क्या प्रारब्ध बदला जा सकता है?
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उत्तर ---- हां बदला जा सकता है। गीता और पातंजल योग दर्शन में ऐसे सूत्र हैं जो संकेत करते हैं कि प्रारब्ध भी बदला जा सकता है।(जीव भी ब्रह्म का अंश है। अतः जीव को मनुष्य योनि में परम स्वतंत्रता प्राप्त करने की सामर्थ्य प्राप्त हो सकती है। अतः जीव भी अपने प्रारब्ध में हेरफेर करने में समर्थ हो सकता है। यदि ऐसा संभव न हो तो फिर धर्म की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। धर्म की आवश्यकता ही इसलिए है कि जीव अपने कर्म बंधनों से मुक्त हो सके। )
यस्य सर्वे समारंभः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निघकर्माणं तमहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।
--- श्री मद्भगवद्गीता
जो अपनी समस्त कामनाओं संकल्पों (पूर्व संस्कारों)को ज्ञान की अग्नि में भस्म कर देता है,उस पुरुष को ज्ञानी जन पंडित कहते हैं।
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः।।३८।।
----विभूतिपाद,पातंजल योग दर्शन
बंधन के कारण कर्म की शिथिलता से चित्त की गति का ज्ञान होने से दूसरे के शरीर में प्रवेश किया जा सकता है।
( जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था।ऐसी कथा है)
चित्त के बंधन का कारण पूर्व कर्म और संस्कार होते हैं। कर्मों का फल भुगतने के लिए ही चित्त शरीर से बंधता है। अर्थात कर्मफल भुगतने के लिए ही शरीर प्राप्त होता है।जब साधक चित्त पर संयम करके चित्त की गति आदि को जान लेता है।तब वह अपने पूर्व संस्कारों को शिथिल करने में समर्थ हो जाता है।समाधि के द्वारा चित्त को निर्मल कर लेने वाला साधक को चित्त की गतियों का ज्ञान हो जाता है। चित्त की गतियों का ज्ञान होने से साधक दूसरे के शरीर में भी प्रवेश कर सकता है।
कर्म संस्कार दाग धब्बों की तरह चित्त पर चिपक जाते हैं।
जैसे अपने वस्त्रों की मलिनता पर ध्यान न देने से उनके संबंध में ज्ञान नहीं होता है। वैसे ही अज्ञान के कारण चित्त से चिपके हुए कर्म संस्कारों का ज्ञान नहीं होता है। जैसे हम अपने वस्त्रों की मलिनता जानकर उन्हें धो कर स्वच्छ साफ कर लेते हैं। वैसे ही योगी साधना और ज्ञान से अपने पूर्व कर्म और संस्कारों को नष्ट कर देते हैं।
संस्कार किस तरह प्रभावित करते हैं इसे हम सहजता ऐसे जान सकते हैं। जैसे हमें अपने वस्त्रों में लगे दाग धब्बों का ज्ञान न हो फिर भी हमें उन दाग धब्बों से ( जिन वस्तुओं से वह दाग धब्बे लगे हैं) सुगंध या दुर्गंध का अनुभव होता रहता है। इसी प्रकार पूर्व जन्म के कर्म और संस्कारों से शुभाशुभ का अनुभव होता रहता है।
अज्ञान में व्यक्ति सांसारिक विषयों में राग रखते हुए निरंतर अपने चित्त में संस्कारों को भरता रहता है। ज्ञानी अपने चित्त को साधना से संस्कारों से मुक्त करता रहता है। कामना और संस्कारों से मुक्त चित्त को ही निर्मल चित्त कहा जाता है।
कभी कभी कुछ क्षणों के लिए जाने अनजाने सभी लोग अनायास निर्मल चित्त की दशा में होते हैं। लेकिन प्रमाद वश वे उसको सहेज नहीं पाते उससे जानते हुए भी अनभिज्ञ रह जाते हैं।जब चित्त में सांसारिक विषयों का अभाव हो, चित्त शांत हो तब वह निर्मल दशा में होता है।योग साधक जानकर सदैव निर्मिल चित्त की दशा में रहने को तत्पर रहते हैं। निर्मल चित्त की दशा उर्वरा भूमि जैसी होती है। वे क्षण बहुत प्रभावकारी और महत्वपूर्ण होते हैं।
रिपोस्ट नये मित्रों के लिए
(चित्र ए आई से निर्मित काल्पनिक है)
