प्रत्यङ्गिरा का रहस्य

प्रत्यङ्गिरा का रहस्य




प्रत्यङ्गिरा देवी तंत्रशास्त्र में वो शक्ति हैं जो न केवल रक्षा करती है, बल्कि आक्रमण को उसी दिशा में लौटा देती है जहां से वो आया है या उसका उद्गम हुआ है । उनका नाम ही अपने अर्थ में इस रहस्य को समेटे हुए है “प्रति” अर्थात् विपरीत और “अंगिरा” अर्थात् अंग या ऊर्जा। इस प्रकार प्रत्यङ्गिरा वह शक्ति है जो समस्त अंगों, इन्द्रियों और ऊर्जाओं को विपरीत दिशा में मोड़ देती है। यही कारण है कि वे केवल देवी नहीं, बल्कि “विपरीत-तत्त्व” हैं – ऐसी चैतन्य शक्ति है जो समस्त दुष्ट, असंतुलित या हिंसक प्रवाह को उसके स्रोत की ओर वापस भेज देती है।
तंत्रशास्त्र में देवी प्रत्यङ्गिरा को दशमहाविद्याओं के भीतर एक अदृश्य किन्तु अत्यंत प्रभावशाली तत्त्व के रूप में देखा गया है। वे किसी एक महाविद्या की उपशक्ति नहीं, बल्कि अनेक महाविद्याओं के मध्य उस संतुलन का कार्य करती हैं जहाँ शक्ति अपनी दिशा बदलती है। विशेषतः उनका सम्बन्ध बगलामुखी, धूमावती और काली से स्पष्ट रूप से प्रतिपादित मिलता है।

बगलामुखी जहाँ स्थम्भन की देवी हैं जो वाणी, मन और कर्म को रोक देती हैं वहीं प्रत्यङ्गिरा उसी स्थम्भन का विपरीत आयाम हैं। वे शत्रु या विरोधी शक्ति को रोककर केवल निष्क्रिय नहीं करतीं, बल्कि उसे उल्टा उसी दिशा में भेज देती हैं। रुद्रयामल तन्त्र में यह कहा गया है कि बगलामुखी स्थम्भन में निपुण हैं, पर उस स्थम्भन के विपरीत जो कार्य होता है, वही प्रत्यङ्गिरा का क्षेत्र है। इसीलिए तांत्रिक दृष्टि से प्रत्यङ्गिरा को “वज्रावरण-शक्ति” कहा गया है जो साधक के चारों ओर एक अदृश्य कवच निर्मित करती है।

धूमावती का तत्त्व नाश, शून्यता और क्षय से जुड़ा है। वे उस स्थिति का प्रतीक हैं जहाँ सब कुछ धुएँ की तरह विलीन हो जाता है। प्रत्यङ्गिरा इस विनाश को नियंत्रित करने वाली परा-शक्ति हैं। कालिका-तन्त्र में कहा गया है कि धूमावती जब नाश करती हैं, ये लेख आचार्या ऋतुराज द्वारा लिखा गया है अगर ये किसी दूसरे की पोस्ट के रूप मे आप को पढ़ने को मिल रहा तो वो व्यक्ति आधुनिक फ्रॉड है जो लोगो को भ्रमित करके लाभ उठाने की मानसा रखता है और वो आप का गुरु है पुनः विचारणीयविषय है आप के लिये ,वो गुरु है या चोर है कॉपी पेस्ट गैंग का सरदार है । तो प्रत्यङ्गिरा उसी नाश के भी नाश को संपन्न करती हैं। अर्थात् वे संतुलन की देवी हैं जो ऊर्जा को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं होने देतीं। धूमावती जहाँ अंधकार हैं, प्रत्यङ्गिरा वहाँ उस अंधकार में छिपी ज्वाला हैं जो रक्षा का प्रकाश बनती है।

काली से उनका सम्बन्ध और भी गूढ़ है। जब काली संहार की पराकाष्ठा पर पहुँचती हैं, जब सम्पूर्ण जगत की गति थमने लगती है, तब उसी कालिक-ऊर्जा को शमित करने वाली शक्ति प्रत्यङ्गिरा मानी गई हैं। प्रत्यङ्गिरा तन्त्र में कहा गया है कि जब काली प्रकोप करती हैं, तो उन्हें शान्त करने वाली शक्ति प्रत्यङ्गिरा स्वरूपिणी है। काली जहाँ काल का विस्तार हैं, प्रत्यङ्गिरा वहाँ काल का अवसान हैं एक ऐसी स्थिति जहाँ काल स्वयं स्थिर हो जाता है।

तंत्र के गूढ़ विभागों में प्रत्यङ्गिरा की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं प्रत्यङ्गिरा, विपरीत प्रत्यङ्गिरा और महाविपरीत प्रत्यङ्गिरा। सामान्य प्रत्यङ्गिरा वह शक्ति है जो साधक की रक्षा करती है, विपरीत प्रत्यङ्गिरा वह रूप है जो दुष्प्रभावों को पलट देती है, और महाविपरीत प्रत्यङ्गिरा वह परात्पर तत्त्व है जो किसी भी दिशा से आने वाली ऊर्जा को निष्क्रिय कर देती है। रुद्रयामल में कहा गया है कि जो देवी विपरीत कहलाती हैं वही परा रूप में महाविपरीत कही गई है। यह महाविपरीत प्रत्यङ्गिरा न केवल बाह्य आक्रमणों से रक्षा करती है, बल्कि साधक के भीतर उठने वाले आत्म-विनाशकारी विचारों, भय और संशय को भी पलट देती है।

विदेशी तांत्रिक-अध्ययनकर्ताओं ने भी प्रत्यङ्गिरा के तत्त्व को “counter-force” कहा है। डॉ. डेविड किन्सले ने उन्हें “the protective manifestation of the terrible feminine” बताया है, जबकि अलेक्सिस सैंडरसन ने प्रत्यङ्गिरा को महाविद्या-ऊर्जा के “reversal-current” के रूप में वर्णित किया है। श्रीलंकाई शैव परंपरा में वे नरसिंह की शक्ति मानी गई हैं जो रौद्र रूप को नियंत्रित करती है।
आज के समय में जब मानसिक, सामाजिक और ऊर्जात्मक असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है, प्रत्यङ्गिरा देवी का तत्त्व विशेष रूप से प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन में आक्रोश, असुरक्षा, नकारात्मक विचार और बाह्य ऊर्जा-प्रभाव मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देते हैं। ये लेख आचार्या ऋतुराज द्वारा लिखा गया है अगर ये किसी दूसरे की पोस्ट के रूप मे आप को पढ़ने को मिल रहा तो वो व्यक्ति आधुनिक फ्रॉड है जो लोगो को भ्रमित करके लाभ उठाने की मानसा रखता है और वो आप का गुरु है पुनः विचारणीयविषय है आप के लिये ,वो गुरु है या चोर है कॉपी पेस्ट गैंग का सरदार है प्रत्यङ्गिरा की साधना का अर्थ केवल > Jayesh: बाहरी शत्रुओं से रक्षा नहीं, बल्कि अपने अंदर के भय, संशय और विषाक्त प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें उसी दिशा में लौटा देना है जहाँ से वे उत्पन्न हुई थीं। माँ प्रत्यङ्गिरा साधना किसी आक्रमण का उत्तर नहीं, बल्कि चेतना की पुनःस्थिति है।

आज प्रत्यङ्गिरा देवी वह प्रतीक हैं जो यह सिखाती हैं कि हर शक्ति का उत्तर उसी दिशा में छिपा है, जहाँ से वह उठी है। उनके तत्त्व को समझना, अपने जीवन में संतुलन, विवेक और आत्म-रक्षा का गूढ़ विज्ञान है। जब साधक भीतर से स्थिर होता है, तब संसार का कोई भी प्रभाव , आघात उसे हिला नहीं सकता। प्रत्यङ्गिरा का स्मरण उसी आंतरिक स्थिरता का आह्वान है जहाँ हर विपरीत परिस्थिति अपने स्रोत में विलीन हो जाती है, और केवल शान्त, वज्रवत् चेतना शेष रहती है।

प्रत्यङ्गिरा का तत्त्व वैज्ञानिक दृष्टि से भी गहरे संबंध रखता है। जब कहा जाता है कि देवी “विपरीत प्रवाह” की अधिष्ठात्री हैं, तो यह विचार ऊर्जा-विज्ञान के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है। भौतिक विज्ञान में न्यूटन का तीसरा नियम कहता है “हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।” यही सिद्धांत प्रत्यङ्गिरा के कार्य में भी दिखाई देता है। जब किसी दिशा में आक्रमण या नकारात्मक तरंग (negative frequency) उत्पन्न होती है, तो प्रत्यङ्गिरा का तत्त्व उसी क्षण समान तीव्रता की विपरीत ऊर्जा उत्पन्न कर संतुलन स्थापित करता है। इस प्रकार वह एक cosmic feedback system की तरह कार्य करती हैं । ये लेख आचार्या ऋतुराज द्वारा लिखा गया है अगर ये किसी दूसरे की पोस्ट के रूप मे आप को पढ़ने को मिल रहा तो वो व्यक्ति आधुनिक फ्रॉड है जो लोगो को भ्रमित करके लाभ उठाने की मानसा रखता है और वो आप का गुरु है पुनः विचारणीयविषय है आप के लिये ,वो गुरु है या चोर है कॉपी पेस्ट गैंग का सरदार है। जहाँ ऊर्जा का संतुलन अपने आप पुनर्स्थापित हो जाता है। यही कारण है कि इन्हें तांत्रिक परंपरा में केवल विनाशकारी नहीं, बल्कि “संरक्षक शक्ति” भी कहा गया है, जो अंधकार का सामना उसी की ऊर्जा से करती है।

यदि इसे न्यूरो-विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो यह तत्त्व मस्तिष्क की “fight or flight” प्रतिक्रिया से संबंधित है। जब मनुष्य भय या तनाव के संपर्क में आता है, तो उसका nervous system दो रास्ते चुनता है या तो संघर्ष (fight) या पलायन (flight)। परंतु प्रत्यङ्गिरा की साधना साधक को तीसरा मार्ग सिखाती है ऊर्जा के प्रवाह को उलट देना। यह प्रतिक्रिया Neuro-regulation कहलाती है, जहाँ चेतना केवल प्रतिक्रिया नहीं करती, बल्कि उस ऊर्जा को रूपांतरित करती है। साधक धीरे-धीरे अपने भीतर ऐसी स्थिति विकसित करता है कि भय, क्रोध या विनाशकारी विचार आने पर भी उसकी प्राणशक्ति बाहर नहीं बिखरती, बल्कि केंद्र की ओर लौट आती है। यह inward movement ही प्रत्यङ्गिरा का आंतरिक विज्ञान है जहाँ साधक किसी नकारात्मक प्रभाव का विरोध नहीं करता, बल्कि उसकी दिशा पलट देता है।

इस प्रकार प्रत्यङ्गिरा केवल देवी नहीं, बल्कि ऊर्जा के उच्चतम विज्ञान का जीवंत प्रतीक हैं जो दिखाता है कि ब्रह्मांड में कोई भी शक्ति नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती; सब कुछ केवल दिशा पर निर्भर करता है। जब दिशा बदल दी जाती है, तो वही विनाशकारी शक्ति रक्षणकारी बन जाती है यही प्रत्यङ्गिरा का रहस्य है। 
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