धार्मिक कहानियाँ एक चोर ने जब सुना कि



एक चोर ने जब सुना कि उस प्राचीन मठ में खूब धन जमा है तो उसने उस धन को चुराने के लिए साधू का वेश बनाया और मठ के निकट ही एक पेड़ के नीचे साधना करने लगा ।
जल्दी ही उसकी कठिन जीवनचर्या के चर्चे आसपास से होते हुए मठ तक पहुंच गए ।
भले ही वो मठ के भीतर अभी तक दाखिल नहीं हुआ था पर उसका नाम भीतर जा चुका था ।
जाड़े की शुरुआत के दिनों में एक सुबह पूजा के लिए फूल तलाशने के बहाने वो टहलता हुआ मठ में पहुँचा तो वहाँ उसका स्वागत किया गया ।
मठ में उसे एक बात बड़ी विचित्र लगी कि मठ में बीचों बीच एक छोटी सी मूर्ति थी जिसके चारों तरफ लापरवाही से सोना बिखरा हुआ था ।STOTRA
उसने इस बारे में जब पूछा तो उसे बताया गया कि मठ दान के रूप में सोना ही स्वीकारता है इसलिए लोग यहाँ इस मूर्ति के सामने सोना चढ़ा देते हैं ।
मठ के मठाधीश ने उसे बताया कि इस मठ को बनाने और मठ के इतने धनवान होने के पीछे उस मूर्ति की ही जादुई शक्ति है ।
उसे बताया गया कि मूर्ति के सामने ईश ध्यान लगा कर जो भी कामना की जाती है वो पूरी हो जाती है ।
उसने शाम की पूजा में ईश्वर पर पूरा ध्यान लगा यह कामना की कि काश मठाधीश उसे मठ में एक रात रुकने की इजाजत दे देता ।
आश्चर्य जनक रूप से पूजा समाप्ति के तुरंत बाद मठाधीश ने मठ की तरफ से उसे रात्रि विश्राम का आतिथ्य प्रस्ताव दिया ।
रात की पूजा से पहले उसने मूर्ति के सामने ईशध्यान लगा यह कामना की कि रात में उसे सोना चुराने में कोई बाधा न आये ।
वाकई हुआ भी ऐसा ही ।
रात्रि भोज के बाद सारे लोग बेपरवाह हो गहरी निद्रा में चले गए ।
वो जितना ले जा सकता था उतना सोना और उस मूर्ति को चुरा भाग निकला ।
रात भर भागते हुए वो जितनी दूर निकल सकता था उतनी दूर निकल गया ।
सुबह उजाला हुआ तो उसने पाया कि वो नदी किनारे स्थित एक शमशान घाट के पास जा पहुँचा है ।
नजदीक की झाड़ी में सोना छुपा कर वो निवृत होने लगा तो उसे ख्याल आया कि कहीं कोई लुटेरा सोने के लालच में उसे ही मार डाले तो क्या होगा ।
उसने सुरक्षा की कामना के लिए मूर्ति पर ईशध्यान लगाने की सोची । पिछले काफी दिनों से आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाने के कारण उसका ईश्वर पर विश्वास बढ़ गया था और उस मूर्ति ने तो कमाल ही कर दिया था ।
मूर्ति को नदी के किनारे एक स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर उसने ईश्वर पर ध्यान केंद्रित किया और 
प्रार्थना की कि कोई उसके सोने को चुरा न पाए । नियमित साधू सन्यासियों की दिनचर्या अपनाते रहने से उसको महसूस ही नहीं हुआ कि वह केवल सुरक्षा के लिए पूजा आदि कर्म कर रहा था । वो ध्यान में रमता रह गया और उजाला बढ़ जाने से उसका सोने को सरे आम ले कर जाना कठिन हो गया । दोपहर तक लोगों का नदी तक आना जाना शुरू हो गया था । भीड़ बढ़ने के साथ ही उसकी चोरी पकड़े जाने और सोना चुरा दिए जाने की फिक्र बढ़ने लगी । उसके पास मूर्ति के सामने ध्यान केंद्रित कर धन की सुरक्षा की कामना करने के अलावा कोई विकल्प न था सो वो थोड़े थोड़े अन्तराल के बाद छुपाए सोने की जाँच कर आता और फिर मूर्ति के सम्मुख ध्यान में बैठ जाता । 
उसकी एकाग्र ध्यान अवस्था से प्रभावित कुछ लोग उसे फल फूल भी अर्पित कर गए ।
रात्रि होते ही वो सोने को समेट मूर्ति के साथ किसी अन्य स्थान के लिए चल पड़ा जहाँ उसकी चोरी की खबर न पहुँच पाए ।

इस तरह यह क्रम चलता गया । वो रात भर चुराए गए सोने और मूर्ति के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान भटकता और सुबह पुनः उसकी साधू की दिनचर्या शुरू हो जाती ।
बीच में उसने सोना बेचने की कोशिश की तो चोर उसकी ताक में पड़ गए और उसकी जान को खतरा बढ़ गया ।
जितनी दफा वो सोना बेचने की कोशिश करता उतना ही खतरा बढ़ता जाता । खतरे के बढ़ते ही उसकी साधना की एकाग्रता भी बढ़ जाती और वो नई जगह चले जाता ।

कुछ समय बाद उसे समझ आ गया कि सोना उसके काम का नहीं क्योंकि वो केवल बोझ ही बढ़ा रहा था और उसकी जान का खतरा बढ़ता जाता था । चोर पहचान लिए की डर से साधुओं का वेश और दिनचर्या भी नहीं टाल सकता था ।

कई नगर गाँव घूमने के बाद थक हार कर एक रात वो उसी मठ में लौट आया और मूर्ति और सोना वापस रख चुपचाप लौटने लगा तो दरवाजे पर मठाधीश खड़े मिले ।
मठाधीश ने उसे प्रणाम किया और मूर्ति को देशाटन करवा लाने हेतु आभार प्रकट किया और मठाधीश ने उससे निवेदन किया कि वो दूसरी सुबह की प्रार्थना तक रुक जाए ।

देशाटन हेतु मूर्ति ले कर जाने की बात सुन उसे बढ़ा आश्चर्य हुआ ।
पर चोरी के कृत्य को छुपाने के लिए यह अच्छा आवरण था ।

सुबह की प्रार्थना होने तक वो पुनः मूर्ति के सामने ध्यान लगा कर बैठ गया और इस बार उसकी कामना चोरी के कृत्य के सार्वजनिक होने से बचने की थी ।

सुबह की प्रार्थना में मठाधीश ने सबके सामने उसे धन्यवाद दिया और उसको बताया कि उस रात उनके स्वप्न में मूर्ति आयी और साधू के हाथों देशाटन की इच्छा जताई । उसे और मूर्ति को न देख वो लोग समझ गए थे कि मूर्ति साधू को ले कर देशाटन करने चले गयी है ।
यह संयोगों का चमत्कार था या उसके मूर्ति के सामने गरिमा बचाने की प्रार्थना की शक्ति कि उसकी चोरी छुप गयी और साधू की गरिमा बच गयी ।

चोर के खुद के साधु वेश की गरिमा के बचने का ख्याल ही उसके चोर कर्म के त्याग की सिद्धि बन गयी थी ।

धन चुराने आया चोर अब साधू बन उसी मठ में रहने लग गया ।
हालाँकि मूर्ति कभी कभी देशाटन कर आती थी ।
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