धार्मिक कहानियाँ द्यौस देवता और उसकी संगिनी पृथ्वी कहानी

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"द्यौस देवता और उसकी संगिनी पृथ्वी कहानी"
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   वैदिक काल के प्राचीन मिथकों में द्यौस पितृ (Dyauṣ Pitṛ) एक महत्वपूर्ण देवता हैं, जिन्हें "पिता आकाश" या "स्वर्ग पिता" कहा जाता है। वे ऋग्वेद के सबसे पुराने देवताओं में से एक हैं और इंडो-यूरोपीय मिथकों के मूल देवता *द्येउस (Dyeus) से जुड़े हैं, जो ग्रीक के ज़ीउस (Zeus) और रोमन के जूपिटर (Jupiter) के समान हैं।धार्मिक कहानियाँ

द्यौस की संगिनी पृथ्वी माता (Prithvi Mata) हैं, जो धरती की देवी हैं। दोनों मिलकर ब्रह्मांड के आदि माता-पिता हैं। ऋग्वेद में उन्हें अक्सर एक साथ पूजा जाता है – द्यौस ऊपर से वर्षा करके पृथ्वी को उर्वर बनाते हैं, जैसे कोई बैल धरती रूपी गाय को गर्भित करता है। उनकी संतानें हैं: उषा (सुबह की देवी), अग्नि (अग्नि देव), सूर्य, आदित्य, मरुत और सबसे प्रमुख – इंद्र।

  प्राचीन समय में द्यौस और पृथ्वी एक-दूसरे से चिपके हुए थे, जिससे विश्व में कोई जगह नहीं थी जीवन के लिए। इंद्र ने अपने वज्र से द्यौस और पृथ्वी को अलग किया, जिससे आकाश ऊपर उठ गया और धरती नीचे स्थिर हो गई। इस अलगाव से विश्व की रचना हुई – बारिश गिरने लगी, नदियां बहने लगीं और जीवन फलने-फूलने लगा। यह वैदिक सृष्टि मिथक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

  कुछ ऋग्वेद के मंत्रों में संकेत मिलता है कि इंद्र ने अपने पिता द्यौस को हराया या उन्हें हटा दिया, ताकि वे स्वयं देवताओं के राजा बन सकें। द्यौस को कभी-कभी लाल बैल के रूप में चित्रित किया जाता है जो गर्जना करता है (गरजना अर्थात् मेघों की ध्वनि), या रात में मोतियों से सजे काले घोड़े के रूप में (मोती अर्थात् तारे)।
हालांकि द्यौस बहुत शक्तिशाली थे, लेकिन बाद के वैदिक काल में इंद्र ने उनकी जगह ले ली। इंद्र वर्षा और वज्र के स्वामी बने, जबकि द्यौस धीरे-धीरे कम महत्वपूर्ण हो गए। पुराणों में उनका नाम लगभग गायब हो जाता है। फिर भी, ऋग्वेद के कुछ सूक्तों (जैसे 1.89, 1.90, 4.17) में उन्हें पृथ्वी के साथ मिलकर स्तुति की जाती है – वे विश्व के रक्षक, उर्वरता के दाता और सभी देवताओं के पिता हैं।
द्यौस की कहानी हमें बताती है कि प्रकृति के नियम कैसे बदलते हैं – आकाश और धरती का मिलन जीवन देता है, लेकिन अलगाव से ही विश्व का विस्तार होता है। यह प्राचीन आर्यों की प्रकृति पूजा और ब्रह्मांडीय संतुलन की समझ को दर्शाती है।
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