वाचक हैं; उसका त्याग कंठ में होता है
तथा "म" रुद्र का वाचक है और उसका त्याग तालुमध्य में होता है।इसी प्रणाली से ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि तथा रुद्रग्रंथि का छेदन हो जाता है। तदनंतर बिंदु है, जो स्वयं ईश्वर रूप है । भ्रूमध्य / आज्ञा चक्र में बिंदु का त्याग होता है।
कपाल में ब्रह्मरन्ध्र ,मूर्धनी अधिपति, शिवरन्ध्र ये तीन मर्म स्थान है;जो क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु , शिव का प्रतीक है नाद सदाशिव रूपी है; इसीलिए ललाट से मूर्धा /मुँह के अंदर का तालु तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है। यहाँ तक का अनुभव स्थूल है।
इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा समना भूमियों में सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं।
भ्रूमध्य आज्ञा चक्र में बिंदु का तथा ब्रह्मरन्ध्र में स्पर्श अनुभूति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर मूर्धनी/अधिपति में व्यापिनी शक्ति का भी त्याग हो जाता है। उस समय केवल मनन मात्र रूप का अनुभव होता है।
यह समना भूमि का परिचय है। इसके बाद ही मनन का त्याग हो जाता है।इसके उपरांत कुछ समय तक मन के विशुद्ध आत्मस्वरूप की झलक दिखती है। इसके बाद अंत में परम अनुग्रह प्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में अथार्त शिवरन्ध्र में प्रवेश होता है।
इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को एक प्रकार से उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा से शिवपर्यन्त अथार्त माया /प्रकृति के छह कारणों का उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति हो जाती है।
ॐ शब्द 3½ मात्रा का एकाक्षर है।
ओमकार आपको शारीरिक, मानसिक,भावनात्मक रूप से आराम देता है।ॐ के उच्चारण से जो सकारात्मक ऊर्जा निकलती है वह आपके आसपास के वातावरण को शांतिपूर्ण तथा आनंदमयी बना देती है।
इस प्राणायाम के द्वारा मन के मोह, अहंकार और मल को दूर करने में सहायता मिलती है।इस को साधक जितना चाहे उतना कर सकता है। योगाभ्यास मेंओम के उच्चारण का अनन्य महत्व है।
इसमें ओंकार का उच्चारण सुनना व बोलना दोनों का अंतर्भाव होता है। इसका लाभ उसे ही मिलता है जो स्वयं इसका अनुभव लेता है। ओंकार प्राणायाम का अधिक लाभ सामूहिक रीति से एक लय व सुरताल में करने से होता है।
ओंकार प्राणायाम को ओंकार साधना/प्रणव साधना/प्रणवोच्चार कहते हैं। इस प्राणायाम के द्वारा सर्व शक्तिमान परमात्मा को संबोधित करते हैं। ओंकार ही उस परमात्मा का प्रतीक हो सकता है।
ओम शब्द साढ़ेतीन (3½ ) मात्रा का एकाक्षर है, यह नाम वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण व सिद्ध है।
अकार-1 मात्रा-कंठमूल से उत्पत्ति-ब्रह्म-उत्पत्ति।
ऊकार-2 मात्रा-होंठों से उत्पत्ति-विष्णु-स्थिति।
मकार-3 मात्रा-बंद होंठों से उत्पत्ति-शिव-लय।
हलंत-1/2 मात्रा। ओंकार सभी अक्षरों को व्याप्त करता है। जैसे सारी सृष्टि का प्रतिनिधित्व परमात्मा करता है वैसे ही सारे अक्षरों का प्रतिनिधित्व ओंकार करता है।
क्रमशः
06/05/2024, 11:38 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....42
ओंकार प्राणायाम कैसे करें । इसे करने के लिए एकांत स्थान चुन ले। ध्यान रहे की स्थान बदले नही । सुखासन और पद्मासन की स्थिति में बैठ जाए। ध्यान रहे की सिर, पीठ, गर्दन और कमर सीधी रेखा में रहे।
शांति से आँखे बंद करे और ध्यान करे की सारी इन्द्रियां अपने स्थान पर सजग है । 3 बार लम्बी सांसे ले और सांसो को तेजी से छोड़ दे। इस क्रिया को दीर्घ श्वसन कहते है।
ऐसे ही 3 से 4 बार दीर्घ श्वसन करने के उपरान्त जितना हो सके लंबी साँस ले। साँस को रोककर, मुँह खोलकर 'अ' का उच्चारण करे। इसका स्पंदन आपको अनाहत चक्र/ हृदय में महसूस होगा। इस तरह आप सात बार ऐसा उच्चारण करें।
पुनः लंबी सांस लेकर, साँस को रोक करके 'उ' का उच्चारण करें। इसमे आपको अपना मुंह गोल करके 'उ' उच्चारण करना होगा। इसका वाइब्रेशन आपको कंठ , विशुद्धि चक्र में होगा।यहआप 7 बार ऐसा उच्चारण करें।
इसके बाद पुनः लंबी सांस लेकर,साँस को रोक करके 'म' का उच्चारण करें। इसमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि आपको मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके म' उच्चारण करना होगा।
इसका वाइब्रेशन आपको तालुमध्य ..आज्ञा चक्र तक में महसूस होगा। ऐसा 7 बार उच्चारण करें। इसके बाद मुंह बंद करके भ्रामरी की तरह नाक से 'गुंजन करके ओम का उच्चारण करें। इसका स्पंदन आपको ब्रह्मरंध में होगा।
इस प्रकार से इस ओंकार के उच्चारण की अनुभूति खुद ही करे।आरम्भ के समय में बराबर और दीर्घ उच्चारण अच्छे से नहीं हो पाता है। परन्तु धीरे धीरे अभ्यास के साथ आप इसका उच्चारण करने लगेंगे।
ओंकार का उच्चारण करने से एक प्रकार का दीर्घ कंपन पैदा होता है ;जिसका अनुभव मुख, गुहा, नाभि चक्र, कान के पास से होकर पूरे शरीर में होता है। शारीरिक लाभ की दृष्टि से कंपन जरूरी है।
यह ओंकार की साधना जब तक साधक को आनंद दे, तब तक करें। ओंकार प्राणायाम से साधक को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक लाभ होता है।
शरीर का सबसे छोटा हिस्सा ऊतकों को नवनिर्मित करनेका कार्यओंकार प्राणायाम करता है। ओंकार से प्रत्येक ऊतक चैतन्य से परिपूर्ण हो जाती है, इससे चेतना की जागृति होती है।
शरीर की आंतरिक इंद्रियों की सफाई होती है। सूक्ष्म मल दूर होता है। शरीर स्वस्थ, सुंदर व पवित्र बनता है। कंठनाली में स्वरतंतु की ट्यूनिंग होती है। लंग्स की कार्य क्षमता बढ़ती है। श्वसन विकार दूर होतेहैं।
रक्तशुद्धि होती है। हृदय को विश्राम मिलता है। मज्जा संस्थान सक्रिय होता है। पाचन क्रिया व उत्सर्जक क्रिया सुधरती है। मन के मल, मोह, अहंकार, मद से छुटकारा मिलता है। मन शांत, प्रसन्न रहता है।
मन की आकलन शक्ति बढ़ती है। मन रिक्त, स्वच्छ, पवित्र व हल्कापन महसूस करता है। एक मंगलमय वातावरण निर्मित होता है। हमारे दैनंदिन व्यवहार मेंआने वाले तनाव के कारण आनेवाली निराशा , उदासी व अशांति ओंकार के स्पष्ट व दीर्घउच्चारण से नष्ट होती है।
ओंकार के नियमित उच्चारण से रक्तदान, दमा आदि तकलीफें दूर होती हैं। अत: स्रावी संस्थान चुस्त होता है। नर को नारायण बनानेकी क्रिया ओंकार प्राणायाम में है। बुद्धि तीव्र, निर्णायक क्षमता व स्मरण शक्ति बढ़ती है।
शरीर, मन व बुद्धि को स्वस्थ रखने वाला अष्टांगों का सार ओंकार है। ओंकार से अष्टांग योग का भी पालन हो जाता है। जिस प्रकार मन पर उत्तम संस्कार होनेके लिए जप, तप, कीर्तन, भजन आदि कर्मसाधन प्रचलित हैं।
उसी प्रकार ध्यान की कल्पना करें तो ओंकार एक साधना प्रतीत होती है किन्तु इसका नियमित अभ्यास आवश्यक है। अत: ऊषा काल में, ब्रह्म मुहूर्त में किसी रम्य स्थान में जाकर सूर्योदय के समय प्रसन्नचित्त बैठ कर यदि ओंकार का नियमित अभ्यास किया जाए।
तो यह उच्चारण सुमधुर, हृदय को प्रसन्न करने वाला होता है। अत: प्रत्येक योग प्रेमी को नियमित रूप से श्रद्धा भाव से ओंकार का उच्चारण करना चाहिए।
क्रमशः
07/05/2024, 7:36 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....43
कुण्डलिनी जागरण में आगे बढ़ने के लिए साधक के लिए स्वर संयम प्रथम शर्त है। इस वायु तत्त्व पर यदि अधिकार प्राप्त कर लिया जाए तो अनेक प्रकार से अपना हित सम्पादन किया जा सकता है।
स्वर शास्त्र के अनुसार श्वास-प्रश्वास के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। ऐसी नाड़ियों की संख्या 72000 है इनको नसें न समझना चाहिए, स्पष्टत: यह प्राण-वायु आवागमन के मार्ग हैं।
नाभि में इसी प्रकार की एक नाड़ी कुण्डली के आकार में है, जिसमें से (1) इड़ा, (2) पिङ्गला, (3) सुषुम्ना, (4) गान्धारी, (5) हस्त-जिह्वा, (6) पूषा, (7) यशश्विनी, (8) अलम्बुषा, (9) कुहू तथा (10) शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ निकली हैं
और यह शरीर के विभिन्न भागों की ओर चली जाती हैं। इनमें से पहली तीन प्रधान हैं। इड़ा को ‘चन्द्र’ कहते हैं जो बाएँ नथुने में है। पिंगला को ‘सूर्य कहते हैं, यह दाहिने नथुने में है।
सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य है जिस प्रकार संसार में सूर्य और चन्द्र नियमित रूप से अपना अपना काम करते हैं, उसी प्रकार इड़ा, पिंगला भी इस जीवन में अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं।
इन तीनों के अतिरिक्त अन्य सात प्रमुख नाड़ियों के स्थान इस प्रकार हैं। गान्धारी बायीं आँख में । हस्तजिह्वा दाहिनी आँख में । पूषा दाहिने कान में। यशश्विनी बाएँ कान में ।
अलम्बुषा मुख में। कुहू लिंग देश में । शंखिनी गुदा में।
इस प्रकार शरीर के दस द्वारों में दस नाड़ियाँ हैं। हठयोग में नाभिकन्द अर्थात् कुण्डलिनी स्थान गुदा द्वार से लिंग देश की ओर दो अँगुल हटकर मूलाधार चक्र माना गया है।
स्वर योग में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से सम्बन्ध रखता है और शरीर की नाभि या मध्य केन्द्र गुदा-मूल में नहीं, वरन् उदर की टुण्डी में ही हो सकता है।
यहाँ ‘नाभि देश’ का तात्पर्य उदर की टुण्डी मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष सम्बन्ध उदर से ही है, इसलिए प्राणायाम द्वारा उदर संस्थान तक प्राण वायु को ले जाकर नाभि केन्द्र से इस प्रकार घर्षण किया जाता है।
कि वहाँ की सुप्त शक्तियों का जागरण हो सके। चन्द्र और सूर्य की अदृश्य रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा का गुण शीतल और सूर्य का उष्ण है।
शीतलता से स्थिरता, गम्भीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चञ्चलता, उत्साह,बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है। मनुष्य को सांसारिक जीवन में शान्तिपूर्ण और अशान्तिपूर्ण दोनों ही तरह के काम करने पड़ते हैं।
किसी भी कार्य का परिणाम उसके आरम्भ पर निर्भर है। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कर्मों को आरम्भ करते समय यह देख लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार काम करने के अनुकूल है कि नहीं।
एक विद्यार्थी को रात में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए जबकि उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद न कर सकेगा।
यदि यही पाठ उसे प्रात:काल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए तो आसानी से सफलता मिल जाएगी।ध्यान, भजन, पूजा, मनन, के लिए एकान्त की आवश्यकता है, किन्तु उत्साह भरने और युद्ध के लिए कोलाहलपूर्ण वातावरण की, बाजों की घोर ध्वनि की आवश्यकता होती है।
ऐसी उचित स्थितियों में किए कार्य अवश्य ही फलीभूत होते हैं। इसी दृष्टिकोण के आधार पर स्वर-योगियों ने आदेश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चन्द्र स्वर में किए जाने चाइये ।
जैसे—विवाह, दान, मन्दिर, कुआँ, तालाब बनाना, नवीन वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण बनवाना, शान्ति के काम, पुष्टि के काम, औषधि देना, मैत्री, व्यापार, बीज बोना, दूर की यात्रा, विद्याभ्यास, योग क्रिया आदि।
यह सब कार्य ऐसे हैं जिनमें अधिक गम्भीरता और बुद्धि पूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है, इसलिए इनका आरम्भ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोश चन्द्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहे हों।
उत्तेजना, आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है; जैसे युद्ध करना, मद्य पीना, काठ, पत्थर, एवं रत्न को तोड़ना; खेलकूद , व्यायाम, नदी पार करना आदि।
संघर्ष और युद्ध आदि कार्य , देश, समाज अथवा आश्रित की रक्षार्थ भी हो सकते हैं और उनको सब प्रशंसनीय कहते इसी प्रकार विशेष परिश्रम के कार्यों का सम्पादन भी समाज और परिवार के लिए अनिवार्य होता है।
वे भी सूर्य स्वर में उत्तमतायुक्त होते हैं। कुछ क्षण के लिए जब दोनों नाड़ी इड़ा, पिंगला रुककर, सुषुम्ना चलती है, तब प्राय: शरीर सन्धि अवस्था में होता है। वह सन्ध्या काल है।
दिन के उदय और अस्त को भी सन्ध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत् होती हैं और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है।
स्वर की सन्ध्या से भी मनुष्य का चित्त सांसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ, कुछ आत्म-चिन्तन की ओर झुकता है।
वह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है, अल्पकाल के लिए आती इसलिए हम ठीक से पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिन्तन और ईश्वराराधना का अभ्यास किया जाए, तो नि:सन्देह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है।
किन्तु सांसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है, इसलिए सुषुम्ना स्वर में आरम्भ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता, वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं।
सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा बहुत उदय होता है, इसलिए इस समय में दिए हुए शाप या वरदान अधिकांश फलीभूत होते हैं,
क्योंकि इन भावनाओं के साथ आत्म-तत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है। इड़ा शीत ऋतु है तो पिंगला ग्रीष्म ऋतु। जिस प्रकार शीत ऋतु के महीनों में शीत की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार चन्द्र नाड़ी शीतल होती है।
और ग्रीष्म ऋतु के महीनों में जिस प्रकार गर्मी की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार सूर्य नाड़ी में उष्णता एवं उत्तेजना का प्राधान्य होता है। स्वर बदलना कुछ विशेष कार्यों के सम्बन्ध में स्वर शास्त्रज्ञों के जो अनुभव हैं।
उनकी जानकारी सर्वसाधारण के लिए बहुत ही सुविधा जनक होगी। कहा गया है कि प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श करके उस चलित स्वर वाले कदम को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए।
क्रमशः
08/05/2024, 11:18 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग...44
यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो अचलित स्वर (जो स्वर न चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करनी चाहिए।
इसी रीति से उसकी बढ़ी हुई उष्णता को अपना अचलित स्वर की ओर का शान्त भाग अपनी आकर्षण विद्युत् से खींचकर शान्त बना देगा और मनोरथ में सिद्धि प्राप्त होगी।
गुरु, मित्र, अफसर, राजदरबार से जबकि बाम स्वर चलित हो, तब वार्तालाप या कार्यारम्भ करना ठीक है। कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यन्त ही आवश्यक हो सकता है।
किन्तु उस समय स्वर विपरीत चलता है। तब क्या उस कार्य के किए बिना ही बैठा रहना चाहिए? नहीं, ऐसा करने की जरूरत नहीं है। जिस प्रकार जब रात को निद्रा आती है।
किन्तु उस समय कुछ कार्य करना आवश्यक होता है तब चाय आदि किसी उत्तेजक पदार्थ की सहायता से शरीर को चैतन्य करते हैं, उसी प्रकार हम कुछ उपायों द्वारा स्वर को बदल भी सकते हैं।
जो स्वर नहीं चल रहा, उसे अँगूठे से दबाएँ और जिस नथुने से साँस चलती है, उससे हवा खींचें। फिर जिससे साँस खींची है, उसे दबाकर पहले नथुने से-यानी जिस स्वर को चलाना है, उससे श्वास छोड़ें।
इस प्रकार कुछ देर तक बार-बार करें, श्वास की चाल बदल जायेगी। जिस नथुने से श्वास चल रहा हो, उसी करवट से लेट जायें, तो स्वर बदल जायेगा। इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है।
जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उस ओर की काँख में कोई सख्त चीज कुछ देर दबाकर रखो तो स्वर बदल जाता है। योगी लोग मंत्र दण्ड रखते है ।घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना कहा जाता है।
चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रूई का फाया रखने से स्वर बदलता है।एक हंस = श्वास को लंबा या दीर्घ समय तक रोकने की कोशिश करनी चाहिये । एक श्वास लेने और छोडने को एक हँसा कहते है ।
एक हँसा और दूसरे हँसा के बीच मे जितनॆ समय तक स्वास रोक सकते है अपनी-अपनी शक्ती के अनुसार रोकना चाहिये। एक सामान्य आदमी एक मिनट में 15 हंस लेता जबकि बीमार ज्यादा लेता ।
आप जितने कम लेते अभ्यास में तो आपकी स्वास स्वयं वैसे शिथिर होती । हर एक मनुष्य दिन-रात में 21600 श्वास लेता है। इससे कम श्वास लेने वाला दीर्घजीवी होता है, क्योंकि अपने धन का जितना कम व्यय होगा, उतने ही अधिक काल तक वह सञ्चित रहेगा।
हमारे श्वास की पूँजी की भी यही दशा है। विश्व के समस्त प्राणियों में जो जीव जितना कम श्वास लेता है, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रहता है। इस तालिका से इसका स्पष्टीकरण हो जाता है ...
1-खरगोश ....38 बार......8 वर्ष
2 बन्दर .....32 बार.......10वर्ष
3-कुत्ता...... 29 बार.... 11वर्ष
4-घोड़ा......19 बार.....35 वर्ष
5-मनुष्य.... 13 बार.... 120 वर्ष
6-साँप.....8 बार.....1000 वर्ष
7-कछुआ....5 बार... 2000वर्ष
किसी योगी का उद्देश्य यही होता कि मिनट में 3 हंसा तक पहुंच सके । मनुष्य साधारण काम-काज में 12 बार, दौड़-धूप करने में 18 और मैथुन करते समय 36 बार प्रति मिनट के हिसाब से श्वास चलता है।
इसलिए विषयी और लम्पट मनुष्य की आयु घट जाती है और प्राणायाम करने वाले योगाभ्यासी दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। साँस सदा पूरी और गहरी लेनी चाहिए तथा झुककर कभी न बैठना चाहिए।
नाभि तक पूरी साँस लेने पर एक प्रकार से कुम्भक हो जाता है और श्वासों की संख्या कम हो जाती है। मेरुदण्ड के भीतर एक प्रकार का तरल जीवन तत्त्व प्रवाहित होता रहता है, जो सुषुम्ना को बलवान् बनाए रखता है।
यदि मेरुदण्ड को झुका हुआ रखा जाए तो उस तरल तत्त्व का प्रवाह रुक जाता है और निर्बल सुषुम्ना मस्तिष्क का पोषण करने से वञ्चित रह जाती है। सोते समय चित होकर नहीं लेटना चाहिए।
इससे सुषुम्ना स्वर चलकर विघ्न पैदा होने की सम्भावना रहती है। ऐसी दशा में अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसलिए भोजनोपरान्त पहले बाएँ, फिर दाहिने करवट लेटना चाहिए।
भोजन के बाद कम से कम 15 मिनट आराम किए बिना यात्रा करना भी उचित नहीं है।शीतलता से अग्नि मन्द पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है।
सूर्य स्वर में पाचन शक्ति की वृद्धि रहती है, अतएव इसी स्वर में भोजन करना उत्तम है। इस नियम को सब लोग जानते हैं कि भोजन के उपरान्त बाएँ करवट से लेटे रहना चाहिए।
उद्देश्य यही है कि बाएँ करवट लेटने से दक्षिण स्वर चलता है जिससे पाचन शक्ति प्रदीप्त होती है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की गतिविधि पर ध्यान रखने से वायु-तत्त्व पर अपना अधिकार होता है।
वायु के माध्यम से कितनी ही ऐसी बातें जानी जा सकती हैं, जिन्हें साधारण लोग नहीं जानते। मकड़ी को वर्षा से बहुत पहले पता लग जाता है कि मेघ बरसने वाला है, तदनुसार वह रक्षा का प्रबन्ध पहले से ही कर लेती है।
कारण यह है कि वायु के साथ वर्षा का सूक्ष्म संयोग मिला रहता है, उसे मनुष्य समझ नहीं पाता; पर मकड़ी अपनी चेतना से यह अनुभव कर लेती है कि इतने समय बाद इतने वेग से पानी बरसने वाला है।
मकड़ी में जैसी सूक्ष्म वायु परीक्षण चेतना होती है, उससे भी अधिक प्रबुद्ध चेतना स्वर-योगी को मिल जाती है। वह वर्षा, गर्मी को ही नहीं वरन् उससे भी सूक्ष्म बातें, भविष्य की सम्भावनाएँ, अपनी दिव्यदृष्टि से जान लेता है।
कई स्वर-ज्ञाता ज्योतिषियों की भाँति इस विद्या द्वारा भविष्यवक्ताओं जैसा व्यवसाय करते हैं। स्वर के आधार पर ही मूक प्रश्न, तेजी-मन्दी, खोई वस्तु का पता, शुभ अशुभ मुहूर्त आदि बातें बताते हैं।
असफल होने की आशंका वाले, दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाले लोग भी स्वर का आश्रय लेकर अपना काम करते हैं।
क्रमशः
08/05/2024, 4:06 pm - स्वर विज्ञान: नमन सभी को।
कृपया स्वर साधना ग्रुप का मासिक सेवा शुल्क जिन सदस्य ने जमा नही किया कृपा 7082097077 पर ptm अथवा गूगल , फोन पे से जमा कर हमे पर्सनल पर स्क्रीन शॉट भेज देवे। 🙏
09/05/2024, 5:47 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....45
स्वर संयम में वायु साधना का अर्थ प्राण वायु पर अपना अधिकार कर लेना है इसके लिए शान्त वातावरण में मेरुदंड सीधा करके बैठ जाइए और नाभि चक्र में श्वेत; चमकीली ज्योति मंडल का ध्यान कीजिए।
उस ज्योति केन्द्र में समुद्र के ज्वार भाटे की तरह हिलोरें उठती हुई दिखाई देगी। यदि बांया स्वर चल रहा होगा तो ज्योति केन्द्र का वर्ण चन्द्रमा के समान पीला होगा और उसके बांये भाग से निकलने वाली इड़ा नाड़ी में होकर श्वांस प्रवाह का आवागमन होगा।
नाभि से नीचे की ओर मूलाधार चक्र (गुदा और लिंग का मध्यवर्ती भाग) में होती हुई मेरुदंड में होकर मस्तिष्क के ऊपरी भाग की परिक्रमा करती हुई नासिका के बांए नथुने तक इड़ा नाड़ी जाती है।
नाभि केन्द्र के वाम भाग को क्रिया शीलता के कारण यह नाड़ी काम करती है और बांया स्वर चलता है। इस तथ्य को भावना के दिव्य नेत्रों द्वारा भली भांति, चित्रवत् देखे ..इड़ा ..पिंगला नाड़ी ।
यदि दाहिना स्वर चल रहा होगा तो नाभि केन्द्र का ज्योति मंडल सूर्य के समान तनिक नीलिमा लिये हुए श्वेत वर्ण का होगा और उसके दाहिने भाग में से निकलने वाले पिंगला नाड़ी में होकर श्वांस प्रश्वांस क्रिया होगी।
नाभि से नीचे मूलाधार में होकर मेरुदंड तथा मस्तिष्क में होती हुई दाहिने नथुने तक पिंगला नाड़ी गई है और नाभि चक्र के दाहिने भाग में चैतन्यता होती है और दाहिना स्वर चलता है।
इस सूक्ष्म क्रिया को ध्यान शक्ति द्वारा ऐसे मनोयोग पूर्वक निरीक्षण करना चाहिए कि वस्तु स्थिति ध्यान क्षेत्र में चित्र के समान स्पष्ट रूप से दिखने लगे। जब स्वर संधि होती है तो वह नाभि चक्र स्थिर हो जाता है।
उसमें कोई हलचल नहीं होती और न उतनी देर तक वायु का आवागमन होता है। इस संधि काल में एक तीसरी नाड़ी मेरुदंड में अत्यन्त द्रुत वेग से बिजली के समान कोंधती है ।
साधारणतः एक क्षण के सौवें भाग में यह कोंध जाती है, इसे ही सुषुम्ना कहते हैं। सुषुम्ना का जो विद्युत प्रवाह है वही आत्मा की चंचल झांकी है। आरम्भ में यह झांकी एक हलके झटके के समान किंचित प्रकाश की मंद किरण जैसी होती है।
साधना से यह चमक अधिक प्रकाशवान और अधिक देर ठहरने वाली होती है। कुछ दिन बाद वर्षा काल में बादलों के मध्य चमकने वाली बिजली के समान उसका प्रकाश और विस्तार होने लगता है।
सुषुम्ना ज्योति में किन्हीं रंगों की आभा होना, उसका सीधा टेढ़ा तिरछा या वर्तुलाकार होना आत्मिक स्थिति का परिचायक है। तीन गुण, पांच तत्व, संस्कार एवं अन्तः करण की जैसी स्थिति होती है उसी के अनुरूप सुषुम्ना का रूप ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होता है।
इड़ा पिंगला की क्रियाएं जब स्पष्ट दिखने लगें तब उनको साक्षी रूप से अवलोकन कीजिए। नाभि चक्र के जिस भाग में ज्वार भाटा आ रहा होगा वही स्वर चल रहा होगा और केन्द्र के आधार पर सूर्य या चन्द्रमा का रंग होगा।
यह क्रिया जैसे जैसे हो रही है उसको स्वाभाविक रीति से होते हुए देखते रहना चाहिए। एक सांस के भीतर पूरा प्रवेश होने पर जब वह लौटती है तो उसे ‘‘आभ्यांतर संधि’’ कहते है।
जब सांस पूरी तरह बाहर निकल नई सांस भीतर भरना आरम्भ करती है तब उसे ‘वाह्य संधि’ कहते हैं। इन कुम्भक कालों में सुषुम्ना की द्रुत गति गामिनी विद्युत आभा का अत्यन्त चपल प्रकाश विशेष सजगता पूर्वक दिव्य नेत्रों से देखना चाहिए।
सांस लेने और सांस छोड़ने के बीच के समयान्तराल को कुम्भक कहते हैं। किसी भी प्रकार का प्राणायाम करते समय तीन क्रियाएँ की जातीं हैं- पूरक, कुम्भक और रेचक। कुम्भक भी दो प्रकार का होता है।
आन्तरिक कुम्भक और वाह्य कुम्भक। श्वास को अन्दर रोकने की क्रिया को आन्तरिक कुम्भक तथा श्वास को बाहर रोकने की क्रिया को बाहरी कुम्भक कहते।कुम्भक करते समय श्वास को अन्दर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है।
आन्तरिक कुम्भक- इसके अन्तर्गत नाक के छिद्रों से वायु को अन्दर खींचकर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, उतनी देर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ दिया जाता है।
वाह्य कुम्भक - इसके अन्तर्गत वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना सम्भव हो, रोककर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचा लिया जाता है।
जब इड़ा बदल कर पिंगला में या पिंगला बदल कर इड़ा में जाती है। अर्थात् एक स्वर जब दूसरे में परिवर्तित होता है तब सुषुम्ना की संधि बेला आती है। अपने आप स्वर बदलने के अवसर पर स्वाभाविक सुषुम्ना का प्राप्त होना प्रायः कठिन होता है।
इसलिए स्वर विद्या के साधक बताये गये स्वर बदलने के उपायों से वह परिवर्तन करते हैं और महा सुषुम्ना की संधि आने पर आत्म ज्योति का दर्शन करते हैं।यह ज्योति आरम्भ में चंचल और विविध आकृतियों की होती है ।
पर अन्त में स्थिर एवं मंडलाकार हो जाती है। यह स्थिरता की स्थिति में आत्म साक्षात्कार होता है। सुषुम्ना में अवस्थित होना, वायु पर अपना अधिकार कर लेना है।इस सफलता के द्वारा लोक लोकान्तरों तक अपनी पहुंच हो जाती है और विश्व ब्रह्माण्ड पर अपना प्रभुत्व अनुभव होता है।
प्राचीन काल में स्वर शक्ति द्वारा अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियां प्राप्त होती थी। आज के युग में वैसा तो नहीं होता पर ऐसे अनुभव होते हैं मनुष्य शरीर रहते हुए भी मानसिक आवरण में देव तत्व की प्रचुरता हो जाती है।
क्रमशः
10/05/2024, 7:04 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ....46
कुंडली जागरण के लिए क्रिया योग से प्रथमआत्म अनुभूति का प्रयास किया जाता। आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।
अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है । जोआत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है।
आमतौर से सभी लोग यह जानते हैं कि हम शरीर से भिन्न है। पर यह हमारा ज्ञान मस्तिष्क के अग्रभाव तक ही सीमित होता है। हम इस तथ्य को जानते तो हैं पर मानते नहीं।
व्यवहार में लोग अपने को शरीर ही अनुभव करते हैं और शरीर को जिन कामों में लाभ होता है ,सुख मिलता है उन्हें करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं। धन कमाने में और इन्द्रिय भोगों में आमतौर से लोगों का समय खर्च होता है।
जिन चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं ;वे शरीर के लाभ हानि से ही सम्बन्धित होती हैं। शरीर के लिए आत्मा की परवाह नहीं की जाती, पाप, अनीति, छल, दुराचार असत्य को अपनाकर भी लोग स्वार्थ साधन करते है।
जन साधारण का स्वार्थ शरीर स्वार्थ से ही सम्बन्धित होता है। संसार में शरीर को ही ‘मैं’ समझने की आम प्रवृत्ति है। ‘मैं’ का अर्थ आत्मा है इसे जानते जरूर हैं पर व्यवहार में मानते यह हैं कि ‘मैं’ का अर्थ है- मेरा शरीर।
इस दृष्टि कोण से जीवन की गतिविधि में भारी अन्तर आ जाता है। आत्मवादी और भौतिक दृष्टि कोण में वैसे बहुत थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता है पर अन्तर के कारण जो परिणाम उपस्थित होते हैं।
उनमें उतना ही भेद होता जितना आकाश पाताल में। रेल की पटरी में लाइन बदलने की कैंची जहाँ लगी होती है वहाँ कोई बहुत भारी अन्तर दिखाई नहीं देता पर जब एक गाड़ी एक तरफ की गुजरती है ।
और दूसरी गाड़ी दूसरी तरफ से तो अन्त में जब चलते चलते दोनों गाड़ियाँ पहुँचती हैं उन स्थानों में सैंकड़ों हजारों मील का अन्तर होता है। एक पूर्व में पहुँचती है तो दूसरी पश्चिमी में।
कैंची के काटने में दो चार अंगुल का फर्क होता है पर अन्त में उसका प्रतिफल बहुत ही भिन्न होता है। ठीक यही हालत आत्मिक और भौतिक दृष्टिकोणों के बीच में है। जो व्यक्ति अपने को आत्मा मानता है ।
वह अपना स्वार्थ उसे समझता है.. जिससे आत्मकल्याण होता है। वह आत्मकल्याण करने वाले विचार और कार्यों को अपनाता है। असंख्य मनुष्य स्वर्ग- नरक की, मुक्ति- बंधन की चिन्ता न करके आत्म हनन करते हुए भौतिक संपदायें कमाते हैं ।
जिससे उनको मनोवाँछित सुख सामग्री प्राप्त हो सके। मैं शरीर हूँ' इसलिए शरीर सुख के लिए धर्म अधर्म की परवाह न करता हुआ भौतिक संपदाएं कमाता है उसी के लिए जीवन का प्रत्येक क्षण लगाता है ।
आज के इस लोकव्यापी दृष्टिकोण में परिवर्तन किये बिना कोई मनुष्य, कोई समाज, कोई राष्ट्र, सुख शान्ति से नहीं रह सकता। मैं आत्मा हूँ, ईश्वर का अविनाशी राजकुमार हूँ, अपने शरीर और मन का उपयोग केवल उन्हीं कार्यों में करूंगा -जो मेरे गौरव के, कर्तव्य के, अनुकूल हैं।”
यह आध्यात्मिक दृष्टिकोण जिन व्यक्तियों ने अपना लिया है उनका जीवन क्रम सतोगुणी ढाँचे में ढल जाता।भौतिक दृष्टिकोण मनुष्य को चिन्ता, क्रोध, शोक, द्वेष, कलह, ईर्ष्या, मद, प्रस्तर, मोह, रोग, उद्वेग आवेश का नारकीय प्रतिफल उपस्थित करता है ।
और आत्मिक दृष्टिकोण के कारण प्रेम सहयोग, प्रसन्नता, साहस, अभय, सन्तोष एवं सात्विक आनन्द का उपहार प्राप्त होता है। इनमें एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग कहा जा सकता है।
योग साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का प्रथम द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है।
सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि ''मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ। केवल वही कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।
यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर आत्म जागरण योग टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए।
लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता इसको आत्मिक भूमिका का जागरण कहते हैं।
आत्मज्ञान शास्त्र से नहीं, स्वयं से उत्पन्न होता है ; शब्द से नहीं, निशब्द से उत्पन्न होता है ; विचार से नहीं निर्विचार से उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान विकल्पों के इकट्ठा करने से नहीं निर्विकल्प समाधि में समाधान में उत्पन्न होता है।
इसलिए शास्त्र आत्मज्ञता नहीं देता, स्वयं का बोध ही, स्वयं के प्रति जागना ही आत्मज्ञान है। इंजीनियरिंग ,
पढ़नी हो शास्त्रज्ञान से हो जाएगा। पर स्व के संबंध में बोध शास्त्र से नहीं हो सकता। शास्त्र तो विचार को परिपक्व कर देंगे।
आत्मज्ञान तो विचार के टूटने से होता है। शास्त्र तो बुद्धि को एक विशिष्ट तर्क भर देंगे और आप सोचते हैं कि आपको आत्मा का ज्ञान हो गया है तो आप भी गलती में हैं। एक प्रचार आपके चित्त में बैठा है कि आत्मा है।
ईश्वर है। प्रचार से विचार परिपक्व हो जाता है, अनुभव नहीं होता है। अगर आपको आत्म-सत्य का अनुभव करना है तो प्रचार के प्रभाव छोड़ देने होंगे। जो स्वयं में भीतर है उसका निष्प्रभाव स्थिति में जागरण होता है।
प्रभाव तो बाह्य है। प्रभाव के अभाव में ही स्वयं का बोध अनुभव होता है।इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित होने की व्यवस्था है।
लेकिन वह जो भीतर छुपा है, इस परिचय में अपरिचित हो जाता है। स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है।
इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं। आंख बाहर ही देख सकती है ;भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने , योगियों ने कहा है, ''लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा''।
लौटाने का मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो देखने वाला बाहर न जाकर अपनी तरफ लौट आएगा।
स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है। स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ बाहर की ध्वनि ,तरंगों का जाल कान से छूट जाए।
कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है ;वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।
जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो अपनी तरफ लौट आएगा,झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी।ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से।
वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं बोध संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं।
उनका इंद्रियों से कोई भी लेना ,देना नहीं है। कमरे में, कितना ही गहन अंधकार हो आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा।
कोई भी स्थिति हो आप तो रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है। इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म अनुभव प्रत्यक्ष है।
यह बड़ी उलटी बात है क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है ,आप दिखाई पड़ रहे हैं। सब चीजें प्रत्यक्ष हैं, आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं ।
कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम आंख है। आंख धोखा दे सकती है।बनास्तिकों ने एक ही प्रत्यक्ष प्रमाण माना है ।
कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे।लेकिन आंख रात में सपने भी देखती है । वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है और जब आंख रस्सी में, सांप देखती है।
तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग -मरीचिका दिखाई पड़ जाती है। इसलिए इंद्रियों का इतना भरोसा नहीं है ।
सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है।मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं हैं। लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है ..अकेला मैं ही हूं।
कोई धोखा देने वाला तत्व, कोई विकृत करने वाला तत्व बीच में नहीं है। इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है। और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है।आत्मा स्वयं प्रकाशित है।
उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है। अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला।
सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है। लेकिन दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है।
आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा।
अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है।वलेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता।
संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।बजगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं।एक छोटा सा जीवकोष्ठ है।
अमीबा'- उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है।उसे स्पर्श का अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो जगत को जानने की दृष्टि से अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है लेकिन आत्मा की दृष्टि से नहीं ।
जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है।कोई आश्चर्य न होगा कि किसी ग्रह पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,. तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए।
हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि छठवीं इंद्रिय क्याहोगी क्योंकि हमारा ज्ञान पांच का है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पांचवी इंद्रिय क्या होगी ।
क्रमशः
11/05/2024, 9:41 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग .....47
आत्मजागृति उपरांत क्रियायोग से साधक की यात्रा आगे बढ़ती । आइए थोड़ा समझते क्रियायोग क्या है। क्रिया योग की साधना प्राचीन योग पद्धति है, जिसे आधुनिक समय में महावतार बाबाजी के शिष्य लाहिरी महाशय के द्वारा 1861 के आसपास पुनर्जीवित किया गया ।
परमहंस योगानन्द की पुस्तक ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए योगी के माध्यम से प्रसारित हुआ। इस पद्धति में प्राणायाम के कई स्तर होते जो ऐसी तकनीकों पर आधारित हैं जिनका उद्देश्य आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया को तेज़ करना और ईश्वर के साथ जुड़ाव की परम स्थिति को उत्पन्न करना होता है।
इस प्रकार क्रिया योग ईश्वर-बोध, यथार्थ-ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है। जिसके द्वारा मानव-रक्त कार्बन से रहित तथा ऑक्सीजन से प्रपूरित हो जाता है। इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु जीवन प्रवाह में रूपान्तरित होकर मस्तिष्क और मेरूदण्ड के चक्रों को नवशक्ति से पुनः पूरित कर देते है।
प्रत्यक्ष प्राणशक्ति के द्वारा मन को नियन्त्रित करनेवाला क्रियायोग अनन्त तक पहुँचने के लिये सबसे सरल और अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है। बैलगाड़ी के समान धीमी और अनिश्चित गति वाले धार्मिक मार्गों की तुलना में क्रिया योग द्वारा ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग को विमान मार्ग कहना उचित होगा।
मनुष्य की श्वसन गति और उसकी चेतना की भिन्न भिन्न स्थिति के बीच गणित के अनुसार सम्बन्ध होने के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। मन की एकाग्रता धीमे श्वसन पर निर्भर है। तेज या विषम श्वास भय, काम क्रोध आदि हानिकर भाव आवेगों की अवस्था का सहचर है।
जैसा की योगानन्द द्वारा क्रिया योग को वर्णित किया गया है,"एक क्रिया योगी अपनी जीवन उर्जा को मानसिक रूप से नियंत्रित कर सकता है ताकि वह रीढ़ की हड्डी के छः केंद्रों के इर्द-गिर्द ऊपर या नीचे की ओर घूमती रहे मस्तिष्क, गर्भाशय ग्रीवा, पृष्ठीय, कमर, त्रिक और गुदास्थि संबंधी स्नायु जाल जो राशि चक्रों के बारह नक्षत्रीय संकेतों, प्रतीकात्मक लौकिक मनुष्य के अनुरूप हैं।
मनुष्य के संवेदनशील रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्द उर्जा के डेढ़ मिनट का चक्कर उसके विकास में तीव्र प्रगति कर सकता है; जैसे आधे मिनट का क्रिया योग एक वर्ष के प्राकृतिक आध्यात्मिक विकास के एक वर्ष के बराबर होता है।
क्रियायोग "आत्मा में रहने की पद्धति" की साधना है"।प्राचीन भारत में क्रिया योग भली भांति जाना जाता था, किन्तु अंत में यह खो गया, जिसका कारण था पुरोहित गोपनीयता और मनुष्य की उदासीनता। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में क्रिया योग को संदर्भित किया है।
जब "भगवान श्रीकृष्ण यह बताते है कि उन्होंने ही अपने पूर्व अवतार में अविनाशी योग की जानकारी एक प्राचीन प्रबुद्ध, वैवस्वत को दी जिन्होंने इसे महान व्यवस्थापक मनु को संप्रेषित किया। इसके बाद उन्होंने, यह ज्ञान भारत के सूर्य वंशी साम्राज्य के जनक इक्ष्वाकु को प्रदान किया।
क्रिया योग शारीरिक अनुशासन, मानसिक नियंत्रण और ॐ पर ध्यान केंद्रित करने से निर्मित है। उस प्रणायाम के जरिए मुक्ति प्राप्त की जा सकती है जो प्रश्वसन और अवसान के क्रम को तोड़ कर प्राप्त की जाती है। क्रिया के साथ कई विधियां जुडी हुई हैं ।
जो प्रमाणित तौर पर गीता, योग सूत्र, तन्त्र शास्त्र और योग की संकल्पना से ली गयी हैं। क्रिया योग एक प्राचीन ध्यान की तकनीक है, जिससे हम प्राण शक्ति और अपने श्वास को नियंत्रण में ला सकते हैं। यह तकनीक महान संत महावतार बाबाजी ने 1861मेंअपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को सिखाई।
लाहिड़ी महाशय ने फिर यह तकनीक अपने शिष्यों को सिखाई, जिनमे से एक स्वामी श्री युक्तेश्वर जी थे, जिन्होंने अपने शिष्यों को यह तकनीक सिखाई, जिनमे से एक परमहंस योगानंद जी थे। फिर उन्होंने अपनी किताब ‘एक योगी की आत्मकथा’ के द्वारा क्रिया योग को प्रचलित किया।
परमहंस योगानंद जी के अनुसार- योग के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए , क्रिया योग आज के ज़माने में मनुष्य को उपलब्ध सबसे प्रभावशाली तकनीक है। क्रिया योग इतना प्रभावशाली इसलिए है क्योंकि वह विकास के स्रोत के साथ प्रत्यक्ष रूप से काम करता है।
हमारी मेरुदंड के भीतर आध्यात्मिक शक्ति है। सभी योग कीं तकनीकें इसी शक्ति के साथ काम करतीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। उदाहरण स्वरूप, योगासन रीढ़ के अंदर मार्ग खोलने में मदद कर सकते हैं, एवं भीतर शक्ति को संतुलित कर सकते हैं।
योग श्वास-नियंत्रण तकनीक अथार्त प्राणायाम, इस शक्ति को जागरूक करने में मदद कर सकतें हैं। परन्तु क्रिया योग इनसे अधिक प्रत्यक्ष है। यह तकनीक अभ्यास करने वाले की प्राण-शक्ति को नियंत्रित करने में मदद करती है।
जब इस तकनीक को चेतना और इच्छाशक्ति के साथ किया जाए तो प्राण शक्ति मानसिक रूप से मेरुदंड में ऊपर और नीचे ले जाई जा सकती है।एक क्रिया, जिसको करने में आधे मिनट के करीब लगता है, एक साल के कुदरती आध्यात्मिक विकास के बराबर है।
क्रिया योगी पातें है कि उनकी धारणा शक्ति बढ़ जाती है, ताकि वे व्यापार और गृहस्थ जीवन में प्रभावशाली बन सकें, और हर तरह से अच्छा इंसान बन सकें। क्रिया योग एक साधन है जिसके द्वारा मानवीय विकास को तीव्र किया जा सकता है।
प्राचीन ऋषियों ने खोज की कि ब्रह्माण्डीय चेतना के रहस्य का श्वास पर नियंत्रण के साथ गहरा संबंध है। ह्रदय की धड़कन को कायम रखने में सामान्यतः जो प्राण शक्ति लगती है उसे अंतहीन माँगों को शान्त करने और रोकने की विधि द्वारा, उच्चतर कार्यों के लिए मुक्त किया जाना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा :मैंने विवस्वत (सूर्य-देव) को यह अविनाशी योग प्रदान किया; विवस्वत ने यह ज्ञान मनु को दिया; मनु ने इसके बारे में इक्ष्वाकु (क्षत्रियों के सूर्यवंश के संस्थापक) को बताया।
इस प्रकार क्रमपूर्वक एक-से-दूसरे तक आते हुए, राजर्षियों ने इसे जाना था। परन्तु, हे शत्रुओं को भस्मीभूत करने वाले (अर्जुन)! कालांतर में, यह योग धरती पर से लुप्त हो गया था। अन्य भक्त प्राण के भीतर जाते श्वास को अपान के बाहर जाते प्रश्वास में।
तथा अपान के बाहर जाते प्रश्वास को प्राण के भीतर जाते श्वास में हवन करते हैं, और इस प्रकार प्राणायाम (क्रियायोग की प्राणशक्ति पर नियन्त्रण विधि) के निष्ठावान् अभ्यास द्वारा श्वास एवं प्रश्वास के कारण को रोक देते हैं अथार्त सांस लेना अनावश्यक बना देते हैं
इस प्रकार ये दो श्लोक राजसी योग की ऐतिहासिक पुरातनता की घोषणा करते हैं ।आत्मा और परमात्मा को जोड़ने वाला शाश्वत, अपरिवर्तनीय विज्ञान। इसके साथ ही, गूढ़ रूप में समझने पर, ये श्लोक इस विज्ञान का एक संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
ये श्लोक उन चरणों के बारे में बताते हैं जिनके द्वारा आत्मा, विश्व-चैतन्य से मानव शरीर के साथ पहचान की नश्वर अवस्था में उतरी है, तथा किस मार्ग के द्वारा यह परमानंदमय अनन्त परमात्मा रूपी अपने स्रोत तक वापस लौट सकती है।
आरोहण, अवरोहण मनुष्य में यह रास्ता अनन्त को जाने का आंतरिक राजमार्ग है। सभी युगों में सभी धर्मों के अनुयायियों के लिये परमात्मा से मिलन का यह एकमात्र मार्ग है। इस एकमात्र राजमार्ग पर व्यक्ति विश्वासों या साधना-प्रणालियों के किसी भी उपमार्ग द्वारा पहुँचे ।
शरीरी चेतना से ब्रह्म तक का अंतिम आरोहण सबके लिये समान है। यह आरोहण, प्राण-शक्ति और चेतना का इन्द्रियों से प्रत्याहार होकर, सूक्ष्म मस्तिष्क मेरु केंद्रों में प्रकाश के द्वारों के द्वारा ऊपर जाने से होता है। जड़ तत्त्व की चेतना प्राण-शक्ति में विलीन हो जाती है।
प्राण-शक्ति मन में, मन आत्मा में, और आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है।आरोहण की विधि राजयोग है। राजयोग का अनन्त विज्ञान, सृष्टि के उत्पन्न होने के साथ ही, सृष्टि में अंतर्भूत रहा है। क्रिया प्राणायाम करने की राजयोग की एक विकसित विधि है।
क्रिया मस्तिष्क व मेरुदंड में सूक्ष्म प्राण ऊर्जा को सुद्रढ एवं पुनर्जीवित करती है। भारत के प्राचीन ऋषियों ने मस्तिष्क और मेरुदंड को जीवन के वृक्ष के रूप में निरूपित किया था। क्रिया के अभ्यास के परिणामस्वरूप अत्यंत शांति और आनंद प्राप्त होता है।
क्रिया से प्राप्त आनन्द, समस्त सुखदायक भौतिक संवेदनाओं के एकत्रित आनन्द से अधिक होता है। इन्द्रिय जगत् से अनासक्त हो, योगी आत्मा के नित्य-नवीन आनंद का अनुभव करता है। आत्मा एवं परमात्मा के दिव्य मिलन में लीन हो, वह अविनाशी आनंद प्राप्त करता है।
योगियों ने यह खोज निकाला था कि विशेष क्रियायोग की विधि के प्रयोग द्वारा प्राण ऊर्जा को निरंतर ऊपर और नीचे मेरुदंड के मार्ग से प्रवाहित करके, यह संभव है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास और चेतना बहुत अधिक तीव्र गति से किया जा सके।
प्रयोग का सही अभ्यास हृदय तथा फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र की सामान्य गतिविधियों को स्वाभाविक रूप से धीमी गति में पहुंचा देता है जिससे शरीर और मन में आंतरिक शांति भर जाती है तथा जगत में होने वाली हलचल जो विचारों, भावनाओं और इंद्रियों के विषयों के ग्रहण करने से उत्पन्न होती हैं।
उन्हें शांत किया जा सकता है। स्थिर अंतःकरण की स्पष्ट अवस्था में, साधक को एक गहरी शांति का अनुभव होता है और वह स्वयं को अपनी आत्मा के और परमात्मा की चेतना के बहुत निकट अनुभव करता है।
क्रमशः
12/05/2024, 7:24 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ....48
जो लोग क्रियायोग का अभ्यास किये बिना नहीं रहते, और जो ध्यान में लम्बे समय तक बैठते हैं एवं ईश्वर से तीव्रता से प्रार्थना करते हैं, वे उस चिर वांछित खज़ाने को अवश्य प्राप्त करेंगे। पहले अपने हृदय में एक अनन्त शान्ति, और इसके बाद एक परम आनन्द को अनुभव करने का प्रयास करते हुए इस विचार पर ध्यान लगाएँ, “मैं और मेरे परमपिता एक हैं।
जब उस परम आनन्द का अनुभव होने लगे, तो कहें, “परमपिता, आप मेरे साथ हैं। अपने अन्तर में स्थित आपकी शक्ति को मैं आदेश देता हूँ कि वह बुरी आदतों की मेरी मस्तिष्कीय कोशिकाओं को, और पुराने प्रवृत्ति-बीजों को भस्मिभूत कर दे।” ध्यान में ईश्वर की शक्ति ऐसा कर देगी।
पुरुष या स्त्री होने की संकीर्ण चेतना से खुद को छुटकारा दिलाये, यह जानें कि आप ईश्वर के बच्चे हैं। फिर मानसिक रूप से प्रतिज्ञापन करें और ईश्वर से प्रार्थना करें : “मैं अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को आज्ञा देता हूँ कि वे बदल जाएँ, कि वे बुरी आदतों के उन खाँचों को ध्वस्त कर दें जिन्होंने मुझे एक कठपुतली बना दिया है।
हे प्रभु! अपने दिव्य प्रकाश में इन्हें भस्म कर दें।” और जब आप विशेष रूप से ध्यान क्रियायोग की विधियों का अभ्यास करेंगे, तो आप वास्तव में देखेंगे कि परमेश्वर का प्रकाश आप को निर्मल कर रहा है। ईश्वर के साथ समस्वरता के द्वारा आप अपनी अवस्था को एक नश्वर जीव से एक अमर प्राणी में बदल सकते हैं।
जब आप ऐसा करेंगे, आपकी सीमितताओं के सभी बंधन टूट जायेंगे। यह एक बहुत ही महान् नियम है जिसे याद रखना चाहिये। जैसे ही आपका ध्यान केन्द्रित होता है, सभी शक्तियों की शक्ति आपकी सहायता के लिये आयेंगे और इसके साथ ही आप आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक सफलता प्राप्त कर सकेंगे।
सबसे महान् प्रेम जो आप अनुभव कर सकते हैं वह ध्यान में ईश्वर के साथ एकत्व में ही प्राप्त किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा के बीच का प्रेम पूर्ण प्रेम है-वह प्रेम जिसे हम सब खोज रहे हैं। यदि आप गहनता से ध्यान करेंगे तो एक ऐसा प्रेम आप पर छा जायेगा जो अवर्णनीय है ।
और आप दूसरों को वह विशुद्ध प्रेम देने में सक्षम हो जायेंगे। जब आप उस दिव्य प्रेम का अनुभव करेंगे, तब आप फूल और जानवर में, एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य में कोई अंतर नहीं देखेंगे। आप सारी प्रकृति के साथ एकात्मता स्थापित करेंगे ।
और समस्त मानवजाति से समान रूप से प्रेम करेंगे। भय की समाप्ति भी ईश्वर के संपर्क से ही आती है, अन्य किसी विधि से नहीं। योग के द्वारा आप उनसे वह संपर्क स्थापित कर सकते हैं। यदि आप प्रभु से प्रेम करते हैं तो आप क्रिया का अत्यधिक भक्ति और निष्ठा के साथ अभ्यास करेंगे।
प्रभु को क्रियायोग और प्रार्थना द्वारा निरन्तर खोजें; प्रसन्नचित्त बनें, क्योंकि भगवद्गीता का उद्धरण देते हुए महावतार बाबाजी ने एक बार कहा था : “इस सच्चे धर्म का थोड़ा-सा भी अभ्यास (जन्म-मृत्यु के चक्र में निहित) महान् भय से तुम्हारी रक्षा करेगा।
जब क्रियायोग द्वारा मन इन्द्रियजन्य विकारों से रहित हो जाता है, तब ध्यान हमारे प्रत्येक अणु को भी ईश्वर की प्रतीति करा देता है। और ध्यान में हमारी प्रत्येक समस्या के लिये ईश्वर का तत्क्षण मार्गदर्शन, उसका समुचित प्रत्युत्तर, भी मिलता है।
क्रिया योग ध्यान के प्रमुख तीन तकनीक हैं जो इस प्रकार हैं -
1- ऊर्जावान व्यायाम/शक्ति-संचार की प्रविधि
2- एकाग्रता की हंसः प्रविधि
3-ओम् ध्यान की तकनीक
नित्य प्रति के अभ्यास से मानसिक व बौद्धिक विश्राम प्राप्त होता है तथा उर्जस्वी संकल्प शक्ति का विकास होता है। सांस, प्राण वायु और एकाग्रता का प्रयोग करके यह विधि साधक को अपनी इच्छा अनुसार ऊर्जा अपने शरीर में आकर्षित करने में समर्थ बनाती है ।
जिससे शरीर के अंगों का शुद्धिकरण होता है और साथ ही वह अधिक पुष्ट भी हो जाते हैं। शक्ति-संचार व्यायाम जो लगभग 15 मिनट में पूरे किए जाते हैं। दबाव दूर करने व तंत्रिका तंत्र का तनाव मिटाने की विधियों में से एक सबसे अधिक प्रभावशाली विधि है।
ध्यान से पहले इसका अभ्यास करने से चेतना की शांत, अंतर्मुखी अवस्था पाने में बहुत सहायता मिलती है। प्राणायाम की वैज्ञानिक विधि की सहायता से योगी अंततः उस बहिर्मुखी प्राण-शक्ति को उलटने में सफल होता है जिसने उसकी चेतना को श्वास एवं हृदय की कार्यशीलता में तथा विषयों में फँसे प्राण–प्रवाहों में बहिर्मुखी बना रखा था।
वह आत्मा व परमात्मा के नैसर्गिक आंतरिक शांति साम्राज्य में प्रवेश करता है। तंत्रिकाओं से मन और प्राण-शक्ति को वापस हटा कर, योगी उन्हें मेरुदण्ड के द्वारा मस्तिष्क में, और फिर अनन्त प्रकाश में ले जाता है। यहाँ मन एवं प्राण-शक्ति, मस्तिष्क में अभिव्यक्त ब्रह्म के शाश्वत ज्ञान के साथ एक हो जाते हैं।
2 एकाग्रता की हंसःविधि ;-
हंसः प्रविधि एकाग्रता की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने में सहायता करती है। प्राण-शक्ति, जड़-सृष्टि और परमात्मा के बीच की कड़ी है। बहिर्मुखी होकर, यह इन्द्रियों के छद्म-आकर्षक जगत् को प्रकट करती है। अंतर्मुखी हो यह चेतना को ईश्वर के सदा-संतुष्टिकारी परमानंद की ओर खींचती है।
इस प्रविधि के अभ्यास से साधक बाह्य विकर्षणों से अपने विचारों और प्राणशक्ति को हटा कर उन्हें किसी वांछित लक्ष्य की प्राप्ति पर या फिर किसी समस्या के समाधान के लिए केंद्रित करना सीखता है। अथवा साधक उस एकाग्र किये गए मन को अंतर में स्थित दिव्य चेतना का बोध प्राप्त करने के लिए प्रयोग कर सकता है।
3-ओम् विधि;-
ध्यान की ओम् प्रविधि से साधक अपनी एकाग्रता की शक्ति को उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयोग करना सीखता है यानि अपने आत्म-स्वरुप के दिव्य गुणों को पहचानने एवं विकसित करने के लिए। यह पुरातन विधि सिखाती है ओमकार के रूप में सर्वव्यापी दिव्य शक्ति का अनुभव किस प्रकार किया जा सकता है।
उस दिव्य शक्ति का जो संपूर्ण सृष्टि का सृजन करती है और उसका पालन-पोषण करती है। यह प्रविधि चेतना का विस्तार करती है जिससे साधक अपने शरीर और मन के परिसीमनों को लांघकर अपनी अनंत क्षमताओं का आनंदमय बोध प्राप्त करता हैं ।
क्रमशः
12/05/2024, 11:45 pm - +91 96908 82579: मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ईश्वर से ही प्रार्थना करते हैं सभी योगिया में मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं धरती माता और जन्मदिन वाली माता और गुरु के स्वरूप में गुरु माता और हमारे शरीर में देव के साथ देवी का स्वरूप रहने वाली माता जिसे हम कुंडली शक्ति भी कहते हैं उन सब को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं सभी माताए अपनी कृपा अपने बच्चों पर बनाए रखें
14/05/2024, 10:19 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग......49
लाहिड़ी महाशय का क्रिया योग चेतना के एकीकरण पर बल देता है । क्रिया योग हठयोग , राज योग और लय योग का अनूठा मेल है। यह साधक को उसकी स्वाभाविक अवस्था में लाता है जिसमें उसका शरीर ग्रंथियों और चक्रों से ही निर्देश प्राप्त करता है।
''सांसहीन अवस्था ' वर्षों के क्रिया अभ्यास के बाद अनुभव किया जाता है। जबरदस्ती सांस रोक कर रखने से इसका कोई संबंध नहीं है। यह वह अवस्था है जहाँ साधको को सांस लेने की जरूरत महसूस नहीं होती या वे बहुत कम सांस लेते हैं।
क्रिया सिद्धांत के अनुसार, यह अवस्था रीढ़ की हड्डी के अंदर सुषुम्ना चैनल जागरूक होने का परिणाम है। क्रियायोग एक सेतु का कार्य करता जिससे मंजिल का रास्ता कम हो जाता । किन्तु शुरुवात सामान्य योग प्राणयाम से कर साधक इस सेतु तक पहुंच सकते।
क्रिया योग के प्रमुख घटक जिस बारे विस्तार से बताते हम आने वाली पोस्टो में वो ये है।
1- तालव्य क्रिया
2- नाभि क्रिया
3-स्पाइनल सेंटरों को जगाने की तकनीक
4-होंग-सॉ तकनीक
5-योनि तथा शाम्भवी मुद्रा
6--मानसिक प्राणायाम
7-क्रिया योग प्राणायाम
8-महामुद्रा
यहां सबसे पहले हम चक्रों की स्थिति बारे बात करते । चक्र रीढ़ की हड्डी के अंदर सूक्ष्म एस्ट्रल अंग हैं। क्रिया योग में पंखुड़ियों के साथ चक्र की कल्पना करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है । जब मानसिक मौन, विश्राम, आत्मा की तीव्र अभीप्सा ,क्रिया प्राणायाम का अभ्यास होता तो "आंतरिक मार्ग" और आध्यात्मिक वास्तविकता प्रकट होती है।
तब आप सूक्ष्म आयाम में चक्रों की वास्तविकता का अनुभव करेंगे। आप उनके सूक्ष्म कंपन के साथ-साथ उनके स्थानों से निकलने वाले प्रकाश के रंगों का अनुभव कर सकेंगे। खेचरी मुद्रा का अभ्यास इस अनुभव को बढ़ावा देता है, खासकर जब सांस की "हवा" कम हो जाती है।
प्रत्येक चक्र की प्रकृति दो पहलुओं को प्रकट करती है, एक आंतरिक और एक बाहरी। चक्र का आंतरिक पहलू, इसका सार, "प्रकाश" का एक कंपन है जो आपकी जागरूकता को ऊपर की ओर, आत्मा की ओर आकर्षित करता है।
चक्र का बाहरी पहलू, इसका भौतिक पक्ष, भौतिक शरीर के जीवन को जीवंत और बनाए रखने वाला एक फैला हुआ "प्रकाश" है। अब, क्रिया प्राणायाम के दौरान रीढ़ की सीढ़ी पर चढ़ते समय, आप चक्रों को छोटी "चमकती रोशनी" के रूप में देख सकते हैं।
एक खोखली नली को रोशन करना जो रीढ़ की हड्डी है। फिर जागरूकता को नीचे लाया जाता है, तब चक्रों को आंतरिक रूप से अंगों के रूप में माना जाता है। शरीर में ऊर्जा (उपरोक्त अनंत से आने वाली) वितरित करना, शरीर के उस हिस्से को जीवंत करना उनका कार्य है।
पहला चक्र, मूलाधार, टेलबोन के ठीक ऊपर रीढ़ की हड्डी का आधार होता है। दूसरा चक्र, स्वाधिष्ठान, सर्कल रीजन में, मूलाधार और मणिपुर के बीच में है। तीसरा चक्र, मणिपुर, लुम्बर रीजन में, नाभि के समान स्तर पर है। चौथा चक्र, अनाहत डोर्सल रीजन में है।
शोल्डर ब्लेड को करीब लाकर और उनके बीच या उनके ठीक नीचे के क्षेत्र में तनावपूर्ण मांसपेशियों पर ध्यान केंद्रित करके इसके स्थान को महसूस किया जा सकता है। पाँचवाँ चक्र, विशुद्ध, वहाँ स्थित है जहाँ गर्दन कंधों से जुड़ जाता है।
इसके स्थान का पता सिर को बगल से हिलाकर, छाती के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखकर और उस बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके लगाया जा सकता है जहां आप "क्रैकिंग" ध्वनि का अनुभव करते हैं। छठे चक्र को आज्ञा कहा जाता है।
मेडुला ओबलोंगता और कुटस्य (भौंहों के बीच का बिंदु) आज्ञा से संबंधित हैं और इन्हें अलग-अलग संस्थाओं के रूप में नहीं माना जा सकता है।मेडुला को आज्ञा चक्र का भौतिक प्रतिरूप माना जाता है। तीन बिंदुओं में से किसी एक में एकाग्रता की स्थिरता पाकर।
आध्यात्मिक नेत्र, एक अनंत गोलाकार चमक के बीच में एक चमकदार बिंदु, आंतरिक दृष्टि पर प्रकट होता है। यह अनुभव आध्यात्मिक आयाम का रॉयल एंट्रेंस है। कभी-कभी भ्रुमध्य शब्द का प्रयोग कूटस्थ के स्थान पर किया जाता है।
रीढ़ की हड्डी के शीर्ष पर मेडुला का पता लगाने के लिए, अपनी ठुड्डी को ऊपर उठाएं और गर्दन की मांसपेशियों को आधार पर तनाव दें। फिर ओसीसीपिटल हड्डी{खोपड़ी के पीछे की हड्डी} के नीचे के छोटे होलो पर ध्यान केंद्रित करें।
मेडुला उस होलो के ठीक आगे है। मेडुला की सीट से भौंहों के बीच के बिंदु की ओर बढ़ते हुए, अजना की सीट का पता लगाना मुश्किल नहीं है: धीरे धीरे अपने सिर को बग़ल में (कुछ सेंटीमीटर बाएँ और दाएँ) घुमाएँ, जिसमें कुछ महसूस हो जैसे जुड़ाव दो मंदिरों में।
आज्ञा चक्र,भ्रूमध्य, एवम् कूटस्थ--क्रिया योग के अभ्यास के पूर्व साधक को स्पष्ट ज्ञात होना आवश्यक है कि आज्ञा चक्र क्या है तथा उसकी स्थिति मस्तक में कहाँ है। आज्ञा चक्र को भ्रूमध्य मान लिया जाता है जो कि एक सहज भूल है।
भ्रूमध्य वस्तुतः आज्ञा चक्र का आंतरिक परिक्षेत्र है; हाई टेंशन विद्युत क्षेत्र,अर्थात भ्रूमध्य पर एकाग्र होना आज्ञा चक्र पर एकाग्र होने के समरूप ही है। इसे ही पिनियल ग्लैंड तथा तृतीय नेत्र कहते हैं। यह मस्तक में मेडुला के ऊपर भ्रूमध्य की ओर अवस्थित है।
अतः भ्रूमध्य को ही आज्ञा चक्र मान लेने में भूल है भी और नही भी,क्योंकि तृतीय नेत्र की दिव्य ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य के परिक्षेत्र में ही होते हैं। लेकिन इस तृतीय नेत्र का दर्शन सूक्ष्म है। वैज्ञानिक यदि तृतीय नेत्र को ढूंढने का प्रयास करेंगें तो उन्हें सिर्फ ग्लैंड मिलेगी।
कूटस्थ सूक्ष्म आध्यात्मिक अस्तित्व है जो देश-काल से परे है। कूट का अर्थ होता है "घन" -लोहार का घन। इसका गूढ़ अर्थ है "वह जो अपरिवर्तनीय है"।आत्मा के जैसे कूटस्थ भी अनश्वर है। योगी को यह विशुद्ध श्वेत तारे के रूप में दिखता है ,जो नीले एवम् सुनहरे मंडल के घेरे में है।
स्पष्ट करने वाली बात यह है कि आज्ञा चक्र एवम् कूटस्थ का मूल स्त्रोत मेडुला है। जब हम चेतना को अंतर्मुखी कर मेडुला पर एकाग्र होते हैं तब आज्ञा चक्र एवम् कूटस्थ की दिव्य ज्योति के दर्शन होते हैं। कोई आश्चर्य नही कि ऐसी अवस्था में हम भ्रूमध्य पर एकाग्र हो जाएं।
अतः स्मरण रहे कि मेडुला ही मुख्य स्त्रोत है। क्रिया में मेडुला तक प्राण का आरोहण पर्याप्त है। दूसरे शब्दों में,यदि हम प्राण ऊर्जा को भ्रूमध्य पर ले जाएं तो हम उसके मूल स्त्रोत मेडुला को ही देखेंगे। मध्य पर आना अर्थात मेडुला पर आना।
यही कारण है कि मेडुला को विश्वतोमुखो(माउथ ऑफ़ गॉड) की संज्ञा दी गई है। यही आत्मा का निवास,आत्म सूर्य की अवस्थिति है,अर्थात मूल स्त्रोत है। यही कारण है कि लाहिड़ी महाशय ने कहा कि आत्म सूर्य (medulla) की परिक्रमा करनी है।
क्रिया में योगी प्राण ऊर्जा को छह चक्रों के इर्द गिर्द (ऊपर नीचे) घुमाता है!अतः क्रिया के अभ्यास के पूर्व आज्ञा चक्र,कूटस्थ एवम् मेडुला का स्पष्ट ज्ञान होना आवश्यक है। मेडुला पर एकाग्र हों एवम् चेतना का प्रवाह भ्रूमध्य की ओर हो । लाहिड़ी महाशय जी ने इंग्लिश के मेडुला शब्द का प्रयोग तो किया नही; वे बोले "कूटस्थ"।अतः सार तत्व मेडुला ही है।
इस प्रकार आज्ञा चक्र का आसन दो रेखाओं का प्रतिच्छेदन बिंदु है । खेचरी मुद्रा के दौरान जीभ की नोक से बहने वाली ऊर्जा पिट्यूटरी ग्रंथि को उत्तेजित करती है। पिट्यूटरी ग्रंथि, या हाइपोफिसिस, एक मटर के आकार की एक अंतःस्रावी ग्रंथि है।
यह मस्तिष्क हाइपोथैलेमस के तल पर एक फैलाव बनाता है। आध्यात्मिक नेत्र का अनुभव प्राप्त करने के लिए इस ग्रंथि पर ध्यान देना सार्थक है। फिर पीनियल ग्रंथि की भूमिका पर जोर देता है। यह मस्तिष्क में एक और छोटी अंतःस्रावी ग्रंथि है।
यह एक छोटे पाइनकोन के आकार का है (प्रतीकात्मक रूप से, कई आध्यात्मिक संगठनों ने पाइन शंकु को एक आइकन के रूप में उपयोग किया है)। यह पिट्यूटरी ग्रंथि के पीछे, मस्तिष्क के तीसरे Ventricle के पीछे स्थित होता है।
पीनियल ग्रंथि पर लंबे समय तक एकाग्रता के बाद सफेद आध्यात्मिक प्रकाश का पूरा अनुभव होने के बाद, यह अंतिम क्रिया मानी जाती है जो आप समाधि में खो जाने से पहले अपने ध्यान को पूर्ण करने के लिए करते हैं। मस्तिष्क में दो और आध्यात्मिक केंद्र है: रूद्री और बामा।
रुद्री मस्तिष्क के बाईं ओर बाएं कान के ऊपर स्थित है, जबकि बामा दाएं कान के ऊपर मस्तिष्क के दाईं ओर स्थित है। हमें उन उच्च क्रियाओं के अभ्यास के दौरान उनका उपयोग करने का अवसर मिलता है। जो मस्तिष्क के ऊपरी भाग में होती हैं।
बिंदु ऑप्टिकल रीजन में स्थित है और इसे अपने आप में एक चक्र नहीं माना जाता है। हालाँकि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है क्योंकि यह एक दरवाजे के रूप में काम करता है जो जागरूकता को सहस्रार तक ले जाता है ।
सिर के शीर्ष पर स्थित है सातवां चक्र। बिन्दु वह स्थान है जहाँ केश रेखा एक प्रकार के भंवर में मुड़ जाती है (यह वह बिंदु है जहाँ चोटी रखते ) सहस्रार के बारे में जागरूक होने के लिए ब्रह्मरंध्र पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सलाह दी जाती हैं।
फॉण्टनेल को अधिक उचित रूप से ''ब्रेग्मा/ ब्रैनग्मा-शीर्षस्थ'' कहा जाता है।आठवां चक्र उच्चतम केंद्र है। यह फॉण्टनेल से लगभग 30 सेंटीमीटर ऊपर स्थित है।
क्रमशः
15/05/2024, 12:35 pm - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग .....50
क्रियायोग के प्रमुख घटको में प्रथम तालव्य क्रिया ओर दूसरी नाभि क्रिया का विवरण इस पोस्ट में कर रहे। तालव्य क्रिया विद्यार्थी को मार्गदर्शन कर खेचरी मुद्रा के योग्य बनाना एक तैयारी व्यायाम है। तालव्य क्रिया क्रियायोग में एक भाग है और इसके तीन भाग है।
इसकी वजह से मणिपुरचक्र में स्पंदन लभ्य होगा। इतना ही नहीं, मणि पुरचक्र से कूटस्थ तक रास्ता साफ हो जायेगा, और विधुत शीघ्रता से सहस्रार पहुंचेगा, और साधक को समाधि की प्राप्ति होगी । तलब्य क्रिया के पहले भाग के दौरान शीशे के सामने अपना मुंह खोलें ।
ताकि बंध के प्रत्येक खोखले भाग देखे जा सकें। खेचरी मुद्रा के दौरान, यह उवुला है जो आगे आता है और केवल जीभ की जड़ दिखाई देती है। नीचे के तीन अभ्यासों को तालव्य क्रिया कहा जाता है। निम्नलिखित सभी अभ्यासों के लिए, जीभ को मुंह में 'रोल बैक' स्थिति में रखा जाता है।
पूरब की ओर मुख करके सीधा बैठिये, मन और दृष्टि कूटस्थ में रखिये।
प्रथम भाग :-
तलब्य क्रिया आराम की स्थिति में शुरू करें और जीभ सिरा ऊपरी दांतों के पिछले हिस्से को हल्के से स्पर्श करें। सक्शन कप प्रभावी बनाने के लिए ऊपरी तालू के खिलाफ जीभ को दबाएं। ऊपरी तालू के खिलाफ दबाने से पहले जीभ की नोक का ऊपरी दांतों के पिछले हिस्से को छूना जरूरी है।
ऊपरी तालु के खिलाफ जीभ को दबाते हुए, निचले जबड़े को तब तक नीचे करें जब तक कि आप स्पष्ट रूप से लिंगुअल फ्रेनुलम (जीभ के नीचे ऊतक की छोटी तह जो इसे मुंह के आधार से जोड़ते हैं) में खिंचाव महसूस न करें।जीभ को तालू के साथ लगाके नीचे ओम करते हुए लाना चाहिये।
इस प्रक्रिया में 'मेंढक के पानी में कूदने' जैसी आवाज आएगी। फ्रेनुलम की स्ट्रेचिंग, इस तरह की ध्वनि के साथ 50 बार किया जाता है।शुरुआत में, फ्रेनुलम को तनाव से बचाने के लिए दिन में 10 पुनरावृत्तियों से अधिक न करें।
द्वितीय भाग :
जीभ को साँप की गति के समान बनाएँ। जीभ को साँप जैसा साइड को और उपर -नीचे करना चाहिये। जीभ के किनारों की गति को नीचे की ओर उठाएँ। इस प्रकार 50 बार किया जाता है।
तृतीय भाग :-
तलब्य क्रिया के कुछ महीनों के नियमित अभ्यास के बाद, जीभ को नासिका ग्रसनी गुहा में डालना संभव होना चाहिए। जीभ को मोड़ के रखिये! अलिजिह्वा का पीछे उपस्थित होल में इस मोड़ी हुई जीभ को रखना चाहिये।इस के लिए दोनों उंगलीयों से बंध को दबाके पीछे ठोकना चाहिए।
खेचरी मुद्रा में महारत हासिल करने के बाद भी, तलब्य क्रिया का अभ्यास जारी रखना चाहिए क्योंकि यह सोचने की प्रक्रिया पर विराम देने का प्रभाव पैदा करता है। यह अज्ञात है कि फ्रेनुलम को खींचने से विचार उत्पादन क्यों कम हो जाता है।
2- नाभि क्रिया:-
यह विशिष्ट चक्र में किया गया जप है विशेष संख्या में गाइड द्वारा निर्देशित है। श्री लाहिड़ी महाशय नाभी क्रिया को अत्यंत महत्व देते थे। मनु संहिता में है; "धर्म के चार चरण हैं और,इसीलिए,सत्य के भी चार चरण हैं।"लाहिड़ी महाशय ने इसे इस प्रकार समझाया;धर्म चार चरणों में विभाजित है ...
1- खेचरी मुद्रा
2- अनाहत ग्रन्थि का भेदन
3- मणिपुर ग्रन्थि का भेदन
4 -मूलाधार ग्रन्थि का भेदन ।
आदि शंकराचार्य जी ने भी सौंदर्य लहरी में का दृष्टान्त दिया है..।
मुलाधारैकनीलया ब्रम्हग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपुरान्तरूदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ।।
आज्ञाचक्रान्तरलस्था रुद्रग्रंथिविभेदिनी ।
स्पष्ट है कि ग्रन्थिभेदन अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रंथि सुषुम्ना में प्राण प्रवाह को बाधित करती है। ये ग्रन्थियां इड़ा एवम् पिंगला के संगम बिंदु पर बनती हैं।यहाँ हम नाभि क्रिया को समझेंगे जो हमारी क्रिया साधना का महत्वपूर्ण अंग है।
मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान वायु एक दूसरे को पार करते हैं,परिणाम स्वरूप ऊर्जा का उलझाव,गुत्थी या ग्रन्थि बन जाती है। मणिपुर ग्रन्थि को नाभि क्रिया से भेदना आवश्यक है जिससे कुण्डलिनी जागरण निर्बाध हो सके।
नाभि क्रिया की विधि-
1-अपने ध्यान आसन पर बैठें। बन्द आखों से भ्रूमध्य पर एकाग्र हों।श्वास-प्रश्वास को भूल जाएं।
2- अब प्रत्येक चक्र पर ॐ का जप करें, क्रमशः ऊपर जाना है;
3-मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर,अनाहत,विशुद्ध,बिंदु तथा अंत में भ्रूमध्य।
4-जब बिंदु से भ्रूमध्य की ओर जाएं तब धीरे धीरे सिर को नीचे झुकाएं;ठुड्डी को कण्ठ से स्पर्श करवाएं(सहज तथा बिना दबाव के)।
4-अब हांथों को जोड़ें;अंगुलियां एक दूसरे को जकड़े हुए तथा अंगूठे परस्पर मिले हुए। हथेलियाँ नीचे की ओर स्वतः हो जायेंगीं।
5-अब अंगूठों से नाभि पर हल्की हल्की ठोकर लगाएं। ठोकर देते समय अंगूठों को 1 या 1.5 इंच से अधिक दूर न ले जाएं। आपकी ठोकर भी मृदु हो तथा गति भी 1 सेकंड में 2 हो।गति सुविधानुसार कम या अधिक कर सकते हैं।
ठोकरों की संख्या 50-100 हो। प्रत्येक ठोकर के साथ ॐ का मानसिक जप करें।ऐसा करने से समान वायु उदर के मध्य भाग में संग्रहित होती है।इस समय नाभि एवम् भ्रूमध्य आपस में जुड़े हैं,ऐसा भाव हो।
6-अब सिर को धीरे धीरे ऊपर उठाते हुए सामान्य स्थिति में ले आएं।ऐसा करते समय एकाग्रता भ्रूमध्य से बिंदु होते हुए सीधे मणिपुर चक्र पर लाना है।
7-अब हाथों को खोल कर पीठ की ओर ले जाएं।पुनः हाथों को पूर्ववत बांध लें।
8-अब मणिपुर चक्र पर ॐ जप के साथ हल्की हल्की ठोकर लगाएं।संख्या 25 से 75 हो।
9-जब यह पूर्ण हो तब हाथों को सामान्य करते हुए ध्यान मुद्रा में ले आएं।
10-अब भ्रूमध्य पर एक बार ॐ का जप करें फिर मेडुला पर तथा उतरते हुए 5,4,3,2,1,प्रत्येक चक्र पर एक बार ॐ का जप करें।
इस पूरी प्रक्रिया को 4 बार दोहराएं। नाभि क्रिया में ॐ की हल्की ठोकर तथा श्वास का कोई सम्बन्ध नही है। साथ ही ठोकरों की संख्या तथा आगे-पीछे संख्या का अनुपात भी निश्चित नही है।आप इस अनुपात को बराबर भी रख सकते हैं।
ठोकर की गति भी आप अपनी सुविधानुसार तेज या धीमी कर सकते हैं।कुछ उन्नत साधक हाथों का प्रयोग ही नही करते तथा पूरी नाभी क्रिया मानसिक रूप से ही करते हैं।धीरे धीरे साधक को ज्ञात हो जाता है कि उसके लिए क्या उचित होगा।
बिंदु 6 पर जब आप सिर को सामान्य स्थिति में लाएं तो कुछ और पीछे जाएं जैसे की छत की ओर देखने का प्रयास है। ऐसा करने से नाभि चक्र की स्पष्ट अनुभूति होगी।
क्रमशः
15/05/2024, 4:36 pm - +91 99286 78244: अगर प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन संभव हो सके तो कुछ कीजिए, गुरुजी , सिर्फ पढकर ये क्रियाएं सीख पाना अत्यंत दुष्कर है । 🙏🙏
15/05/2024, 6:15 pm - स्वर विज्ञान: रूप सिंह जी यह मात्र जानकारी के लिए है क्रिया करने को नही। आपकी यात्रा तो वही से आगे बढ़ती जो क्रिया आपको करने को कहा गया।
16/05/2024, 9:08 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....51
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के तीसरे घटक स्पाइनल सेंटरों को जगाने की तकनीक ओर चौथे घटक होंग सॉ तकनीक का वर्णन करेगे।
1- सही ध्यान मुद्रा में सीधे बैठें। निश्चित रहें कि रीढ़ की हड्डी सीधी है और शरीर आराम अवस्था में ।
2-आंखें बंद या आधी बंद करके, भौंहों के बीच की दृष्टि को एकाग्र करें। ऐसा करते समय चेहरे के भाव को आरामदायक और शांत रखें।
3- अब रीढ़ की हड्डी को थोड़ी सी बायीं ओर ले जाएँ (शरीर को झटका देकर), फिर दायीं ओर, और अपनी चेतना के केंद्र को शरीर और इंद्रियों से रीढ़ की हड्डियों में बदलें।
अब रीढ़ की हड्डी को थोड़ा बाईं ओर ले जाएँ (शरीर को झुलाकर), फिर दायीं ओर, और अपनी चेतना के केंद्र को शरीर और इंद्रियों से रीढ़ की हड्डियों में बदलें। जब आपका ध्यान रीढ़ की हड्डी में केंद्रित हो, तो शरीर को झुलाना बंद करें।
4- अपनी चेतना को रीढ़ की हड्डी के आधार पर कोसीजील केंद्र अथार्त मूलाधार से भौंहों के बीच के बिंदु तक कई बार ऊपर और नीचे की यात्रा करने दें। अब कोसीजियल केंद्र पर ध्यान केंद्रित करें, और मानसिक रूप से "ओम" का जाप करें।
धीरे-धीरे मानसिक रूप से रीढ़ की हड्डी पर यात्रा करें - मूलाधार से आज्ञा तक सभी चक्रों को महसूस करना - भौंहों के बीच बिंदु पर, प्रत्येक केंद्र में मानसिक रूप से "ओम" का जाप करना। जब आप भौंहों के बीच केंद्रीय बिंदु पर पहुंचते हैं, तो नीचे की ओर लौटें।
भौंहों के मध्य बिंदु पर, मेडुला पर, और पाँच रीढ़ की हड्डी के सुषुम्ना मार्ग में प्रत्येक पर "ओम" जप करें, एक ही समय मानसिक रूप से भावना प्रत्येक केंद्र मे जाये ।
5- इस तरह रीढ़ की हड्डी के ऊपर और नीचे जाते रहें - कोसीजील केंद्र दुमची और कूटस्थ केंद्र के बीच - प्रत्येक चक्र पर "ओम" का जप करते रहें, जब तक कि आपको अलग-अलग महसूस नहीं होता कि आपकी चेतना शरीर से रीढ़ में स्थानांतरित हो गई है।
हमेशा इस तकनीक के अभ्यास को कूटस्थ केंद्र मे समाप्त करें। आप रीढ़ की हड्डी में जाने के बाद प्रत्येक चक्र पर "ओम" का जाप करते हैं।परम तत्व या परंब्रह्म निराकार और निर्गुण है। जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब उसमें से एक स्पंदन निकला जिसे हम ओम के नाम से भी पुकारते हैं।
यह सिर्फ ध्वनि नहीं है बल्कि यह चेतना और प्रज्ञा का स्पंदन है। उसमें शक्ति भी है। आगे चलकर यह ओम जब और घनीभूत होता है यानी सृष्टि का विकास होता है तो यह दूसरे तत्वों में बदल जाता है। इसकी उल्लेख सांख्य दर्शन में भी होता है।
परम तत्व से निकले हुए ओम से ही इस सृष्टि का निर्माण हुआ है। ओम परम तत्व भी है और परम तत्व ओम है। इस तकनीक का पूर्ण अभ्यास आपकी आत्मा को मुक्त करने में मदद करेगा जिससे आप चक्रों को जागृत करने और आत्मा के साथ होने के लिए उन दरवाजो से गुजरते हैं।
4- होंग-सॉ तकनीक:-
यह श्वास को देखने की सरल तकनीक है। साँस लेने और छोड़ने की पूरी अवधि के दौरान आने वाली और बाहर जाने वाली सांसों को बारीकी से देखा जाता है। श्वास की गति को बदलने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है। प्राकृतिक लय बनी रहती है और सांस अपने आप धीमी होने लगती है।
हांग शब्द आने वाली सांस के साथ सिंक्रोनाइज़ होता है और सॉ शब्द आउटगोइंग सांस के साथ सिंक्रोनाइज़ होता है। किसी को एक भी सांस नहीं छोड़नी चाहिए और हांग और सॉ की संगत ध्वनियों के साथ सांस की लंबाई को ध्यान में रखते हुए एक समान होना चाहिए।
आपको इसे किसी भी समय करना चाहिए। इस हांग-सॉ तकनीक का नियमित रूप से अभ्यास किया जाना चाहिए, एक अलग , शांत स्थान में अभ्यास करने का प्रयास करें, इससे ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी और परिणाम तेज होंगे।
क्रमशः
17/05/2024, 11:30 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग....52
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के पंचम घटक योनि मुद्रा या ज्योति मुद्रा ओर शाम्भवी मुद्रा का वर्णन करेगे ।
यह अभ्यास क्रिया के बाद किया जाता है और इसमें क्रिया तत्व, षण्मुखी मुद्रा, ज्योति दर्शन और नाद श्रवण शामिल है। षण्मुखी मुद्रा में बाह्य इन्द्रिय-बोध के सात द्वारों दो कान, दो नेत्र, दो नासिका छिद्र एवं मुँह को बंद कर सजगता को अंतर्मुखी बनाया जाता है।
योनि मुद्रा (ज्योति मुद्रा )-योनि का अर्थ है-अधिष्ठानब (निवास स्थान) यही वह अधिष्ठान है जहाँ योगी स्थिर हो कर आदि शक्ति में लीन होता है।आदि शक्ति,ललिताम्बा,त्रिपुरसुंदरी यहाँ अधिष्ठात्री हैं। योनि मुद्रा का अभ्यास रात्रि में ही करना चाहिए।
परंतु योनि मुद्रा ध्यान की अवस्था में एक विशिष्ठ सोपान है तथा क्रिया के अभ्यास के पहले तथा बाद में भी माता की कृपा होती है। योनि मुद्रा एक स्वयम्भू मुद्रा है तथा इस मुद्रा के संदर्भ में साधक को अभ्यास करना होता है। यही बात महा मुद्रा तथा खेचरी मुद्रा के संदर्भ में भी सत्य है।
ये मुद्राएं योगी की उन्नत क्रमविकास की पराकाष्टा की ओर संकेत करती हैं।अंतः अभ्यास शब्द के स्थान पर "प्रणाम" शब्द का प्रयोग होना चाहिए ।आज्ञा चक्र के माध्यम से भ्रूमध्य में योनि (त्रिकोण) का दर्शन माता की कृपा से ही सम्भव होता है।
लम्बी साधना के बाद ही योगी पात्र हो पाता है। योगी को कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं। आरम्भ में खेचरी मुद्रा के बिना भी योनि मुद्रा को प्रणाम कर सकते हैं। आँखे तथा मुख बन्द कर क्रिया प्राणायाम की तरह ही प्राण ऊर्जा को मूलाधार से ऊपर खींचना शरू करें ।
तथा बिंदु तक ले कर आएं। साथ ही अपने दोनों हाथों की कुहनियों को ऊपर उठाते हुए अँगुलियों को चेहरे के समीप लाएं। यहाँ उद्देश्य है कि हमारी आँखे,मुख, कान तथा नासिकॉ छिद्र अँगुलियों द्वारा पूर्ण रूपेण बन्द किये जाएं। नियम हैं,जैसे कानों को अंगूठों से,होठों को अनामिका से इत्यादि।
परन्तु आप अपनी सुविधा से अँगुलियों का प्रयोग करें। संक्षेप में,समस्त द्वार जहाँ से ऊर्जा बाहर जा सकती है,बन्द होने चाहिए। ध्यान रहे,नासिका छिद्र बन्द करने के पूर्व आपका ऊर्जा आरोहण पूर्ण हो जाना चाहिए।
ऊर्जा का आरोहण पूर्ण है;समस्त द्वार बन्द हैं,ऊर्जा मस्तक में घनीभूत है तथा इन्द्रिय संयम का प्रकाश रुपी ओज भ्रूमध्य की ओर जा रहा है। इस अवस्था में ऊर्जा स्वतः भ्रूमध्य की ओर गमन करेगी। कुछ ही क्षणों में साधक को प्रकाशमयी अखण्ड मंडल के दर्शन होंगे।
साधक तब तक उस अवस्था में स्थिर रहे जहाँ तक वह सहज हो। श्वास को रोके रखना है तब तक कि साधक सहज रह सके। कूटस्थ के दर्शन की अवस्था में भ्रूमध्य में ॐ का जप करें। अब साधक को श्वास(प्राण ऊर्जा) छोड़नी है(क्रिया प्राणायाम की तरह मूलाधार तक)।यह एक प्रणाम हुआ।
ऐसे तीन प्रणाम करें। प्रत्येक प्रणाम के पश्चात् साधक अपने हाथों को यथास्थान रख सकता है तथा उन्हें वापस भी ला सकता है। यथास्थान ही रखना श्रेयस्कर होगा जिससे संचित ऊर्जा बाहर न जा सके एवम् साधक अंतर्मुखी बना रहे।
अतः आप योनि मुद्रा में भी तीन क्रिया प्राणायाम करते हैं। ये मुद्राएं स्वयम्भू हैं ;अतः साधक की अनुभूति अलग एवम् अद्वितीय हो सकती है। कुछ साधकों को ॐ का नाद भी सुनाई पड़ता है। प्रणाम के पश्चात् भी कूटस्थ ज्योति ललाट में मंडराती हैं।
साधक को पूर्ण निष्ठा के साथ ज्योति को प्रणाम कर अगाध शांति में डूबे रहना चाहिए। यह शांति ध्यान आसन से उठने के बाद भी साधक के हर क्रिया कलाप में परिलक्षित होती है।
शाम्भवी महा मुद्रा,, -
शायद ही कोई अन्य क्रिया लोगों को पहले ही दिन इस तरह ऊपर उठा देती है, जैसा शांभवी महामुद्रा करती है। इसका कारण ये है कि यदि आप महामुद्रा सही ढंग से लगाते हैं तो आप की अपनी उर्जायें एक ऐसी दिशा में घूम जाती हैं जिसमें वे अपने आप कभी नहीं घूमतीं।
अन्यथा आप की इंद्रियों को लगातार मिलने वाले संदेशों के कारण आप की ऊर्जाओं का खर्च ही होता रहता है। ये वैसा ही है कि जब आप किसी चीज़ को लगातार देखते रहते हैं तो कुछ समय बाद सिर्फ आप की आँखें ही नहीं थकतीं,बल्कि आप भी थक जाते हैं।
क्योंकि जब भी आप किसी चीज़ पर ध्यान देते हैं तो आप की ऊर्जा खर्च होती है। वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि जो लोग शाम्भवी क्रिया करते हैं उनकी कार्टिसोल ( तनाव को कम करने वाले हार्मोन्स) को सक्रिय करने की क्षमता काफी ज्यादा होती है।
बीडीएनएफ, ज्ञान तंतुओं को सुदृढ़ करने वाला तत्व जो मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न किया जाता है, वह भी बढ़ता है। बौद्ध ध्यान प्रक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण भाग ये है कि उनसे लोग शांतिपूर्ण, आनंददायक हो जाते हैं पर साथ ही उनके मस्तिष्क की सक्रियता भी कम हो जाती है।
शाम्भवी के बारे में जो महत्वपूर्ण बात है, वो ये है कि लोग शांतिपूर्ण, आनंददायक तो हो ही जाते हैं पर साथ ही उनके मस्तिष्क की सक्रियता भी बढ़ जाती है। आज्ञा चक्र निम्न और उच्च चेतना को जोड़ने वाला केंद्र है। इससे आप अपने ध्यान को नियंत्रण कर सकते हैं।
शांभवी महामुद्रा आपके मन और मस्तिष्क को शांत रखता है।यह आपके प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। जिससे आप कई रोगों से लड़ने में सक्षम बनते हैं। आपके शरीर में संतुलन बनाने में आपकी सहायता करता है। जिससे आप अपने ऊर्जा का बेहतर तरीके से उपयोग कर पाते हैं।
शांभवी महामुद्रा कैसे करें?
1-पहले चरण में आपको एक स्थान तय करना होगा। इसके बाद आप समय निर्धारित करें की किस समय इसे आप अभ्यास करेंगे।
2-दूसरे चऱण में पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या स्वस्तिकासन जैसे किसी भी ध्यान आसन में बैठें, जिसमें आप सहज हों। अब उंगलियां ज्ञान मुद्रा या चिन मुद्रा ले आएं और हथेलियाँ घुटनों पर रख दें।
3-तीसरे चरण में आपको इस मुद्रा में अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाए रहने के अलावा और कुछ नहीं करना है। अपनी आँखों से हम वास्तव में उस जगह को नहीं देख सकते जहाँ दो भौंहें मिलती हैं। लेकिन भौंहों के बीच दृष्टि को केंद्रित करने का प्रयास किया जाता है।
4-चौथे चरण में अब आप दो भौंहों को केंद्र में मिलने वाली दो घुमावदार रेखाओं के रूप में देख पाएंगे। यह केंद्र में एक प्रकार की वी-आकार की रेखा बनाता है। वी-आकार की रेखा के निचले केंद्र क्षेत्र में इस बिंदु पर आंखों को एकाग्र करें। जब तक आप कर सकते हैं तब तक इस स्थिति को बनाए रखें।
5-पांचवें चरण, प्रारंभ में, आंख की मांसपेशियों में कुछ सेकंड या मिनटों के भीतर दर्द शुरू हो जाएगा। आंखों को आराम दें और इसे सामान्य स्थिति में वापस लाएं। कुछ समय के लिए आराम करें और फिर से प्रयास करें।
अभ्यास के साथ व्यक्ति अधिक समय तक इस ध्यान को बनाए रख सकता है।ध्यान रखें अभ्यास के दौरान सामान्य रूप से सांस लें। जैसे ही आप ध्यान तकनीक के साथ आगे बढ़ते हैं, आपकी सांस धीमी हो जाएगी और अधिक सूक्ष्म हो जाएगी ।
क्रमशः
18/05/2024, 5:06 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....53
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के छठम घटक मानसिक प्राणायाम बारे वर्णन करते। यह देखने की एक तकनीक है। रीढ़ की हड्डी के माध्यम से कोक्सीक्स हड्डी के बिंदु से मेडुला बिंदु तक आरोही और अवरोही श्वास की कल्पना करनी चाहिए।
मेडुला बिंदु भौहों के मध्य बिंदु के बिल्कुल विपरीत सिर के पीछे स्थित होता है जबकि कोक्सीक्स बिंदु वह होता है जहां रीढ़ की हड्डी समाप्त होती है। इस बैक प्वाइंट पर पूरा ध्यान रखा जाता है। मन को धीरे-धीरे ऊपर की ओर चढ़ने और धीरे-धीरे नीचे उतरने के लिए निर्देशित किया जाता है।
रीढ़ की हड्डी के छह केंद्र (चक्र) हैं जिन्हें कहा जाता है:
1-मूलाधार कोक्सीक्स/ Coccyx के अनुरूप (प्रथम चक्र)
2-स्वाधिष्ठान Sacral /त्रिक के अनुरूप (दूसरा चक्र)
3-मणिपुर नाभि के विपरीत रीढ़ की हड्डी पर बिंदु के अनुरूप (तीसरा चक्र)
4-अनाहत : यह हृदय के ठीक पीछे या कंधे के ब्लेड के बीच में रीढ़ की हड्डी के बिंदु से मेल खाती है। (चौथा चक्र)
5-विशुद्धि : यह कशेरुकी के सी-7 से मेल खाती है। (पांचवां चक्र)
6- मेडुला बिंदु: यह भौंहों के बीच के बिंदु के ठीक पीछे Occipital lobe से मेल खाती है, जिसे अजना चक्र (छठा चक्र) कहा जाता है। ।
ये छह बिंदु हैं जो ऊर्जा के भंवर हैं जहां मन को रीढ़ की हड्डी के ऊपर और नीचे यात्रा करने के लिए निर्देशित किया जाता है। जैसे ही मन किसी एक केंद्र को पार करता है, मानसिक रूप से "ओम" का जाप किया जाता है।
इस प्रकार रीढ़ की हड्डी पर चढ़ते समय प्रत्येक चक्र या केंद्र पर एक बार मानसिक रूप से छह बार "ओम" का जाप किया जाता है और इसी तरह मन की नीचे की गति पर भी "ओम" का जाप किया जाता है।
इसे मानसिक रूप से प्राणायाम कहा जाता है। चढ़ना और उतरना.... 5 से 10 सेकंड जितना धीमा हो सकता है या 22 सेकंड तक धीमा हो सकता है। यह अभ्यास कई बार किया जा सकता है।
ध्यान केंद्रित किए बिना, आंखें धीरे से ध्यान को भौहों के मध्य-बिंदु पर माथे में लगाती हैं। यह एकाग्रता नहीं है, बल्कि मन को एक आसन दिया जाता है और व्यक्ति को इस बात की जानकारी होनी चाहिए।
कि मन वहां स्थिर है या नहीं । यदि यह धीरे से हिलती है, तो इसे वापस बिंदु पर लाएं। यह अभ्यास किसी भी संख्या में भी किया जा सकता है। उपरोक्त अभ्यासों के माध्यम से सहायक क्रिया कहलाती है।
वे भक्त को वास्तविक क्रिया योग का अभ्यास करने में सक्षम बनाने के लिए किए जाते हैं, ताकि क्रिया अभ्यास में बहुत कुशल हो, जिसका अब वर्णन किया जाना है।
क्रमशः
19/05/2024, 7:57 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग......54
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के सातवें घटक क्रिया योग प्राणायाम का वर्णन करेगे। क्रिया योग एक संपूर्ण मार्ग है। क्रिया योग का केद्र बिंदु प्राणायाम है लेकिन नैतिक या आध्यात्मिक नियमों का पालन किए बिना हम सिर्फ प्राणायाम के अभ्यास से प्रगति नहीं कर सकते।
यह श्वास ही है जो जप, ध्यान , श्वास और सूक्ष्म प्राण के मिलन का प्रतिनिधित्व करता है। क्रिया योग अभ्यास के पहले स्तर के विभिन्न खंड निम्नलिखित हैं। गले की आवाज के साथ गहरी सांस लेते हुए क्रिया प्राणायाम का अभ्यास शुरू करें।
अपनी पसंदीदा ध्यान स्थिति पूर्व की ओर मुख करके बैठें। अब से आप एक मोटे तकिये के किनारे पर बैठने वाली तकनीक का उपयोग कर सकते हैं ताकि नितंबों को थोड़ा ऊपर उठाया जा सके। ठुड्डी थोड़ी नीचे है (आपकी गर्दन की मांसपेशियां थोड़ा सा भी तनाव बनाए रखती हैं।)
मुंह और आंखें बंद हैं। महसूस करें कि आपकी जागरूकता केंद्र में मेडुला में स्थित है, जबकि आंतरिक सहजता कूटस्थ पर है। गले में एक आवाज पैदा करते हुए नाक से गहरी सांस लें जैसे उज्जयी प्राणायाम में लेंते हैं।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि ध्वनि सही है, अपने गले से बहने वाली हवा के घर्षण को बढ़ाने पर ध्यान दें। एक दबी हुई आवाज निकलेगी। इसकी आवृत्ति बढ़ाएँ। यदि परिवेश पूरी तरह से शांत है, तो व्यक्ति इसे 4-5 मीटर के दायरे में सुन सकता है ।
इसके बाहर किसी भी तरह से नहीं। क्रिया प्राणायाम का अभ्यास पेट की गहरी सांस के साथ करना है। इसका मतलब यह है कि, साँस लेने के दौरान वक्ष का ऊपरी हिस्सा लगभग स्थिर रहता है जबकि पेट फैलता है। कंधे नहीं उठते हैं। साँस छोड़ने के दौरान, पेट अंदर आ जाता है।
साँस छोड़ने के अंतिम भाग के दौरान, नाभि का रीढ़ की ओर जाने का स्पष्ट बोध होता है। इस अनुभव को परिष्कृत करके - नाभि के अंदर की ओर बढ़ने और डायाफ्राम की मांसपेशियों की क्रिया के बारे में अधिक जागरूक होने से - आप एक परमानंद की अनुभूति महसूस करेंगे।
श्वास और साँस छोड़ने की लंबाई लगभग समान होती है। साँस छोड़ना साँस लेने से अधिक लंबा हो सकता है। साँस लेने और छोड़ने के बीच 2:3 के अनुपात को और अधिक स्वाभाविक रूप से महसूस किया जा सकता है। कुछ स्कूल सलाह देते हैं ।
कि साँस लेने के बाद 3 सेकंड की सांस रोककर रखें। उदाहरण के लिए: 10 सेकंड अंतःश्वसन; 3 सेकंड रोकें; 15 सेकंड साँस छोड़ना। माला या उंगलियों का उपयोग करके सांसों की संख्या गिनें। शुरूआत करने के लिए, आप 24 सांसों का अभ्यास करें ।
समय के साथ इसमें वृद्धि होगी। साँस लेने की आवाज़ लाउडस्पीकर की बढ़ी हुई पृष्ठभूमि के शोर के समान है - एक शांत साँस छोड़ने के दौरान केवल हल्की फुफकार होती है। ध्वनि की पूर्णता खेचरी मुद्रा के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
साँस लेने की आवाज़ बहुत सूक्ष्म होगी, जबकि साँस छोड़ने की आवाज़ बाँसुरी जैसी होगी: शी शी रीढ़ के माध्यम से प्राण को चलते हुए देखें। क्रिया प्राणायाम के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह होता है: गले में ध्वनि उत्पन्न करने वाली गहरी सांस आपको अनुभव करने में सक्षम बनाती है।
प्राण रीढ़ के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। इसे प्राप्त करने के लिए आपको कुछ हफ्तों के लिए निम्नलिखित को अपनाना होगा....निर्देश:- श्वास के दौरान कंठ चक्र (विशुद्ध) के सामने की ओर ध्यान केंद्रित करें। महसूस करें (जागरूक हो जाएं) कि प्राण इस चक्र से आपके शरीर में प्रवाहित होता है।
फिर, साँस छोड़ने के दौरान, प्रत्येक चक्र में जीवंत करने वाले प्राण के कंपन को निर्देशित करें। आप महसूस करेगे कि धीरे- धीरे एक स्पंदन रीढ़ के अंदर जा रही है । इस तरह से अभ्यास करने से, आप महसूस करेंगे कि विशुद्ध चक्र के सामने की ओर से ,श्वास प्राण को गले मिलता है।
आप महसूस करेंगे कि रीढ़ के माध्यम से एक ठंडा ऊर्जा आ रही है। कुछ हफ्तों के लिए आपको क्रिया प्राणायाम के इस नए विवरण पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता हो सकती है, फिर यह अपने आप काम करेगा। आप इच्छा शक्ति से प्राण के प्रवाह को नियंत्रित करेंगे।
यह साँस लेने के दौरान ठंड की अनुभूति के रूप में ऊपर की ओर और साँस छोड़ने के दौरान नीचे की ओर एक गुनगुनी सनसनाहट के रूप में बहेगा। हमेशा आराम से रहें ;जिससे श्वास अधिक सूक्ष्म और धीमी हो जाएगी। मानसिक रूप से प्रत्येक चक्र में ओम का जाप करें।
जब आपको लगता है कि आप पिछले दो बिंदुओं का सही तरीके से अभ्यास कर रहे हैं, तो निम्न क्रिया जोड़ें। श्वास लेने के दौरान, मूलाधार से मेडुला तक, प्रत्येक छह चक्रों में 'ओम' का मानसिक रूप से उच्चारण किया जाता है ।
और साँस छोड़ने के दौरान भी, 'ओम' का मानसिक रूप से मेडुला में और मूलाधार तक आने वाले अन्य सभी चक्रों में जप किया जाता है। कूटस्थ पर अपनी आंतरिक दृष्टि का ध्यान करें । यह स्पष्ट है कि रीढ़ की हड्डी के ऊपर और नीचे जाना ,गले की आवाज पैदा करना, ठंड और गर्म संवेदनाओं को महसूस करना और साथ ही प्रत्येक चक्र में 'ओम' को रखना कठिन है।
हालाँकि, लाहिड़ी महाशय ने लिखा है कि प्रत्येक चक्र में ओम का जाप किए बिना आगे बढ़ने पर, आपकी 'तामसिक' क्रिया बन जाती है। दूसरे शब्दों में इसकी प्रकृति सकारात्मक नहीं है और कई तरह के बेकार विचार उठते हैं। इसलिए स्वयंको शांत करने और यह परिणाम प्राप्त करने का प्रयास करें।
एक गहरी सांस लें, फिर दूसरा श्वास लेने और छोड़ने की लंबाई के बारे में चिंता न करें। कुछ सांसों के बाद आपको पता चलता है कि आपकी सांस स्वाभाविक रूप से लंबी हो जाती है। साँस लेने और छोड़ने के बीच में एक छोटा विराम स्वाभाविक रूप से हो सकता है।
पूर्ण क्रिया प्राणायाम 80 स्वास प्रति घंटा अथार्त लगभग 45 सेकिंड पर स्वास है। एक नवसाधक ऐसी लय तक पहुँचने से कोसों दूर है। एक सीखने वाले के लिए यदि प्रत्येक सांस 2-3 सेकंड से अधिक 20 सेकंड तक चलती है। तो इसका मतलब है कि अभ्यास बहुत अच्छा है।
प्रत्येक विराम आरामदायक शांति का क्षण है। श्वास की 'बांसुरी' की तरह ध्वनि को सुनें। श्वास की ध्वनि को सूक्ष्म और सूक्ष्म बनाएं। में उत्पन्न होने वाली नासिका ग्रसनी में साँस छोड़ने के दौरान हल्की सीटी की तरह महीन आवाज होती है।
प्रतीकात्मक रूप से वे कहते हैं कि यह "कृष्ण की बांसुरी" है। लाहिड़ी महाशय ने इसे "की होल के माध्यम से हवा उड़ाने के समान" वर्णित किया। उन्होंने समझाया कि इस ध्वनि में विचारों सहित किसी भी बाहरी विचलित करने वाले कारक को काटने की शक्ति है। वे कहते हैं कि यह है: "एक छुरा जो मन से जुड़ी हर चीज को काट देता है"।
क्रमशः
20/05/2024, 4:15 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर्यात्रा की भाग......54
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के सातवें घटक क्रिया योग प्राणायाम का वर्णन करेगे। क्रिया योग एक संपूर्ण मार्ग है। क्रिया योग का केद्र बिंदु प्राणायाम है लेकिन नैतिक या आध्यात्मिक नियमों का पालन किए बिना हम सिर्फ प्राणायाम के अभ्यास से प्रगति नहीं कर सकते।
यह श्वास ही है जो जप, ध्यान , श्वास और सूक्ष्म प्राण के मिलन का प्रतिनिधित्व करता है। क्रिया योग अभ्यास के पहले स्तर के विभिन्न खंड निम्नलिखित हैं। गले की आवाज के साथ गहरी सांस लेते हुए क्रिया प्राणायाम का अभ्यास शुरू करें।
अपनी पसंदीदा ध्यान स्थिति पूर्व की ओर मुख करके बैठें। अब से आप एक मोटे तकिये के किनारे पर बैठने वाली तकनीक का उपयोग कर सकते हैं ताकि नितंबों को थोड़ा ऊपर उठाया जा सके। ठुड्डी थोड़ी नीचे है (आपकी गर्दन की मांसपेशियां थोड़ा सा भी तनाव बनाए रखती हैं।)
मुंह और आंखें बंद हैं। महसूस करें कि आपकी जागरूकता केंद्र में मेडुला में स्थित है, जबकि आंतरिक सहजता कूटस्थ पर है। गले में एक आवाज पैदा करते हुए नाक से गहरी सांस लें जैसे उज्जयी प्राणायाम में लेंते हैं।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि ध्वनि सही है, अपने गले से बहने वाली हवा के घर्षण को बढ़ाने पर ध्यान दें। एक दबी हुई आवाज निकलेगी। इसकी आवृत्ति बढ़ाएँ। यदि परिवेश पूरी तरह से शांत है, तो व्यक्ति इसे 4-5 मीटर के दायरे में सुन सकता है ।
इसके बाहर किसी भी तरह से नहीं। क्रिया प्राणायाम का अभ्यास पेट की गहरी सांस के साथ करना है। इसका मतलब यह है कि, साँस लेने के दौरान वक्ष का ऊपरी हिस्सा लगभग स्थिर रहता है जबकि पेट फैलता है। कंधे नहीं उठते हैं। साँस छोड़ने के दौरान, पेट अंदर आ जाता है।
साँस छोड़ने के अंतिम भाग के दौरान, नाभि का रीढ़ की ओर जाने का स्पष्ट बोध होता है। इस अनुभव को परिष्कृत करके - नाभि के अंदर की ओर बढ़ने और डायाफ्राम की मांसपेशियों की क्रिया के बारे में अधिक जागरूक होने से - आप एक परमानंद की अनुभूति महसूस करेंगे।
श्वास और साँस छोड़ने की लंबाई लगभग समान होती है। साँस छोड़ना साँस लेने से अधिक लंबा हो सकता है। साँस लेने और छोड़ने के बीच 2:3 के अनुपात को और अधिक स्वाभाविक रूप से महसूस किया जा सकता है। कुछ स्कूल सलाह देते हैं ।
कि साँस लेने के बाद 3 सेकंड की सांस रोककर रखें। उदाहरण के लिए: 10 सेकंड अंतःश्वसन; 3 सेकंड रोकें; 15 सेकंड साँस छोड़ना। माला या उंगलियों का उपयोग करके सांसों की संख्या गिनें। शुरूआत करने के लिए, आप 24 सांसों का अभ्यास करें ।
समय के साथ इसमें वृद्धि होगी। साँस लेने की आवाज़ लाउडस्पीकर की बढ़ी हुई पृष्ठभूमि के शोर के समान है - एक शांत साँस छोड़ने के दौरान केवल हल्की फुफकार होती है। ध्वनि की पूर्णता खेचरी मुद्रा के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
साँस लेने की आवाज़ बहुत सूक्ष्म होगी, जबकि साँस छोड़ने की आवाज़ बाँसुरी जैसी होगी: शी शी रीढ़ के माध्यम से प्राण को चलते हुए देखें। क्रिया प्राणायाम के दौरान सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह होता है: गले में ध्वनि उत्पन्न करने वाली गहरी सांस आपको अनुभव करने में सक्षम बनाती है।
प्राण रीढ़ के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। इसे प्राप्त करने के लिए आपको कुछ हफ्तों के लिए निम्नलिखित को अपनाना होगा....निर्देश:- श्वास के दौरान कंठ चक्र (विशुद्ध) के सामने की ओर ध्यान केंद्रित करें। महसूस करें (जागरूक हो जाएं) कि प्राण इस चक्र से आपके शरीर में प्रवाहित होता है।
फिर, साँस छोड़ने के दौरान, प्रत्येक चक्र में जीवंत करने वाले प्राण के कंपन को निर्देशित करें। आप महसूस करेगे कि धीरे- धीरे एक स्पंदन रीढ़ के अंदर जा रही है । इस तरह से अभ्यास करने से, आप महसूस करेंगे कि विशुद्ध चक्र के सामने की ओर से ,श्वास प्राण को गले मिलता है।
आप महसूस करेंगे कि रीढ़ के माध्यम से एक ठंडा ऊर्जा आ रही है। कुछ हफ्तों के लिए आपको क्रिया प्राणायाम के इस नए विवरण पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता हो सकती है, फिर यह अपने आप काम करेगा। आप इच्छा शक्ति से प्राण के प्रवाह को नियंत्रित करेंगे।
यह साँस लेने के दौरान ठंड की अनुभूति के रूप में ऊपर की ओर और साँस छोड़ने के दौरान नीचे की ओर एक गुनगुनी सनसनाहट के रूप में बहेगा। हमेशा आराम से रहें ;जिससे श्वास अधिक सूक्ष्म और धीमी हो जाएगी। मानसिक रूप से प्रत्येक चक्र में ओम का जाप करें।
जब आपको लगता है कि आप पिछले दो बिंदुओं का सही तरीके से अभ्यास कर रहे हैं, तो निम्न क्रिया जोड़ें। श्वास लेने के दौरान, मूलाधार से मेडुला तक, प्रत्येक छह चक्रों में 'ओम' का मानसिक रूप से उच्चारण किया जाता है ।
और साँस छोड़ने के दौरान भी, 'ओम' का मानसिक रूप से मेडुला में और मूलाधार तक आने वाले अन्य सभी चक्रों में जप किया जाता है। कूटस्थ पर अपनी आंतरिक दृष्टि का ध्यान करें । यह स्पष्ट है कि रीढ़ की हड्डी के ऊपर और नीचे जाना ,गले की आवाज पैदा करना, ठंड और गर्म संवेदनाओं को महसूस करना और साथ ही प्रत्येक चक्र में 'ओम' को रखना कठिन है।
हालाँकि, लाहिड़ी महाशय ने लिखा है कि प्रत्येक चक्र में ओम का जाप किए बिना आगे बढ़ने पर, आपकी 'तामसिक' क्रिया बन जाती है। दूसरे शब्दों में इसकी प्रकृति सकारात्मक नहीं है और कई तरह के बेकार विचार उठते हैं। इसलिए स्वयंको शांत करने और यह परिणाम प्राप्त करने का प्रयास करें।
एक गहरी सांस लें, फिर दूसरा श्वास लेने और छोड़ने की लंबाई के बारे में चिंता न करें। कुछ सांसों के बाद आपको पता चलता है कि आपकी सांस स्वाभाविक रूप से लंबी हो जाती है। साँस लेने और छोड़ने के बीच में एक छोटा विराम स्वाभाविक रूप से हो सकता है।
पूर्ण क्रिया प्राणायाम 80 स्वास प्रति घंटा अथार्त लगभग 45 सेकिंड पर स्वास है। एक नवसाधक ऐसी लय तक पहुँचने से कोसों दूर है। एक सीखने वाले के लिए यदि प्रत्येक सांस 2-3 सेकंड से अधिक 20 सेकंड तक चलती है। तो इसका मतलब है कि अभ्यास बहुत अच्छा है।
प्रत्येक विराम आरामदायक शांति का क्षण है। श्वास की 'बांसुरी' की तरह ध्वनि को सुनें। श्वास की ध्वनि को सूक्ष्म और सूक्ष्म बनाएं। में उत्पन्न होने वाली नासिका ग्रसनी में साँस छोड़ने के दौरान हल्की सीटी की तरह महीन आवाज होती है।
प्रतीकात्मक रूप से वे कहते हैं कि यह "कृष्ण की बांसुरी" है। लाहिड़ी महाशय ने इसे "की होल के माध्यम से हवा उड़ाने के समान" वर्णित किया। उन्होंने समझाया कि इस ध्वनि में विचारों सहित किसी भी बाहरी विचलित करने वाले कारक को काटने की शक्ति है। वे कहते हैं कि यह है: "एक छुरा जो मन से जुड़ी हर चीज को काट देता है"।
क्रमशः
20/05/2024, 11:12 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....55
एक सीखने वाले के लिए यदि प्रत्येक सांस 2-3 सेकंड से अधिक 20 सेकंड तक चलती तो इसका मतलब है कि अभ्यास बहुत अच्छा है। प्रत्येक विराम आरामदायक शांति का क्षण है। श्वास की 'बांसुरी' की तरह ध्वनि को सुनें। श्वास की ध्वनि को सूक्ष्म और सूक्ष्म बनाएं।
साँस छोड़ने में हल्की सीटी की तरह महीन आवाज होती है। प्रतीकात्मक रूप से वे कहते हैं कि यह "कृष्ण की बांसुरी" है। लाहिड़ी महाशय ने इसे "कीहोल के माध्यम से हवा उड़ाने के समान" वर्णित किया। उन्होंने समझाया कि इस ध्वनि में विचारों सहित किसी भी बाहरी विचलित करने वाले कारक को काटने की शक्ति है।
इसलिए वे कहते हैं कि यह है: "एक छुरा जो मन से जुड़ी हर चीज को काट देता है"। इसका अंदाजा लगाने के लिए सीटी बजाएं, फूंकें, कम करें, कम करें…. जब तक यह मुश्किल से श्रव्य है। या एक खाली इत्र के नमूने पर विचार करें, बिना ढक्कन के। एक नथुना बंद करो।
नमूने के उद्घाटन को खुले नथुने के नीचे रखें और एक लंबी लेकिन सूक्ष्म साँस छोड़ें। ऊपर और नीचे ले जाएँ उत्पादित सीटी ध्वनि के सभी रूपों का अनुभव करने वाला नमूना। एक निश्चित बिंदु पर आप एक शानदार सीटी प्राप्त करेंगे और कहेंगे: ''यह है''।
यह ध्वनि नासिका ग्रसनी के ऊपरी भाग में उत्पन्न होती है। यदि आप इसे महसूस करते हैं तो आपका केवल एक ही कर्तव्य अधिक है: इस ध्वनि को अपने दिमाग में पूरी तरह से समा लेने दे ।
जब आप क्रिया प्राणायाम की 48 पुनरावृत्तियों की संख्या को पार करते हैं, तो अपनी जागरूकता को कुटस्थ से फोंटानेल की ओर ले जाएँ। यदि आप इस स्थिति का सामना करने का निर्णय लेते हैं, तो आप अब से, क्रिया प्राणायाम के लगभग 4x12 दोहराव के बाद, आगे बढ़ सकते हैं।
आपकी जागरूकता का केंद्र आपके सिर के ऊपरी हिस्से में हैं। क्रिया प्राणायाम का अभ्यास एक विशिष्ट मुद्रा को अपनाकर किया जाता है जो शास्त्रीय शाम्भवी मुद्रा का एक विकास है। शांभवी मुद्रा भौंहों के बीच की जगह पर ध्यान केंद्रित करने की क्रिया है।
माथे की हल्की झुर्री के साथ दोनों भौहों को केंद्र की ओर लाती है। अब, शाम्भवी का एक उच्च रूप है जिसके लिए बंद या आधी बंद पलकों की आवश्यकता होती है। लाहिरी महाशय अपने प्रसिद्ध चित्र में इस मुद्रा को दिखा रहे हैं।
आँखें ऊपर की ओर देखती हैं जैसे कि छत की ओर देख रही हों लेकिन... बिना सिर हिलाए। आंखों की मांसपेशियों में आने वाला हल्का तनाव धीरे-धीरे गायब हो जाता है और इस स्थिति कोआसानी से बनाए रखा जा सकता है।
एक दर्शक आईरिस के नीचे श्वेतपटल (आंख का सफेद) का निरीक्षण करेगा क्योंकि बहुत बार निचली पलकें आराम करती हैं। इस मुद्रा के माध्यम से, सभी का प्राण सिर के शीर्ष पर एकत्र होता है। ऐसा लगता है कि अभ्यास का अपना जीवन है।
आपको अंततः एक मानसिक स्थिति को पार करने का आभास होगा, जो सो जाने जैसा है, फिर अचानक पूर्ण जागरूकता में लौटना और यह महसूस करना कि आप आध्यात्मिक प्रकाश में डूब रहे हैं। यह एक विमान का बादलों से एक स्पष्ट पारदर्शी आकाश में उभरने की तरह है।
क्रिया प्राणायाम के अभ्यास के बाद अपनी सांस के प्रति सचेत रहते हुए कम से कम 10 मिनट स्थिर रहें जो स्वाभाविक रूप से अपनी लय से आगे बढ़ता है। आप इसे अपनी रीढ़ की हड्डी के ऊपर और नीचे जाने वाली मीठी ऊर्जा के रूप में देखने के लिए चुन सकते हैं।
इस तरह तुम्हारी श्वास बहुत आसानी से और अधिक शांत हो जाएगी, लगभग गायब होने के करीब पहुंच जाएगी। प्रत्येक चक्र में मानसिक रूप से ओम का जप करते हुए ओम की आंतरिक ध्वनि सुने। अपनी जागरूकता को आंतरिक करने के लिए, आप मानसिक रूप से ओम का जाप करें।
चक्र रीढ़ के साथ ऊपर (साँस लेने के दौरान) और नीचे (साँस छोड़ते समय) जा रहा है। यह मानसिक रूप से ओम का जप वर्णित प्रक्रिया को और आसान बनाने में मदद करता है। आप बस अपनी जागरूकता को अधिक अनुशासित होना सिखाते हैं।
रीढ़ के साथ ऊपर और नीचे जाकर धैर्यपूर्वक आपकी आज्ञा का पालन करना। महत्वपूर्ण यह है कि आप अपनी रीढ़ में क्या हो रहा है, इसके बारे में अधिक से अधिक जागरूक रहें। क्रिया प्राणायाम के दौरान ऐसा हो सकता है कि आप आंतरिक सूक्ष्म ध्वनियों को सुनें। ये ध्वनियाँ चक्रों की गतिविधि से आती हैं।
एक महान अनुभव है...एक लंबे समय तक चलने वाली घंटी (अनहत नाद ) की आवाज सुनना। इस ''घंटी'' का अनुभव ''कई प्रकार के जल'' की ध्वनि में बदल जाता है। यह ओम की वास्तविक ध्वनि है जो आत्मा को रीढ़ के माध्यम से यात्रा करने के लिए मार्गदर्शन करता है।
दिव्य प्रकाश से संपर्क करता है। लाहिड़ी महाशय ने इसे "बहुत से लोगों द्वारा लगातार घंटी की डिस्क को मारने और एक कंटेनर से तेल बहने के रूप में निरंतर" ध्वनि के रूप में वर्णित किया। निश्चित रूप से, जब आप बहते पानी या चट्टानों पर लहरों के टूटने की आवाज़ सुनते हैं।
तो आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप सही रास्ते पर हैं। समझने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन ध्वनियों को महसूस करने की घटना गहरी एकाग्रता के एक अद्वितीय क्षण की तीव्रता से उत्पन्न नहीं होती है, बल्कि क्रिया के दैनिक सत्रों के दौरान प्रयास के संचय से उत्पन्न होती है।
एक ''प्रयास'' किसी भी आंतरिक ध्वनि को सुनने के लिए सावधानीपूर्वक ध्यान है । आंतरिक रूप से निरंतर सुनने के लिए इच्छा को आगे लाना आवश्यक है। जब तक आप सूक्ष्म ध्वनियों से अवगत नहीं हो जाते, तब तक इस कंपन की प्रतिध्वनि को ट्रैक करने के लिए शब्दांश ओम के प्रत्येक जप के साथ.. एक अडिग इच्छाशक्ति होनी चाहिए। इससे आपके सुनने के कौशल में सुधार होगा।
अंत में क्रिया प्राणायाम के पांचवें बिंदु , एक महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान दें।क्रिया प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए अपने सिर के ऊपरी भाग पर मजबूत एकाग्रता नवसाधक या मध्यम स्तर के साधको के लिए उपयुक्त नहीं है। इस कारण से बताया गया है ।
कि आप 48 क्रिया श्वासों का अभ्यास करने के बाद ही एकाग्रता के इस रूप का उपयोग कर सकते हैं। कुंडलिनी जागरण को उत्तेजित करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है सहस्रार में एक मजबूत चुंबक विकसित करना। इसका तात्पर्य हमारे अवचेतन मन पर कार्य करना है ।
जो चेतना के क्षेत्र में कुछ ऐसी सामग्री लाता है जिसे हम आत्मसात करने में सक्षम नहीं हैं। वह व्यक्ति जो इसका अनुभव करता है, खासकर यदि वह भावनात्मक परिपक्वता से दूर है, तो वह पूरी तरह से नकारात्मक मनो दशाओं का अनुभव कर सकता है। अगली पोस्ट में क्रियायोग के आठवें घटक महामुद्रा बारे बताते।
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क्रमशः
21/05/2024, 5:39 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग......56
इस पोस्ट में हम क्रियायोग के आठवें घटक महामुद्रा के बारे वर्णन करते यह तकनीक हठ योग से भिन्न है, और क्रिया तत्वों से थोड़ा भिन्न रूप सेअभ्यास किया जाता है। महामुद्रा का अभ्यास करने से पहले शाम्भवी,खेचरी,मूल बन्ध और कुम्भक की सभी विधियों की पूरी जानकारी होना जरूरी है।
तभी महामुद्रा का अभ्यास ठीक से किया जा सकता है। महामुद्रा एक सील है। जैसे ही आप ताला लगा कर सील कर देते हैं तो आप की उर्जायें बाहर जाने की बजाय अपने आप को एक अलग ही दिशा में घुमा देती हैं। इसी लिये हम इसे ‘महामुद्रा’ या ‘क्रिया’ कहते हैं।
महामुद्रा करने की पहली विधि ;–
1-अपने पैरो को सामने फैला कर प्रारम्भिक स्थिति में बैठ जायें।
2-दाहिने पैर को फैलाकर रखें और बायें घुटनों को मोड़कर बायीं एड़ी से मूलाधार या योनि मूल पर दबाव डाले।
3-दोनों हाथों को घुटने के ऊपर रखें।
4-अपनी शरीर को संतुलित करते हुए, शरीर को आराम की स्थिति में लायें।
5-अब आगे की ओर झुक कर दाहिने पैर के अंगूठे को दोनों हाथों से पकड़े।
6-आराम से जितनी देर तक सम्भव हो इस स्थिति में बने रहें।
7-अब सीधे बैठने की स्थिति में वापस आ जायें और दोनों हाथों को दाहिने घुटने पर रखें।
8-इस तरह महामुद्रा का एक चक्र हुआ।
9-इसी तरह बायें पैर को मोड़कर तीन चक्र और दाये पैर को मोड़कर तीन चक्र करें।
10-अंत में दोनों पैर को फैलाकर 3 चक्रों का अभ्यास करें।
महामुद्रा करने की विधि ;–
1-दाहिने पैर को सामने फैलाकर उत्तान पादासन में बैठ जायें।
2-अपनी पीठ को सीधा रखते हुए पुरे शरीर को शिथिल करें।
3-अब खेचरी मुद्रा लगायें और गहरी श्वास अंदर ले।
4-श्वास को छोड़ते हुए आगे झुकें और दाहिने पैर के अंगूठे को दोनों हाथों से पकड़ लें।
5-अपने सिर और पीठ को सीधा रखें। और सिर को थोड़ा पीछे झुकाते हुए धीरे धीरे श्वास लें।
6-अब शाम्भवी मुद्रा का अभ्यास करते हुए मूलबन्ध को लगाएँ।
7-श्वास को अन्दर रोकते हुए चेतना को भ्रूमध्य से कण्ठ होते हुए मूलाधार तक ले जाये।
8-इसी तरह चेतना को घूमते हुए मानसिक रूप से आज्ञा, विशुद्धि, मूलाधार तक दुहराते रहे।
9-प्रत्येक चक्र पर एकाग्रता एक दो क्षण तक ही रखें।
10-आरामपूर्वक जबतक श्वास को रोक सकते हो चेतन को घुमाते रहें।
11-अब क्रमशः शाम्भवी मुद्रा को हटाए, फिर मूलबन्ध को।
12-सीधे बैठने की स्थिति में आते हुए धीरे धीरे श्वास छोड़े।
इस तरह महामुद्रा का एक चक्र पूरा हुआ। इसी तरह बायें पैर को मोड़कर तीन चक्र और दाये पैर को मोड़कर तीन चक्र करें। अंत में दोनों पैर को फैलाकर 3 चक्रों अभ्यास करें।
महामुद्रा करने की अवधि ;–
प्रारम्भ में बायें, दायें और दोनों पैरों से तीन तीन चक्रो का अभ्यास करना चाहिए। कुछ महीनों के अभ्यास के बाद धीरे धीरे चक्रों की संख्या को 12 चक्रों तक बढ़ाया जा सकता है। प्रत्येक चक्रों के समापन के समय जब चेतना मूलाधार में वापस आती है तो मन से चक्रों की गणना करते रहें।
महामुद्रा करने का समय; –
महामुद्रा के अभ्यास के लिए सबसे अच्छा समय प्रातः काल है। जब पेट पूरी तरह से खाली हो इसे किया जा सकता है। ध्यान के अभ्यास करने से पूर्व भी इसे किया जा सकता है।
महामुद्रा करने की सीमायें –
ग्रीष्म ऋतू में महामुद्रा का अभ्यास नहीं करना चाहिए। क्योंकि महामुद्रा के अभ्यास से बहुत अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि कोई उच्च रक्तचाप या हृदय रोग से पीड़ित व्यकित है तो महामुद्रा का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
महामुद्रा के लाभ; –
1-इस मुद्रा को करने से एक साथ आपको शाम्भवी मुद्रा, मूलबन्ध और कुम्भक के लाभ प्राप्त होते है।
2-महामुद्रा से पाचन एवं परिपाचन की क्रिया उत्प्रेरित होती है। यह मुद्रा उदर के रोगों को दूर करती है।
3-महामुद्रा मूलाधार को आज्ञाचक्र से जोड़ने वाले ऊर्जा परिपथ को उत्प्रेरित है।
4-इस मुद्रा को करने से शरीर में प्राण का अवशोषण बढ़ता है तथा सजगता तीव्र होती है।
5-महामुद्रा को करने से सहज ही ध्यान की अवस्था लग जाती है।
महामुद्रा का प्रभाव;-
महा मुद्रा तीनों बंधों [मूलबंध,उड्डीयान और जालंधर] को समाहित करती है। जब एक साथ शरीर को आगे की ओर झुकाकर और अत्यधिक संकुचन के बिना लगाया जाता है, तो यह सुषुम्ना के दोनों सिरों के बारे में जागरूक होने में मदद करता है ।
और रीढ़ की हड्डी को ऊपर उठाने वाली एक ऊर्जावान धारा की भावना पैदा करता है। समय आने पर, व्यक्ति संपूर्ण सुषुम्ना को एक दीप्तिमान चैनल के रूप में देख सकेगा। केवल इसी तकनीक का उपयोग करके योगियों ने शानदार अनुभव प्राप्त किये ।
और सुषुम्ना को एक दीप्तिमान चैनल के रूप में देखा।अनेक ऐसे क्रियाबन हैं जिन्होंने अन्य सभी क्रिया तकनीकों को अलग कर दिया और प्रतिदिन दो सत्रों में 144 महामुद्रा का अभ्यास किया है। वे सभी क्रिया योगों में महामुद्रा को सबसे अधिक उपयोगी मानते हैं।
क्रमशः
22/05/2024, 9:35 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग ...57
क्रिया योग के आठो घटक का वर्णन पिछली पोस्टों में कर चुके कुछ अन्य विवरण इस पोस्ट में दे रहे। महामुद्रा ,नाभि क्रिया और योनि मुद्रा अभ्यास के लिए सबसे अच्छी तैयारी है जो आमतौर पर क्रिया प्राणायाम के बाद आती है।
सिंथेटिक रूप से दो ऊर्जाएं (प्राण और अपान) जो रीढ़ की हड्डी में गति में डाली जाती हैं जो एक साथ मिल जाती हैं। इनका मिलन हमारे शरीर में ऊर्जा की एक नई अवस्था को जन्म देता है जिसका नाम समान है। यह समान रीढ़ की हड्डी के सूक्ष्म चैनल में प्रवेश करता है।
एक विशेष अवस्था हमारी चेतना में घटती है। महृषि पतंजलि इस राज्य को ''प्रत्याहार'' कहते है अर्थात ''इन्द्रियों का वापस लेना। '' उस अवस्था में हमारा मन पूरी तरह से शांत रहता है और ध्यानस्थ अवस्था में अवशोषित रह सकता है।
यह ऊँची अवस्था है और आध्यात्मिक मार्ग पर पहला कदम माना जा सकता है। पहले क्रिया कदम में निपुणता प्राप्त करने के लिए कार्य करते समय, एक क्रियाबन क्रिया की अन्य "उच्च" प्रक्रियाओं का पता लगाने और उपयोग करने की इच्छा कर सकता है।
खेचरी मुद्रा प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार यह मुद्रा क्रिया प्राणायाम के अभ्यास को पूर्ण करने और मन को और शांत करने में बहुत मदद करती है। आध्यात्मिक प्रकृति की अन्य घटनाएं हो सकती हैं। क्रिया के उच्चतम चरण भी अनायास ही प्रकट हो सकते हैं।
इस स्तर पर त्रिभंगमुरारी आंदोलन को सूक्ष्म रूप में सीखने की इच्छा होगी। वे अपना ध्यान मूलाधार की ओर बढ़ते हुए ऊर्जावान प्रवाह पर केंद्रित करके शुरू करते हैं लेकिन रीढ़ की हड्डी के बाहर शेष रहते हैं। ऐसे वर्तमान को व्यक्त करना मुश्किल है ।
क्योंकि जो वास्तविकता को कहे या जो मन से परे है उसके लिए हमारे पास शब्द नहीं है । यह वर्तमान सूक्ष्म रूप से त्रिभंगमुरारी आंदोलन से संबंधित है। इस शिक्षण में रीढ़ की हड्डी का दरवाजा खोला जाता है। एक छात्र सीखता है ।
कि कैसे सूक्ष्म आंदोलन सनसनी के पहलू में पारदर्शी ओंकार वास्तविकता को पूरा किया जाए। इस प्रक्रिया के माध्यम से एक विद्यार्थी समय और स्थान के आयाम को छोड़कर उच्चतम असम्प्रजनता समाधि तक पहुँच सकता है जो कैवल्य राज्य की ओर जाता है।
जब श्वास शांति अवस्था से बेचैन हो जाती है, तब सृजन आरम्भ होता है। सृष्टि के क्रम में ध्वनि ( ॐ की ध्वनि) सर्वप्रथम ध्वनिहीन अवस्था (शाश्वत शांति) से उत्पन्न होती है। अब ध्वनि से, एक कोरोलरी अवस्था के रूप में एक व्यवस्थित तरीके से उत्पादित वायु, फिर अग्नि, जल, और पृथ्वी हैं।
वाइब्रेशनल स्तर से, एथेरियल (एथर), गैसियस (वायु), उप-गैस (अग्नि), तरल (जल) और ठोस (पृथ्वी)। सातवें दिन श्वास विश्राम होता है। केंद्रों की गिनती अगर सिर से की जाती है, तो Coccygeal center 7वां केंद्र होगा। ध्यान का पूरा उद्देश्य अनन्त शांति (स्थिरत्व) प्राप्त करना है।
पृथ्वी के साथ शुरू होने वाली कम्पन की सबसे निचली अवस्था से विलीन होने के उल्टे क्रम में वापस जाना है। मूल क्रिया में विशेषता यह है कि कुंडलिनी को जागृत करने के लिए जल्दबाजी न करें। बल्कि एक "निश्चित आदेश," का पालन किया जाता है। इसके दो भाग हैं:
1 द प्री-रिवर्स ऑर्डर, या नीचे की यात्रा
2 द रिवर्स ऑर्डर, या ऊपर की यात्रा।
दीक्षा सात क्रियाओं में विभाजित है। प्रथम क्रिया गुरु द्वारा शिष्य को दी जाती है। दूसरी क्रिया, तीसरी क्रिया, चौथी क्रिया शिष्य की साधना पर निर्भर करती है। पांचवी क्रिया, छठी क्रिया और सप्तम क्रिया को दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, यह स्वयं ही होती है ।
और इन क्रियाओं के लिए स्वयं को गुरु मानना चाहिए। खेचरी मुद्रा सफल होने पर दूसरी क्रिया शिष्य को दी जाती है और दूसरी क्रिया का लक्ष्य मन की गांठ तोड़ना और ॐ ध्वनि सुनना है । ॐ ध्वनि को प्रणव को स्थिर करने के लिए तृतीय क्रिया शिष्य को दी जाती है।
चौथी क्रिया चक्रों का अनुभव करने और मूलाधार गांठ तोड़ने के लिए दी जाती है। आध्यात्मिक मार्ग पर महान प्रयास करने वालों के लिए उच्च क्रियाएं उपलब्ध होती हैं। केवल व्यक्तिगत साधना अनुभव ही उच्च क्रिया प्रथाओं को अर्थ देते हैं।
पांचवी, छठी और सातवीं क्रियाएं मूल रूप से अलग हैं। चक्र एक ही समय में एक ही क्षेत्र में मिल जाते हैं और ठोस, भौतिक वास्तविकता में एकीकृत हो जाते हैं। सूक्ष्म संबंधों में अंतर्दृष्टि उभरती है। सभी वास्तविक अभ्यास सीधे और व्यक्तिगत रूप से किसी भी उपयुक्त क्रिया योग शिक्षक या मार्गदर्शक से सीखना चाहिए।
क्रिया अनुशासन का पालन करने के लिए त्यागी होना कोई आवश्यक नहीं है। मूल क्रियायोग त्यागी और गृहस्थ दोनों के लिए उपयुक्त है।तालब्य क्रिया महामुद्रा के बाद की जाती है जैसा कि क्रिया अभ्यास की शुरुआत में किया जाता था।
ऊपर वर्णित क्रिया के पहले स्तर का पूरा सेट सुबह और रात में एक साथ किया जाना चाहिए। लेकिन योनि मुद्रा केवल रात के समय में और केवल एक बार की जाती है। शिष्य को सक्षम करने के लिए क्रिया अभ्यास की निगरानी लगातार मार्गदर्शक द्वारा की जानी चाहिए।
खेचरी मुद्रा में पूर्णता (उवुला से ऊपर उठने और नासिका गुहा में प्रवेश करने और भीतर से भीतर के नथुने को अवरुद्ध करने वाली जीभ) तालब्य क्रिया के अभ्यास के माध्यम से प्राप्त की जाती है। एक बार खेचरी मुद्रा प्राप्त हो जाने के बाद सभी क्रिया योग अभ्यास खेचरी मुद्रा में किए जाते हैं।
अनैच्छिक रूप से भौंहों के बीच के बिंदु को देखता है और वहीं थम जाता है। मन गहराई में वापस चला जाता है और परमानंद पीछा करता है। यह एक ऐसा चरण है जब क्रिया दूसरे स्तर की होती है।
क्रमशः
23/05/2024, 6:16 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की भाग.....58
मुख से लेकर नाभि तक चक्राकार ‘अ’ से लेकर ‘ह’ तक के समस्त अक्षरों की एक ग्रन्थिमाला है, उस माला के दानों को ‘मातृकायें’ कहते हैं। इन मातृकाओं के योग- दर्शन द्वारा ही ऋषियों ने देवनागरी वर्णमाला के अक्षरों की रचना की है।
देवनागरी वर्णमाला में कुल 53 अक्षर हैं, जिनमें से 16 स्वर हैं और 37 व्यंजन होते हैं। जिन वर्णों का उच्चारण करते समय स्वास कण्ठ, तालु आदि स्थानों से बिना रुके हुए निकलती है, उन्हें 'स्वर' कहा जाता है। जिन वर्णों का उच्चारण करते समय स्वास कण्ठ, तालु आदि स्थानों से रुककर निकलती है, उन्हें 'व्यंजन' कहा जाता है।
हिंदी वर्णमाला में 16 स्वर है। जैसे :- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ। 25 स्पर्श व्यंजन है ;- क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म 4 अंतस्थ व्यंजन;- य र ल व 4 ऊष्म व्यंजन;- श ष स ह 4 संयुक्त व्यंजन;- क्ष त्र ज्ञ श्र
देव शक्तियों में डाकिनी, राकिनी, शाकिनी, हाकिनी आदि के विचित्र नामों को सुनकर उनके मशानी जैसी होने का भ्रम होता है। वास्तव में, ऐसा नहीं है। चक्रों के देव जिन मातृकाओं से झंकृत और सम्बद्ध होते हैं, उन्हें उन देवों की देवशक्ति कहते हैं।
ड, र, ल, क, श, के आगे आदि मातृकाओं का बोधक’ शब्द जोडक़र राकिनी, डाकिनी बना दिये गये हैं। यही देव शक्तियाँ हैं। पंचतत्त्वों के अपने- अपने गुण होते हैं। पृथ्वी का गन्ध, जल का रस, अग्रि का रूप, वायु का स्पर्श और आकाश का गुण शब्द होता है।
चक्रों में तत्त्वों की प्रधानता के अनुरूप उनके गुण भी प्रधानता में होते हैं।यही चक्रों के गुण हैं। यह चक्र अपनी सूक्ष्म शक्ति को वैसे तो समस्त शरीर में प्रवाहित करते हैं, पर एक ज्ञानेन्द्रिय और एक कर्मेन्द्रिय से उनका सम्बन्ध विशेष रूप से होता है।
सम्बन्धित इन्द्रियों को वे अधिक प्रभावित करते हैं।चक्रों के जागरण के चिह्न उन इन्द्रियों पर तुरन्त परिलक्षित होते हैं। इसी सम्बन्ध विशेष के कारण वे इन्द्रियाँ चक्रों की इन्द्रियाँ कहलाती हैं।
कुण्डलिनी शक्ति का स्रोत है। वह हमारे शरीर का सबसे अधिक समीप चैतन्य है। उसमें बीज रूप से इतनी रहस्यमय शक्तियाँ गर्भित हैं, जिनकी कल्पना तक नहीं हो सकती। कुण्डलिनी शक्ति के इन छ: केन्द्रों अथार्त षट्चक्रों में भी उसका काफी प्रकाश है।
जैसे सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं, सूर्य उनका केन्द्र है और चन्द्रमा, मङ्गल आदि उसमें सम्बद्ध होने के कारण सूर्य की परिक्रमा करते हैं, वे सूर्य की ऊष्मा, आकर्षणी, विलयिनी आदि शक्तियों से प्रभावित और ओत- प्रोत रहते हैं, वैसे ही कुण्डलिनी की शक्तियाँ भी चक्रों में प्रसारित रहती हैं।छहों चक्रों का परिचय नीचे दिया जा रहा है ।
मूलाधार चक्र- स्थान- योनि (गुदा के समीप)। दल- चार। वर्ण- लाल। लोक- भू:लोक। दलों के अक्षर- वँ, शँ, षँ, सँ। तत्त्व- पृथ्वी तत्त्व। बीज- लँ। वाहन- ऐरावत हाथी। गुण- गन्ध। देवशक्ति- डाकिनी। यन्त्र- चतुष्कोण। ज्ञानेन्द्रिय- नासिका। कर्मेन्द्रिय- गुदा। ध्यान का फल- वक्ता, मनुष्यों में श्रेष्ठ, सर्व विद्याविनोदी, आरोग्य, आनन्दचित्त, काव्य और लेखन की सामर्थ्य ।
स्वाधिष्ठान चक्र- स्थान- पेडू (शिश्र के सामने)। दल- छ:। वर्ण- सिन्दूर। लोक- भुव:। दलों के अक्षर- बँ, भँ, मँ, यँ, रँ, लँ। तत्त्व- जल तत्त्व। बीज- बँ। बीज का वाहन- मगर। गुण- रस। देव- विष्णु। देवशक्ति- डाकिनी। यन्त्र- चन्द्राकार। ज्ञानेन्द्रिय- रसना। कर्मेन्द्रिय- लिङ्गं। ध्यान का फल- अहंकारादि विकारों का नाश, श्रेष्ठ योग, मोह की निवृत्ति, रचना शक्ति।
मणिपूर चक्र- स्थान- नाभि। दल- दस। वर्ण- नील। लोक- स्व:। दलों के अक्षर- डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं। तत्त्व- अग्रितत्त्व। बीज- रं। बीज का वाहन- मेंढ़ा। गुण- रूप। देव- वृद्ध रुद्र। देवशक्ति- शाकिनी। यन्त्र- त्रिकोण। ज्ञानेन्द्रिय- चक्षु। कर्मेन्द्रिय- चरण। ध्यान का फल- संहार और पालन की सामर्थ्य, वचन सिद्धि।
अनाहत चक्र- स्थान- हृदय। दल- बारह। वर्ण- अरुण। लोक- मह:। दलों के अक्षर- कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं। तत्त्व- वायु। देवशक्ति- काकिनी। यन्त्र- षट्कोण। ज्ञानेन्द्रिय- त्वचा। कर्मेन्द्रिय- हाथ। फल- स्वामित्व, योगसिद्धि, ज्ञान जागृति, इन्द्रिय जय, परकाया प्रवेश।
विशुद्ध चक्र- स्थान- कण्ठ। दल- सोलह। वर्ण- धूम्र। लोक- जन:। दलों के अक्षर- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ।‘अ’ से लेकर ‘अ:’ तक सोलह अक्षर। इसीलिए किसी भी शुभ अवसर पर षोडश मातृकाओं की स्थापना कर कार्य की सफलता के लिए विशेष प्रार्थना की जाती हैं।
तत्त्व- आकाश। तत्त्वबीज- हं। वाहन- हाथी। गुण- शब्द। देव- पंचमुखी सदाशिव। देवशक्ति- शाकिनी। यन्त्र- शून्य (गोलाकार)। ज्ञानेन्द्रिय- कर्ण। कर्मेन्द्रिय- पाद। ध्यान फल- चित्त शान्ति, त्रिकालदर्शित्व, दीर्घ जीवन, तेजस्विता, सर्वहित में कार्य।
आज्ञा चक्र- स्थान- भ्रू। दल- दो। वर्ण- श्वेत। दलों के अक्षर- हं, क्षं। तत्व- मह: तत्त्व। बीज- ऊँ। बीज का वाहन- नाद। देव- ज्योतिर्लिंग। देवशक्ति- हाकिनी। यन्त्र- लिङ्गकार। लोक- तप:। ध्यान फल- सर्वार्थ साधन षट्चक्रों में उपर्युक्त छ: चक्र ही आते हैं; परन्तु सहस्रार को सातवाँ शून्य चक्र भी माना जाता हैं। उसका निम्न वर्णन है—
शून्य चक्र- स्थान- मस्तक। दल- सहस्र। दलों के अक्षर- अं से क्षं तक की पुनरावृत्तियाँ। लोक- सत्य। तत्त्वों से अतीत। बीज तत्त्व- (:) विसर्ग। बीज का वाहन- बिन्दु। देव- परब्रह्म। देवशक्ति- महाशक्ति। यन्त्र- पूर्ण चन्द्रवत्। प्रकाश- निराकार। ध्यान फल- भक्ति, अमरता, समाधि, समस्त ऋद्धि- सिद्धियों का प्राप्त होना।
क्रमशः
24/05/2024, 9:26 am - स्वर विज्ञान: कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर् यात्रा की का शेष भाग ।
ब्रह्मनाड़ी की पोली नली में होकर वायु का अभिगमन होता है, तो चक्रों के सूक्ष्म छिद्रों के आघात से उनमें एक वैसी ध्वनि होती है, जैसी कि वंशी में वायु का प्रवेश होने पर छिद्रों के आधार से ध्वनि उत्पन्न होती है।
हर चक्र के एक सूक्ष्म छिद्र में वंशी के स्वर- छिद्र की सी प्रतिक्रिया होने के कारण स, रे, ग, म जैसे स्वरों की एक विशेष ध्वनि प्रवाहित होती है, जो- यँ, लँ, रँ, हँ, जैसे स्वरों में सुनाई पड़ती है, इसे चक्रों का बीज कहते हैं।
चक्रों में वायु की चाल में अन्तर होता है। जैसे अंगूठे के बगल की अंगुली वात की नाड़ी होती है जो सांप की तरह चलती है। उसके बगल में मध्यमा अंगुली पित्त की नाड़ी होती है जो मेढ़क की तरह व उसके पास की अंगुली कफ की नाड़ी हंस की भांति चलती है।
उस चाल को पहचान कर वैद्य लोग अपना कार्य करते हैं। तत्त्वों के मिश्रण टेढ़ा- मेढ़ा मार्ग, भँवर, बीज आदि के समन्वय से तथा प्रत्येक चक्र में रक्त एवँ प्राण के संयोग से एक विशेष प्रकार की चाल दिखाई देती है।
यह चाल किसी चक्र में हाथी के समान मन्द , किसी में मगर की तरह डुबकी मारने वाली, किसी में हिरण की- सी छलाँग मारने वाली, किसी में मेढक़ की तरह फुदकने वाली होती है। उस चाल को चक्रों का वाहन कहते हैं।
इन चक्रों में विविध दैवी शक्तियाँ समाहित हैं। उत्पादन, पोषण, संहार, ज्ञान, समृद्धि, बल आदि शक्तियों को देवता विशेषों की शक्ति माना गया है अथार्त ये शक्तियाँ ही देवता हैं। प्रत्येक चक्र में एक पुरुष वर्ग की उष्णवीर्य और एक स्त्री वर्ग की शीतवीर्य शक्ति रहती है।
क्योंकि पॉजिटिव और नेगेटिव , अग्नि और सोम दोनों तत्त्वों के मिले बिना गति और जीव का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता। यह शक्तियाँ ही चक्रों के देवी- देवता हैं।
भगवान शिव कहते है "उद्यमो भैरव:''-उद्यम ही भैरव है। उद्यम का अर्थ है प्रगाढ़ श्रम। उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस संसार रूपी कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो। जो चेष्टा करता है, वही भैरव है।
भैरव शब्द पारिभाषिक है। भ' का अर्थ है 'भरण';'र' का अर्थ है रवण;और 'व' का अर्थ है वमन। भरण का अर्थ है रख रखाव, रवण का अर्थ है संहार, और वमन का अर्थ है फैलाना। मूल अस्तित्व का नाम भैरव है।हिंदू देवताओं में भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है।
भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करनेवाला। भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जातेहैं। भैरव नाम में दार्शनिक गुण हैं ।
और स्पष्ट जागरूकता और सावधान रवैया के कारण स्पष्ट अंतर्ज्ञान है।जिस दिन भी तुमने आध्यात्मिक जीवन की चेष्टा शुरू की, तुम भैरव होने लगे; अथार्त तुम परमात्मा के साथ एक होने लगे। तुम्हारे भीतर मुक्त होने का पहला खयाल तुम्हारी चेष्टा की पहली किरण है ।
और तुमने यात्रा शुरू कर दी। मंजिल भी ज्यादा दूर नहीं है क्योंकि पहला कदम ही करीब-करीब आधी यात्रा है। तुम्हारे भीतर जैसे ही यह भाव सघन होना शुरू हुआ कि अब मैं मूर्च्छा से बाहर निकलूं और चैतन्य बनूं वैसे ही तुम भैरव होने लगते हो।
अथार्त ब्रह्म के साथ एक होने लगे।तुम उसी सागर के झरने हो, उसी सूरज की किरण हो, उसी महा आकाश के एक छोटे से खंड हो..मूलत: तो तुम एक हो ही।वास्तव में ,तुम एक हो ही, लेकिन सिर्फ यह स्मरण आ जाए तो तुम्हारी यात्रा प्रारभ्म हो गयी।
मंजिल पहुंचने में तो समय लगेगा;लेकिन तुमने चेष्टा शुरू कर दी । चेष्टा से तुम्हारे भीतर बीज आरोपित हो जाता हैं कि मैं इस कारागृह रूपी संसार से बाहर आ जाऊं, शरीर से,जन्मों की आकांक्षा ,वासना से मुक्त हो जाऊं और अब इस संसार में फंसाव के बीज न बोऊं।
तुम्हें यह स्मरण आना शुरू हो जाये और दीवालें विसर्जित होने लगें, तो तुम इस महा आकाश के साथ एक हो जाओगे। बड़ी जबरदस्त चेष्टा करना जरूरी है क्योंकि गहरी नींद है; जब तोड़ने का सतत प्रयास करोगे, तो ही टूट पायेगी ,आलस्य से संभव नहीं होगा।
उद्यम का अर्थ है..तुम्हारी पूरी चेष्टा संलग्र हो जाये। आज तोड़ोगे, और कल फिर बना लोगे तो फिर भटकते रहोगे। लोग शिकायत करते हैं 'हम करते हैं, लेकिन कुछ हो नहीं रहा। इसका अर्थ है कि उनके करने में कोई प्राण नहीं हैं ...इसलिए नहीं होता।
शिकायत का अर्थ है कि कहीं कुछ अन्याय हो रहा है कि दूसरों को हो रहा है, हमें नहीं हो रहा है। वास्तव में ,इस जगत में अन्याय होता ही नहीं। जो भी होता न्याय ही है। क्योंकि न्याय-अन्याय करने को यहां कोई मनुष्य नहीं बैठा है।जगत में तो तटस्थ नियम हैं, उन्हीं तटस्थ नियमों का नाम धर्म है।
गुरुत्वाकर्षण के नियम न तुम्हें गिराने को उत्सुक है, न तुम्हें सम्हालने में उत्सुक है। जब तुम सीधे चलते हो, तो वही तुम्हें संभालता है और जब तिरछे चलते हो, तो वही तुम्हें गिराता है। न उसकी कोई गिराने कीआकांक्षा है, न सम्हालने की।
वह परम नियम है... तटस्थ है और तुम्हारी तरह पक्षपात नहीं करता कि किसी को गिरा दे, किसी को उठा दे। तुम जैसे ही ठीक चलने लगते हो, वह तुम्हें संभालता है। तुम गिरना चाहते हो तो ही वह तुम्हें गिराता है। वह हर हालत में उपलब्ध है ;उसके द्वार बंद नहीं है।
तुम दरवाजा खोलकर भीतर जाना चाहते हो,तो भीतर चले जाओ या दरवाजे से सिर ठोकना चाहते हो,तो सिर ठोक लो। उद्यम भैरव है और इसके लिए महान श्रम चाहिए। श्रम में तुम्हारी समग्रता लग जाये...तब तुम्हारे भैरव हो जाने में देर न लगेगी।
भैरव का प्रतीकात्मक अर्थ है.... ब्रह्म जो धारण किये है, जो सम्हाले है, जिसमें हम पैदा होंगे, और जिसमें हम मिटेंगे। जो सृष्टि का नियम है और जिसमें प्रलय भी होगा। शक्तिचक्र के संधान से विश्व का संहार हो जाता है''। अगर तुमने ठीक से उद्यम किया ।
और अपनी संपूर्ण ऊर्जा को सत्य की,आत्मा की या परमात्मा की खोज में संलग्र कर दिया .... तो तुम्हारे भीतर जो शक्ति का चक्र है, वह पूर्ण हो जाता है।अभी तुम्हारे भीतर शक्ति का चक्र पूर्ण नहीं है । विज्ञान के अनुसार बुद्धिमान मनुष्य भी पंद्रह प्रतिशत से ज्यादा प्रतिभा का उपयोग नहीं करता।
अथार्त पच्चासी प्रतिशत प्रतिभा का तो इस्तेमाल ही नहीं होता है। यह तो केवल प्रतिभा की बात है। वास्तव में, हम अपने शरीर की ऊर्जा का भी पांच प्रतिशत से ज्यादा उपयोग नहीं करते । हमारे जीवन का दीया केवल टिमटिमाता रहता है।
क्योकि हम जीने से भी भयभीत है। हम डरे-डरे ,कंपते -कंपते जीते है। तो फिर भीतर जो शक्ति का चक्र है , वह पूरा नहीं हो पाता। बस तुम्हारा जीवन ऐसा ही है ..हिचकोले खाते चलता है । शक्ति के केवल खंड आते हैं; इसीलिए शक्ति अखंड नहीं हो पाती।
जिस चीज में भी तुम अपनी पूरी शक्ति लगा दोगे, वही उद्यम है।वह कुछ भी हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर तुम चित्र बनाते हो, और चित्रकार हो, और तुमने अपनी पूरी शक्ति चित्र बनाने में लगा दिया, तो तुम वहीं से मुक्त हो जाओगे; क्योंकि, वही उद्यम है।
पूर्ण होते ही भैरव हो जाता है। अगर तुम एक मूर्तिकार हो; तुमने सब कुछ मूर्ति में समाहित कर दिया तो शक्ति का चक्र पूरा हो जाता है। जब तुम किसी भी कृत्य में, पूरी शक्ति से करते हो, तो वही ध्यान हो जाता है। तब भैरव निकट है, अथार्त मंजिल पास आ गयी।
और जब भी तुम्हारी शक्ति का चक्र पूरा होता है ; उसी क्षण तुम्हारे लिए विश्व समाप्त हो गया। पूर्णता और सम्पूर्णता में अंतर है। पूर्णता ब्रह्म का प्रतीक है और सम्पूर्णता प्रकृति का प्रतीक है। पूर्णता प्राप्त होते ही तुम्हारे लिए कोई संसार नहीं है।
फिर तुम परमात्मा हो गये , भैरव हो गये , मुक्त हो गये। फिर तुम्हारे लिए न कोई बंधन है, न कोई शरीर है, न कोई संसार है। हमें सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग स्मरण रखना है। अगर तुमने पूरी शक्ति को लगाया तो फिर क्षणभर की देर नहीं लगती।
तुम उसी क्षण अनुभव करोगे कि अचानक संसार खो जाता है और परमात्मा सामने आ जाता है। तुम्हारी शक्ति का पूरा लग जाना ही तुम्हारे जीवन की क्रांति हो जाती है। फिर पीठ संसार की तरफ हो जाती है और मुंह परमात्मा की तरफ हो जाता है।
अगर तुम्हें उसकी एक झलक भी मिल जाए तो फिर तुम वही न हो सकोगे, जो तुम पहले थे। फिर उसकी एक झलक से तुम्हारा जीवन उसी यात्रा में संलग्र हो जायेगा।तो ध्यान रखना है कि अपने को पूरा डुबाना है।
तो ही कुछ हो सकेगा। अगर तुमने थोड़ा भी अपने को बचाया तो तुम्हारा श्रम व्यर्थ है। जब तक श्रम उद्यम न बन जाए तब तक भैरव की उपलब्धि नहीं होगी।
26/05/2024, 4:49 am - स्वर विज्ञान: अगर किसी पदार्थ ठोस, द्रव्य,या गेंस को अगर तोड़ा जाए तो अनु, परमाणु, से होते हुए आखिरी कण जिसे शब्द कहते। पूरा ब्रह्मांड शब्द से बना या यूं कहें शब्द में समाया है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, जगत में जो भी दिखाई पड़ रहा है, वह विद्युत का ही समागम है।
विभिन्न-विभिन्न रूपों में विद्युत ही सघन होकर पदार्थ हो गई है। विद्युत मौलिक तत्व है। हमारे महाऋषियों ने चेतना की आत्यंतिक गहराई में उतरकर चेतना का जो आखिरी बिंदु है, उसे पकड़ा उस बिंदु को उन्होंने कहा ..ध्वनि, ।
उनकी खोज है कि सारा अस्तित्व ध्वनि का ही घनीभूत रूप है, शब्द का घनीभूत रूप है। इसलिए वेद को हमने परमेश्वर कहा, क्योंकि वह शब्द है। और ऐसी खोज यही नहीं है, बल्कि जिन्होंने भी आत्मा की तरफ से यात्रा की है, उन्होंने भी यही कहा है।
बाइबिल कहती है, जगत के प्राथमिक चरण में 'शब्द 'था, 'लोगोस'..दि वर्ड। फिर शब्द से ही सब उत्पत्ति हुई। जिन्होंने आत्मा के भीतर प्रवेश करके जीवन की आधारशिला खोजनी चाही, उन सभी ने ध्वनि को आधारभूत माना है।
जिन्होंने पदार्थ की खोज की है, उन्होंने विद्युत को आधारभूत माना है। पर एक आश्चर्य की बात यह है कि विज्ञान कहता है कि ध्वनि विद्युत का एक रूप है। और योग कहता है कि विद्युत ध्वनि का एक रूप है। इस मामले में विज्ञान और योग दोनों सहमत हैं कि विद्युत और ध्वनि दो चीजें नहीं हैं।
यह परिभाषा की बात है कि हम विद्युत को ध्वनि का रूप कहें, कि ध्वनि को विद्युत का रूप कहें। लेकिन एक बात में दोनों राजी हैं कि जीवन की चरम, आखिरी, आत्यंतिक जो इकाई है, वह या तो विद्युत जैसी है, या ध्वनि जैसी है। और विद्युत और ध्वनि में कोई भेद नहीं है।
पर दोनों ने अलग -अलग तरह से यात्रा की है, और अलग -अलग रूप से आत्यंतिक को पकड़ा है। यदि पदार्थ से खोज की जाए तो विद्युत ही मिलती है। पदार्थ जड है। विद्युत भी जड़ है। लेकिन अगर चैतन्य से खोज की जाए, तो चैतन्य का आधारभूत स्वरूप ध्वनि है।
शब्द है, विचार है, चैतन्य है, मन है, मनन है। जितने ही गहरे हम उतरते चले जाएं, तो ध्वनि के शुद्धतम रूप शेष रह जाते हैं। ध्वनि का यह अंतिम जो रूप है, उसे हमने नाम दिया है ...ओंकार, ओम। तत्व दर्शन में, जैन हिंदुओं से राजी नहीं हैं लेकिन इस बात में राजी हैं।
जो आत्यंतिक घटना भीतर घटती है, उसकी ध्वनि ओंकार की है। बौद्ध राजी नहीं हैं सब सिद्धातो में भेद हैं, लेकिन जब समाधि फलती है और पूर्ण होती है, तो जो ध्वनि भीतर स्फुरित होती है, वह ओंकार की है, वह ओम है।मुसलमान अपनी प्रार्थना के बाद आमीन शब्द का प्रयोग करते हैं।
ईसाई भी, यहूदी भी। शब्दशास्त्री कहते हैं कि आमीन ओम का ही रूप है। वह जो भीतर ध्वनि होती है, उसे कोई ओम की तरह भी समझ सकता है, कोई ओमीन की तरह भी समझ सकता है। ध्वनि में अपनी तरफ से समझ लेने की बहुत आसानी है।
तो आप जो भी चाहें सुनना वह सुन सकते हैं। बादलो की रिमझिम में आप चाहें तो किसी गीत की कड़ी भी सुन सकते हैं। और अगर कोई भक्त हो, तो उसे राधे -राधे भी सुनाई पड़ जाएगा। ध्वनि बहुत सूक्ष्म है। हमारे मनीषियों ने उसे ओम की तरह पकड़ा।
अंग्रेजी में कुछ शब्द हैं, जिसको अंग्रेजी भाषा शास्त्री समझा नहीं पाते कि उनकी उत्पत्ति क्या है। जैसे ओमनीप्रेजेंट, ओमनीपोटेट। लेकिन जो लोग ओम के विज्ञान को समझते हैं, वे कहेंगे कि इन शब्दों का जन्म ओम से हुआ है।ओमनीपोटेट का अर्थ है कि ओम की तरह जो शक्तिशाली -विराट।
ओमनीप्रेजेट का अर्थ है कि ओम की भांति जो सब जगह उपस्थित हो गया -सर्वकाल में। संस्कृत से संसार की करीब -करीब सभी सुसंस्कृत भाषाओं का जन्म हुआ है। संस्कृत आदि भाषा है। अंग्रेजी हो कि फ्रेंच, रशियन हो जर्मन, इटेलियन, स्पेनिश हो, सब में संस्कृत की मूल धातुएं उपस्थित हैं।
ॐ संस्कृत की आधारभूत ध्वनि है। इस ओम में संस्कृत की जितनी ध्वनियां हैं, सभी का समावेश है। ॐ बना है अ, उ और म—तीन ध्वनियों के जोड़ से ये तीन मूल स्वर हैं। बाकी सारी भाषा इन्हीं से पैदा होती है। सारे शब्द फिर इनसे ही निर्मित होते हैं।
इन तीन शाखाओं से सारी ध्वनि का जाल और सारे शब्दों का जन्म होता है इस सूत्र को बहुत ठीक से समझना है क्योंकि भीतर जिन्हें प्रवेश करना है, वे इस ध्वनि के सहारे बड़े आसानी से भीतर प्रवेश कर सकते हैं। क्योंकि प्रतिक्षण यह ध्वनि भीतर गूंज रही है।
यह ध्वनि ही आपका प्राण है। यह ध्वनि भीतर से खो जाए, आप खो जाएंगे। आपका अस्तित्व इसी ध्वनि की स्फुरणा है। लेकिन हम इतने शब्दों, शोरगुल और इतनी ध्वनियों से भरे हैं कि भीतर की धुन सुनाई नहीं पड़ती। यह बड़ी सूक्ष्म है,और बड़ी गहरे में है।
यहां इतना शोर है कि इस छोटी सी, धीमी सी, मौलिक गहरी आवाज को हम सुन नहीं पाते। इसे सुनने के लिए जरूरी है कि हमारा मन पूरी तरह शांत हो जाए। इसके लिए जरूरी है कि बाहर का जो शोर है, वह छूट जाए। हमारा मन बाहर से हम कुछ भी न सुनें ।
भीतर कोई विचार न चलें, तो धीरे -धीरे इस ध्वनि का अनुभव होना शुरू हो जाता है। ॐ मूलमंत्र है इसका पाठ करने का अर्थ अनहद नाद का श्रवण करना है उच्चारण करना नही। उच्चारण मूल नहीं है। जो बिना पाठ किए भीतर गूंज रहा है, वह मूल है।
जो आप बोलते हैं होंठों से या मन से, वह तो आपका ही है परन्तु ऊपर -ऊपर है। वह जो भीतर से बिना किसी प्रयास के, पर्त -पर्त उघाड़कर आता है, जो आपके ऊपर छा जाता है, जो आपका कृत्य नहीं है, वह आपके भीतर घटी घटना है ।
उस ॐ से जिसका संबंध जुड़ जाता है, वह जीवन के परम आधार से एक हो गया। उसने ब्रह्म के साथ मैत्री बना ली। वह मोक्ष को उपलब्ध हो गया।लेकिन जैसे ही हमे यह पता चल गया, तो हमने इस का यह उपयोग किया कि हम बैठकर ॐ का पाठ करने लगे।
अगर आप इसका पाठ करेंगे तो धीरे -धीरे आपका मन ओम की ध्वनि से भर जाएगा। लेकिन वह ध्वनि पैदा की हुई है। वह आपके ही द्वारा पैदा की हुई है। और जो आप पैदा करते हैं, वह आपसे बड़ा नहीं हो सकता। इसे बहुत ठीक से समझ लें।
और जो भी आप पैदा करते हैं, वह हाथ के मैल की तरह है। जिसने आपको पैदा किया, जिससे आप पैदा हुए हैं, उसे आप पैदा नहीं कर सकते। लेकिन लोग ॐ का पाठ करके सोचते हैं कि मूल ध्वनि में उतर जाएंगे, यह असंभव है। इसके होने का कोई उपाय ही नहीं है।
खतरा यह है कि ॐ जपते जपते कहीं इतना कंठस्थ हो जाए और इतना यांत्रिक हो जाए, तो यह भूल ही जाएंगे कि यह असली नहीं है, नकली है। मनुष्य नकल करने में इतना कुशल है कि जैसे ही उसे पता चल जाए कि मूल कैसा है, वह उसकी नकल बना लेता है।
हमने कागज के फूल ही नहीं बनाए,बल्कि हमने महामंत्र भी कागज के बना लिए हैं। फिर उन कागज के महामंत्र से खतरा यह है की ॐ का पाठ कर-कर के इतना शोरभीतर पैदा कर लें कि वह जो भीतर की सूक्ष्मातिसूक्ष्म ध्वनि है, वह सुनाई ही न पड़े।
हमारा ॐ ही उसमें बाधा बन जाए। ऋषियों ने कहा है कि वह जो भीतर का ॐ है, वह अनाहत नाद है। अनाहत नाद का अर्थ होता है, जो किसी चीज की चोट से पैदा न हो, आहत न हो। ताली बजाना आहत नाद है। दो चीजें टकराईं, उनसे शब्द पैदा हुआ। होंठ टकराए शब्द पैदा हुआ।
जीभ तालू से टकराई, शब्द पैदा हुआ। जो भी चीज दो चीजों के टक्कर से पैदा होती है, वह अनाहत नहीं है। और जो ॐ है, अनाहत नाद है। यह किसी चीज की टक्कर से पैदा नहीं होता। यह अस्तित्व का स्वरूप है। यह पैदा कभी हुआ ही नहीं।
और ध्यान रहे, जो चीज भी पैदा होती है, वह मर जाएगी। और जो चीज दो चीजों की टकराहट से पैदा होती है, वह ज्यादा देर नहीं टिक पाएगी और मिट जाएगी। ताली बज भी नहीं पाई कि खो गई और ॐ है शाश्वत ,सदा, सदैव, नित्य। वह दो चीजों की टक्कर से पैदा नहीं हो रहा है।
वह है, इस अनाहत की खोज में आप ॐ मंत्र का सहारा ले सकते हैं, लेकिन बड़ी कुशलता की जरूरत है। इसलिए आप सिर्फ ओ की आवाज करें। म को मत आने दें। आप सिर्फ करें ओ.... सिर्फ ओ.... करते रहें। और एक दिन आप अचानक पाएंगे कि ओम आना शुरू हो गया।
आप सिर्फ ओ से चोट मार रहे थे, सिर्फ साज बिठा रहे थे, ताकि भीतर का साज बैठ जाए। और जिस दिन आप अचानक चौंककर पाएं कि आप तो ओ कहते हैं, लेकिन भीतर से ओम आता है, उस दिन आप समझना कि कोई और धारा भीतर टूट गई।
तो प्रतीक्षा करना ...जल्दी मत करना। आप सिर्फ ओ का उपयोग करना और आधे हिस्से को छोड़ देना भीतर पर। जिस दिन धारा बहेगी, उस दिन वह जुड़ जाएगा। और जिस दिन आपको ऐसा लगे कि आपके ओ में कोई नई चीज भीतर से आकर जुड़ गई है।
उस दिन से आप ओ का उच्चारण भी बंद कर देना। उस दिन से सिर्फ आप आंख बंद करके बैठ जाना और सुनने की कोशिश करना। अर्थात मंत्र बोलने की नहीं बल्कि मंत्र को सुनने की कोशिश करना। होंठ और जीभ का प्रयोग मत करना, भीतर कान का प्रयोग करना ।
सुनना, कि भीतर क्या हो रहा है। और आप पाएंगे कि ॐ का नाद भीतर हो रहा है। वह आपका पैदा किया हुआ नहीं है। आप नहीं थे तब वह था, आप नहीं होंगे तब भी वह होगा। आपका होना एक लहर की तरह है, वह आपके नीचे छिपा हुआ सागर है।
इसलिए आधा मंत्र दिया गया है और आधा छोड़ रखा है। ताकि आधा भीतर से पूरा हो, तो आपको पता चल जाए कि अब कोई नई घटना घट रही है, जो मैं नहीं कर रहा हूं। उसी वक्त आप रुक जाना और मंत्र बोलने की जगह मंत्र को सुनना शुरू कर देना।
ऋषियों ने मंत्र को सुना है, बोला नहीं है। लेकिन जहां आप खड़े हैं, वहां कुछ तो बोलने से शुरू करना पड़ेगा, 'ताकि पत्थर हट जाए और झरना बहने लगे।।
क्रमशः
28/05/2024, 7:30 am - स्वर विज्ञान: क्या है ॐ ध्वनि का रहस्य भाग....2
यह 'ओ' की चोट सिर्फ पत्थर को हटाने के लिए है। और जैसे ही पत्थर हटेगा कि ॐ का झरना बहने लगेगा। फिर आप चुपचाप हो जाना। फिर आप बोलना मत। फिर आहत नाद पैदा मत करना। फिर तो अनाहत करीब है। और कान उसमें लग जाएंगे तो एक तादाम्य बन जाता।
तो बस सुनाई पड़ना शुरू हो जाएगा। और तब आप चकित होंगे कि यह तो स्वर निरंतर गूंज रहा था, अब तक मैंने क्यों नहीं सुना...। वास्तव में, आप कहीं और उलझे थे, मन कहीं और व्यस्त था। मन जहाँ व्यस्त होता है, उतना ही उसे बोध होता है।
और जब मन ही बहुत ज्यादा व्यस्त होता है, तो शेष सब जगह अनुपस्थित हो जाता है। एक युवक क्रिकेट के मैदान में खेल रहा है। पैर में चोट लग जाती है,और खून बहना शुरू हो जाता है। दर्शक जो ग्राउंड के किनारे बैठे है , उन्हें दिखाई पड़ता है कि पैर से खून बह रहा है।
जमीन पर खून के दाग पड़ गए है। लेकिन उस युवक को न तो चोट का पता है, न दर्द हो रहा है, न खून के बहने का कोई खयाल है। उसका सारा ध्यान खेल में लगा है। लेकिन जब खेल बंद होगा तब उसे स्मरण आएगा। यह चोट तो बहुत पहले की लग गई थी! लेकिन ध्यान कहीं और था।
आपके घर में आग लगी हो और कोई आपको नमस्कार करे। आपको दिखाई भी नहीं पड़ेगा, सुनाई भी नहीं पड़ेगा। आंखे देखेंगी, फिर भी नहीं दिखाई पड़ेगा। कान सुनेंगे, फिर भी सुनाई नहीं पड़ेगा। घर में आग लगी है। आप रोज रास्ते से गुजरते हैं ।
किनारे लगे दीवालों पर पोस्टर भी पढ़ते हैं, दुकानों के साइनबोर्ड भी पढ़ते हैं। दुकानों में भी झांककर देखते बढ़ते चले जाते हैं। लेकिन घर में आग लगी है, उस दिन आपको कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा। उसी रास्ते से आप गुजरेंगे, कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा।
आंखे तो हैं, लेकिन अब आंखों के पीछे आप नहीं है। और जब तक आंखों के पीछे आप न खड़े हो, सेतु न हो। तब तक कुछ अनुभव नहीं होता। तो आप बाहर इतने व्यस्त हैं, इसलिए भीतर की तरफ ध्यान नहीं है। योग की सारी चेष्टा इतनी है। कि आप बाहर से थोड़े मुक्त हो जाएं।
ताकि ध्यान की धारा भीतर बहने लगे। और भीतर सब कुछ मौजूद है, जो चाहा जा सकता है। जो चाह -चाहकर नहीं मिलता;जिसको हम जन्मों -जन्मों से खोज रहे हैं , वह मौजूद है। गौतम बुद्ध को जब ज्ञान हुआ, और किसी ने पूछा कि आपको क्या मिला।
तो गौतम बुद्ध ने कहा है कि मुझे मिला कुछ भी नहीं है, केवल जो मिला ही हुआ था उसका पता चला। वह सदा से था ही। यह ॐ आपके भीतर गूंज ही रहा है। यह आपके प्राणों का स्वर है। यह आपका होना है ..आपका अस्तित्व है।ॐ सातवीं अवस्था का सूचक है।
सातवीं अवस्था किसी भी शब्द से नहीं कही जा सकती। ॐ की खोज चौथे शरीर के अनुभव पर हुई है। वास्तव में, जब चित्त सब भांति शून्य हो जाता है -कोई विचार नहीं होते...तब भी शून्य की ध्वनि शेष होती है। अगर कभी बिलकुल सूनी जगह में आप खड़े हो गए हों।
जहां कोई ध्वनि नहीं ...तों वहां शून्य का भी एक सन्नाटा है। शून्य भी बोलता है .जीरो ध्वनि, उस सन्नाटे में, जो मूल ध्वनियां हैं, वे ही केवल शेष रह जाती हैं। अ, ऊ, म.. मूल ध्वनियां हैं। हमारा सारा ध्वनि का विस्तार उन तीन ध्वनियों के ही नये -नये संबंधों और जोड़ों से हुआ है।
जब सारे शब्द खो जाते हैं, तब ध्वनि शेष रह जाती है। चौथे मनस शरीर/ मेंटल बॉडी की शून्यता में जो ध्वनि होती है, वहां ॐ को खोजा गया है। तो इस ओम् का यदि साधक प्रयोग करे, तो दो परिणाम हो सकते हैं। वास्तव में, सभी शरीरों की दो संभावनाएं हैं और चौथे शरीर की भी..।
किसी भी शब्द को अगर बार-बार दोहराया जाए, तो उसका एक सा संघात, लयबद्धता, जैसे कि सिर पर कोई ताली थपक रहा हो, ऐसा ही परिणाम करती है और निद्रा पैदा कर देती है। यदि साधक ॐ का ऐसा प्रयोग करे कि उस ॐ के द्वारा स्लीप नेस पैदा हो जाए ।
तो चौथे मनस शरीर की जो पहली प्राकृतिक स्थिति है...कल्पना, स्वप्न।अगर ॐ का इस भांति प्रयोग किया जाए कि उससे तंद्रा आ जाए तो आप एक स्वप्न में खो जाएंगे। वह स्वप्न सम्मोहन तंद्रा जैसा होगा। उस स्वप्न में जो भी आप देखना चाहें, देख सकेंगे।
भगवान के दर्शन कर सकते हैं, स्वर्ग-नरकों की यात्रा कर सकते हैं। लेकिन वह सब स्वप्न ही होगा ;उसमें सत्य कुछ भी नहीं होगा। आनंद का अनुभव कर सकते हैं, शांति का अनुभव कर सकते हैं। ॐ की ध्वनि को जोर से पैदा करके उसमें लीन हो जाना बहुत ही सरल है, रसपूर्ण है।
जैसे सुखद ,मनचाहा स्वप्न होता है ,ऐसी रसपूर्ण है। इसमें बहुत कठिनाई नहीं है और मनस शरीर के दो रूप हैं एक कल्पना का, स्वप्न का; और दूसरा रूप है संकल्प का ,दिव्य दृष्टि का, विजन का। जिसे योग तंद्रा कहते हैं, वह तो ॐ के संघात से पैदा हो जाती है।
तो अगर ॐ का मन में दोहराना किया जाए , तो उसके संघात से तंद्रा पैदा होती है। ओर यदि ओम् का उच्चारण किया जाए, और पीछे साक्षी को भी कायम रखा जाए अथार्त दोहरे काम किए जाएं तो चौथे शरीर की दूसरी संभावना पर काम शुरू हो जाता है।
ओम् की ध्वनि पैदा की जाए और पीछे जागकर इस ध्वनि को सुना भी जाए ...इसमें लीन या डूबा न जाए। तो यह ध्वनि एक तल पर चलती रहे और हम दूसरे तल पर खड़े होकर इसको सुननेवाले, साक्षी, द्रष्टा, श्रोता हो जाएं। इस ध्वनि में लीन न हों, बल्कि जाग जाएं।
तब आप स्वप्न में नहीं जाएंगे,अथार्त योग-तंद्रा में नहीं जाएंगे,बल्कि योग जागृति में चले जाएंगे। किसी मंत्र का उपयोग करने पर, 99% लोग तो तंद्रा में चले जाते हैं। उसके कारण हैं कि हमारा चौथा शरीर निद्रा का आदी है; वह सोना ही जानता है और रोज सपने देखता ही है।
तो मंत्र के उपयोग से बहुत संभावना यही है कि आपका वह स्वप्न देखने का आदी मन अपनी यांत्रिक प्रक्रिया से तत्काल स्वप्न में चला जाएगा। लेकिन यदि साक्षी को जगाया जा सके और पीछे तुम खड़े होकर देखते भी रहो कि यह ओम् की ध्वनि हो रही .इसमें लीन न होओ, डूबो मत।
तो ॐ से भी वही काम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अगर ' मैं कौन हूं ' को भी तुम निद्रा की भांति पूछने लगो और पीछे साक्षी न रह जाओ, तो जो भूल ॐ से स्वप्न पैदा होने की होती है, वह ' मैं कौन हूं ' से भी पैदा हो जाएगी।
लेकिन ॐ की बजाय ‘मैं कौन हूं? से स्वप्न पैदा होने की संभावना थोड़ी कम है। उसका कारण है कि ॐ में कोई प्रश्न नहीं है, सिर्फ थपकी है; ' मैं कौन हूं' में प्रश्न है, सिर्फ थपकी नहीं है। और प्रश्न आपको जगाए रखेगा। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अगर चित्त में प्रश्न हो तो सोना मुश्किल हो जाता है।
अगर दिन में भी आपके चित्त में कोई बहुत गहरा प्रश्न घूम रहा है, तो रात आपकी नींद खराब हो जाएगी...प्रश्न आपको सोने न देगा। वह जो क्वेश्चन मार्क है ...अनिद्रा का बड़ा सहयोगी है। अगर चित्त में कोई प्रश्न खड़ा है, चिंता खड़ी है, कोई सवाल खड़ा है, कोई जिज्ञासा खड़ी है।
तो नींद मुश्किल हो जाएगी। तो ॐ की जगह ' मैं कौन हूं' का प्रयोग ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि उसमें मौलिक रूप से एक प्रश्न है। और चूंकि प्रश्न है, इसलिए उत्तर की गहरी खोज के लिए तुम्हें जागा ही रहना होगा। ॐ में कोई प्रश्न नहीं है; उसमें कहीं चोट नहीं है।
और उसका निरंतर संघात, निद्रा ले आएगी। इसके अतिरिक्त ' मैं कौन हूं' में संगीत नहीं है। ओम् बहुत संगीतपूर्ण है और जितना ज्यादा संगीत है उतना स्वप्न में ले जाने में समर्थ है। शब्दों के भी आकार हैं, संगीत है और उनकी चोट का भी भेद है।
अगर कोई सोया भी पड़ा हो, और उसके पास हम बैठकर कहने लगें... ' मैं कौन हूं ', ' मैं कौन हूं', तो सोया हुआ भी जग सकता है। लेकिन सोए हुए व्यक्ति के पास अगर हम बैठकर ॐ और ॐ, दोहराने लगें, तो उसकी नींद और गहरी हो जाएगी। संघात के फर्क हैं।
इसका यह मतलब नहीं है कि ॐ से नहीं किया जा सकता। अगर कोई ॐ के पीछे जागकर खड़ा हो सके तो उससे भी यही काम हो जाएगा।बलेकिन अगर ॐ की साधना करेंगे तो चौथे शरीर से ओम् का अनिवार्य एसोसिएशन हो जाएगा और वह रोकनेवाला सिद्ध होगा।
ॐ प्रतीक तो है सातवें शरीर का, लेकिन उसका अनुभव होता है चौथे शरीर में ...ध्वनि का। चौथे शरीर में इसका प्रयोग सातवें शरीर के लिए किया गया है। क्योंकि सातवें शरीर के लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं है । और चौथे शरीर के बाद फिर शब्दों का अनुभव बंद हो जाता है।
तो चौथे शरीर का जो आखिरी शब्द है, उसको हम अंतिम अवस्था के लिए प्रयोग कर रहे हैं। और कोई उपाय भी नहीं है। क्योंकि पांचवां शरीर फिर निःशब्द है; छठवां बिलकुल निःशब्द है; सातवां तो बिलकुल ही शून्य है।
चौथे शरीर की जो आखिरी शब्द की सीमा है, जहां से हम शब्दों को छोड़ेंगे, वहां आखिरी क्षण में, सीमांत पर ॐ सुनाई पड़ता है। तो भाषा की दुनिया का वह आखिरी शब्द है, और अभाषा की दुनिया का वह पहला शब्द है; वह दोनों की सीमा पर है।
वह है तो चौथे शरीर का, लेकिन हमारे पास उससे ज्यादा सातवें शरीर के कोई निकट शब्द नहीं है। इसलिए उसको सातवें के लिए प्रयोग किया है।लेकिन उसको चौथे के साथ न बांधें । इससे वह अनुभव तो चौथे में होगा, लेकिन उसको सिंबल सातवें का ही रहने देना उचित है।
इसलिए उसका साधना के लिए उपयोग करने की जरूरत नहीं। उसके लिए किसी ऐसी चीज का उपयोग करना चाहिए जो चौथे पर ही छूट भी जाए। जैसे, 'मैं कौन हूं?' यह चौथे में प्रयोग भी होगा, छूट भी जाएगा। और ॐ का सिंबॉलिक अर्थ ही रहना चाहिए।
साधन की तरह उसका उपयोग एक और कारण से भी उचित नहीं है क्योंकि जिसे हम अंतिम/ एब्लोल्युट का प्रतीक बना रहे हैं, उसे हमें अपना साधन नहीं बनाना चाहिए ; वह साध्य ही रहना चाहिए।
क्रमशः
28/05/2024, 8:04 am - +91 98877 80007: पहला भाग उपलब्ध नही हुआ है प्रभु...🙏
28/05/2024, 8:23 am - स्वर विज्ञान: जी प्रभु जब कोई विषय शुरू होता तो भाग एक नहीं लिखा जाता।
28/05/2024, 8:23 am - स्वर विज्ञान: यह है
28/05/2024, 8:25 am - +91 98877 80007: 🙏
29/05/2024, 10:01 am - स्वर विज्ञान: क्या है ॐ ध्वनि का रहस्य भाग....3
ॐ वह है जिसे हमें पाना है। इसलिए ॐ को किसी भी तरह के साधन की तरह प्रयोग न करे । और उसका प्रयोग हुआ है, उससे बहुत नुकसान हुए हैं। उसका प्रयोग करने वाला साधक बहुत बार चौथे शरीर को सातवां समझ बैठता हैं ; क्योंकि ॐ सातवें का प्रतीक था और चौथे में अनुभव होता है।
जब चौथे में अनुभव होता है तो साधक को लगता है कि अब हम ॐ को उपलब्ध हो गए; अब यात्रा खत्म हो गई। इसलिए मेंटल बॉडी पर बड़ा नुकसान होता है; वह वहीं रुक जाता है। बहुत से साधक हैं, जो दृश्यों को, रंगों को, ध्वनियों को, नाद को, उपलब्धि मान लेते हैं।
स्वभावत:, क्योंकि जिसको अंतिम प्रतीक कहा है, वह इस सीमा रेखा पर पता चलने लगता है। फिर हमें लगता है कि सीमा आ गई । इसलिए अगर इसका प्रयोग करेंगे तो पहले, दूसरे, तीसरे शरीर पर इसका कोई परिणाम नहीं होगा; इसका परिणाम चौथे शरीर पर होगा।
इसलिए पहले, दूसरे, तीसरे शरीर के लिए दूसरे शब्द खोजे गए हैं, जो उन पर चोट कर सकते हैं। ये जो मूल ध्वनियां हैं...अ, ऊ और म की, इस संबंध में एक बात और खयाल में ले लेनी उचित है। जैसे बाइबिल यह नहीं कहती कि परमात्मा ने जगत बनाया।
बाइबिल कहती है कि सबसे पहले शब्द था , फिर सब हुआ; परमात्मा ने कहा—प्रकाश हो और प्रकाश हो गया। बहुत से शास्त्र इस बात की खबर देते हैं कि सबसे पहले शब्द था। जैसे कि हम कहते हैं शब्द ब्रह्म है। हालांकि इससे बड़ी भ्रांति होती है।
इससे कई लोग समझ लेते हैं कि शब्द से ही ब्रह्म मिल जाएगा। ब्रह्म तो मिलेगा निःशब्द से, लेकिन ' शब्द ब्रह्म है ' इसका मतलब केवल इतना ही है कि हम अपने अनुभव में जितनी ध्वनियों को जानते हैं, उसमें सबसे सूक्ष्मतम ध्वनि शब्द की है।
अगर हम जगत को पीछे और पीछे लौटाएं तो अंततः जब हम शून्य की कल्पना करें, जहां से जगत शुरू हुआ होगा, तो वहां भी ..उस शून्य में ॐ की ध्वनि हो रही होगी । क्योंकि जब हम चौथे शरीर पर शून्य के करीब पहुंचते हैं तो ओम् की ध्वनि सुनाई पड़ती है।
और वहां से हम डूबने लगते हैं उस दुनिया में जहां कि प्रारंभ में दुनिया रही होगी। चौथे के बाद हम जाते हैं आत्म शरीर में, आत्म शरीर के बाद जाते हैं ब्रह्म शरीर में, ब्रह्म शरीर के बाद जाते हैं निर्वाण शरीर में, और आखिरी ध्वनि जो उन दोनों के बीच में है, वह ओम् की है।
इस तरफ हमारा व्यक्तित्व चार शरीरों वाला है , जिसको हम कह सकते हैं— जगत; और उस तरफ हमारा अव्यक्तित्व है, जिसको हम कह सकते हैं—ब्रह्म। ब्रह्म और जगत के बीच में जो ध्वनि सीमा—रेखा पर गूंजती है, वह ॐ की है।
इस अनुभव से यह विचार आना शुरू हुआ कि जब जगत बना होगा, तो उस ब्रह्म के शून्य से इस पदार्थ के साकार तक आने में बीच में ॐ की ध्वनि गूंजती रही होगी। और इसलिए ' शब्द था' उस शब्द से ही सब हुआ', यह विचार है।
और इस शब्द को अगर हम उसके मूल तत्वों में तोड़ दें तो वह अ उ म पर रह जाता है; बस तीन ध्वनियां मौलिक रह जाती हैं। उन तीनों का जोड़ ॐ है। तो इसलिए ऐसा कहा जा सकता है ॐ ही पहले था, ॐ ही अंत में होगा। क्योंकि अंत जो है वह पहले में ही वापस लौट जाना है।
वह जो अंत है वह सदा पहले में वापस लौट जाना है .सर्किल पूरा होता है।लेकिन फिर भी ॐ को प्रतीक की तरह ही प्रयोग करना है, साधन की तरह नहीं। साधन के लिए और चीजें खोजी जा सकती हैं। ॐ जैसे पवित्रतम शब्द को साधन की तरह उपयोग करके अपवित्र नहीं करना है।
वास्तव में, यह हमारे शरीर से उच्चारण योग्य नहीं। यह तो उस जगह शुरू होता है जहां जीभ अर्थ खो देती है, शरीर व्यर्थ हो जाता है; वहां इसकी गूंज है। और वह गूंज हम नहीं करते, वह गूंज होती है, वह जानी जाती है, वह की नहीं जाती। इसलिए ॐ को जानना ही है, करना नहीं है।
और भी एक खतरा है कि अगर आपने ॐ का प्रयोग किया, तो जो उसका मूल उच्चार है, जो अस्तित्व से होता है उसका आपको कभी पता नहीं चल पाएगा कि वह कैसा है, आपका अपना उच्चारण उस पर आरोपित हो जाएगा। तो उसकी शुद्धतम जो अनुभूति है, वह आपको नहीं हो सकेगी।
तो जो लोग भी ॐ शब्द का साधना में प्रयोग करते हैं, उनको वस्तुत: ॐ का कभी अनुभव नहीं हो पाता। क्योंकि वे जो प्रयोग कर रहे हैं, उसका ही अभ्यास होने से, जब वह मूल ध्वनि आनी शुरू होती है, तो उनको अपनी ही ध्वनि सुनाई पड़ती है।
वे ओम् को नहीं सुन पाते; शून्य का सीधा गुंजन उनके ऊपर नहीं हो पाता अपना ही शब्द वे तत्काल पकड़ लेते हैं। स्वभावत:, क्योंकि जिससे हम परिचित हैं, वह आरोपित हो जाता है। वह किसी दिन चौथे शरीर पर प्रकट होगा। और तब वह कई अर्थ रखेगा।
एक तो यह अर्थ रखेगा कि चौथे शरीर की सीमा आ गई; और अब आप मनस के बाहर जाते हैं, शब्द के बाहर जाते हैं। आखिरी शब्द आ गया; जहां से शब्द शुरू हुए थे, वहीं आप खड़े हो गए; जहां पूरा जगत सृष्टि के पहले क्षण में खड़ा होगा, वहां आप खड़े हो गए हैं, उस सीमांत पर खड़े हैं।
और फिर जब उसकी अपनी मूल ध्वनि पैदा होती है तो उसका रस ही और है। उसको कुछ कहने का उपाय नहीं। हमारा श्रेष्ठतम संगीत भी उसकी दूरतम ध्वनि नहीं है। हम कितने ही उपाय करें, उस शून्य के संगीत को म्यूजिक ऑफ साइलेंस को हम कभी भी न सुन पाएंगे।
और इसलिए अच्छा हो कि हम उसको कोई रूपरंग देकर न चलें। नहीं तो वह हमें बाधा दे सकता है। चौथे शरीर तक स्त्री और पुरुष का भेद है, चौथे शरीर के बाद कोई भेद नहीं है। पांचवां शरीर लिंग-भेद के बाहर है। लेकिन चौथे शरीर तक बहुत बुनियादी भेद है।
और वह बुनियादी भेद बहुत तरह के परिणाम लाएगा। पुरुष शरीर का पहला शरीर पुरुष है, दूसरा शरीर स्त्रैण है; तीसरा शरीर फिर पुरुष है, चौथा शरीर फिर स्त्रैण है। इससे उलटा स्त्री का है उसका पहला शरीर स्त्री का, दूसरा पुरुष का, तीसरा स्त्री का और चौथा पुरुष का।
इसकी वजह से बड़े मौलिक भेद पड़ते हैं ; जिन्होंने मनुष्य जाति के पूरे इतिहास और धर्मों को बड़ी गहराई से प्रभावित किया, और मनुष्य की पूरी संस्कृति को एक तरह की व्यवस्था दी। पुरुष शरीर की कुछ खूबियां हैं; स्त्री शरीर की कुछ खूबियां और विशेषताएं हैं।
दोनों खूबियां और विशेषताएं एक -दूसरे की पूरक हैं। वास्तव में, स्त्री शरीर भी अधूरा शरीर है और पुरुष शरीर भी अधूरा शरीर है; इसलिए सृजन के क्रम में उन दोनों को संयुक्त होना पड़ता है। यह संयुक्त होना दो प्रकार का है।
एक पुरुष का शरीर अगर बाहर की स्त्री से संयुक्त हो, तो प्रकृति का सृजन होता है; प्रकृति की तरफ यात्रा शुरू होती है। और एक पुरुष का शरीर अगर अपने ही पीछे छिपे स्त्री शरीर से संयुक्त हो, तो ब्रह्म की तरफ का जन्म शुरू होता है ; परमात्मा की तरफ यात्रा शुरू होती है।
क्रमशः
30/05/2024, 8:13 am - स्वर विज्ञान: This message was deleted
30/05/2024, 8:14 am - स्वर विज्ञान: क्या है ॐ ध्वनि का रहस्य भाग....4
वास्तव में, स्त्री शरीर भी अधूरा शरीर है और पुरुष शरीर भी अधूरा शरीर है; इसलिए सृजन के क्रम में उन दोनों को संयुक्त होना पड़ता है। यह संयुक्त होना दो प्रकार का है। एक पुरुष का शरीर अगर बाहर की स्त्री से संयुक्त हो, तो प्रकृति का सृजन होता है तो प्रकृति की तरफ यात्रा शुरू होती है।
और एक पुरुष का शरीर अगर अपने ही पीछे छिपे स्त्री शरीर से संयुक्त हो, तो ब्रह्म की तरफ का जन्म शुरू होता है ; परमात्मा की तरफ यात्रा शुरू होती है। ऊर्ध्वगमन का यात्रा पथ यही है..भीतर की स्त्री से संबंधित होना, और भीतर के पुरुष से संबंधित होना।
वास्तव में ,जो ऊर्जा है, वह सदा पुरुष से स्त्री की तरफ बहती है ...चाहे वह बाहर की तरफ बहे और चाहे वह भीतर की तरफ बहे। अगर पुरुष के भौतिक शरीर की ऊर्जा भीतर के स्त्री शरीर के प्रति बहे, तो फिर ऊर्जा बाहर विकीर्ण नहीं होती -ब्रह्मचर्य की साधना का यही अर्थ है।
तब वह निरंतर ऊपर चढ़ती जाती है। चौथे शरीर तक उस ऊर्जा की यात्रा हो सकती है। चौथे शरीर पर ब्रह्मचर्य पूरा हो जाता है। इसके बाद ब्रह्मचर्य जैसी कोई चीज नहीं है; क्योंकि चौथे शरीर को पार करने के बाद साधक न पुरुष है और न स्त्री है।
अब यह जो एक नंबर का शरीर और दो नंबर का शरीर है, इसी को ध्यान में रखकर अर्धनारीश्वर की कल्पना कभी हमने चित्रित की थी। बाकी वह प्रतीक बनकर रह गई और हम उसे कभी समझ नहीं पाए। शिव शंकर अधूरे हैं,देवी पार्वती अधूरी है ..वे दोनों मिलकर एक हैं।
अर्धनारीश्वर का कि आधा अंग पुरुष का है, आधा स्त्री का है। यह जो आधा दूसरा अंग है, यह बाहर प्रकट नहीं है, यह प्रत्येक के भीतर छिपा है। तुम्हारा एक पहलू पुरुष का है, तुम्हारा दूसरा पहलू स्त्री का है। वास्तव में, ये एक -दूसरे के परिपूरक हैं,ये दो इकाइयां नहीं हैं, ये एक ही इकाई के दो पहलू हैं।
आप देखेंगे कि पुरुष जब दिनभर कार्य करता तो उसका पहला शरीर थक जाता है। घर लौटते-लौटते वह पहला शरीर विश्राम चाहता है। भीतर का स्त्री शरीर प्रमुख हो जाता है, पुरुष शरीर गौण हो जाता है। स्त्री दिन भर स्त्री रहते-रहते पहला शरीर थक जाता है, उसका दूसरा शरीर प्रमुख हो जाता है।
इसलिए स्त्री पुरुष का व्यवहार करने लगती है और पुरुष स्त्री का व्यवहार करने लगता है ...रिवर्सन हो जाता है। ऊर्जा के आंतरिक प्रवाह ऊर्ध्व गमन का मार्ग है कि बाहर के पुरुष का भीतर की स्त्री से मिलन या बाहर की स्त्री का भीतर के पुरुष से मिलन।
पुरुष शरीर के जो विशेष गुण हैं, वह पहला गुण यह है कि वह आक्रामक है ,दाता है, दे सकता है, ले नहीं सकता। लेकिन पुरुष ग्रहण नहीं कर पाता; उसकी ग्रहण करने की क्षमता बहुत कम है। इसलिए पुरुषों ने धर्म को जन्म तो दिया, लेकिन पुरुष धर्म का संग्रह नहीं करते।
बल्कि स्त्रियां धर्म का संग्रह करती है। स्त्री दे नहीं सकती, ले सकती है।परन्तु इस ब्रह्मांड की सबसे बड़ी महिमा यही है कि जिसका पहला शरीर स्त्री का है ;उसका दूसरा शरीर पुरुष का;पुनः तीसरा शरीर स्त्री का और चौथा पुरुष का। इस प्रकार जिसका पहला शरीर पुरुष का है।
उसका दूसरा शरीर स्त्री का ;पुनः तीसरा पुरुष का और चौथा स्त्री का। चौथे शरीर के बाद स्त्री पुरुष शरीर का भेद भी खत्म हो जाता है। उनका ऊर्ध्व गमन हो जाता है। जिसका पहला शरीर स्त्री का है ;उसका चौथा शरीर पुरुष का है। जिसका पहला शरीर पुरुष का है ;उसका चौथा शरीर स्त्री का है।
इसलिए चौथे शरीर में स्त्रियां देने वाली है दाता है और चौथे शरीर में पुरुष लेने वाले भिक्षुक हैं। सांसारिक जगत में 3 शरीरों का वर्चस्व है। परंतु आध्यात्मिक जगत में यात्रा चौथे शरीर से ही शुरू होती है। स्त्रैण व्यक्तित्व का मतलब यह है कि उनमें स्त्रैण गुण हैं।
कोमलता, प्रेम, ममता, करुणा और अहिंसा आदि वे बढ़ गए; हिंसा क्रोध खत्म हो गया, आक्रमण विदा हो गया। जब भी कोई मुल्क आध्यात्मिक होगा, तो स्त्रैण हो जाएगा; और जब भी स्त्रैण होगा, तब अपने से बहुत साधारण सभ्यताएं उसको हरा देंगी।
सामान्य चौथे शरीर मे ॐ ध्वनि सुनने लगती ओर यात्रा पूर्ण समझ लोग रुक जाते। किन्तु गुरु परंपरा में गुरुजन सदैव कहते कि चौथे शरीर में जल्द आगे बढ़ो साधना समय दोगुना कर दो। क्योकि अगला शरीर आत्म शरीर है वही आपका पहला जन्म होगा स्वयं से।
उससे पहले न जन्म है न मृत्यु हम किसी ओर के गर्भ से जन्म लेते रहते यह जीवन चक्र यू ही चलता रहता। आत्म शरीर स्वयं से जन्म लेता फिर आप को पराए गर्भ से मुक्ति मिल जाती। इसे मुक्ति कहा है यह मोक्ष या निर्वाण नही है अभी यात्रा बाकी है।
उदहारण के लिए बौद्ध तिब्बत से निकाल दिए गए या भारत को जिन लोगों ने हराया, वे भारत से बहुत पिछड़ी हुई सभ्यताएं , एक अर्थ में बिलकुल बर्बर सभ्यताएं थीं। लेकिन हम अध्यात्म में दाता हो गए थे, हम उनको आत्मसात ही कर सके, लड़ने का कोई उपाय न था।
तो ऐसी प्रक्रियाएं हैं कि इसी हालत में व्यक्तित्व का रूपांतरण किया जा सकता है..जो तुम्हारा नंबर दो का शरीर है, वह तुम्हारे नंबर एक का शरीर हो सकता है; और जो तुम्हारे नंबर एक का शरीर है, वह तुम्हारे नंबर दो का शरीर हो सकता है।
इसके लिए प्रगाढ़ संकल्प की साधनाएं हैं, जिनसे तुम्हारा इसी जीवन में भी शरीर रूपांतरित हो सकता है। परंतु समस्या तब आती है जब हम चौथे शरीर पर ही रुक जाते हैं। चौथे शरीर के बाद पांचवें ,छठवें और सातवें शरीर की भी तो यात्रा है।
भारत चौथे शरीर पर ही रुक गया इसलिए हार गया। उदाहरण के लिए गोपिओं को श्री कृष्ण सखी प्रतीत होते हैं; परंतु क्या महाभारत में भी उनका व्यक्तित्व ऐसा है? नही, क्योंकि उनकी यात्रा छटे शरीर की हैं। श्री कृष्ण छटे ब्रह्म शरीर मे है । भारत चौथे शरीर पर रुक गया तो हार गया।
इसीलिए चौथे शरीर के बाद रुकना नहीं हैं... सातवें शरीर तक जाना हैं। राग से शुरू कर वैराग्य के रास्ते वीतरागता तक जाना वैराग्य पर रुकना नही है। जो संसार मे लिप्त होता उसे रागी कहते ओर जो संसार को मिथ्या मान दूर भागता उसे वैरागी कहते।
राग ओर वैराग्य से ऊपर की अवस्था होती वीतरागता। यहाँ न संसार को पकड़ा होता न ही छोड़ा होता। पूर्ण आनन्द की अवस्था होती यह। जहाँ सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए योगी जन मोक्ष की तरफ बढ़ते रहते राजा जनक की तरह।
ॐ ध्वनि चौथे शरीर पर सुनाई देती आगे की यात्रा निःशब्द है इस लिए इसे सातवे का प्रतीक माना गया किंतु ॐ ध्वनि सुनने के उपरांत भी बढ़ते रहना है ।
03/06/2024, 5:05 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते हैं लेकिन कभी खोज न पाएंगे, क्योंकि खोजा उसे जा सकता है जिसे खोया हो। वास्तव में, जो खोजने निकला है, वह स्वयं ही परमात्मा है, इसलिए नहीं खोज पाएगा। जिन्होंने कहा है, परमात्मा नहीं है, वे कभी भीतर ही नहीं गए।
और जो भीतर गए हैं, उन्होंने सदा कहा है कि परमात्मा है.... हमारा स्वभाव स्वयं परमात्मा होना है। स्वभाव का अर्थ है, जो मेरा होना ही है। जो हमारा अस्तित्व ही है। हम अगर परमात्मा से अलग होते, तो कहीं न कहीं उसे खोज ही लेते, आमने-सामने पड़ ही जाते।
लेकिन हम स्वयं ही परमात्मा हैं ; इसलिए जो परमात्मा को खोजने निकला है, उसे अभी पता ही नहीं कि वह जिसे खोज रहा है। वह उसका स्वयं का ही होना है। यह तो हमारा स्वभाव है, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, लेकिन जो खोने से मिलता-जुलता है ।
वह है विस्मरण ,स्वभाव को खोया नहीं जा सकता, लेकिन स्वभाव को भूला जा सकता है। परमात्मा सिर्फ विस्मृत है। योग की जरूरत है इस विस्मरण को तोड़कर स्मरण को पुनर्स्थापित करने के लिए। योग से कोई नई उपलब्धि नहीं होगी; जो सदा-सदा से मिला ही हुआ है।
वही पुनर्स्मरण होगा।योग का मतलब है आत्मा से परमात्मा का मिलन। अगर इस पृथ्वी पर अंधेरा न हो, तो प्रकाश का किसी को भी पता नहीं चलेगा। पता चलने के लिए विपरीत का होना जरूरी है। जिंदगी के गहरे नियमों में से एक है कि उसी बात का पता चलता है ।
जिसका विरोधी मौजूद हो; अन्यथा पता नहीं चलता। अगर हमारे भीतर परमात्मा सदा से है, तो भी उसका पता तभी चलेगा, जब एक बार विस्मरण हो। उसके बिना पता नहीं चल सकता। योग इस भूलने के ढंग से विपरीत यात्रा है ...पुनः घर की ओर वापसी।
योग समस्त धर्मों की प्रक्रिया है ,सार है। योग शुद्ध विज्ञान है। हां, फर्क है क्योंकि साइंस पदार्थगत है ,जबकि योग आत्मगत है। विज्ञान खोजता है पदार्थ और योग खोजता है परमात्मा। वैज्ञानिकों का खयाल है कि दस प्रतिशत से ज्यादा हम अपने शरीर का उपयोग नहीं करते।
नब्बे प्रतिशत शरीर की शक्तियां अनुपयोगी रहकर ही समाप्त हो जाती हैं। योग का पहला काम तो यह है कि उन नब्बे प्रतिशत शक्तियों में से जो सोई पड़ी हैं, उन शक्तियों को जगाना,जिनके माध्यम से अंतर्यात्रा हो सके क्योंकि बिना एनर्जी/ऊर्जा के कोई यात्रा नहीं हो सकती है।
शरीर में बहुत-से चक्र हैं। इन प्रत्येक चक्र में छिपी हुई अपनी विशेष ऊर्जा है, जिसका विशेष उपयोग किया जा सकता है। योगासन उन सब चक्रों में सोई हुई शक्ति को जगाने का प्रयोग है। योग के द्वारा शरीर एक डायनेमिक फोर्स, ऊर्जा की एक जीती-जागती, साकार प्रतिमा बन जाता है।
इस शक्ति के पंखों पर चढ़कर अंतर्यात्रा हो सकती है। अन्यथा अंतर्यात्रा अत्यंत कठिन है। योग का पहला तत्व है, ऊर्जा। दूसरा तत्व है, ध्वनि और तीसरा तत्व है, ध्यान, अटेंशन, दिशा। योग कहता है कि अगर परमात्मा की तरफ जाना है तो उन ध्वनियों का उपयोग करो।
जिन ध्वनियों से परमात्मा की तरफ जाने वाला लयबद्ध मन निर्मित हो जाए। इस जगत में और कुछ भी खोजना हो, तो दिशा है। लेकिन परमात्मा की तो कोई दिशा नहीं है क्योकि वह सब दिशाओं में व्याप्त है।जब परमात्मा की तो कोई दिशा नहीं, तो उसे हम कैसे खोजें?
इसीलिए योग ने ऐसी ध्वनियां खोजी जो दिशाहीन हैं। जैसे ओम ..यह दिशा हीन ध्वनि है। अगर आप ओम का पाठ करें, तो यह ध्वनि सर्कुलर है।इस लिए ओम का जो प्रतीक बनाया है, वह भी सर्कुलर /वर्तुलाकार है। अगर आप भीतर ओम की ध्वनि करें।
तो आपको ऐसा अनुभव होगा, जैसे मंदिर के ऊपर गोल गुंबज होती है।वह गोल गुंबज ओम की ध्वनि से जुड़कर बनाई गई है। जब आप भीतर जोर से ओम का पाठ करेंगे, तो आपको अपने सिर और चारों तरफ एक सर्कुलर स्थिति का बोध होगा, दिशाहीन। ॐ कहीं से आता हुआ नहीं मालूम पड़ेगा।
और सब कहीं जाता हुआ मालूम पड़ेगा। यह एक अदभुत ध्वनि है, जो योग ने खोजी है। इस ध्वनि के मुकाबले जगत में कोई दूसरी ध्वनि नहीं खोजी जा सकी। इस सर्कुलर स्थिति में आप परमात्मा की तरफ उन्मुख होंगे, अन्यथा आप उन्मुख न हो सकेंगे।
कोई चीज आपको अपनी तरफ खींचती रहेगी ; कोई न कोई दिशा आपको पुकारती रहेगी। दिशामुक्त होंगे, तो भीतर की तरफ यात्रा शुरू होगी। और जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक नहीं चलायमान होता है, वैसी ही उपमा ध्यान योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।
सब ध्वनियां चेतना को कंपित करेंगी। जब तक किसी दिशा में ध्यान जाए गा, तब तक चेतना की लौ कंपित होगी। चित्त के लिए ध्वनि ही वायु है। जब इन समस्त ध्वनियों के पार हम अपने भीतर कोई मंदिर खोज पाएं।जहां ये कोई ध्वनियां प्रवेश न करें।
तब हम अपने भीतर ऊर्जा का एक ऐसा मंडल/वर्तुल बना पाएंगे, जहां चेतना अकंप ठहर जाए । इस मंडल में ठहरी हुई चेतना वायुरहित स्थान में दीए की लौ जैसी हो जाती है। योग उसका अभ्यास है ; तब चित्त मंडलाकार अपने भीतर ही बंद हो जाता है।
क्रमशः
03/06/2024, 6:05 pm - स्वर विज्ञान removed +91 95986 10251
03/06/2024, 6:05 pm - स्वर विज्ञान removed +91 96908 82579
03/06/2024, 6:05 pm - स्वर विज्ञान removed +91 83901 31438
06/06/2024, 8:22 pm - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग.....2
जब समस्त ध्वनियों के पार हम अपने भीतर कोई मंदिर खोज पाएं, जहां ये कोई ध्वनियां प्रवेश न करें। हम अपने भीतर ऊर्जा का एक ऐसा मंडल/वर्तुल बना पाएंगे, जहां चेतना अकंप ठहर जाए। इस मंडल में ठहरी हुई चेतना वायुरहित स्थान में दीए की लौ जैसी हो जाती है।
योग उसका अभ्यास है ; तब चित्त ..मंडलाकार अपने भीतर ही बंद हो जाता है। तो ध्वनि का एक विशेष आयोजन भीतर करना पड़े, तभी लौ ठहर पाएगी। योग कहता है मन आपके सिस्टम की जड़ है। मन में लोभ, क्रोध काम, अहंकार होगा ही क्योकि यह मन का स्वभाव है।
इस मन को ही बदलो। इस मन की जगह नए मन को स्थापित करो। यह मन रहा और इस मन का यंत्र रहा, तो सब जारी रहेगा। इस यंत्र को नया करो, नया यंत्र स्थापित करो। तो तुम्हारे पास नया मन होगा, जिसमें क्रोध नहीं होगा, काम नहीं होगा।
मोह नहीं होगा, लोभ नहीं होगा। लेकिन इस मन को बदलने का राज है और योग उसी राज का विस्तार है? और योग ने तीन प्रकार के राज कहे, तीन तरह के लोगों के लिए। क्योंकि तीन तरह के लोग हैं। वे लोग हैं, जिनके भीतर, विचार ,बुद्धि प्रधान है, जिनके भीतर भाव प्रधान है, और जिनके पीछे कर्म प्रधान है ।
योग की तीन प्रमुख शाखाएं हैं –फिर तो अनंत शाखाएं हो गईं–कर्म, भक्ति और ज्ञान। तीन तत्व अग्नि, जल और वायु। और उन तीनों की तीन कुंजियां हैं। और प्रत्येक टाइप के व्यक्ति के लिए अलग अलग कुंजी लागू होती है। परन्तु ताला खुलने पर एक ही मकान में प्रवेश होता है।
अब जो व्यक्ति विचार से ही जीता है वायु तत्व उसके लिए प्रार्थना, कीर्तन, भजन बिलकुल अर्थपूर्ण नहीं मालूम पड़ेंगे। उसमें उसका कसूर नहीं है क्योंकि विचार प्रश्न उठाता है। और जहां विचार में प्रश्न उठते हैं वहां भाव जल तत्व में प्रश्न नहीं उठते हैं।
भाव प्रश्न नहीं उठाते क्योंकि निष्प्रश्न हैं। भाव स्वीकार है, एक्सेप्टिबिलिटी है लेकिन विचार संघर्ष करता है। तो विचार के लिए तो अलग ही रास्ता खोजना पड़ेगा। योग ने उसके लिए रास्ता खोजा ..ज्ञानयोग अथार्त उस जगह पहुंच जाओ, जहां न ज्ञेय रह जाए और न ज्ञाता रह जाए, सिर्फ ज्ञान रह जाए।
उसकी पूरी प्रक्रिया है। ज्ञेय /आब्जेक्ट्स को छोड़ो। जिसे जानना हो, उसे छोड़ो; और जो जानने वाला है, उसे भी छोड़ो। जो ज्ञान की क्षमता नोइंग फैकल्टी है, उसी में रमो।
भाव वाले व्यक्ति जल तत्व को यह बात समझ में न पड़ेगी कि ज्ञान की धारा में कैसे खड़े हो जाएं क्योंकि भाव वाला भावना से जीता है, समझ से नहीं। भाव वाले से कहो कि आनंदमग्न होकर , प्रभु-समर्पित होकर नाचो। वह नाचने लगेगा। वह यह नहीं पूछेगा, नाचने से क्या होगा ।
और नाचने से सब हो जाएगा। नाचने में वह क्षण आता है, कि नाचने वाला भी मिट जाता है, नृत्य ही रह जाता है । परमात्मा भी भूल जाता है, जिसके लिए नाच रहे हैं; जो नाचता था, वह भी भूल जाता है; सिर्फ नाचना ही रह जाता है... जस्ट डांसिंग। जस्ट नोइंग की तरह घटना घट जाती है।
जैसे सिर्फ जानना रह जाता है, बस द्वार खुल जाता है। सिर्फ नृत्य रह जाता है, तो भी द्वार खुल जाता है।उदाहरण के लिए जब मीरा गाती है, 'मेरे तो गिरधर गोपाल', तो न तो गोपाल रह जाते न मेरा कोई रह जाता। सिर्फ यह गीत ही रह जाता है ..गिरधर भी भूल जाते हैं।
गायक भी भूल जाता है; मीरा भी खो जाती है, श्री कृष्ण भी खो जाते हैं; बस, गीत रह जाता है। जहां सिर्फ गीत रह जाता है, वहां वही घटना घट जाती है। लेकिन वायु तत्व कहेंगे, केवल ज्ञान /जस्ट नोइंग रह जाए, बस...वहीं द्वार खुलेगा। मीरा कहेगी, ज्ञान का क्या करेंगे! गीत रह जाए।
ज्ञान तो रेगिस्तान जैसा बड़ा रूखा सूखा है लेकिन गीत गीला है ,हरियाली से भरा है। प्राणों के कोने-कोने तक गीत स्नान करा जाता है। तीसरा हैं अग्नि तत्व..कर्म प्रधान। ये तीन खास प्रकार के लोग हैं। इन तीन विधियों के द्वारा साधारणतः कोई भी व्यक्ति चेतना को उस स्थान में ले आ सकता है ।
जहां केवल ज्ञान रह जाए ;केवल भाव रह जाए या केवल कर्म रह जाए । तीन की जगह एक रह जाए अथार्त बीच का रह जाए, दोनों छोर मिट जाएं, तो व्यक्ति की चेतना स्थिर हो जाती है। जैसे कि जहां वायु न बहती हो, वहां दीए की ज्योति स्थिर हो जाती है।
उस दीए की ज्योति के स्थिर होने को ही योगी को उपमा दी गई है। योगी भी ऐसा ही ठहर जाता है। भगवत गीता में योग शब्द को एक नहीं बल्कि कई अर्थों में प्रयोग हुआ है, लेकिन हर योग अंतत: ईश्वर से मिलने मार्ग से ही जुड़ता है।
गीता में योग के कई प्रकार हैं, लेकिन मुख्यत: तीन योग का वास्ता ही मनुष्य से अधिक होता है । अथार्त ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। महाभारत युद्ध में जब अर्जुन नातों में उलझ मोह में बंध रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि जीवन में सबसे बड़ा योग है ,कर्म योग।
उन्होंने बताया था कि कर्म योग से कोई भी मुक्त नहीं हो सकता, वह स्वयं भी कर्म योग से बंधे हैं। कर्म योग ईश्वर को भी बंधन में बांधे रखता है। श्री कृष्ण योग ने अर्जुन को 13 प्रकार के योग के बारे में जानकारी देकर उनके मन के मैल को साफ किया था। गीता में उल्लेखित 13 योग है।
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क्रमशः
07/06/2024, 8:13 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग.......3
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 13 प्रकार के योग के बारे में जानकारी देकर उनके मन के मैल को साफ किया , गीता में उल्लेखित प्रमुख 13 योग है..
1-विषाद योग :- विषाद यानी दुख। युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने अपनो को सामने देखा तो वह विषाद योग से भर गए। उनके मन में निराशा और अपनो के नाश का भय हावी होने लगा। तब भगवान श्रीकष्ण ने अर्जुन के मन से यह भय दूर करने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वही गीता बनीं। उन्होंने सर्वप्रथम विषाद योग से अर्जुन को दूर किया और युद्ध के लिए तैयार किया था।
2-सांख्य योग :- भगवान श्रीकृष्ण ने पुरुष की प्रकृति और उसके अंदर मौजूद तत्वों के बारे में समझाया। उन्होनें अर्जुन को बताया कि मनुष्य को जब भी लगे कि उस पर दुख या विषाद हावी हो रहा है । उसे सांख्य योग यानी पुरुष प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए। मनुष्य पांच सांख्य से बना है, आग, पानी, मिट्टी, हवा। अंत में मनुष्य इसी में मिलता है।
3-कर्म योग:- भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जीवन में सबसे बड़ा योग कर्म योग है। इस योग से देवता भी नहीं बच सकते। कर्म योग से सभी बंधे हैं। सभी को कर्म करना है। इस बंधन से कोई मुक्त नहीं हो सकता है। साथ ही यह भी समझाया की कर्म करना मनुष्य का पहला धर्म है। उन्हों ने अर्जुन को समझाया कि सूर्य और चंद्रमा भी अपने कर्म मार्ग पर निरंतर प्रशस्त रहते हैं। तुम्हें भी कर्मशील बनना होगा।
4-ज्ञान योग:- भगवान श्रीकृष्ण अजुर्न से कहा कि ज्ञान अमृत समान होता है। इसे जो पी लेता है उसे कभी कोई बंधन नहीं बांध सकता। ज्ञान से बढ़कर इस दुनिया में कोई चीज़ नहीं होती है। ज्ञान मनुष्य को कर्म बंधनों में रहकर भी भौतिक संसर्ग से विमुक्त बना देता है।
5-कर्म वैराग्य योग:- भगवान ने अर्जुन को बताया कि कर्म से कोई मुक्त नहीं, यह सच है, लेकिन कर्म को कभी कुछ पाने या फल पाने के लिए नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिए। यह सोचे बिना कि इसका फल उसे कब मिलेगा या क्या मिलेगा। कर्म के फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। ईश्वर बुरे कर्मों का बुरा फल और अच्छे कर्मों का अच्छा फल देते हैं।
6-ध्यान योग:- ध्यान योग से मनुष्य खुद को मूल्यांकन करना सीखता है। इस योग को करना हर किसी के लिए जरूरी है। ध्यान योग में मन और मस्तिष्क का मिलन होता है और ऐसी स्थिति में दोनों ही शांत होते हैं और विचलित नहीं होते। ध्यान योग मनुष्य को शांत और विचारशील बनता है।
7-विज्ञान योग:- इस योग में मनष्य किसी खोज पर निकलता है। सत्य की खोज विज्ञान योग का ही अंग है। इस मार्ग पर बिना किसी संकोच के मनुष्य को चलना चाहिए। विज्ञान योग तप योग की ओर अग्रसर होता है।
8-अक्षर ब्रह्म योग:- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अक्षर ब्रह्म योग की प्राप्ति से ही ब्रह्मा, अधिदेव, अध्यात्म और आत्म संयम की प्राप्ति होती है। मनुष्य को अपने भौतिक जीवन का निर्वाह शून्य से करना चाहिए। अक्षर ब्रह्म योग के लिए मनुष्य को अपने अंदर के हर विचार और सोच को बाहर करना होता है। नए सिरे से मन को शुद्ध कर इस योग को करना होता है।
9-राज विद्या गुह्य योग:- इस योग में स्थिर रहकर व्यक्ति परम ब्रह्म का ज्ञानी होता है। मनुष्य को परम ज्ञान प्राप्ति के लिए राज विद्या गुह्य योग का आत्मसात करना चाहिए। इसे करने वाला हर बंधनों से मुक्त हो सकता है।
10-विभूति विस्तार योग:- मनुष्य विभूति विस्तार योग के जरिये ही ईश्वर के नजदीक पहुंचता है। इस योग के माध्यम से साधक ब्रह्म में लीन हो कर अपने ईश्वर मार्ग पर प्रशस्त होता है।
11-विश्वरूप दर्शन योग:-इस योग को मनुष्य जब कर लेता है तब उसे ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन होता है। ये अनंत योग माना गया है। ईश्वर तक विराट रूप योग के माध्यम से अपना रूप प्राप्त किए हैं।
12-भक्ति योग:- भक्ति योग ईश्वर प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ योग है। बिना इस योग के भगवान नहीं मिल सकते। जिस मनुष्य में भक्ति नहीं होती उसे भगवान कभी नहीं मिलते।
13-क्षेत्र विभाग योग:- क्षेत्र विभाग योग ही वह जरिया है जिसे जरिये मनुष्य आत्मा, परमात्मा और ज्ञान के गूढ़ रहस्य को जान पाता है। इस योग में समा जाने वाले ही साधक योगी होते हैं।
गीता में वर्णित ये योग, मौजूदा समय में मनुष्य की जरूरत हैं। इसे अपनाने वाला ही असल मायने में अपने जीवन को पूर्ण रूप से जी पाता है।योगी वह है जो पिण्ड के अन्दर जीव का आत्मा से मिलन (हंसो) साधना के माध्यम (स्वांस-प्रस्वांस) से करते हैं।
ज्ञानी या तत्वज्ञानी वह है जो ब्रह्माण्ड के अन्दर मानव का अवतार से मिलन तत्त्वज्ञान के माध्यम से करते हैं। योगी अपने लक्ष्य रूप आत्मा की प्राप्ति हेतु अपने मन को इन्द्रिय रूपी गोलकों से अथार्त बहिर्मुखी से हटाकर खींचकर अंतर्मुखी बनाते हुये स्वास-प्रस्वास में लगाकर जीव को समाधि अवस्था में आत्मा से मिलन करता है।
ये समस्त क्रियाएँ पिण्ड में होती, पिण्ड से बाहर योगी की कोई क्रिया प्रक्रिया नहीं होती है। परन्तु तत्त्वज्ञानी अपने लक्ष्य रूप परमात्मा की प्राप्ति हेतु अपने जीवात्मा से युक्त शरीर को सम्बन्ध ममता-आसक्ति रूपी सम्बन्धियों से मोह आदि से हटाकर पूर्णतः समर्पण /शरणागत होते हुये सत्संग एवं धर्म संस्थापनार्थ अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति को लगाते हुये अनुगामी के रूप में रहता है।
योगी का कार्यक्षेत्र मात्र एक पिण्ड के अन्तर्गत ही रहता है परन्तु ज्ञानी का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है। योगी ‘अहम्’ रूप जीव को आत्मा से मिलाकर जीवात्मा (हंसो) भाव से मात्र समाधि अवस्था तक ही रहता है।
परन्तु ज्ञानी ‘अहम्’ रूप जीव को ‘सः’ रूप आत्मा से मिलाते हुये परमात्मा से मिलाकर शरणागत भाव से शाश्वत् अद्वैत्तत्त्वबोध रूप में हो जाता है।योगी मात्र समाधि में ही आत्मामय (हंसो) रूप में रहता है, जैसे ही समाधि टूटती है, वह पुनः सोsहं रूप होते हुये अहंकारी रूप ‘अहम्’ में फँस जाता है।
ठीक इसी प्रकार ज्ञानी शरणागत रूप में ही ‘मुक्त’ अमरता, परमपद, परमतत्त्वमय, पापमुक्त, बन्धन मुक्त, सच्चिदानन्दमय (आत्मतत्त्वम्) रूप में रहता है परन्तु शरणागतभाव के टूटते ही वह पुनः मिथ्याज्ञानभिमानी रूप ‘अहम्’ शरीर में फँस जाता है।
जहाँ पर दो नदियाँ मिलकर तीसरा रूप लेकर बहती हैं तो वह मिलन-स्थल ही संगम है। परन्तु जहाँ पर तीनों नदियाँ- गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हों, उसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता। उसमें भी जहाँ अक्षय-वट हो, वह भी भारद्वाज ऋषि जैसे उपदेशक के साथ, तो उसकी महिमा में चार चाँद ही ला देता है।
परन्तु यह सारी महिमा मात्र कर्मकांडियों के लिए ही है।योगियों-महात्माओं और ज्ञानियों के लिए नहीं, क्योंकि कर्म-कांड की मर्यादा तभी तक रहती है, जब तक कि योग-साधना नहीं की जाती और ज्ञान में तो ये कर्मकांडी और योगी-महात्मा सभी आकर विलय कर जाते हैं।
भगवद गीता अध्याय: 6 श्लोक 46 में श्री कृष्ण कहते है
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। हे अर्जुन! तू योगी हो
क्रमशः
08/06/2024, 12:26 pm - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग .....4
भगवद्गीता में गीता अध्याय-6 श्लोक-46 में श्रीकष्ण कहते है ''योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन, तू योगी हो''।
श्रीकष्ण ने योगी को तीन से श्रेष्ठ कहा है और चौथा बनने का आदेश दिया है। तीनों बातों को थोड़ा-थोड़ा देख लेना जरूरी है। तपश्चर्या दिखाई पड़ती है और योग दिखाई नहीं पड़ता है। योग है अंतर्साधना, तपश्चर्या है बहिर्साधना।
साधारणतः तपस्वी श्रेष्ठ मालूम पड़ता है, क्योंकि तपश्चर्या प्रकट है और योग अप्रकट। अगर कोई व्यक्ति घनी धूप में खड़ा है, भूखा खड़ा है, प्यासा खड़ा है, उपवासा खड़ा है, शरीर को सताता है-- तो सबको दिखाई पड़ता है क्यों कि तपस्वी मूलतः शरीर से बंधा हुआ है।
जैसे भोगी शरीर से बंधा होता है; उसके शरीरों की सजावट ,गहने, सारा का सारा शृंगार दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ही तपस्वी का भी सारा का सारा शरीर विरोध प्रकट दिखाई पड़ता है। लेकिन दोनों का केंद्र एक ही है--भोगी का भी शरीर है और तथाकथित तपस्वी का भी शरीर है।
लेकिन योगी को पहचानना मुश्किल है, क्योंकि योगी शरीर से नहीं अंतस से शुरू करता है। योगी की यात्रा भीतरी है और वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक इस अर्थों में है कि योगी साधनों का प्रयोग करता है, जिनसे अंतस चित्त को रूपांतरित किया जा सके। त्यागी केवल शरीर से शत्रु की भांति लड़ता है ।
दमन करता हुआ मालूम पड़ता है। भोगी भोजन खाए चला जाता है; जितना उसका वश है और त्यागी भोजन छोड़ता चला जाता है। लेकिन योगी न तो भोजन किए चला जाता है और न ही भोजन का त्याग करता है। योगी रस का , स्वाद का त्याग कर देता और जितना भोजन जरूरी है, कर लेता है।
लेकिन यह दिखाई न पड़ेगा;बहुत मुश्किल से पहचान में आएगा। यह तो योगी ही या जो बहुत निकट होंगे, वे धीरे-धीरे पहचान पाएंगे। कि योगी कैसे उठता है, कैसे बैठता है, तपस्वी दिखाई पड़ जाएगा, क्योंकि तपस्वी का सारा प्रयोग शरीर पर है लेकिन योगी का सारा प्रयोग अंतस चेतना पर है।
योगी की समस्त साधना,अंतर्साधना है।इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्वी से महान है योगी। ऐसा कहने की जरूरत इसीलिए पड़ी होगी, क्योंकि तपस्वी सदा ही महान दिखाई पड़ता है। जो व्यक्ति रास्तों पर कांटे बिछाकर उन पर बैठ जाए, वह स्वभावतः उस व्यक्ति से महान दिखाई पड़ेगा ।
जो अपनी आरामकुर्सी में बैठकर ध्यान करता हो। क्योंकि कुर्सी में बैठना कौन-सी महानता है?लेकिन कांटों पर लेटना बड़ा काम नहीं है क्योंकि कोई भी थोड़ा-सा अभ्यास करे, तो बैठ जाएगा। प्रत्येक मनुष्य की पीठ पर ऐसे ब्लाइंड स्पाट्स हैं, जहां कांटा चुभेगा, लेकिन आपको पता नहीं चलेगा।
बस, उन्हीं ब्लाइंड स्पाट्स का थोड़ा-सा अभ्यास करना पड़ता है। व्यवस्थित कांटे रखने पड़ते हैं, जो ब्लाइंड स्पाट्स में लग जाएं। यह सीधी-सी ट्रिक है, इसमें कुछ मामला नहीं है। लेकिन कांटे पर कोई ललेटा हो, तो चमत्कार हो जाएगा, भीड़ इकट्ठी हो जाएगी।
लेकिन कोई आरामकुर्सी पर बैठकर ध्यान कर रहा हो, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा। यद्यपि ध्यान को एकाग्र करना कांटों पर लेटने से बहुत कठिन काम है। क्योंकि ध्यान पारे की तरह हाथ से छिटक जाता है ; पकड़ भी नहीं पाए, कि छूट जाता है। एक क्षण भी एक जगह नहीं रुकता ।
इस ध्यान को एक जगह ठहरा लेना योग है।तपस्वी दिखाई पड़ता है; लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि योगी के जीवन में तपश्चर्या न होगी। जो तपश्चर्या कर रहा है, उसके जीवन में योग होगा, ओर योगी के जीवन में एक तरह की तपश्चर्या आ जाती है जो बड़ी सूक्ष्म होती है।
गहरे अर्थों में वह सरल हो जाता है ,दुख को झेलने के लिए सदा तत्पर हो जाता है ,सुख की मांग नहीं करता। उस पर दुख आ जाएं, तो योगी दुख को ऐसे झेलता है, जैसे वह दुख न हो। सुख आ जाए, तो ऐसे झेलता है, जैसे वह सुख न हो। योगी सुख और दुख में सम होता है।
लेकिन तपस्वी दुख आ जाए। इसकी प्रतीक्षा नहीं करता; अपनी तरफ से दुख का इंतजाम करता है, आयोजन करता है। अगर एक दिन भूख लगी हो और खाना न मिले, तो योगी विक्षुब्ध नहीं हो जाता; भूख को शांति से देखता है; सम रहता है।
लेकिन तपस्वी को भूख भी लगी हो, भोजन भी मौजूद हो, शरीर की जरूरत भी हो, भोजन भी मिलता हो, तो भी रोककर, हठ बांधकर बैठ जाता है कि भोजन नहीं करूंगा। यह आयोजित दुख है।ध्यान रहे, भोगी सुख की आयोजन करता है, तपस्वी दुख की आयोजन करता है।
अगर भोगी सिर सीधा करके खड़ा है, तो तपस्वी शीर्षासन लगाकर खड़ा हो जाता है। लेकिन दोनों आयोजन करते हैं। योगी आयोजन नहीं करता। वह कहता है, प्रभु जो देता है, उसे सम भाव से मैं लेता हूं। वह अपनी तरफ से न सुख का आयोजन करता है, न दुख का आयोजन करता है।
जो मिल जाता है, उस मिल गए में शांति से ऐसे गुजर जाता है, जैसे कीचड़ में खिला कमल ...लेकिन कीचड़ उसका स्पर्श न करता हो।
क्रमशः
09/06/2024, 9:28 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग......5
अध्याय-6 का अंतिम श्लोक श्रद्धा पर पूरा होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, ''और संपूर्ण योगियों में भी, जो श्रद्धावान योगी मेरे में लगे हुए अंतरात्मा से मेरे को निरंतर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है। और श्रद्धा से मुझमें लगा हुआ योगी परम अवस्था को उपलब्ध होता है, वह मुझे सर्वाधिक मान्य है।
दो तरह के योगी हो सकते हैं। एक बिना किसी श्रद्धा के योग में लगे हुए जिन्हे मात्र जीवन के दुख से छुटकारा चाहिए। वह जीवन की ऊब से भागा हुआ हैं, जो अपने को किसी सुरक्षित अंतःस्थल में पहुंचा देना चाहता है। वह बिना श्रद्धा के भी योग में संलग्न हो सकता है लेकिन यात्रा बहुत लंबी होगी।
क्योंकि परमात्मा जो सहायता दे सकता है, वह उसे न मिल सकेगी। यह अंतर समझना हैं। इसलिए श्रीकृष्ण उसे कहते हैं, जो मुझमें श्रद्धा से लीन है, मेरी आत्मा से अपनी आत्मा को मिलाए हुए है, उसे मैं परम श्रेष्ठ कहता हूं।
उदाहरण के लिए एक बच्चा रास्ते पर चल रहा है। कई बार बच्चा अपने पिता का हाथ पकड़ना पसंद नहीं करता। उसके अहंकार को चोट लगती है। पिता छोड़ दे या बेटा झटका देकर हाथ अलग कर ले। तो भी बेटा चलना सीख जाएगा, लेकिन यात्रा लंबी होगी भूल-चूक ;होगी हाथ-पैर बहुत टूटेंगे।
तो बेटा चलना तो चाहता है, लेकिन खुद के अहंकार के अतिरिक्त पिता या किसी के प्रति कोई भाव नहीं है। तो जरूरी नहीं वह इसी जन्म में सीख पाए। जन्म-जन्म भी लग सकते हैं। श्रद्धा में उसके अहंकार निर्मित न हो पाएगा। वह कहेगा, मेहनत मैं पूरी करता हूं।
लेकिन फिर भी तेरी कृपा के बगैर तो मिलना नहीं होगा। मैं जरूर चलने की कोशिश करूंगा, लेकिन मैं गिर सकता तेरे हाथ का सहारा मुझे बना रहे। और आश्चर्य की बात यह है कि इस तरह का जो चित्त है, उसका द्वार सदा ही परम शक्ति को पाने के लिए खुला रहेगा।
जो श्रद्धावान नहीं है, उसका मन बंद है। श्रद्धावान व्यक्ति वह है, जिसके द्वार-दरवाजे खुले हैं। श्रद्धा का अर्थ है, मुझसे भी विराट शक्ति मेरे चारों तरफ मौजूद है, मैं उसके सहारे के लिए निरंतर निवेदन कर रहा हूं।मैं अकेला काफी नहीं हूं क्योंकि मैं जन्मा नहीं था, तब भी वह विराट शक्ति मौजूद थी।
और आज भी मेरे हृदय की धड़कन मेरे द्वारा नहीं चलती, उसके ही द्वारा चलती है। आज भी मेरा खून मैं नहीं बहाता, वही बहाता है। और आज भी मेरी श्वास मैं नहीं लेता, वही लेता है। और कल जब मौत आएगी, तो मैं कुछ न कर सकूंगा। शायद वही मुझे अपने में वापस बुला लेगा।
तो जो मुझे जन्म देता है, जो मुझे जीवन देता है।जो मुझे मृत्यु में भी ले जाता है, जिसके हाथ में सारा खेल है, मैं अकड़कर यह कहूं कि मैं ही चल लूंगा, मैं ही सत्य तक पहुंच जाऊंगा, तो थोड़ी-सी भूल होगी। व्यर्थ ही द्वार बंद हो जाएंगे। सहयोग से विराट शक्ति मिल सकती थी , वह न मिल पाएगी।
इसलिए योग की इतनी लंबी चर्चा के बाद अंतिम सूत्र में श्रीकृष्ण श्रद्धा की बात कहते हैं। योग का तो अर्थ है, मैं कुछ करूंगा। श्रद्धा का अर्थ है -मुझसे अकेले से न होगा। योग विधि, साधना के द्वारा मुझे ही करना है, में करूंगा और श्रद्धा का अर्थ है जरूर करूंगा ; लेकिन मैं काफी नहीं हूं।
तेरी भी जरूरत पड़ती रहेगी। और जहां मैं कमजोर पड़ जाऊं, तेरी शक्ति मुझे मिले। और आश्चर्य की बात यह है कि जो इस भाव से चलता है, उसे इशारे मिलते हैं, सहारे मिलते हैं; उसे बल भी मिलता है। उसे शक्ति भी मिलती है। और जो इस भरोसे नहीं चलता, उसे भी इशारा मिलता है।
सहारा ,शक्ति मिलती है, लेकिन उसके द्वार बंद हैं, इसलिए वह नहीं देख पाता और शक्ति दरवाजे से ही वापस लौट जाती है। परमात्मा तो सभी को सहायता देता है। लेकिन जो श्रद्धा करते हैं, वे उस सहायता को ले पाते हैं। और जो श्रद्धा नहीं करते, वे नहीं ले पाते हैं।
श्रद्धा का अर्थ है, यह भरोसा, अथार्त मैं इस सागर में एक बूंद से ज्यादा नहीं हूं। इस अस्तित्व में एक छोटा-सा कण हूं। योग तो कहता है कि तू अपनी हस्ती को इकट्ठा कर और श्रम कर। और श्रद्धा कहती है, अपनी हस्ती को पूरा मत मान लेना। नाव को किनारे से खोलना जरूर।
लेकिन तेरी नाव को तो हवाएं ही ले जाएंगी। ऐसी श्रद्धा बनी रहती है, तो एक छोटा-सा दीया भी सूरज की शक्ति का मालिक हो जाता है ;एक छोटा-सा अणु भी परम ब्रह्मांड की शक्ति के साथ एक हो जाता है। इस लिए योग की इतनी चर्चा करने के बाद भी श्रीकृष्ण ने कहा ।
कि जो मुझमें श्रद्धायुक्त है, उसे मैं परम श्रेष्ठ कहता हूं।श्री कृष्ण कह रहे ,हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थ्ति हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थ्ति है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान।
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूं और अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं। मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अश्निरूप होकर प्राण और अपान मे स्थ्ति हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं।
और मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामीरूय से स्थित हूं तथा मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन अर्थात संशय विसर्जन होता सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं''। श्री कृष्ण के ये सारे सूत्र अर्जुन का समर्पण संभव हो सके।
इसके लिए हैं। श्री कृष्ण की ये सारी बातें उस एक केंद्र की ओर इशारा कर रही हैं , जो सबका आधार है। और अगर वह आधार हमें दिखाई पड़ने लगे, तो हम उस आधार की शरण सहज ही जा सकेंगे। अगर हमारी बुद्धि को उसकी झलक भी मिलने लगे, तो हम अपने होने का आग्रह, और अहंकार की छंटनी शुरू हो जाए।
तो श्री कृष्ण जब बार -बार यह कहते है। और आपको अगर ऐसा लगे कि श्री कृष्ण अहंकारी हैं,अपने 'मैं' पर जोर देते हैं, तो समझना कि यह चोट आपके अहंकार को लग रही है। अर्जुन ने तो कहीं भी यह सवाल नहीं उठाया कि आप इतने अहंकार की बातें क्यों कर रहे हैं।
यह भी जरा आश्चर्यजनक है क्योंकि अर्जुन बुद्धिमान,सुशिक्षित, सुसंस्कारी है। उस समय के प्रतिभावान व्यक्तियों में से एक है। और श्रीकृष्ण जिसके सारथी बनने को राजी हो गए हैं, वह कोई साधारण या गंवार नहीं है। श्री कृष्ण के जोर का कारण समझना होगा ।
क्योंकि उनका जोर स्वयं पर नहीं है; बल्कि अर्जुन पर है। श्रीकृष्ण की यह सारी चेष्टा इसीलिए है कि अर्जुन देख पाए कि उसके भीतर जो मैं की आवाज है, वह व्यर्थ है; और वह संपूर्ण के केंद्र पर समर्पित हो जाए। श्री कृष्ण अर्जुन से कह सके, क्योंकि अर्जुन का सतत प्रेम श्रीकृष्ण के प्रति है।
और जहां प्रेम हो, वहां हम समझ पाते हैं कि यह जो कहा जा रहा है इसमें कोई अहंकार नहीं है। तो अर्जुन को पूरे समय यह लगा है कि श्रीकृष्ण अपने 'मैं' को बड़ा कर रहे हैं ताकि मेरा 'मैं'उस बड़े मैं में खो जाए। वे अपने 'मैं' के विराट रूप को मुझे दे रहे ताकि मैं एक बूंद की तरह उस सागर में खो जाऊं।
यह सिर्फ एक उपाय है कि अर्जुन मिटने को राजी हो सके। प्रत्येक गुरु अपने शिष्य को यह सहारा देगा ही। जिस दिन शिष्य मिट जाएगा, उस दिन गुरु हंसकर उससे भी कह देगा कि तुम भी नहीं हो, मैं भी नहीं हूं। ज्ञानी सदा जानते हैं कि वे कुछ भी नहीं हैं।
लेकिन अज्ञानियों से बात करना जोखम का काम है। श्रीकृष्ण इतने जोर से कह रहे हैं कि 'मैं' यह हूं ताकि अर्जुन को प्रतीति होने लगे कि वह कुछ भी नहीं है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा कि दीवाल पर एक लकीर खींच दो और किसी को कहो कि इसे बिना छुए छोटा कर दो।
वे नहीं कर पाएगे। लेकिन एक बड़ी लकीर उसके पास खींचों ; वह छोटी हो जायेगी। श्रीकृष्ण इतना ही कर रहे हैं कि अर्जुन की लकीर के पास एक बहुत बड़ी लकीर खींच रहे हैं । अर्जुन का 'मैं' है, एक छोटा सा टिमटिमाता दीया; और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, सूर्यों का सूर्य मैं हूं।
वास्तव में,अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति इतना प्रेम है कि वह देख सकता है।अगर अर्जुन भाव से देख ले, तो श्रीकृष्ण के भीतर का सूरज दिखेगा। तब वह अपने टिमटिमाते दीए को छोड़ देगा। टिमटिमाता दीया छूट जाए तो अपने भीतर का सूरज भी दिखेगा।
लेकिन अपने ही भीतर के सूरज को देखना अति कठिन है। क्योंकि अपनी नजर तो अपने दीए पर ही लगी है। इस दीए का बुझना जरूरी है।
क्रमशः
10/06/2024, 9:06 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग.....6
श्रीकृष्ण इतना ही कर रहे हैं कि अर्जुन की लकीर के पास एक बहुत बड़ी लकीर खींच रहे हैं ,श्रीकृष्ण की लकीर। अर्जुन का 'मैं' है, एक छोटा सा टिमटिमाता दीया; और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, सूर्यों का सूर्य मैं हूं। वास्तव में,अर्जुन का श्रीकृष्ण के प्रति इतना प्रेम है।
कि वह देख सकता है। अगर अर्जुन भाव से देख ले, तो श्रीकृष्ण के भीतर का सूरज दिखेगा। तब वह अपने टिमटिमाते दीए को छोड़ देगा।टिमटिमाता दीया छूट जाए तो अपने भीतर का सूरज भी दिखेगा। लेकिन अपने ही भीतर के सूरज को देखना अति कठिन है।
क्योंकि अपनी नजर तो अपने दीए पर ही लगी है। इस दीए का बुझना जरूरी है। यह गुरु के सहारे ही बुझ सकता है और एक बार बुझ जाए, तो गुरु के सूर्य को देखने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि अपना सूर्य भी दिखाई पड़ने लगेगा। हमारी हालत ऐसी है कि सूर्य निकला है ।
लेकिन हम दीए से आविष्ट होकर ,उस पर आंख गड़ाए बैठे हैं। इतने जन्मों से आंख गड़ाए हैं कि सम्मोहित हो गए हैं। वह दीया ही दिखाई पड़ता है और दीया देखते देखते आंखें भी इतनी छोटी हो गई हैं । कि अगर एक बार सूर्य की तरफ देखें, तो अंधेरा ही दिखाई पड़ेगा।
यह श्रीकृष्ण का सहारा है कि आहिस्ता से अर्जुन को उसके दीए से हटा लें। और एक बार वह श्रीकृष्ण का सूर्य देख ले। तो वह केवल श्रीकृष्ण का सूर्य नहीं है, बल्कि वह सभी का सूर्य है.. सभी के भीतर बैठा है।'और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थित हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है।
तथा जो तेज चंद्रमा में स्थित है। और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान। और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण किए हूं और रस -स्वरूप अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को पुष्ट करता हूं।''
यहाँ सोम दो अर्थ रखता है। एक तो सोम का अर्थ है, चंद्रमा। रस विज्ञान के अनुसार औषधियों को पुष्टि चंद्रमा से मिलती है। सूर्य के बिना औषधियां, वनस्पतिया, वृक्ष बड़े नहीं होंगे क्योंकि सूरज उन्हें प्राण देता है। लेकिन उनमें जो जीवनदायी तत्व है,रस है या शांति है,वह उन्हें, चंद्रमा से मिलता है।
इसलिए जितनी शांत औषधियां हैं, उन सबमें चंद्रमा छिपा है। इसी कारण सोम का दूसरा अर्थ भी है । उसे हम सोमरस कहते थे। ये औषधियां व्यक्ति में क्रांतिकारी फर्क ले आती हैं क्योंकि वेद में जो सोम का वर्णन है कि ऋषि सोम को पी लेते हैं और समाधिस्थ हो जाते हैं।
और परमात्मा के आमने -सामने उनकी चर्चा और बातचीत होने लगती है। इस लोक से रूपांतरित हो जाते हैं; किसी और आयाम में प्रविष्ट हो जाते हैं । वैज्ञानिक बड़ी खोज में लगे हैं । कि वेदों ने जिसको सोमरस कहा है, वह क्या है। कितने दावे किए गए हैं कि यह वनस्पति सोमरस होनी चाहिए।
कुछ लक्षण मिलते हैं, पूरे लक्षण किसी वनस्पति से नहीं मिलते। संभावना इस बात की है कि वह वनस्पति पृथ्वी से खो गई। सोम की खोज के लिए बड़े ग्रंथ लिखे जाते हैं, बड़ी शोध की जाती है क्योंकि वनस्पति , औषधि या रसायन के द्वारा समाधि कैसे प्राप्त की जाए।
इस संबंध में बड़ा प्रयास किया जा रहा है। हो सकता है, सोम इस तरह का रासायनिक रस रहा हो कि समाज को उसे विलुप्त कर देना पड़ा हो। क्योंकि समाज में अगर लोग बहुत आनंदित हो जाएं। और तल्लीन रहने लगें, तो समाज नहीं चल सकता है। समाज के लिए थोड़े दुखी, परेशान लोग चाहिए।
अगर सभी लोग प्रसन्न हों, तो बहुत मुश्किल काम है। निश्चित ही उसको छिपाया गया होगा या नष्ट कर दिया गया होगा। इसलिए बहुत खोज करके भी हिमालय में सोम वनस्पति उपलब्ध नहीं होती। सभी वनस्पतियों में चांद उतरता है लेकिन सोम अदभुत रस है।
सोम नाम की जो वनस्पति है, उसमें चंद्रमा की पूरी शांति होती है। उसके पत्ते -पत्ते में, फूल में, जड़ों में चंद्रमा छिप जाता है। और उसका अगर विधिवत उपयोग किया जाए, तो समाधि फलित होती है। लेकिन श्रीकृष्ण यहां कह रहे हैं कि मैं वही सोम हूं।
चांद भी मैं हूं, सूरज भी मैं हूं। इस जगत में जो तेज है, वह भी मेरा है, और इस जगत में जो शांति है, सन्नाटा है, वह भी मेरा है। इस जगत में जो तरंगें हैं, वे भी मेरी हैं। इस जगत में जो शांत समाधिस्थ व्यक्तित्व है, वह मैं हूं। मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त हुआ अन्न को पचाता हूं।
और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं। शरीर को तो हम जानते है, देखते है। तो जिसे हम जानते और देखते है -वह अलग हो गया ,संसार का हिस्सा हो गया। भीतर आंख बंद करते है तो अपने हृदय की धड़कन भी हम सुनते है।
तो यह हृदय की धड़कन भी हमारी न रही; यंत्रवत हो गई, शरीर की हो गई।आंख बंद करते है तो विचारों की बदलियां घूमती हैं। उनको भी हम देखते है कि यह विचार जा रहा है, यह अच्छा हैं या बुरा । इन विचारों के पार 'मैं' देखने वाला हो गया।
समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं इतनी ही चेष्टा करती हैं कि तुम्हें यह समझ में आना शुरू हो जाए कि तुम क्या -क्या नहीं हो। नेति -नेति;अथार्त यह भी मैं नहीं, यह भी मैं नहीं। जो भी दिखाई पड़ जाए, ज्ञेय /आब्जेक्ट बन जाए, उसे छोड़ते जाओ।
और उस जगह ही रुको, जहाँ सिर्फ जानने वाला ही रह जाए। वही अंतर्यामी है जो भीतर छिपा और सब जानता है।और किसी के द्वारा कभी जाना नहीं जाता। क्योंकि उसके पीछे जाने का कोई उपाय नहीं है। वह सबसे पीछे है। वह मूल है। अगर हम अपने भीतर के अंतर्यामी को पकड़ लें, वही हम हैं।
अगर उसमें हम खडे हो जाएं और ठहर जाएं, तो हम श्रीकृष्ण में खड़े हो गए। और तब हम भी कह सकेंगे कि यह सूरज मेरी ही रोशनी है, और यह चांद मुझसे ही चमकता है,औषधियां मुझसे ही बड़ी होती हैं। और इस जगत में जो सोम बरस रहा है, वह मैं ही हूं।
अंतर्यामी को आप पकड़ लें, तो यही घोषणा जो श्रीकृष्ण की है, आपकी घोषणा हो जाएगी। और तभी आप समझ पाएंगे । कि श्रीकृष्ण यह घोषणा अहंकार के कारण नहीं बल्कि एक आंतरिक अनुभव के कारण कर रहे हैं कि''मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामीरूप से स्थित हूं ।
तथा मेरे से ही स्मृति, जान और अपोहन, संशय -विसर्जन होता है।और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं तथा वेदात का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं''। तीन शब्दों का श्रीकृष्ण ने उपयोग किया है ... स्मृति, ज्ञान और अपोहन। अपोहन का अर्थ है, संशय का विसर्जन।
अपोहन शब्द याद रखने जैसा है। आपके भीतर सदा ऊहापोह चलता है। ऊहापोह का मतलब है, यह ठीक कि वह ठीक! यह भी ठीक, वह भी ठीक! कुछ समझ नहीं पड़ता कि क्या ठीक। संशय में मन घड़ी के पेंडुलम की तरह, बाएं -दाएं डोलता रहता है ; कहीं ठहरता नहीं।
यह ऊहापोह की अवस्था है। अपोहन का अर्थ है, इससे विपरीत अवस्था। जहाँ कोई ऊहापोह नहीं, जहा संशय चला गया। जहाँ आप असंशय खड़े हो गए। जहाँ चित्त स्थिर है चुनाव न रहा कि यहां जाऊं कि वहाँ जाऊं , वह अपोहन है। श्रीकृष्ण कहते हैं, स्मृति मैं हूं।
स्मृति से इस बात का प्रयोजन है कि मैं कौन हूं। यादाश्त नही ,आत्मबोध, कि मैं कौन हूं! आप mba हैं, यह आत्म बोध नहीं है। क्योंकि MBA होना स्त्री होना, कि पुरुष होना,सांयोगिक है; कोई आपका स्वभाव नहीं है। लेकिन हम उसको भी स्वभाव की तरह पकड़ लेते हैं।
और ऐसा नहीं है आप वह नहीं रहेंगे, तो सब मिट गया क्योंकि कुछ नहीं मिटता। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, आत्मस्मरण /सेल्फ रिमेंबरेंस 'मैं 'हूं। मेरा नाम, मेरा घर, पता, ये सब कुछ मूल्य के नहीं हैं। मेरा न कोई नाम है, और न मेरा कोई घर है, और न मेरा कोई रूप है।
मेरी वह जो अरूप और अनाम स्थिति है, उसी को श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह स्मृति है। स्मृति शब्द बाद में बिगड़ा और संत कबीर के समय में सुरति हो गया। गुरुनानक और संत कबीर कहते हैं, सुरति जगाओ। सुरति का मतलब है,उसको जगाओ , जो आपके भीतर परमात्मा है।
वह जो सब संयोगों के पार है, सब स्थितियों के पार है, सभी स्थितियों से गुजरता है, फिर भी किसी स्थिति के साथ एक नहीं है, सभी अवस्थाओं से गुजरता है। कभी आप बच्चे हैं; कभी जवान हैं; कभी बूढ़ा। लेकिन आपके भीतर कोई है, जो न बच्चा है, न जवान है, न बूढ़ा है; जो तीनों से गुजरता है।
उदाहरण के लिए जैसे तीन स्टेशन हों और आपकी ट्रेन तीनों से गुजर जाए। वह जो यात्री भीतर बैठा है, जो सदा चल रहा है। कहीं भी ठहरता नहीं है, किसी भी अवस्था के साथ एक नहीं हो जाता है; सदा अवस्था मुक्त है, उस स्मृति को श्रीकृष्ण कहते , 'मैं हूं'। तीन शब्दों में श्रीकृष्ण ज्ञान भी कह रहे हैं।
यहां ज्ञान से अर्थ नालेज का नहीं है। विश्वविद्यालय ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण उस ज्ञान की बात नहीं कर रहे हैं। शिक्षक ज्ञान देते हैं और ज्ञान को स्मृति इकट्ठी कर लेती है। आपके पास संग्रह हो जाता है , बड़ी सूचनाएं इकट्ठी हो जाती हैं। ज्ञान से अर्थ है... प्रज्ञा। यह बड़ी अलग बात है।
क्योंकि यह हो सकता है, आप कुछ न जानते हों और ज्ञानी हों। और यह भी हो सकता है, बहुत कुछ जानते हों और निपट अज्ञानी हों। आपके जानने से कोई संबंध नहीं है। व्यक्ति बहुत कुछ जान सकता है। सब शास्त्र कंठस्थ हो सकते हैं, और फिर भी जीवन में जो व्यवहार करे, वहां अज्ञानी सिद्ध हो।
आपको वेद कंठस्थ हों और गीता आपकी जबान पर बैठी हो; और आपको मालूम है कि न तो शस्त्रों से छिदता हूं, न अग्नि मुझे जला सकती है। और जरा सा दुख आ जाए और आप ...चिलाये। वहाँ पता चलता है कि यह प्रज्ञा है या नहीं। प्रज्ञा आपके अनुभव में काम आती है।
ज्ञान केवल बुद्धि की बातचीत है और बुद्धि की बातचीत तो हम कुछ भी इकट्ठी कर ले सकते हैं। यहां श्रीकृष्ण जो ज्ञान कह रहे हैं। उसका प्रज्ञा से संबंध है। स्मृति, ज्ञान और अपोहन, ये ही सब वेदों द्वारा जानने योग्य तीन बातें हैं। सारा वेदांत इन्हीं तीन की खोज करता है।
और न केवल सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं । वरन वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं। सारे वेद मुझे ही खोजते हैं और सारे वेद मेरे ही अनुभव से निकलते हैं। वास्तव में,सारे वेदों की खोज है कि वह अंतर्यामी मिल जाए।
वह जो भीतर छिपा हुआ राजों का राज है, वह मिल जाए। लेकिन वेद निकलते कहां से हैं? जिनको वह मिल जाता है, उनकी वाणी वेद बन जाती है। जो उसे पा लेते हैं, उनकी सुगंध वेद बन ‘जाती है। जो वहां उस अंतर्यामी तक तक पहुंच जाते हैं , फिर वे जो भी कहते हैं, वही वेद बन जाता है।
वे न कहें, तो मौन उनका वेद हो जाएगा। वे चलें -फिरें, उठें, तो उनकी गतिविधि वेद हो जाएगी। अगर श्रीकृष्ण को बांसुरी बजाते हुए देख लो, तो उस बांसुरी में वेद है; उसमें सारा वेदांत है, उसमें सारा इशारा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही सबकी खोज, और मैं ही सब का मूल हूं।
और यह जो 'मैं' है, तुम्हारे भीतर छिपा हुआ अंतर्यामी है। श्रीकृष्ण बाहर से बोल रहे हैं, लेकिन जिसकी तरफ इशारा कर रहे हैं, वह अर्जुन के भीतर है। गुरु सदा बाहर से बोलता है।
लेकिन जिस तरफ इशारा करता है, वह शिष्य के भीतर है। इसलिए यात्रा के दो पड़ाव हैं । एक तो बाहर का गुरु, वह पहला पड़ाव है और फिर भीतर का गुरु, वह अंतिम पड़ाव है।
क्रमशः
11/06/2024, 6:58 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग....7
श्रीकृष्ण कहते हैं,"यह जो आठ अंगों वाली प्रकृति है, यह अपरा है। अपरा का अर्थ होता है, निम्न, नीचे की, इस पार की। और इन आठ के पार मेरी वह प्रकृति है, जो परा है,उस पार की। ये आठ विभाजन इस किनारे के हैं। और एक मैं हूं, उस पार, इन सबसे दूर और ऊपर उठकर–परा।
इन सबके पार, उस चैतन्य को, उस चेतना को, जो इन सबके पार है, तू इन सबको धारण करने वाली समझ। वह जो पार है, क्या है? वास्तव में,वह परा ही सबको धारण करने वाली है ;वही सबको संभाले है। यह इतना विराट विस्तार उस परा की ही छाती पर है। परा अथार्त उस पार की चेतना।
वह पार की चेतना क्या है? और हमारे भीतर उस पार की चेतना की तरफ जाने वाला द्वार कहां है? स्वयं के भीतर वह परा, वह बियांड कहां शुरू होता समस्त योग का सार, उस परा को पहचानने की प्रक्रिया, टेक्नीक है। शरीर में नहीं, क्योंकि शरीर पदार्थ है।
मन में नहीं, क्योंकि मन भी बाहर से संगृहीत विचारों का जोड़ है। बुद्धि में नहीं, क्योंकि बुद्धि भी सूक्ष्मतम अग्नि का रूप है। अहंकार में नहीं, क्योंकि अहंकार भी स्वनिर्मित धारणा है। फिर कहां है वह द्वार, वह सेतु? जहां से सबको धारण करने वाली चेतना का साक्षात और मिलन है?
वह है इन सबके साक्षित्व में। शरीर मैं नहीं हूं, यह हम शरीर के साक्षी होकर जान सकते हैं। फिर हम विचारों के भी साक्षी हो सकते हैं। आप भीतर देख सकते हैं कि यह क्रोध चल रहा है। आप भीतर देख सकते हैं, यह लोभ सरक रहा है। आप भीतर देख सकते हैं कि यह काम यात्रा कर रहा है।
विचार को आप वैसे ही,देख सकते हैं जैसे अपने भीतर के पर्दे पर आप फिल्म को देखते हैं। उसके भी आप साक्षी हो सकते हैं। तो फिर आप उससे भी अलग हो गए। कठिनाई थोड़ी-सी पड़ेगी 'मैं 'को देखने में, क्योंकि वह सूक्ष्मतम है और हम उससे आइडेंटिफाइड हैं।
कोई आदमी आपको गाली देता है, तब जरा भीतर गौर से देखना कि कोई सांप फन उठाता है, जैसे फुफकारता हो, जैसे सोए सांप को चोट मार दी हो, कोई आपके भीतर उठकर खड़ा हो जाता है। जरा उसे गौर से देखना। जब आप सुंदर कपड़े पहनकर निकलते हैं ।
सड़क पर, तब आप वही नहीं होते, जब आप दीन-हीन कपड़े पहनकर निकलते हैं। भीतर थोड़ा-सा फर्क होता है। वह जो भीतर 'मैं' है, उसको जरा जागकर खोजते रहेंगे। कि वह कहां-कहां खड़ा होता है, तो जल्दी आपकी उससे मुलाकात होने लगेगी; जगह-जगह मुलाकात होगी।
आईने के सामने खड़े होंगे, तो शक्ल कम दिखाई पड़ेगी, अहंकार ज्यादा दिखाई पड़ेगा। किसी से हाथ मिलाएंगे, तो आप कम मिलते हुए मालूम पड़ेंगे, अहंकार ज्यादा मिलता हुआ मालूम पड़ेगा। किसी से बात करेंगे, तो आप संवाद करते हुए देखे अहंकार भीतर खड़ा हुआ मालूम पड़ेगा।
थोड़ा होश का प्रयोग करें, तो धीरे-धीरे आपके और आपके अहंकार के बीच एक फासला पैदा हो जाएगा। और आप देख पाएंगे, यह अहंकार है; यह रहा अहंकार और जिस दिन आप अहंकार को देख पाये उसी दिन आप प्रकृति से छलांग लगाकर उस भीतर की परा प्रकृति में पहुंच जाएंगे।
जिसे श्रीकृष्ण कहते हैं, ''मेरा स्वरूप,मेरी चेतना'। और उसी चेतना ने सब धारण किया हुआ है। तब आप पाएंगे कि आपके शरीर, आपकी बुद्धि को भी उसी ने धारण किया हुआ है। तब आप पाएंगे कि आप कभी भीतर गए ही नहीं। उसको कभी आपने देखा ही नहीं, जो प्राणों का प्राण है।
जो सारी परिधि का केंद्र है। आपने कभी मालिक को देखा ही नहीं; आप नौकरों से ही उलझे रहे। और अनेक बार आपने नौकरों को ही समझ लिया कि यह मैं हूं। आप मालिक तक कभी पहुंचे नहीं। श्रीकृष्ण अर्जुन को उस मालिक की तरफ ले जाने की एक-एक कदम कोशिश कर रहे हैं।
कहते हैं, ''यह है आठ की प्रकृति अर्जुन। तू इसे ठीक से समझ ले। और फिर इसके पार होने के लिए मैं उस बात की तुझे खबर दूं, जो परा है, वह जो चैतन्य है, पीछे सबसे छिपा, जो सबका निर्माता, जो सबका आधार और जो सबको फिर अपने में आत्मसात कर लेता है''।
इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि ''मैं तो छिपा हूं इस सब क्षुद्र में भी, लेकिन तू मुझसे शुरू कर। सत्व, रज, तम तीनों से ही जो मोहित हैं, वे मेरे तत्व को न जान पाएंगे। क्योंकि मैं बियांड हूं, मैं पार हूं तीनों के''। बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है। इसको समझना पड़ेगा।
गुणों के कार्यरूप सात्विक, राजस और तामस, इन तीनों प्रकार के भावों से यह सब संसार मोहित हो रहा है। इसलिए इन तीनों गुणों से परे 'अविनाशी' को तत्व से कोइ भी नहीं जानता। प्रकृति के मोह में सारे ही लोग हैं। मोह के कारण अलग-अलग होंगे, अलग-अलग बहाने होंगे।
लेकिन मोह का परिणाम एक ही होता है। हमें लगता है, चोर नहीं जान पाएगा, बेईमान नहीं जान पाएगा; लेकिन सज्जन तो जान लेगा। सज्जन तो सत्व से मोहित है। हम कहते हैं, वह आदमी नहीं जान पाएगा, जो सिर्फ धन कमा रहा है।
वह तो जान लेगा, जो जाकर मरीजों की सेवा कर रहा है! हम कहते हैं, वह आदमी भला न जान पाए, जो आदमी सिर्फ राजनीति कर रहा है। लेकिन वह तो जान लेगा, जो दीन-दुखियों के पैर दबा रहा है। श्रीकृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों ही मोहित है।
वह जो बुरा दिखाई पड़ता है, वह तो मोहित है ही। वह जो भला दिखाई पड़ता है, वह भी मेरी ही प्रकृति के सत्व गुण से मोहित है। यह जानना थोड़ा कठिन और जटिल है। उदाहरण के लिए आप अपनी दुकान पर बैठे हैं, और अगर ग्राहक न आए, तो आप दुखी होते हैं।
लेकिन आपको पता है कि किसी सेवक को अगर कोई सेवा करवाने वाला न मिले। तो आपसे कम दुखी नहीं होता। अंतर क्या हुआ? माना कि वह काम अच्छा कर रहा था, लेकिन परिणाम तो एक ही है। अगर समाज इतना सुखद, इतना मंगल को उपलब्ध हो जाए ।
कि किसी व्यक्ति को समाज में, समाज-सुधार के काम करने का मौका न मिले, तो आप जानते हैं, समाज सुधारकों की कैसी हालत हो जाए! बड़ी मुश्किल में बड़ी बेचैनी में पड़ जाएं। वह बेचैनी ठीक वैसी ही होगी, जैसे अचानक धंधा डूब जाए; ग्राहक न आएं।
फैशन बदल जाए; आपकी दुकान की चीजें बिकनी बंद हो जाएं। वह पीड़ा उतनी ही होगी। सत्व /एयर एलिमेंट भी, अच्छा काम भी बिना परमात्मा को समर्पित हुए सिर्फ एक मोह है,और उससे अहंकार ही निर्मित होता है। जिन को हम सात्विक लोग कहते हैं।
वे भी अपनी अस्मिता को मजबूत करने में लगे रहते हैं। परमात्मा के अतिरिक्त वह जो पार है, वह जो परा है प्रकृति के ऊपर, उसके अति रिक्त–सभी सम्मोहन है। सभी मोह के आधार बन जाते हैं। सभी मन को पकड़ लेते हैं, अन्यथा, श्रीकृष्ण को अर्जुन से यह कहने की जरूरत क्या है कि अर्जुन सत्व से मोहित हो रहा है।
क्रमशः
12/06/2024, 9:30 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग......8
परमात्मा के अतिरिक्त–वह जो पार है, वह जो परा है प्रकृति के ऊपर, उसके अतिरिक्त– सभी सम्मोहन है। सभी मोह के आधार बन जाते हैं; सभी मन को पकड़ लेते और मन सभी को मूर्च्छित कर देता हैं। अन्यथा,श्रीकृष्ण को अर्जुन से कहने की जरूरत क्या है कि अर्जुन सत्व से मोहित हो रहा है।
उदाहरण के लिए एक सुबह गौतम बुद्ध के पास एक आदमी आया और बुद्ध के चरणों में सिर रखकर उसने कहा। मुझे कुछ बताएं कि मैं दुनिया का कल्याण कर सकूं''। गौतम बुद्ध ने उसकी तरफ देखा और कहा कि ''तू अपना ही कर ले, तो काफी है।
तू दुनिया को क्यों मुसीबत में डालना चाहता ,तेरा कल्याण हो चुका? उसने कहा कि मैं कोई स्वार्थी आदमी नहीं हूं। मुझे मेरी फिक्र ही नहीं है; मुझे तो दुनिया की फिक्र है। गौतम बुद्ध ने कहा, ''जिसका खुद का दीया बुझा हो, वह किसके दीए जला सकेगा''।
मगर वह आदमी कह रहा है,कि मैं स्वार्थी नहीं हूं, मुझे दुनिया की फिक्र है। लेकिन यह आदमी अगर कल्याण करने जाए, तो किसी के जले दीए और बुझा देगा। इससे कल्याण हो नहीं सकता। परमात्मा के सिवाय कल्याण हो नहीं सकता। आदमी कैसे कल्याण करेगा?
और वह कहता है कि नहीं, मेरी उत्सुकता मुझमें, अपने आपमें नहीं है। मेरी उत्सुकता तो यह है कि दूसरों का भला कैसे हो।गौतम बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को कहा कि ''देखो, यह एक पवित्र अहंकारी है। इसको यह भी अहंकार है कि यह स्वार्थी नहीं है''।
तो गौतम बुद्ध ने कहा, ''पहले तू अपना स्वार्थ तो साध ले। तू पहले स्वयं को तो जान ले''। उसने कहा कि इन सब बातों में मुझे मत डालें। दुनिया में बड़ी तकलीफ चल रही है,मुझे सब बदलना है और सब ठीक कर देना है। बुध बोले कि ठीक करने वाले हजारों साल से ठीक कर रहे हैं।
दुनिया की तकलीफ बढ़ती जाती है। कम नहीं होती। अब तो ऐसा लगने लगा है कि किसी तरह समाज का समाज-सुधारकों से छुटकारा हो जाए, तो थोड़ी राहत मिले। असल में दूसरे को बदलने और ठीक करने का भी एक रस है।
दुनिया को ठीक कर देने में भी एक बड़ी मौज है, बड़ा रस है। और हरेक इस खयाल से जीता है कि मैं सारी दुनिया को ठीक कर दूंगा। खुद को ठीक करना बहुत मुश्किल पाकर लोग दुनिया को ठीक करने निकल जाते हैं। खुद से बचने के लिए लोग हजार उपाय खोज लेते हैं।
खुद की बीमारियां दिखाई न पड़ें, खुद की परेशानियां दिखाई न पड़ें, खुद की परेशानियों से पलायन हो जाए, तो दूसरे की परेशानियों में लग जाते,यह भुलाने की तरकीबें हैं; लेकिन सात्विक बातें हैं, इसलिए मजा भी है। चोर को तो आप कह भी दें कि तू बुरा काम कर रहा है, नष्ट कर रहा है अपने को।
साधु को कैसे कहिएगा? वह तो सेवा कर रहा है। वह तो कोई बुरा काम कर नहीं रहा है। वह तो स्कूल खोल रहा है; धर्मशाला बना रहा है; अस्पताल बना रहा है। कोई बुरा काम नहीं कर रहा है। कोढ़ियों की मालिश कर रहा है; कोई बुरा काम नहीं कर रहा है।
लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं, सत्व, रज, तम, तीनों.. चाहे कोई ऐसा कृत्य, जो बुरा हो; और चाहे कोई ऐसा कृत्य, जो भला हो; और भले और बुरे की तरफ दौड़ने की जो प्रवृत्ति है, वे तीनों ही प्रकृति हैं। और अर्जुन, तू ठीक से समझ ले कि जब तक इन तीन से कोई मोहित हुआ जी रहा है।
तब तक वह मुझ पार को, वह जो अतीत है, वह जो अतिक्रमण कर जाता है, उसको उपलब्ध नहीं हो सकेगा। इसका अर्थ यह हैं कि परमात्मा को पाने के लिए बुरे के तो ऊपर उठना ही पड़ता है, भले के भी ऊपर उठ जाना है। परमात्मा को पाने के लिए असदवृत्तियों को तो छोड़ ही देना पड़ता है।
सदवृत्तियों को भी छोड़ देना पड़ता है। असल में उस परम स्वतंत्रता के लिए लोहे का पिंजरा तो छोड़ना ही हैं, सोने की जंजीरें भी तोड़ देनी पड़ती हैं। और ध्यान रहे, लोहे से अक्सर ही सोने की जंजीरें ज्यादा कठिन सिद्ध होती हैं। क्योंकि लोहे की जंजीर को तो तोड़ने का मन भी होता है।
सोने की जंजीर को बचाने का भी मन होता है। सोने की जंजीर आभूषण मालूम पड़ने लगती है। इसलिए बुराई से तो कोई आदमी उठने की तैयारी दिखलाता है। लेकिन भलाई से तो उठने की तैयारी भी नहीं दिखलाता। वेसे तम से सत्व पर आया जाता फिर उसे भी छोड़ दिया जाता।
तो श्रीकृष्ण कहते हैं, तू सत्व की बातों में मत पड़ अर्जुन। तू यह साधुता की बातें मत कर। क्योंकि मुझे पाए बिना कोई भी साधु नहीं है। उसके पहले सिर्फ धोखा है मन का। कुछ लोग बुरे ढंग से अपने को धोखा देते हैं, कुछ लोग भले ढंग से अपने को धोखा देते हैं।
कुछ लोग दूसरों को नुकसान करके अपने को धोखा देते हैं। कुछ लोग दूसरों को लाभ पहुंचाकर अपने को धोखा देते हैं। लेकिन धोखा तब तक जारी रहता है, जब तक कोई प्रकृति के गुणों के ऊपर न उठ जाए। चित्त की ऐसी अवस्था चाहिए न बुरा खींचता हो, न भला खींचता हो।
न बीमारियां आकर्षित करती हों –(क्रोध, काम, लोभ); न तथाकथित सेवा, सदभाव, मंगल, कल्याण। कोई भी आकर्षित न करता हो। और जब दोनों में से कोई भी आकर्षित नहीं करता, तो चित्त ठहर जाता है। नहीं तो दौड़ता रहता है।
कभी बुरे के लिए, कभी भले के लिए; कभी साधु होने के लिए, कभी असाधु होने के लिए; दौड़ जारी रहती है। चित्त तो रुकता ही तब है,जब दोनों से मुक्त हो जाता है। और जब चित्त दोनों से मुक्त होता है, तब एक नए आयाम में यात्रा शुरू होती है।
अंतर्यात्रा या ऊर्ध्वयात्रा शुरू होती है। तब व्यक्ति प्रकृति के ऊपर उठकर परमात्मा को अनुभव कर पाता है।
क्रमशः
14/06/2024, 9:52 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग........9
श्री कृष्ण कहते है कि वास्तव में, साधु और असाधु एक ही दुनिया के रहने वाले लोग हैं। एक के हाथ में लोहे की जंजीरें हैं। एक के हाथ में सोने की जंजीरें हैं। एक बुरे कामों में उलझा है, लेकिन व्यस्त है उसी तरह, दूसरा भले कामों में उलझा है,और व्यस्त है।
लेकिन दोनों की नजरें जमीन पर लगी हैं। दोनों में से कोई आकाश की तरफ नहीं देख रहा इसलिए हमने इस देश में साधु को वह मूल्य नहीं दिया, जो संत को दिया। हमने उसे संत कहा है, जो न भले में उलझा है, न बुरे में। जो उलझा ही नहीं है; जिसने जमीन से नजर ऊपर उठा ली।
जिसने आकाश को देखा है; जिसने परमात्मा को पहचाना है। इसका यह मतलब नहीं है कि परमात्मा को पहचानने के बाद वह साधु नहीं होगा। वह वही साधु होगा ;लेकिन बुनियादी अंतर पड़ जाएंगे। जिसने परमात्मा को नहीं पहचाना,उसकी साधुता,असाधुता के खिलाफ एक सतत संघर्ष होती है।
असाधु भीतर मौजूद रहता है। वह तमस भीतर मौजूद रहता है। सत्व की लड़ाई चलती रहती है। साधु का मतलब है, जिसने क्रोध को भीतर दबाया है; अक्रोधी हुआ। जिसने चोरी को भीतर दबाया; अचोर हुआ। जिसने परिग्रह को दबाकर छोड़ा; अपरिग्रही हुआ।
जिसने अहंकार को दबाया, और विनम्र हुआ लेकिन वे सब भीतर बीमारियां कतार बद्ध मौजूद हैं, और प्रतीक्षा कर रही हैं कि कब विश्राम करिएगा कब थोड़ा-सा अवकाश लेंगे अपने संघर्ष से। इसलिए साधु रात सोने तक में डरते हैं, क्योंकि सोने में विश्राम हो जाता है।
और जिस-जिस को दिन में दबाया है, वह सब सपना बनकर छाती पर घूमने लगता है। इसलिए साधु जरा भी विश्राम लेने में डरते हैं कि कहीं भी जरा विश्राम लिया और वह संघर्ष अगर थोड़ा भी शिथिल हुआ, तो मालूम है उन्हें भलीभांति कि दुश्मन मौजूद है।
सब साधु अपने भीतर असाधु को दबाए हुए हैं। और जब तक असाधु मौजूद है, साधु सिर्फ सतह है। भीतर तो सब उबल रहा है लावे की तरह। ज्वाला मुखी की तरह भीतर आग लगी है। अभी धुआं दिखाई नहीं पड़ रहा; अभी ज्वालामुखी फूटा नहीं।
लेकिन इससे ज्वालामुखी नहीं है, ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं। ज्वाला मुखी भीतर तैयारी कर रहा है। संत हम उसे कहते हैं, जो असाधुता से लड़कर साधु नहीं है , जिसने परमात्मा को देखा, और परमात्मा को देखने से साधु हो गया ;कोई संघर्ष नहीं है।
किसी को दबाया नहीं, किसी से लड़ा नहीं। इसलिए संत विश्राम से नहीं डरेगा। डरने का कोई सवाल ही नहीं है। उसे विपरीत की संभावना ही नहीं है। उसके भीतर से, परमात्मा को देखने से, असाधुता गिर गई। संत वह है, जिसकी असाधुता गिर गई; और साधुता पनपी, प्रकट हुई।
और साधु वह है, जिसने असाधुता को दबाया, अभ्यास किया; साधुता को थोपा, आरोपित किया। साधु की तरह अपने को नियोजित किया, संयमित किया; अपने को तैयार किया। साधु की तरह जिसने अपने ऊपर मेहनत की। इसमें आदमी की मेहनत ज्यादा दूरगामी नहीं हो सकती।
आदमी हमेशा प्रकृति से हार जाएगा। उदाहरण के लिए एक बड़ा वर्तुल खींचें, वह परमात्मा है। उसमें एक छोटा वर्तुल खींचें, वह प्रकृति है। उसमें और एक छोटा-सा वर्तुल खींचें, वह आदमी है।प्रकृति परमात्मा में है, लेकिन परमात्मा प्रकृति में नहीं है।
आदमी प्रकृति में है, लेकिन प्रकृति आदमी में नहीं है। वह आदमी और छोटा वर्तुल है। तो अगर आदमी प्रकृति के खिलाफ लड़ेगा , तो हारेगा। प्रकृति से लड़ नहीं सकता; वह बड़ी है, उससे विराट है। प्रकृति आदमी में है,और भीतर पूरी, गहरे में छिपी है।
आदमी उसका छोटा-सा हिस्सा दबाए हुए है। इसलिए आप रोज प्रकृति से हारते हैं। लेकिन आपको खयाल नहीं आता कि आप अपने से बड़ी शक्ति से लड़ रहे हैं; तो हारेंगे ही। उदाहरण के लिए जब आप क्रोध से हारते हैं, तो आपको पता है, आप किससे लड़ रहे हैं।
आप सोचते हैं कि क्रोध छोटी-मोटी चीज है। लेकिन क्रोध छोटी-मोटी चीज नहीं है; प्रकृति का हिस्सा है। उसकी जड़ें गहरी हैं; आपके खून ,आपकी हड्डियों और आपकी बुद्धि से ज्यादा गहरी। इसलिए आप हजार बार बुद्धि से निश्चित कर लेते हैं ।
कि अब क्रोध नहीं करूंगा, और जब क्रोध आता है, तो पता नहीं बुद्धि कहां जाती है, और क्रोध आ जाता है। क्रोध गहरा है। आप ऊपर-ऊपर निर्णय करते रहते हैं, भीतर प्रकृति आपकी फिक्र नहीं करती। अगर आपने प्रकृति से अपने ही भरोसे जीतने की कोशिश की, तो आप रोज हारेंगे।
कभी-कभी साधु मालूम पड़ेंगे, फिर असाधुता प्रकट हो जाएगी। और फिर - फिर प्रकृति आपको हराती ही रहेगी। अगर प्रकृति को हराना है, तो आदमी के भरोसे नहीं, बड़े वर्तुल, परमात्मा के भरोसे हराया जा सकता है। तब उस बड़े वर्तुल के साथ सहारा लें।
उसके साथ तत्काल जीत हो जाती है। उसके साथ प्रकृति उसी तरह हार जाती , जैसे आपके साथ प्रकृति से आप हार जाते हैं। प्रकृति से आप लड़ेंगे, तो आप हारेंगे। अगर परमात्मा को लड़ाएंगे, तो प्रकृति हारी ही हुई है। कोई सवाल नहीं है, क्योंकि परमात्मा और भी प्रकृति के गहरे में है।
उदाहरण के लिए सागर, सागर पर उठी लहरें,और लहरों पर तैरता हुआ एक तिनका, ऐसा समझ लें। सागर परमात्मा हैं, लहरें प्रकृति, और आप एक छोटे-से तिनके हैं लहरों के ऊपर। आप लहरों से भी नहीं लड़ सकते हैं।लहर से भी हार जाएंगे।
आप कितना ही निर्णय करें कि हम तो लहर के ऊपर रहेंगे; लहर की मर्जी कि कब नीचे गिरा दे। लेकिन सागर का सहारा ले लें, तो फिर लहर कुछ भी नहीं है। क्योंकि सागर के सामने लहर का क्या वश। परमात्मा में निष्ठा का अर्थ, कि प्रकृति से मनुष्य की सीधी लड़ाई असंभव है।
हम परमात्मा में समर्पित होते हैं, समर्पित होते ही लड़ाई समाप्त हो जाती है। परमात्मा को देखते ही प्रकृति शांत हो जाती है।यह करीब-करीब ऐसा ही घटित होता है, जैसे कि स्कूल के क्लास के बच्चे खेल रहे हैं। शोरगुल कर रहे हैं, और शिक्षक भीतर आया, और सब शांति हो गई।
बच्चे अपनी जगह बैठ गए हैं; उन्होंने किताबें खोल लीं; अपना काम करने लगे। अभी शोरगुल था, अब सब शांत हो गया। ठीक ऐसे ही परमात्मा की तरफ आंख उठते ही प्रकृति एकदम शांत हो जाती है। मालिक आ गया। प्रकृति का कोई उपाय नहीं रह जाता।
लेकिन आप तो प्रकृति के एक छोटे-से टुकड़े हैं। तिनके, और प्रकृति से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सात्विक होने की चेष्टा बिना धार्मिक हुए, बिना परमात्मा में समर्पित हुए, प्रकृति से लड़ने की चेष्टा है। इन तीनों के पार है प्रभु। जब आपके चित्त में तीन चीजें।
सत्व न हो, तम न हो, रजस न होन हों, तब आपका चित्त परमात्मा की तरफ उठेगा। इनको थोड़ा-सा समझ लें कि जब ये तीनों न होंगे तो कैसी स्थिति होगी। वह जो शक्ति है, जो करती है, बुरा करने का भाव नहीं, भला करने का भाव नहीं–जब ये दोनों नहीं रहते ;तब वह जो शक्ति है, वह कहां जाए?
और शक्ति तो कहीं जाएगी ही। अगर आप मार्ग न देंगे, तो भी जाएगी। अब न बुरे की तरफ जा सकती है, न भले की तरफ जा सकती है, तो अब कहां जाए? वास्तव में,जब दोनों दिशाएं बंद हो जाती हैं, तो शक्ति ऊपर की तरफ, यात्रा पर उठने लगती है।
और वह यात्रा पर परमात्मा है, जहां न शुभ है, न अशुभ है। जहां दोनों नहीं, जहां द्वंद्व नहीं; जहां अद्वय है, जहां अद्वंद्व है, जहां अद्वैत है। उसकी एक झलक, और सारी प्रकृति शांत हो जाती है। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं कि है अर्जुन ''तू उस झलक को पा ले और फिर तू बात करना साधुता की।
करने की जरूरत न रहेगी; तू साधु ही हो जाएगा। उसकी नजर पड़ी, कि तू बदला; तेरी नजर उस पर पड़ी, कि तू बदला। एक बार उस दर्शन को'' उसे देखने के लिए इन तीन के ऊपर जाना जरूरी है। इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं, ''मैं इन तीनों के पार हूं। इन तीनों तक प्रकृति है, ऐसा तू जानना।
जब तीनों के पार उठे, तब तू मुझे देख, और जान पाएगा। यह अलौकिक अर्थात अति अदभुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है, परंतु जो पुरुष मेरे को ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात संसार से तर जाते हैं''।
बड़ी शक्ति है प्रकृति की, क्योंकि है तो परमात्मा की ही शक्ति ,कठिन है, अलौकिक है, क्योंकि हम उसी शक्ति से निर्मित हैं, हमारा सब कुछ हैं। सिर्फ हमारे भीतर जो परमात्मा है, वह उसे छोड़कर हैं।हमारा शरीर, हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारा सब कुछ प्रकृति से ही निर्मित है।
जब हम मिट्टी से लड़ते हैं, तो हम मिट्टी को ही लड़ा रहे हैं। हम प्रकृति से ही प्रकृति को लड़ा रहे हैं। तो हम न जीत पाएंगे। श्रीकृष्ण कहते हैं,विचित्र है, अदभुत है, अलौकिक है, असाधारण है यह शक्ति। क्योंकि शक्ति तो आखिर परमात्मा की ही है।
माना कि कितनी ही छोटी लहरें हों, फिर भी हैं तो सागर की। यह सोचकर कि लहरें हैं। उनसे जूझ मत जाना। हमें डुबाने को तो वे लहरें भी काफी हैं। क्योंकि लहरों में भी और छोटी लहर हैं। अगर आदमी अपने बलबूते पर लड़े ;सोचता हो कि मैं पार कर ही लूंगा, तो कठिन है।
लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं, कठिन नहीं , संभव भी है, अगर कोई मेरा सहारा ले ले। अगर कोई मुझ पर भरोसा कर सके, , तो बड़ी सरल है। अगर कोई दिन-रात मुझे ही भजे। अगर कोई दिन-रात मुझको ही समर्पित रहे, अगर कोई मेरे ही हाथ में सारी बात छोड़ दे और कहे कि ठीक है।
अब तुम्हीं नाव को खेओ। अब मैं छोड़ता हूं; अब तुम मुझे ले चलो, जहां ले चलना हो। खुद आदमी लड़ने की कोशिश करे, तो लड़ाई बहुत कठिन है; जीतना करीब-करीब असंभव है; हारना ही सुनिश्चित है। लेकिन विराट के साथ हार असंभव है; विराट के साथ जीत सुनिश्चित है।
क्रमशः
15/06/2024, 8:12 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है भाग ...10
श्रीकृष्ण कहते हैं, दिन-रात मुझे ही भजे। क्या मतलब होगा दिन-रात भजने का? वास्तव में, भजना बहुत भाव की दशा है। भजने का अर्थ है, एक अंतःस्मरण। जहां भी, जो भी दिखाई पड़ जाए, उसमें श्रीकृष्ण का ही स्मरण। फूल दिखे, तो पहले फूल का खयाल न आए।
पहले खयाल श्रीकृष्ण का आए। फिर श्रीकृष्ण फूल में खिल जाए; फिर फूल श्रीकृष्णरूप हो जाए। भोजन को बैठें, तो पहले खयाल भोजन का न आए, श्रीकृष्ण का आए। पेट में भूख लगे, तो पहले खयाल यह न आए कि मुझे भूख लगी है; पहले खयाल आ जाए, श्रीकृष्ण को भूख लगी है।
ऐसा रोएं-रोएं में, उठते-बैठते, चलते-सोते; सांझ जब रात बिस्तर पर गिरने लगें। तो ऐसा खयाल न आए कि मैं सोने जा रहा हूं; ऐसा खयाल आए कि मेरे भीतर वह जो श्रीकृष्ण है, अब विश्राम को जाता है। और यह शब्द से नहीं, यह खयाल भाव से आए।
आपके घर में एक बच्चा पैदा ,तो ऐसा न लगे कि बच्चा पैदा हुआ है; ऐसा लगे कि श्रीकृष्ण आए, या परमात्मा आया। कोई भी नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि सभी नाम उसी के हैं, भाव यह हो कि परमात्मा है। सभी स्थितियों में–सुख में, दुख में, विपदा में, संपदा मेंउसका ही स्मरण बना रहे।
सभी कुछ उसको ही समर्पित हो जाए। ऐसा जो दिन-रात भजे कोई, तो विराट से सम्मिलन शुरू हो जाता है। क्योंकि हमारी चेतना उसी तरफ बहने लगती है, जिस तरफ हमारी स्मृति होती,स्मृति चेतना के लिए चैनेलाइजेशन है। जैसे हम नहर बनाते हैं नदी में।
नहर नहीं बनाते, तो नदी बहती है, जहां उसे बहना होता है। नहर बना देते हैं, तो फिर नदी नहर से बहती है। और जहां हमें ले जाना होता है, नदी वहां पहुंच जाती है। जिसे संतों ने स्मरण स्मृति या सुरति कहा है, बुद्ध ने राइट माइंडफुलनेस कहा है,..सम्यक स्मृति।
यह बात भाव में प्रवेश कर जाए । सुबह जब नींद खुले, तो ऐसा न लगे कि मैं जग रहा हूं; ऐसा लगे कि मेरे भीतर परमात्मा जागा। और यह शब्द से नहीं; ऐसा आप सुबह उठकर कहें कि मेरे भीतर परमात्मा जागा। उससे बहुत अर्थ नहीं है।
क्योंकि कहने का मतलब ही यह है कि आपको भाव पैदा नहीं हो रहा है। भाव पैदा हो, तो कहने की जरूरत नहीं है। भाव और शब्द में फर्क है। शब्द धोखा देते हैं। आदमी बार-बार किसी से कहता है, ''मैं बहुत प्रेम करता हूं''। तब वह धोखा देने की कोशिश कर रहा है।
क्योंकि जब प्रेम होता है, तो प्रेम शब्द-शून्य होता है; कहने की भी जरूरत नहीं होती पूरे प्राणों से प्रकट होता है। रोएं- रोएं से प्रकट होता है। मां बच्चे से कह भी नहीं सकती कि मैं तुझे प्रेम करती हूं। कैसे कहेगी! बच्चा भाषा भी नहीं जानता। फिर भी बच्चा पहचानता है।
रोएं-रोएं से, मां के चारों तरफ, प्रेम बहने लगता है। कोई भाषा नहीं है। और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर बच्चे को मां के पास बड़ा न किया जाए, तो फिर वह जिंदगी में किसी को भी प्रेम न कर पाएगा। और मां कभी बच्चे से कहती नहीं कि मैं तुझे प्रेम करती हूं ।
क्योंकि उससे कहने का कोई उपाय नहीं है। लेकिन उसे छाती से लगा लेती है। भाव की कोई धारा दोनों की छातियों के बीच आदान-प्रदान हो जाती है। उसकी आंखों में झांकती है। भाव की कोई धारा एक-दूसरे की आंख से उतर जाती है। उसका हाथ.. हाथ में लेती है।
और भाव की कोई धारा हाथ-हाथ के पार चली जाती है। शब्द नहीं है ;जो अनूठा प्रेम था–शब्दहीन, निःशब्द, मौन; जाना । जिसे, किसी ने कहा नहीं किसी ने दावा नहीं किया था; लेकिन फिर भी बहा था और पहचाना था। यह जो प्रभु-परायण होने की बात है, यही श्रीकृष्ण कहते हैं, मुझे ही जो भजे।
चौबीस घंटे, इसका अर्थ है, जो भाव से मुझमें जीए। उठे-बैठे कहीं भी, भाव से मुझमें रहे। चले-फिरे कहीं भी, भाव से मुझमें रहे। करे कुछ भी, भाव से मुझमें रहे। एक अंतर्धारा भाव की मेरी तरफ बहती रहे, बहती रहे। धीरे-धीरे वह नहर खुद जाती है।
जिससे व्यक्ति और परमात्मा के बीच सेतु बन जाता है। और एक बार वह सेतु निर्मित हो जाए, फिर प्रकृति से ज्यादा निर्बल कोई चीज नहीं है। लेकिन जब तक वह सेतु न बने, प्रकृति महाशक्तिशाली है। हमारी तुलना में प्रकृति बहुत शक्तिशाली है। परमात्मा की तुलना में कोई सवाल ही नहीं उठता।
क्रमशः
16/06/2024, 5:04 am - स्वर विज्ञान: लोग परमात्मा को खोजते है का शेष भाग ।
अगर आदमी अपने पर भरोसा करे, तो अपने को उलझाएगा । और जब से पूरी आदमियत ने अपने पर भरोसा करना शुरू किया है, और जब से ऐसा लगा है कि ईश्वर को बीच में आने की कोई भी जरूरत नहीं है। हम काफी हैं; तब से हमने आदमी की समस्याएं कई गुना गहरी और गहन कर दी हैं।
सुलझाव कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। रोज उलझाव बढ़ता चला जाता ,एक समस्या सुलझाते हैं, तो सुलझाने में पच्चीस नई समस्याएं खड़ी कर लेते हैं। उनको सुलझाने जाते हैं कि और हरेक समस्या से पच्चीस समस्याएं खड़ी होती हैं। सारा मनुष्य एक समस्या हो गया है।
सिर्फ एक समस्या; जिसे कहीं से भी छुओ, और समस्या। जैसे सागर को कहीं से भी चखो, और नमकीन, नमक। ऐसे आदमी को कहीं से भी छुओ, और समस्याएं निकल आती हैं। कुछ भी करो, और समस्याएं। सब तरफ समस्याएं फैल गई हैं।
क्या बात हो गई हैअसल में प्रकृति से लड़कर हम जो कर रहे हैं, उससे यही होना निश्चित था। प्रकृति दुस्तर है, उससे लड़ा नहीं जा सकता। लड़कर हम सिर्फ अपने ऊपर मुसीबत बुला सकते हैं। हां, थोड़ी देर हम अपने को भ्रम में रख सकते हैं कि हम लड़ रहे हैं, और जीत जाएंगे।
हम थोड़ी देर आशाएं बांध सकते हैं। लेकिन सब आशाएं धूल-धूसरित हो जाती हैं; सब मिट्टी में मिल जाती हैं। फिर भी आदमी अजीब है, अब तक उसे खयाल नहीं आया। और हम एक-दूसरे को हिम्मत बढ़ाए चले जाते हैं। पिता बेटे को कहता है, कोई फिक्र नहीं; मैं नहीं जीता, तू जीत जाएगा।
जरा परिस्थितियां ठीक न थीं। शिक्षक विद्यार्थी को कहे जाता है, कोई फिक्र नहीं। हम नहीं जान पाए कि सत्य क्या है, लेकिन तुम जान लोगे, क्योंकि अब ज्ञान और काफी विकसित हो गया है। उदाहरण के लिए एक बूढ़े ऊंट से किसी ने पूछा कि तुम पहाड़ पर जाते वक्त ज्यादा आनंद अनुभव करते हो।
कि पहाड़ से नीचे जाते वक्त? उसने कहा, ये दोनों बातें फिजूल हैं। असली सवाल यह है कि मेरे ऊपर बोझ है या नहीं। ऊपर नीचे का कोई सवाल नहीं है। मेरा दोनों वक्त एक ही काम रहता है। चाहे पहाड़ के नीचे जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं। चाहे पहाड़ के ऊपर जाऊं, तो बोझ ले जाता हूं।
उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सदा बोझ ही ढोता हूं लेकिन हमें फर्क लगता है। कभी हम जब सफलता की तरफ जा रहे होते हैं, तो बोझ हम आसानी से ढोते हैं, क्योंकि हमें लगता है, पहाड़ उतार पर है। जल्दी पहुंच जाते हैं। पर हमें पता नहीं कि पहाड़ के नीचे जाकर करना क्या है?
फिर नया बोझ लादना है, पहाड़ पर चढ़ना है। हर सफलता नई असफलता का बोध देगी। हर सफलता नई सफलता के लिए यात्रा बनेगी। हर सफलता पड़ाव होगी, मंजिल तो नहीं। मगर जब सफल होता है मन, तो हम ज्यादा बोझ ढो लेते हैं।
और जब असफल होता है, तो जरा पीड़ित अनुभव करते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर करते क्या हैं? हम सब एक-दूसरे को कहे चले जाते हैं कि बढ़े जाओ, मंजिल बहुत पास है। बढ़े जाओ, मंजिल बहुत पास है। न हमें कोई मंजिल मिली है; न जिनसे हम कह रहे हैं, उन्हें कोई मिलेगी।
लेकिन चलाए चले जाते हैं। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, ''मुझको परायण को उपलब्ध हो जा, मेरे प्रति समर्पित हो जा। इस दौड़ से बच। ये तीन प्रकृति के गुण और यह प्रकृति का पूरा का पूरा सम्मोहन का जाल, यह मेरी योगमाया है; मेरे सम्मोहन की शक्ति है।
और इस सब में सारा जगत चल रहा है और दौड़ा चला जा रहा है। तू रुक और मेरे स्मरण में लग''। अगर हमें सम्मोहन के बाहर आना है, तो परमात्मा के स्मरण में लग जाए। परमात्मा का सम्मोहन डी-हिप्नोटाइजिंग है। वह सम्मोहन को तोड़ता है।
वह एंटीडोट है। उदाहरण के लिए एक आदमी ने आपको गाली दी है और आपके भीतर क्रोध का धुआं उठा। वह प्रकृति का सम्मोहन है। उसने आपकी बटन दबा दी। बस, अब आपका पंखा भीतर चलने लगा। उस वक्त जरा स्मरण करें, उस ओर भी श्रीकृष्ण हैं, इस ओर भी श्रीकृष्ण हैं।
और तब आप अचानक पाएंगे कि भीतर जो क्रोध उड़ने के लिए पंख फैलाता था। उसने पंख सिकोड़ लिए। परमात्मा का स्मरण -सम्मोहन तोड़क है। और अगर परमात्मा को भूले और अपना ही स्मरण रखा कि मैं ही सब कुछ हूं, तो यह जो 'मैं' है, यह बहुत ही ख़तरनाक है।
और यह सम्मोहन को गहन करता है, मूर्च्छित करता है,और बेहोश करता है। फिर हम दौड़े चले जाते हैं। चारों तरफ यह तीन ,(एयर एलिमेंट ,फायर एलिमेंट, वॉटर एलिमेंट) का खेल चलता रहता है। यह प्रकृति की तीन की लीला चलती रहती है; हम उस ट्राएंगल में दौड़ते रहते हैं।
इससे कब ऊपर उठेंगे? इससे उठने का द्वार कहां है? इससे उठने का द्वार है, प्रभु-स्मरण। ओर ध्यान योग अर्थाथ अंतर्यात्रा। हमारे अस्तित्व में 114 चक्र है जिनमे से दो हमारे शथुल शरीर से बाहर है और बाकी 112 हमारे भीतर है यह सभी मुक्ति के द्वार है।
भगवान शिव ने जो विज्ञान भैरव तँत्र में माँ पार्वती को 112 सूत्र बताये वो सभी द्वार है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कोई एक पकड़ कर यात्रा शुरू की जा सकती किन्तु यह यात्रा बाहर की न होकर अंतर्यात्रा होगी। कोई साधु है या असाधु कुछ होना ही हमे प्रकृति में रखता।
जब हम कुछ नही होंगे तब परमात्मा की ओर कदम बढ़ता हमारा क्योकि वो त्रिगुणातीत है तीनो गुणों से परे। श्री कृष्ण कहते अकर्म करो अर्थात कर्म में कर्ता भाव न रहे न ही फल की इच्छा । जीवन खत्म हो जाये इच्छा शेष रहे तो है मृत्यु ओर जीवन शेष हो और इच्छा समाप्त तो वो है मुक्ति।
18/06/2024, 11:49 pm - स्वर विज्ञान: हमारी पूज्य माता जी अपनी संसारिक यात्रा पूर्ण कर प्रभु चरणों में लीन हो गई है तो हम अपने संसारिक कर्तव्यों के निर्वहन हेतु कुछ समय के लिए अवकाश ले रहे।
प्रभु इच्छा से जल्द आप के बीच आते। 🙏
19/06/2024, 5:05 am - +91 98877 80007: ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे ...🙏
19/06/2024, 7:22 am - +91 99286 78244: ओम् शान्ति: , शान्ति: , शान्ति : ।🙏🙏.
19/06/2024, 7:33 am - +91 90110 36142: ईश्वर से प्रार्थना है वे माताजी की आत्मा को शांती प्रदान करे 🙏🏻 ॐ शांती
19/06/2024, 8:13 am - Jayesh Patel: Om shanti
19/06/2024, 8:28 am - +91 70118 70321: Om Shanti
19/06/2024, 9:27 am - +91 99095 93785: <Media omitted>
19/06/2024, 4:48 pm - +91 97546 39119: ओम् शांति 👣
19/06/2024, 6:02 pm - +91 96381 22288: ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे ...🙏
06/07/2024, 7:31 pm - स्वर विज्ञान: ध्यान क्या है भाग....9
मैं जो बाहर खड़ा हुआ हूं, यह क्या है? वास्तव में, यह भी एक विचार है। पर इससे भी थोड़ा सुख , थोड़ी शांति मिलेगी जो कि मन को सदा मिलती है, जब भी वह अपनी किसी वासना को पूरा कर लेता है। लेकिन वह शांति नहीं, जो कालजयी है;, जिसका कोई नाम नहीं है।
उदाहरण के लिए दीया जलता है, लौ जलती है। लौ पहले तेल को जलाती रहती है। फिर तेल चुक जाता है। फिर लौ बाती को जलाने लगती है। फिर बाती चुक जाती है। फिर लौ खो जाती है। अथार्त लौ पहले तेल जला देती है, फिर बाती को जला देती है, फिर स्वयं को जला लेती है।
विचार को छोड़ दें, फिर स्वयं को भी छोड़ दें। तब कुछ नहीं बचता। तुम अशांत हो और मन तुम्हें धोखा दे रहा है कि तुम शांत हो। तुम्हें कुछ पता नहीं है और तुम कहते हो, मुझे मालूम है कि भीतर आत्मा है। तुम्हें कुछ पता नहीं और तुम कहते हो, यह सारा संसार परमात्मा ने बनाया है।
तुम्हें कुछ भी पता नहीं है और तुम कहते हो कि आत्मा अमर है। मन के इस धोखे में जो पड़ेगा, वह फिर उसे न जान पाएगा जो जानने जैसा है। और उसे न जान पाए, इसलिए मन ये सारे धोखे निर्मित करता है। तो जब तक तुम्हें पता चलता हो कि विचार चल रहा है।
तब तक तुम जानना कि मन ने अपने दो हिस्से किए: एक हिस्सा विचार चलाने वाला, और एक हिस्सा एक विचार का कि मैं विचार नहीं हूं, मैं निर्विचार हूं। यह मन का ही द्वैत है। सच तो यह है कि मन के बाहर द्वैत होता ही नहीं। मन के बाहर अद्वैत हो जाता है।
और अद्वैत का कोई बोध नहीं होता, कि तुम कह सको, ऐसा है। ज्यादा से ज्यादा तुम इतना ही कह सकोगे, ऐसा नहीं है। तब एक निर्विकार भाव अवस्था, एक निर्विकार अस्तित्व, एक मौन-शांत सत्ता, शेष रह जाता है, जहां मैं का भंवर नहीं बनता।
पानी में चक्कर से भंवर बनता है। और भंवर की एक खूबी होती है, आप कुछ भी डाल दो तो वह भंवर उसको फौरन खींच कर घुमाने लगता है। 'मन एक भंवर है। जिसमें आप कुछ भी डालें, वह किसी भी चीज को पकड़ कर घुमाने लगेगा।
इस निर्विचार, निरहंकार स्थिति में कोई भंवर नहीं रह जाता, कोई घूमने की स्थिति नहीं रह जाती। और तब जिसे कैवल्य कहते हैं..घटित होता । कैवल्य का अर्थ है, कुछ भी न बचा, केवल होना ही बचा; कोई उपाधि न रही, कोई विशेषण न रहा; सिर्फ अस्तित्व रह गया। मात्र होना, की हु बस।
जैसे कोई खुले आकाश में झांके--न कोई बादल, न कोई तारे, खाली आकाश रह गया। ऐसा ही जब भीतर रह जाता है, झांकने वाला भी नहीं रह जाता, सिर्फ खालीपन रह जाता है, तब पता चलता है उसका, उस पथ का, जिस पर विचरण संभव नहीं है, उस पथ का, जो अविकारी है।
तब पता चलता है उस सत्य का, जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता, जो कालजयी है, जो कालातीत है, जो सदा एकरस है, जो केवल स्वयं है महा ऋषि कहते है, अंकुशो मार्ग: अथार्त अंकुश ही मार्ग है। बड़े छोटे सूत्रों में बड़ी अमृत सूचनाएं हैं।
इस मन पर जो फैलाव करता , स्वप्नों को जन्माता है, प्रक्षेपण करता है...इस मन को रोकना, इस मन को ठहराना, इस मन को न चलने देना, इस मन को गतिमान न होने देना, इस मन को सक्रिय न होने देना-..इस पर अंकुश ही मार्ग है।
धीरे -धीरे, इस मन को विसर्जित कर देना ही सिद्धि है। उदाहरण के लिए एक शिष्य जब अपने गुरु के पास गया तो उसने कहा, मैं मन को कैसा बनाऊं कि सत्य को जान सकूं? तो गुरु बहुत हंसने लगा। उसने कहा, मन को तू कैसा भी बना, सत्य को तू न जान सकेगा।
तो उसने पूछा कि क्या मैं सत्य को जान ही न सकूंगा? गुरु ने कहा, यह मैंने नहीं कहा। सत्य को तू जान सकेगा, लेकिन कृपा कर मन को छोड़ दे, इस मन पर अंकुश रखना पड़े, इस मन को धीरे—धीरे विसर्जित करना पड़े और वह क्षण लाना पड़े, जहां हम कह सकें, अब कोई मन नहीं।
वास्तव में, जहां मन नहीं, चेतना और सत्य का मिलन हो जाता है। वहीं आनंद है और वहीं नित्य की प्रतीति और अनुभूति है। वास्तव में, मन का न होना ...ध्यान है। तू मन को बनाने की कोशिश मत कर कि ऐसा बनाऊं, अच्छा बनाऊं, बुरा बनाऊं। यह रंग दूं वह रंग दूं।
साधु का बनाऊं, संत का बनाऊं। किसका मन बनाऊं? मन से नहीं होगा, क्योंकि मन कैसा भी होगा, तो प्रक्षेपण करेगा। अच्छा मन अच्छे प्रक्षेपण करेगा, बुरा मन बुरे प्रक्षेपण करेगा। लेकिन प्रक्षेपण जारी रहेगा। मन ही न हो, तो हमारे और जगत के बीच।
हमारे और सत्य के बीच जो -जो जाल है, वह तत्काल गिर जाता। हम वही देख पाते हैं, जो है। ध्यान भी अ-मन अथार्त मन को फेंक देना है, हटा देना है। पहले तो, धीरे -धीरे अंकुश से ही यात्रा शुरू करनी पड़ेगी। उदाहरण के लिए बैठे हैं, धूप पड़ रही है। मन कहेगा, बड़ी तकलीफ हो रही है।
मन को कहें कि तू चुप रह। मुझे जरा धूप को अनुभव करने दे कि क्या हो रहा है। मन कहेगा, धूप में बड़ा आनंद आ रहा है । तो कहना, तू जरा चुप रह, तू बीच में मत आ। धूप और मुझे सीधा मिलने दे। और तब बड़े फर्क पड़ेंगे। तब धूप जैसी है, वैसी ही अनुभव में आएगी।
क्रमशः
07/07/2024, 6:44 am - स्वर विज्ञान: कुछ सदस्यो का आग्रह रहा है की राजयोग के आठ चरण हैं...यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । इस बारे विस्तार से बताए। तो आदरणीय दोस्तो प्रथम तो इन्हे चरण नही आयाम कहना उचित होगा क्योंकि चरण में हम आगे बढ़ते तो पिछला छूट जाता।
प्रथम हम कुछ शब्दों में योग को समझते। योग दर्शन का मूल ग्रंथ है योग सूत्र। यह सात दर्शनों में से एक शास्त्र है । इसकी की रचना पांच हजार साल पहले महाऋषि पतंजलि ने की। योगसूत्र में चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है।
अष्टांग योग : यह आठ आयामों वाला मार्ग है जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है। इस पोस्ट में हम प्रथम आयाम यम बारे के बारे बताने का प्रयास करते और अगले आयामों बारे फिर अगली पोस्ट में भेजेगे।
यम : पांच सामाजिक नैतिकता
1 अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना। सभी प्रकार से ही हिंसा का परित्याग ।
2 सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना। वाणी तथा मन का अर्थ के अनुरूप रहना अर्थात् अर्थ का जैसे स्वरूप है उसी के अनुसार वाणी से कहना तथा मन से वैसा मनन करना ही सत्य है।
3 अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना। दूसरे के धन का अपहरण करना ही स्तेय या चोरी हैं। उस स्तेय का अभाव, दूसरे के धन, सत्त्व का अपहरण न करना ही अस्तेय है।
4 ब्रह्मचर्य - दो अर्थ हैं: चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना। सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना। मुख्यतः उपस्थ इन्द्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं।
5 अपरिग्रह -आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना। भोग के साधनों का स्वीकार न करना,
वास्तव में, यह योग का संपूर्ण विज्ञान है। उदाहरण के लिए हमारे हाथ, पैर, हृदय.. एक दूसरे से अलग नहीं हैं, वे जुड़े हुए हैं। यदि हृदय रुक जाए तो फिर हाथ नहीं चलेगा। वे सीढ़ी के सोपानों की भांति नहीं हैं, क्योंकि सीढ़ी का तो हर डंडा अलग होता है।
यदि एक डंडा टूट जाए तो पूरी सीढ़ी नहीं टूटती। इसलिए महृषि पतंजलि कहते हैं कि वे चरण हैं, क्योंकि उनका एक सुनिश्चित विकास है ;लेकिन यह शरीर के जीवंत अंग हैं। तुम उन में से किसी एक को नहीं छोड़ सकते हो;वे समग्र के साथ संबंधित हैं।
सीढ़ी के सोपान में तुम एक ही छलांग में दो चरण कूद सकते हो, लेकिन अंग नहीं छोड़े जा सकते हैं, तो योग के ये आठ अंग, चरण भी हैं और जीवंत इकाई भी हैं औरएक गहन संबद्धता में जुड़े हुए हैं। पहले को पहला होना है और आठवां , आठवां ही होगा।
पहला अंग 'यम' का अर्थ निषेध , दमन जैसा मालूम पड़ता है। लेकिन महृषि पतंजलि के लिए आत्म संयम का अर्थ स्वयं का, ऊर्जाओं का दमन नहीं बल्कि स्वयं के जीवन को सम्यक दिशा देना है। क्योंकि आप ऐसा जीवन जी सकते है, जो बहुत सी दिशाओं में जाता हो।
तब आप बहुत से रास्तों पर चल सकते हो, लेकिन जब तक तुम्हारे पास दिशा नहीं है, तुम व्यर्थ ही चल रहे हो । तुम कभी भी कहीं नहीं पहुंचोगे। और केवल निराशा अनुभव करोगे। जीवन ऊर्जा सीमित है । जो आपको प्रकृति से, अस्तित्व से, परमात्मा से मिली हैं।
यदि आप उसका उपयोग नासमझी और दिशा हीन ढंग से करते हो, तो तुम कहीं भी नहीं पहुंचोगे। तुम्हारी ऊर्जा चुक जाएगी और वह बिलकुल नकारात्मक खालीपन होगा ..भीतर खोखला..कुछ भी नहीं। तुम मरने के पहले ही मर जाओगे।
ये सीमित ऊर्जाएं इस ढंग से प्रयोग की जा सकती हैं कि वे असीम के लिए द्वार बन सकती हैं। यदि तुम अपनी सारी ऊर्जाओं को इकट्ठा कर एक ही दिशा में होशपूर्वक , बोधपूर्वक बढ़ते हो, तो तुम भीड़ नहीं रहते बल्कि एक संगठन हो जाते हो।
साधारणतया तुम एक भीड़ हो; तुम्हारे भीतर बहुत सी आवाजें हैं। एक कहती है, 'इस दिशा में जाओ।’ दूसरी कहती है, 'यह तो बेकार है। उधर जाओ। और यदि तुम आत्मवान ,अखंड नहीं हो, तो तुम जहां कहीं भी जाओगे; कभी कहीं चैन से नहीं रहने पाओगे।
तुम सदा ही कहीं न कहीं जा रहे होओगे और कभी कहीं नहीं पहुंचोगे। वह जीवन जो 'यम' के विपरीत है, विक्षिप्त हो जाएगा। जब तक तुम आत्मवान न हो जाओ, तुम मुक्त नहीं हो सकते हो। तुम्हारी स्वतंत्रता एक आडम्बर के सिवाय और कुछ न होगी।
तुम स्वयं को, अपनी संभावनाओं, अपनी ऊर्जाओं को नष्ट कर दोगे और अनुभव करोगे कि जीवन भर इतनी कोशिश की, लेकिन पाया कुछ भी नहीं...उससे कोई विकास नहीं हुआ। जब तक तुम आत्म संयमी नहीं होते, दूसरा चरण 'नियम' की संभावना नहीं है।'
नियम' का अर्थ हैं एक सुनिश्चित नियमन : वह जीवन जो अव्यवस्थित नहीं अनुशासित है। जब तक तुम्हारे जीवन में नियमितता , अनुशासन नहीं आता, तब तक तुम अपनी वृत्तियों के गुलाम ही रहोगे।
क्रमश:
09/07/2024, 7:41 am - स्वर विज्ञान: अष्टांग योग का दूसरा आयाम 'नियम' 'नियम' का अर्थ हैं एक सुनिश्चित नियमन : वह जीवन जो अव्यवस्थित नहीं अनुशासित है। जब तक तुम्हारे जीवन में नियमितता , अनुशासन नहीं आता, तब तक अपनी वृत्तियों के गुलाम ही रहोगे ।
तुम्हारे भीतर बहुत से अप्रकट मालिक होंगे ; और वे तुम पर शासन करते रहेंगे। जिसके पास नियमितता होती है, केवल वही मालिक हो सकता है। वास्तव में असली मालिक तभी प्रगट होता है जब आठवां चरण पा लिया जाता है ..जो कि लक्ष्य है।
तब व्यक्ति मुक्तिदाता हो जाता है क्योंकि यदि तुम मुक्ति पा गए हो, तो अचानक तुम दूसरों के लिए मुक्ति देने वाले हो जाते हो। तुम उन्हें मुक्ति देने की कोशिश नहीं करते हो..केवल तुम्हारी उपस्थिति ही एक मुक्तिदायी प्रभाव बन जाती है।
नियम: पाँच व्यक्तिगत नैतिकता
1 शरीर की शुद्धि। यानी बाहरी ओर आंतरिक हर प्रकार से स्वछ रहा जाए ।
2 सन्तुष्ट ,प्रसन्न रहना। किसी प्रकार की तृष्णा का न होना ही सन्तोष है।
3 तप से अनुशासित रहना। दूसरे शास्त्रों में वर्णन किये गये चान्द्रायण इत्यादि तप है।
4 स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना। प्रणव पूर्वक, ओंकार के साथ मन्त्रों का जप, पाठ करना स्वाध्याय है।
5 ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा।
क्रमश:
09/07/2024, 7:43 am - स्वर विज्ञान: अष्टांग योग का तीसरा आयाम है आसन। आसन का शाब्दिक अर्थ है- बैठना, बैठने का आधार, बैठने की विशेष प्रक्रिया, शरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए इसका विधान मिलता है। जब जीवन में नियमितता होती, तभी आसन उपलब्ध होता है।
उदाहरण के लिए यदि तुम कभी मौन बैठने का प्रयास करो तो नहीं बैठ सकते , शरीर विद्रोह करने की कोशिश करता , शरीर के बहुत से हिस्सों में एक बेचैनी अनुभव होती, ऐसा लगता कि चींटियां रेंग रही हैं। जबकि आंख खोल कर पाओगे कि कहीं कोई चींटियां नहीं हैं।
वास्तव में, शरीर धोखा दे रहा ,अनुशासित नही होना चाहता क्योकि शरीर बिगड़ चुका है , वह स्वयं अपना मालिक बन गया है। आसन का अर्थ है एक विश्रांत मुद्रा। उस विश्राम के क्षण में, अचानक, तुम शरीर का अतिक्रमण कर जाते हो; चेतना ऊर्ध्वगामी हो जाती है।
शरीर समस्याएं खड़ी करता है, क्योंकि एक बार समस्या खडी हो जाए, तो तुम्हें लौटना ही पड़ेगा। यह शरीर की चालाकी है कि यहीं रहो.. ''बंधे रहो शरीर से और धरती से।’' तुम आकाश की ओर बढ़ रहे हो, तो शरीर भयभीत होने लगता है।
''प्रयत्न की शिथिलता और असीम पर ध्यान से आसन सिद्ध होता है''। क्या तुमने कभी ध्यान दिया है कि जब तुम किसी थिएटर में कोई फिल्म देखने जाते हो तो कितनी बार तुम अपने बैठने का ढंग बदलते हो? अगर पर्दे पर कोई बहुत सनसनीखेज सीन चल रहा होता है।
तो तुम कुर्सी पर आराम से टिके हुए बैठ नही सकते। तुम सीधे बैठ जाते हो; तुम्हारी रीढ़ सीधी हो जाती है। अगर कुछ उबाऊ बात चल रही होती है। तो तुम शिथिल रहते हो। अगर कुछ बहुत ही अप्रीतिकर सीन चल रहा होता है, तो तुम बार -बार अपना बैठने का ढंग बदलते हो।
अगर सच में कोई सुंदर बात वहां चल रही होती है, तो तुम्हारी आँख का झपकना तक रुक जाता है। कोई गति नहीं होती, तुम बिलकुल स्थिर हो जाते हो, अकंप, जैसे कि शरीर हो ही नहीं। क्या तुमने इन बातों के आपसी संबंध को देखने की कोशिश की है?
आसन की सिद्धि में पहली बात है प्रयास की शिथिलता, जो इस संसार की सर्वाधिक कठिन बातों में से एक है। यदि तुम उसे समझ लेते हो तो बहुत सरल है, यदि तुम नहीं समझते तो बहुत कठिन है। यह किसी अभ्यास की बात नहीं है; समझ की बात है।
कुछ चीजें हैं जिन्हें तुम करना चाहते हो, तो कृपया उन्हें करने की कोशिश मत करना, अन्यथा विपरीत प्रभाव होगा। तुम्हें नींद नहीं आ रही है। तो प्रयास मत करना नींद लाने का। यदि तुम प्रयास करते हो, तो नींद और मुश्किल हो जाएगी।
यदि ज्यादा प्रयास करते हो तो नींद असंभव हो जाएगी, नींद तभी आती है जब कोई प्रयास नहीं होता। बस विश्राम में होते हो और कुछ नहीं। तुम नींद के विषय में सोच तक नहीं रहे होते। कुछ चित्र गुजरते हैं मन से... तुम उन्हें तटस्थ भाव से देखते हो।
तुम्हें उनमें भी कोई बहुत ज्यादा रस नहीं होता है , क्योंकि यदि रस पैदा हो जाए तो नींद खो जाती है। बस तुम उनसे अलग बने रहते हो, लेटे रहते हो, विश्राम कर रहे होते हो, कोई लक्ष्य नहीं तो नींद आ जाती है। अप्रयास एक अदभुत घटना है। यह जान लो तो सब संभव हो जाता हैं।
तुम्हें तो बस विश्राम में होना है। इस विषय में बहुत प्रयास मत करना; अनुभूति को ही काम करने देना। तुम आराम को अपने ऊपर नहीं थोप सकते हो? यह असंभव है। तुम विश्राम में हो सकते हो यदि तुम सहजता से शिथिल हो जाओ।
जब आसन सिद्ध हो जाता है तब द्वंद्वों से उत्पन्न अशांति की समाप्ति होती है''। जब शरीर सच में ही सुख में होता है, विश्रांत होता है, शरीर की लौ कैप नहीं रही होती स्थिर होती है, कोई गति नहीं होती—अचानक जैसे समय रुक गया हो, कोई हवा न चल रही हो।
प्रत्येक चीज स्थिर और शांत हो और शरीर में कोई उत्पेरणा न हो हिलने —डुलने की, वह थिर हो, गहनरूप से संतुलित, शांत, मौन, अपने स्वभाव में स्थित. उस अवस्था में सभी द्वंद्व समाप्त हो जाते और द्वंद्वों के कारण उत्पन्न अशांति समाप्त हो जाती है।
जब भी मन अशांत होता है तो तुम्हारा शरीर भी अशांत और बेचैन होता है, जब शरीर बेचैन होता है तो तुम्हारा मन मौन नहीं हो सकता? वे दोनों जुड़े हैं। शरीर और मन एक ही चीज है। तुम मनोशरीर हो। शरीर केवल तुम्हारे मन का प्रारंभ है और कुछ भी नहीं है।
जो कुछ भी शरीर में घटता है वह मन को प्रभावित करता है और जो कुछ भी मन में घटता है वह शरीर को प्रभावित करता है। इसलिए शरीर पर इतना जोर है, क्योंकि अगर तुम्हारा शरीर विश्राम में नहीं है। तो मन भी शांत नहीं हो सकता। और शरीर के साथ शुरू करना आसान है।
क्योंकि यह सब से बाहरी पर्त है। बहुत से लोग मन के साथ प्रारंभ करने का प्रयास करते हैं और असफल होते हैं, क्योंकि उनका शरीर सहयोग नही देता यदि तुम शरीर की शांत अवस्था को उपलब्ध हो जाते हो, तो अचानक तुम पाओगे कि मन स्थिर हो रहा है।
मन हमेशा बाएं-दाएं डोलता रहता है । दोनों अतियां बोझिल होती हैं,तब तुम आराम में नहीं हो सकते। आराम होता है मध्य में, क्योंकि मध्य में बोझ नहीं होता। ठीक -ठीक मध्य में तुम निर्भार होते हो। बाईं ओर झुको, और बोझ हो जाता है। दाईं ओर झुको, और बोझ हो जाता है।
जितना ज्यादा मध्य से दूर जाते हो, उतना ही ज्यादा बोझ बढ़ता जाता है। मध्य में रहो। क्योंकि सारे द्वैत हैं ...तुम निरंतर इस ओर से उस ओर डोलते रहते हो। जब आसन सिद्ध हो जाता है, तब द्वंद्वों से उत्पन्न अशांति की समाप्ति होती है।
जब कहीं कोई द्वैत नहीं बचता, तब तुम कैसे तनावपूर्ण , परेशानी में रह सकते हो? जब तुम्हारे भीतर दो होते हैं, वे दो लड़ते ही रहते हैं, और वे तुम्हें कभी विश्राम में न रहने देंगे। जब यह द्वैत तिरोहित हो जाता है, तो तुम शांत, केंद्रस्थ, मे होते हो।
संतुलित व्यक्ति यदि महल में है, तो वह महल का सुख लेता है। यदि महल न हो तो वह झोपड़ी का आनंद लेता है। कैसी भी स्थिति हो, वह प्रसन्न और संतुलित रहता है। न तो वह महल के पक्ष में होता है और न वह, उसके विरोध में होता है। महृषि पतंजलि कहते हैं ।
बाह्य आसन शरीर से संबंधित आंतरिक आसन मन से संबंधित है और दोनों जुड़े हुए हैं। जब शरीर मध्य में होता है तो मन भी मध्य में होता है -शांत और मौन होता है। जब शरीर शांत होता है, तो शरीर भाव तिरोहित हो जाता है, जब मन विश्राम में होता है, तो मन तिरोहित हो जाता है।
तब तुम केवल आत्मा हो... इंद्रियातीत, जो न शरीर है और न मन। महृषि पतंजलि नहीं कह रहे हैं, 'ऐसा करो।’ वे तो बस मार्ग दिखा रहे हैं। यदि तुम उसे समझ लेते हो , तो वह तुमको, तुम्हारे मार्ग को, तुम्हारे अंतस को प्रभावित करने लगेगा । उसे आत्मसात करो ;गहरे उतरने दो।
बहने दो अपने रक्त में ..बनने दो मांस -मज्जा। ये सूत्र स्मृति में रख लेने को नहीं है, इन्हें प्राणों में उतारने की जरूरत है। तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व को बात समझ में आनी चाहिए।बस इतना ही वे अपना काम शुरू कर देती हैं 'और असीम पर ध्यान से आसन सिद्ध होता है''।
यदि तुम शब्दों के , दर्शन के, सिद्धांतो के विषय में सोचते हो। तो ये सब सीमित बातें हैं। लेकिन यदि तुम परमात्मा के विषय में सोचते हो तो एक शून्य आ जाता है। तुम देखते हो स्वयं को । इस भांति तुम आसन सिद्ध करते हो और यह केवल शुरुआत है,और गहरे उतरना होता है।
10/07/2024, 6:30 am - स्वर विज्ञान: अष्टांग योग का चोथा आयाम है प्राणायाम। यह सिद्ध होता है श्वास और प्रश्वास पर कुंभक करने से।शरीर और मन के बीच श्वास एक सेतु है ,आसन में स्थिर शरीर, असीम में विलीन होता मन और श्वास का सेतु जो कि उन्हें जोड़ता , यह तीनों चीजें एक सम्यक लय में होनी चाहिए।
जब भी मन बदलता है, तो श्वास बदल जाती है। इसके विपरीत यह बात भी सच है कि यदि श्वाश का ढंग बदलो तो मन बदल जाता है। जब तुम शांत और मौन होते हो, तो अच्छा अनुभव करते हो। विश्राम करते हुए श्वास पर ध्यान देना, वह बहुत धीमी चलती है।
आप उसे अनुभव भी नहीं करते कि वह चल भी रही है या नहीं और जब क्रोधित होते हो, तो ध्यान देना। श्वास तुरंत बदल जाती है। प्रत्येक भाव दशा के साथ श्वास की लय भिन्न होती है। श्वास एक सेतु है।
जब शरीर स्वस्थ होता है, तो श्वास अलग ढंग से चलती है। शरीर अस्वस्थ होता है तो श्वास अलग ढंग से चलती है। प्राणायाम शब्द का अर्थ है प्राण -ऊर्जा का विस्तार। प्राण =आयाम : प्राण का अर्थ है श्वास में छिपी प्राण -ऊर्जा, और आयाम का अर्थ है असीम विस्तार।
प्राणो को उसके आयाम तक पहुंचाना। इस ढंग से श्वास लेना कि तुम अस्तित्व की श्वास के साथ एक हो जाते हो कि तुम अलग से श्वास नहीं ले रहे, तुम समग्र के साथ श्वास ले रहे हो। प्रयोग करके देखना : दो प्रेमी साथ साथ बैठे हैं तो वे पाते हैं कि वे एक साथ श्वास ले रहे हैं।
कभी सजग होकर देखना जब अपने मित्र के साथ बैठे हो, तो तुम साथ -साथ श्वास ले रहे होओगे। यदि कोई उबाने वाला बैठा है और तुम उससे छुटकारा पाना चाहते हो, तो तुम अलग -अलग श्वास लोगे; तुम्हारी श्वास आपस में बिलकुल लयबद्ध न होगी।
कभी किसी वृक्ष के पास बैठना। यदि तुम शांत हो, आनंदित हो, तो अचानक तुम पाओगे कि वृक्ष,उसी ढंग से श्वास ले रहा है, जिस ढंग से तुम श्वास ले रहे हो। और एक घड़ी आती है जब तुम अनुभव करते हो कि तुम समग्र के साथ श्वास ले रहे हो।
तुम समग्र की श्वास के साथ लयबद्ध हो जाते हो। तुम फिर लड़ नहीं रहे होते, संघर्ष नहीं कर रहे होते। तुम समर्पित होते हो कि अलग श्वास लेने की जरूरत नहीं रह जाती है। गहन प्रेम में लोग साथ -साथ श्वास लेते हैं। घृणा में ऐसा कभी नहीं होता।
अगर तुम किसी के प्रति विरोध रखते हो तो चाहे वह हजारों मील दूर क्यों न हो ;तुम अलग -अलग श्वास लोगे; तुम एक साथ श्वास नहीं ले सकते। यह एक अनुभूति है। आप भारत में हो, और तुम्हें पता भी न हो कि तुम्हारा प्रेमी कहां है ;लेकिन तुम साथ-साथ ही श्वास लोगे।
ऐसा ही होना चाहिए और होता है। कुछ प्रमाण हैं जो संकेत देते हैं। उदाहरण के लिए टेलीपैथी पर कुछ प्रयोग चलते हैं। इस टेलीपैथी के प्रयोग में दो व्यक्ति, बहुत दूर होते हैं। एक व्यक्ति संदेश भेजता , दूसरा व्यक्ति संदेश ग्रहण करता है।
निश्चित समय पर, कोई व्यक्ति संदेश भेजना शुरू करता है। वह त्रिभुज का आकार बनाता है, उस पर चित्त को एकाग्र करता है और संदेश भेजता है कि 'मैंने त्रिभुज बनाया है। और दूसरा व्यक्ति उसे ग्रहण करने की कोशिश करता है। बस खुला रहता है, संवेदनशील रहता है ..क्या संदेश आ रहा है।
वैज्ञानिकों ने निरीक्षण किया है कि यदि वह त्रिभुज को पकड़ पाता है तो वे दोनों एक ही ढंग से श्वास ले रहे होते हैं; यदि वह त्रिभुज को चूक जाता है तो वे एक ही ढंग से श्वास नहीं ले रहे होते हैं। श्वास की गहन लयबद्धता में कोई सेतु तुम्हें जोड़ता है; तुम एक हो जाते हो।
तब अनुभूति दूसरे तक पहुंच सकती है, विचार दूसरे तक पहुंच सकते हैं। यदि तुम किसी संत से मिलने जाओ तो सदा उसकी श्वास पर ध्यान देना। और यदि तुम एक संवाद अनुभव करते हो। उसके साथ एक गहन प्रेम अनुभव करते हो, तो फिर अपनी श्वास पर भी ध्यान देना।
तुम अचानक अनुभव करोगे कि तुम्हारी भाव -दशा, तुम्हारी श्वास उसके साथ मेल खाने लगती है। जाने या अनजाने ; लेकिन यह होता है। प्राणायाम का मतलब है : समग्र के साथ श्वास लेना। तब जीवन-ऊर्जा फैलती चली जाती है पेड़ों, पहाड़ों और आकाश और सितारों के साथ।
तब एक घड़ी आती है, जब तुम बुद्ध हो जाते हों—तुम पूरी तरह खो जाते हो। अब तुम श्वास नहीं लेते, समग्र श्वास लेता है तुम में। अब तुम्हारी श्वास और समग्र की श्वास अलग नहीं होती। वे एक होती हैं। इतनी एक होती हैं कि अब यह कहना व्यर्थ होता है कि 'यह मेरी श्वास है।
जब स्वास लेते हो, और जब श्वास पूरी तरह भीतर होती है और कुछ क्षणों के लिए श्वास ठहर जाती है। ऐसा ही तब होता है जब तुम श्वास बाहर छोड़ते तो। तुम श्वास बाहर छोड़ते हो, जब श्वास पूरी तरह बाहर होती है, तब फिर कुछ क्षणों के लिए श्वास ठहर जाती है।
उन घड़ियों में तुम्हारा मृत्यु से साक्षात्कार होता है, और मृत्यु से साक्षात्कार परमात्मा से साक्षात्कार है। क्योंकि जब तुम मिट जाते हो, परमात्मा अवतरित होता है तुम में। जब श्वास ठहर जाती है; न बाहर जाती है न भीतर आती है, तुम उस अवस्था में होते हो जैसे मृत्यु की घड़ी होगे।
एक पल को तुम्हारा मृत्यु से साक्षात्कार हो जाता है -श्वास ठहर गई होती है। पूरा 'विज्ञान भैरव तंत्र' इस प्रक्रिया पर आधारित है, क्योंकि यदि तुम उस अंतराल में प्रवेश कर सको , तो वही द्वार है। लेकिन वह बहुत सूक्ष्म और संकरा है।
कबीर ने कहा है, 'दो नहीं गुजर सकते साथ -साथ, केवल एक ही गुजर सकता है। मार्ग इतना संकरा है कि यदि तुम्हारे भीतर भीड़ है, तो तुम नहीं गुजर सकते। यदि तुम दो में भी बंटे हुए हो बाएं और दाएं ;तो भी तुम नहीं गुजर सकते।
यदि तुम एक हो, एक समस्वरता, एक अखंडता, तो तुम गुजर सकते हो। मार्ग संकरा है , सीधा है, निश्चित ही वह सीधा परमात्मा की तरफ जाता है, लेकिन बहुत संकरा है। तुम अपने साथ किसी को नहीं ले जा सकते। तुम अपने साथ अपनी चीजें नहीं ले जा सकते।
तुम अपना ज्ञान नहीं ले जा सकते। तुम अपना त्याग नहीं ले जा सकते। असल में तुम अपना अहंकार भी नहीं ले जा सकते ।'तुम्हीं' गुजरोगे वहां से, लेकिन तुम्हारे शुद्धतम अस्तित्व के अतिरिक्त बाकी हर चीज द्वार पर छोड़ देनी होती है । और यही क्षण हैं मार्ग को देख लेने के।
जब श्वास भीतर जाती है और ठहर जाती है ...पल भर को; जब श्वास बाहर जाती है और ठहर जाती है। इन अंतरालों के प्रति, इन क्षणों के प्रति और भी सजग होना। इन अंतरालों के द्वारा परमात्मा तुम में प्रवेश करता है..हम इसे बहुत सोच समझ कर देवता कहते हैं।
असल में मृत्यु ज्यादा गहरी है। जब तुम श्वास भीतर लेते हो। तो उसे थोड़ी देर रोकना, ताकि 'द्वार' अनुभव किया जा सके। जब तुम श्वास बाहर छोड़ते हो, तो उसे थोड़ी देर बाहर रोकना, ताकि तुम उस शून्य अंतराल को ज्यादा आसानी से अनुभव कर सको।
'उपरोक्त प्राणायामों की अवधि और आवृत्ति देश काल और संख्या के अनुसार ज्यादा लंबी और सूक्ष्म होती जाती है''। इन अंतरालों का जितना ज्यादा तुम अभ्यास करते हो, उतना ज्यादा विस्तीर्ण होता है ''द्वार''; तुम उसे उतना ज्यादा अनुभव करने लगते हो।
जब भी तुम कुछ नहीं कर रहे हो, तो श्वास को भीतर लेना और रोक लेना। उसे वहां अनुभव करना; वहीं कहीं द्वार है। वहां अंधेरा है; द्वार तुरंत ही नहीं मिल जाता है, तुम्हें टटोलना होगा ..लेकिन तुम पा लोगे। और जब भी तुम श्वास को रोकोगे, तुरंत ही विचार ठहर जाएंगे।
अचानक श्वास रोक देना और तुरंत प्रवाह रुक जाता है और विचार ठहर जाते हैं, क्योंकि विचार और श्वास दोनों संबंधित हैं। इस जीवन से, दूसरे दिव्य जीवन में, श्वास की जरूरत नहीं है। तुम जीते हो, श्वास की कोई जरूरत नहीं होती, विचारों की कोई जरूरत नहीं होती।
विचार और श्वास भौतिक संसार का हिस्सा हैं। निर्विचार, निःश्वास ...वे शाश्वत जीवन का हिस्सा हैं। ''प्राणायाम का चौथा प्रकार आंतरिक होता है और वह प्रथम तीन के पार जाता है''। भीतर रोकना, बाहर रोकना, अचानक रोकना। और चौथा प्रकार आंतरिक है।
चौथे प्रकार पर बुद्ध ने बहुत जोर दिया है, वे इसे कहते हैं, 'अनापानसती योग'। वे कहते हैं, 'बस श्वास की पूरी प्रक्रिया को देखते रहना।’ श्वास भीतर जाति फिर एक ठहराव आता है ..जब श्वास भीतर जा चुकी होती है तो एक पल के लिए ठहरती है।
उस ठहराव को देखना। कुछ करना मत; बस देखते रहना। फिर श्वास बाहर की यात्रा पर चल देती है ...देखते रहना। जब श्वास पूरी तरह बाहर होती है तो फिर एक क्षण के लिए ठहरती है ..उसको भी देखना। फिर श्वास भीतर आती है, बाहर जाती है, तुम बस देखना।
यह चौथा प्रकार है,केवल देखते रहने से ही तुम श्वास से अलग हो जाते हो। जब तुम श्वास से अलग हो जाते हो, तब तुम विचारों से अलग हो जाते हो। असल में शरीर में श्वास की प्रक्रिया मन में विचारों की प्रक्रिया के समानांतर ही है। मन में विचार चलते हैं ;शरीर में श्वास चलती है।
वे समानांतर शक्तियां हैं... एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। महृषि पतंजलि भी चौथे प्राणायाम की ओर संकेत करते हैं। गौतम बुद्ध ने भी अपना पूरा ध्यान चौथे प्राणायाम पर ही केंद्रित कर दिया। वे प्रथम तीन की बात ही नहीं करते। संपूर्ण बौद्ध ध्यान चौथे प्राणायाम पर ही आधारित है।
प्राणायाम का चौथा प्रकार' जो कि साक्षी होना है ' आंतरिक होता है और वह प्रथम तीन के पार जाता है।’महृषि पतंजलि बहुत वैज्ञानिक हैं ;वे योग के विषय में वह सब कहते जाते हैं ...जो भी कहा जा सकता है। इसीलिए वे योग के आदि और अंत हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं, है अर्जुन, योग-यज्ञ के द्वारा व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो जाता है। योगीजन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगी प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के परायण होते हैं।
हम परमात्मा से बहुत-बहुत भांति से जुड़े हुए हैं। जैसे एक वृक्ष एक ही जड़ से नहीं जुड़ा होता पृथ्वी से, बहुत जड़ों से जुड़ा होता है। हम भी अस्तित्व से बहुत जड़ों से जुड़े हुए हैं, और इसलिए अस्तित्व तक पहुंचने के लिए किसी भी एक जड़ के सहारे हम प्रवेश कर सकते हैं।
जीवन-ऊर्जा नाभि पर इकट्ठी है; यह एक द्वार है। जीवन-ऊर्जा प्राण पर भी संचालित है; श्वास पर भी। श्वास चलती है, तो हम कहते हैं, व्यक्ति जीवित है। श्वास गई, तो हम कहते हैं, व्यक्ति भी गया। श्वास पर सब खेल है। श्वास से ही शरीर और आत्मा जुड़ी है; श्वास सेतु है।
10/07/2024 sudhi nu chhe