🌹🌹श्री गोरख तंत्र🌹🌹
इड़ा स्वर में योग्य कार्य
इसमें स्थिर व चर दोनों कार्य किए जाते हैं जैसे अलंकार बनवाना, फिर पहन कर दूर देश की यात्रा करना या घर बनवाना, धर्मशाला बनवाना,अन्न आदि वस्तुओं का संग्रह करना, तालाब बावड़ी कुआ सरोवर बनवाना ,देव मन्दिर की प्रतिष्ठा करना उनके लिए नीवं रखना, दान देना, विवाह आदि करना, वस्त्र खरीदना या बनवाना, तथा पहनना, शांत विचार से धर्म कार्य करना व्यापार करना ओषधि लाना, रसायन बनाना, बड़ों के दर्शन करना , खेतों में बीज बोना, शत्रु से संधि करना, मेल मिलाप करना आदि स्थिर कार्य चंद्र स्वर के चलते हुए करना शुभ हैं
पिंगला स्वर में योग्य कार्य
कठिन विद्या प्राप्त करना, अधम विद्या प्राप्त करना, स्त्री संयोग, वैश्या गमन, नाव जहाज पर चढ़ना, भ्रष्ट कार्य करना, देश विध्वंस करना, हथियार बनाना व चलाना, सीख कर शिकार खेलना, चोपाओं को बेचना, पत्थर घिसना, अथवा काठ को चीरना या चिरवाना, मशीन बनवाना, यंत्र मंत्र यंत्र की विद्या प्राप्त करना, गीतों का अभ्यास करना, किलें पर चढाई करना, पहाड़ी पर जाना, जुआ खेलना, चोरी करना, घोड़ा हाथी बैल रथ साधना, कसरत करना, मारन उच्चाटन कर्म करना, यक्षिनि भूत प्रेत वेताल को वश में करना, वशीकरण प्रयोग करना, युद्ध में भाग लेना, राजा से मिलना, भोजन करना, स्नान करना, त्यौहार मनाना, सभा को संबोधित करना, आदि कार्य सूर्य स्वर में करना अति उत्तम हैं
साधना विचार
यदि चंद्र स्वर के चलते समय सूर्य स्वर और सूर्य स्वर के चलते समय चंद्र स्वर चले तो साधना करने वाले साधक को चाहिए कि ऐसे समय में किसी बात का विचार या साधना न करें इसका फल विपरित होगा। जब तक स्वर अपने ठीक नियम पर न आएं साधना करना व्यर्थ हैं।
साधना करने वाले को चाहिए कि रात्रि के समय चंद्र स्वर का विचार न करें और दिन सूर्य स्वर की कोई साधना न साधे क्योंकि सूर्य स्वर में सूर्य का और चंद्र स्वर में चंद्र बन्द रहता हैं
वार विचार
चंद्र स्वर को गुरुवार शुक्रवार और बुधवार सुर्य उदय काल में चंद्र स्वर शुक्ल की प्राप्ति होगी तथा रविवार सोमवार मंगलवार को सुर्य स्वर फल दायक है
पक्ष विचार
यदि मंगलवार शनिवार को कृष्ण पक्ष में पिंगला नाड़ी का विचार किया जाए तो महान फल की प्राप्ति होगी। इसके विपरित शुक्ल पक्ष में गुरुवार शुक्रवार बुधवार में इड़ा नाड़ी का विचार करें तो अति उत्तम फल का दाता हैं इसके विपरित विचार करने से अशुभ फल की प्राप्ति होती हैं।
संक्रांत की चाल
वृष कर्क कन्या वृश्चिक मकर मीन यह स्वर तो चंद्र स्वर के हैं और मेष सिंह कुंभ तुला मिथुन धनु ये छह संक्रांत सुर्य स्वर के हैं।
तिथि विचार
यदि शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सुर्य के स्वर में चंद्रमा के स्वर में चलने लगें तो वह पुरूष के लिए उत्तम होगा इस समय में जो भी कार्य किया जायेगा वह सर्व सुखो का दाता होगा।
सुष्मना स्वर में योग्य कार्य
जब स्वर बार बार बदले यानी क्षण भर में चंद्र स्वर और क्षण भर में सुर्य स्वर चले तो सुष्मना स्वर जानना चाहिए। ऐसे समय में केवल गुरु मंत्र जप, प्रभु भजन, ईष्ट देव देवी मंत्र जप और योगाभ्यास करना चाहिए।
दर्पण पर तत्व ज्ञान
आईनें में अपने मुंह को देखकर उस पर अपनी स्वांस के द्वारा जों आकार दर्पण पर बने उससे तत्व का ज्ञान करना चाहिए
चौकोर पृथ्वी
अर्द्ध चंद्राकार जल
त्रिकोण अग्नि
गोल वायु
बिंदु आकाश
समझना चाहिए।
श्वांस से तत्व ज्ञान
यदि श्वांस नांक की नकुओं के बिल्कुल के बिल्कुल बीच में चलें तो जल तत्व और उपर की और श्वांस चलें तो अग्नि तत्व तिरछा श्वांस चलें तो वायु तत्व व भींचकर चले तो आकाश,मध्यम चलें तो पृथ्वी तत्व जानो।
मुख स्वाद से तत्व ज्ञान
जब भूमि तत्व चलें तो मुंह मीठा हो जाता है और जल तत्व के चलने पर मुख कसैला हो जाता हैं अगर चटपटा स्वाद मालूम हो तो अग्नि तत्व और खट्टा स्वाद हो तो वायु तत्व तथा कड़वा स्वाद मालूम तो आकाश तत्व जानें।
श्वांस की नाप से तत्व ज्ञान
जिस समय नाक श्वांस आठ अंगुल चलें वायु तत्व, चार अंगुल श्वांस चलें तो अग्नि तत्व समझें तथा बारह अंगुल लम्बाई हो तो पृथ्वी तत्व और सोलह अंगुल लम्बा होने पर जल तत्व जानो। जिस समय दोनों स्वर पूर्ण हो जाएं और बाहर उनको प्रकाश न दिखाई दे उस समय आकाश तत्व चलता हुआ जानें।
तत्व से कार्य सिद्धि का ज्ञान
भूमि तत्व के समय जो भी कार्य किया जायेगा वह देरी से सिद्ध होगा। जल तत्व में किया गया कार्य तत्काल फल देता है अग्नि तत्व में और वायु तत्व में जों कार्य किया जायेगा उससे हानि होती हैं आकाश तत्व में किए कार्य से निष्फलता प्राप्त होती हैं।
पृथ्वी तत्व का प्रभाव
पृथ्वी तत्व का रंग पीला होता हैं मध्यम गति से धीरे धीरे चलता है इसकी लंबाई ठोड़ी तक की होती हैं इस तत्व से धर्म के स्थिर सब कार्य किए जाते हैं पृथ्वी तत्व से सब कार्य सिद्ध होते हैं।
वायु तत्व का प्रभाव
वायु तत्व सदैव निचे की तरफ़ चलता हैं चाल इसकी शीघ्र गामी हैं अर्थात जल्दी जल्दी चलता हैं लंबाई इसकी सोलह अंगुल हैं और रंग इसका श्वेत शीतल गति वाला होता हैं यह तत्व शुभ कार्यों में अच्छा हैं।
अग्नि तत्व का प्रभाव
यह तत्व उपर को चलता हैं इसकी चाल भौंहों में रहती हैं वर्ण इसका लाल हैं अत्यन्त गर्म होता हैं चार अंगुल प्रमाण से सदैव ऊंचा चलता हैं यह तत्व क्रूर करने के लिए श्रेष्ठ हैं।
वायु तत्व का प्रभाव
इस तत्व की प्रकृति गर्म और रंग काला होता हैं कोई कोई विद्वान इसको हरा भी बताते हैं शीतल इसका वर्ण हैं यह आठ अंगुल प्रमाण वाला होता हैं यह तत्व चार कर्मों के लिए श्रेष्ठ हैं।
आकाश तत्व का प्रभाव
यह स्वर एक ही चाल पर सीधा चलता हैं और सब तत्वों के गुणों को बढ़ाने वाला है इस तत्व से योगाभ्यास किया जाता हैं इसका रंग नीला हैं
तत्वों से सिद्धि का समय
पृथ्वी तत्व सदैव दिन में सिद्धि की प्राप्ति करता है जल तत्व रात्रि में फल देता हैं अग्नि तत्व से मृत योग बनता है वायु तत्व से क्षय रोग होता हैं आकाश तत्व कभी कभी शुभ फलदायक भी होता हैं।
उपरोक्त सुर्य चंद्र स्वर ज्ञान गोरख तन्त्र से उद्धृत हैं अतः कोई भी कॉपी पेस्ट की चेष्टा न करें और इनको योगाभ्यास से सिद्ध किया जा सकता हैं अत कोई भी साधक साधिकाएं बिना गुरू निर्देशन में न करें या योग्य साधक की देखरेख में ही करें।
श्री नाथजी गुरुजी
की चरण कमल पादुका
को आदेश 🌹🌹🌹
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